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  • भंगण मां — Vijendra Diwach

    भंगण मां — Vijendra Diwach

    Vijendra Diwach

    मैं एक औरत हूँ
    मेरी जाति मुझे भंगी बतायी गयी है,
    घर वालों ने बचपन से ही मुझे
    हाथों में झाड़ू पकड़ाई है,
    मेरी कमर में आभूषण के
    रूप में झाड़ू ही सजायी है।

    कोई मौसम नहीं देखते हैं
    बस निकल पड़ते हैं,
    कथित विद्वान चौक-रास्ते तो साफ करवाते हैं,
    लेकिन अपनी सामन्ती सोच पर कभी झाड़ू नहीं मारते हैं।

    गलियारे बुहारने पर मिल जाती है
    कुछ रोटियां और थोड़ा अनाज,
    कभी कोई बुलाकर पड़ोसियों को
    देता है पुराने कपड़ो का दान,
    खुला प्रदर्शन करके खुद ही खुद को
    समझता है बन्दा नवाज।

    एक सुबह
    जाने वाली बारात का बैंड-डीजे बज रहा था
    मेरी झाड़ू का तिनका-तिनका
    रात्रिभोज में कथित सभ्यजनों द्वारा फैलायी गयी
    गन्दगी पर चल रहा था,
    शादी की सफाई में
    कुछ हरी मिर्च और थोड़े टमाटर मिले,
    रात के थोड़े कचौरे-पकौड़े भी मिले,
    कुछ पकौड़े मुंह में डाले,
    कुछ परिवार के लिये थैले में डाले।

    एक बालक की नजर हम पर पड़ी,
    उसकी जुबान कुछ इस तरह से चली-
    मांजी ये कचौरे-पकौड़े बेसन के और कल के हैं,
    आप बीमार हो जाओगे,
    पेट बिगड़ जायेगा।

    मैंने भी उत्तर दिया-
    छप्पन भोग और खाने वालों के पेट खराब होते हैं,
    बेटा हमें कुछ नहीं होगा।

    वह फिर बोला-
    हरी मिर्च और टमाटर के बीज निकाल के खाना,
    सुना है इनके बीजों से पेट में पथरी बनती है,
    मैंने फिर जवाब दिया-
    बेटा जो पत्थर ही खाते हैं उनका क्या?
    ज़िन्दगी तो उनकी पत्थरों के सहारे ही चलती है।

    द्वार पर जाते ही
    सब कहते हैं भंगण मां आ गयी,
    ये मेरी तौहीन है या फिर मेरा सम्मान,
    मैं भी खुद को भंगण मां कहने लगी हूँ,
    भूल गयी मां-बाबा ने क्या रखा था मेरा असली नाम।

    आज भी हम शमशान घाट से कपड़े उठाते हैं,
    अर्थियों के कफनों से चादरें और कम्बले बनाते हैं,
    आधुनिक कहे जाने वाले युग में
    आज भी हम सामन्ती बेड़ियों में जकड़े जाते हैं,
    सभ्यता का ढोंग करके
    कुंठित लोग झूठे ही सभ्य होने का उत्सव मनाते हैं,
    ऐसे झूठे उत्सव केवल इंसानियत को छलाते हैं,
    एक नजर हम पर डालो
    देखों कैसे जीवन हम चलाते हैं।

    ये गलियारे तो हम सदियों से साफ कर रहे हैं,
    मगर समाज और देश के
    कथित विद्वानों अपने मन की भी सफाई करो,
    इंसान को इंसान समझों,
    सामान्य मानविकी को भी मानव स्वीकार करो,
    भंगी और हमारे जैसी अन्य मैला ढोंने वाली जातियों को,
    दिल अपना बड़ा करके
    माथे पर बल लाकर रोटी देने की जगह
    अपनेपन और शिक्षा का उपहार दो।
    हमने तुम्हारें घर गलियारों को बहुत साफ किया है,
    एक बार तुम भी हमारे घर गलियारों को देखों,
    अपनी आँखों की असली पट खोलो,
    हो यदि सच में तुम मानवीय तो
    देखकर हमारा ज़िंदगीनामा द्रवित हो तुम्हारा ह्रदय,
    तुम भी थोड़ा रो लो।

    हमारे बच्चों की कमर में झाड़ू की जगह
    कंधों पर किताबों का थैला हो,
    उनकी भी आँखों में सुंदर भविष्य का सपना हो,
    मानवता जगाने वाली शिक्षा से ही इनका वास्ता हो,
    ये चले हमेशा नैतिकता पर चाहे कैसा भी रास्ता हो।
    हमारी बेटियां भंगण मां नहीं अपने असली नामों से पहचानी जायें,
    हमारी बस्ती भी इंसानों की बस्ती समझी जायें।।

    Vijendra Diwach

  • विस्तृत

    विस्तृत

    Dheeraj Kumar

    जो था स्वयं विस्तृत
    ज्यादा विस्तार पाता हुआ
    विस्तारित हो चला…..

    स्वयं के भीतर 
    गहरे चलने की मार्ग की खोज का
    मार्ग प्रशस्त होता गया

    यद्यपि कि
    विस्तार का मार्ग से
    या, विस्तारित होने का चलने से
    प्रत्यक्ष या परोक्ष 
    कोई भी संबंध जोड़ना मुश्किल था
    तो भी….
    एक अदृश्य और अबूझ बंधन से
    मजबूती से बंधे हुए थे वे

    गहरे भीतर की हरेक यात्रा का
    ठहराव का बिन्दु
    समय के तीर की दिशा मे
    बहता ही चला गया……

    बहते जाने के क्रम मे
    मष्तिष्क या स्पेस की छननी मे
    आसन्न अवशेष के बचे रह जाने की संभावित अवधारणा
    ज्यों ज्यों तिरोहित होता गया
    अनजाना और अनदेखा सा 
    एक तल उभरने की 
    प्रक्रियागत रूझान सामने 
    दिखने लगा …..

    एक तल 
    जिसपर रूकने या पैर टिकाने की
    कोई संभावना या प्रायिकता 
    नही होनी थी
    बस
    स्वयं चलकर
    विस्तारित होते हुये
    विस्तृत हो जाना था….

    Dhiraj Kumar

  • खून का दबाव व मिठास

    खून का दबाव व मिठास

    Mukesh Kumar Sinha

    जी रहे हैं या यूँ कहें कि जी रहे थे 
    ढेरों परेशानियों संग 
    थी कुछ खुशियाँ भी हमारे हिस्से 
    जिनको सतरंगी नजरों के साथ 
    हमने महसूस कर
    बिखेरी खिलखिलाहटें

    कुछ अहमियत रखते अपनों के लिए 
    हम चमकती बिंदिया ही रहे
    उनके चौड़े माथे की

    इन्ही बीतते हुए समयों में 
    कुछ खूबियाँ ढूंढ कर सहेजी भी 
    कभी-कभी गुनगुनाते हुए 
    ढेरों कामों को निपटाया 
    तो, डायरियों में 
    कुछ आड़े-तिरछे शब्दों को जमा कर 
    लिख डाली थी कई सारी कवितायेँ 
    जिंदगी चली जा रही थी 
    चले जा रहे थे हम भी 
    सफ़र-हमसफ़र के छाँव तले

    पर तभी 
    जिंदगी अपने कार्यकुशलता के दवाब तले 
    कब कुलबुलाने लगी 
    कब रक्तवाहिनियों में बहते रक्त ने 
    दीवारों पर डाला दबाव
    अंदाजा तक नहीं लगा

    इन्ही कुछ समयों में 
    हुआ कुछ अलग सा परिवर्तन 
    क्योंकि 
    ताजिंदगी अपने मीठे स्वाभाव के लिए जाने गए 
    पर शायद अपने मीठे स्वाभाव को 
    पता नहीं कब 
    बहा दिया अपने ही धमनियों में 
    और वहां भी बहने लगी मिठास 
    दौड़ने लगी चीटियाँ रक्त के साथ

    अंततः
    फिर एक रोज 
    बैठे थे हरे केबिन में 
    स्टेथोस्कोप के साथ मुस्कुराते हुए 
    डॉक्टर ने 
    स्फाइगनोमैनोमीटर पर नजर अटकाए हुए 
    कर दी घोषणा कि
    बढ़ा है ब्लड प्रेशर 
    बढ़ गयी है मिठास आपके रक्त में 
    और पर्ची का बांया कोना 
    135/105 के साथ बढे हुए 
    पीपी फास्टिंग के साथ चिढ़ा रहा था हमें

    बदल चुकी ज़िन्दगी में
    ढेर सारी आशंकाओं के साथ प्राथमिकताएँ भी
    पीड़ा और खौफ़ की पुड़िया
    चुपके से बंधी मुट्ठी के बीच 
    उंगलियों की झिर्रियों से लगी झांकने
    डॉक्टर की हिदायतें व
    परहेज़ की लंबी फेहरिस्त
    मानो जीवन का नया सूत्र थमा 
    हाथ पकड़ उजाले में ले जा रही 
    माथे पर पसीने के बूँद 
    पसीजे हाथों से सहेजे
    आहिस्ता से पर्स के अंदर वाली तह में दबा
    इनडेपामाइड और एमिकोलन की पत्तियों से 
    हवा दी अपने चेहरे को

    फिर होंठो के कोनों से 
    मुस्कुराते हुए अपने से अपनों को देखा 
    और धीरे से कहा 
    बस इतना आश्वस्त करो 
    गर मुस्कुराते हुए हमें झेलो 
    तो झेल लेंगे इन 
    बेवजह के दुश्मनों को भी
    जो दोस्त बन बैठे हैं

    देख लेना, अगले सप्ताह 
    जब निकलेगा रक्त उंगली के पोर से
    तो उनमे नहीं होगी 
    मिठास 
    और न ही 
    माथे पर छमकेगा पसीना 
    रक्तचाप की वजह से

    अब सारा गुस्सा 
    पीड़ाएँ हो जायेंगी धाराशायी 
    बस हौले से हथेली को 
    दबा कर कह देना
    ‘आल इज वेल’
    और फिर हम डूब जाएंगे 
    अपनी मुस्कुराहटों संग 
    अपनी ही खास दुनिया में

    आखिर इतना तो सच है न कि
    बीपी शुगर से 
    ज्यादा अहमियत रखतें हैं हम

    मानते हो न ऐसा !!

    Mukesh Kumar Sinha

  • भारत की कला लोक हितकारी क्यों नहीं है?

    Sanjay Shramanjothe

    कला और सृजन के आयामों में एक जैसा भाईचारा चाहिए जो कि भारत में नहीं है। ऐसा क्यों है? ऐसा होना नहीं चाहिए, लेकिन है। सृजनात्मक लोगों के बीच इस तरह मेलजोल और एकता क्यों नहीं है? एकता एक नैतिक प्रश्न है अगर आपकी नैतिकता विखण्डन और विभाजन के चारे से बनी है तो सृजनात्मक आयामों में भी एकता नहीं बन पाएगी।

    इतिहास में देखें समाज के सबसे शक्तिशाली आयाम – राजनीति के प्रति भी हमारी जनता में एक उपेक्षा फैलाई गई थी जो अभी भी बनी हुई है- “कोउ नृप होय हमे का हानि”, ये वक्तव्य सभ्यता और एकता वाले समाज में असंभव है हाँ विभाजन वाले और असभ्य समाज में ये न केवल संभव है बल्कि यही उसके सार्वजनिक और सामाजिक जीवन का एकमात्र नियम भी है। कोई भी राजा हो हमें क्या मतलब – इसका अर्थ है कि आपके राजा और राजगुरु, राजसत्ता आपके हितैषी नहीं हैं और आपको उनसे कोई लगाव नहीं है। मतलब कि देश, इतिहास, भूगोल सहित धर्म और समाज की धारणा ही यातो अभी यहां जन्म नही ले पायी है या मिटा दी गयी है।

    ये धारणा क्यों जन्म नहीं ले पायी? या क्यों मिटा दी गयी? इस प्रश्न के उत्तर में भारत के पूरे इतिहास और मनोविज्ञान का सार छुपा हुआ है। अभी किसी गाँव में जाइये किसी हेण्डपम्प या तालाब या कुवें के पास खड़े हो जाइये अगर वो सूख रहा है तो पूरे गाँव को एक जैसा दुःख नहीं होता। समाज के एक बड़े वर्ग के लिए पानी का ये स्त्रोत उपलब्ध ही नहीं, उसे इस स्त्रोत के पास फटकने ही नहीं दिया जाता। ये ताल या हेण्डपम्प सूख मरे तो वे लोग कहेंगे हमे क्या मतलब सूखे तो सूख जाए।

    इसी तरह जिन व्यापारों, व्यवसायों में आपका या आपके परिवार, रिश्तेदारों का दखल या हित नहीं है उनके बन्द हो जाने पर या उन पर हमला हो जाने पर आप कह सकते हैं कि हमें क्या मतलब आपका बिजनेस डूबता है तो डूबे। इसी तरह जिन जातियों में आपके लोगों का भोजन या विवाह नहीं होता वे गुलाम हों या दंगे में मरें, आपको कोई फर्क नही पड़ता। अगर आपके रिश्तेदार और हितैषी हर जाति हर वर्ग में हों तो आपको उन जातियों वर्गों की ख़ुशी या सुख से सहानुभूति होगी।

    लेकिन भारत में एक किस्म का “सामाजिक वैराग्य” बनाकर रखा जाता है ये वैराग्य नहीं बल्कि पलायन और छुआछूत है, जिम्मदारी से भागने का दूसरा नाम है। इससे समाज विभाजित कमजोर और जातिवादी बना रहता है। इसीलिये गौर से देखिये तो साफ़ समझ में आएगा कि ओशो, रविशंकर, जग्गी वासुदेव जैसे भारतीय धर्मगुरु, योगी, बाबा आदि ऐसे वैराग्य और मोक्ष की धारणा से भरा जहरीला अध्यात्म हर एक पीढ़ी को पिलाते रहते हैं।

    ये बाबा हर पीढ़ी को पलायनवादी वेदांत सिखाते चलते हैं। इनका एकमात्र फायदा इस बात में है कि भारत की गरीब दलित दमित जनता इस सामंती और पुरुषसत्तावादी धर्म से आजाद न हो जाए। कर्मकांड न सही तो अध्यात्म की रस्सी से ही ये धर्म के खूंटे से बंधी रहे। ताकि उनका कुआँ न सूखे।

    इसी तरह आज के फ़िल्मकार साहित्यकार चित्रकार और सृजनधर्मी लोग हैं। सबके अपने कुवें और हेण्डपम्प है किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। यहां अपनी झोली भर जाए तो मोक्ष मिल जाता है बाकी समाज और दुनिया जाये भाड़ में अपना कुटुंब ही वसुधैव कुटुंब है।

    हसन निसार ने एक चर्चा में थॉमस रो का उदाहरण देते हुए कहा है कि अंग्रेजी अधिकारियों ने जब भारत में पैर फ़ैलाने शुरू किये तो मुगल दरबार में किसी बादशाह के बीमार बेटे का उन्होंने एलोपैथी से इलाज किया बेटा स्वस्थ हुआ तो बादशाह ने खुश होकर कहा कि इस अंग्रेज के वजन के बराबर सोना तौलकर इसे दिया जाए। अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि बादशाह मुझे ये सोना नहीं चाहिए बस मुझे और मेरी कौम को हिंदुस्तान से व्यापार की इजाजत दे दीजिए।

    इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। हालाँकि इसका ये अर्थ नहीं कि उन अंग्रेजो की लूटमार भरी नैतिकता सर्वथा प्रशंसनीय है। लेकिन फिर भी कुछ श्रेष्ठता का तत्व तो उनमें है ही। उसी श्रेष्ठता ने भारत को आधुनिकता और सभ्यता दी है।

    अब देखिये, भारत में जब साहित्यकारों पर हमले होते हैं तो फिल्मकार बिरादरी को फर्क नहीं पड़ता। फिल्मकारों पर हमले होते हैं तो खिलाडियों को फर्क नहीं पड़ता। वो तो आजकल फिल्मकारों और खिलाड़ियों में प्रेम विवाह और अंतर्जातीय अंतरधार्मिक विवाह होने लगे हैं इसलिए उनके बीच एकता जन्म ले रही है। डॉ. अंबेडकर ने इसीलिये अंतर्जातीय विवाह की सलाह दी थी, बॉलीवुड और क्रिकेट के बीच वह सलाह बढ़िया काम कर रही है। लेकिन साहित्य, संगीत कला आदि में अभी भी मनुस्मृति ही चल रही है।

    अब बड़ा प्रश्न ये है कि साहित्य और खेल या साहित्य और फिल्म के बीच ये प्रेम क्यों नहीं पनप रहा है?

    इसका बहुत गहरा कारण है। साहित्य और फिल्म इतने गहराई से और सीधे सीधे समाज को संबोधित करते हैं कि उनके सन्देश से बड़ा बदलाव आ सकता है। इसीलिये इस देश के धर्म संस्कृति के ठेकेदारों को पता है कि साहित्यकार और फिल्मकार तबकों को कंट्रोल करके रखना है वरना यहां की जनता कला के सृजनात्मक आयामों की शक्ति से परिचित हो गयी तो इस देश पर शोषक धर्म की सत्ता खत्म हो जायेगी।

    इसीलिये बहुत सोच समझकर साहित्य में भी जन विमर्श को अदृश्य बनाकर देवी देवता, भक्ति, राजे रजवाड़े, मिथक, महाकाव्य आदि की चर्चा चलती रही है। हजारों साल से इस मुल्क के साहित्य में आम आदमी की कोई बात नहीं हो रही थी, 1935 तक मुख्यधारा के साहित्य में जिस तरह का नायिका विमर्श और श्रृंगार वर्णन चला उसे देख लीजिये। वो तो भला हो कार्ल मार्क्स और अन्य दार्शनिकों का जिन्होंने भारतीय विद्वानों को पहली बार जन हितैषी साहित्य रचना सिखाया। वरना आज तक नख शिख वर्णन और भजन कीर्तन स्तुतियाँ इत्यादि ही चलती रहती।

    हालाँकि मार्क्स के आने के बाद भी भारतीय भक्ति का आभामण्डल कम नहीं हुआ है। आज भी कला, संगीत, साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र उसी परलोकी, आत्मघाती अध्यात्म में जड़ जमाये हुए है। आज भी कला के आनन्द की उपमा ‘विदेही भाव, समाधी भाव और समय की स्तब्धता’ से दी जाती है। मतलब इस लोक से हटकर परलोक में ले जाने वाली कला ही महान कला है। बाकी सब बेकार है। ये सब उसी जहरीले कुवें से निकलने वाली शब्दावली है जिसने स्त्री अधिकार और स्त्री विमर्श की बजाय नायिका विमर्श पैदा किया था। या जिसने दलित साहित्य की बजाय “दास्य भक्ति साहित्य” पैदा किया था।

    साहित्य के बाद जब फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो भारत का यही देवता विमर्श या नायिका विमर्श भक्ति में और इश्क मुहब्बत की छिछोरी रंगीनियों में ट्रांसलेट हो गया। हालाँकि यूरोप में भी फ़िल्मी सफर ऐसे ही शुरू हुआ था। पहले धर्म फिर इश्क मुहब्बत। लेकिन बहुत जल्द उन्होंने अन्य विषय भी सीख लिए। बायोग्राफ़िकल, हिस्टोरिकल, डॉक्यूमेंट्री स्टाइल फिल्में वहां खूब सराही जाती हैं। इधर भारत में इसकी कल्पना ही असंभव है।

    यहां अभी भी रामलीला चल रही है। स्त्री विमर्श सास बहू विमर्श बना हुआ है। एक सभ्य और इंसानी समाज होने के नाते यूरोप में उन्होंने इंसानी अधिकारों की परिभाषा जल्द सीख ली और अपने साहित्य औऱ फिल्मों में उसे अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया। लेकिन हमारा देश धर्मप्राण होने के नाते आज भी देवी देवताओं और मिथकों महाकाव्यों में ही घुसा जा रहा है, बहुत हुआ तो इश्क मुहब्बत और शादी के वीडियो चला देते हैं या चलताऊ देशभक्ति के हैंडपंप उखाड़ने वाले “गदरीले नायक” रच देते हैं।

    भारत का साहित्य और फिल्म आज भी पूरी तरह जन विमर्श में नहीं उतर सका है। अभी भी पुराने सौन्दर्यशास्त्र का मोह ऐसा बना हुआ है कि समानता, प्रेम, स्त्री अधिकार, दलित अधिकार की प्रस्तावनाओं से डर लगता है। और तो और बच्चों को भी वैज्ञानिक तार्किक शिक्षा देने से डर लगता है कि कहीं वे अधर्मी न हो जाएं। इसीलिए सारे बाबा योगी और पंडित मिलकर बच्चो को ध्यान योग और प्राणायाम के नाम पर विभाजन और इंसानियत के विरोध के “संस्कार” सिखाते हैं।

    ये विभाजक संस्कार असल में भारत को पुराना भारत बनाये रखने की सनातन साजिश है। इसलिए सिनेमा, साहित्य, पत्रकारिता और सभी कलाओं में ठीक राजनीति, प्रशासन और न्यायपालिका की ही तरह सवर्ण द्विजों का ही आधिपत्य बना हुआ है। वे तय करते हैं कि किस गुण को किस भाषा में सद्गुण सिद्ध करना है। किस गुण को मानव हितैषी और “वसुधैव कुटुंब” के “अनुकूल” सिद्ध करना है या “प्रतिकूल” सिद्ध करना है।

    इन परिभाषाओं से अंततः वे कहाँ और कैसे पहुंचना चाहते है ये वे बहुत सावधानी से तय करते हैं। वे एक ऐसे सर्वोदय या रामराज्य की रचना करते हैं जिसमे वर्ण व्यवस्था भी जारी रहे और वर्णानुकूल कार्य करते हुए “स्वधर्म” पालन करने वाले “संस्कारी पुरुष” और “सुशीला स्त्री” सहित सभी बच्चे तर्क और मानव अधिकार भूलकर संस्कारी भी बनी रहें और यूरोपीय कला, साहित्य, सिनेमा, विज्ञान तकनीक आदि को ऊपर ऊपर सीखकर प्रगतिशील भी बने रहे। भीतर हनुमान चालीस चलती रहे और ऊपर ऊपर “वी शल ओवरकम” या “तुंकल तुंकल लिटिल इश्टार” भी चलता रहे। ऊपर टाई और भीतर जनेऊ चलती रहे। काउबॉय हैट के नीचे संस्कारी चोटी भी सरकती रहे।

    जब कला और कलाओं के प्राप्य या करणीय के प्रति आपके विद्वानों और “विद्वान षड्यंत्रकारियों” का ये रुख है तो आपकी कला और साहित्य भी विभाजन ही पैदा करेंगी और खुद भी विभाजित होंगी। उनमे आपसी मेलजोल से अंतर्जातीय विवाह नहीं होंगे बल्कि छुआछूत पैदा होगी इंटेरडीसीप्लिनरिटी या इनोवेशन का पुरस्कार या प्रेरणा नहीं होगा बल्कि व्यभिचार की टीस और “नीच वर्णसंकर” पैदा होने का भय होगा।

    ऐसी भयभीत और अनैतिक कौम से आप कैसे उम्मीद करेंगे कि वे कला या सृजन के नाम पर एकदूसरे के साथ खड़े हों? क्यों उम्मीद करेंगे? साहित्य, कला, सिनेमा और पत्रकारिता में भी जिन लोगों का दबदबा बना हुआ है क्या वे इन सृजनात्मक आयामों में कोई सार्थक एकता सिद्ध होने देंगे? क्यों होने देंगे? जबकि वे बखूबी जानते हैं कि इन आयामों में एकता का अर्थ होगा भारतीय शोषक संस्कृति का निर्णायक अंत। क्या वे इतने मूर्ख हैं कि अपनी परम्परागत सत्ता, आजीविका और भविष्य को नष्ट कर दें?

    इसीलिये भारतीय फिल्मकार पत्रकार और खिलाड़ी भारतीय समाज की समस्याओं पर कुछ नहीं बोलते। वे किस जाति या वर्ण से आते हैं ये देख लीजिए आपको उनकी चुप्पी और तटस्थता का कारण समझ में आ जायेगा। मुहम्मद अली ने अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ बोलते हुए सरकार से और धर्म से कड़ी टक्कर ली थी, कई हॉलीवुड सितारों ने भी इसी तरह हिम्मत दिखाई। तत्कालीन यूरोप में चार्ली चैपलिन ने और सैकड़ों साहित्यकारों रंगकर्मियों ने ये साहस दिखाया था। लेकिन हमारे क्रिकेट के भगवानों और महानायको ने क्या किया? इन्होंने कभी गरीब मजलूम और स्त्री अधिकार की बात नही की। बल्कि हर दौर में बदलते राजनितिक आकाओं के सामने इन्होंने सकर्वजनिक रूप से साष्टांग प्रणाम किये हैं। इसका क्या मतलब है?

    धर्म सत्ता अर्थसत्ता और राजसत्ता के समीकरण की एक ही चाबी है उस चाबी को सब मिल जुलकर संभालते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे सौंपते जाते हैं। इस प्रवाह में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। इस बीच “शुद्रा दी राइजिंग” या “शरणम गच्छामि” जैसी फिल्में बनें या ऐसा साहित्य लिखा जाने लगे तो उसे बैन कर दिया जाता है। समाज के लिये घातक सिद्ध करके सेंसर कर दिया जाता है। लेकिन घर घर में मूर्खता और अनैतिकता फ़ैलाने वाले मिथक और महाकाव्यों आधारित सीरयल लगातार बढ़ते ही जाते हैं। ये सब अपने आप ही नहीं होता, इसके पीछे बहुत निर्णयपूर्वक सचेतन ढंग से कोई यांत्रिकी काम करती है।

    तो अंततः यह लिख कर रख लीजिए कि जब तक भारत में कला, संगीत, पत्रकारिता और सृजन के आयामों में स्वर्ण द्विजों और ब्राह्मणवादियों का कब्जा है तब तक साहित्य, गीत, संगीत, सिनेमा पत्रकारिता और खेल भी आम भारतीय के विरोध में ही काम करेंगे।

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • अंधेरा

    अंधेरा

    Dhiraj Kumar


    अंधेरा …..
    अत्यंत उदार और लचीला होता है
    प्रकाश को अपने सीने से
    आर पार जाने देने मे
    कोई तकलीफ नही होती उसे
    वो न तो प्रकाश को 
    पथ भ्रष्ट करता है
    और न ही दूषित……

    अंधेरा एक गहन चिन्तक की तरह
    अपने धुन मे मगन रहता है
    वो अचल है ,शाश्वत है ,निराकार है….
    उसे कोई फर्क नही पड़ता कि
    प्रकाश उसके बारे मे क्या सोचता है
    या उसके के साथ क्या सलूक 
    करने वाला है

    अलबत्ता…..
    प्रकाश हमेशा खुराफाती होता है
    अंधेरे का अकेलापन और शांति
    उसे अच्छा नही लगता 
    किसी भी तरीके से
    कोई न कोई चेहरा ढूंढ ही लेता है
    ताकि उपर पड़ कर 
    चेहरे को रौशन कर दे 
    ……और अंधेरे को तंग तबाह

    Dhiraj Kumar

  • बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं

    बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं

    Durga Shankar Kasar

    बेटियाँ चावल उछाल
    बिना पलटे,
    महावर लगे कदमों से विदा हो जाती हैं।

    छोड़ जाती है बुक शेल्फ में,
    कव्हर पर अपना नाम लिखी किताबें।
    दीवार पर टंगी खूबसूरत आइल पेंटिंग के एक कोने पर लिखा अपना नाम।
    खामोशी से नर्म एहसासों की निशानियां,
    छोड़ जाती है ……
    बेटियाँ विदा हो जाती हैं।

    रसोई में नए फैशन की क्राकरी खरीद,
    अपने पसंद की सलीके से बैठक सजा,
    अलमारियों में आउट डेटेड ड्रेस छोड़,
    तमाम नयी खरीदादारी सूटकेस में ले,
    मन आँगन की तुलसी में दबा जाती हैं …
    बेटियाँ विदा हो जाती हैं।

    सूने सूने कमरों में उनका स्पर्श,
    पूजा घर की रंगोली में उंगलियों की महक,
    बिरहन दीवारों पर बचपन की निशानियाँ,
    घर आँगन पनीली आँखों में भर,
    महावर लगे पैरों से दहलीज़ लांघ जाती है…

    बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं।

    एल्बम में अपनी मुस्कुराती तस्वीरें,
    कुछ धूल लगे मैडल और कप,
    आँगन में गेंदे की क्यारियाँ उसकी निशानी,
    गुड़ियों को पहनाकर एक साड़ी पुरानी,
    उदास खिलौने आले में औंधे मुँह लुढ़के,
    घर भर में वीरानी घोल जाती हैं ….

    बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं।

    टी वी पर शादी की सी डी देखते देखते,
    पापा हट जाते जब जब विदाई आती है।
    सारा बचपन अपने तकिये के अंदर दबा,
    जिम्मेदारी की चुनर ओढ़ चली जाती हैं।
    बेटियाँ चावल उछाल बिना पलटे विदा हो जाती हैं।

    (तमाम बेटियों को समर्पित)

    Durga Shankar Kasar

  • EVM बनाम बैलेट पेपर : जनशक्ति लोकतंत्र को किससे कितना ख़तरा

    Nishant Rana

    जीत के बावजूद राहुल गांधी के EVM पर अपना स्टैंड पहले की तरह ही क्लियर करने वाले बयान का स्वागत किया जाना चाहिए।

    हम अपने अधिकार की बात में भी राजनैतिक पार्टियों के भोपू की तरह बजने लगे है! हम भारतीयों की आदत है पक्ष और विपक्ष चुनने की इस चक्कर में कई बार हम अपना पक्ष भूल जाते है। लोकतंत्र और चुनाव किसी भी देश में वहां की राजनैतिक पार्टियों की बपौती नहीं होते है। भारत में भी नहीं है।

    सत्ता के केंद्र में रहने वाले या फिर सत्ता प्राप्त करने वाले लोगों में कितने लोग है जो वास्तव में जनता के लिए सही नीतियां बनाने के लिए आते है। यह तो जन शक्ति है जो हर पांच साल में आपको सत्ता (शक्ति) से बेदखल कर सकती है यदि यह शक्ति जनता के पास न हो तो इन्हीं लोगों में से कितने लोग अपनी ओढ़ी हुई विनम्रता क्या नहीं छोड़ देंगे। शोषण करने में क्या कोई कोर कसर छोड़ेंगे !

    शक्ति के बदलाव की यह ताकत हमें बहुत ही कम समय के लिए कई वर्षों के बाद मिलती है हमारे वोट से, चुनावी प्रक्रिया से। चुनाव ही है जो हमें हमारा सहीं गलत चुनने की आजादी देता है।

    हमारा किसी पार्टी के पक्ष को समर्थन हमें कितना भी सुरक्षित महसूस करवाता हो, भले ही हमारा कितना भी मन करता हो कि चुनाव की जरूरत ही क्या है बस हमारा फलाना नेता ही सदा सदा के लिए बना रहे, लेकिन वास्तविकता यहीं है कि हमें हमारे इस भाव के मजबूत होने की शक्ति भी चुनने और चुने हुए को हटा देने के अधिकार से ही आती है, आप के पास शक्ति है इसलिए आपके भावों को तसल्ली देना या उन कामों को करना जिनके लिए आपने उन्हें चुना है उनकी मजबूरी है। यदि यह अधिकार न हो तो देव तुल्य नेता जी ठेंगा दिखाने में देर न लगायेंगे।

    भले ही हम अपने अपने पक्ष पर बहुत कट्टरता से जुड़े हो, पसन्द ना पंसद के आधार पर रोज एक दूसरे का सिर फोड़ते हो लेकिन यह अधिकार ही हमसे ले लिया जाए या फिर चुनाव होने का चुने जाने की प्रक्रिया में हमें केवल क्या दिखावे के लिए शामिल किया जाए !


    कांग्रेस जब सत्ता में थी बीजेपी ने EVM का खूब विरोध किया बाकायदा किताब तक लिखीं गई लेकिन सत्ता में मौजूद कांग्रेस के कान पर जूं तक न रेंगी। वहीं जब बीजेपी सत्ता में आई तो कांग्रेस ने हार EVM का रोना रोया, भाजपा ने अब EVM को पाक साफ कर दिया।
    अब ऐसा तो है नहीं कि दोनों ही झूठ बोल रहे हो, दोनों ही सत्ता का स्वाद चख चुके है सो EVM में क्या खेल हो सकता है को भी करीब से जानते होंगे तभी तो सत्ता प्राप्त होते ही EVM दोनों पार्टी के लिए सही हो जाती है और सत्ता जाते ही पहला शक EVM पर जाता है।

    लेकिन हम क्या अपनी शक्ति के लिए क्या केवल राजनैतिक पार्टियों के विरोध या सवाल करने तक ही सीमित है!

    EVM के पक्ष में कुछ और भी तर्क सुनने को मिलते है जिन्हें सुनकर लगता है कि यह लोग अभी जानते ही नहीं है कि भारत में वोटिंग में क्या क्या होता है या जानबूझकर आंख बंद रखना चाहते है, आइए देखते है ऐसे ही तर्कों के पीछे कितनी गहराई है या केवल एक सतही बातों को बहुत बड़ा करके पेश किया जा रहा है-

    वोट गिनने की सहूलियत को बार बार गिनाया जाता है

    पूरी चुनावी प्रक्रिया कई महीने चलती है क्या उतने दिन बिना परेशान हुए लोग काम करते है।
    पुलिस में सिपाही पूरा पूरा दिन भाग दौड़ वाली पब्लिक डीलिंग वाली ड्यूटी करते है। सेना के जवान और न जाने कितने विभागों के लोग दिन रात एक करके अपने अपने काम करते है। 
    यदि फिर भी लगता है कि वोट गिनना जिस भी विभाग के जिम्मे आता है बहुत भारी काम है तो इसके लिए अलग से वैकेंसी निकाली जाए। आप 1000 जगह निकालिए लाखों आवेदन न आए तब कहियेगा।
    और जब किसी भी देश के लिए चुनाव और चुनावी प्रक्रिया का एक दम निष्पक्षता से होना बहुत ही गंभीर मसला हो तो थोड़ी बहुत देर होने में भी क्या बुराई है।

    बैलेट पेपर पर बूथ कैप्चरिंग होती थी 

    जो समय के साथ बहुत हद तक सुधर चुकी थी लेकिन सबको पता है बूथ कैप्चरिंग, फर्जी वोटिंग EVM पर भी वैसे ही होती है। बैलेट पेपर में बदलाव में बहुत ही छोटे स्तर पर किसी विधानसभा क्षेत्र के भी एक आध जगह पर ही सम्भव था।
    EVM पर यह खतरा राष्ट्रीय स्तर पर सभी के सभी बूथ पर सम्भव है (यहां रिमोट कंट्रोल , ब्लूटूथ, हैकिंग जैसी टटपूंजिया चीज की बात नहीं हो रही)

    VVPAT से सुधार संभव है 

    VVPAT भी उन खतरों से सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं देता है जिनकी अभी तक बात होती आई है और यदि गिनती करके ही मिलान करना है तो बैलेट पेपर गिनने में ही क्या बुराई है?
    और यदि गिनती नहीं करनी है, केवल मतदाता को गोली देनी है तो जरूरी नहीं है प्रिंट होकर जो आया हो वहीं इनपुट में गया हो।

    EVM बहुत सुरक्षा में और कैमरों की निगरानी में रहती है
    बैलेट पेपर भी बहुत सुरक्षा और कैमरों की निगरानी में रखे जा सकते है।

    EVM की हैकिंग होने की संभावना बहुत कम है, लेकिन संभावना है। यह पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने निर्णय में माना है।

    टेक्नोलॉजी को नकारना, विज्ञान में पीछे जाना मूर्खता है और जब ऑनलाइन मनी ट्रांसक्शन और ATM में लोगों को भरोसा हो सकता है तो EVM को भी भरोसे मंद बनाया जा सकता है

    दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। दोनों बिल्कुल अलग चीजे है।मनी ट्रांजेक्शन फ्रॉड पकड़ में आ जाता है क्योंकि  हमें पता होता है कि अकॉउंट में कितना रुपया है, ट्रांजेक्शन हिस्ट्री का रिकॉर्ड रहता है। जबकि EVM में जो भी  संख्या दर्ज हों रही है उसका पता नहीं चल सकता कि डिजिट किस तरह मूव कर रही है या अंको को किस तरह से मूव करने के लिए प्रोग्राम किया गया है। 
    बैलेट पेपर पर आपको पता है आपका ठप्पा कहीं लग गया तो लग गया। अब कोई पूरा बैलेट बॉक्स ही बदले तो अलग बात है। पूरा बैलेट बॉक्स बदला जा सकता है तो EVM भी बदली जा सकती है।
    लेकिन EVM आपको भरोसा नहीं दे सकती कि आपने जो बटन दबाया है वोट वहीं दर्ज हुआ हो।
    मत दर्ज करने से लेकर परिणाम तक के बीच का छिपाव ही इसका प्रयोग लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बनता है.
    और EVM को इससे अधिक पारदर्शी बनाने का मतलब है मतदाता या चुनाव की गोपनीयता को भंग करना.
    EVM का प्रयोग न करने को विज्ञान में पीछे जाना ऐसे जता दिया जाता है जैसे केवल EVM के प्रयोग न करने के कारण सीधे पाषाण युग में पहुँच जायेंगे। विज्ञान में आगे बढ़ना है तो EVM भी क्यों सीधे मोबाइल आदि से ही मताधिकार का प्रयोग हो जाया करे इतने तामझाम की भी क्या जरूरत है !
    वोटों की गिनती के अलग EVM कोई नई सहूलियत नहीं देता है।
    और केवल गिनती की सहूलियत के लिए लोकतंत्र पर खतरे को नजरंदाज तो नहीं ही किया जा  सकता है.

    चलते-चलते :-

    असल सवाल तो EVM पर हमारा होना चाहिए। भाजपा को सौ साल तक हम चुने या कांग्रेस मुक्त भारत हम करे यह अधिकार जनता के पास हमेशा रहना चाहिए लेकिन जब एक चीज निष्पक्षता, स्पष्टता पर हमें शक है भले ही हमारी मूर्खता के कारण हमें शक है, हम नहीं हुए उतने डिजिटल की मशीन में घुस कर देखे कि कौन से प्रोग्राम चिप किस तरह से काम कर रहे है, एक एक वोट पर डिज़ाइन है या फिर सौ-हज़ार या फिर जो भी संख्या निर्धारित है की वोट संख्या के बाद हर तीसरे या पांचवे वोट पर प्रोग्राम किया हुआ है. चिप ही तो है किसी भी तरह से किसी भी संख्या के बाद से प्रोग्राम कि जा सकती है।
    हो सकता है इलेक्शन कमीशन के प्रमुख तक को न पता हो कहाँ क्या कैसे कब डिज़ाइन किया हुआ है, तब उस चीज को जबर्दश्ती हम पर थोपने का कारण क्या है !

    Nishant Rana


    Nishant Rana

  • लोकतंत्र बिकता है – Vijendra Diwach

    पांच साल में एक बार तमाशा लगता है,
    नेता वोट के लिये घर घर झांकता है,
    ना भाषा का होश ना मर्यादा का तोल
    गुंडे मव्वाली ओढ लेते हैं नेता का रोल
    जनता बजाती ताली है
    जनता ही ऐसे गुंडे खङे करती है।
    तभी तो 
    लोकतंत्र बिकता है।

    वोट के लिये
    लोगों के गले में देशी ठर्रा डाला जाता है,
    थाली में कुत्तों की बोटी,
    जेब में दो चार सौ रुपये की गड्डी,
    इस तरह लोकतंत्र में 
    दो कोङी के भाव इंसान बिकता है,
    कहीं वोट बंदूक लाठी की नोंक पर पङता है,
    लोकतंत्र बिकता है।

    मेरा भारत महान,
    करके सुरापान,
    बेकार कर देता है अपना अमूल्य मतदान,
    अपनी जाति,
    अपने धर्म,
    अपने नाते रिश्तेदार,
    इन सबसे करके लगाव,
    साधने अपने निजी स्वार्थ,
    देता है बुरे लोगों का साथ,
    जीतकर ऐसे फर्जी नेता
    देते हैं झूठे आश्वासन
    और दूर से ही हिलाते हैं हाथ।
    लोकतंत्र बिकता है।

    दिखाकर झूठे सब्जबाग,
    नेता जा टिकता है विधानसभा और संसद में,
    वहां कुत्तों की तरह लङते हैं,
    कुत्ते भी इस नाटक के आगे पानी भरते हैं,
    नेता ऐसे ही जनता की कमाई खर्च करते हैं।

    हे विद्वान देशवासियों!
    आप चुनावी मौसम में
    पाकर दारु की बोतल,
    लेकर हजार पांच सौ रुपये,
    मदमस्त होकर होश ना खोइये,
    ये चुनावी मौसम तो
    चार दिन की चांदनी है
    फिर अंधेरी रात है,
    इसलिये भारत का भविष्य न बिगाङिये।

    ऐसा ही ढर्रा यदि चलेगा,
    जनता को नेता ऐसे ही छलेगा,
    अपने कर्त्तव्य और अधिकार के लिये
    अब भी न जागे तो 
    देश सामंतवादिता से ही चलेगा,
    जागो, नहीं तो लोकतंत्र बिकता है 
    और बिकता रहेगा।

    Vijendra Diwach

    Vijendra Diwach

  • कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

    कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

    Gourang

    अक्सर ऐसा ही होता है। लुढ़कते, झनझनाते पसिंजर ट्रेन जब सियालदह स्टेशन पर रुकती है, घड़ी तारीख के आखरी पड़ाव पर होने की संकेत देती है। मैंने भी आदत के जब्त में आ कलाई की घड़ी देखी। उम्मीद के अनुसार घड़ी ने रात के साढ़े ग्यारह के सुई दिखाये। बैक पैक पीठ में डाल मैं प्लैटफ़ार्म से बाहर निकलने के जुगत बनाने लगा। अजीब स्टेशन है, इस वक्त भी भीड़ बेशुमार है। लोग जगह बनाते हुए तेजी से गुजर रहे हैं। एक उम्र दराज औरत मुझसे तेज निकलकर आगे चली गई। जाते जाते बड़बड़ाई – ‘स्टेशन कोई टुरिस्ट प्लेस नहीं कि आराम से चलो, लोग समझते नहीं।’ इससे पहले कि मैं समझता यह डायलॉग किसके लिए गिफ्ट है, एक चालीस के करीब औरत ने ट्राली बैग से मुझे धक्का दिया। मैं गिरते गिरते बचा। वो बड़बड़ाई – ‘लगता है मैं स्टेशन में चलने का कोचिंग सेंटर खोल दूँ, खूब चलेगा।’ मैं अभी इस सदमें गोता खा ही रहा था कि टिकट कलेक्टर ने मुझे टोक दिया – “ए जरा टिकट दिखाईये।” 
    मैं और हड़बड़ाया। चालीस के करीब औरत ने फिर कहा – “टिकट बाबू, जरा ठीक से टाइट करियेगा, बहुत स्मार्ट बन रहा है।” 
    टिकट कलेक्टर मुझ पर और ज़ोर देकर देखा और बोला – ‘निकालो, निकालो।’ 
    मैं हकलाया फिर बोला – “मैं तो धन्य हो गया, इतने दिनों में पहली बार किसी ने टिकट देखने की मर्जी दिखाई।”
    वो बोला – “साईड में आओ।” 
    मैं उसके साथ किनारे पर आ गया। फिर मोबाइल निकालकर एम-टिकट दिखाया। वह चिढ़ गया और बोला – “टिकट है तो इतना नाटक क्यों किया?” 
    “कितना नाटक?” मैंने मजा लेते हुए कहा। 
    वह घूर कर मुझे देखा। मैंने उसकी परवाह न करते हुए बोला – “उस लड़की के पास टिकट नहीं थी, तुम गलत चुनाव कर बैठे।” फिर मैं लंबे डग भरते निकल आया। मुझे खूब अंदाजा था कि मेरे पीठ पीछे टिकट कलेक्टर के आँखों से अंगार निकल रहे होंगे।

    स्टेशन के बाहर आकर मैंने प्री पैड टैक्सी के काउंटर पर लाईन लगाई। पर कोई भी टैक्सी मौजूद नहीं थी। काउंटर बॉय बोला – “इंतजार करिए।” 
    मैंने आसमान की ओर देखा। बादलों ने तारों को छुपा लिया था। टैक्सी के न मिलने की वजह समझ आई। एक तो रात फिर बारिश के अंदेशे ने शहर को थमा दिया था। 
    कुछ सोचने के बाद मैंने मोबाइल निकाला, उबेर पर लोकेशन टाइप कर रिक्वेस्ट डाल दिया। आस पास कोई भी टैक्सी न दिखी ऐप्प में। समय कोई बीस मिनट। खैर, वही सही। मैंने कन्फ़र्म कर दिया। कोई आठ मिनट में सुमन नाम दिख गया, टैक्सी नंबर भी उभर आया। मैंने कॉल नंबर ढूंढ कॉल कर दिया। रिंग होता रहा पर उधर से उठाया नहीं। ऐसा ही होता है, शहर को अभी न्यूयार्क होने में बरसों देरी है। फिर मैंने आसमान की ओर देखा, बिजली चमकने शुरू हो गए थे। भीड़ बारिश देख स्टेशन कॉम्प्लेक्स पर ही ठहर गई थी। अभी मैं दुबारा रिंग करने ही वाला था कि बूँदा बाँदी शुरू हो गई। फिर बादल भी गरजने लगे। कुछ देर मैं ठिठका। अभी वापस स्टेशन कॉम्प्लेक्स में लौट जाऊँ कि नहीं सोच ही रहा था, ठीक तभी टैक्सी वाले ने कॉल बैक किया। क्या आश्चर्य !! यह तो पहली बार हुआ। मैंने कॉल रिसीव किया और कड़कते हुए पूछा – “कहाँ पर हैं?” इनसे कड़क व्यवहार ही काम आता है। 
    उधर से एक घरघराती सी आवाज आई – “ऐप्प आपसे दस मिनट की दूरी दिखा रहा है। उधर बारिश शुरू हो गई?” आवाज कुछ पतली सी थी। बारिश की आवाज में सुनने में तकलीफ हो रही थी। 
    मैंने रूखा सा जवाब दिया – “हाँ। मैं इधर शेड पर खड़ा हूँ।” मैं शेड की ओर बढ़ता हुआ बोला। 
    उधर से फिर आवाज आई – “दस मिनट।” और कॉल कट गई। 
    बारिश ज़ोरों से शुरू हो गई थी। इंतजार के अलावा और कुछ बचा न था। मैं मोबाइल पर मेसेज स्क्रोल करता हुआ वक्त काटने लगा। कुछ देर बाद एक टैक्सी थमने की आवाज आई। मैंने सर उठाया। नंबर वही था। किसी तरह दौड़कर बारिश में भींगते हुए मैं टैक्सी में बैठा। ड्राइवर ने कन्फ़र्म किया – “गौरांग? लोकेशन गड़िया? 
    मैं चौंककर सर उठाया। अब पतली आवाज का रहस्य खुला। वो कोई तीस साल की औरत थी। मेरा मुँह खुला रह गया। मैं बस पूछा – “आप?”
    “कोई तकलीफ?” आवाज आई। 
    मैं संभला और बोला – “नहीं।” चलिये।” अब मेरी आवाज नरम और मीठी थी। 
    मैंने बैक मिरर पर नजर डाली। वो भी मुझे ही देख रही थी। अच्छी सूरत थी। पर सूखी सी थी। शायद रात को खाया न हो, मैंने सोचा। मुझे याद आया, खाया तो मैं भी नहीं था।। मैंने गौर किया, बारिश में वो दक्षता से ड्राइव कर रही थी। मैं मुस्कुराया। वो नहीं मुस्कुराई। मुझे तकलीफ हुई। 
    मैं धीरे से बोला – “सॉरी।” 
    “किस बात का?” वो पूछी। 
    “मेरी आवाज बहुत रूखी थी। दरअसल किसी और का गुस्सा आप पर निकल आया।” मैंने संजीदगी से कहा। अब वो मुस्कुराई। तभी गाड़ी रेड सिग्नल पर खड़ी हो गई।
    “इतनी रात गए गाड़ी चलाते आपको………” 
    उसने बात बीच में ही काट दिया – “लड़की हूँ, टैक्सी ड्राइवर हूँ, मर्दाना काम है। देर रात के झमेले हैं। अच्छे बुरे पसिंजर भी मिलते हैं। ऑड लोकेशन्स भी होते हैं। सब है। पर मेरा पेशा मेरा चुना हुआ है, चैलेंज है तो है। सबको बार बार जवाब देते देते थक जाती हूँ।” मैं हड़बड़ाया। मैं फिर मुस्कुराया। मगर वो फिर नहीं मुस्कुराई। 
    सिग्नल हरा हो गया। उसने गियर बदला, ऐक्सिलेटर पर दबाव डाला। गाड़ी सड़क पर फिसलने लगी। खामोशी ने पाँव पसार दिये। 

    कुछ दूर जाते ही मुझे दूर से वह डॉमिनो का काउंटर दिख गया। मुझे पता था, यह देर रात तक खुला रहता है। मैं चिल्लाया – रोको, रोको। गाड़ी बाएँ रोको।” 
    वो हड़बड़ाते हुए कस कर ब्रेक मार गाडी साईड में खड़ी कर पूछी – “क्या हुआ?” 
    मैं डॉमिनो की ओर इशारा कर बोला – “बस एक मिनट। बहुत भूख लगी है।” वो कुछ गुस्सा, कुछ निराशा भाव लिए देखी। मगर कुछ बोली नहीं। मैंने कार का दरवाजा खोलते हुए उसे देखा, वो अपने होठों पर जीभ फिरा रही थी। 
    बारिश घट गई थी। बस कुछ बूँदा बाँदी ही चल रही थी। कोई दस मिनट में मैं लौटा। वो बहुत गुस्से में दिखी। इसके पहले कि कुछ कहती मैं उसे एक पैकेट और कोक के बोतल पकड़ाते हुये कहा – “बस दो मिनट ही लगेंगे। ये उन्होंने गर्म कर दिये हैं।” वो अब मुझे आश्चर्य से देखने लगी। 
    मैं अब पूरे अधिकार से कहा – “जल्द खा लीजिये। लड़कियों को भी लड़कों की तरह ही भूख लगती है।” उसने अब थाम लिया। उसके चेहरे की शिकन अब मिट चुकी थी। मैं अंदर बैठ खाने लगा और उसे मिरर में देखा। वो संतोष से खाने लगी, आँखें पनियाई हुई थी। वो भी सचमुच बहुत भूखी थी।

    कुछ देर बाद गाड़ी फिर चलने लगी। मैं बाहर रात के शहर को देखने लगा। अधिकतर दुकानें बंद ही थी। बत्तियों से रोशन सड़कें, बड़े बड़े होर्डिंग्स सब तेजी से गुजरने लगे। अचानक मैंने महसूस किया, वो मुझे मिरर से देख रही थी। मैंने उसे देखा। वो मुस्कुराई। मैं मुस्कुराया। फिर मैं रात के शहर को देखने लगा। कुछ देर बाद मेरा डेस्टिनेशन आ जाएगा। 

    यूँ ही सोचते सोचते ओवर ब्रीज क्रॉस हो गया। अचानक मैंने देखा वो मुझे फिर मिरर से देख रही थी। मैंने भी उसे फिर मिरर में देखा। मैं मुस्कुराया। वो झेंप कर मुस्कुराई जैसे चोरी पकड़ी गई हो। मैं भी मुस्कुराया। अब हम दोनों मुस्कुराते हुए मिरर में ही देखने लगे। वो कभी सड़क तो कभी मिरर पर देख रही थी। दोनों मुस्कुरा रहे थे।
    कुछ देर बाद अचानक गाड़ी रुक गई। मैंने मिरर में सवालिया निगाहों से देखा। वो हँसी और बोली – “कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं।” 
    मैंने देखा, मेरा डेस्टिनेशन आ चुका था। टैक्सी से निकल उसके पैसे चुकाए। फिर उसकी आँखों में झाँक उसे कहा – “थैंक्यू।” वो भी मेरी नजरों से नजर मिलाई और सर हिलाई। 
    मैं घूमकर अपने कैंपस की ओर जाने लगा। कुछ दूर जा अचानक मुझे सुनाई दिया – “सुनिए!” 
    मैं सुन घूम खड़ा हुआ। वो पूछी – “आपकी शादी हो गई है?”
    मैं मुस्कुराया और हाँ में सर हिलाया। थोड़ी देर मुझे देखने के बाद वो भी मुस्कुराई और सर हिलाई। मैं खड़ा रहा।

    टैक्सी स्टार्ट हुई और तेजी से निकल गई।

    Gourang


    Gourang

  • मैं तुम हूँ

    मैं तुम हूँ

    Puneet Shukla

    मैं तुम्हें जानता हूँ
    मैं उसे भी जानता हूँ
    मैं सबको जानता हूँ।

    तुम उसे जानते हो
    तुम मुझे नहीं जानते
    तुम मुझे जान ही नहीं सकते।

    तुम मुझे नहीं जानते, 
    इसका मतलब यह नहीं कि तुम असमर्थ हो
    दरअसल मुझे जाना ही नहीं जा सकता।

    मुझे देखना
    तुम्हें देखना है
    तुम तुमको नहीं देख सकते।

    जो न देखा जा सके
    जो न जाना जा सके
    वह मैं हूँ।

    जहाँ शब्द मौन हो जाएँ
    जहाँ इन्द्रियाँ जवाब दे जाएँ
    वहाँ मैं हूँ।

    तुम 
    अपने तक पहुँच जाओ
    तो मुझ तक भी पहुँच जाओगे।

    मैं 
    वह सुगन्ध हूँ
    जो पुष्प के अन्तर में है।

    मैं 
    तुम 
    हूँ।

    Puneet Shukla