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  • यौन शिक्षा :: एक दृष्टिकोण – अनुपमा गर्ग (भाग – 4)

    लोग अपने सिबलिंग्स के साथ सेक्स के सपने क्यों देखते हैं।

    मैं 40 वर्षीय तलाकशुदा महिला हूँ, तलाक के बाद कभी पति तो कभी भाई के साथ सेक्स के सपने दिखते, भाई के साथ जब भी देखती तो सुबह उठकर बेहद शर्मिंदगी सी होती है। जबकि भाई के साथ मेरे रिश्ते बिल्कुल नॉर्मल, मतलब जैसे सामान्य भाई बहन होते हैं, वैसे ही हैं। जो सपने में दिखता वह होशोहवास में जिंदगी में कभी नहीं सोचा, बल्कि सपने के बाद बहुत देर तक अजीब लगता रहता है।

    पिछली एक पोस्ट में कुंठा के बारे में बात की थी हम लोगों ने, कि कुंठा क्या है? फ़्रस्ट्रेशन या कुंठा का मतलब है, जब कोई इच्छा पूरी न हो, और इस बात से खीझ, छटपटाहट हो।
    यहाँ एक चीज़ समझना ज़रूरी है, वो ये कि अपने आप में कुंठा अच्छी या बुरी नहीं होती। आप उसे कैसे मैनेज करते हैं, और कुंठा के कारण आपके जीवन पर असर कैसा पड़ता है, इस से तय होता है कि अच्छा क्या है और बुरा क्या।
    आप के अनुसार आप 40 साल की हैं और तलाकशुदा हैं। तो मैं ये मान ले रही हूँ, कि आपकी शादी में आपका अपने पति के साथ सेक्सुअल रिश्ता था। वो कितना संतुष्टि से भरा  था, इस बारे में मैं कोई कयास नहीं लगाऊंगी।
    अब जब पति से आपका अलगाव हो चुका, तो ऐसा तो नहीं है कि आपके शरीर की सेक्स और पुरुष के बदन के लिए चाह या ज़रुरत ख़त्म हो गयी। हर स्वस्थ व्यक्ति की , चाहे उनका कोई भी जेंडर हो, कुछ सेक्सुअल ज़रूरतें, प्रैफरेंसेज (पसंद नापसंद), डिजायर (इच्छा) होती ही हैं। ऐसे में उनका पूरा न होना, कहीं तो फ़्रस्ट्रेशन पैदा करेगा ही। इस फ़्रस्ट्रेशन को न निकल पाने का नतीजा भी हो सकते हैं आपके सपने।
    आपके प्रश्न का दूसरा हिस्सा है कि आपको अपने भाई के साथ सेक्स के सपने दिखते हैं, और इससे आपको अजीब (अगर मैं ठीक समझ पा रही हूँ तो ‘गन्दा’ ) लगता है। ये स्वाभाविक है।
    आपके शरीर और मन की सेक्सुअल नीड्स क्योंकि पूरी नहीं हो पा रहीं तो आपके इर्द गिर्द जो पुरुष  हैं,उनकी तरफ आपका मन जा रहा है। क्योंकि सामान्य तौर पर परिवार की अवधारणा वाले किसी भी समाज में, incest या सिब्लिंग्स में सेक्सुअल संबंधों को बुरा समझा जाता है, इसलिए आपका गिल्ट भी स्वाभाविक है। हमारी परिवार को ले कर मोरैलिटी बहुत गहरी है, और ऐसे में, जब कोई इच्छा इस फ्रेमवर्क पर सवाल उठाती है तो उससे discomfort या तकलीफ होना, अजीब लगना, गिल्ट महसूस करना बहुत स्वाभाविक है।
    यहाँ ज़रूरी ये है कि इससे आपके रिश्तों में बदलाव तो नहीं आया। जैसा अपने कहा आपके भाई के साथ आपका सम्बन्ध वैसा ही है जैसा बहन भाई में सामान्यतः होता है, इसलिए मुझे इस समय परेशानी जैसा कुछ नज़र नहीं आता।
    लेकिन मुझे ये ज़रूर लगता है कि आपकी ज़रूरतें पूरी होना ज़रूरी है, और अन्य किसी भी दृष्टिकोण से हों या न हों, आपके स्वयं के मन और भावनाओं के लिए वो ज़रूरी है।
    आप यहाँ कुछ चीज़ों के बारे में सोच कर देखें। क्या आपके पति के अतिरिक्त आपके जीवन में कोई पुरुष था जिससे आपके सेक्सुअल सम्बन्ध रहे हों?  यदि हाँ तो क्या कभी उस पुरुष के बारे में भी सपने आते हैं ? क्या तलाक के बाद, अभी आपके जीवन में कोई साथी है? क्या आप मास्टरबेट करती हैं ?
    क्या आपके घर में आपको प्राइवेसी मिल पाती है, क्योंकि आम तौर पर भारत में घर ,बहुत बड़े हों, और सबके अपने कमरे हों, ऐसा कम हो पता है, और ऐसे में प्राइवेसी एक बड़ी समस्या बन जाती है।
    क्या आपके लिए ये संभव है कि आप  सेक्स टॉयज के जरिये अपनी ज़रूरतें explore  कर पाएं? क्या आपके लिए किसी के साथ डेट करना संभव है ? क्या आपके लिए सिर्फ कैसुअल सेक्स के लिए किसी के साथ आपसी सहमति से हुक अप करना संभव है ?
    यदि इनमें से कुछ भी संभव नहीं, तो मैं आप को ये राय दूँगी, कि किसी मनोवैज्ञानिक से मिलें। Psychotherapists कई बार आपकी काउन्सलिंग करते समय बहुत सारे ऐसे विषयों पर डिटेल में बात कर पते हैं, जो ऊपर से सेक्स सम्बंधित नहीं लगते। लेकिन अक्सर ऐसे विषय, अनुभव, या विचार, सेक्स से सम्बंधित आपकी मानसिकता और आपके नज़रिये को गहरे अवचेतन में बैठ कर, प्रभावित करते हैं।
    यदि आपको लग रहा है कि आपकी ज़रूरतें पूरा न हो पाना, आपके सामान्य जीवन, और रिश्तों को प्रभावित कर सकता है तो आपको किसी अच्छे मनोवैज्ञानिक से बात कर उनकी राय ज़रूर लेनी चाहिए।
    आशा करती हूँ आपको मेरे जवाब से कुछ मदद मिले।

    डिस्क्लेमरलेख में हम सेक्स और सेक्सुअलिटी के सम्बन्ध में बात इसलिए कर रहे हैं ताकि पूर्वाग्रहों, कुंठाओं से बाहर आ कर, इस विषय पर संवाद स्थापित किया जा सके, और एक स्वस्थ समाज का विकास किया जा सके। यहाँ किसी की भावनाएं भड़काने, किसी को चोट पहुँचाने, या किसी को क्या करना चाहिए ये बताने का प्रयास हरगिज़ नहीं किया जाता। ऐसे ही, कृपया ये प्रयास मेरे साथ न करें। प्रश्न पूछना चाहें, तो गूगल फॉर्म संलग्न है, वहां पूछ सकते हैं।

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    Anupama Garg

    Anupama is an ever-evolving person, deeply interested in human behavior, specially human sexuality. She has vastly researched alternative sexual lifestyles and has also written a series of non-fiction books on the subject with a pseudonym.

    She believes in transforming the outlook towards sexuality by structured, quality conversations, one at a time. Apart from this space, she works as a content specialist and researcher, writes poetry and sings for passion.

    Instagram: @anupama.garg.25

    Facebook: https://www.facebook.com/anu.25.25/

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  • यौन शिक्षा :: एक दृष्टिकोण – अनुपमा गर्ग (भाग – 3)

    यौन शिक्षा :: एक दृष्टिकोण – अनुपमा गर्ग (भाग – 3)

    यौन कुंठित लोगों की पहचान कैसे की जा सकती है?

    एक लाइन में उत्तर देना हो तो कहूँगी, लगभग हम सभी किसी न किसी हद तक यौन कुंठित हैं। देख लीजिये सभी को, कुछ हद तक खुद को भी शीशे में। पहली बात ये कि किसी के माथे पर नहीं लिखा होता कि वे यौन कुंठित हैं।

    दूसरी बात कुंठा क्या है? फ़्रस्ट्रेशन या कुंठा का मतलब है, जब कोई इच्छा पूरी न हो, और इस बात से खीझ हो। तो दुनिया में कौन है जिसको सेक्सुअल फ़्रस्ट्रेशन कभी न कभी नहीं होती ? हाँ यहाँ ये देखना ज़रूरी है कि सिर्फ फ़्रस्ट्रेशन है, या कोई उस फ़्रस्ट्रेशन के कारण किसी का यौन उत्पीड़न कर रहा है ? कहीं ये सेक्सुअल फ़्रस्ट्रेशन अस्वस्थ रूप तो धारण नहीं कर रही ?

    अस्वस्थ रूप की भी कई परिभाषाएं हो सकती हैं। खुद को नुकसान पहुँचाना, किसी से ज़बरदस्ती करना, किसी और को नुकसान पहुँचाना, सेक्सुअल फ़्रस्ट्रेशन का रोज़मर्रा के जीवन पर सामान्य से ज़्यादा प्रभाव पड़ना, जिस जेंडर के प्रति आप आकर्षित होते हैं उसी जेंडर के प्रति घृणा महसूस करने लगना , ये सब अस्वस्थ कुंठा की परिभाषाएं हो सकती हैं। अब ये कुंठा किसी की शक्ल पर तो लिखी नहीं होती। तो यौन कुंठित लोगों को पहचानेंगे कैसे?

    लेकिन यदि मैं सही समझ पा रही हूँ, और आपका सवाल ये है कि अपने बच्चों, या उम्रदराज़ लोगों को यौन उत्पीड़न से सुरक्षित कैसे रखें, तो वो एक अलग प्रश्न है। उस पर एक अलग पोस्ट में चर्चा करेंगे। पर कुंठा के सन्दर्भ में एक चीज़ ज़रूर है जिस पर बात की जानी चाहिए। वो है कि हम ऐसा क्या कर सकते हैं, कि सेक्सुअल फ़्रस्ट्रेशन हमारे आस पास कम पनपे, या अगर पनपे भी, तो उससे डील कैसे करें?

    तो सबसे पहली ज़रूरी चीज़ है, स्वस्थ संवाद। अगर हम अपने आस पास खुल कर ये स्वीकार कर पाते हैं कि सेक्सुअल डिजायर नार्मल है, SEX  भी नार्मल है, तो आधी समस्या ख़त्म हो जाती है। आप अक्सर लोगों को कहते सुनेंगे, अरे सेक्स के बारे में बात करने का क्या है? सब को तो पता है, यहाँ तक कि कुछ लोग ये भी कि बच्चियों को तो गुड टच बैड टच पहले से पता होता है। उनसे कोई पूछे बच्चे माँ के पेट से सेक्स के बारे में तो सीख कर नहीं आते।

    ये भी कहा जाता है, सेक्स के बारे में बात करना ‘व्यभिचार’ को बढ़ावा देना है। तो मेरा प्रश्न ये है, अब तक ज़्यादा बात नहीं होती थी, और कुंठाओं के पनपने का अंत नहीं है। रोज़ अख़बार में सो-कॉल्ड-एडल्ट्स के व्यभिचार, बच्चों के साथ रेप और पता नहीं किस किस यौन कुंठा का क्या क्या नतीजा पढ़ने को मिलता है। न बात कर के कौनसे झंडे गाड़ लिए हमने मर्यादा के ?

    इससे बेहतर है कम से कम सलीके से बात ही कर लें हम सब एक सभ्य समाज की तरह इस विषय पर। ये बिलकुल सच है, कि हर किसी के बस की नहीं है इस विषय पर गंभीर, स्वस्थ, और शालीन चर्चा करना। लेकिन जो कर रहे हैं, उन्हें ही पढ़ लें, बजाय ट्रोल करने के तो कुछ समझ विकसित होगी, और कुंठाओं से थोड़ी मुक्ति मिल पायेगी शायद।

    तो पहली बात तो हुयी संवाद। जब सेक्स को नार्मल समझा जाने लगेगा तो अपने आप वो दूर की कौड़ी लगना बंद हो जायेगा। उसे हासिल करना कोई किला फतह करने जैसा नहीं लगेगा। ‘यार मैंने उसकी ले ली ‘ तरह की भाषा अपने आप ही अप्रासंगिक हो जाएगी। लेकिन दूसरी चीज़ है कि यदि फ़्रस्ट्रेशन है ही, तो उसे सुलझाया कैसे जाये?

    समझें कि सेक्सुअल फ़्रस्ट्रेशन या यौन कुंठा कोई मेडिकल कंडीशन नहीं है। ये सेक्सुअल arousal, यौन उत्तेजना जैसी लग सकती है, लेकिन है नहीं। यौन उत्तेजना का अर्थ है सेक्स करने की चाह, और उसके शारीरिक और मानसिक तौर पर दिखने वाले चिन्ह, लेकिन अगर बहुत बार सेक्सुअल उत्तेजना के बाद सेक्स की चाह की पूर्त्ति न हो, तो  ये फ़्रस्ट्रेशन या कुंठा में बदल सकती है।

    ऐसे में सेक्सुअल डिजायर की संतुष्टि करना या न करना ये हर व्यक्ति की अपनी अलग चॉइस हो सकती है। किसको कितनी फ़्रस्ट्रेशन होगी ये भी व्यक्तिगत मसला है। फ़्रस्ट्रेशन इसलिए है कि सेक्स कर नहीं पा रहे, या इसलिए कि सेक्स की क्वालिटी से संतुष्ट नहीं हैं, ये भी व्यक्ति से व्यक्ति पर निर्भर करता है।

    कुछ लोगों को मास्टरबेशन या हस्तमैथुन इसका सुगम उपाय लगता है, कुछ लोगों को कैज़ुअल सेक्स, हुक अप, या संभवतः पेड सेक्स, या वैश्यालय जाना भी इसका उपाय नज़र आ सकता है।  कुछ लोग इसके उपाय में औरतों या पुरुषों को बेवकूफ बना कर, फुसला कर, उनके साथ सोने का प्रयत्न करते हैं।

    कुछ लोग पोर्न देख कर अपनी फ़्रस्ट्रेशन मिटाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस फ़्रस्ट्रेशन का कुछ नहीं करते, उसे भी जीवन के एक नार्मल हिस्से की तरह स्वीकार कर के उसके साथ अपने आप को थाम कर रखते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो hobbies, स्पोर्ट्स, और दूसरे constructive तरीकों का इस्तेमाल करते हैं अपनी फ़्रस्ट्रेशन से डील करने में। अब इनमें से किस तरीके से फ़्रस्ट्रेशन वाकई मिट जाती है, और किस्से नहीं, ये एक अलग ही समझ विकसित करने का मुद्दा है।

    मैं यहाँ न तो किसी भी तरीके का समर्थन कर रही हूँ, न ही उसकी आलोचना। इसलिए ये व्यभिचार, और वैश्यालय, और सेक्सुअल एब्यूज टाइप की बकवास ले कर न आएं। मैंने सिर्फ कुछ तरीकों के बारे में यहाँ बात की है।

    इसी तरह इनमें से कौनसे तरीके ठीक हैं, कौनसे नहीं इस को समझने के कई नज़रिये हैं – एक एथिकल (मैंने जान बूझ कर मॉरल शब्द काम नहीं लिया है यहाँ ) या नैतिक, वैधानिक या लीगल, साइकोलॉजिकल या मानसिक, सोशल या सामाजिक, इमोशनल या भावनात्मक आदि।

    इन सब चीज़ों को देखते समय एक चीज़ और ध्यान रखने की है, वो है सेक्स, सेक्सुअलिटी, सेक्सुअल हेल्थ सम्बंधित चीज़ों का बाज़ारीकरण। ये सिर्फ पोर्न, सुली डील्स, सेक्स वर्क आदि के रूप में ही नहीं, बल्कि सेक्स टॉयज, कंडोम्स, लुब्रिकेंट्स, गर्भ निरोधक, STD टेस्ट्स, अवेयरनेस, पुस्तकें (ज्ञानवर्धक भी, और अश्लील भी), फिल्मों, कपड़ों आदि बहुत सारे रूपों में  देखने को मिलता है।

    इसकी समझ विकसित करना इसलिए ज़रूरी है ताकि, सेक्स और सेक्सुअलिटी सम्बंधित अपने निर्णय लेते समय समझदारी के साथ चॉइस बनायीं जा सके।

    सेक्स, सेक्सुअलिटी से सम्बंधित विषयों को एक पोस्ट या कुछ पोस्ट्स में समझना, समझाना, संवाद कायम करना, या समेटना संभव नहीं है, इसलिए अभी के लिए यहीं तक।

    डिस्क्लेमर – लेख में हम सेक्स और सेक्सुअलिटी के सम्बन्ध में बात इसलिए कर रहे हैं ताकि पूर्वाग्रहों, कुंठाओं से बाहर आ कर, इस विषय पर संवाद स्थापित किया जा सके, और एक स्वस्थ समाज का विकास किया जा सके। यहाँ किसी की भावनाएं भड़काने, किसी को चोट पहुँचाने, या किसी को क्या करना चाहिए ये बताने का प्रयास हरगिज़ नहीं किया जाता। ऐसे ही, कृपया ये प्रयास मेरे साथ न करें। प्रश्न पूछना चाहें, तो गूगल फॉर्म संलग्न है, वहां पूछ सकते हैं। 

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    Anupama Garg

    Anupama is an ever-evolving person, deeply interested in human behavior, specially human sexuality. She has vastly researched alternative sexual lifestyles and has also written a series of non-fiction books on the subject with a pseudonym.

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  • यौन शिक्षा :: एक दृष्टिकोण – अनुपमा गर्ग (भाग – 2)

    यौन शिक्षा :: एक दृष्टिकोण – अनुपमा गर्ग (भाग – 2)

    सेक्सुअल रिश्ते में खोखलापन क्यों ? 

    प्रश्न – मैंने और एक लड़के ने आपसी सहमती से शारीरिक संबंध बनाए। कुछ महीनों से हमारा ये रिलेशन, जोकि सिर्फ शारिरिक संतुष्टि के लिए है, सही चल रहा है। हम एक दूसरे के साथ काफी कम्फर्ट महसूस करते हैं। पर मेरी दुविधा ये है कि मैं जब भी उस से मिलकर आती हुं, बहुत खालीपन महसूस करती हुं। मैंने जीवन के उस मोड़ पर ये संबंध बनाया जब मुझे प्रेम की बहुत ज़रूरत महसूस हो रही थी। जब से उसके साथ हूं तब से मुझे और ज्यादा खालीपन लग रहा और इमोशनल सपोर्ट की ज़रूरत महसूस हो रही है। लेकिन उसका साथ मुझे पसंद है, मैं कुछ ही वक्त के लिए सही पर प्रेम महसूस कर पाती हूं उसकी वजह से।

    अपनी राय दें।

    मेरी दोस्त, आपके प्रश्न से इतना समझ पाई कि आप महिला हैं।  शायद सिंगल भी हैं।  आपकी दुविधा समझ सकती हूँ।  इस स्थिति को देखने के कई पहलू हैं, अतः मेरा उत्तर थोड़ा लम्बा हो सकता है।  अगर संभव हो तो थोड़े धैर्य के साथ पढें।

    मेरी राय तो नहीं कहूँगी, लेकिन मेरा दृष्टिकोण इस स्थिति के बारे में जैसा है, वो बता रही हूँ।   यदि उसमें से आपके कुछ और सवाल हों, तो फॉर्म में फिर से लिख सकती हैं।

    प्रेम और सेक्स दो अलग अलग बातें हैं। प्रेम कई प्रकार का होता है, उनमें से प्रेम का एक प्रकार रोमांटिक या सेक्सुअल अट्रैक्शन भी है।   इसलिए सबसे पहले अपने आप के साथ कुछ देर बैठ कर ये देखें कि आपने जब ये रिश्ता शुरू किया, तब भावनात्मक प्रेम की चाह थी, या यौन तृप्ति की? यदि इस रिश्ते से आपकी उम्मीद सिर्फ शारीरिक सुख की थी, और यदि वह सुख आप दोनों सहमति से, आनंदपूर्वक एक दूसरे से प्राप्त कर रहे हैं, तो फिर ये जो खालीपन आपको महसूस हो रहा है, ये कहाँ से आ रहा है इसे देखें।   क्या ये खालीपन हमारी कंडीशनिंग का हिस्सा तो नहीं ?

    अक्सर हमारे आस पास लोग ऐसा दिखाते हैं कि उनकी रिलेशनशिप्स बहुत खुश हैं, वो बहुत प्रेम में हैं, वो बहुत सेक्सुअली संतुष्ट हैं।   लेकिन ये इसलिए क्योंकि हमें लगता है, हम जैसे ही कहेंगे कि हमें संतुष्टि नहीं मिली, हमें जज किया जायेगा।   हमें बुरी लड़की, या आवारा लड़के का तमगा मिल जायेगा।   अब क्योंकि हम अपने आसपास हमेशा ये ही देखते हैं, तो हम अपने आप से, और अपने पार्टनर से भी ऐसी ही unrealistic संतुष्टि की उम्मीद भी लगा बैठते हैं।  

    कभी कभी, इसके उलट ये भी होता है, कि किसी रिश्ते की शुरुआत तो होती है एक दृष्टिकोण के साथ, लेकिन समय के साथ साथ, एक या दोनों व्यक्ति की भावनाएं, ज़रूरतें बदल जाती हैं।   कई बार हम अपने साथी को ये बताते ही नहीं।   इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, झिझक, ‘कहीं मेरे हाथ से ये भी न चला जाए’ का डर, ‘लेकिन हमने यहाँ से शुरू नहीं किया था, अब बोलेंगे तो साथी क्या समझेंगे?’ का जजमेंट आदि।  

    लेकिन बिना बताए तो कभी पता भी नहीं चलेगा कि सामने वाला इस बारे में क्या सोचता है? इसलिए संवाद से डर लगने के बाद भी संवाद ज़रूरी है ! ये संभव है कि आपने जो रिश्ता बिना उम्मीदों के शुरू किया, उससे अब आपकी ज़रूरतें बदल रही हों।   ये भी संभव है कि आपके साथी को भी ऐसा लग रहा हो। ऐसे में बात करें ताकि सही स्थिति की पूरी समझ विकसित हो पाए।  

    इस स्थिति को देखने का एक और पहलू भी है।  वह है Rebound और New Relationship Energy।   जैसा आपने कहा – इस रिश्ते की शुरुआत एक ऐसे समय में हुई, जब आपको प्रेम की बहुत आवश्यकता महसूस हो रही थी।   कभी कभी, हम एक रिश्ते में से जब बाहर आते हैं, तो बहुत टूटे हुए होते हैं।   ऐसे में किसी भी नए रिश्ते की शुरुआत, कुछ दिन, कुछ हफ़्तों, कुछ महीनों तक तो सुकून दे सकती है।   लेकिन ऐसे किसी भी रिश्ते की नींव आम तौर पर कच्ची होती है, और बिना सुदृढ़ नींव के रिश्तों में एक समय के बाद खोखलापन मासूस होना लाज़िमी है।  

    ऐसा नहीं है कि ये खोखलापन ठहराव वाले, लॉन्गटर्म रिश्तों में नहीं आ सकता।   लेकिन बिना पिछले रिश्ते को प्रोसेस किए, जब नए रिश्ते बनाए जाते हैं, तो ऐसा खालीपन देखने को ज़्यादा मिलता है।   बहुत बार ऐसे में हम एक के बाद एक शार्ट टर्म अफेयर्स करते जाते हैं।   इसमें नैतिक रूप से कुछ गलत नहीं है, लेकिन, यह रिलेशनशिप की ज़रुरत पूरी नहीं करता।   ऐसे में कई बार यह भाव भी घर कर सकता है मन में, कि शायद मैं किसी रिलेशनशिप के लायक ही नहीं हूँ।   जबकि इनमें से कुछ भी सच नहीं होता।  

    हर रिश्ते की एक New Relationship Energy या यूं समझ लें कि एक हनीमून पीरियड भी होता है।   ये वो समय है जब रिश्ता नया है, समस्याएं कम और सब कुछ सुन्दर ही सुन्दर नज़र आता है।   New Relationship Energy या NRE का इस बात से कोई सम्बन्ध नहीं, कि आपका रिश्ता शारीरिक भर है, या भावनात्मक, बौद्धिक, सामाजिक आदि भी है।   तो आपसे मुझे ये कहना है, कि आपको खालीपन या खोखलापन महसूस होने के पीछे एक कारण ये भी हो सकता है, कि कुछ महीने बीतने के बाद ये NRE आपकी रिलेशनशिप से ख़त्म हो रही हो।  

    इन सब बातों के बारे में आराम से सोच कर देखें।  बिलकुल संभव है कि आपको शायद इस दुविधा के पीछे और कोई वजह भी नज़र आए।   जहाँ तक इसके समाधान का सम्बन्ध है, आप जो भी समझेंगी, वो आपको आज या कल, जल्द या देर से, अपने साथी को तो बताना चाहिए, ऐसा मेरी समझ कहती है।   उसके बाद उन्हें सोचने का मौका दे कर, उनके विचार जान कर, आप दोनों इस रिश्ते को कैसे, कितना, कब तक आगे बढ़ाना, ये बेहतर तय कर पाएंगे।  

    उम्मीद है, कुछ समाधान मिला होगा आपको। 


    डिस्क्लेमर लेख में हम सेक्स और सेक्सुअलिटी के सम्बन्ध में बात इसलिए कर रहे हैं ताकि पूर्वाग्रहों, कुंठाओं से बाहर आ कर, इस विषय पर संवाद स्थापित किया जा सके, और एक स्वस्थ समाज का विकास किया जा सके। यहाँ किसी की भावनाएं भड़काने, किसी को चोट पहुँचाने, या किसी को क्या करना चाहिए ये बताने का प्रयास हरगिज़ नहीं किया जाता। ऐसे ही, कृपया ये प्रयास मेरे साथ न करें। प्रश्न पूछना चाहें, तो गूगल फॉर्म संलग्न है, वहां पूछ सकते हैं।

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  • यौन शिक्षा :: एक दृष्टिकोण – अनुपमा गर्ग (भाग – 1)

    यौन शिक्षा :: एक दृष्टिकोण – अनुपमा गर्ग (भाग – 1)

    भूमिका –

    आज एक कॉलेज सीनियर ने फ़ोन किया। 18 – 19 साल का बच्चा है उनका। जब मैं मास्टर्स के एक्साम्स देने गयी थी, तब ये भी बच्चे को घर छोड़ कर आती थीं प्राइवेट एक्साम्स देने। हम दोनों अलग-अलग सब्जेक्ट्स में थे, और ये शादी के कई सालों बाद दोबारा पढाई शुरू कर रही थीं। पति के साथ रिलेशनशिप बिलकुल उतनी ही टॉक्सिक और अब्यूसिव है, जितनी आम हिंदुस्तानी घरों में होती है। लेकिन बच्चे को इन्होंने बहुत खुले मन से पाला। बच्चा बड़े शहर की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ने जब गया पहली बार, तो इन्होने अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए, उसे सेफ सेक्स, प्रोटेक्शन, वगैरह भी समझाया। बच्चा ने वहां bumble, tinder वगैरह चलाया, और hookup कर के आया।

    अभी छुट्टियों में घर लौटा और बाप ने condoms देख लिए बच्चे के सामान में। उधर हमारी सीनियर को बच्चे ने खुले मन से बताया कि वो कैसे अपनी एक सीनियर विजिटिंग स्टूडेंट के साथ मिला डेटिंग ऐप पर, और उसने कैसे इंटिमेसी एक्स्प्लोर की। ‘We enjoyed  ourselves mumma without commitments, without baggage, and with safety. Maybe we will do it again’.

    मेरी दोस्त के चेहरे पर कुछ भाव आये, कुछ गए। बच्चे ने देखे, और बोला “Sorry mamma, I upset you  ” दोस्त ने बच्चे से कहा कि वो अपसेट नहीं हैं लेकिन मुझसे बात करते समय वो चिंतित थीं। उनके शब्द थे – “अनुपमा वो distract हो जायेगा पढ़ाई से। क्या मैंने उसे मेंटली prepare करने में कोई गलती कर दी? मैं डिस्कस किस से करूं ?”

    मुझे  लेकिन सिर्फ़ ये एक ही सवाल नहीं दिखा यहाँ। मुझे कई सवाल सुनाई दिए – कहे अनकहे। एक सवाल  – क्या मेरी परवरिश में कमी रह गयी ? क्या मैं अच्छी माँ नहीं हूँ ? क्या मेरा बेटा बिगड़ रहा है ? क्या मेरा बेटा भटक जायेगा ?

    खैर मेरी दोस्त और मेरा संवाद अधूरा रह गया, कि कोई आ गया दरवाज़े पर। वैसे भी हम दोनों तो करते ही रहेंगे अपना followup फ़ोन कॉल, लेकिन मेरा दिमाग कई पुराने संवादों की तरफ गया।

    बहुत से संवाद हैं जो अलग अलग वक़्त पर, अलग अलग लोगों के साथ किए हैं मैंने, सेक्स, जेंडर, सेक्सुअलिटी के बारे में। और हर संवाद सिरे से शुरू करना पड़ा है। हर संवाद में यही निकल के आता है कि इस बारे में बात करने की ज़रुरत है, लेकिन टैबू है। और जितनी बार बात करो, सवाल फिर वही, तुमको ये ही बात क्यों करना है ? और भी तो इतना कुछ है बात करने के लिए? लिखने के लिए !

    दुनिया कहाँ जा रही, और हम अभी गुड टच, बैड टच, कंसेंट में ही उलझे हैं, orgasm पर कब पहुंचेंगे? बात करते हैं तो या तो संस्कृतनिष्ठ हिंदी में जिसका रोज़मर्रा की बोलचाल से कोई लेना देना नहीं, या फिर स्लैंग में, जिसको सुन के ही उबकाई आ जाये। शीघ्रपतन, स्वप्नदोष, बचपन की गलतियों के बोर्ड पढ़ लीजिये, किसी नए शहर में घुसते ही। ऑटो वाले को बदनाम गलियाँ ज़रूर पता होंगी,  बाकी कुछ पता हो न हो।  यहाँ तक कि एक बार मैं एक जाने माने सेक्सोलॉजिस्ट को इंटरव्यू करने गयी, और उनके चैम्बर के बाहर बैठे हुए मैंने सुना कि वो किसी मरीज़ से कह रहे थे ‘तुझे घोड़ा बना दूंगा, चिंता मत कर।’

    “मैडम आप लेस्बियन हैं क्या? वरना आप को सेक्सुअलिटी की स्टडी क्यों करनी है? आप डॉक्टर थोड़े ही हैं ? “

    मेरा मन किया पूछूँ, “आप तो डॉक्टर हैं न? गे भी नहीं हैं, फिर उस बेचारे भले पेशेंट को घोड़ा क्यों बनाना चाहते थे?” 

    मैं बिना इंटरव्यू लिए, शुक्रिया बोल कर चली आयी वहां से, लेकिन मैं आज भी देखती हूँ लोगों को सवालों के साथ घूमते हुए, और कचरा सीखते हुए, एंग्जायटी से डील करते हुए, रिश्तों को दरकते हुए, अनाप शनाप पैसा खर्चते हुए।इसी सब के साथ कई साथियों से परिचर्चा एवं लेखन कार्य के साथ सेक्सुअल अवयेरनेस पर नोट्स की जरूरत महसूस हुई। सेक्सुअल अवेयरनेस परिपक्वता में नज़र आती है, अश्लीलता में नहीं। लेख के आखिर में गूगल फॉर्म भी उपलब्ध है ताकि जो लोग बिना नाम बताए पूछना चाहें, पूछ सकें।

    श्रंखला के पहले प्रश्न से हम इसकी शुरुआत करते है – 

     

    प्रश्न – क्या भावनात्मक रूप से एक हुए बिना सेक्स संतुष्टि प्रदान कर सकता है । दूसरे शब्दों में क्या आत्मिक प्रेम स्थापित हुए बिना मात्र शारीरिक स्तर पर किया गया मैथुन मन को तृप्त कर पाता है? यदि शारीरिक स्तर पर किया गया सेक्स और प्रेम में किए गए सेक्स समान रूप से संतुष्टि दायक हैं तो फिर अन्य अनेक लोगों को मैं देखता हूं कि वे किसी के साथ शारीरिक रूप से मैथुन करने के बाद पुनः शीघ्र ही अपनी संतुष्टि किसी अन्य पुरुष या स्त्री में खोजने लगते हैं, ऐसा क्यों है कि शारीरिक क्षुधा शांत होने पर भी मन अतृप्त रहता है?

    मैम, मैं इस संदर्भ में बहुत हद तक अनभिज्ञ हूं इसलिए यह प्रश्न अक्सर मेरे सामने आता है । इस संदर्भ में मेरा ग्यान ज्यादातर किताबी ही है, इसलिए प्रश्न में तनिक भ्रम सा दिखाई पड़ सकता है इसलिए क्षमा करें । भैरप्पा बहुत दृढ़ता से सम्भोग और मैथुन (sex) और सम्भोग को अलग अलग परिभाषित करता है।  वात्स्यायन भी इसमें अंतर करता है । जबकि अंग्रेजी में इसके लिए कोई अलग शब्द ही नहीं है । उपरवास से सम्भोग की प्रक्रिया तक स्त्री और पुरुष का पहुंचना क्या वस्तुतः मैथुन ही है और अगर ऐसा है तो परिणाम में सामान्यतः अंतर क्यों दिखाई देता है । क्यों एक पुरुष सुखी दामपत्य जीते हुए भी अपनी तृप्ति महसूस नहीं कर पाता और क्यों किसी को एक सामान्य चुम्बन भी तृप्ति का बोध करा देता है ?

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    इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। सेक्स व्यक्तिगत होता है। कई लोग हैं, जिन्हें बिना बौद्धिक उत्तेजना के बगैर किया सेक्स संतुष्टि नहीं देता। ऐसे लोगों को Sapiosexual कहा जाता है। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें प्रेम में ही उत्तेजना, और प्रेमी के साथ किए सेक्स से ही आनंद की प्राप्ति होती है। ऐसे लोगों को Demisexual कहा जाता है।

    वहीं Asexual लोग भी हैं, जिन्हें सेक्सुअल उत्तेजना नहीं होती। उन्हें लोगों से प्रेम होता है, वे लोगों से शारीरिक, भावनात्मक सम्बन्ध बना सकते हैं, वे लोगों के गले लग सकते हैं, उन्हें बाहों में भी भर सकते हैं, उन्हें रोमांटिक स्पर्श की इच्छा भी हो सकती है, लेकिन सेक्स या जिसे आप मैथुन या सम्भोग कह रहे हैं, उसकी इच्छा नहीं होती।

    ठीक इसी तरह ऐसे लोग भी हैं, जो सेक्स को सिर्फ शारीरिक आवश्यकता की तरह देखते हैं, उसे पूरा भी करते हैं, और उन्हें इसके लिए emotions या commitment या spiritual सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती। इसका व्यक्ति के जेंडर से कोई सम्बन्ध नहीं है। महिलाएं या पुरुष कोई भी ऐसा हो सकता है।

    सेक्स को सिर्फ शारीरिक आवश्यकता की तरह देखने वाले लोग इसे पूरा भी करें, ये यह कोई जरूरी नहीं है। इसका मतलब ये भी नहीं, कि वे अपने सेक्सुअल साथी / साथियों के प्रति सम्मान नहीं रखते। ये भी जरूरी नहीं, कि बहुत से लोग ये समझते भी हों कि सेक्स उनके लिए मात्रा एक शारीरिक आवश्यकता है। विशेष तौर पर इसलिए क्योंकि सेक्स के बारे में हमारी समझ अधिकतर कंडीशनिंग, सामाजिक और नैतिक मूल्यों, दंड विधान आदि से विकसित होती है।

    कई समाजों में (जैसे हमारे अपने समाज को ही उदाहरण के तौर पर देखें, या जैसे और भी बहुत से साउथ एशियाई देशों में सेक्स को ले कर बहुत कुंठा है), सेक्स की बात करने या, सेक्स की इच्छा दर्शाने पर, या सेक्स कर लेने पर भी, लोगों की सामाजिक, नैतिक प्रताड़ना की जाती है। ऐसे में लोग अक्सर ये दिखाने की कोशिश करते हैं, कि उन्हें अपने साथी से प्रेम भी है। ऐसे समाज में अक्सर, सेक्स की बातें, सेक्स की प्रक्रिया, और सेक्स का अनुभव, सभी बहुत ढोंग और कुंठाओं से भर जाता है।

    वहीँ दूसरी ओर, जिन समाजों में सेक्सुअलिटी का सम्यक अध्ययन किया जा रहा है वहां सेक्सुअलिटी के बारे में नए तथ्य सामने आ रहे हैं। जहाँ अपनी सेक्सुअल डिजायर बताने पर पाबन्दी नहीं है, जहाँ सेक्सुअल भिन्नता के लिए दंड का प्रावधान नहीं है, वहां लोग ठीक से और सवालों के साथ, इस सवाल का भी जवाब दे पा रहे हैं। ये एक अलग बात है, कि धीरे-धीरे वक़्त बदल रहा है, और जैसे जैसे समाज में लोगों के अनुभव बदलेंगे, वैसे ही धीरे-धीरे शायद समाज की सेक्स, संतुष्टि, और आनंद को ले कर अवधारणाएं भी।

    मेरे व्यक्तिगत अनुभव में, हमने सदियों से इस बारे में बात ही न कर के इस विषय को बेवजह ज़रुरत से ज़्यादा उलझन भरा बना दिया है। सेक्स अनुभव और संवाद का विषय ज़्यादा है, अध्ययन का कम। इसलिए हमारे प्रश्न यदि इस बात पर ज़्यादा ध्यान दें कि हम स्वयं, और अपने साथी को कैसे आनंद पहुंचा सकते हैं, तो हम पाएंगे कि हमारे सम्बन्ध कहीं बेहतर होंगे, बजाय इसके कि कामसूत्र में कितनी मुद्राएं हैं, या भैरप्पा सम्भोग व मैथुन के लिए अलग अलग terms use करते हैं या नहीं।

    वैसे सन्दर्भ में बताती चलूँ, कि अंग्रेज़ी में सेक्स शब्द को बहुत आराम से इस्तेमाल किया जाता है, मैथुन के लिए शब्द ‘coitus’ है, लेकिन वहां लोगों से ये उम्मीदें नहीं की जातीं कि वे जब तक शुद्ध भाषा में बात न कर सकें, तब तक उनके प्रश्न, उनके उत्तर, या उनके अनुभवजन्य विचार मान्य नहीं होंगे।

    खैर विषय से इतर गए बिना, मूल प्रश्न पर लौटते हुए – सेक्स एक व्यक्तिगत अनुभव है, इसलिए कुछ लोगों को भावनात्मक रिश्ते के बिना संतुष्टि नहीं मिलती, कुछ लोगों को मिलती है। हाँ सहमति ज़रूरी है। भारतीय विधि के प्रावधान के अनुसार सहमति देने का विषय अपने आप में काफी विशद है, इसलिए वो किसी और दिन।

    डिस्क्लेमर – मेरे लेख में हम सेक्स और सेक्सुअलिटी के सम्बन्ध में बात इसलिए कर रहे हैं ताकि की जाती है कि पूर्वाग्रहों, कुंठाओं से बाहर आ कर, इस विषय पर संवाद स्थापित किया जा सके, और एक स्वस्थ समाज का विकास किया जा सके। यहाँ किसी की भावनाएं भड़काने, किसी को चोट पहुँचाने, या किसी को क्या करना चाहिए ये बताने का प्रयास हरगिज़ नहीं किया जाता। ऐसे ही, कृपया ये प्रयास मेरे साथ न करें। प्रश्न पूछना चाहें, तो गूगल फॉर्म संलग्न है, वहां पूछ सकते हैं। 

    Google Form Link – https://forms.gle/9h6SKgQcuyzq1tQy6

    About Author

    Anupama Garg

    Anupama is an ever-evolving person, deeply interested in human behavior, specially human sexuality. She has vastly researched alternative sexual lifestyles and has also written a series of non-fiction books on the subject with a pseudonym.

    She believes in transforming the outlook towards sexuality by structured, quality conversations, one at a time. Apart from this space, she works as a content specialist and researcher, writes poetry and sings for passion.

    Instagram: @anupama.garg.25

    Facebook: https://www.facebook.com/anu.25.25/

  • प्रेमी देर रात घर लौटते हैं

    प्रेमी देर रात घर लौटते हैं

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    वे ऐसे नहीं चलते जैसे हत्या के लिए नौकरी पर रखे गए सैनिक चलते हैं

    वे ऐसे नहीं चलते जैसे पहलू खान के पीछे चलते गौ-रक्षक

    वे ऐसे नहीं चलते जैसे अँधेरा होने पर चलती हैं लड़कियाँ

    वे ऐसे नहीं चलते जैसे चलता है दक्खिन टोले का कोई इंसान उत्तर दिशा की तरफ़

    वे ऐसे नहीं चलते जैसे हत्यारे चलते हैं भभूत लपेटे नंग-धड़ंग

    वे ऐसे नहीं चलते जैसे न्यूज़ स्टूडियो में चलता है कोई पाजी एंकर

    वे ऐसे नहीं चलते जैसे चलता है डरा हुआ तानाशाह तोप में घुसकर

    वे ऐसे नहीं चलते जैसे अम्बानी चलता है रोज़ अपने घर से

    उनके क़दम तो ऐसे चलते हैं जैसे

    उँगलियाँ चलती रही होंगी बीथोवन की पियानो पर

    प्रेम में पगी

    एकदम अभ्यस्त

    जैसे ये पैर सिर्फ़ उसी एक रास्ते पर चलने के लिए बने हैं

    वे बार-बार चलते हैं उसी एक गली में

    बाम पर नज़रें टिकाए

    उनका चलना देर रात तक चलता है

    जब तक कि बीथोवन का वह पीस ख़त्म नहीं हो जाता

    जो बुना है उसने अपनी प्रेमिका की याद में

    प्रेमी देर रात ही घर लौटते हैं। 

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • क्वीन विक्टोरिया को भी सर्दी लगती है

    क्वीन विक्टोरिया को भी सर्दी लगती है

    राजेश्वर वशिष्ठ


    सुनेत्रा,

    आज सुबह क्वीन विक्टोरिया ने कहा-

    आसमान में कोई खिड़की खुली छूट गई होगी

    बहुत ठंड रही रात भर

    इतने कपड़े पहन कर भी मुझे

    ठिठुरना पड़ा कोलकाता में

    इस अपने ही इतने अद्भुत घर में!

    सूरज ने धीरे से दस्तक दी

    हरे पत्तों को चूमा और

    विक्टोरिया की गोद में पसर गया

    रानी साहिबा ने

    नज़र उठा कर नहीं देखा उसे

    वह नाराज़ थीं।

    1901 की जनवरी ही थी

    जब मैंने विदा ली इस दुनिया से

    ठंड से ठिठुर रहा था ग्रेट ब्रिटेन

    कब्र की मिट्टी को

    कोई नहीं करता गरम

    चाहे दफनाया जा रहा हो

    किसी सम्राट को ही

    लिहाज़ा ठंड से काँपती रही मैं भी

    उस सबसे कीमती लकड़ी के ताबूत में!

    मेरी आत्मा ने

    पूरी दुनिया का चक्कर लगाया

    और इत्मिनान किया

    कि वाकई सूरज नहीं डूबता

    इंग्लैंड के सिंहासन का!

    मैं आखिर में ठहर गई

    इंडिया के इस कैल्कटा शहर में

    जहाँ हुगली का बहता पानी था

    हरी घास का मैदान था

    चिड़ियों की चहचहाहट थी

    और सबसे वफादार बाबू थे

    जिन्हें हमने कभी बैबून कहा था

    और उनमें होड़ लग गई बाबू बनने की

    ज़रूरत से उपजी आस्था तो

    शब्दों के अर्थ ही बदल डालती है!

    मुझे याद थी ब्रिटेन की सर्दी

    जो राजाओं को भी महसूस होती थी

    मुझे रश्क था ताजमहल से

    जो इंडिया में ही आगरा में था

    दिल करता था मेरे लिए भी बने एक ताजमहल

    और मैं यहीं रह गई कैल्कटा में

    यहाँ बन सकता था मेरा भी ताजमहल!

    1906 से लेकर 1921 तक

    पहरा देती रही मेरी आत्मा

    अपने इस महल का

    जिसे कम शानदार नहीं बनाया गया था।

    विश्व युद्ध आया

    कितनी ही सर्दी-गरमियाँ आई

    पर मैं बैठी ही रही

    इस शानदार ऊँचे सिंहासन पर!

    आज़ादी के बाद भी यह मेरा ही देश है

    कॉमनवेल्थ का सदस्य है

    अंग्रेज़ी बोलता है और बिछ जाता है

    गोरी चमड़ी के सामने

    अब भी छोड़ना नहीं चाहता

    मैकाले की शिक्षा पद्धति

    और ब्रिटिश कानून का मोह!

    अभी भी ज़िंदा बचे हैं ऐसे लोग

    जो गर्व से कहते हैं

    इन काले अंग्रेज़ों से तो गोरे अंग्रेज़ अच्छे थे

    मेरा सीना चौड़ा हो जाता है सुन कर!

    अब तपने लगा है सूरज

    कुछ ही देर में खुल जाएंगी

    जमी हुई बूढ़ी हड्डियाँ

    बहुत मज़ेदार लगती है मुझे

    तुम्हारे इस कोलकाता की ठंड ।

    पर सुनो,

    तुम ठण्ड से बचो

    बाबुओं को ठंड जल्दी लगती है

    नए साल में,

    नई छुट्टियाँ जो खाते में आगई हैं!

    मेरा क्या

    मैं तो ठंडे मुल्क की पैदायश हूँ! 

    Rajeshwar Vashishth

  • मानवाधिकार का वर्तमान संदर्भ और पुलिस-प्रशासन की भूमिका —— Ashok Kumar Verma

    मानवाधिकार का वर्तमान संदर्भ और पुलिस-प्रशासन की भूमिका —— Ashok Kumar Verma

    Ashok Kumar Verma IPS (Rtd)
    Writer
    MA (Philosophy), Allahabad University

    पुलिस द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के प्रकरण आजकल प्रायः रोज़ ही देखने, सुनने और पढ़ने को मिलते रहते हैं। जनसामान्य के साथ पुलिस के दुर्व्यवहार, मारपीट, उत्पीड़न, यातना  आदि के प्रकरण समाचार-पत्रों की अक्सर सुर्खियाँ बनते रहते हैं। मारपीट और यातना के कुछ प्रकरणों में पीड़ित की मृत्यु तक हो जाती है। मृत्युवाले प्रकरणों में कुछ दिन अख़बार और मीडिया में चर्चा होता है। साथ ही, विरोध, आन्दोलन, धरना-प्रदर्शन आदि का क्रम भी चलता है। समय के साथ कुछ प्रकरण सरकार द्वारा की गयी कार्रवाई और दी गयी सहूलियतों से पीड़ित पक्ष के संतुष्ट हो जाने के कारण और कुछ पीड़ित पक्ष के शिकायत करते-करते थक या ऊब जाने के कारण शांत हो जाते हैं। जनता और प्रेस-मीडिया भी पुराने प्रकरण को भूल जाते हैं। प्रतिदिन इतने नये प्रकरण आते रहते हैं कि पुराने याद रखना असंभव हो जाता है। फिर जहाँ विविधता नहीं, वहाँ सरसता भी नहीं रहती है। पाठकों की रुचि बनाये रखने के लिए बदलाव आवश्यक है। यही रोज़मर्रा की हमारी सामाजिक ज़िंदगी है। 

    गोरखपुर के रामगढ़ताल क्षेत्र में दिनांक 27 सितम्बर, 2021 को होटल कृष्णा पैलेस में चेकिंग के दौरान पुलिस द्वारा की गयी मारपीट के कारण कानपुर के व्यवसायी मनीष गुप्ता की मृत्यु हो गयी। प्रभारी निरीक्षक और चौकी प्रभारी सहित छह उत्तरदायी पुलिसकर्मियों को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए निलंबित कर दिया गया। इन सभी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध अभियोग भी पंजीकृत हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस प्रकरण की जाँच के लिए एक एसआईटी का गठन किया है तथा निष्पक्षता की दृष्टि से प्रकरण को गोरखपुर से कानपुर स्थानांतरित कर दिया है। साथ ही, सीबीआई जाँच की सिफ़ारिश करते हुए प्रकरण को भारत सरकार को भी संदर्भित कर दिया गया है। शासन ने मृतक की पत्नी को कानपुर विकास प्राधिकरण में ओएसडी बनाने तथा उसके परिवार को 40 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की है। 

    यही घटनाक्रम है, जो इस तरह की घटना के बाद सामान्यतः घटित होता है। इन सब के बाद सबकुछ पूर्ववत् चलने लगता है। न पुलिस बदलती है, न प्रेस-मीडिया और न ही जनता। हमारे सामाजिक जीवन का यही ढर्रा आम हो चला है। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। हर नयी घटना में एक नया मृतक होता है और उसका परिवार होता है, लेकिन, रोने-बिलखने, तड़पने, आँसुओं, दुःख-दर्द आदि में कोई बदलाव नहीं होता। आख़िर, यह सब हमारी नियति में अब तक क्यों है, आज यही सबसे बड़ा सवाल है? देश को आज़ाद हुए तो बहुत लम्बा अर्सा गुज़र गया है। बावजूद इसके स्थितियाँ क्यों नहीं बदलीं? पुलिस द्वारा मारने-पीटने, दुर्व्यवहार करने की उसकी प्रवृत्ति और प्रकृति अब तक क्यों नहीं बदली? पुलिस लोक का सेवक क्यों नहीं बन सकी? पुलिस का रूपांतरण क्यों नहीं हुआ? सच्चे अर्थों में लोकतंत्र हमारे यहाँ क्यों नहीं विकसित हो पाया? मानवगरिमा अभी तक हमारे समाज के लिए चिंतन का महत्त्वपूर्ण विषय क्यों नहीं बनी?

    आज़ादी के बाद पुलिस का चरित्र बदलना चाहिए था, मगर अफ़सोस की बात है कि  उसके मूल चरित्र में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया। सामान्यतः आरोप लगता है कि जनसामान्य के साथ अभी भी पुलिस का रवैया तानाशाहीवाला ही होता है, उनके साथ वह भेदभाव करती है, उनसे मित्रवत् व्यवहार नहीं करती है और सबसे बढ़कर अपने अधिकारों का वह दुरुपयोग करती है। वास्तव में यह स्थिति पुलिस की ही नहीं है, सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था की है। सब कुछ स्वतंत्रता के पूर्व जैसा ही चल रहा है। बस, अंगरेज़ों के स्थान पर हमारे अपने देश के लोग शासक बन गये हैं। हमारे अपने शासकों को अपनी सत्ता, अपने लोगों और वर्ग का हित ही सर्वोपरि है। लोक आज भी सो रहा है। उसको जगाने के कोई सार्थक और ईमानदार प्रयास अभी तक नहीं हुए। कारण स्पष्ट है, लोक के जागने से शासकवर्ग की सत्ता को चुनौती मिलने की सम्भावना होती है। इसीलिए हमारे देश में लोक को इतना जागरूक ही नहीं बनाया गया कि वह भाग्यवाद, नियतिवाद, कृपा, अंधविश्वास, आदि से मुक्त होकर अपने अधिकारों-कर्तव्यों और देश-दुनिया को जान-समझ सके। लोकतंत्र क्या है, इसे जान सके। वह आज भी जनप्रतिनिधि, शासन-तंत्र के अधिकारियों, पुलिस आदि को भाग्यविधाता और स्वयं को उनका सेवक मानता है। उसे यह मालूम ही नहीं है कि पुलिस या प्रशासन उसकी सेवा के लिए हैं। उसे सामाजिक न्याय, मानवगरिमा, समता, आदि उदात्त लोकतांत्रिक मूल्यों की जानकारी ही नहीं है। प्रेस और मीडिया का कर्तव्य लोगों को शिक्षित करना, उनकी रुचि का परिष्कार करना और चीज़ों को पारदर्शी तरीके से लोक के सामने प्रस्तुत करना है। संविधान, लोकतंत्र, गणतंत्र, समाजवाद, आदि के संबंध में जनसामान्य को जानकारी देने जैसे अपने पुनीत कर्तव्य से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाने वाले प्रेस और मीडिया ने अपना मुँह मोड़ रखा है।

    हमारा समाज अत्यंत जटिल है। जाति-वर्ण-वर्ग के भेद और उनका प्रभुत्व और वर्चस्व और उनके हित हमारे समाज को जटिल बनाते हैं। असमानता, निर्धनता, अज्ञानता और ग़रीबी इस जटिलता को और जटिल बनाती हैं। प्रभुता-वर्चस्व-संपन्न कोई भी वर्ग अपनी विशिष्टता को देश और समाजहित में त्यागने और छोड़ने को तैयार नहीं है। देशभक्ति का अर्थ उसके लिए बहुत सीमित है। उसे नहीं मालूम कि कोई राष्ट्र अपने नागरिकों से बनता है। देश में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में उसकी कोई रुचि नहीं है। कई बार अपने सोच और कार्यों से वह इन बुराइयों को संरक्षण भी देता है। जापान के प्रभुता-संपन्न वर्ग ने उन्नीसवीं शताब्दी में देशहित के लिए अपने विशेषाधिकार छोड़ दिये थे। मध्यकाल की जड़ता को त्याग आज वह उन्नत और आधुनिक राष्ट्र है। वहाँ नर्सरी के बच्चे कई किमी दूर अकेले पढ़ने जाते-आते हैं। हमारे यहाँ इस तरह की कल्पना करना भी संभव नहीं है। जाति, वर्ण, भेदभाव, असमानता, ग़रीबी, आदि बुराइयाँ आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं। अग्रसोची और अग्रदर्शी की जगह हमारे समाज को अतीतोन्मुखी और आत्ममुग्धता का शिकार बनाया जाता है। जबकि माना जाता है परिवर्तन ही जीवन है। परन्तु अतीत के प्रति हमारी मुग्धता हमें समय के अनुसार नूतन, नवीन और अद्यतन नहीं बनने देती। अतीत को आदर्श मानकर हम परिवर्तन की राह रोक देते हैं। जब तक हमारा समाज समतामूलक, विवेकसंपन्न, समावेशी और आधुनिक नहीं बनता, तब तक पुलिस के क्या, शासनतंत्र के किसी भी अंग के चरित्र में कोई मौलिक परिवर्तन संभव नहीं है।    

    आज़ादी के बाद पुलिस ही नहीं, शासन के सभी अंगों में पुरानी प्रणाली का ही हमारे देश में प्रचलन है। उसमें कोई ख़ास परिवर्तन नहीं किया गया। पुलिस सुधारों के लिए गठित विभिन्न पुलिस आयोगों की आख्याएँ और संस्तुतियाँ फाइलों में बंद धूल फाँक रही हैं। सीमा सुरक्षा बल, उ.प्र. पुलिस और असम पुलिस के प्रमुख सेवानिवृत्त आईपीएस श्री प्रकाश सिंह की 1996 में दाखिल एक पीआईएल में माननीय उच्चतम न्यायालय का 2006 में आदेश हो जाने के बाद भी अधिकतर राज्यों ने पुलिस सुधारों संबंधी न्यायालय के निर्देशों को आंशिक रूप से ही लागू किया गया है। पुलिस राज्यसूची का विषय है। पूर्ण रूप से लागू करने का नैतिक बल अभी तक किसी राज्य सरकार ने नहीं दिखाया। जबकि इन निर्देशों को लागू करना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, क्योंकि तमाम सरकारें अपने-अपने हिसाब से पुलिस का इस्तेमाल करती रहती हैं। किसी भी देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उन्नति के लिए पुलिस व्यवस्था में निरंतर सुधार होना आवश्यक है। इससे वह लोक और समय की अपेक्षाओं के अनुरूप ढलती और नयी होती रहती है। 

    हमारी पुलिस कमोबेश सन् 1861 ई. के इंडियन कौंसिल्स एक्ट के अनुसार अब भी चल रही है। यूनाइटेड किंगडम, यानी ग्रेट ब्रिटेन, ने भारत में जो पुलिस-व्यवस्था लागू की, वह ब्रिटेनवाली पुलिस-व्यवस्था नहीं है। अगर भारत में लागू की गयी पुलिस-व्यवस्था अच्छी होती, तो ब्रिटेन में भी वह अवश्य लागू होती। लेकिन, ऐसा नहीं है। वहाँ भारतवाली पुलिस-व्यवस्था नहीं है। सामान्य मामलों को वहाँ सामुदायिक पुलिस देखती है और विशेष मामलों को मेट्रोपॉलिटन पुलिस। वहाँ केवल आरक्षी के पद पर ही भर्ती होती है। आरक्षी ही प्रोन्नत होकर चीफ़ ऑफ़ कांस्टेबल, यानी हमारे यहाँ का डीजीपी, बनता है। वह जनता और अपने विभाग की समस्याओं, परेशानियों और अपेक्षाओं का जानकर होता है। यह अनुभव देश-काल और लोक की अपेक्षाओं के अनुरूप उचित और उपयुक्त निर्णय लेने में उसकी मदद करता है। अंगरेज़ों ने अपने देश में तो यह व्यवस्था रखी, लेकिन हमारे देश के लिए उन्होंने अलग व्यवस्था की। आख़िर, उन्होंने ऐसा क्यों किया? आज तक यह सामान्य-सी बात हमारी समझ में नहीं आयी। साफ़ सी बात है, क्योंकि उनको हम पर शासन करना था। हमारा कल्याण उनका उद्देश्य नहीं था, उनका उद्देश्य शासन-तंत्र को मज़बूत और स्थायी बनाये रखना था। ऐसे में आज़ादी के बाद हमारी कोई विवशता न थी और न है कि हम उनकी व्यवस्था को आज क़ायम रखें। अब हमें नयी पुलिसव्यवस्था चाहिए, जिसका सोच आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप हो। हमारे यहाँ जिन चार रैंकों में भर्ती होती हैं, वे हैं, आरक्षी, उपनिरीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक और आईपीएस। यह व्यवस्था कुछ वर्ण-व्यवस्था-जैसी है। इस पदानुक्रम में हर ऊपरवाला नीचेवाले को अपने से कमतर मानता है, जबकि आतंकवाद के दौरान पंजाब में कुछ आरक्षी पुलिस अधीक्षक बनाये गये और उन्होंने अपना दायित्व उसी तरह निभाया, जैसे अन्य अधिकारियों ने। इस प्रकार हमारी पुलिस का चरित्र लोकतंत्र के अनुरूप नहीं बदला और न ही ऐसा कोई प्रयास ही हुआ। 

    पुलिस आज भी सत्ता की मुखापेक्षी है। जनता के प्रति उसकी दृष्टि अंगरेज़ों के समय की जैसी ही है। सत्तायें अब भी पुलिस और अन्य संस्थाओं का उपयोग अपने हित में करती रहती हैं। व्यवस्था के नाम पर सत्ता भेदभाव, दमन, उत्पीड़न, आदि परंपरागत तरीकों का उपयोग करती रहती है। वह पुलिस और शासन की सभी संस्थाओं का उपयोग जनसामान्य की सुरक्षा और सेवा के लिए न करके, अपने लिए करती है। वह विपक्षी और असहमत लोगों के विरुद्ध पुलिस का नहीं, सम्पूर्ण प्रशासनिक तंत्र का डराने-धमकाने और ‘ठीक’ करने के लिए दुरुपयोग करती है। जब तक हमारा समाज नहीं बदलता, सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा। स्वतंत्रता के बाद भी पुलिस और प्रशासन का चरित्र सामंती और औपनिवेशिक है। लोककल्याणकारी व्यवस्था के अनुकूल और अनुरूप उसमें बदलाव नहीं हुआ। दुर्भाग्यपूर्ण, मगर सच है कि हमारे समाज का सोच अभी भी सामन्ती है। इसी के चलते हमारे देश में पुलिस का एक बड़ा हिस्सा वीआईपी और वीवीआईपी की सुरक्षा में लगा रहता है। गनर, शैडो, आदि को प्रतिष्ठा का सूचक माना जाता है, जबकि एक लोकतान्त्रिक देश में ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए। ऐसी स्थिति में पुलिस से लोकहित, लोकन्याय और लोककल्याण की अपेक्षा करना बेमानी है।

    मेरे एक मित्र विवेक उमराव, जो ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया इंटरनेशनल जर्नल के संपादक हैं, आस्ट्रेलिया के कैनबरा में रहते हैं। वे बताते रहते हैं कि ‘जनप्रतिनिधि ही नहीं, यहाँ नौकरशाह, न्यायीधीश या सरकारी कर्मचारी मतलब सरकारी-तंत्र का कोई भी यदि करप्शन करता है या करप्शन से जुड़ा कारक निकलता है, तो उसकी  सीधे बरखास्तगी होती है। नौकरी तो जाती ही है, ऊपर से मुकदमें चलते हैं, सजा होती है,  अलग से। पुलिस का बड़े से बड़ा अधिकारी भी यहाँ के सबसे ग़रीब आदमी के ऊपर हाथ उठाना तो दूर, तू-तड़ाक से बात तक नहीं कर सकता है, बिना सम्मान दिये बात तक नहीं कर सकता है। दुनिया के  जिन देशों में भी लोकतंत्र या शासनव्यवस्था परिपक्व है, वहाँ लोक सबसे बड़ा होता है। सरकार व प्रशासन लोक के लिए प्रबंधन-तंत्र होते हैं। सरकार व प्रशासन लोक के लिए होते हैं, सीधे तौर पर उनके लिए जवाबदेह होते हैं।’ सच्चे अर्थों में यही एक समर्थ एवं प्रभावी लोकतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था की पहचान है।

    Ashok Kumar Verma

  • जेनयू जैसे संस्थान कैसे सामंती मानसिकता, अवतारवाद के आवरण में नेतृत्व के नाम पर समाज को पीछे धकेलते है।

    जेनयू जैसे संस्थान कैसे सामंती मानसिकता, अवतारवाद के आवरण में नेतृत्व के नाम पर समाज को पीछे धकेलते है।

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    जेएनयू विरोध के नाम पर मुख्यत: हमें जो सुनाई दिखाई पड़ता है वह यह है कि जेएनयू में लड़के लड़कियां सेक्स कर लेते है, कंडोम का प्रयोग किया जाता है, किसी खास राजनैतिक विचारधारा को ज्यादा सपोर्ट करते है, देश विरोधी गतिविधियां होती है आदि आदि बातों को आगे बढाते हुए करते है।
    ऐसा करने वाले अधिकतर लोग जो हमें दिखाई पड़ते है वह भी किसी राजनैतिक विचारधारा के पक्ष में झुके होने के कारण ऐसा कर रहे होते है व साथ के साथ अपनी कुंठित मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे होते है। इस तरह एक विरोध वाले खुद निजी जीवन में धूर्त, व्यभिचारी, भृष्ट, महिलाओं, बच्चों का शोषण करने वाले व धार्मिक व जातिवादी मद में अंधे होते है। मैं कई ऐसे लोगों को जानता रहा हूँ जो रिश्तों के नाम पर खूब लड़कियों का शोषण करते रहे, जिम्मेदारियों के नाम पर भागते रहे, अबॉर्शन जैसी चीजें भी कराते रहे।
    इस तरह के तर्क इनके ही जैसी मानसिकता वालो को खूब संतुष्ट करते है।
    लेकिन
    इस तरह के तर्क जेएनयू का पक्ष लिए जाने का कारण भी बन जाते है। इन्हीं तर्कों के कारण कि देखिए लोग किस तरह से विरोध कर रहे है और अपना पक्ष विरोधी के विपरीत वाले पक्ष को चुन लेते है।
    अब मेरा सवाल ये है कि जेएनयू में क्या किसी बाहर देश के लोग आते है इसी देश समाज से आते है तो वह क्यों नहीं इसी तरह की मानसिकता वाले हो सकते। इससे भी बढ़ कर धूर्तता यदि चालाक हो जाए तो ऐसे विरोध को अपने पक्ष में क्यों नहीं भुना सकते?

    इस तरह के तर्क से पक्ष हो या विपक्ष वस्तुनिष्ठ तार्किकता तो गायब हो ही जाती है।

    आप जेएनयू के समर्थन कीजिये जो एक तरफ वाले गाली गलौज को हो हुड़दंग के साथ जत्थे के साथ हाजिर हो जाते है। आप विपक्ष लिखिए तो आपको सीधे उठा कर पहले वालो की कैटेगरी में रख दिया जाता है।
    बहुत लोग जेएनयू के विरोध में इसलिये भी बात नहीं रख पाते कि एक तो अपनी इमेज का खतरा उपर से एक पक्ष तो कम से कम आपके साथ चल ही रहा था उनकी नाराजगी क्यों झेलनी। लाइक वगैरह कम हुए तो क्रांति कम हो जानी।

    जेनयू का पक्ष लीजिए या विपक्ष लेकिन कई ऐसे पहलू है जिन पर बात ही नहीं की जाती है

    सबसे पहले बात करते है पुलिस द्वारा उत्पीड़न की। भारत में पुलिस के काम करने की शैली और चरित्र की बात की जाये तो दिल्ली पुलिस को बाकी राज्यों की पुलिस की अपेक्षा कम बर्बर, कम भ्रष्ट माना जाता है। मान लेते है कि ऐसा नहीं भी है केवल दिल्ली पुलिस अपने आप को प्रायोजित कर जाती है। बाकी राज्यों की पुलिस तो अपनी इमेज को प्रायोजित करने के लिए भी तैयार नहीं है। यदि पुलिस का व्यवहार सारी मीडिया के सामने इस प्रकार का है तो यही पुलिस का व्यवहार बाकी राज्यों में बाकी छात्रों के साथ किस प्रकार का होता होगा इसकी केवल कल्पना भर कर लीजिए। नौकरशाही का व्यवहार आपके राजनैतिक पक्ष को तो ध्यान में नहीं ही रखता है यह तो आप भी जानते ही होंगे। आम आदमी किसी भी राजनैतिक पक्ष का हो नौकरशाही उसके साथ कीड़े मकोड़े वाला ही व्यवहार करती है। हर राज्य में सालों से छात्र प्रशासनिक उत्पीड़न झेल रहे होते है कितनों को ही कई कई सालों तक जेल में सड़ा दिया जाता है, हाथ पैर तोड़ कर घर बैठा दिया जाता है। यदि आप बाकी जगह से तुलना करेंगे तो बाकी जगहों को देखते हुए आप यह भी कह सकते है कि यहाँ तो कुछ होता ही नहीं है। यह सुविधा भी केवल जेनयू को ही प्राप्त है कि हर छोटी बड़ी बात पर अटेन्शन लेते है उसका लाभ उठाते है।

    जेनयू को मैं एक सामंती चरित्र का संस्थान मानता हूँ बिल्कुल वैसे ही जैसे भारत में कुछ जातियों को सामंती अधिकार व लाभ प्राप्त है।
    जेनयू के लिए कोई विषय मुद्दा केवल और केवल तब बनता है जब बात जरा सी भी इस संस्थान को मिलने वाले लाभ या अधिकार पर आती है। इसी बात को ये सभी लोगों का मुद्दा बना देते है। यह बिल्कुल वैसा ही है कि जब तक शोषित वर्ग का शोषण हो रहा मारा पीटा जा रहा सही गलत जैसे भी एनकाउन्टर हो रहा तो ठीक लेकिन जैसे ही जाति विशेष या धर्म की बात आयेगी तो इस समस्या को सबकी समस्या बता कर मुद्दा बनाया जायेगा।

    जैसे कुछ जाति विशेष को मिली सुविधाओं के कारण भारत महान, विश्व गुरु का ढोल पीटा जाता है लेकिन भारतीय समाज को गर्त में ले जाने वाले लोग भी यहीं है वैसे ही जो सुविधाएं लाभ हर एक ब्लॉक स्तर पर होनी चाहिए थी, हर एक जगह के बच्चों को बराबर पढ़ने के अधिकार इतनी ही सुविधाएं होनी चाहिए थी वह कुछ संस्थानों तक समेट कर रख दी। इन बातों का पक्ष जेनयू कभी नहीं लेता, लेगा भी कैसे खुद के महान होने का, कंपटीशन की छंटनी से पैदा हुई विशिष्ठता का स्वाद फिर कैसे मिलेगा।

    चूंकि आज तक विशेष सुविधाएं व लाभ कुछ ही संस्थानों को मिलते रहे है तो अधिकतर कलेक्टर, सचिव आदि इन्हीं संस्थानों से निकल कर आते रहे है। एक बार भी इन लोगों ने इन पदों पर मिलने वाले लाभ, सामंती आधिकारों पर प्रश्न उठाया हो तो बताया जाए। सवाल उठा ही नहीं सकते क्योंकि अपने आप को मिले लाभ आधिकारों को यह खुद की महानता और मेरिट के आधार पर डीजर्व करना मानते आये है, जब पूरी ट्रेनिंग जातिव्यवस्था की तरह भ्रष्टता को दैवीय अधिकार मानने से रही है तो पूरा जीवन खुद को महान समझते हुए भ्रष्टता को अपना अधिकार मानते हुए क्यों न जियेंगे। चूंकि मुख्य पदों पर आजादी के बाद से ही इन्हीं संस्थानों से लोग आते रहे है तो नीति बनाने से ले कर नीतियाँ लागू करने वाले पदों पर रहे है तो क्यों न माना जाये कि देश की ऐसी तैसी करने में इन्हीं लोगों का मुख्य योगदान रहा है।

    किसी संस्थान कि गुणवत्ता का आधार यह तो बिल्कुल नहीं होता कि उस संस्थान के लोग नौकरियों पर व देश विदेश में कितना सेट होते रहे, मेरिट भी गुणवत्ता का आधार नहीं होता है यह नौकरशाही के व्यवहार से साफ साफ दिख ही जाता है और जब नौकरिया यहाँ के लोगों के लिए है तो यही के लोग नौकरियां करेंगे गुणवत्ता के आधार पर विदेश से तो लोग बुलाए नहीं जायेंगे। यहीं कारण है जिन सस्थानों को भारत में नंबर एक दो तीन बोला जाता है उनकी गिनती पूरी दुनिया में 500 तक नहीं होती है। यहाँ यह समझ लेना भी होगा कि किसी संस्था को अच्छे संस्था का दर्जा इस लिए नहीं मिल जाता है कि वह बड़ी बिल्डिंग के साथ खड़ा हुआ संस्थान है, भारत गिनती के संस्थानों में सुविधाएं है भारी फंड आदि की व्यवस्था है असल गुणवत्ता का मालूम ही तब पड़ता है जब हजारों कि संख्या में ऐसे संस्थान हो। छंटनी प्रतियोगिताओं के आधार पर कॉलेज में एडमिशन से लेकर नौकरियों तक में लोगो का लिया जाना कभी गुणवत्ता हो ही नहीं सकता। उल्टा सामंती मानसिकता विशिष्ठता को प्रयोजित ही करेगा।

    पूरी दुनिया में यूनिवर्सिटी की रैंकिंग वहां के छात्रों द्वारा शोध पत्रों की संख्या और गुणवत्ता पर आधारित होती है। यह वह डॉक्टरेट पेपर होते है जो कठोर समीक्षाओं के बाद अंतरराष्ट्रीय ख्याति के जर्नल में प्रकाशित होते है। इन सब में आप दूर दूर तक नहीं आते है बात करते है आप मेरिट की, विद्वता की, चिंतनशीलता की। नौकरी लगवा देने से एक संस्थान महान हो जाता है तो कुछ कहने को रह ही नहीं जाता है, भाषण बाजी करना चिंतन या काम करना होता है तब भी कहने को कुछ रह ही नहीं जाता है।
    यदि सोशल मीडिया की बयार में बह कर मान ही लिया जाये कि जेएनयू जैसे संस्थान से हर साल हजारों की संख्या में चिन्तनशील लोग निकलते ही रहते है तो देश छोड़ दीजिए, यहीं बता दीजिए दिल्ली के बगल में ही कूड़ा प्रबंधन के लिए कितना काम किया है, दिल्ली के बगल में ही विस्थापित मजदूरों की बस्तियां है वहां के बच्चों के लिए शिक्षा पर क्या काम किया है? यमुना की साफ सफाई जल प्रबंधन पर ही कुछ बता दिया जाये। अपने गांवों में जाकर क्या किया है यह ही बता दिया जाये।
    नौकरी लगाना, विदेशों में सैटल होने के अवसर तलाशना, समाधान या रचनात्मक विकास के बारे में जरा भी विचार न करते हुए विरोध के ढोंग को जीना ही क्या विद्वता और क्रांति होता है?

    गांव देहात का व्यक्ति यह नहीं देखता कि आप कितने बड़े लेख लिखते है कितना महान करुणामय लिखते बोलते है।
    वह यह भी नहीं देख पाता कि तमाम भोग सुविधाओं के पीछे आपका भी जीवन दयनीय परिस्थितियों व शोषण से भरा हुआ है। वह यह भी नहीं देख पाता कि आप उन लोगों के लिए काम करते है जो उसके शोषण के लिए सीधे जिम्मेदार है। वह यह भी नहीं देख पाता कि आपको दिया जाने वाला मोटा पैसा उससे ही धूर्तता से लेकर आपकी जेब में आपको सहलाने के लिए डाल दिया जाता है। वह देखता है आपके जीये जाने वाले जीवन को, आपके द्वारा प्रायोजित महान जीवन को और वह लग जाता है अपने जीवन बच्चों को इसी सब की तरफ धकेलने में।
    कोरी भावुकता, अहंकार, रोमांटिक क्रांति के पीछे लेखक, पत्रकार, समाजिक कार्यकर्ता आदि अपने समाज को गर्त में धकेलने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
    आप यह मानने को तैयार ही नहीं है कि समाज से अलगाव आपने अपनी सामंती सोच और फूहड़ताओ के कारण अपने आप को अलग मानने की मानसिकता , सेलेब्रिटिज्म को जीने के लिए किया। बिना व्यवहारिक ज्ञान के, जीवन में उतारे बिना, समाज के साथ जुड़े बिना, बिना सुधारात्मक दिशा में काम किये एक दूसरे को पहनाए हुए विद्वता के तमगे निर्लज्जता से अधिक कुछ नहीं होते।
    और देश में माहौल बनाने को राजनैतिक पार्टियों को भुनाने को फिर जब इतना सब तैयार मिल ही रहा तो केवल अन्ना हजारे टेक्निक ही थोड़े न है। ऐसी जगहों से बे-सिर पैर तरीको से केवल विरोध दर्ज करवा लीजिए लोग खुद ब खुद इनके विपक्ष में हामी भर कर तैयार बैठ ही जाते है। ऐसे विरोध के लिए तो राजनैतिक पार्टियां क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टियां, राष्ट्रीय स्तर पर नेता तक खड़े कर देती है/बना देती है/प्रयोजित कर देती है आप तो फिर भी एक शिक्षण संस्थान है।

    चलते-चलते :-

    देश में शिक्षा स्वास्थ्य एक दम मुफ्त होना चाहिए एक समाज अपने देश के व्यक्तियों के लिए, बच्चों के लिए कम से कम इतना संवेदनशील तो होना ही चाहिए, लेकिन चलिए साथ के साथ यह भी देख लेते है कि जब हम जेएनयू में शिक्षा की फीस बढ़ाए जाने का विरोध कर रहे होते है तो यह भी देखना बनता ही न देश में 12वी तक शिक्षा लगभग फ्री ही रही है, सरकारी अस्पतालों में इलाज बेहद कम रुपयों में उपलब्ध रहा ही तो इन सब कि आज जो हालत है, सर्विस का स्तर जो एक निम्न से निम्नतम स्तर पर जाने पर लगा हुआ है इसके जिम्मेदार क्या विदेशों में रहने वाले लोग है। इसके जिम्मेदार उनमें नौकरियां करने वाले लोग जितने है उससे कहीं ज्यादा हम है। हमारा बच्चा कम फीस में गरीब तबकों के बच्चों के साथ कैसे पढ़ सकता है? महंगी फीस नहीं देंगे, महंगे ट्यूशन नहीं लगवाएंगे, कोचिंग नहीं करवाएंगे तो जिम्मेदार माता पिता होने का एहसास कहां से होगा ?
    सामंतवादी मानसिकता बहुत बारीक चीज होती है। थोथी संवेदनशीलता दिखाने से यह ढक नहीं जाती है।
    यदि हमने अपने आपको सरकारी बेसिक शिक्षा के साथ अपने बच्चों को जोड़ा होता , सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से खुद को जोड़ा होता तो क्या ये सब सुधारात्मक दिशा में नहीं बढ़ गए होते। यहां तक कि प्राइवेट स्कूल, अस्पताल भी मजबूर होते सरकार के अंतर्गत ही काम करने को। सरकारे भी उसी स्वभाव की होती जो इन क्षेत्रों के प्रति जिम्मेदारी से काम करती। पूरा ढांचा ही अलग स्वभाव का होता, जब हमारा स्वभाव ही सामंतवादी है, दोगला है तो सरकारों भी ऐसे ही होनी है बिल्कुल कोई अंतर होना ही नहीं है। इन बातों का लेफ्ट राइट मानसिकता से कोई मतलब ही नहीं है।
    इस तरह ढोंग को अपने जीवन में जीते हुए जब हम विरोध प्रदर्शन और समाज को गालियां दे रहे होते है तब हर तरह से समाज का नुकसान ही करते है चाहे यह जानबूझ कर किये जा रहे हो या अनजाने में। आप जेएनयू जैसे संस्थानों के पक्ष में लगातार खड़े रहते है मैं भी पूछता हूँ आपके ही दूर दराज के गांव देहात के लोग जिन्होंने इनके एडमिशन फॉर्म के बारे में भी नहीं सुन रखा होता उनकी क्या गलती कि वह इन संस्थानो से महंगी फीस भरे, शोषण झेले, कम सुविधाओं में रहे। आप क्यों नहीं इस बात का पक्ष लेते कि या तो हर जिले, ब्लॉक स्तर पर अच्छी यूनिवर्सिटी हो या सबको एक जैसा ट्रीटमेंट मिले।

    वास्तविक क्रांति आपके जीवन के भीतर से उपजती है, यह आपकी जीवन शैली जीवन व्यवस्था को बदल कर रख देती है इस क्रांति का सामना करने के लिए वास्तविक ऊर्जा और हिम्मत की जरूरत पड़ती है, जब हम क्रांति को अपने जीवन में नहीं उतार पाते तब क्रांति के रोमांस से ही अपना मनोरंजन करके खुद के कुछ होने का एहसास कराया जाता है। बिना अपवाद भारत के अधिकतर आंदोलन इसी तरह की प्रयोजित रोमांटिक क्रांति के चरित्र के ही होते है इसीलिए देश समाज वहीं रहता है नेता, लेखक, पत्रकार, ब्यूरोकेट अपने अपने खांचों में जिस व्यवस्था से लड़ने का दिखावा करते है उसी को मजबूत करते हुए सफलता की सीढ़िया चढ़ते चले जाते है और समाज और ज्यादा गर्त में इसी तरह के व्यक्तित्वों का निर्माण करता हुआ बढ़ता चला जाता है। 

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • नया राष्ट्रगान

    नया राष्ट्रगान

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    अपने अतीत की महानता के मिथ्या गर्व में डूबा एक देश था
    किसी दूसरी आकाशगंगा में
    किसी और ग्रह पर
    किसी और प्रजाति के लोगों का

    उनकी भाषा से हिंदी में भावानुवाद किया जाए तो कुछ यूँ होगा कि-
    वे खुद को विश्व गुरु मानते थे

    ख़ैर
    उनकी भाषा में उनका भी हमारी तरह एक राष्ट्रगान था
    जैसे हमारा अपना ‘जन गण मन’
    उनका संविधान था
    संसद थी समूचे लोकतंत्र जैसी कोई व्यवस्था थी

    तो वाक़या वहाँ का है
    दूर किसी और आकाशगंगा के किसी ग्रह के किसी एलियन समाज का
    सहूलियत के लिए हम हिंदी भावानुवाद कर लेते हैं
    सहूलियत के लिए हम अपने देश के तंत्र के चश्मे से उनके तंत्र और उस लोक को देख लेते हैं
    अंत में फिर यह तो याद रखना ही है कि यह कहीं और की बात है..

    ~~~

    नए राष्ट्र में जनता सारी राष्ट्रभक्त हो
    राष्ट्र्गान भी नया हो
    इसके साथ प्रधानमंत्री ने रखी
    और एक इच्छा –
    ‘चारण-भाषा ‘
    गूंज रही थीं दोनो सदनों
    में मेज़ों की
    थपथपाहटें

    जन-गण-मन के
    अधिनायक
    विजयी रहे हैं हर मोर्चे पर
    नए राष्ट्र के भाग्य विधाता तो हम हैं ही
    इस पर नहीं
    किसी को अब संदेह
    लिहाज़ा
    बेमतलब हैं ऐसी बातें
    अश्वमेघ को थामे
    चक्रवर्ती गृहमंत्री
    ने ललकारा

    फिर
    विदेश मंत्री ने रखा
    जान मारू सुझाव-हम विश्वगुरू हैं
    क्यों हो फिर हमको मंज़ूर
    वसुधैव कुटुम्बकम से
    एक बालिश्त कम
    राष्ट्र्गान में नाम हों अपने सभी पड़ोसी
    मुल्क़ों के
    आख़िर
    गौरवशाली अतीत में वे सब इसी राष्ट्र का
    हिस्सा थे और
    सम्पूर्ण विश्व को एक दिन इसी राष्ट्र का हिस्सा होना ही है

    खड़े हुए तब जाने-माने
    पर्यावरणविद्
    राज्यसभा की मिली थी कुर्सी
    जिनको
    पिछले साल
    इन्होंने प्रदूषण में किसान और
    मज़दूरों की साज़िश का पर्दाफ़ाश किया था
    एक और पर्दाफ़ाश उन्होंने किया –
    कि
    नदियों का विकास में योगदान अब नहीं रहा
    सो
    नदियों के नाम न रखे जाएँ
    राष्ट्र्गान में

    रक्षा मंत्री ने समंदरों और पर्वतों की
    घनघोर आलोचना कर डाली
    वित्तमंत्री ने की
    ताक़ीद कहीं नोटबंदी और जीएसटी
    धोखे से भी छूट न जाएँ

    सभी सदस्यों ने बारी बारी से
    रखे अपने सुझाव
    और
    सबसे अंत में सबसे महत्वपूर्ण सुझाव
    महामहिम राष्ट्रपति ने भिजवाया –
    राष्ट्रगान में केवल मंगलवार नहीं सातो दिन रखवाए जाएँ.

    राष्ट्रगान फिर लिखा गया कवियों की भीड़ में
    और हज़ारों पत्रकार एंकर
    टेलीवीजन
    और अख़बारों में बता रहे थे
    दुनिया में सबसे बेहतर
    अपना राष्ट्रगान है
    अनगिनत कट्टर राष्ट्रभक्त नायक नायिकाओं ने फिर
    भव्य राममंदिर के विशाल प्रांगण में
    इस नए राष्ट्र के नए राष्ट्रगान को
    पंचम स्वर में गाया

    ~~~

    मगर यह तो भूलने वाली बात नहीं है कि
    यह तो करोड़ों अरबों प्रकाश वर्ष दूर की बात है

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • मानसिक बलात्कार

    मानसिक बलात्कार

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    बच्चें को पैदा होने के दिन से भारतीय समाज में बच्चों के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करना शुरू कर देता है जाता है।
    जब बच्चे के किसी कार्य से माता-पिता शिक्षक आदि को यदि जरा भी तकलीफ या जरा भी जिम्मेदारी बढ़ी महसूस होती है केवल तब ही बच्चे से पूर्ण व्यक्ति होने के अंदाज में डांटा फटकारा जाता है। अन्यथा हर एक स्थिति में बच्चों की आधिकारिक स्थिति व समझ को कुत्ते बिल्लियों से भी परे ही माना जाता है। कुल मिलाकर किसी भी क्षण बच्चे को पूर्ण मनुष्य माना ही नहीं जाता है।

    उसमें भी यदि बच्चा लड़की हो, या शोषित वर्ग से आता हो तब तो उनका अस्तित्व होना न होना एक बराबर है।

    बच्चे की सारी जिज्ञासाएं रोक कर जब आप उसे अध कच्ची नींद से उठा कर ऐसे स्कूल में भेज रहे होते है जहां उसे पूरे दिन बैठा रहना है, ऐसी चीजे सीखनी समझनी है जिनकी तरफ बढ़ना उसकी स्व रुचि से नहीं हुआ है तब आप अपने बच्चे को मानसिक पंगु बना रहे होते है।
    बच्चे को जब आप स्वत: खोजना, समझना , सीखना जिज्ञासाओं के साथ बढ़ने का माहैल उपलब्ध न करा कर, नौकरी आदि के लिए बाजारू शिक्षा में धकेल रहे होते है जहां उसे अपने साथ वाले बच्चों के साथ मैत्री भाव, सहयोगात्मक भाव न रख कर उनसे निरंतर प्रतियोगिता करनी है, जिसमें चाहे सभी कितनी ही अच्छी दौड़ लगा ले लेकिन रेस में जैसा कि होता है आगे रहना कुछ एक को ही है।
    बच्चे के जीवन का समय कीमती समय जब हम इस तरह के दवाब, पीड़ाओं बेमतलब की जबरदस्ती करवाने वाली मेहनत से गुजरवाते है तब हम उनके साथ मानसिक बलात्कार कर रहे होते है, अपनी हिंसा गुणात्मक रूप से बच्चों के ब्रेन में बलात्कारी ढंग से भर रहे होते है।

    जब हम लड़के और लड़की के पालन पोषण – उनके खाने पीने, कपड़े पहनने, काम करने, अधिकारों में अंतर कर रहे होते है उसी पल से हम लड़की केवल भोग्या है, लड़के को भोग करना है जैसी मानसिकता तैयार कर देते है।
    हमारे यहां बच्चों को पालन करने में ऐसा स्पेस ही नहीं छोड़ा जाता जहां बच्चों के ब्रेन के साथ जबरदस्त रूप से छेड़ छाड़ न की जाती है, मानो की धरती पर जीवन इसी सब कार्य के लिए हुआ हो, आने वाली पीढ़ियों का जीवन नष्ट या नरकमय बनाने में योगदान नहीं दिया तो जीवन व्यर्थ चला जाना है। हमारा जीवन जीने का कोई तरीका ट्रेनिंग ऐसी है ही नहीं बच्चों में बाकी मनुष्यों से अलगाव न पैदा करती हो, प्रेम पनपने की चिन्दी भर जगह की भी भ्रूण हत्या न कर देती हो।
    जब हम बच्चों में जातीय गर्व भर रहे होते है उसी पल हम उन्हें दूसरों से अलग कर रहे होते है, उनके अंदर द्वेष भर रहे होते है, दूसरे लोगों को दोयम मानने की मानसिकता भर रहे होते है।

    बच्चियों को बचपन से ही चूड़ी, चुन्नी, सिंदूर, पायल, बिछवा, कपड़ो के ढंग के साथ असुरक्षात्मक मानसिकता से बांध दिया जाता है। हमारे मानसिक बलात्कार इतने बारीक और चालाकी पूर्ण होते है कि केवल एक दरवाजा इस तरीके से खुला छोड़ा जाता है जिसमें व्यक्ति बचाव में भागता तो है लेकिन उसके लिए बिछाया हुआ एक अन्य जाल ही होता है जिसमें वह स्वतंत्रता के भ्रम में गुलामी वाला जीवन ही जीता है, स्वयं उसे महानता के रूप में प्रयोजित करता है।
    महिलाएं को पूरा जीवन इस तरह कंडीशन किया जाता है कि उसे अपने आपको इन्ही में सुरक्षित महसूस करने का विकल्प केवल छोड़ दिया जाता है।
    मतलब बचपन से लेकर अब तक केवल शोषण ही शोषण दोयम दर्जा और यहां आकर कुछ अलग है का भ्रम। शोषण करने के, बलात्कार करने के ऐसे तरीके जिसमें शोषित को पता ही न चले कि उसके साथ कुछ गलत भी हो रहा है, इतने गजब अमानवीय धूर्ततापूर्वक तरीके शायद ही किसी समाज में देखने को मिलते हो।

    बाकी छोड़िए हमने तो शादी के नाम पर शारीरक बलात्कार, वेश्या वृति के लिए एक सस्था ही तैयार कर कर दी है, आप इसके नियमों के तहत वह सब कीजिए जो करना है उल्टा सम्मान आपको दिया जायेगा।

    जिस समाज में मानसिक बलात्कारों की एक पूरी श्रंखला बनी हुई हो वह समाज हर स्तर पर कुंठित व हिंसक न होगा तो क्या होगा। ऐसे समाज में शारीरिक बलात्कारी पैदा नहीं होंगे तो क्या होंगे।

    आप इस सब को समाज को कोसना कह सकते है लेकिन मैं इसे बीमारी का देखना या बीमारी को डाइअग्नोज़ करना कहता हूँ। अभी तो हम बीमारी को महान बीमारी, विश्व गुरु बीमारी, दुनिया की सबसे अनूठी बीमारी मानने में ही फले फूलें जा रहे है, मानसिक बीमारियों को पूजने में ही लगे हुए है। महाराज बीमारी को बीमारी मानिए तो सही इलाज अपने आप चल कर समाज में आ जायेगा।

    किसी भी बीमारी का इलाज बीमारी वाले भाग को सुन्न कर देना या पैन किलर ले लेना नहीं होता है। चूंकि हम मानिसक बीमार है, हर पल तरह तरह के बलात्कारों को अपने जीवन में झेलते और करते आते है। यदि हम यह सोचते है कि हम जोर से चिल्लाने से, कठोर दंड आदि मांगने से अपने आप को छिपा ले जाएंगे या बचा ले जाएंगे तो हम रह रह कर हम अपनी प्रताड़नाएं ही केवल प्रदर्शित कर रहे होते है।
    महिलाओं, बच्चों के मानसिक बलात्कार करने को हम महान सभ्यता के नाम पर गौरान्वित होते रहेंगे तब तक कड़े कानूनों, दंड फंड की मांग भी करते ही रहेंगे दोहरे चरित्र को छिपाने के यही सब उपाय होते है।

    हम वास्तव में इलाज चाहते है तो जड़े निरंतर खोदती रहनी होगी तब तक खोदते रहनी होगी जब तक सामाजिक बीमारियों का मूल नहीं पकड़ लेते। अब हम बीमारी के उस स्तर पर भी नहीं है जहां पेन किलर फौरी राहत दे देता हो, इलाज तो बहुत दूर की बात है।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance.