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  • दुभाषिया

    दुभाषिया

    Kumar Vikram

    वो दो घरों में नहीं
    एक ही घर के
    दो कमरों में
    एक साथ रहता है
    या यूँ भी कह सकते हैं
    कि यदि माता व पिता
    दो अलग अलग भाषाएँ हैं
    तो बच्चा दुभाषिया है
    या दुभाषिया होना चाहिए
    वह सिरफ एक की भाषा नहीं बोल सकता
    अच्छा बच्चा अच्छा दुभाषिया ही होता है
    वो लफ़्ज़ों की जड़ता छोड़ सकता है
    वो बर्लिन की दीवार तोड़ सकता है
    हलांकि वो दोनों भाषाओं का ज्ञाता है
    इसीलिए दोनों जगह उपेक्षित है
    वो दोनों भाषा समझता है
    इसीलिए दोनों जगह समझा नहीं जाता है
    कुछ कुछ उन जासूसों की तरह
    जिनकी ज़रूरत शब्दों भावों के
    अंतहीन अन्धकारमय विकट गलियों से
    निकलने के लिए होती तो है
    पर जिनसे दोस्ती दिखाना ख़तरे से ख़ाली नहीं
    बल्कि उन्हें बीच चौराहे पर ‘दो-गला’ कह
    भाषा विद्रोही घोषित कर ही
    खुद को निज भाषा सेवी जताया जा सकता है

    Kumar Vikram

  • दिल्ली विश्वविधालय की छात्र राजनीति के चरित्र में आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए — Ramanand Sharma

    दिल्ली विश्वविधालय की छात्र राजनीति के चरित्र में आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए — Ramanand Sharma

    Ramanand Sharma

    जाति से शुरू होकर जाति पर खत्म होने वाली राजनीति यानी डूसू दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संगठन, भारत में छात्र राजनीति को सबसे बड़ा मंच देने वाली संस्था है। जहां से अरुण जेटली विजय गोयल और न जाने कितने छात्र नेता निकलें जो आगे चलकर मुख्यधारा की राजनीति से जुड़े। भारत में छात्र राजनीति का इतिहास करीब 170 साल पुराना है, 1848 में दादाभाई नैरोजी जी ने ‘द स्टूडेंट साइंटिफिक एंड हिस्टोरिक सोसाइटी’ की स्थापना की। समयानुसार छात्र राजनीति की भूमिका बदलती रही है, आज़ादी के बाद देखें तो छात्र राजनीति हमेशा जन आंदोलनों के केंद्र में रही है। आज़ादी से पहले और आज के समय में एक बात समान रूप से देखने को मिलती है कि छात्र राजनीति से निकले हुए तमाम लोग जो मुख्यधारा की राजनीति कर रहे हैं, आने वाली पीढ़ी को छात्र राजनीति करने से मना ही करते हैं। यहां भगत सिंह का कथन उल्लेखनीय है- “हमारा दुर्भाग्य है कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर जो अब शिक्षा मंत्री है स्कूल कॉलेजों के नाम पर एक सर्कुलर भेजता है कि कोई पढ़ने लिखने वाला लड़का पॉलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेगा।”

    इस देश में छात्र राजनीति से निकले लोगों की संख्या को देखेंगे तो लगेगा कि केवल और केवल छात्र राजनीति से निकले लोग ही मुख्यधारा की राजनीति की दिशा एवं दशा को तय कर रहे हैं जैसे जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर जाकिर हुसैन, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, कर्पूरी ठाकुर, शरद यादव, सुशील मोदी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, विजय गोयल। दिल्ली विश्वविद्यालय के लोकतंत्र का महापर्व जहां पर 1.4 लाख वोटर हैं जिसमें से मात्र 40% विद्यार्थी वोट देने आते हैं और इस बार यह अनुपात घटकर 36% हो गया है। ऐसे में क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि विद्यार्थियों में चुनाव को लेकर उत्साह नहीं है? इस बार चुनाव को देखने से पता चलता है कि विद्यार्थी महज अपने कॉलेज के चुनाव में प्रतिभाग करने के लिए लालायित रहता है उसे डूसू के चुनाव से उम्मीदें कम रहती हैं, क्या इसके पीछे यह कारण है की डूसू में लड़ने वाले सारे कैंडिडेट अपने आप को आम छात्र से नहीं जोड़ पा रहे हैं? क्या डूसू में ज़मीनी कार्यकर्ता नहीं आ रहे हैं?

    एक अध्ययन में पाया गया कि यहां हेलीकॉप्टर कैंडिडेट की संख्या प्रत्येक वर्ष बढ़ती ही जा रही है, संगठन ज़मीनी कार्यकर्ता को टिकट नहीं दे रहा है वो टिकट उस व्यक्ति को देता है जिसके पास अथाह दौलत है, संपत्ति है। बाहुबल के आधार पर कोर वोटर के रूप में बांट दिया गया है, जैसे एबीवीपी का मतलब मान लिया जाता है गुर्जर, ब्राम्हण फॉरवर्ड कास्ट का वोट बैंक। वहीं एनएसयूआई से तात्पर्य होता है जाट, यादव, मुस्लिम, बैकवर्ड कास्ट का वोट बैंक। आइसा से तात्पर्य होता है दलित पिछड़ा या वे तमाम लोग जो वैचारिक रूप से और धरातल स्तर पर अच्छा कार्य कर रहे हैं। नियोपूर्वांचल जब 2018 में कई साल बाद एबीवीपी पूर्वांचल के कैंडिडेट को टिकट देती है तो वह बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत हासिल करता है लेकिन एक बात विचारणीय है कि वे लोग जो गाजीपुर से हाजीपुर तक पूर्वांचल मानते हैं, वे लोग आखिर क्यों एबीवीपी के अलावा अन्य संगठनों का समर्थन नहीं करते। जब कोई भी कैंडिडेट एबीवीपी के सिवा अन्य संगठनों से पूर्वांचल की आइडेंटिटी पर चुनाव लड़ता है तो उसे समर्थन नहीं प्राप्त होता है, ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि पूर्वांचल का मतलब फॉरवर्ड कास्ट होता है? क्या पूर्वांचल से चुनाव लड़ने का अधिकार केवल आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्तियों के पास है जो तथाकथित उच्च जाति से आता है? क्या पूरा पूर्वांचल उसी के लिए एकत्रित होगा जिसके पास जातीय श्रेष्ठता होगी? क्यों जब कोई यादव या कुर्मी, धोबी या किसी और पिछड़े जाति का व्यक्ति पूर्वांचल की पहचान पर चुनाव लड़ता है तो उसे पूर्वांचली न कहकर यादव कम्युनिटी का बताया जाता है, कुर्मी कम्युनिटी का बताया जाता है और वहीं जब कोई ब्राह्मण, क्षत्रीय, भूमिहार या ऊंची जाति का व्यक्ति चुनाव लड़ता है तो उसे पूरे ‘पूर्वांचल का व्यक्ति’ बताया जाता है। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? इसलिए क्योंकि वह जातीय रूप से श्रेष्ठ है या आर्थिक रूप से सक्षम है। पिछले वर्षों का आंकलन करें तो पता चलता है कि पूर्वांचल से कई कैंडिडेट तमाम संगठनों से आए, यहां तक कि 2017 में राजा चौधरी नाम का एक इंडिपेंडेंट कैंडिडेट भी चुनाव लड़ता है जिसके पास एजेंडा होता है, जो संघर्षमयी होता है लेकिन उसके पास पैसा नहीं होता, जातीय समीकरण नहीं होता, केवल इसलिए वह चुनाव हार जाता है। उस वक्त ‘पूर्वांचल की अस्मिता’ कहां खो जाती है? इन तमाम पिछड़े दलित शोषित लोगों के लिए पूर्वांचल की लहर क्यों नहीं चलती? क्या पूर्वांचल की लहर केवल आर्थिक संपन्न और जातीय श्रेष्ठ लोगों के लिए ही चलती रहेगी?

    संगठन की अस्मिता पर चोट–

    विगत सालों का चुनाव देखने से साफ ज़ाहिर होता है कि वोटिंग व्यक्ति के जातीय और उसके लॉबी के अनुसार होती आ रही है। संगठन को वोट नहीं पड़ रहे हैं। यही कारण है कि जब आप चुनाव परिणाम देखते हैं तो पाते हैं कि अध्यक्ष भारी मतों से विजयी होता है और वहीं उसी संगठन के अन्य प्रत्याशियों को काफ़ी कम मत प्राप्त होता है। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि लोगों को संगठन में दिलचस्पी नहीं है, केवल व्यक्ति में है। विगत वर्षों में सुनने में यह भी आया है कि एक ऑर्गेनाइजेशन का व्यक्ति दूसरे आर्गेनाइजेशन के व्यक्ति के साथ मिलकर चुनाव लड़ता है, इसका आशय स्पष्ट है कि संगठन के प्रति उसकी निष्ठा नहीं है उसे सिर्फ चुनाव जीतना है संगठन की विचारधारा से उसका कोई लेना देना है, उसे संगठन से मात्र टिकट मिलने की चाह रहती है। 

    कैंपस पॉलिटिक्स–

    नॉर्थ कैंपस:- एक ऐसा क्षेत्र जहां पर तमाम संगठन की शक्ति लगभग एक समान है क्योंकि डीयू की धरोहर देखें तो यहीं मिलती है जैसे हिन्दू कॉलेज की पार्लियामेंट व्यवस्था, मीरांडा का प्रेसिडेंशियल डिबेट, या यूं कहें फ्रीडम ऑफ स्पीच पर रामजस का तीखापन। 70 के दशक से देखें तो नॉर्थ कैंपस में लेफ्ट डोमिनेंट रहा है और यहां आज भी लेफ्ट को नॉर्थ कैंपस से अच्छे खासे वोट प्राप्त होते हैं वहीं एबीवीपी और एनएसयूआई भी पीछे नहीं हैं।

    साउथ कैंपस:- ऐसा कैंपस जहां पर कॉलेजों के बीच की दूरी को तय करने में करीबन 45 मिनट या डेढ़ घंटे का समय लगता है। इस कैंपस कि प्रसिद्धि का एक कारण व्यक्ति को चुनाव जीताने की शक्ति है। कारण स्पष्ट है कि यहां पर छात्रों की अधिक संख्या और कई आर्गेनाइजेशन यहां पर अभी तक अपनी शाख नहीं जमा पाए हैं। इलीट दिल्ली के इन कॉलजों की ‘राजनीति’ में सर्वहारा यूं ही दब जाता है और कई बार उसे दबा दिया जाता है। पूंजीवादी लोग सत्ता को अपने हाथ में ले लेते हैं। 

    -लेफ्ट क्यों नहीं आया?

    लेफ्ट के ना आने की वजह- लेफ्ट के पास दूसरे संगठनों के मुकाबले ह्यूमन रिसोर्सेस की कमी, लेफ्ट यूनिटी का एक ना होना, प्रचार प्रसार न कर पाना, हर एक व्यक्ति के पास सूचना के रूप में न पहुंच पाना, कैंपस संबंधित मुद्दों में हल के साथ न उपस्थित हो पाना। डूसू में 52 कॉलेज शामिल हैं और 5 दिन के भीतर ₹5000 के बजट में शायद ही कोई प्रत्याशी प्रचार प्रसार कर पाएगा क्योंकि इन कॉलेजों के बीच की दूरी लगभग दो घंटे की है यानी अर्थ और ह्यूमन रिसोर्सेस के बिना हर कॉलेज में पहुंच पाना मुश्किल है। जेएनयू में लेफ्ट एक होकर चुनाव लड़ती है जबकि डीयू लेफ्ट कई धड़ो में चुनाव लड़ती है जैसे एआइएसएफ, एसएफआई, डीएसएफ, आइसा इत्यादि, जो की लेफ्ट के वोट को बांटते हैं और जिस से सीधा फायदा विपक्ष को होता है। लेफ्ट अपना नरेटीव चलाने में नाकामयाब रहा है। 2015 के बाद देखें तो कोई भी व्यक्ति जब अपने आप को लेफ्ट विचार का समर्थक बताता है तो उसे एंटी-नेशनल के तौर पर देखा जाता है, यही कारण है कि गांव, दूर दराज से आए हुए तमाम लोग अपने आप को लेफ्ट आइडेंटिटी से जोड़ने से मना करते हैं। लेफ्ट जिस प्रकार से लिंगदोह को मानते हुए अपनी राजनीति कर रहा है यह भी एक रुकावट की तरह उसके सामने है जो की विपक्ष को फायदा पहुंचा रही है।

    – 2019 में क्या नया?

    पहली बार नॉर्थ कैंपस के हंसराज कॉलेज में प्रेसीडेंशियल स्पीच हुई जिसमें सबसे अच्छी स्पीच देने वाले कैंडिडेट को सबसे कम वोट मिला। वहां पर पहले से दो पैनल चलता था-पहला ‘चेंज पैनल’ और दूसरा ‘रेवोलुशन पैनल’। इस बार एक नया ‘नायाब पैनल’ लाया गया जो की फेयर पॉलिटिक्स मोटो के साथ चुनाव में उतरा। उसकी पहली सफलता यह होती है कि उसने हंसराज के इतिहास में पहली बार प्रेसिडेंशियल स्पीच कराई एवं नए मुद्दों के साथ चुनाव लड़ता है लेकिन इन तमाम चीजों का उसको कोई फायदा नहीं होता है, कॉलेज फिर से चुनती है लॉबी पॉलिटिक्स, जातीय पॉलिटिक्स और वह चुनती है ‘रेवोलुशन’ को। ऐसे में क्या हम यह माने कि कॉलेज में विद्यार्थी अभी भी लॉबी पॉलिटिक्स के इतर नहीं सोचना चाहते हैं?

    कई अरसे बाद डूसू में किसी मुसलमान कैंडिडेट को टिकट मिलता है खास बात यह है कि वह कैंडिडेट पूर्वांचल का था। जी हां वही पूर्वांचल जिसकी हवा पिछले वर्षों से चरम पर थी और इसी पूर्वांचल ने पिछले वर्ष एक कैंडिडेट (शक्ति)को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी लेकिन इस साल पूर्वांचल की हवा नहीं चल पाई। डूसू अपने पुराने जातीय आधार को नहीं बदल पाया उसने फिर से जाति और लॉबी पॉलिटिक्स को चुना।

    जहां पर हर साल एनएसयूआई प्रेसिडेंट पोस्ट पर जाट कैंडिडेट को लड़ाती थी लेकिन इस बार उसने एक प्रयोग किया उसने महिला कैंडिडेट को उतारा जो एक पिछड़े समाज से आती है लेकिन डीयू की जनाधार ने उसे भी खारिज किया और उसे महज 10000 वोट मिले। जबकि अमूमन देखा जाए तो एनएसयूआई को प्रेसिडेंट पोस्ट पर मिलने वाली वोटों की संख्या अक्सर 15,000 से ज्यादा ही होती थी। क्या यह वही डीयू है जहां पर इक्वलिटी का डिस्कोर्स चलता है ?

    क्या यह वही डीयू है जहां पर महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है?

    क्या यह वही डीयू है जहां पर महिला असिस्टेंट प्रोफेसर की संख्या अधिक है? अगर यह वही डीयू है तो एक महिला कैंडिडेट को क्यों नहीं अपनाता है क्यों उसे महज 10000 वोट मिलता है और वह फिर से उसी जातीय पॉलिटिक्स को जिसे वह वर्षों से ज़िंदा किए हुए हैं फिर से ज़िंदा रखता है।

    एक ऐसा कैंडिडेट जो संगठन का कई वर्षों से कार्यकर्ता रहा है जिसने अपने कॉलेज के दिनों में भी संगठन के लिए विचारधारा के स्तर और लोगों के हित के लिए बहुत कार्य किए, वह व्यक्ति एक हेलीकॉप्टर कैंडिडेट से चुनाव हार जाता है। जबकि उसी संगठन के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार 19000 वोटों से चुनाव जीतते हैं क्या यह मान लिया जाए कि विचारधारा हार गई धनबल, जातीय समीकरण, क्षेत्रवाद जीत गया? पिछली बार डूसू के चुनाव को देखें तो लगता है कि पूरी दिल्ली पूर्वांचलमय हो गई थी। क्या उस धरती के पास इस बार के लिए कोई कैंडिडेट नहीं था। अगर आफताब जैसे लोग थे तो उन्हें डूसू में क्यों नहीं पहुंचाया गया? कई सालों बाद सीएलसी से लाल सलाम की आवाज आती है जो लोकतंत्र में विश्वास को बहुत मजबूत बनाती है और यह सोचने पर मजबूर करती है कि एक दिन ऐसा भी आ सकता है जिस दिन डूसू में लाल सलाम गूंजे। लोकतंत्र में सत्ता में परिवर्तन कब हो जाए कहा नहीं जा सकता। जाने कब ‘फर्श से अर्श’ तक का सफर पूरा हो जाए। लेकिन उसके लिए सबसे जरूरी है संघर्ष जो सही दिशा में जारी रहे। 

    विचारधारा के स्तर पर हम कितने मजबूत हैं यह एक उदाहरण से समझते हैं कुछ दिनों पहले एबीवीपी संगठन के कार्यकर्ता ने सावरकर, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक मूर्ति आर्ट फैकल्टी के गेट पर लगाई और कुछ दिनों बाद उसी संगठन के लोगों ने उस मूर्ति को हटा दिया उसी संगठन के लोग चुनाव में वोट मांगते हुए कहते हैं विपक्षी सावरकर को अपमानित करते हैं इसलिए आप एक होइए वोट दीजिए। 

    क्या मूर्ति को हटाना अपमान है या विचारधारा के स्तर पर विरोध करना? 

    एबीवीपी के 2018 के प्रेसिडेंट अंकिव की डिग्री चुनाव जीतने के बाद पता चलता फ़र्ज़ी है, जो की संगठन की नाकामी को प्रदर्शित करता है लेकिन इस चुनाव में उसका भी कोई नकारात्मक प्रभाव दिखाई नहीं पड़ा। 

    क्या डीयू का छात्र डूसू के प्रत्याशीयों का चेहरा देखकर वोट देता है या संगठन को वोट देने जाता है या यूं कहें मोदी जी के चेहरे पर वोट देने जाता है?

    2019 में पिछले वर्ष के अपेक्षा अधिक नोटा का इस्तेमाल हुआ। प्रत्येक पद पर देखें तो नोटा पड़ने की संख्या अलग-अलग है और जीत का मार्जिन भी बहुत ज़्यादा अलग है। वहीं देखे तो अध्यक्ष के जीतने का मार्जिन 19000 है और उन्हें करीब बंद 29000 वोट मिलते हैं। जबकि उसी संगठन के तीन प्रत्याशी जो कि वाइस प्रेसिडेंट सेक्रेटरी और ज्वाइंट सेक्रेट्री पर चुनाव लड़े थे उन्हें 20000 से भी कम वोट मिलते हैं जो यह दर्शाता है कि छात्र संगठन को देखकर वोट नहीं दिया है। वहीं पर एनएसयूआई के आशीष लांबा को भी करीबन 20000 वोट मिलते हैं क्या कारण रहा होगा की 20000 का मार्जिन केवल अक्षित दहिया और आशीष लांबा छू पाते हैं जबकि उसी संगठन के 3 प्रत्याशी 20000 के अंदर ही सीमट जाते हैं। जबकि जिसका एक कैंडिडेट 19 हज़ार वोट से जीत दर्ज करता है। डीयू में डूसू की वोटिंग प्रतिशत में आई गिरावट यह प्रदर्शित करती है कि लोगों के मन में डूसू के प्रति उत्साह और दिलचस्पी कम होती जा रही है। संगठन अपनी शाख लोगों के बीच मजबूत नहीं बना पा रही है। एक सर्वे से पता चला है कि छात्र कॉलेज में वोट देने जाते हैं इसी वजह से वह डूसू में वोट दे देते हैं, उसकी प्राथमिकता कॉलेज में वोट देना है। अगर डूसू का चुनाव कॉलेज के चुनाव के दिनांक के इतर रख दिया जाए तो हो सकता है कि डूसू की पोलिंग मात्र 10% रह जाए क्योंकि नोटा की बढ़ती संख्या पोलिंग की घटती संख्या प्रदर्शित कर रही है, कॉलेज के चुनाव ने ही डूसू के चुनाव को जिंदा बनाए रखा हुआ है। आखिर क्यों डूसू के निर्वाचित सदस्य प्रत्येक वर्ष की रिपोर्ट विद्यार्थी तक नहीं पहुंचाते हैं? 

    क्यों विश्वविद्यालय प्रशासन एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण नहीं करता जिसमें छात्र संगठन के द्वारा किए गए तमाम कार्यों को प्रत्येक विद्यार्थी तक पहुंचाया जा सके?

    डिजिटल इंडिया के दौर में क्या यह संभव नहीं है? जबकि हम अपनी सारी एक्टिविटीज का ध्यान कॉलेज या डीयू की वेबसाइट से जान पाते हैं। क्या हम अपने छात्र प्रतिनिधि का एक प्रेसीडेंशियल स्पीच नहीं करा सकते? जब हर कॉलेज के प्राचार्य भारत के प्रेसिडेंट की स्पीच को सुनाने के लिए प्रबंध कर सकते हैं तो वे क्यों नहीं विश्वविद्यालय के छात्र प्रतिनिधि का भाषण सुनवाने के लिए व्यवस्था करते हैं?

    जबकि कॉलेज स्तर पर आजकल अमूमन प्रत्येक कॉलेज में प्रेजिडेंटशियल स्पीच का आयोजन होता है।

    इसलिए विश्वविद्यालय को डूसू में वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने के लिए इन मुद्दों पे ध्यान देना चाहिए और विद्यार्थियों के समक्ष छात्र प्रतिनिधियों का रिपोर्टकार्ड भी पेश करना चाहिए जिससे छात्र को अपना मत देने में दुविधा न हो और वे एक बेहतर उम्मीदवार का चयन कर सकें।

    Ramanand Sharma


  • चारुस्मिता

    चारुस्मिता

    ​Rajeshwar Vashistha

    मैं किसी पेड़ की तरह उगना चाहता हूँ!
    मेरे पास मजबूत जड़ है, तना भी और पत्ते भी
    पर मुझे नहीं मालूम
    कि मैं पीपल बनूँ, नीम बनूँ, बुरूँस बनूँ या देवदार?
    बस मैं एक ऐसा जादुई पेड़ बनना चाहता हूँ
    जिस पर चिड़िएँ, गिलहरियाँ,
    तितलिएँ और कोयल सब दिन-रात आएँ।

    चारुस्मिता ने कहा – सुनो पेड़,
    मुझे तुमसे प्रेम हो गया है।
    मेरे पास एक भरी-पूरी दुनिया है,
    खूबसूरत आँखें और मरमरी जिस्म है,
    प्रेम-कविताएँ भी लिख लेती हूँ।
    तुम जैसा प्रेमी मिल जाए
    तो लोग शताब्दियों तक याद करेंगे हमें!

    मैंने पूछा – मुझे सागौन या शीशम का पेड़ बनाना चाहती हो?
    ताकि मेरी लकड़ी पर अपनी तस्वीर बना कर
    उसके नीचे रुबाइयाते उमर खैयाम लिख सको!
    या यूक्लिप्ट्स जैसा कोई मुलायम पेड़,
    जिससे बने कागज़ पर छप सके तुम्हारी
    तुकबंदी की किताब?
    और उसके विमोचन के लिए
    अपनी धोती संभालता हुआ चला आए कोई मंत्री!

    उसने कहा – मैं जब प्रेम में होती हूँ
    किसी प्रश्न का उत्तर नहीं देती।

    मेरे घर में असंख्य पेड़ पौधे हैं,
    सभी कुलीन और संभ्रांत!
    मैं हर सुबह अपनी चिड़ियों को दाना खिलाते हुए
    हर पेड़ की एक-एक पत्ती अपने पल्लू से साफ करती हूँ।
    हर नए खिले फूल का चित्र फेस-बुक पर अपडेट करती हूँ।
    दिन भर ब्ल्यू-रे प्लेयर पर बजाती हूँ
    बीथोवन की सिम्फनी!
    तुम भूल जाओगे जंगली पक्षियों की कर्कश आवाज़ें।

    मेरे पेड़ बिगड़ैल बच्चों की तरह ज़मीन पर नहीं लोटते,
    उनकी शाखों पर कव्वे और कबूतर बींट नहीं करते।
    उनकी जड़ों के पास विराजते हैं
    भाँति-भाँति की मुद्राओं में ढेर सारे गणेश
    कछुए और एंटीक कलाकृतियाँ।
    मैं, उनकी जड़ों को
    घर के मंदिर में, शिवलिंग पर चढ़ाए जल से
    स्वयं तृप्त करती हूँ।
    यहाँ अगर पेड़ मर भी जाएँ
    तो सीधे स्वर्ग जाते हैं!
    लोग मेरे अभिजात्य को
    मुहावरे की तरह इस्तेमाल करते हैं।

    मेरा प्रेम पाकर
    तुम दुनिया भर के पेड़ों की भीड़ से अलग हो जाओगे,
    तुम्हें लगेगा तुम कदम्ब के पेड़ हो
    और राधा तुम्हें अपनी बाहों में भर कर
    अलौकिक स्पर्श सुख दे रही है।
    मैं तुम्हें अपने पलँग के सिरहाने
    मक़बूल फ़िदा हुसैन की
    सरस्वती रिप्लीका के पास स्थापित करूँगी,
    लोग जानते हैं, मेरा घर एक सुंदर कला-क्षेत्र है!

    मुझे लगता है,
    हर पेड़ बाहें उठाकर पानी के लिए
    दिन भर ताकता रहता है सूरज की ओर।
    कौन साफ करता है उसकी पत्तियाँ?
    किसके तने पर मचलती हैं
    राधा की नाज़ुक सुंदर उँगलियाँ?
    किसकी छाया में नृत्य करते हैं शिशु गणेश?
    कौन से पेड़ के निकट रहती हैं सरस्वती?

    सुनेत्रा,
    तुम जल रही हो न मेरे भाग्य से?
    ———
    पगले, रो रही हूँ
    चारुस्मिता, तुम्हें बोंसाई बनाने जा रही है! 

    ​Rajeshwar Vashistha

    Rajeshwar Vashishth


  • भारतीय समाज :- मान-सम्मान एवं स्वाभिमान

    भारतीय समाज :- मान-सम्मान एवं स्वाभिमान

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    भारतीय समाज को जाति व्यवस्था ने इतना दमित और प्रदूषित किया है कि यहां रहने वाला व्यक्ति स्त्री या पुरुष प्रेम स्वतंत्रता का कहकरा भी नहीं समझते। भारतीय समाज समाजिक संस्कारों में प्रेम और स्वतंत्रता जैसे भावों की निरंतरता में भ्रूण हत्या करता चलता है, चला आया है। जिस समाज में इन भावों का ही कोई स्थान नहीं होगा वहां का व्यक्ति न तो सम्मान के बारे में कुछ जान समझ सकता है, न स्वाभिमान के बारे में और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में।
    समझना छोड़िए वह इनकी कल्पना भी नहीं कर सकता है।
    भारतीय समाज केवल और केवल शोषक और शोषित आधारित व्यवस्था पर चलने वाला दमनपूर्वक चलने वाला समाज है।
    यहां मान सम्मान स्वाभिमान का अर्थ केवल इतना है कि जो जो आपके शोषण तले आते है वह आपसे बराबरी में बात न करे, बराबरी में न खायें पिये, आपके जैसा ओढ़ना खाना पीना रहना न हो। स्वाभिमान पूरे तैश के साथ बरकार रखने के लिए सारे जतन इसी व्यवस्था को बनाये रखने के है।
    यहीं स्वाभिमान अपने से ऊपरी व्यवस्था के व्यक्ति, संस्था पर तुरन्त गायब भी हो जाता है क्योंकि जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का शोषण करता है उसे किसी भी सामाजिक व्यवस्था की कंडीशनिंग या अन्य कंडीशनिंग के कारण जायज ठहराता है चाहे वह अपने ही परिवार की स्त्री बच्चों तक सीमित हो वह अपने से ऊपरी व्यवस्था द्वारा किए गए शोषण को भी स्वीकार करेगा ही करेगा, स्वीकार न करने का कोई सवाल ही नहीं।
    जो समाज दमित हो स्वयं के प्रति एवं अपनो के प्रति ही क्रूर हो वहां अपने निजी स्वार्थों के लिए चापलूसी, धूर्तता ही काम करते है भले ही मान सम्मान अच्छे बर्ताव की पारिवारिक सम्बन्धों में भी कितनी ही परते ओढ़ ली जाये।

    चलते-चलते :-

    और बात ही क्या की हमारे समाज का मान-सम्मान स्वभिमान इतने ऊंचे दर्जे का है कि यह कभी बैंकों की लाइन में चुप-चाप लग जाता है। कभी KYC के नाम पर इज्जत बख़्शी जाती है कभी NRC के नाम पर। कभी अपनी ही मांगो के नाम पर लाठियां पड़ना।
    इसका सबसे ताजा उदाहरण है मोटर व्हीकल एक्ट के नाम पर गुंडागर्दी थोपना उससे भी बड़ी बात इसे स्वीकार कर लिया जाना। गिगयाने, मिमयाने की आदत तो हमें बचपन से ही डाल दी जाती है तो इस सब को भी स्वाभिमान से क्या ही जोड़ना।
    अब ऐसा तो है नहीं कि जो भी शासन प्रशासन है वह कहीं बाहर का हो और हम पर चीजें थोप रहा हो। अब तो हमारी ही बनाई हुई व्यवस्था है तंत्र है दूसरे को तो इसका दोष दिया ही नहीं जा सकता।

    यदि समाज के आपसी संबंध ठीक हो, समाज गुंडागर्दी, शोषण शोषक पर आधारित समाज न हो तो ऐसा शासन प्रशासन अस्तित्व में आ ही नहीं सकता जिस पर अनाप शनाप अधिकार हो, लोगों के साथ अनाप शनाप व्यवहार कर सके, गुंडागर्दी थोप सके।
    चूंकि हम अभिशप्त है शोषक बनने को इसलिए शोषित होने को भी अभिशप्त ही है।

    अपवादों की बात ही क्या की जाये, हममें धूर्तता इतने गहरे में बैठती है कि हर व्यक्ति अपने को अपवाद ही समझता है।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • विवशता के क्षणों में

    विवशता के क्षणों में

    ​Rajeshwar ​Vashistha

    पिता चाहते थे
    जब वह शाम को थक हार कर घर लौटें
    मैं बिना सहारे अपने पावों पर चल कर
    दरवाज़े तक आऊँ
    और वह मुझे गोद में उठा लें।
    पर बहुत दिनों तक ऐसा हो नहीं पाया।

    निराश पिता कुछ देर मुझे सहारा देकर चलाते
    माँ की गोद में डालते और फिर मुँह-हाथ धोकर
    चौंके में भोजन के लिए बैठ जाते।
    पंखा झलते हुए दादी धीरे से कहती –
    धीरज रखो, लड़के देर से चलना सीखते हैं।
    वे लड़कियाँ नहीं होते।

    मुझे लगता है गूँगा है यह लड़का,
    इशारों से बातें करता है।
    अपने भाई की बात से दुखी पिता
    मुझे छत पर ले जाकर
    आँ से माँ तक का ध्वनि परिवर्तन सिखाते।
    दादा जी कहते – लड़के देर से बोलना सीखते हैं।

    छोटी बहनें दौड़ कर माँ के पास आतीं
    और खाद्य-पदार्थों के नामों की झड़ी लगा देतीं।
    मुझे कभी समझ नहीं आए सब्ज़ियों और दालों के नाम
    रोटी, पराठे या पूड़ी में से क्या चुनूँ ।
    मेरे लिए खाने का अर्थ
    सदा भूख से लुका-छिपी खेलना ही रहा।

    मेरे अवसाद के क्षणों में वह मेरे निकट आई
    उसने मुझे धैर्य से सुना और नर्स की तरह कहा
    ज़िंदगी यहीं खत्म नहीं होती।
    मैं विस्मय से काँपा,
    प्रेम को व्यक्त करने में खो जाने का भय था।
    पर वह स्त्री थी इसलिए सब कुछ समझ गई।

    वह मेरे लिए प्रकृति की चुलबुली हँसी है,
    रात के धुँधलके में सम्मोहित करती
    रजनी गंधा के पुष्पों की गंध है,
    ब्रह्मा की पुष्करिणी में भरा प्रेम-अमृत है।

    पर मैं वही छोटा बच्चा हूँ
    जिसने सदा सभी को निराश किया है।

    सुनेत्रा,
    क्या पुरुषों की चिरंतन अपरिपक्वता ही
    स्त्रियों के दायित्वबोध की नियंता है!

    ​Rajeshwar ​Vashistha

    Rajeshwar Vashishth


  • बदमाश डायरी — Gourang

    बदमाश डायरी — Gourang

    Gourang

    “कौन हो तुम?”
    “वही तो खुद से पूछ रही हूँ।”
    “मतलब?” 
    “मतलब! क्या मतलब?” 
    “क्या क्या मतलब? शक्ल से तो मेंटल नहीं लगते, कपड़े भी तो दुरस्त ही हैं।”
    “चलो, यही सवाल मैं तुमसे करती हूँ, कौन हो तुम?” 
    “मैं! मैं शरत हूँ।” 
    “तो महज एक नाम हो बस?” 
    “क्या नाम? पढ़ा लिखा हूँ, नौकरी करता हूँ, अच्छा कमाता हूँ, इसी शहर का हूँ, यार दोस्त हैं, मौज मस्ती करता हूँ। इसी से तो पहचान है।” 
    “बस इतनी सी ही तो पहचान है। एक नाम, एक ठिकाना, कमाते हो। फिर एक अदद घर, बैंक बैलेन्स, समाजिकता, रुतबा, रसूख। ये ही तो?” 
    “और क्या होना होता है?” 
    “बताया न, वही खुद से पूछ रही हूँ। यह सब तो दूसरों के लिए है। खुद के लिए मैं क्या हूँ?”

    ………… ………… …………

    जैसा कि अक्सर होता है, खुद से बातें किए बिन मुझे नींद नहीं आती। डायरी हँसती है। दसियों बार मैंने खुद से पूछा, ये दस्तावेज़ किसलिए? किसके लिए? पर, जैसे होते हैं न कुछ बे सिर पैर की बातें, जिसके माने तब समझ नहीं आते, शायद बाद में आए। हँसती डायरी को देख मैं भी मुस्कुरा लेती हूँ, साली चिढ़ाती बहुत है। 
    आज एक शरत नाम का लड़का मिल गया। मिल क्या गया, बस टकरा गया। अच्छा है, हैंडसम भी। मैं वर्कशॉप गई थी, शांतनुदा से मिलने। वही बुलाये थे अपने वर्कशॉप पर। जैसा कि अक्सर होता है, कुछ गपशप होती है, फिर संगीत पर चर्चा होती है, कुछ सुर ताल भी हो जाता है। पर वे तो मिले नहीं, ये मिल गया। मैं वायोलिन के तार को अनमने ढंग से छेड़ रही थी, बेसुरा। शायद यही उसे चुभा होगा, बड़ी कर्कश आवाज में पूछ लिया, ‘कौन हो तुम?’ मेरे मन का बाहर निकल आया। क्या पता क्यों, मैंने उससे शास्त्रार्थ कर लिया। 
    मैं उकता रही थी। उसे वहीं वैसा ही छोड़ बाहर निकल आई।

    ……….. ……….. …………

    “आप तो बहुत अच्छा बंसी बजाते है!!” 
    “अरे रहस्यमयी जी? आप कब आई?” 
    “रहस्यमयी?” 
    “और नहीं तो क्या? उस दिन आपका नाम भी जान न पाया। पर आपसे मिलकर मैं भी रात भर सोचता रहा, खुद के लिए कौन हूँ मैं?” 
    “कुछ हल मिला?”
    “कहाँ? ले दे के यही बंसी ही मिला। मन बोला, मुरलीधर का मुरली ही बोलेगा।” 
    “वही। आपकी बंसी में जादू है।” 
    “और आप बहुत सेंसिबल हैं। पता है न, एक सेंसिबल लड़की इस दुनिया में बहुत दुर्लभ है।” 
    “ऐसा क्या?” 
    “और नहीं तो क्या? अपने आस पास ही देखिये, कितनी लड़कियाँ खुद से यह सवाल करती हैं?” 
    “शरत बाबू, अफसोस तो इसी का है। दुनिया यही सोचती है, चाहे वो कुछ भी करे, आखिर में उसे तो रोटियाँ ही सेकनी है।” 
    “नहीं, नहीं। सारी दुनिया बदल रही है। कुछ भी अब आखिर में नहीं हैं। आगे भी बहुत कुछ है, एक बहुत ही सार्थक कंट्रिब्यूशन है। और हाँ, सिकता, वारा, गार्गी, लोपामुद्रा केवल चूल्हा-चपाती तो न करते थे, अन्यथा आज भी याद न किए जाते।”

    …….. ………… …………

    शांतनुदा भले आदमी हैं। गुणग्राही हैं, संगीत से अटूट प्रेम करते हैं, संगीत चाहने वालों से भी। अभी शरत बाबू से बात ही कर रही थी कि अंदर आए। मुझे देखते ही चहके, ‘अरे इमन तुम उस दिन भाग क्यों गई? चलो, चलो आज और देर नहीं।’ कहते ही मुझे वायोलिन पकड़ा दिया। शरत बाबू के आगे थोड़ी झिझक हो रही थी पर शांतनुदा के आग्रह को टालना मुश्किल ही था। मन फिर खुद ही तैयार हो गया। मैं लम्बाडा के धुन बजाने लगी। धीरे धीरे आँखें बंद हो गई। अंतरयात्रा में उतर गई। मेरे दिमाग में सिर्फ लम्बाडा के धुन ही थे। बाकी सब से तो मैं कट ही गई। 
    आखिर में जब धुन समाप्त हुआ, मैंने आँखें खोली। आँखें खोलते ही शरत बाबू पर ही दृष्टि पड़ी। कितनी अनुराग भरी दृष्टि थी। मेरा दिल धडक गया। मैं नजर मिलाये न रह सकी। मुझे ठीक पता है, मेरे गाल अब भी गुलाबी हो रहे हैं। 
    डायरी फिर हँस रही है। पूछ रही है, ‘तुम’ से ‘आप’ का सफर? इमन में मध्यम तो तीव्र होता है न! षड़ज भी अवरोह में ही लगता है। घूम के लगता है, आखिर लगता ही है। 
    अब उसकी बंसी इमन ही बजाये तो फिर न कहना।

    डायरी बड़ी बदमाश है। सब कुछ जान लेती है……..

    Gourang

    Gourang


  • बच्चे चाहिए हमें — Nishant Rana

    बच्चे चाहिए हमें — Nishant Rana

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    बच्चें हम पैदा करते है
    क्योंकि हमें करने होते है 
    समाज में अपना पुरुषत्व साबित करने को
    अपना स्त्रीत्व साबित करने को
    बच्चे चाहिए होते है हमें
    क्योकिं खोजते है अपनी मुक्ति
    पैदा हुए बच्चे से 
    दिखता है बहुत कोमल नाजुक सा मस्तिष्क जिसमें बींध सके अपने सपने
    निकाल सके अपनी खीज, गुस्सा , झुंझलाहटे
    एक तो ऐसा हो जिस पर समझे अपना पूर्ण अधिकार
    जिसको सुधारा जा सके मारा जा सके जो नहीं सीखता समझता 
    आपकी कहीं हर बात
    क्योंकि अपनी चेतना से भी रख देता है वह अपने पक्ष
    बच्चे चाहिए हमें
    ताकि कुछ मनोरंजन हो हमारा 
    उन पर कविता लिखने में
    उन्हें भीख मांगते देखने में
    उन्हें भूखे मरते देखने में 
    संवेदशीलता की चिपचिपाहट महसूस करने को
    मरें हुए बच्चों की लाशों को इधर उधर सकेरने में
    हम मार देते है निसंकोच बच्चियां
    यदि यह सब देना नहीं उनके हिस्से
    हमें चाहिए बच्चे कि वो बड़े हो
    और वो पैदा करे और बच्चें
    वहीं सब दोहराने को 
    जिसके लिए पैदा किया था उन्हें

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • गुड टच बैड टच — Nishant Rana

    गुड टच बैड टच — Nishant Rana

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    भारतीय समाज हजारों सालों से यौनिक नैतिकता का पाठ पढ़ाता आया है। भारतीय समाज अलग अलग तरीकों से, धूर्तता से यौनिकता को सुरक्षित करता आया है.

    हम यौन शुचिता के नाम पर स्त्री को इतना संस्कारित कर चुके है कभी जौहर के रूप में कभी सती प्रथा के नाम पर स्वयं को जलाती आई है। और यदि कोई शारीरिक पीड़ा के कारण ही सही इस संस्कार से बाहर आना चाहती रही उन्हें हम स्वयं ही आग में झोकते आये है।

    यौन शुचिता के नाम पर हमने विधवाओं को भयंकर उत्पीड़न की स्थिति में डाला, यह यौन नैतिकता का ही पाठ था जिसने उन्हें उस स्थिति को स्वीकार करना बनाया। ऐसी स्थिति में भी यदि कोई महिला अपनी शारीरिक जरूरतों के कारण किसी के साथ सम्बन्ध बनाती भी है तब भी वह जो नैतिकता उसके अंदर प्रतिष्ठित है के कारण अपने आप को पाप का भागीदार समझती है, अपनी स्थिति को ठीक समझती है।

    बाल विवाह के रूप में हमने यौन शुचिता के माध्यम से ही गुलामी व यौन शोषण थोपा।

    घर से बाहर निकलने न देने के नाम पर हमारी यहीं कुंठित मानसिकता को मान सम्मान के नाम पर जीना रहा। कपड़े जो शरीर को सर्दी गर्मी धूल मिट्टी शरीर को कुछ आराम सुरक्षा देने के लिए प्रयोग होने थे उन तक में हमने इतनी सेक्स, लैंगिक नैतिकता घुसेड़ दी कि अमूनन तो कोई स्त्री और कई पुरुष इससे बाहर ही नहीं आ पाते यह मानिये जीवन का शायद कोई हिस्सा हमने ऐसा छोड़ा जहां से मस्तिष्क के बच निकलने की कोई संभावना हो।

    हमने अपने ग्रंथों में पूजा पाठ तक में स्त्री को देवी बनाया, उसमें यौन नैतिकता की इतनी गुलामी अपराधबोध भरा की देवी प्रतिष्ठित बातों से अलग जरा भी कुछ कर रही है तो उससे बड़ी पापिन कोई नहीं है। 
    सामाजिक संस्कारों से अलग कोई स्त्री जरा भी जाये या फिर पुरुष की भी उसमें सहमती रही हो लेकिन जैसे ही वह भोग बंद हो या फिर आपको न मिल कर किसी और को मिल रहा हो तो देवी से तो पाप हुआ ही है आप कुल्टा, रण्डी, चरित्रहीन जैसे तमगे जब मनमर्जी किसी स्त्री पर थोप सकते हो.

    गुड टच और बैड टच भी ऊपर की गई चर्चाओं की तरह का ही शारीरिक दैवीयकरण है केवल रैपर अलग है.

    हम यौन शिक्षा पर कभी काम नहीं करेंगे, हम बच्चों के साथ कभी इतने मित्रवत नहीं हो पायेंगे कि वह अपनी परेशानियाँ भी हम से खुल कर कह सके लेकिन बच्चे के खुले मस्तिष्क को भय और यौन कुंठाओं के दलदल में जरुर ले जायेंगे. ऊपर से माता-पिता खासकर माताओं का यह तुर्रा कि हमें भी सिखाया गया है हम पर तो कोई फर्क नहीं. जबकि यहीं फर्क उनका जीवन निर्धारित कर चुका होता है खुद के जीवन को नरक बना चुका होता है. लेकिन उस बात को रुककर देखने, स्वीकार करने को तैयार हो तब न. यदि समाज बच्चों और स्त्रियों के लिए असुरक्षात्मक है, बालात्कारी मानसिकता का है तो गुड टच बैड टच से समाज सही दिशा में कैसे चला जायेगा? समाज में तो हत्याएं भी होती है, चोरी, भ्रष्टाचार और तमाम तरह के अपराध होते है बच्चों को इन सब के आधार पर फिर लड़ने मारने की ट्रेनिंग भी देनी चाहिए; चाकू ,पिस्तौल जैसे हथियार भी देने चाहिए, हर जगह कैमरे लगे रहने चाहिए. ऐसा ही बहुत कुछ होना चाहिए ऊपर जो सब बताया गया है इन तर्क के आधार पर तो फिर वैसा होना भी क्या गलत?

    समाज असुरक्षित है तो इसे असुरक्षित बनाया किसने है, क्यों बच्चों को इतनी नैतिकताओं में रखने के बावजूद समाज कुंठित है, आपराधिक है. यह बहुत ही गंभीर मसला है कि फिर जैसा समाज हमने बनाया उसी समाज के आपराधिक कारणों को आधार बना कर उन सब कारकों को और मजबूत करते रहें जो इस सब की वजह से ऐसे समाज का निर्माण करते हो जहां कोई भी एक दूसरे पर विश्वास न करता हो, भय के माहौल में जीते हो, अपराध बोध, असुरक्षा और यौन कुंठाओं को जीते हो.

    इन सबके पीछे केवल और केवल एक ही बात निकल कर सामने आती है कि पुरुष या माता-पिता की संपत्ति के रूप में स्त्री/बच्चों को प्रयोजित/प्रतिष्ठित किया जाता रहें. स्त्री अपने आप को भोग्या माने, उत्पाद माने, उसका हर एक क्रिया कलाप निर्णय पुरुष के नजरिये के आधार पर हो. हमारे यहाँ पुरूषों को यह बैठा कर नहीं सीखाया जाता है कि तुम्हें स्त्री को नियंत्रित करना है चाहें वह तुम्हारी बहन हो, माता हो, पत्नी हो या बेटी हो. जब हमारे ईश्वर, देवता भी स्त्रियों का शोषण करने के बाद, बालात्कार करने के बाद पूजनीय है, समाज और हमारें दैवीय ग्रन्थों में यौन शुचिता प्रतिष्ठित है, समाज में किसी भी प्रकार का खुलापन है ही नहीं, रत्ती भर भी जगह मस्तिष्क के विकास की छोड़ी ही नहीं जाती तब पुरुष को अलग से कुछ सिखाने की जरूरत ही नहीं रह जाती है, स्वत: ही भोगने वाली, नियंत्रित करने वाली सामंती मानसिकता अपने लिए जगह बनाती चली जाती है.

    चलते-चलते :-

    यौन शुचिता का जाल इतना गहरा हैं कि बहुत सी महिलाएं स्त्रीवाद के नाम पर पुरूषों से नफ़रत करती है और उनके जीवन जीने का आधार एक बार फिर से पुरुष का नजरिया ही हो जाता है.

    हमारे समाज में आपसी संबंधो में प्रेम, मैत्री, सहअस्तित्व, सहजता, स्वतन्त्रता, ज़िम्मेदारी के पनपने की इतनी बारीकी से भ्रूण हत्या की जाती है कि एक तरफ पुरुष स्त्री को केवल यौन रूप से लगातार भोगते रहने की मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाता है और स्त्री अपनी यौन शुचिता से ऊपर नहीं उठ पाती, अपने सम्बन्धों को खुल कर नहीं जी पाती. ऐसा ही समाज में स्त्री पुरुष संबंधो में ईमानदार न हो कर धूर्तता, दिखावे को बहुत बारीकी से प्रेम के नाम पर जीता है कुछ समय बाद एक दूसरे का सर फोड़ता है और इसी प्रकार के संबंधो की चकरघिन्नी चलाये रखता है. इस तरह की मानसिकता में ही किसी समाज में शादी के नाम पर चलने वाली वेश्यावृति, व्यापार, सत्ता लंबे समय तक टिके रह सकते है. एक स्वतंत्र, जिम्मेदार, सामूहिक रूप से अपने कर्तव्यों के निर्वहन करने वाले समाज/संबंधो के बनने का आधार कभी डर नहीं हो सकता. हम जितना अपने भोग के लिए डरेंगे उतना ही तंत्र मजबूत होगा, उतने ही हम झूठे मनोरंजन, नफ़रत में और डूबेंगे और अपने अधिकार, स्वतंत्रता, निर्वहन और भी अधिक मुश्किल हालातों में डालते रहेंगे.

    अपवाद हर जगह है मनुष्य में सोच समझ जागने, किसी भी प्रकार की विकृत मानसिकता से निकलने की सम्भावना भी हर जगह है, यदि हम वास्तव में अपने बच्चों की सुरक्षा, स्वस्थ समाज के लिए प्रतिबद्ध है तब हमें अपने डर, नफ़रत से बाहर आना ही होगा, बहुत कुछ सामजिक रूप से झेलना ही होगा बशर्ते यह सब बिना ढोंग के हो, हम जो है उसे प्रतिष्ठित करने के बजाय उसे ईमानदारी से स्वीकार कर उसका अवलोकन करें, और कोई विकल्प है भी नहीं.
    बाकी यदि किसी को भी लिखा पढने में असुविधा या चोट लगी हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ.

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist. 

    Devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance.  



  • पहचान — Nishant Rana

    पहचान — Nishant Rana

    Nishant Rana

    मैं खुद ही खुद का हौंसला हूँ
    मैं अकेला ही खुद के लिए खड़ा हूँ
    मैं शौक से लड़ा, मैं खौफ से लड़ा
    मैं भूत से लड़ा मैं भविष्य से लड़ा
    मैं दिन रात सुबहो शाम से लड़ा
    मैं जात धर्म ऊंचनीच भेदभाव से लड़ा
    भारी थी सबसे लड़ाई वो
    जब मैं अपने आप से लड़ा

    जरूरी नहीं इकरंगा हो अकेलापन
    बीतने दो पतझड़ मैं रंग हज़ार हूँ

    केवल न शौर्य की बात हो
    न केवल गर्व की बात हो
    प्रेम की भी बात हो
    सहजता की भी बात हो
    बीती जो लड़ाइयां
    यह न मेरी पहचान हो
    सुबह की लाली की बात हो
    दमकती शाम की धूल की बात हो
    पंछियों की बात हो, नदियों की बात हो
    न हो लड़ाइयां इसकी भी बात हो
    कैसे जिया जीवन
    संबंधों की बात हो।
    सब पहचान से परे
    नितांत अकेले मरने की बात हो

    Nishant Rana

  • जाणे मेरा जीवड़ा — Vijendra Diwach

    जाणे मेरा जीवड़ा — Vijendra Diwach

    Vijendra Diwach

    मैं बेटी
    इस धरती पर आई,
    मेरी मां मुझे इस संसार में लेकर आई,
    लेकिन मेरी मां नारी होकर भी मुझे नहीं समझ पायी,
    मेरे लड़की रूप में पैदा होने पर
    नारी ने ही रो-रोकर आंखें सुजाई।

    कहते हो मिश्र की सभ्यता में नारी का सम्मान था,
    राजा की कुर्सी के उत्तराधिकार पर बेटी का हक था,
    लेकिन बताओ
    भाई की बहन से शादी,
    यहां यह कौनसा मेल था?
    यह तो सब पुरुषों का
    बहन के हाथों से सत्ता पाने का खेल था,
    कहते हैं मैं पहले आदमी द्वारा पूजी जाती थी,
    लेकिन इस आदमी ने कैसे मुझे पूजा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    रामराज्य के राम ने मुझे
    सीता के रूप में अपवित्र कहकर वन में भेजा,
    तथाकथित महान विद्वानों की सभा में
    मुझे द्रोपदी के रूप में लूटा।
    सबने देखा
    धृतराष्ट्र की अंधी जैसी आंखो ने भी देखा,
    दोनों ही जगह पर
    मेरा ही दमन करने की साजिशें रची गयी,
    लेकिन अपने को बड़े-बड़े गुरु-धर्मगुरु
    और महान कहने वालों की जुबान ना खुली,
    क्योंकि सबको सत्ता के साथ सुख भोगना था,
    मुझे किस-किस कृष्ण के आगे हाथ फैलाना पड़ा,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मध्यकाल में मुझे मीरा के रूप में सताया है,
    यहां भी मैं रजिया के रूप में शासिका बनी तो
    मुल्ला-मौलवियों ने स्त्री होने की वजह से,
    मैं शासिका नहीं बन सकती ऐसा फरमान फ़रमाया है,
    मैं नहीं हटी तो पुरुष मानसिकता ने
    सत्ता की शक्ति के लिये,
    मुझे मार के हटाया है।

    अपने को खुदा के बन्दे कहने वालों ने
    तीन तलाक कहकर ठुकराया है,
    बुर्के में ढका है मुझे,
    मेरे स्वतंत्र विचारों को दफनाया है,
    सबने मिलकर मुझे
    जिंदा ही सती के रूप में जलाया है,
    अपनी इज्जत के लिये
    मैंने आग में अपना जौहर कराया है।

    आधुनिक युग वालों ने तो
    और भी बर्बर जुल्म ढायें हैं,
    मुझे लूटने के लिये
    पशुता से भी क्रूर तरीके अपनायें है,
    हर युग में मुझे ही दैहिक अग्निपरीक्षा से क्यों गुजरना पड़ा,
    कैसे मैंने खुद का वजूद बचाया
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कुछ समय पहले ही
    जब मैं जन्म लेती थी,
    एक मां-बाप के घर हम नौ-नौ बहनें पैदा हो जाती,
    लेकिन मां-बाप को कुल चलाने के लिये बेटे की चाहत होती,
    कैसे ऐसे माहौल में हम बहनें बिना प्यार के जी पाती,
    कितना रोता मेरा हीवड़ा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कुछ समय पहले ही
    कुछ मां-बाप मुझे जन्मते ही
    जिंदा ही कलश में रखकर किसी नदी में बहा देते,
    या फिर गड्डा खोदकर जिंदा ही दबा देते,

    कितना मेरा जी ता तड़पाया,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कितना मेरा जी था तड़पाया,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    आज भी मुझे
    जब लोगों को पता चले कि गर्भ में बेटी है,
    सब मिलकर मार देते हैं,
    जन्मते ही किसी नाले में
    या फिर कहीं झाड़ियों में फेंक देते हैं,
    धरती पर आने से पहले कसूर क्या था मेरा,
    यही ना कि मैं लड़की थी,
    नहीं था पेट में लड़का,
    क्या मैंने सहा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कभी लगता है
    अब स्थिति कुछ ठीक है,
    लेकिन जब जाती हूं स्कूल-कॉलेजों में,
    हर गली,हर कोने पर कई आंखों ने मेरे शरीर को ताड़ा,
    कई नामर्दों की पुरुष मानसिकता ने अपनी गन्दी नजरों से
    मेरी शारीरिक बनावट का एक्सरे खींच डाला,
    मुझे लगा कैसा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मेरे पहनावे पर सवाल खड़े किये जाते हैं,
    पर अपनी सोच के कभी निरीक्षण नहीं किये जाते हैं,
    कपड़ों पर सवाल उठाने वाले
    मन्दिर-मस्जिदों में दो-दो साल की मासूमों से
    रेप के जुर्म में पकड़े जाते हैं,
    अरे आदमी तेरी सोच गन्दी है
    और ढीला है तेरे मनरूपी पायजामे का नाड़ा,
    मैं एक मासूम बच्ची थी,
    क्या मेरे पर बीती
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    सब कहते हैं तुम लड़की हो,
    कमजोर हो,
    अपने साथ में बदमाशों के लिये मिर्च स्प्रे रखो,
    आठ-दस वर्ष की मासूम यह सब क्या जाने कि
    कौन बदमाश है,
    कौन है शैतान,
    अब तो बाप भी गोद में लेता है
    तो लगता है
    आ गया फिर कोई हैवान,
    आदमी तेरी आत्मा और दिमाग में है सब सड़ा-सड़ा,
    बचपन मेरा कैसे खोया,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मेरे पैदा होते ही
    तैयारी शुरू कर देते हैं मेरी शादी की,
    बालविवाह करके मेरा,
    घड़ी तय कर देते हैं मेरी बर्बादी की,
    मजबूरी में बचपन में दुल्हन बनना पड़ा,
    मेरे बालमन पर क्या असर पड़ा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मेरी शादी घर के बड़े ही तय करते हैं,
    ना मुझसे मेरे मन की पूछते हैं
    यदि शक्ल मेरी अच्छी नहीं तो वरमाला में देखते ही,
    मेरे जीवनसाथी बनने वाले ने मुंह मुझसे मोड़ा,
    यदि उसने दबाव में शादी कर भी ली तो
    प्रेम वाला नाता हमेशा के लिये तोड़ा,
    सब मेरे फिजिकली शरीर और सूरत देखते हैं,
    ना किसी ने मेरे गुण देखे,
    ना कोई मेरी सीरत देखते हैं,
    अरे ओ जीवनसाथी बनने वाले मर्द,
    मैंने भी तो बिना सोचे समझे तेरे संग अपना रिश्ता जोड़ा,
    अपना आंगन,अपने परिचितों को छोड़कर
    तुम जैसे अजनबी का हाथ पकड़ा,
    ओ मर्द?तुमने ना मेरी रूह देखी,
    क्या बीता मुझ पर
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    नारी शक्ति की पूजा करते हो,
    लेकिन घर में ‘कन्या ना आ जाये’
    ऐसे मन्त्र पढ़कर कन्या से
    पीछा छुड़ाने की जुगत लगाते हो,
    मनुष्य होकर क्यों खुद को पशु बनाते हो,
    पशु भी जेंडर भेदभाव तो नहीं करते हैं,
    तुम मनुष्य होने का ढोंग करके
    प्रकृति को छलाने की कोशिश करते हो,
    मां-पत्नी तो चाहते हो,
    लेकिन बेटी को गर्भ में ही मारते हो,
    अरे आदमी!मर गया है तेरी इंसानियत का कीड़ा,
    आगे मुझे बढ़ना है,
    रुकना अब मुझे जंचता नहीं,
    मुझे बढने नहीं देते हो आगे
    तभी तुमने राह में मेरी डाला है रोड़ा,
    इससे कितनी हुई मुझे पीड़ा,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    अरे नर मेरे जिन दो अंगों के पीछे तु है पड़ा,
    उनमें से एक से मैंने तुझे जन्म दिया,
    दूसरे से मैंने तुम्हें दूध पिलाकर यह जीवन दिया,
    फिर भी तु मेरी आत्मा की परवाह किये बगैर,
    मुझे भोग्या बनाने के पीछे है पड़ा,
    तु यह सब बहुत गलत करता है,
    क्यों तुमने अपने इस अंतर्मन को नहीं झिंझोड़ा,
    मेरी आत्मा कैसे रोती है,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    आओ मुझे सम्मान दो,
    सच्ची नियत से साथ दो,
    अपनी गन्दी नजरों को उतार दो,
    इंसानियत वाला दिल बना लो,
    मेरे मां-बाबा आप दहेज के पैसों से
    मुझे पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होने दो,
    परिवार में जेंडर भेदभाव मिटा दो,
    मेरी एक बहन कल्पना चावला की तरह
    मेरे सपनों के पंखों को एक नई उड़ान दो।

    अब मैं नारी अपने लक्ष्य खुद बनाऊंगी,
    टक्कर तो तब भी दी थी शास्त्रार्थों में
    याज्ञवल्क्य जैसे ज्ञानियों को गार्गी के रूप में,
    जब हारने लगे मेरे आगे तो
    धमकियां दी की मैं चुप हो जाऊं,
    नहीं तो मेरा सिर तोड़ दिया जायेगा,
    अब सच के लिये चुप नहीं रहूंगी,
    सच्चाई और मानवता की आवाज बनूंगी,
    मेरे ऊपर लगाये गए प्रतिबन्धों के ऊपर से रास्ता नया बनाऊंगी,
    नारी हूं,नर-नारी को साथ लेकर चलूंगी,
    बार-बार गिरकर,उठकर फिर चलूंगी।

    अब यह नारी आगे बढेगी,
    खुद को मनुष्य मानकर परतन्त्रता की जंजीरें तोड़ेगी,
    अरे आदमी देख लेना इतनी ऊचाइयों पर पहुंच जाऊंगी,
    मेरे कद के बराबर आने के लिये
    आरक्षण जैसी व्यवस्था याद आएगी।

    मेरी राह में लगा देना पहरा कितना भी कड़ा,
    आदमी को मनुष्य के स्तर पर पहुंचाकर खुश होगा मेरा हीवड़ा,
    औरत हूं ना
    प्रकृति का दु:ख कैसे ना जाणे मेरा जीवड़ा।।

    Vijendra Diwach