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  • इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है…!

    इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है…!

    Tribhuvan’s Facebook Wall

    बहुत साल पहले की बात है। उन दिनों में स्कूली छात्र था और कम्युनिस्ट शब्द पहली बार कानों में पड़ा था। यह शब्द प्रयुक्त किया था एक सरदार साहेब ने, जिन्हें मैं नानाजी कहा करता था।

    वे दिखने में साधु जैसे थे, क्योंकि वे सिख वेशभूषा में रहने के बावजूद बालों को अक्सर खुला रखा करते और गले में होती सफेद मोतियों की एक सुंदर माला। घर में कारें-जीपें बहुत थीं, लेकिन मेरे बाबा से मिलने के लिए वे घोड़े पर आते थे। दोनों की दोस्ती की वजह घोड़े, उपनिषद चर्चा और सिख-इस्लाम या दार्शनिक विषय हुआ करते थे। वे उपनिषदों की बहुत सी कहानियां बड़े ही रोचक ढंग से सुनाया करते थे।

    मैं अभी उनका नाम भूल गया हूं, लेकिन वे बानियावाला गांव से आया करते थे। उस गांव के सरदार मस्तानसिंह मुझे आज भी बहुत याद हैं। गांव का नाम बानियावाला था, लेकिन गांव पूरी तरह सिखों का था। उस गांव में मैंने कभी कोई बानिया नहीं देखा। बानिया यानी बनिया। यह गांव कई कारणों में मेरे दिलोदिमाग़ में है। वह सरदार साहब ही थी, जिन्होंने मुझे छठी कक्षा में “भोजप्रबंध” लाकर दिया था और कहा था कि मैं इसे कंठस्थ कर लूं। कपड़े की ज़िल्द और ख़ास गंध वाले पीले पन्ने वाली वह किताब आज भी हमारे घर की थाती है।

    “भोजप्रबंध” संस्कृत साहित्य की एक उत्कृष्ट कृति है। यह लोककवि बल्लाल की अनुपम रचना है। इसमें राजा भाेज की राजसभा के बहुत से सुंदर और सम्मोहक कथानक हैं। यह कृति बताती है कि शासकों को क्यों साहित्य में पारंगत होना चाहिए। लेकिन एक विद्या व्यसनी किसान सिख को जब मैं इस तरह देखता था तो ऐसा लगता था कि किसी पुराने कालखंड से कोई ऋषि चला आया है।

    इस ग्रंथ का वह श्लोक मुझे आज भी कंठस्थ है, जिसमें राजा भोज ने टटं टटंटं टटटं टटंटम् बोला और कालिदास ने समस्यापूर्ति यों की : राजाभिषेके मदविह्वलाया, हस्ताच्युतो हेमघटो युवत्या:; सोपानमार्गेषु करोति शब्दं टटं टटंटं टटटं टटंटम्!

    ख़ैर, बातचीत चल रही थी, कम्युनिज्म की। मेरे बार-बार प्रश्नों पर वे समझाने लगे : जैसे ये आंगन है। ये वेहड़ा है। तुहाडा ते साडा खेत है। ए घोड़ेे ऐं। ए मज्झां ते गाइयां ऐं…ये सबके सांझे हैं। मेरे बात पल्ले नहीं पड़ी। मुझे ये लगता था कि पूरे गांव का सब कुछ साझा ही है, क्योंकि हमारे घर से दूध और मक्खन मेरे दोस्त आकर ले जाते हैं और मैं किसी भी घर से जाकर गन्ने, फल और सब्जियां ले आता हूं या दे आता हूं। हमारा खेत दूर था। इसलिए चार क्यारे लूसण और दो क्यारे बरसीम पड़ोस के किसी खेत में बो लेते थे। बाबा ने कई लोगों को साथ लेकर आंदाेलन चलाया और गांव में स्कूल खुल रहा था; लेकिन वह बना उस जगह जो पांच-छह गांवों के बीच समान दूरी पर थी।

    लेकिन मुझे उनकी एक बात बहुत आसानी से समझ आ गई : सभी रिश्ते बहुत साफ़ सुथरे और इनसाफ़ की बुनियाद और न्याय की अाधारशिला पर टिके होते थे। (हां-हां, दोनों का मतलब एक ही होता है!) लेकिन वे ऐसे ही बोला करते थे। वे आैम प्रकाश चौटाला की तरह, लेकिन चौटाला से भी बहुत पहले से “यक़ीन, भरोसा और विश्वास” बोला करते थे। हर किसी से योग्यता और क़ाबिलियत के अनुसार काम और हर किसी को उसकी ज़रूरत और अावश्यकता के अनुसार पैसा। अब तुम चाहो तो मेहनत-मज़ूरी कर लो और चाहो तो हवाई जहाज उड़ाओ या फिर किताबें लिखो। कालिदास बनकर समस्या पूर्ति करो। मेरे ये बात बिलकुल पल्ले नहीं पड़ी। उनके शब्द आज भी वैसे के वैसे याद हैं।

    आख़िर में उन्होंने समझाया : देखो, मान लो तुम चार भाई हो। सब काम करेंगे अपनी क़ाबिलियत और जुगत से, लेकिन जो खेत में होगा, वह सबको बराबर मिलेगा। इस तरह वे कई चीज़ें समझा रहे थे। यह सही है कि न तो वे कम्युनिस्ट थे और न ही मेरे बाबा। न ही मैं कभी कम्युनिस्ट बना और न ही सरदार साहब की संतानें। सबके भीतर पता नहीं कौन कौन आवाज़ें लगाता है। लेकिन कभी किसी सांप्रदायिक, मताग्रही, जातिवादी या राष्ट्रवादी को उन्होंने न पसंद किया और न कभी अपने आसपास फटकने दिया। कई संकीर्ण मुल्ला-मौलवियों, पंडितों-ज्योतिषियों, मिशनरियों, ग्रंथियों आदि से दो-दो हाथ करते ही देखा। हमारी रगों में भी वही लहू बहुत जीवंत होकर बह रहा है।

    लेकिन कुछ समय बाद जब उन सरदार साहब की मां का देहांत हुआ तो मैं भी बाबा के साथ घोड़े पर बैठकर गया। उस दिन वे बोले : बेटा, आज तेरे उस दिन वाले प्रश्न का उत्तर मेरे पास बहुत ज़ोरदार है। हर मां होती है सच्ची कम्युनिस्ट! तुम मां को समझ लो तो कम्युनिज्म समझ आ जाएगा। देख, मैं नकम्मा (निकम्मा) कोई काम नहीं करता। सारा दिन वेहला (बेकार) घूमता रहा। किताबें पढ़ता। साधु बना। मेरे भाई खेत में खटते। लेकिन मां ने सदा सबको एक जैसी रोटी दी, मक्खन में लिबड़-लिबड़ के। सरों का साग दिया घ्यो से तर करके। मैंनूं भी वही दूध का बड़ा छन्ना और खेत में खटने वालों को भी वही सब। एक जैसा पैसा, एक जैसा प्यार।

    वे बोले : हमारे घरों में जो जमाईं ऊंचे पदों पर थे उनको भी वही शगुन और सम्मान दिया। जैसा उनको वैसा ही सरीके-कबीले के कम पढ़े लिखे दामादों को। सबके साथ बराबर। एक भाई ने बड़ी पैळी (खेत) बना ली और एक के पास कम रही तो भी मां के लिए दोनों बराबर रहे। न प्यार में फर्क, न दूध के गलास में और दही के कटोरे में। मुझ नकम्मे को अगर मक्खन बिना रोटी चंगी नहीं लगती थी तो वह हमारे बड़े भाई के हिस्से का भी मक्खन हमें देती थी।

    वे कह रहे थे : और वेखो तुम, तुम्हारी मां भी ऐसी ही होगी और तुम्हारे प्यो की मां भी वैसी ही हाेगी। मां की मां भी और दुनिया की हर मां। हर मां की नीति fairest of all principles होती है : from each according to his ability, to each according to his needs! एबिलिटी के अनुसार काम और ज़रूरत के अनुसार अवदान!

    और कमाल वेखो : मां के इस फै़सले पर न कभी बाप की घुड़की चली और न कभी ताए की गालियां कुछ कर पाईं! बाप तो पूरी हिटलरशाही चलाता है। एक ही घर हिटलरशाही भी तब कुछ ठीक कर पाती है अगर मां का कम्युनिज्म साथ हो। मां भी अगर हिटलर हो जाए तो फिर आंगन का तो हिरोशिमा बनना तय ही है, वेहड़ा भी नागसाकी हो ही जाऊगा!

    वे बोले : देख, घर से मां चली गई, कम्युनिज्म चला गया! बस हिटलरशाही रह गई। वह रुआबदार आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूंज रही है आैर सिख वेशभूषा के कारण उनका ऋषितुल्य चेहरा मेरी आंखों के आगे जीवंत हो जाता है। मानो, वे कह रहे हों : कम्युनिज्म चला गया, मां चली गई! (कम्युनिज्म का अर्थ यहां सीपीआई-सीपीएम आदि के शासन से नहीं लगाया जाए। जैसे कि आरएसएस ब्रैंड विचारधारा या इस्लामिक फंडामेंटलिस्ट या भोलेभाले लोगों को ठगने वाले ईसाइयों की गतिविधियों को हम धर्म नहीं कह सकते।)

    Tribhuvan


  • पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य – सिंह साहब दी ग्रेट

    पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य – सिंह साहब दी ग्रेट

    Bhanwar Meghwanshi

    पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य सिंह साहब दी ग्रेट !

    लल्लू लाल पैदा तो गांव में ही हो गये थे ,पर मजाल कि गामड़पन उनको छू भी ले ।

    अपनी ग्रामीण पहचान से पिंड छुड़ाने के लिए उन्होंने उस जमाने में जैसे तैसे आठवीं पास की ,हुनरमंद इतने थे कि मास्टर के लिए पड़ौसी के खेत से ककड़ी ,भिंडी ,भुट्टे और बालियां चुराकर खुद के खेत की बता कर गुरुदक्षिणा दे आते थे।

    बालक लल्लू की इस दक्षता से प्रभावित मास्टरजी ने उसे 8 वी तक पास किया, बाद में महकमा ए पुलिस ऑफ राजस्थान में लल्लूजी को रंगरूट बनने का अवसर मिल गया।

    जब लल्लूजी बावर्दी हो गए, मूंछे बढ़ा ली ,तनख्वाह भी आने लगी ,शादी भी हो गई, हर चीज़ बदली तो लल्लू लाल जी ने ललन सिंह नाम रख लिया।

    ज़िंदगी बड़ी शान से कटने लगी,जल्दी ही पुलिसिया दांव पेंच और जरूरी कमीनगी उनमें आ गई, सब ठीक चल रहा था, पर घर जाने के मौके कम थे, पुलिस की सर्विस में नये नये भर्ती होने वाले रंगरूटों की शारिरिक भूख की चिंता किसे रहती है, ऊपर से इकहरे बदन के नवजवान ललन सिंह की ड्यूटी अक्सर अफसरों के घरों में लगाई जाने लगी।

    ललन सिंह जल भुनकर राख हो गये, ये भी कोई नौकरी है भला ,जिसमें अफसरों और ऊनकी बीबियों तक के चड्डी बनियान धोने सुखाने पड़ रहे हैं ।

    ललन सिंह ने विद्रोह कर दिया, पुलिस की हड़ताल में शामिल होने का विचार कर लिया,आला अधिकारियों तक बात पहुंची तो उनकी फील्ड पोस्टिंग हो गई, थाने में लगा दिया गया।

    ललन सिंह अफसरों के घरों की बेगारी से मुक्त होने की खुशी से सरोबार ही थे कि उनके जीवन में वो घटित हो गया जो घटना ही नही चाहिये, पर हो गया तो हो गया ,क्या कर सकते थे ।

    तो संतों ,कथा उस रात की है ,जब वर्दी लगाये, टोपी चढ़ाये, जूतों की फ़ीते कसकर बांधे, कांस्टेबल ललन सिंह हाथ में डंडा लिये रात्रि गश्त पर निकले, उनमें देशभक्ति और पत्नी से आसक्ति दोनों ही भाव हिलोरें मार रहे थे, पर वो संस्कारों के वशीभूत होकर आमजन की सुरक्षा में सन्नद्ध हुये एक गली में यहाँ वहाँ विचर रहे थे। तभी किसी सुघड़ गृहस्थ युगल ने रात्रि के प्रथम प्रहर का पहला राष्ट्रीय कार्यक्रम सम्पादित किया और स्वच्छ भारत की समझ से अनजान व्यक्ति की भांति सहायक सामग्री को खिड़की खोलकर गली में फेंक दिया, वो क्या जाने कि सड़क पर ललन सिंह की क्रांतिकारी रूह सदेह विचरण कर रही है।

    पुराना जमाना था, आज जितने फ़्लेवर की सहायक सामग्री कहाँ उपलब्ध होती थी, एक मात्र उपलब्ध साधन परिवार नियोजन वालों द्वारा प्रदत्त गुब्बारा ही था , जो बच्चों के हाथ लगता तो वे मुंह से फुला कर मनोरंजन कर लेते थे,बड़ो के हाथ लगता तो वे अपनी तरह से उसका उपयोग उपभोग करते थे ..

    …. तो महानुभावों, काम मे आया सफेद मटमैला लिजलिजा सा गुब्बारा सीधे ललन सिंह की टोपी पर गिरा और वहीं स्थिर हो गया, ललन शर्म और क्रोध के मारे थर थर कांपने लगे ,उन्होंने बगावत करने की ठान ली।

    वे इससे ज्यादा बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे, सो अनुशासन फ़ासन को धत्ता बताते हुए सीधे हड़ताल में शरीक हो गये, सस्पेंड हुये और जल्दी ही टर्मिनेट भी हो गए, हालांकि जब समझ आई तो लिखित में माफी मांगी, टेसुए बहाये, नाक रगड़ी ,भीख मांगी ,दया की याचना की, पर कोई करतब काम न आया ,घर बैठना पड़ा।

    गांव लौटे तो खाने कमाने का संकट खड़ा हो गया,हराम की कमाई बन्द हो चुकी थी ,तब तक दो तीन शादियां कर चुके ,पहली छोड़कर भाग गई, दूसरी बीमारी से चल बसी ,उसकी मौत को 15 दिन भी नहीं बीते कि तीसरी औरत घर ला बिठाई ,दरअसल विषय भोग के मामले में ललन सिंह खुले सांड ही थे ,उन्हें बिना पत्नी जीवन सारहीन लगता था।

    वैसे भी पुलिस की नौकरी छोड़कर वे साईकल पर दूध बेचने वाले ‘कान्हा’ हो चुके थे ,ऐसे में शादी तो जरूरी थी,सो कर डाली ।

    दूध से भी भला कोई घर चलता है ? कितना ही पानी मिलाओ पानी का पैसा पानी में ही चला जाता है, इसलिये मजदूरी का काम भी करना शुरू कर दिया ,इसी दौरान किसी संस्था के सम्पर्क में आ गए ।

    अचानक ललन सिंह बड़ी बड़ी महान महान बातें करने लगे ,वो किसान नेता हो गये और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भाषण पेलने लगे, हारमोनियम तो बजा लेते ही थे ,भजन और गाने लगे ,इस तरह वे पुलिस, दूधिया ,कारीगर ,मजदूर ,किसान और आध्यात्मिक ,वैचारिक महापुरुष के रूप में स्थापित हो गये ।

    ओशो के एक्टिव मेडिटेशन से शुरू हो कर यू जी कृष्णमूर्ति तक होते हुये गोयनका जी की विपश्यना तक पहुंच गयेे। हालांकि इन सबके बावजूद भी ललन सिंह पक्के खल ,कुटिल और कामी तो बने रहे ।

    उन्होंने अपनी हर उद्दंडता को सिद्धांतों का सुंदर जामा पहनाना सीख लिया, अब वे लाल बाबा हो गये, प्रेम की विशुद्ध व्याख्या करने लगे ,उम्र 60 को पार कर रही थी, पर दैहिक ताप बढ़ता जा रहा था,प्रोटेस्ट ग्रंथि भी बढ़ रही थी, अनायास ही उनमें ‘काम गुरु’ बनने का भाव अत्यंत सघन हो गया, सामाजिक बदलाव के सपने को साकार करने आई मध्यवर्ती युवक युवतियों से वे काम गुरु के रूप में बर्ताव करने लगे,धीरे धीरे उनकी कामुक छवि काफी मजबूत हो गई तो संस्था ने उनसे पिंड छुड़ाने की तरकीब निकाली और ऐसे स्थान पर भेज दिया जहाँ पर वे अपनी ढलती उम्र के प्यार के साथ पूरी बेशर्मी से वक्त गुजारने लगे।

    लल्लू लाल जी उर्फ ललन सिंह उपाख्य लाल बाबा सदैव गांव, गरीबी , किसान ,मजदूरी ,धर्म अध्यात्म और निस्वार्थ भाव की करते पर साथ ही साथ कमीशन मिलने वाले बिजनेस भी कर लेते ,सरकार की हर योजना का फायदा गरीब से पहले उन्होंने उठाया ,खुलकर राजनीति की, समानता, संविधान और लोकतंत्र का हर बात में जिक्र करते,पर व्यवहार में पक्के जातिवादी तत्व थे, पूरी ज़िंदगी उन्होंने बहुत चालाकी से दोहरा जीवन जिया।

    इतना दोगलापन कि लोग उनके मुंह पर ही उन्हें पाखंड की पाठशाला का प्राचार्य कहने लगे पर उन्होंने इस बात का कभी बुरा नहीं माना, वे सतवादी हरिचन्द बन चुके थे ,झूठ को भी सच की भांति बोलने लगे थे और महिलाओं का यौन शोषण भी दैहिक स्वतंत्रता के नाम पर करते थे।बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम के वे जीवंत प्रतीक बन चुके थे।

    लाल सा इस सदी के सबसे महान सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक पाखंडी पुरुष साबित हुये, हालांकि इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया ,उनकी करतूतों पर कोई किताब नहीं लिखी गई।

    संतों ,वैसे तो इस काल्पनिक कथा का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से सीधे सीधे कोई संबंध नहीं है ,पर ऐसे लाल बुझक्कडों से सम्पूर्ण भारत भरा पड़ा है।

    Bhanwar Meghwanshi


    Bhanwar Meghwanshi

  • हीरे जैसा मोती लाल-लाल

    हीरे जैसा मोती लाल-लाल

    Bhanwar Meghwanshi

    हीरे जैसा मोती – लाल लाल !!

    सुना है कि भीलवाड़ा में कोई लाल मोती है ,आर टी आई का धंधा करता है ?

    उसका नाम ,पता और नम्बर किसी के पास हो तो मुहैया करवाएं ,किसी गैंडा स्वामी का पट्टशिष्य बताया जाता है ।

    वैसे तो बेचारा कट्टर अम्बेडकरवादी है ,पर अपनी निजी सगी पत्नी को भूत प्रेत से निजात दिलाने के लिए हर रोज पीर बाबजी की मजार पर धोक लगाता है ।

    क्रांतिकारी इतना कि एक बार टेशन पर भगवा जला दिया, पुलिस केस हो गया ,फिर थानेदार के पांव पकड़कर रोया ,तब जा कर छूटा।

    कभी कभी दलित आंदोलन चलाता है, जय मूलनिवासी भी करता है पर माइन्स में पार्टनर जैन को रखता है ।

    पक्का महिलावादी है ,पहली पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित किया, केस चला ,दोस्तो की मदद से किसी तरह मुक्त हुआ, दूसरी लड़की को फांसा,शादी का झांसा देकर कुछ समय उसका देह लाभ लिया ,अंत में उसे भी छोड़ा और किसी और का पार्टनर बना ,जिससे सात फेरों के चक्कर लगाये, उसका चक्कर यह है कि उसे भूत बाबजी आते हैं।

    मार्केट में मोती बड़ा क्रांतिकारी है, मिशन की बात करता है, बाबा साहब के कारवां को आगे ले जाने का संकल्प करता है, पर व्यस्त रहता है, क्योंकि ज्यादातर टाईम घर मे भूत बनी पत्नी की चरण सेवा में लगा रहता है।

    यूँ बड़ा अच्छा लड़का है ,बड़े सामाजिक ठेकेदार का घोषित वारिस है ,आज तक जहां जहां से भी सूचना मांगी ,कार्यवाही नहीं करवाई, तोड़ बट्टा कर लिया ,इसीसे रोजी रोटी चलती है मोती की ।

    यह होनहार क्रांतिकारी युवक 7 मई शाम से करेड़ा कस्बे से गायब है, निकटवर्ती गोरधनपुरा के लोग उसकी खोज में लगे हैं, कहीं नजर आये तो जानकारी दीजियेगा।

    भैया मोती ,इस तरह नाराज़ नहीं होते ,तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा ,तुम जिले में अपना ” आर टी आई से कमाई ” का धंधा आराम से चला सकते हो।

    लौट आओ !!

    डिस्क्लेमर – इस कथा का किसी भी जीवित ,मृत या मूर्छित ,अर्धमूर्छित मोती लाल नामक व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है, मोती भक्त नाराज होकर खुद को और अपने आका को एक्सपोज न करें ।

    Bhanwar Meghwanshi


  • घिसी हुई चप्पल

    घिसी हुई चप्पल

    Mukesh Kumar Sinha

    घिसी हुई चप्पल 
    पड़ी थी पायताने में 
    थी एक उलटी पड़ी 
    एक थी सीधी

    औंधा पडा था चेहरा मेरा 
    तकिये में दबी पड़ी थी आँखे 
    था आँखे मीचे 
    सोच रहा था देखूं कोई हसीं सपना 
    पर बंद आँखों के परिदृश्य में 
    नीचे पड़ी 
    घिसते चप्पल की बेरुखी 
    दिख ही जा रही थी 
    बता दे रही थी, अपने तलवे के प्रति बेरुखापन

    तभी खुल गयी आँख 
    खुद से खुद ने कहा 
    लगता है जाना है किसी यात्रा पर 
    तभी तो दिख रही है चप्पल 
    पर ये टूटी चप्पल ही क्यों 
    क्योंकि बता रही मुझे 
    मेरे स्थिति की परिस्थिति

    साम्राज्यवाद के प्रतीक पलंग पर लेटे हुए 
    मजदूरवाद को जीवंत करता हुआ 
    घिसा हुआ चप्पल 
    बार बार मस्तिष्क में डेरा जमा कर 
    खुलते बंद आँखों में पर्दा हटाते हुए 
    बता रहा था 
    कि चलो किसी यात्रा पर 
    झंडे का डंडा पकडे 
    ताकि सार्थक क़दमों के 
    एक दो तीन चार के कदमताल के साथ 
    हम भी समझ पायें
    चप्पल की अहमियत

    एक पल को मुस्काते हुए 
    हुई इच्छा कि खुद को कहूँ 
    मत चलो नंगे पाँव 
    चुभ जायेंगे कील या कोई नश्तर 
    पर 
    वीर तुम बढे चलो – के देशभक्ति शब्दों से 
    मर्द के दर्द को पी जाने व्यथा 
    आ गयी चेहरे पर

    नींद टूट चुकी थी
    पहन ली थी चप्पल
    जा रहा था ………!
    नए चप्पल को खरीदने
    ताकि
    चेहरे की इज्जत बरकरार रहे पांवों में !

    Mukesh Kumar Sinha


    Mukesh Kumar Sinha

  • ऐसा लगा जैसे मैंने पहाड़ को थोड़ा भी नहीं समझा है

    ऐसा लगा जैसे मैंने पहाड़ को थोड़ा भी नहीं समझा है

    Akhilesh Pradhan 

     रोज की तरह कल नंदा देवी मंदिर परिसर जाना हुआ। नंदा देवी मंदिर मुनस्यारी के डानाधार क्षेत्र में अवस्थित है। तो जब मैं मंदिर से नीचे उतर रहा था तो मंदिर परिसर के मुख्य द्वार पर एक पोस्टर लगा हुआ था, वह पोस्टर सप्ताह भर पहले हुए किसी इवेंट से संबंधित था। उस पोस्टर को वहाँ चिपका देखकर मेरे मन में दो ख्याल आए, पहला यह कि ये कार्यक्रम तो कब का समाप्त हो चुका है, तो इसे यहाँ से निकाला जा सकता है, दूसरा यह कि मंदिर परिसर के मुख्य द्वार पर ये कहीं से भी सही नहीं लग रहा है, यूं कहें कि अशोभनीय सा लगा।
     
    अब जैसे ही मैं उस पोस्टर को वहाँ से निकाल‌ रहा था, उतने ही समय वहाँ से दो महिलाएँ गुजर रही थी, उन्होंने मुझे आश्चर्य भाव से कहा – भैया आप पोस्टर को क्यों निकाल रहे हैं। वैसे पहाड़ के लोग आश्चर्य भाव से ही पूछते हैं, गुस्से या धमकाने का भाव आपको मिलेगा ही नहीं।
    मैंने उन्हें जवाब में कहा – दीदी ये प्रोग्राम तो हो चुका है।
    फिर उन्होंने कहा – फिर भी क्यों निकाला भैया।
    मैं उनके इस सवाल‌ से चुप सा हो गया, मैंने आंखे फेर ली और वहीं हमारे एक दोस्त की गाड़ी में बैठकर वहाँ से निकल गया।
     
    गाड़ी एक किलोमीटर से अधिक चल चुकी थी, मुझे अचानक महसूस हुआ कि ये मैंने क्या कर दिया। मुझे उनका बोलने का तरीका,उनके चेहरे के भाव याद आने लगे। फिर मैंने अपने दोस्त को बहाना मारकर गाड़ी रोकने को कहा और उसे आगे जाने को‌ कह दिया। अब वहाँ से मैं पैदल वापस उन दो महिलाओं के पास गया। मुझे पता नहीं क्यों ऐसा महसूस हो रहा था कि शायद मेरे द्वारा उन्हें चोट पहुंची है। मैं जब उनके पास पहुंचा तो मैंने उन्हें पहाड़ी परंपरा के अनुसार दोनों हाथों से नमस्ते करते हुए कहा – दीदी, मैं कोई बाहर से आने वाला टूरिस्ट जैसा नहीं हूं, पिछले चार साल से यहां आ रहा हूं, यहाँ बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता भी हूं, यहाँ के लोगों के जीवनस्तर को सुधारने के लिए प्रयास भी कर रहा हूं, मुझे टूरिस्ट मत समझना दीदी, मैं तो अब यहीं का‌ हो गया हूं। शायद मेरे पोस्टर निकालने से आपको अच्छा नहीं लगा होगा, मुझे माफ कर दीजिएगा। मैं उसे वापस फिर से वहीं चिपका देता हूं, इसलिए मैं वापस लौटकर आया हूं।
     
    दीदी ने मुस्कुराते हुए जवाब में कहा – अरे! नहीं भैया, वो तो पुराना हो चुका है, उसको और क्या चिपकाना हुआ, रहने दो। फिर उन्होंने चिंता जाहिर करने के भाव से कहा – लोग तो इन पहाड़ों का पता नहीं क्या क्या कर जाते हैं भैया। बाहर से लोग आकर फूल, पौधे तहस नहस करते हैं, तोड़कर ले जाते हैं। पता नहीं क्या क्या उल्टा पुल्टा जो करते हैं लोग, कैसा जो मजा आता होगा उनको ऐसा करके। ऐसा कहते हुए उन्होंने एक‌ विस्मयकारी मुस्कुराहट फेरी और उतने ही समय वहाँ सामान जोहने वाली मैक्स की एक गाड़ी आ रही थी, उन्होंने हाथ फेरते हुए उस गाड़ी को रोका और दौड़ते हंसते उसमें लिफ्ट लेकर वो चली गईं। उस मैक्स की गाड़ी के ठीक पीछे से जो एक टूरिस्ट गाड़ी आ रही थी, उसमें बैठे कुछ लोग इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे, मुझे पता नहीं क्यों उन टूरिस्ट लोगों के इस तरीके को देखकर हंसी आ गई।

    आपको लग रहा होगा कि एक पुराने पोस्टर फाड़ने को लेकर, यानि इतनी छोटी सी बात के लिए कौन इतनी मेहनत करे। ये भी कोई बात हुई क्या। लेकिन आप पहाड़ को समझने की कोशिश करेंगे तो लगेगा कि ये ध्यान देने योग्य बात है। मैंने पहाड़ी लोगों के मन को देखा है, वे अपने में मस्त रहते हैं, वे आपसे कभी नाराज नहीं होंगे, वे आपको बस प्रेमभाव से बोल देंगे, अब वो हम पर होता है कि हम सही गलत समझ पाते हैं या नहीं। काश, काश मुझमें ये क्षमता होती कि दीदी के उस अपनेपन और सरलता से परिपूर्ण भाषायी अंदाज, उस बोलने के तरीके को आपके सामने लिख कर बता पाता, काश मैं भाषायी विस्तार दे पाता उनके चेहरे की उस मासूमियत को। आप भी कहते कि दुनिया में आज भी ऐसी चीजें बची हुई हैं क्या? खैर..।

    उस दीदी ने जब मुझसे कहा कि पोस्टर का डेट जा चुका है, फिर भी आपने क्यों फाड़ा भैया? इसका सीधा सा अर्थ यह था कि मुझे कोई हक नहीं बनता है कि मैं उस पोस्टर को‌ वहाँ से हटाऊं। यानि उन्होंने तो मुझे अन्य लोगों की तरह एक बाहरी असभ्य टूरिस्ट ही समझा होगा। उनके ऐसा सवाल करने का सिर्फ और सिर्फ यही अर्थ हुआ कि उस पोस्टर को निकालना कम‌ से कम मेरे अधिकार क्षेत्र में तो नहीं था। यानि मैं कौन हुआ उनके सही गलत का निर्धारण करने वाला। असल में बात सिर्फ उस टुच्चे से पोस्टर को हटाने की नहीं है, पिछले कुछ सालों से जो बाहर से यहाँ टूरिस्ट आते थे, उन्होंने खूब उत्पात मचाया हुआ है, कोई खेतों में राजमा, जड़ी बूटी आदि की पौध को उखाड़ कर ले जाते, फल हुआ नहीं रहता था और तोड़ देते। बाहरी लोगों के स्वार्थ और लिप्सा की वजह से ऐसी चीजें लगातार होती आई है तो लोगों के मन में भी यही बैठ गया है कि अधिकतर बाहर मैदानों से आने वाले टूरिस्ट तो ऐसे ही होते हैं।

    मैं पूरे भरोसे से कहता हूं कि अगर इतिहास में ऐसी बदमाशियां नहीं हुई होती तो उस दीदी को मेरे पोस्टर फाड़ने पर सवाल नहीं करना पड़ता। उनका मुझे सवाल करना इस बात का संकेत था कि – –
    -आप कैसे से जो हो गये हैं,
    -पहाड़ को भी अपने शहरों की तरह समझने लगते हैं,
    -आपके बस का नहीं हुआ हम‌ पहाड़ी लोगों के मन को समझना।

    Akhilesh Pradhan


    Akhilesh Pradhan

  • सदफ़

    सदफ़

    Mohd Zahid

    सदफ़ उस सुबह बहुत बेचैन थी , कुछ देर बाद ही उसका तलाक होने वाला था , उसकी सारी खुशियाँ ज़िंदगी भर “बाँझ” के उलहने में दब कर मर जाने वाली थी।

    वह अपनी अम्मी के यहाँ कमरा बंद करके रात भर रोती रही , खुदकुशी का ख्याल आया पर इस्लाम में खुदकुशी “हराम” है , ज़िन्दगी के इस हालात में आकर सदफ़ के अंदर मौत का डर खत्म हो चुका था पर वह हराम मौत नहीं मरना चाहती थी।

    चार साल की शादी , लड़के की माँ ने एक नज़र कहीं देखा और रिश्ता भेज दिया , सदफ़ की उम्र भी नहीं थी परन्तु एक शानदार रिश्ते के लालच में सदफ़ के माँ बाप ने सदफ़ को शादी के लिए मना लिया।

    शादी के 2 साल बाद तक , सदफ़ की ज़िन्दगी में बहार ही बहार , गुलशन ही गुलशन पर सदफ़ की सास को सदफ़ अब खटकने लगी।

    दो साल में कोई बच्चा नहीं हुआ और सदफ़ की सास के मुताबिक यह सदफ़ की कमी थी।

    सदफ़ का शौहर “रेहान” , यूं तो सदफ़ को बहुत मानता परन्तु अपनी माँ के सामने उसकी आवाज़ नहीं निकलती। एक शानदार नौकरी छोड़ कर अरबों की खानदानी संपत्ती देखने “रेहान” घर आ गया और सदफ़ की मुसीबतें शुरू हो गयीं।

    रोज़ बच्चे का ताना , दिन गुज़रता गया , हफ्ते और महीने गुज़रते गये , और सास की सदफ़ पर नफरतें बढ़ती गयीं , वजह वही कि चार साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ।

    सास के मानसिक उत्पीड़न से थकहार कर सदफ़ अपने माँ बाप के घर आ गयी और दो दिन बाद ही सास ने बेटे को सदफ़ को तलाक देकर दूसरी शादी का हुक्म सुना दिया।

    “सदफ़ बाँझ है , तलाक देकर विदा करो , दूसरी शादी ही अब एक वाहिद उपाय है।

    उस शाम “तलाक” की खबर से सदफ़ के घर कोहराम मच गया , बाप भाई भागे हुए सदफ़ के ससुराल गये परन्तु नतीज़ा वही ज़ीरो।

    और अब वह सुबह सदफ़ के सामने थी।

    तलाक हो गया , रेहान की चंद दिनों में धूमधाम से दूसरी शादी हो गयी और सदफ़ बाँझ बन कर समाज की नज़रों में घृणा की पात्र हो गयी।

    कुछ वक्त गुज़रा , सदफ़ की खाला अपनी बहन की इस तकलीफ़ को देख ना सकीं , जो सदफ़ उनके हाथों पली बढ़ी वह सदफ़ आज टूट रही है बिखर रही है।

    सदफ़ की ख़ाला ने अपने बेटे “अनवर” से अपनी ज़िन्दगी की एक वाहिद खुशी माँगी , अनवर ने सदफ़ से निकाह कर लिया।

    वक्त फिर गुज़रता गया , सदफ़ को इस शादी से जुड़वा बच्चे हुए और दोनों बेटे। सदफ़ की ज़िन्दगी फिर खुशियों से भर गयी , शान शौकत वैसी नहीं पर खुशियाँ उससे कहीं अधिक।

    2 साल बाद एक शादी में अचानक सदफ़ “रेहान” के सामने आ गयी , हड़बड़ाहट में उसकी नज़र रेहान की माँ पर पड़ी , दोनों अभी तक अकेले थे।

    रेहान दूसरी शादी के तीन साल बाद भी बाप बनने के लिए तरस रहा है , सदफ़ उनसे किनारा करते हुए हाल में अपने बच्चों के साथ बैठी , वहाँ भी रेहान की माँ पहुंच गयी , वह बात करना चाहती थीं।

    पर सदफ़ हमेशा खामोश थी , अब भी खामोश थी। पर दूसरी शादी के बावजूद रेहान के औलाद ना होने से वह मायूस थी।

    मेरी बचपन की दोस्त वर्षों बाद आज मिली तो उसकी यह कहानी उसकी ही ज़ुबानी आज सुनी , उसके दिल में है कि वह अपनी एक औलाद “रेहान” को सौंप दे।

    सोचा उसकी कहानी नाम बदलकर आप सब दोस्तों से शेयर कर लूं और सदफ़ के फैसले पर आपकी राय भी जान लूं फिर आपको सदफ़ का लिया फैसला बताउंगा।


    Mohd Zahid


    Mohd Zahid

  • ईमानदारी से जीना मुश्किल

    ईमानदारी से जीना मुश्किल

    Vijendra Diwach

    गरीब आदमी की गरीबी भी उसका मजाक उङाती,
    उसकी रूखी सूखी रोटी भी कहती है मुझे खा के दिखा,
    मन कहता है रोटी तु रूखी सूखी है तेरे को कैसे खाऊंगा,
    आमाश्य कहता है आने दे मै भूखे पेट में तो पत्थर भी पचा लूंगा।
    गरीब रूखा सुखा खाकर इसे ही संतुलित आहार मान लेते हैं,
    बस अपने परिश्रम के बल पर जो मिल जाये उसे ही छप्पन भोग जान लेते हैं।

    गरीब आदमी मेहनत करके भी फाकाकशी का जीवन जीता है,
    ईमानदार हो के भी इस सभ्य कहे जाने वाले समाज में अजनबी बन के रहता है।

    गरीब के नाते रिश्तेदार उससे दूर ही रहते हैं,
    कभी बातचीत हो जाये या फिर कहीं मुलाकात,
    बिना हाल चाल जाने ही अपनी पचासों समस्यायें सुनायेगें की ये कहीं हम से कुछ मदद ना मांग ले
    और इस तरह उस गरीब से भी गरीब होने का नाटक कर पीछा छुटाते हैं।

    सरकारें ये कैसा डवलपमेन्ट कर रही हैं,
    मेट्रो ट्रेने तो चल रही हैं
    लेकिन इन्हीं मेट्रो के पूलियों के नीचे इंसानी जिन्दगियां नरकीय जीवन जी रही है,


    इंसान अपनों को ही भूलाकर कहां जा रहा है?
    इक दिन सब को मरना है
    फिर क्यों इस दुनिया में ये तेरा ये मेरा फैलाया जा रहा है।

    इस चालू चपंडर दुनिया में झूठे,धोखेबाजों और बेइमानों का का बोलबाला बढता जा रहा है, 
    इस दुनिया में शरीफ होकर जीना धीरें धीरें मुश्किल होता जा रहा है।

    Vijendra Diwach


    Vijendra Diwach

  • गाँव बंद

    गाँव बंद

    Nishant Rana

    भारत में अधिकांश बंद राजनैतिक पार्टियों द्वारा दूसरी पार्टियों के विरोध में लगाए जाते रहे है या फिर व्यपारियों द्वारा अपने हित को साधने के लिए। व्यपारी वर्ग भले ही जीवन भर एक ही राजनैतिक पार्टी को वोट देता रहे लेकिन सरकारी नीतियों में अपने हितों में जरा भी चूक देखता है तो हड़ताल या बंद के द्वारा अपनी बात रखता है।

    उस भारत बंद का मतलब होता है केवल शहर बंद गांवों में इस तरह की बंद की खबरे भी पहुँच जाए तो वह बहुत है। गांवों में राजनैतिक पार्टियों या व्यपारियों के आह्वान पर बंद नहीं होते आए है।

    यहां व्यापारी वर्ग से मतलब उत्पादन करने वाले वर्ग से नहीं है। किसान-मजदूर वर्ग उत्पादन से सीधा जुड़ा है लेकिन इन्हें व्यापारी ही नहीं माना जाता रहा क्योंकि हमारे यहां किसान प्राकृतिक संसाधन, घर , सोंझ , पशु धन, खाने पीने के मामले में बहुत समर्द्ध हो सकता है लेकिन रुपए वाले बाजार में उसे लगातार कमजोर और लूटा ही गया है। और हमारे समाज के अनुसार व्यापारी वह होता है जो लोगों को मूर्ख बना सके, शोषण कर सके तिगड़म बाजी कर के रुपए बना सके।

    इस तरह के शोषण एवं लूट के लिए हमारे समाज बाकायदा प्रशासन वर्ग और पूंजीपति वर्ग का मिला जुला सिस्टम दिखाई पड़ता है। खास जाति वर्गों के लिए इस सिस्टम में एंट्री जल्दी है बाकी जातियों के लिए वह थोड़ी दुश्वर है। (फिलहाल लेख का विषय यह नहीं है।) सिस्टम के अंदर कोई भी हो अंततः वह उस तंत्र के हिसाब से ही कार्य करता है, जिसके लिए तंत्र बनाया गया है। इस बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि फांसी लगाने वाला जल्लाद कितना भी अच्छे मन का व्यक्ति लेकिन उसे उस सिस्टम का हिस्सा रहना है तो उसे अपनी संवेदंशीलता लगातार खत्म करते हुए तंत्र के कहने पर बिना सोचे समझे तख्ते पर आए व्यक्ति को फांसी देनी ही देनी है।

    किसान और मजदूर यह सब नहीं करता वह बाजार को उत्पाद बेचते हुए भी हाथ जोड़ता है और खरीदते हुए भी शोषण ही करवाता है। चूंकि वह लगातार उत्पादन करता है। बाजार जाता है इसलिए उसके शोषण की गति कम दिखाई देती है जबकि व्यापारी वर्ग तेजी से फलता फूलता जाता है।

    दूसरी हड़ताल अधिकतर सरकारी कर्मचारियों द्वारा अपने वेतन-भत्ते, सुविधाओं आदि को बढाने के लिए की जाती है।

    सरकारी नौकरी हमारे यहां कैरियर का ही पर्याय हो चुकी है क्योंकि किसान-मजदूर लोगों की सेवा नीति निर्धारण के लिए, कामों के प्रबंधन के लिए रखा जाता है उनके पास अनन्तः कुछ नहीं बचता लेकिन जिन्हें उन्हीं के उत्पादों से निकली तनख्वाह पर रखा जाता है वह उसी किसान मजदूर वर्ग को गांव के आदमी को कीड़ा मकोड़ा समझते है। एक अदना सा कर्मचारी भी किसान को गरियाने एवं शोषण करने के अधिकार रखता है। तनख्वाह के मामले में भी वह कंपनी के मुख्य मालिक (किसान-मजदूर) वर्ग से तुलनात्मक रूप से कई गुना का अंतर है। सुविधाओं में कई गुना का अंतर है। जबकि जिनके लिए इन्हें मुख्यत: काम पर रखा जाता है वह सब लगातार उत्पादन एवं लाभ के मामले में माइनस की स्थिति है।

    चलते-चलते :

    इस तरह के कुतर्क लगातार दिए जाते है कि देश की अर्थव्यस्था पूंजीपतियों , व्यापारी वर्ग के टैक्स आदि से चलती है। तुर्रा यह है कि देश को यहीं चला रहे है।
    गांव बंद का समर्थन सबसे अधिक इन्ही कुतर्कों की वजह से है यदि देश की अर्थव्यस्था की इनके टैक्स से चल रही है तब इनका पूरा का पूरा व्यपार ही गांवों की लूट पर खड़ा है उसका क्या ! किसान मजदूर वर्ग भी अपनी सभी खरीद पर डायरेक्ट नहीं तो इनडायरेक्ट टैक्स चुकाता ही है। व्यपारी वर्ग अपने चुकाने वाले टैक्स को भी इन्हीं लोगों से अपने लाभ रूप में वसूलता है जबकि किसान को ऐसी कोई सुविधा नहीं है।
    लूटतंत्र में शामिल लोग मोटी चमड़ी के लोग है अपने पूर्वाग्रहों में मस्त रहते है। उनके लिए लोगों की जागरूकता का मतलब है कि जिन राजनैतिक पार्टियों को लाभ के लिए वह वोट देते है लोग भी जाग्रत हो कर उनकी इसी बात का अनुकरण करे एवं उन्ही नीतियों का समर्थन करे जिनसे केवल उन्हें लाभ पहुँचता हो। कभी वह इस पक्ष के बारे मे सोच ही नहीं सकते कि जो निर्माता है वह सबसे अधिक लाभ की स्थिति में होना चाहिए।
    गांव बंद इसलिए ही होने चाहिए ताकि यह स्थिति साफ हो कि आप गांवों की वजह से है न कि गांव आपके वजह से।
    शहरी चकाचौंध में मुंदी हुई आंखों को खोलने का और कोई रास्ता भी नहीं है। भूखें मरने की चिंता न कीजियेगा किसान आपको अपनी न्यूनतम संवेदनशीलता में भी भूखा नहीं मरने देगा।

    Nishant Rana

    Nishant Rana


  • अगर आप किसी एक राजनीतिक दल के खेमे में हैं, उसकी ग़लतियों का महिमामंडन करते हैं और ठीक वैसी ही ग़लती पर विरोधी का उपहास उड़ाते हैं तो आप में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिसे लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है।

    अगर आप किसी एक राजनीतिक दल के खेमे में हैं, उसकी ग़लतियों का महिमामंडन करते हैं और ठीक वैसी ही ग़लती पर विरोधी का उपहास उड़ाते हैं तो आप में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिसे लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है।

    Tribhuvan


    इस समय देश में तीन तरह के नागरिक हैं।

    एक वे जिन्हें जो कुछ कर्नाटक में हुआ, वह बहुत अच्छा लग रहा है। ये सबके सब या तो कांग्रेसी माइंडसेट के लोग हैं या फिर भाजपा के विरोधी लोग हैं। इन लोगों का देश प्रेम या लोकतंत्र से कोई लेनादेना नहीं है। ये सत्तावादी लोग हैं या फिर बड़ी पार्टियों के चमचे लोग हैं।

    एक वे जिन्हें वह अच्छा लगा, जो बिहार, गोवा, मेघालय, जम्मू और कश्मीर में आदि में हुआ और उन्हें सिर्फ़ कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस का सरकार बनाना बुरा लगा, ये भाजपा और आरएसएस के लोग हैं। इन लोगों का देश प्रेम या लोकतंत्र से कोई लेनादेना नहीं है। ये भी सत्तावादी लोग हैं या फिर बड़ी पार्टियों के चमचा लोग हैं। इनका भी अपना कोई विवेक नहीं हैं आैर इनकी हालत हांकी जा रही भेड़ाें से कुछ अलग नहीं है, जैसा कि बिलकुल ऊपर की श्रेणी वाले लेागों के साथ है। इसमें आप दिल्ली की आम आदमी पार्टी, बहन मायावती की बसपा, वामपंथी दलों या अकाली मित्रों या अन्ना-वन्नाद्रमुक किसी को भी ले शामिल कर सकते हैं। कोई और भी दल संभव है। आरजेडी, जेडीयू, जेडीएस आदि आदि। कोई भी। सबके सब।

    इस समय देश को एक तीसरी तरह की श्रेणी के लाेगों की ज़रूरत है। जो ग़लत को ग़लत और अनैतिक को अनैतिक कह सकें। ये देश में न के बराबर लोग हैं। अगर हमें अपने देश और देश की व्यवस्था को अच्छा बनाना है तो इस श्रेणी में हमें ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की ज़रूरत है। चमचे बनो तो देश के बनो। मानवता के बनो। इस धरती के बनो। राजनीतिक व्यवस्था में अनैतिकता, झूठ-फ़रेब और आपराधिक मानसिकता से वर्चस्व स्थापित करके सत्ता हासिल करने वाले लिप्सुओं के पीछे देश को बर्बाद करने के षडयंत्र में क्याें शामिल हो रहे हो?

    अगर राजस्थान में 51 साल पहले लोकतंत्र को प्रहसन बना देने वाली कांग्रेस आपके सामने है तो गोवा, बिहार, मेघालय और कर्नाटक में लोकतंत्र का चीरहरण करने वाली भाजपा भी आपके सामने है। क्या इनमें कोई फ़र्क है?

    अगर पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें पांच साल पहले बढ़ना ग़लत था तो वह आज भी है। अगर किसानों की दुर्दशा के लिए दस साल पहले प्रश्न उठ रहे थे तो वे आज भी उठने चाहिए। अगर पंद्रह साल पहले नोटबंद करना देश के साथ खिलवाड़ करना था तो वह आज भी है। अगर आज से बीस साल पहले किसी आतंकवादी घटना पर हमें सरकार बिना रीढ़ और बिना हड़डी की एक कमज़ोर अनैतिक लगती थी तो वह आज भी है। आख़िर ऐसा क्या है कि हम नागरिकों की बुद्धि में कोई राजनीतिक दल या कोई विचारधारा ऐसा इंजेक्शन लगा देती है कि आपके या हमारे विवेक और राज्यपाल के विवेक में कोई फ़र्क नहीं रह जाता? और आप ऐसा आचरण करने लगते हैं, मानो आप किसी के खिलौने, किसी की कठपुतली या किसी मदारी के सिखाए हुए बंदर हों! क्या ऐसा होना चाहिए। ऐसे जितने भी मेरे मित्र या बंधु हैं, सबसके सब ज़हीन और जीनियस हैं, लेकिन पता नहीं क्यों वे किसी के अनचाने या अनचाहे ही दुष्टतापूर्ण कामों के प्रशंसक बन जाते हैं।

    आओ, मित्रो, हम सब देश के सजग नागरिक बनें, तटस्थ रहें और ग़लत को ग़लत कहें। अगर हम में यह साहस नहीं है और हम किसी एक के खेमे में हैं तो हम में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिस लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है। और हां, याद रखें कि भेड़ तो भेड़ है। उसे कुदरत ने बनाया ही वैसा है। लेकिन आपको तो प्रकृति ने एक बहुत बेहतरीन मस्तिष्क और एक अतुलनीय हृदय दिया हुआ है, जिसे अच्छे और बुरे की पूरी पहचान करने की क्षमता से आपूरित किया गया है। और फिर भी आप बहुत गर्व के साथ किसी खेमे की भेड़ बनना पसंद करते हैं तो यह जानना दिलचस्प होगा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

    और अगर आप शिक्षक, वकील, पत्रकार, लेखक, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायाधीश आदि में से कुछ हैं तो यह और भी शर्मनाक है।

    क्षमा करें, मुझे यह कड़ी भाषा इस्तेमाल करने की इज़ाज़त अपनी भारत माता से मिली हुई है।

    Tribhuvan


    Credits: Tribhuvan’s Facebook

  • भारत की एकमात्र समस्या – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    भारत की एकमात्र समस्या – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत का अध्यात्म असल में एक पागलखाना है, एक ख़ास तरह का आधुनिक षड्यंत्र है जिसके सहारे पुराने शोषक धर्म और सामाजिक संरचना को नई ताकत और जिन्दगी दी जाती है.

    कई लोगों ने भारत में सामाजिक क्रान्ति की संभावना के नष्ट होते रहने के संबंध में जो विश्लेषण दिया है वो कहता है कि भारत का धर्म इसके लिए जिम्मेदार है. निश्चित ही भारत का धर्म प्रतिक्रान्ति का हथियार है लेकिन सर उपर उपर नजर आने वाले इस धर्म को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह ठीक नहीं है.

    धर्म मोटे अर्थों में कर्मकांड, विश्वास और पूजा पद्धति इत्यादि इत्यादि का जमघट होता है, ये स्वयं अपना स्त्रोत नहीं है बल्कि ये भी किसी अन्य गहरी विधा के गर्भ से जन्मता है. ठीक से कहें तो भारतीय धर्म का मूल उसके भाववादी दर्शन में है.

    इस लोक के शोषण और सच्चाइयों से भाग कर परलोक में परम शान्ति या मोक्ष को खोजते हुए जन्म मरण (भवचक्र) से बाहर निकलना इस दर्शन का इसका मूल लक्ष्य है. ऐसे लक्ष्य असल में इस जमीन पर चल रहे जीवन को सम्मान नहीं देते बल्कि किसी आसमानी लोक या हवा हवाई स्वर्ग में या मोक्ष या बैकुंठ को सम्मान देते हैं.

    जो लोग ये कहते हैं की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना इस जमीन पर घट रहे जीवन के खिलाफ है वे बहुत हद तक सही हैं. इसके बावजूद ये वक्तव्य अधूरा है. मेरा गहरा अनुभव ये है की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना भी तभी उठती है जबकि आपके समाज में जमीनी जीवन के खिलाफ एक निर्णायक मनोवृत्ति बन चुकी हो.

    उदाहरण के लिए भारत में सामाजिक और लौकिक जीवन की जमीनी सच्चाइयों को छुपाते हुए उनमे पल रही सडांध और बीमारी को लगातार दबाते हुए समाज में यथास्थिति बनाये रखना ही भारत की परम्परा रही है. भारत में पुरोहित वर्ग, शासक वर्ग और व्यापारी वर्ग ने हमेशा से एक ख़ास तरह की सामाजिक संरचना को मजबूत बनाया है.

    इस संरचना में अस्सी प्रतिशत कामगारों मजदूरों, स्त्रीयों और अछूतों को पूरी व्यवस्था के लाभों से वंचित रखने का काम किया है. यह काम सैनिक बल से या लठैतों के जरिये नहीं किया जा सकता. इसे सामाजिक धार्मिक विश्वास के जरिये ही किया जा सकता है. इस ख़ास तरह की अमानवीय सामाजिक संरचना को बनाये रखने के लिए धर्म ने बड़ी चतुराई से हजारों साल तक बढिया काम किया है.

    भारत के धर्म ने कर्मकांडों और त्योहारों के जरिये इन अस्सी प्रतिशत बहुजनों के बीच निश्चित ही एक ख़ास तरह की गुलामी, कायरता और भाग्यवाद को फैलाया है. विशेष रूप से बहुजनों की स्त्रीयों को इस धर्म ने व्रत उपवासों, त्योहारों आदि के जरिये एकदम गुलाम और कायर बनाया हुआ है.

    ये गुलाम और डरपोक स्त्रीयां एक डरपोक कौम को जन्म देती हैं जो किसी भी बदलाव या तर्क की बात से डरते हैं. ये अस्सी प्रतिशत डरपोक और दिशाहीन लोग वही हैं जिन्हें सामाजिक क्रान्ति की सबसे ज्यादा जरूरत है लेकिन ये खुद उस क्रान्ति को रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं.

    भारतीय धर्म को और उसके स्वाभाविक परिणाम को इस तरह देखना बहुत आसान है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है. लेकिन मेरा अनुभव ये बताता है कि हमें धर्म के बाह्य कर्मकांडीय स्वरूप पर प्रश्न उठाने से या उसे ध्वस्त कर देने भर से कोई स्थाई समाधान नहीं मिलने वाला है. बाहरी कर्मकांड रुक भी जाएँ तो यह जहरीली अमरबेल फिर से पनप जायेगी.

    इसका जीवन स्त्रोत कहीं और छुपा हुआ है. आप गौर कीजिये इस समाज के पढ़े लिखे तबके पर, ये शहरी मध्यमवर्ग तबका धर्म के बाहरी कर्मकांड जैसे कि यज्ञ, हवन, बलि, श्राद्ध, तीर्थयात्रा, दान दक्षिणा, ब्राह्मण भोज आदि नहीं करता है. ये तबका – जिसमे सुशिक्षित इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, प्रबन्धक, और हर तरह के पेशेवर और नई पीढी के युवा या अप्रवासी भारतीय आते हैं – वे ग्रामीण या कस्बाई कर्मकांड नहीं करते हैं. वे लोग बहुत मौकों पर प्रगतिशील भी नजर आते हैं.

    अक्सर वे पार्टी इत्यादि में शराब और मांस का सेवन करते हुए मिल जाते हैं. यही लोग शहरों में लिव इन रिलेशन और समलैंगिक शादियों सहित लोकतंत्र, साम्यवाद, क्रान्ति आदि के झंडे भी लहराता हुआ मिल जायेंगे. ऐसा करते हुए वे खुद की और दूसरों की नजरों में स्वयं को “गैर-रुढ़िवादी” सिद्ध कर देते हैं. लेकिन आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म में इनका विश्वास कभी कम नहीं होता.

    सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब ये हुआ कि ये प्रगतिशील युवा वर्ग सिगरेट शराब और मांस सहित फ्री सेक्स के बावजूद पूरी ठसक के साथ अंदर से धार्मिक बना रहता है और इस सड़ी हुई सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखता है. ये एक विचित्र लेकिन परेशान करने वाला तथ्य है.

    इसका ये अर्थ हुआ कि बाहरी आडंबरों से भारत के इस धर्म का या इस धर्म के वास्तविक जहर का कोई अधिक सम्बन्ध नहीं है. बल्कि बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों से भी कहीं अधिक गहराई में छुपा इसका जहरीला अध्यात्म या रहस्यवाद ही इसका असली जीवन स्त्रोत है.

    उसी स्त्रोत से जहर का वो फव्वारा फूटता है जो हर दौर में हर पीढ़ी में पूरे भारत को पागल बनाये रखता है. इस बात को गहराई से समझना होगा, ये थोड़ी उलझी हुई बात है.

    असल में भारत का धर्म कोई एकरूप बात नहीं है इसके हजारों विभिन्न रंग और चेहरे हैं. इसी को विविधता कहके महिमंडित किया जाता है. लेकिन इन विविध रूपों के भीतर एक सा जहर लहू बनके बहता है. वह लहू है इसकी ‘आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की मान्यता’. इसी जहरीली त्रिमूर्ति के गर्भ से परलोक की महिमा और इस लोक की निंदा जन्म लेती है.

    बाहरी आडंबर, कर्मकांड कुछ भी हों अंदर ही अंदर इनमे कर्म का विस्तारित सिद्धांत (इस जन्म का कर्म अगले जन्म को तय करेगा) चलता रहता है. इसी में लपेट कर दान दक्षिणा, पुण्य, पाप आदि की सलाहकारी भी चलती रहती है, इसी से ध्यान साधना के तरीके बनाये जाते हैं और लोगों को व्यर्थ के तन्त्र मन्त्र ध्यान भजन में उलझाया जाता है.

    बाहर के कर्मकांड बदल भी जाएँ तो थोड़े दिनों बाद इस जहरीले कुँए से नई जहरीली बेल पनप कर समाज पर फ़ैल जाती है. उदाहरण के आजकल के पूजा पंडाल जगराते जुलूस, सामूहिक भोज आदि भारत में बहुत पुराने नहीं हैं.

    जब स्वतन्त्रता संघर्ष के दिनों में आजादी के आन्दोलन के लिए या तथाकथित हिन्दू जीवन दर्शन को प्रचारित करने के लिए हिन्दुओं सहित बहुजन जातियों को संगठित करने की आवश्यकता हुई तब पुराने दर्शन और कर्म के सिद्धांत पर आधारित कर्मकांडों को नये रूप में ढाल दिया गया और नये देवी देवताओं सहित नई आरती, नये पूजा विधान, जुलूस, जगराते, डांडिया, सामूहिक भोज आदि निर्मित कर दिए गये.

    इनमे शामिल होने वाले लोगों के मौलिक मनोविज्ञान अभी भी आत्मा, परमात्मा और कर्म के विस्तारित सिद्धांत और पुनर्जन्म की धारणा से ही नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही ये इनोवेशन किया गया था. इन नये कर्मकांडों से इन्हें आजाद करवा भी दिया जाए तो कोई बदलाव नहीं होने वाला. उस अमरबेल में से फिर नये अंकुर अपने आप निकल आयेंगे.

    यहाँ तक कि हिन्दू धर्म छोड़कर जाने वाले दलितों बहुजनों में भी इसी कारण कोई ख़ास बदलाव नहीं आता है. उनके मन में गहराई में इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म सहित मोक्ष या स्वर्ग या जन्नत जैसे अंधविश्वास भरे ही रहते हैं. इन जहरीले बीजों को अपने साथ ले जाकर वे ध्यान समाधी मोक्ष जन्नत आदि के लिए नये कर्मकांड खुद ही बना लेते हैं.

    वे भी पुराने देवी देवता छोड़कर नये देवी देवता और तीर्थ, मन्दिर ध्यान केंद्र आदि बना लेते हैं और नये धर्म में भी पुराने भारतीय धर्म की जहरीली खुराक फैला देते हैं. ये एक लाइलाज बीमारी नजर आती है.
    अब बड़ा सवाल ये है कि इसका इलाज कैसे हो?
    मेरा स्पष्ट मानना है कि भारत का धर्म जिस दर्शन से उपजा है और जिस अध्यात्म या रहस्यवाद को महिमामंडित करके आगे बढ़ता है उसकी तरफ कभी गंभीरता से उंगली नहीं उठाई गयी है.

    हमें धार्मिक कर्मकांडों और पूजा पद्धतियों से आगे बढ़कर इस धर्म के मूल दर्शन पर चोट करनी होगी. इस दर्शन पर चोट करने से ही हम ओशो रजनीश, आसाराम, निर्मल बाबा, राम रहीम, श्री श्री, जग्गी इत्यादि बाबाओं को रोक सकेंगे जो कि हर पीढी में पुनर्जन्म के जहरीले दर्शन के आधार पर ध्यान समाधी मोक्ष आदि की अन्धविश्वासी व्याख्याएं फैलाते हैं.

    ये ध्यान देने लायक बात है कि जब जब भारत के शोषक धर्म पर संकट आता है, इसमें तरह तरह के बाबा पैदा हो जाते हैं जो क्रान्ति और बदलाव के नाम पर गुमराह करने के लिए खड़े हो जाते हैं.

    ओशो रजनीश और राम-रहीम जैसे ये बाबा पुराने दर्शन से विज्ञान और पश्चिमी क्रान्ति को जोड़कर ऐसी भयानक सम्मोहनकारी शराब बनाते हैं कि कई पीढियां इसमें से बाहर नहीं निकल पाती.

    आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के अंधविश्वास को जस का तस बनाये रखते हुए उसके ऊपर ऊपर के बेल बूटों में थोड़ा बदलाव करके ये पाखंडी बाबा नई पीढ़ियों को फिर से उसी दलदल में घसीट लेते हैं.

    ये भयानक रूप से धूर्त और अवसरवादी होते हैं, ये विज्ञान मनोविज्ञान लोकतंत्र साम्यवाद समाजवाद आदि की व्याख्या करते हुए आत्मा परमात्मा को भी महिमामंडित करते जाते हैं और ऐसा आभास पैदा करते हैं कि पुनर्जन्म और कर्म का विस्तारित सिद्धांत इन सब आधुनिक क्रांतिकारी सिद्धांतों के साथ फिट होता है.

    इसके लिए वे अध्यात्म और रहस्यवाद का सहारा लेते हैं. पुरानी पूजा और कर्मकांडों के बदले वे आधुनिक पश्चिमी ढंग के नाईट क्लब और नाईट क्लब कल्चर की तरह जगराते, कीर्तन, ध्यान, समाधि आदि के नये कर्मकांडों की रचना करते हैं.

    युवा वर्ग इससे एकदम से सम्मोहित हो जाता है. अपने परिवारों, गाँवों, कस्बों में जाति, वर्ण, अमीर गरीब आदि के विभाजन की चोट से सताए हुए इस युवा वर्ग को इन पाखंडी बाबाओं के ध्यान केन्द्रों और डेरों में थोड़ा अपनेपन और भाईचारे एहसास होता है. इस विभाजित समाज में एकसाथ बैठने, खाने, नाचने का मौक़ा उन्हें पहली बार मिलता है.

    इस तरह नई पश्चिमी जीवन शैली के कुछ टुकड़ों को पुरानी जहरीली खुराक में मिलाकर एक नया कहीं अधिक जहरीला काकटेल बनाया जाता है जो पुराने कर्मकांड से भरे धर्म की तुलना में आधुनिक नजर आते हुए भी उससे कही अधिक मारक और भयानक होता है. इस तरह ओशो रजनीश जैसे ये पाखंडी बाबा धर्म के साथ आधुनिकता को जोड़कर पुराने जहरीले दर्शन को एक नई जिन्दगी दे देते हैं और नये युवाओं, शहरी माध्यम वर्ग और पेशेवरों को फुसलाते हुए उसी सनातन सुरंग में खींच ले जाते हैं.

    इसलिए सभी बहुजनों, दलितों, मजदूरों, स्त्रीयों आदिवासियों को मेरी यही सलाह होती है कि वे धार्मिक कर्मकांड का विरोध करते हुए वहीं तक न रुक जाएँ. भारत के पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से ध्यान, समाधि, साधना और मोक्ष के नाम पर जितने बाबा और ध्यान केंद्र आदि चल रहे हैं उनसे भी बचकर रहें.

    ये ध्यान समाधि सिखाने वाले लोग असल में पुराने कर्मकांडीय लुटेरों के ही प्रगतिशील एजेंट हैं. आप एक बार इनके चंगुल में फंसकर ध्यान समाधि सीखने जाइए, धीरे धीरे ये आपको भूत प्रेत, श्राद्ध, देवी देवता पौराणिक बकवास का महात्म्य आदि सिखाने लगते हैं और कुछ ही महीनों में अच्छे खासे सुशिक्षित पेशेवर लोग तोते वाले ज्योतिषी की तरह बकवास करने लगते हैं.

    ये जहरीले धर्म का नई परिस्थिति में खुद को ज़िंदा बनाये रखने का हथकंडा है. पश्चिमी क्रांतियों के प्रभाव में जीने वाले भारत में धर्म और कर्मकांड अब उतने आकर्षक नहीं रह गये हैं. अगर धोती कुर्ता या तिलक कुमकुम लगाने वाला संस्कृत बोलने वाला कोई पंडित खड़ा हो जाए तो उसे सुनने के लिए आज का युवा वर्ग उत्सुक न होगा.

    लेकिन वही पोंगा पंडित अगर फेंसी गाउन, चोगे, रोल्स रोयस या मर्सिडीज कार लेकर फाइव स्टार आश्रम में खड़ा हो जाए और इंग्लिश में बात करते हुए फ्रायड, नीत्शे, मार्क्स और डार्विन के तर्क देने लगे तो शहरी मध्यम वर्ग का पेशेवर युवा उससे प्रभावित होने लगेगा. एक बार ये युवा इनके चक्कर में फस जाएँ फिर ये बाबा लोग उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते.

    यही असली खेल है. इस खेल को समझे बिना भारत में बहुजन और स्त्री मुक्ति की कोई संभावना नहीं हो सकती. ये बात भारत के मुक्तिकामियों को गहराई से नोट कर लेनी चाहिए.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

    Sanjay Shramanjothe