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  • आदर्शों के भ्रम जाल

    आदर्शों के भ्रम जाल

    Murari Tripathi

    कुछ लोग आदर्शों पर चलते हैं
    पथ पर बढ़ते हैं निरंतर
    कुछ लोग आदर्शों को मानते हैं नकली
    किसी भी तरह पहुंचना चाहते हैं कृत्रिम शिखर पर

    कुछ लोग आदर्शवादी होने का रचते हैं भ्रमजाल
    करते हैं दिखावा
    व्यापार करते हैं क्षद्म संवेदनाओं का

    अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए
    बेंच सकता है इंसान खुद को
    बिना किसी हिचक के
    बिना किसी ग्लानि के

    मन में चलता है बहुत कुछ
    तरह- तरह के स्वार्थ के विचार
    असंख्य बार गुजरते हैं मस्तिष्क पटल पर

    झूठ दर झूठ गढ़ा जाता है 
    भट्टी में पकाई जाती हैं 
    गीली मिट्टी से बनीं ईंटें
    बेशर्मी जैसी कठोर बनकर निकलती हैं

    रची जाती हैं काल्पनिक कहानियां
    लिखे जाते हैं महानता के गीत
    लिखे जाते हैं नाटक
    जो असल में होते हैं सिर्फ नाटक

    एकाकीपन कितना क्रूर है
    पैदा करता है अप्रासांगिक हो जाने का डर

    हर क्षण सुनना चाहते हैं हम
    अपनी तारीफों के कसीदे
    हर क्षण पाना चाहते हैं घिरा खुद को
    चारण कवियों के समूह से

    आलोचनाएं चुभती हैं
    गरल की तरह पीनी पड़ती हैं
    घूंट पर घूंट

    उचित सिद्ध करते रहते हैं
    हम अपने विचलन को
    अपने स्वार्थों को
    बिना किसी टीस के
    यह सोचकर कि
    दुनिया ऐसे ही चलती है

    क्यों ये दुनिया ऐसे ही चलती है?
    और अगर चलती है
    तो क्या ऐसे ही चलती रहनी चाहिए?
    बोलो…
    बोलने से पहले खुद से पूछो…

    Murari Tripathi


  • शुरू से सब शुरू करते है

    शुरू से सब शुरू करते है

    Sachin Bhandari

    चलो यूँ करते हैं
    शुरू से सब शुरू करते हैं।

    तकरारों को भूल कर
    शिकवों को मिटा कर
    फिर से दोस्ती करते हैं
    शुरू से सब शुरू करते हैं।

    टूटी हिम्मत को समेट कर
    उम्मीदों को फिर से जगा कर
    एक बार और कोशिश करते हैं
    शुरू से सब शुरू करते हैं।

    नए पात्र गढ़ते हैं
    नयी कहानी लिखते हैं
    आओ न साथ बैठ कर कुछ नया सोचते हैं
    शुरू से सब शुरू करते हैं।

    हार के सिलसिले को तोड़ते हैं
    पिछले से सीख नया करते हैं
    आओ चलो फिर से खेलते हैं
    शुरू से सब शुरू करते हैं।

    चल मेरे मन उठ
    बस तू और मैं ही हैं संग
    अपनी हिम्मत को साथ लेकर
    शुरू से सब शुरू करते हैं।।

    Sachin Bhandari


    Sachin Bhandari

  • पिता के जूते

    पिता के जूते

    Mukesh Kumar Sinha

    जूता पिता का 
    पहली बार पहना था तीन दशक पहले
    जब उन्होंने कहा था –
    टाइट है, काटने लगा है पैर
    तुम ही पहन लो 
    पापा का संवाद था बड़े होते बेटे के साथ 
    अधिकार को कमी की पैकिंग में लपेट कर 
    कहा गया था शायद
    पर सुन ही नहीं सका था ‘मैं’

    पहली बार 
    बांधते हुए जूते 
    दिल कह रहा था 
    मर्द वाली फ़ीलिंग के लिए 
    ज़रूरी है 
    4 नंबर के सैंडल के बदले 
    7 नंबर के लेस वाले 
    पिता के या पिता जैसे जूते पहने ही जाएं

    चमकते पुराने जूते और 
    अॉल्टर करवाए हुए पुरानी पैंट पहने 
    साईकल पर 
    उनके साथ 
    करते हुए सफ़र 
    उनसे ही बतियाते हुए बता रहा था 
    पहली बार
    घर के खर्चे कम करने की जरुरत और तरीके 
    अपनी परचून की दुकान की लाभ-हानि 
    स्वयं के पढ़ाई की अहमियत और पढने के सलीके

    पिता की हूँ-हाँ से बेखबर 
    7 नंबर के जोड़े ने शुरू जो कर दिया था दिखाना असर 
    तभी तो चौदह-पंद्रह वर्षीय छोकरे को 
    पहली बार समझ में आई थी 
    अहमियत पिता की 
    उनके मेहनत की 
    और इन सबसे ऊपर 
    उनके होने की

    तब से
    ज़िंदगी भी जूते और जूते के लेस के साथ 
    भागती रही 
    बिना उलझाए, बिना रुके 
    उसी सात नंबर में 
    कभी कभी पिता के साथ
    पर, अधिकतर समय उनसे दूर
    बहुत-बहुत दूर

    वो अंतिम दिन भी आया जब 
    उनकेे चले जाने के बाद 
    पिता के जूते देख 
    माँ से पूछा क्या, बस कह डाला
    मैं ही पहन लूं इसको अब…… !!

    एक बार फिर 
    पैर को जूते में डाल 
    खुद को पिता सा महसूस कर 
    नज़रे दौड़ा रहा था दूर तलक

    है अब अजब सी सोच 
    जिस दिन भी भीतर
    मन होता है डाँवाडोल
    पिता के जूते पहन 
    दिल की धडकनों के ऊपर हलके से हथेली को रख कर 
    कह उठता हूँ 
    आल इज़ वेल, आल इज़ वेल 
    लक्की चार्म की तरह

    शायद होता है एक संवाद
    स्वर्गवासी पिता के स्नेह के साथ 
    जो बेशक है पूर्णतया आभासी 
    पर होती है आत्मिक संतुष्टि 
    होगा सबकुछ बेहतर 
    कहीं प्लेटोनिक आशीर्वाद तो नहीं
    जिसका माध्यम भर है ये ख़ास जूता

    हाँ 
    आज फिर 
    पॉलिश्ड, चकमक
    पिता के जूते पहन
    बढ़ता जा रहा हूं

    जल्दी पहुँचना जो है काम पर।

    Mukesh Kumar Sinha


    Mukesh Kumar Sinha

  • सॉरी बेटा मैं आपको प्यार नहीं करता

    सॉरी बेटा मैं आपको प्यार नहीं करता

    Sanjiv Kumar Sharma

    (एक बाप का बेटे को आखिरी खत)

    उम्मीद है तुम खुश होगे और अपनी नयी नौकरी में आराम से होगे। मेरी पोती तान्या और बहु कैसे हैं? तान्या तो अब काफी बड़ी हो गयी होगी बहुत दिन हो गए उसे देखे हुए भी। जब से तुम मुंबई गए हो उससे मिलना ही नहीं हुआ।

    मेरी तबियत काफी बिगड़ चुकी है और किडनी के साथ अब दिल भी जवाब दे रहा है। कुछ दवाएं और नलियां मुझे किसी तरह जिन्दा रखे हुए हैं। हॉस्पिट्ल में लेटे हुए रोज मौत, दर्द और हताशा से दो-चार होते हुए मेरी जिंदगी के समझ बहुत गहरी हो गयी है। मुझे अहसास हो रहा है की जिन चीजो को जरूरी समझ कर भागता रहा उनकी असलियत में कोई कीमत नहीं थी। और जो जरूरी चीजें थी उनको भुला दिया। तुम्हारी माँ मर भी गयी और मैं कभी उसके साथ प्यार को ठीक से जी भी नहीं सका।

    हो सकता है मैं शायद अब ज्यादा दिन जिन्दा नहीं रहूँ इसलिए तुमको ये खत लिख रहा हूँ। फ़ोन पर ये बातें नहीं कर सकता इसलिए मैंने ये तरीका अपनाया है। मेरी विनती है कि इसे पढ़ना जरूर भले ही तुम्हारे पास समय हो या नहीं हो। ये मेरी असली पूँजी है जो मैं तुम्हारे नाम छोड़ना चाहता हूँ।

    सबसे पहले मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि ये खत मैं खुद नहीं लिख पा रहा हूँ। मैं लिख ही नहीं सकता। इसे बोल कर लिखवा रहा हूँ। और जो इसे लिख रहा है वो एक नवयुवक है। मुझे मालुम है कि वो मेरी बात से असहज होगा फिर भी उसके बारे में बताना बहुत जरूरी है। वो शायद किसी ऐतिहासिक इमारत में फोटो खींचने का काम करता है ज्यादा नहीं कमाता लेकिन गुजर-बसर हो जाती है। फिर भी जब उसे समय मिलता है तो यहाँ सरकारी हॉस्पिटल में आ जाता है। किसी से दो बातें कर लेता है, किसी को ढांढस बंधा देता है, किसी की हाथ पैरों से मदद हो जाती है तो कर देता है। लेकिन सब कुछ यूँ ही बिना किसी फायदे के, बस यूँ ही अपनी मौज में।

    इससे मिल कर मुझे पता चला कि एक बाप के तौर पर मैं तुमको एक बहुत बड़ी बात सिखाना भूल गया कि जिंदगी की महक, उसकी ख़ूबसूरती उन चीजों में समाई है जो यूँ ही की जाती हैं, बिना किसी स्वार्थ के बिना किसी सौदेबाजी के; सिर्फ उस क्षण को जीने के लिए न कि ललचाई हुई निगाहों से भविष्य की और ताकते हुए। सच तो ये है कि मैंने तुम्हारी शुरुआत ही गलत कर दी। पढाई की शुरआत ही कराई इस शर्त पर कि डांट से बचना हो तो पढ़ो, फिर इनाम चाहिए तो पढ़ो, नंबर के लिए पढ़ो, फलानी चीज के लिए पढ़ो, ढिमका चीज के लिए पढ़ो। हर चीज इसलिए करो क्योंकि कुछ हासिल करना है, कुछ पाना है। हर काम इसलिए करो कि किसी से से तुलना करनी है या किसी को दिखाना है।

    तुम्हारे मन की जमीन तो खाली थी उस पर महत्वाकांक्षा के बीज मैंने ही बिखेरे। बच्चों के मन की जमीन बड़ी उपजाऊ होती है और उस पर बिखेरे हुए बीज बड़ी आसानी से उगते हैं। सोचा था जब ये फसल पकेगी उसे काट लूँगा। लेकिन मैं भूल गया था कि मैं जहरीली नागफनी बो रहा हूँ। नागफनी बड़ी आसानी से उगती है, फसल खूब होती है लेकिन उसमे कभी फूल नहीं खिलते और जो भी उसके पास आता है उसे जहर और काँटों के सिवा कुछ नहीं मिलता। महत्वाकांक्षा अकेली ही इंसान को खत्म करके उसे एक खतरनाक रोबोट में बदल देने के लिए काफी है, उसे किसी साथ की जरूरत नहीं है। महत्वाकांक्षा के विष से भरा इंसान भष्मासुर होता है वह जिस चीज को हाथ लगाता है राख कर देता। उसके रिश्ते छीना-झपटी से ज्यादा नहीं होते। उसके लिए जीविका जीवन चलाने का साधन या अपने शौक की पूर्ति नहीं होती बल्कि अपने भीतर लगातार टीस देती अपने कुछ न होने की खरोंचों से भागने का जरिया होती हैं और जब किसी तरह उसकी बेचैनी कम नहीं होती तो वह दूसरे को भी खरोंच मारने से बाज नहीं आता।

    मैं ये सारी बातें तुम्हें इसलिए नहीं बता रहा हूँ कि मैं तुमसे कुछ चाहता हूँ बल्कि इसलिए बता रहा हूँ कि तुम मेरी वाली गलती न दोहराओ। मैंने साफ़-साफ़ देख लिया है कि मैं तुम से प्यार नहीं करता था बल्कि तुम्हे अपनी सम्पत्ति समझता था। जो कुछ और तरीकों से नहीं मिल रहा था उसे तुम्हारे जरिए हासिल करना चाहता था। अपने सभी डर मैंने जाने-अनजाने तुम्हारे अंदर डाल दिए। शायद चाहता था कि तुम मेरे जैसे बन जाओ ताकि मैं तुम्हारे साथ चैन से जिंदगी काट सकूँ। मेरा ऐशो-आराम बुढ़ापे में भी चलता रहे, ये शरीर ज्यादा से ज्यादा समय तक बना रहे, भोग करता रहे। लेकिन तुम अपनी बेटी तान्या को सच में प्यार करने की कोशिश करना। ये मत समझना कि वो तुम्हारे किसी भी तरह के मानसिक या शारीरिक इस्तेमाल की कोई चीज है। बल्कि वो एक उपहार है जो तुमने खुद अपनी इच्छा से माँगा है। उसे मौका देना कि वो खिल सके, अपनी तरह से बढ़ सके। तुम बस उसे जीवन को महसूस करने देना, बिना किसी डर के अपनी समग्रता में। कोशिश करना कि वो हमारे अंदर भरे हुए डरों के जाल में कम से कम फंसे। धर्म, ईश्वर और मौत बहुत डर फैलाते हैं, इनके डर से उसे यथासंभव बचाना। तथाकथित धर्म और ईश्वर से उसके पवित्र मन को दूर रखना जब वह वयस्क होगी अपने आप समझ लेगी। मौत से उसका परिचय कराना डराना नही। उसे बताना मौत बड़ी मामूली चीज है जो हर पल घट रही है। उसे शमशान या कब्रिस्तान ले जाया करना और दिखाना कि वहां डरने के लिए कुछ है ही नहीं।

    और सबसे बड़ी बात उसे बताना कि वो यूनिक है उसे न किसी से प्रतिस्पर्धा करनी है न किसी को कुछ साबित करना और न ही वो कोई शो पीस है जो तुम्हारी या किसी और की शान के लिए इस्तेमाल होना है। वो बस पता लगाए कि उसे क्या करना अच्छा लगता है और फिर उसी में डूब जाए। उसे मौका देना कि वो जिंदगी को वर्तमान में जीना सीखे। चीजों को मौज में करना सीखे, इंसानो से, पेड़ों से, परिंदों से, बारिश की बूंदो से, फूलों पर मंडराती तितलियों से उसका रिश्ता बना रहे।

    बस अब विदा !
    अपना ख्याल रखना।
    तुम्हारा अभागा पिता

    Sanjiv Kumar Sharma

    Editor, Ground Report India

    An author, thinker, translator and a travel-enthusiastic visited almost all states of India in his wheelchair. He had polio paralysis of both the lower limbs at an early age and could not get into the formal system of education, ie schooling. On his own, he started with formal mainstream education at home, and appeared in few exams privately but soon realised about the inadequacy of traditional approach to education and started self-study in his way.

    Sanjiv stayed in a room for more than 12 years and spent time in reading books, writing, translating and contemplating on vital issues of human life, society and religion. He has studied literature, philosophy, science, religion and psychology. He started writing during adolescent and continues to write till the date. He has written many articles, poems and stories which got published in various newspapers and magazines. With the area of social media, he also has turned into a prolific writer on the internet.

  • नौ का पहाड़ा

    नौ का पहाड़ा

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    वह बच्चा पतली सी न टूटने वाली डंडी की मार से जमीन पर नीचे पड़ा था।

    मम्मी, जो स्कूल में जा कर उस बच्चे की मैम हो जाती थी, ने नौ का पहाड़ा घर से याद करने को कहा था। नौ का पहाड़ा उसके लिए अभी खेल है वह नौ का पहाड़ा दोहराए जा रहा है नौ ई कना नौ, नौ दूनी अट्ठारह, नौ तिया सत्ताईस… मम्मी देखो मेरे को तो एक दम याद हो गया, सुनो नौ ई कना नौ, नौ दूनी अट्ठारह नौ तिया सत्ताईस, नौ चौक छत्तीस… नौ दहाई नब्बे। मैंने तो अभी ही सुना दिया तुम कुछ कहोगी तो नहीं मैं भूल गया तो!

    – नहीं!

    “पहाड़ा दिया था सुनने को चलो तुम सुनाओ।” सबको ताजा कर दे ऐसी मुस्कान लिए बच्चा पहाड़ा सुनाना शुरू करता है नौ ई कना नौ, नौ दूनी अट्ठारह, नौ तिया सत्ताईस, नौ चौक…. नौ चौक…. मैम जी मैंने घर पर तो सुनाया था, मैंने याद किया था।

    डंडी उठती है और उस बच्चे पर जमीन पर चीखते-चिल्लाते पड़े होने पर भी पड़ती रहती है।

    वह बच्चा पतली सी न टूटने वाली डंडी की मार से जमीन पर नीचे पड़ा था, शारीरिक चोट उसके लिए नई नहीं थी लेकिन ठगे जाने, विश्वास टूटे जाने को महसूस करने का उसका यह पहला अनुभव था।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    Devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance.