After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.
Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.
To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.
He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.
In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.
He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.
Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.
Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.
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For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.
He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.
मैं जब भी चीन की बात करता हूं, जब भी यह कहने का प्रयास करता हूं कि चीन साम्यवादी देश नहीं है, साम्यवाद के नाम पर धूर्तता से लोगों को मूर्ख बनाता आ रहा है। चीन के लोगों की हालत व भारत के लोगों की हालत में अंतर नहीं, उल्टे कुछ मामले ऐसे हैं, जिनमें भारत चीन से बेहतर है और कुछ मामले ऐसे हैं जिनमें चीन भारत से बेहतर है। यदि संपूर्णता में बात की जाए तो भारत चीन की तुलना में बेहतर देश है। भारत का अपरिपक्व लोकतंत्र भी चीन के कपटी-साम्यवाद से बहुत बेहतर है।
मेरे ऐसा कहने पर बहुत लोग भयंकर रूप से प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं, कुछ तो मुझ पर व्यक्तिगत हमले भी शुरू कर देते हैं, गाली-गलौच शुरू कर देते हैं, शायद इन लोगों का ऐसा होना ही उनको चीन के कपटी-साम्यवादी चरित्र के और नजदीक ला देता है।
ऐसा भी नहीं है कि प्रतिक्रियावादी होने वाले सिर्फ माओत्से तुंग के समर्थक लोग होते हैं। वे लोग भी होते हैं जिनको चकाचौंध का शौक होता है, यौन कुंठित व सैडेस्टिक सोच के लोगों को भी चीन आदर्श देश लगता है। इनमें से बिना किसी अपवाद सभी का चीन से आर्थिक व बाजारू लाभ का रिश्ता ही होता है।
दरअसल भारत में चीन को बहुत ही बढ़िया, सामाजिक आदर्श व विकसित देश मानने की मनोवैज्ञानिक बीमारी टाइप है, इसमें चीन की यूनिवर्सिटियों मे लाखों रुपए सालाना फीस देकर जाकर पढ़ने वाले छात्र, नौकरी के लिए जाने वाले लोग व व्यापारी लोग हैं। छात्र हों या प्रोफेशनल लोग या व्यापारी लोग, इनको चीन के कुछ शहरों के शहरी चकाचौंध से इतर असली चीन का चेहरा देखने, जानने, समझने की न तो जरूरत होती है, न सोच, न ही वैचारिक औकात, न ही अधिकार। इसलिए जितना देख पाते हैं, उतने को ही चार अंधों की तरह पूरा हाथी मान लेते हैं। यहां मैं यह मानकर चल रहा हूं कि आपको चार अंधों व हाथी वाली कहानी पता ही होगी, इसलिए बताने की जरूरत नहीं समझता हूं।
चीनकेअंध–भक्त (भगत-गण)
दरअसल भारत जैसे विकासशील देशों जहां लोगों का एक खास वर्ग है जिसमें मार्क्सवाद, साम्यवाद, कम्युनिज्म, माओवाद इत्यादि के प्रति अंध-भक्ति वाला एकतरफा रोमांस होता है। जबकि मार्क्सवाद क्या है साम्यवाद क्या है कम्युनिज्म क्या है माओवाद क्या है इत्यादि की धेला भर भी वास्तविक समझ नहीं होती है। लेकिन इन लोगों को चीन में सबकुछ आइडियल दीखता है, पता नहीं कैसे देखते हैं, क्या पढ़ते हैं, क्या सोचते हैं, क्योंकि इन लोगों को चीन में वह सबकुछ दीखता है जो चीन के संदर्भ में इन लोगों व इन लोगों के जैसों के अलावा किसी और को नहीं दीखता है। इन लोगों के पास हर एक बात की एक ही काट होती है कि पाश्चात्य मीडिया व कंपनियों का षणयंत्र रहता है कि चीन को बदनाम किया जाए। गजब बात यह है कि चीन खुद इन षणयंत्रकारियों को अपने यहां सुख सुविधाएं देकर बुलाता है और अपने देश के लोगों को इन कंपनियों के लिए मशीनी रोबोट टाइप बनाकर प्रस्तुत करता है। इन लोगों को दुनिया भर का षणयंत्र दीख जाता है लेकिन चीन द्वारा वीभत्स व फर्जी साम्यवाद के नाम पर चीन के करोड़ों लोगों के साथ लगातार किया जा रहा षणयंत्र नहीं दीखता है।
दरअसल इन चीन-भगत लोगों व भारत के राजनेताओं व राजनैतिक-पार्टियों के भगत लोगों में बिलकुल भी अंतर नहीं होता है। जैसे भारत में विभिन्न प्रकार के भगत लोगों को उनकी भगतई के आधार पर गुजरात में विकास, उत्तरप्रदेश में समाजवाद या बहुजनवाद, बिहार में सामाजिक-न्याय इत्यादि दीखता रहता होता है। कितना भी जोर लगा लीजिए, कितना भी वस्तुनिष्ठता से तथ्य दीजिए, कितना भी तर्कसंगत चर्चा कीजिए, इन सब तत्वों का कोई वजूद रह ही नहीं रह पाता क्योंकि भगत लोगों को वही देखना होता है जो इनको देखना होता है। चूंकि भगतई के अलावा कुछ और ठोस इनके पास होता नहीं तो बहुत जल्द अपने असली चोले में आकर गाली-गलौच शुरू कर देते हैं।
किंकर्तव्यविमूढ़ता यह है कि चीन के ये अंध-भगत लोग भारत के उन लोगों को घटिया मानते हैं, दोयम सोच का मानते हैं, जो लोग भारत के किसी राजनेता या राजनैतिक पार्टी का भगत लोग होते हैं। मानों चीन की भगतई करने से अभिजात्य हो जाते हों, रातोंरात बौद्धिक हो जाते हों, क्रांतिकारी हो जाते हों, परिवर्तनकारी हो जाते हों। मजेदार बात यह कि इनमें से अधिकतर लोग भरे पेट वाले होते हैं, साम्यवादी विचारधारा को जीवन में प्रमाणिकता से उतार कर जीने से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता, उल्टे शोषणकारी ढांचों का सक्रिय हिस्सा बनते हैं। जीवन पूरी बेशर्मी व ढोंग के साथ गुजारते हैं।
चीन देश की कुछ फोटो
अब चीन की कुछ फोटो दे रहा हूं, फोटो के बाद लेख जारी रहेगा। लेख के बीच में फोटो क्यों दे रहा हूं, यह आपको पूरा लेख पढ़ने के बाद स्वतः समझ आ जाएगा। फोटो दो प्रकार की हैं। चीन के अमीर व अभिजात्य लोगों के लिए शहरी चकाचौंध की फोटो तथा चीन की लगभग आधी जनसंख्या जो जीने के लिए अभिशप्त है, उस असली चेहरे की फोटो।
— शहरी-अभिजात्यीय चकाचौंध
— असली चेहरा (फर्जी-विकास)
पेयजल व औद्योगिक कचरा
करोड़ों लोगों व बच्चों का भोजन
करोड़ों गरीब बच्चों के लिए शिक्षा
दूरदराज के इलाकों में सरकार स्कूल तक नहीं बनवाती, बच्चों को जान हथेली पर रख कर स्कूल जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है
बाल मजदूरी के लिए अभिशप्त होना
करोड़ों बच्चे अभिशप्त हैं बचपन न जीने को
करोड़ों गरीब बच्चों की देखभाल
करोड़ों लोगों की आर्थिक दशा-स्थिति
करोड़ों वृ्द्ध लोगों की आर्थिक स्थिति
करोड़ों गरीब लोग
चीनकाकपटी-साम्यवाद
चीन के प्रमुख शहरों में सबसे सस्ते घर भी, 100 गज से भी कम क्षेत्रफल वाले घर की कीमत भी कई करोड़ रुपए होती है। हर शहर में बहुत महंगे इलाके, कुछ कम महंगे इलाके, कुछ और कम महंगे इलाके यानि कई आर्थिक स्तरों वाले इलाके होते हैं। शहरों में स्लम जैसे इलाके भी होते हैं, गरीबों के इलाके होते हैं। वैसे ही जैसे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश इत्यादि देशों में होते हैं।
चीन में भी आयकर देना होता है। आय के स्तरों के आधार पर आयकर देना होता है। एक रुपया भी आय है तो आयकर देना होता है (वह अलग बात है कि बहुत लोगों की आय की लिखापढ़ी हो ही नहीं सकती, होती ही नहीं)। 3% से लेकर 45% तक आयकर पड़ता है। जैसे दुनिया के दूसरे देशों में स्लैब होते हैं, वैसे ही स्लैब यहां भी होते हैं। साम्यवादी शासन में लोगों की आय में जमीन आसमान का अंतर कैसे? यह समझ के बाहर है।
चीन में 60% सरकारी व 40% प्राइवेट अस्पताल हैं। साम्यवादी शासन में प्राइवेट अस्पताल कैसे? यह समझ के बाहर है। कोरोना के लिए 10 दिन में अस्पताल खड़ा करने की नौटंकी कर सकते हैं, लेकिन चीन की लगभग आधी जनसंख्या के लिए ठीक-ठाक स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध नहीं करा सकते हैं।
चीन में प्राइवेट स्कूल भी होते हैं, जिनमें भारी-भरकम फीस वसूली जाती है।
चीन में लाखों बच्चे आर्थिक विपन्नता के कारण पढ़ाई छोड़ देते हैं।
चीन में लाखों बच्चे स्वास्थ्य कारणों से पढ़ाई छोड़ देते हैं।
चीन में करोड़ों लोग ऐसी स्थितियों में रहते हैं, जिनको विकास किस चिड़िया का नाम है, पता ही नहीं। इन लोगों को पता ही नहीं कि साम्यवाद, कम्युनिज्म किस चिड़िया का नाम होता है।
चीन में लगभग 70 रुपए प्रतिदिन से कम वाले को गरीबी रेखा के नीचे माना जाता है, 70 रुपए प्रतिदिन के बावजूद चीन में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या करोड़ों में है।
चीनकी GDP
चीन की GDP लगभग 12.238 ट्रिलियन डालर है। बहुत लोग मुझसे बहुत बदतमीजी के साथ बहसबाजी करते हैं कि चीन विकासशील देश कैसे हो सकता है क्योंकि इतने ट्रिलियन की GDP है। सुनने समझने को तैयार नहीं होते हैं, अजानकारी व भगतई का अहंकार बहुत बड़ा वजूद रखता है। दरअसल साम्यवाद व ट्रिलियन GDP इत्यादि ऐसे शब्द हैं कि शेष सबकुछ कोई मायने नहीं रखता है। बहुत लोगों को GDP क्या होता है, यह पता नहीं होता, साम्यवाद के सूक्ष्म बिंदुओ का पता नहीं होता। लेकिन इन शब्दों के मायाजाल में अपनी सोच विचार की शक्ति को कुंठित कर लेते हैं।
चीन की GDP पर अपनी बात को एक उदाहरण से सरल ढंग से रखता हूं —
ऑस्ट्रेलिया देश की GDP 1.323 ट्रिलियन डालर है, चीन की GDP 12.238 ट्रिलियन डालर है। मतलब चीन की GDP ऑस्ट्रेलिया की GDP से लगभग 9 गुना अधिक है। चीन की GDP 9 गुना अधिक दीख रही है लेकिन वास्तविकता में चीन की GDP ऑस्ट्रेलिया से बड़ी है नहीं।
दरअसल चीन की 144 करोड़ जनसंख्या ऑस्ट्रेलिया की ढाई करोड़ जनसंख्या से लगभग 58 गुना अधिक होकर भी सिर्फ 9 गुना ही अधिक GDP पैदा करती है। जाहिर है चीन की सत्ता को संसाधनों का प्रबंधन नहीं आता, जबकि चीन के सभी लोग चीन की सत्ता के गुलाम हैं। दुनिया भर की कंपनियों के लिए पूरे चीन देश को सस्ता मजदूर सप्लाई करने वाला बनाकर भी उतनी GDP नहीं पैदा कर पाता जितनी GDP ऑस्ट्रेलिया के महज ढाई करोड़ लोग पैदा कर लेते हैं।
चीन के साथ तो जनसंख्या घनत्व का बहाना भी नहीं है, क्योंकि चीन का जनसंख्या घनत्व योरप के अधिकतर देशों के जनसंख्या घनत्व से कम है। फिर भी चीन योरप के अधिकतर देशों के विकास व सामाजिक परिपक्वता के सामने कहीं नहीं ठहरता है, सिवाय सस्ते मजदूरों की सप्लाई व उपभोक्ताओं की संख्या के।
यदि सूक्ष्मता से गणना की जाए तो गणना यह निकलती है कि ऑस्ट्रेलिया की GDP चीन की GDP से लगभग 6 गुना अधिक बड़ी है। ऑस्ट्रेलिया की GDP का अधिकांश भाग उसकी अपनी GDP है, जिस पर उसका पूरा अधिकार है। ऑस्ट्रेलिया अपनी GDP अपने देश के लोगों के बेहतर जीवन स्तर पर खर्च करता है।
जबकि चीन की GDP का बड़ा हिस्सा कागजी लिखापढ़ी में भले ही चीन की GDP हो, लेकिन उस पर अधिकार तो योरप, ऑस्ट्रेलिया व अमेरिका की कंपनियों का ही है। यदि चीन की GDP से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिकार वाली GDP घटा दी जाए तो चीन की वास्तविक GDP तो बहुत अधिक कम हो जाती है।
चूंकि चीन अपने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जमकर करता आ रहा है, इसलिए दुनिया की कंपनियों को लुभाने के लिए अब उसके पास सस्ते मजदूर ही हैं। दुनिया की कंपनियां चीन इसलिए पहुंचती हैं क्योंकि चीन में उनको सस्ते मजदूर उपलब्ध होते हैं। यह कौन सा सर्वहारा साम्यवाद है जो मजदूरों का शोषण खुद ही करवाता है?
वास्तविक GDP कम होने के बावजूद चीन अपनी GDP को अपने देश के लोगों का जीवन स्तर बेहतर करने की बजाय अंतरिक्ष की फूं-फां, सैन्य-शक्ति की फूं-फां, विदेशों में संपत्ति खरीदने इत्यादि की फूं-फां में प्रयोग करता है।
यह कौन सा साम्यवाद है कि देश के करोड़ों लोग भूखे मर रहे हों, पहनने के लिए कपड़े नहीं हों, सर पर छत नहीं हो, बच्चों के लिए शिक्षा नहीं हो, लोगों के लिए स्वास्थ्य नहीं हो लेकिन देश की GDP का बड़ा हिस्सा फूं-फां व सत्ता-संचालकों की अय्याशी में खर्च की जाती हो।
उपसंहार
आपने लेख पढ़ लिया है, फोटो देख ली हैं, अब अपने मन में यह विचार जरूर कीजिएगा कि चीन में किस तरह का साम्यवाद या कम्युनिज्म है। यथार्थ यही है कि चीन का साम्यवाद दुनिया की कंपनियों के लिए आर्गनाइज्ड रूप से शोषित सस्ता मजदूर उपलब्ध कराने का औजार बन कर रह गया है, यही बनना भी चाहता है। चीन में साम्यवाद नहीं है। चीन का चरित्र शोषणकारी है न कि सर्वहारावादी।
सस्ता मजदूर उपलब्ध कराने के बदले चीन के सत्ता वर्ग व कुछ प्रतिशत लोगों को अय्याशी भोगने को मिलती है। लोग सवाल भी नहीं खड़ा कर सकते हैं, क्योंकि साम्यवाद के नाम पर हिंसक व बर्बर तरीके से बहुत तगड़ा शिकंजा कस रखा है।
दरअसल माओत्से तुंग इलाके के सबसे अमीर व्यक्ति के पुत्र थे, राज्य के सबसे अभिजात्य परिवारों में से एक में उनका ननिहाल था। बचपन से किशोरवास्था तक के समय का अपना अधिकतर जीवन अपने ननिहाल के ऐश्वर्य में गुजारा। किताबें पढ़ने का शौक था तो जीवन में किताबें खूब पढ़ीं। महात्वाकांक्षी बहुत ही अधिक थे, संवेदनशील तो बिलकुल भी नहीं थे।
रूस को अपने साम्यवाद का फैलाव करना था सो माओत्से तुंग जैसे आदमी की खोज थी। माओत्से को अनाप-शनाप सैन्य संसाधन व आर्थिक संसाधन दिए, परिणामतः माओत्से तुंग चीन की सत्ता पलटने में कामयाब हुए। सत्ता बनी रहे, निरंकुश रहे, इसलिए लंबे समय तक चीन के लोगों के साथ बर्बरता करते रहे। सर्वहारा के विकास के नाम पर लोगों को शातिराना धूर्तता से मूर्ख बनाते रहे।
चूंकि माओत्से का साम्यवाद से कोई लेना-देना था नहीं, तो उन्होंने साम्यवाद का अपना वर्जन बनाया, बहुत ही अधिक हिंसक, बर्बर व अनैतिक वर्जन। नैतिकता का तो मजाक उड़ाता था। माओत्से तुंग ने लगभग हर उस व्यक्ति की हत्या की जिसने थोड़ा सा भी विरोध किया। कल्पना कीजिए कि माओत्से कितना अधिक शक्की व क्रूर आदमी रहा होगा जिसने 7 करोड़ से अधिक लोगों की हत्या की। ये 7 करोड़ लोग सर्वहारा ही तो रहे होंगे। यदि सर्वहारा नहीं थे तब तो चीन की राजशाही का दिलखोल कर आदर करना चाहिए, क्योंकि राजशाही अपने आपमें साम्यवादी विचार पर चलने वाली रही होगी जो चीन के 7 करोड़ से भी बहुत अधिक लोग अमीर व अभिजात्यीय थे। जाहिर है, माओत्से ने अपने ही देश के सर्वहारा लोगों की हत्याएं करवाईं वह भी करोड़ों की संख्या में।
यदि चीन में लोगों की सहमति से या लोगों की समझ बढ़ने के कारण साम्यवाद आया तो फिर करोड़ों हत्याएं कराने की क्या जरूरत थी। क्यों चौक पर बीसियों हजार निर्दोष छात्रों को चारों तरफ से घेर कर गोलियों से भून दिया गया था। क्यों हर साल हजारों लोगों की चुपचाप हत्याएं कर दी जाती हैं, जो लोग जरा सा भी चीन की सत्ता की आलोचना करने का दुस्साहस करते हैं।
रूस के साम्यवाद में बड़ी खामियां रहीं लेकिन वहां का साम्यवाद चीन जैसा घिनौना व कपटी साम्यवाद नहीं था, यही कारण रहा कि समय के साथ परिपक्व होने के लिए लोकतंत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ गया। दरअसल लोकतंत्र ही साम्यवाद की परिपक्व अवस्था है। दुनिया में ऐसे कई देश हैं जो कागज में भले ही साम्यवादी न हों लेकिन अपने-अपने देश की सीमा के अंदर व्यवहारिक साम्यवाद को जीते हैं।
इसलिए भारत में रहने वाले चीन के भगत लोगों को थोड़ी सी ही सही लेकिन कम से कम कुछ तो सामाजिक ईमानदारी जीने का प्रयास करना ही चाहिए। भारत के लोकतंत्र को परिपक्व होने में, परिष्कृत होने में योगदान देना चाहिए। यह न कर पाएं, तब भी ठीक है, लेकिन कम से कम चीन के फर्जी, ढकोसलेबाज व कपटी साम्यवाद तथा बर्बर, क्रूर, वीभत्स सत्ता-समूह के शान में जबरिया अतथ्यात्मक कसीदे तो नहीं ही पढ़ना चाहिए।
After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.
Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.
To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.
He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.
In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.
He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.
Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.
Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.
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For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.
He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.
ब्रिटिश लोग 200-225 साल पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के प्रति रेसिस्ट थे। ऑस्ट्रेलिया उनका देश नहीं था, वहां के लोग मतलब आदिवासी उनके अपने देश या समाज के लोग नहीं थे। यहां तक कि उनकी तरह दिखने वाले तक नहीं थे, रंग भी अलग था। इन सबके बावजूद ऑस्ट्रेलिया समाज आज कहां खड़ा है। हम अपने भारतीय समाज व लोगों के गिरेबां में भी झांकें ताकि हमें यह अंदाजा हो सके कि, हम व हमारा समाज अपने ही लोगों के लिए कितना अधिक रेसिस्ट व हिंसक मानसिकता से भयंकर रूप से ग्रस्त है। वह भी तब, जब हमारा देश हमारा ही है/था, हमारा समाज हमारा ही है/था, हमारे लोग अपने ही लोग हैं/थे।
हमारे कुंठित मन को जब ऑस्ट्रेलिया को गाली देने के लिए कुछ विशेष नहीं मिल पाता तो हम टेरना शुरू कर देते हैं कि ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की बर्बर हत्याएं कीं, ऐसा किया वैसा किया। जबकि अधिकतर होता यह है कि हम अपने पूर्वाग्रह से मनचाही कल्पना करते हुए तर्कशीलता का प्रयोग करते हुए तर्क गढ़ते हैं, गूगल करके कुछ अधकचरे तथ्य जोड़ते हैं, और अपनी मानसिक हिंसक प्रवृत्ति के द्वारा नियंत्रित हो लेते हैं।
हम यह सब साबित कुछ यूं करते हैं, मानो दुनिया में आज से 200-225 वर्ष पहले के देश, सभ्यताएं व समाज बहुत अधिक अहिंसक, मानवता-वादी हुआ करते थे; उस समय जब सबकुछ आदर्शवादी होता था, मानवीय मूल्य चरम पर थे तब भी ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया में ऐसा किया।
हम यह भूल जाते हैं कि भारत में सैकड़ों राजे-रजवाड़े थे। जो छोटी-छोटी बात में आपस में युद्ध करते रहते थे। इन्हीं सब में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की हत्याएं होती थीं। जितने लोगों की हत्याएं हमारा भारतीय समाज प्रतिवर्ष करता था, उतनी तो संभवतः उस समय ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी जनसंख्या भी न होगी।
हम यह भूल जाते हैं कि, ब्रिटिश लोगों ने लगभग 200-225 वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जितनी हत्याएं की। उससे बहुत-बहुत अधिक हत्याएं तो हम भारतीयों ने आजाद होने के बाद के वर्षों में ही खुद अपने ही समाज के दलितों व आदिवासियों की हत्याएं कर दी हैं, आजतक करते आ रहे हैं।
हमारे दोहरेपन की हालत यह है कि अपने समाज व अपने अंदर की आज की बर्बरता के बारे में भी बात नहीं करना चाहते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में 200-225 साल पहले हुई घटनाओं को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं।
हमारी कुंठा हमें यह भी नहीं देखने देती है कि 200-225 वर्षों में ऑस्ट्रेलिया के समाज ने कितनी अधिक लोकतांत्रिक परिपक्वता हासिल की है, मानवाधिकारों की किन ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं। कैसे एक बेहतर समाज का निर्माण किया है। यह सब हो पाना दोहरेपन, आदर्शों की बतोलेबाजी, मानसिक हिंसा व बर्बरता इत्यादि से संभव नहीं होता। यह सब हो पाने का सीधा अर्थ यही है कि समाज ने समय के साथ-साथ अपने आपको परिष्कृत किया है, परिपक्व किया है, सीखा है, समझा है, गलतियों को स्वीकार किया है।
हमारे दोहरेपन से यह भी साबित होता है कि हमारे अंदर ऑस्ट्रेलिया जैसे लगातार परिपक्व व बेहतर होते जाने वाले समाजों से कुंठा है, द्वेष है, ईर्ष्या है, जलन है। यही कारण है कि, जब कुछ नहीं मिलता तो 200-225 वर्ष पहले पहुंच कर तथ्यों को तोड़-मोड़कर अपनी कुंठा को खाद-पानी दे लेते हैं। तर्क/वितर्क देकर अपनी मानसिक हिंसा की प्रवृत्ति को जी लेते हैं।
ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में यह लेख कम से कम उन लोगों को तो लाभ पहुंचा ही सकता है, जो अंदर से मानसिक बीमार नहीं हैं, पूर्वाग्रह से भयंकर स्तर तक कुंठित नहीं हैं, देखने समझने की संभवानाएं शेष हैं। यह लेख शोधपत्र नहीं है, इसलिए यह लेख कामनसेंस के आधार पर ही पढ़ा जाए। लेख लंबा है लेकिन यदि आप पढ़ने में रूचि रखते हैं तो आपको पूरा लेख पढ़ना चाहिए। धन्यवाद।
1788 के पूर्व ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी
जिस समय दुनिया की सभी सभ्यताओं ने बड़े-बड़े साम्राज्य बना लिए थे। हजारों वर्षों से नगरीय सभ्यताओं में जी रहे थे। तोपों, बंदूकों का सैकड़ों वर्ष पहले प्रयोग करना शुरू कर चुके थे। स्टीम इंजन का कामर्सियल प्रयोग शुरू हो चुका था। सैकड़ों-हजारों प्रकार के कपड़ों का प्रयोग हो रहा था। बड़े-बड़े समुद्री जहाजों का प्रयोग हो रहा था। लोग हजारों किलोमीटर लंबी समुद्री यात्राएं करते थे। घड़ी का प्रयोग हो रहा था। परमाणु होता है ऐसी कई वैज्ञानिक सिद्धांत आ चुके थे। दूरदर्शी व सूक्ष्मदर्शी यंत्रों का प्रयोग हो रहा था। दुनिया का पहला कैमरा डिजाइन हो चुका था। पूरी दुनिया में शताब्दियों पहले से ही बड़े-बड़े महल, किले व पूजागृह खड़े हो रहे थे।
उस समय ऑस्ट्रेलिया की सभ्यता यह तक नहीं जानती थी कि एक जगह पर गांव या नगर बनाकर स्थाई रूप से रहना क्या होता है। कपड़ा क्या होता है। ब्रोंज क्या होता है। लोहा क्या होता है। जबकि दुनिया हजारों वर्षों पहले ही ब्रोंज व आयरन युगों को पार कर चुकी थी। ऑस्ट्रेलिया आदिवासी पाषाण युग में ही जी रहे थे, जबकि शेष दुनिया बहुत अधिक आगे आ चुकी थी।
नगर/गांव इत्यादि नहीं थे
ऑस्ट्रेलिया के लोग नहीं जानते थे कि स्थाई रूप से एक ही जगह पर रहना क्या होता है, इसलिए नगर/गांव इत्यादि नहीं होते थे। जब ब्रिटिश पहुंचे तब पूरे आस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या कम अधिक लगभग पांच – सात लाख थी। लिपि नहीं थी। संपत्ति नहीं थी। 700 से अधिक बोलियां थीं। मतलब यह कि हर 700 – 900 लोगों पर बोली बदल जाती थी। स्थाई कबीलाई संस्कृति भी नहीं थी क्योंकि लोग स्थाई तौर एक स्थान पर नहीं रहते थे। समूहों के मुखिया बड़े बुजुर्ग होते थे, अनुभव मायने रखता था।
भोजन व कृषि
व्यवस्थित कृषि नहीं थी। पशुपालन नहीं था। शिकार करते थे।
धातुओं का प्रयोग
पाषाण युगीन जीवन था। धातु का प्रयोग करना नहीं जानते थे।
हथियार
बिना धातु वाले लकड़ी व पत्थर के हथियार।
कला, संगीत इत्यादि
पाषाण युगीन स्टोन पेंटिंग, वाद्ययंत्र इत्यादि।
ब्रिटिशर्स का आना 1788 से ऑस्ट्रेलिया आदिवासी
ऑस्ट्रेलिया दिवस/ 26 जनवरी
ऑस्ट्रेलिया दिवस का सिर्फ मतलब यह कि 26 जनवरी 1788 को ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पहली बार 11 जहाजों व 1500 लोगों की ब्रिटिश फ्लीट का पदार्पण हुआ। वैसे यह फ्लीट ऑस्ट्रेलिया 20 जनवरी 1788 के आसपास पहुंच चुकी थी लेकिन समुद्र में तरंगो के बहुत विकराल होने व अन्य कारणों के कारण ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण 26 जनवरी 1788 को हो पाया। इसी दिन 26 जनवरी 1788 को पहली बार ब्रिटेन का झंडा ऑस्ट्रेलिया में गाड़ा गया।
ऐसा नहीं था कि ब्रिटिश लोगों ने पहले कई वर्षों या दशकों तक ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का कत्लेआम किया या उनके साथ युद्ध लड़े, फिर समूचे ऑस्ट्रेलिया पर विजय प्राप्त होने पर 26 जनवरी 1788 को विजय पताका लहराई, जिसके कारण ऑस्ट्रेलिया-दिवस मनाते हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया दिवस की बात की जाए तो ऑस्ट्रेलिया दिवस का ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के साथ हिंसा का नाता नहीं। यह दिवस सिर्फ यह इंगित करता है कि इस दिन पहली बार ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण किया।
26 जनवरी को ऑस्ट्रेलिया दिवस के रूप में पूरे देश में मनाया जाएगा और इस दिन पूरे देश में पब्लिक-हालीडे होगा। यह भी तय हुआ 1994 में, महज लगभग 24 वर्ष पूर्व वह भी लोकतांत्रिक तरीके से। ऐसा नहीं है कि सरकार का मना आया और तय कर दिया कि इसको पूरे देश में ऑस्ट्रेलिया-दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
ऑस्ट्रेलिया में ऐसा कोई दिवस सार्वजनिक रूप से सरकारी तौर पर नहीं मनाया जाता, जिससे यह साबित हो कि कब पूरा ऑस्ट्रेलिया कब्जाया गया या कब वहां ऑस्ट्रेलिया को गुलाम के रूप में इंग्लैंड का संविधान लागू हुआ, इत्यादि-इत्यादि। उल्टे ऑस्ट्रेलिया में प्रतिवर्ष नेशनल सॉरी डे मनाया जाता है। यह सब होना भी आज के ऑस्ट्रेलिया समाज की लोकतांत्रिक परिपक्वता व संवेदनशीलता को ही दर्शाता है।
बीमारियों से मौतें
ऑस्ट्रेलिया एक हजारों वर्षों से अछूती जमीन थी, वहां के लोग जंगलों में पाषाण युग की ही तरह रहते थे। बिना वैज्ञानिक विकास के। इसलिए प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार की कोई भी छेड़छाड़ नहीं हुई। इसका परिणाम यह रहा कि आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के शरीर में बाहरी दुनिया की बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो पाई। उनके शरीर दुनिया की सभ्यताओं में मनुष्यों को होने वाली बीमारियों को जानते तक नहीं थे।
ब्रिटिश जब ऐसी अछूती जगह पहुंचे तो उनके शरीरों से ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के लिए बीमारियां अपने आप हावी होती गईं। आदिवासियों की कुल हुई मौतों में से अधिकतर लगभग 95% मौतें बीमारियों से हुईं। उस समय तकनीक इतनी व्यवस्थित नहीं थी कि बिना बैकफायर हुए खड़यंत्र करके बीमारियों के कीटाणुओं को इंजेक्ट करके सामूहिक हत्याएं वह भी स्थितियों में नियंत्रण रखते हुए की जा सके। आदिवासी लोगों में नगरीय सभ्यता का विकास तक नहीं था कि उन्हें किसी घेरे में आइसोलेट करके बीमारियों के कीटाणुओं से मारा जा सके।
ब्रिटिश लेखकों की संवेदनशीलता व लेखन-ईमानदारी ही है कि वे बीमारियों से होने वाली मौतों के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते थे/हैं। जबकि उस काल में ऐसा कर पाना नियंत्रित तरीके से संभव नहीं था, कि आदिवासियों को जबरदस्ती बीमारियों के कीटाणु पिला कर उनकी सामूहिक हत्याएं किया जाना संभव हो। लेकिन ब्रिटिश लेखक यह मानते थे/हैं कि यदि वे लोग नहीं आते तो बीमारियां नहीं फैलतीं और लोग नहीं मरते, इसीलिए वे कहते हैं कि हमने बीमारी फैलाकर आदिवासियों को मारा।
संघर्ष में मौतें
ब्रिटिश 1788 में ऑस्ट्रेलिया आए। पहला सामूहिक हत्याकांड 1838 में हुआ जिसमें 28 आदिवासियों की हत्याएं हुईं।1884 में 200 से अधिक आदिवासी मारे गए। ऑस्ट्रेलिया में आने के बाद आदिवासियों के साथ लगभग 200-225 वर्षों के संघर्ष में प्राइवेट हत्याओं को जोड़ते हुए आदिवासियों की लगभग 10 से 20 हजार मौतें हुईं। लगभग डेढ़ से दो शताब्दियों में इतनी हत्याएं दुनिया के इतिहास को देखते हुए तथा ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी व ब्रिटिश के लोगों के विकास व सभ्यताओं के स्तर के भयंकर अंतर को देखते हुए, नगण्य संख्या ही है। पाषाण-काल में जीने वाले ऑस्ट्रेलिया-आदिवासियों की तुलना में ब्रिटिश इतना विकसित थे कि पूरी आदिवासी सभ्यता को ही कुछ महीनों में ही चुन-चुन कर खतम कर सकते थे।
वर्तमान ऑस्ट्रेलिया व आदिवासी समाज
जिन लोगों ने वास्तव में कभी भी कहीं भी जमीन पर समाज के लिए गंभीर व बड़े स्तर पर सामाजिक काम किया है, जिन लोगों के पास मौलिक सामाजिक सोच है, जो घृणा, पूर्वाग्रह इत्यादि पर आधारित नहीं है। ऐसे लोगों ने यदि योरप, अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया देशों के समाजों को नजदीक से देखा है। तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वे इस बात से सहमत होंगे कि ऑस्ट्रेलियन्स विनम्र, अहिंसक, लोकतांत्रिक व गैर-सामंती मानसिकता के लोग हैं।
ऑस्ट्रेलियाई समाज की एक विशिष्टता और है, कि आज ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या के लगभग 65% लोग अनीश्वरवादी हैं। दुनिया में देश की जनसंख्या का प्रतिशत जो अनीश्वरवादी है, ऑस्ट्रेलिया चौथे/पांचवे स्थान पर आता है। मैं यहां चीन जैसे देशों को नहीं जोड़ रहा हूं जहां लोगों की अधिकतर इच्छा अनिच्छा स्वैच्छिक न होकर सरकार के जबरदस्ती थोपे गए नियमों के आधार पर होता है। यदि चीन के सरकारी-गुंडई के दावों को छोड़ दिया जाए तो चीन की जनसंख्या का लगभग 20% लोग ही अनीश्वरवादी हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया के उन लोगों के आकड़े न जोड़े जाएं जो लोग भारत व चीन जैसे देशों से जाकर बसे हैं तो आस्ट्रेलिया दुनिया का पहला या दूसरा ऐसा देश हो सकता है जिसकी जनसंख्या का सबसे अधिक प्रतिशत लोग अनीश्वरवादी हैं।
किसी भी हिंसक, बर्बर व क्रूर मानसिकता के लोकतांत्रिक समाज के लोग विनम्र, अहिंसक, गैर-सामंती व लोकतांत्रिक मूल्यों के लोग नहीं हो सकते हैं। बहुत बड़ी संख्या में स्वेच्छा से अनीश्वरवादी नहीं हो सकते हैं। लेख में आगे की बातों को समझने व महसूस करने के लिए यह एक मूलभूत तत्व है।
आदिवासियों का दूतावास
26 जनवरी 1972 को ऑस्ट्रेलिया दिवस की शाम को चार आदिवासी युवाओं माइकल अंडरसन, बिल्ली क्रैगी, बर्ट विलियम्स और टोनी कूरे ने ऑस्ट्रेलिया संसद के सामने एक बीच छाता लगाकर उसे आदिवासी दूतावास का नाम दे दिया। इस दूतावास को ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी व गैर-आदिवासी नागरिकों का सहयोग मिला, विभिन्न उतार चढ़ाव देखते हुए यह दूतावास 1995 में ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्वपूर्ण स्थानों के रूप में पंजीकृत हुआ।
आदिवासी संरक्षित क्षेत्र
ऑस्ट्रेलिया में अनेकों आदिवासी संरक्षित क्षेत्र हैं। इस आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी संस्कृति पूरे सम्मान के साथ जीवित व संरक्षित है। उनकी संस्कृति से न्यूनतम छेड़छाड़ किए हुए बेहतरीन नागरिक सुविधाएं देती है। इन क्षेत्रों में गैर-आदिवासी लोगों का प्रवेश बिना सरकार व बिना आदिवासियों की अनुमति के प्रवेश प्रतिबंधित रहता है।
आदिवासियों को विशिष्ट सुविधाएं
आदिवासियों की वर्तमान जनसंख्या लगभग साढ़े सात लाख है। सरकार ने बेहतरीन गुणवत्ता के लगभग दो लाख घर, डेढ़ लाख से अधिक स्विमिंग पूल, पौने दो लाख से अधिक आउटडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग डेढ़ लाख इनडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग पौने दो लाख सामुदायिक/सांस्कृतिक केंद्र तथा लगभग दो लाख अतिरिक्त सुविधाएं आदिवासी समाज के लिए उपलब्ध कराए हैं।
आदिवासियों को अनेक प्रकार के विशेष भत्ते मिलते हैं।
— आदिवासियों को आवास
सरकार द्वारा आदिवासियों को दिए गए घरों में से एक घर
— आदिवासियों के लिए प्राथमिक चिकित्सा केंद्र
— आदिवासियों के लिए शिक्षा
— आदिवासी बच्चों के लिए स्विमिंग पूल
आदिवासियों को आरक्षण
बेहतरीन सुविधाओं के अतिरिक्त जितना प्रतिशत आदिवासियों की संख्या है, उतना प्रतिशत उनको विभिन्न स्तरों पर आरक्षण भी प्राप्त है। चूंकि समय के साथ आदिवासियों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है, इसलिए आरक्षण भी बढ़ता जा रहा है। बढ़ते रहने के बावजूद आरक्षण का गैर-आदिवासियों द्वारा विरोध नहीं होता, उल्टे आरक्षण को सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हैं। यह सामाजिक परिपक्वता ही है कि लगभग 200 वर्ष पहले तक पूरी तरह पाषाण युग में जीने वाले लोगों के लिए मेधाविता, योग्यता इत्यादि कारण बताते हुए आरक्षण का विरोध करने की बजाय, सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हुए, आरक्षण का स्वागत करते हैं। आदिवासियों को दोयम नजरों से नहीं देखा जाता है। उनका अपमान नहीं किया जा सकता है। दबंगों द्वारा उनको चौराहों में नंगा करके पीटा नहीं जाता है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं किया जाता है। जबकि भारत में दलितों के साथ आज भी ऐसा होता है, प्रतिवर्ष ऐसी हजारों घटनाएं होती हैं।
नेशनल सॉरी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) 26 मई
बाहरी सभ्यता के ब्रिटिश लोगों के आने के कारण ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की बीमारियों के कारण लगातार मौतें हो रहीं थीं। उनकी संख्या कम होती जा रही थी। ब्रिटिश पुरुषों के संपर्क में आने के कारण आदिवासी महिलाओं से संकर-जाति के आदिवासी बच्चे भी पैदा हो रहे थे।
1906 के लगभग आस्ट्रेलिया सरकार ने यह निर्णय लिया कि जो संकर बच्चे हैं उनको उनकी आदिवासी माताओं से लेकर सरकार के संरक्षण में रखा जाए। उनको पढ़ाया लिखाया जाए, प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे आधुनिक सभ्यताओं के साथ तालमेल बना कर जी सकें। ये बच्चे 16 से 18 वर्ष की आयु तक सरकारी संरक्षण में रखे जाते थे। उसके बाद उनको उनके आदिवासी परिवार का परिचय दिया जाता था, उनको अपनी आदिवासी माता का सरनेम लगाने का अधिकार भी दिया जाता था। इन बच्चों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती थी लेकिन उनके पास अपना परिवार नहीं होता था। इस नीति के कारण लगभग 60 वर्षों में लगभग 25,000 बच्चे अपनी आदिवासी माता से अलग करके सरकारी संरक्षण में पाले गए।
लेकिन कुछ दशकों बाद सरकार को यह महसूस हुआ कि यह तरीका उचित नहीं है, अमानवीय है तथा जो भी होता आया है वह गलत है। तब सरकार ने 1967 में यह नीति बंद कर दिया। आगे चलकर सरकार ने यह स्वीकार किया कि यह आस्ट्रेलिया के लिए सबसे शर्मिदगी वाली नीति रही। ऐसा नहीं होना चाहिए था।
सरकार ने पूरे देश की ओर से आदिवासियों से क्षमायाचना करने के लिए 26 मई 1998 को पहली बार आधिकारिक तौर पर नेशनल सारी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) के रूप में मनाया, तब से प्रतिवर्ष 26 मई नेशनल सारी डे के रूप में मनाया जाता है। हजारों-लाखों लोग मार्च करते हैं।
प्रधानमंत्री ने संसद व सरकार की ओर से आधिकारक रूप से क्षमा मांगी
आस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री ने पूरे देश की ओर से आधिकारिक तौर पर आदिवासियों से 13 फरवरी 2008 को पुरानी सरकारों व संसदों की ओर से क्षमायाचना की।
यह आधुनिक ऑस्ट्रेलिया-समाज की परिपक्वता ही है कि उन्होंने समय के साथ परिष्कृत होते हुए, गलतियों को स्वीकारते हुए, एक ऐसा देश बनाया जिसमें लोग अभय के साथ बेहतर जीवन जीते हुए रहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो मौका देखकर आदिवासी व गैर-आदिवासी एक दूसरे की हत्याएं कर रहे होते। जगह-जगह पुलिस व सेना के बैरियर लगे रहा करते। ऑस्ट्रेलिया एक बेहद शांतिप्रिय व लोकतांत्रिक देश नहीं होता।
हमारा भारतीय समाज
यदि हम भारतीय भी चिंतन व दस्तावेजी लेखन में ईमानदार होते तो हमारे पास भी दस्तावेज होते जिनमें लिखा होता कि हमारी जाति व्यवस्था के कारण अछूतों को ऐसी गंदी जगहों में रहने के लिए बाध्य होना पड़ा कि हर साल बीमारियों से हजारों लाखों अछूत मरता रहा। यह भी लिखते कि जमीनों में अधिकार न होने, लेकिन उन्हीं जमीनों में रात दिन बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के कारण, अकाल में लाखों अछूतों की हत्याएं की जाती रहीं। लेकिन इतना ईमानदार होने के लिए जिस समझ दृष्टि व जिगर की जरूरत होती है, वह न तब थी और न ही अब उन लोगों के पास है। जो लोग अपने गिरेबां में झांकने की बजाय पूरी बेशर्मी के साथ ऑस्ट्रेलिया को 200-225 वर्ष पहले के लिए गाली देते हैं, उनके अपने ही पूर्वजों व उनके अपने ही समाज ने ऑस्ट्रेलिया की तुलना में सैकड़ों-हजारों गुना अधिक हत्याएं की हैं, वह भी अपने ही समाज के लोगों की।
जाति-व्यवस्था के द्वारा संस्थागत हत्याएं
भारतीय समाज ने लाखों शूद्रों की हत्याएं संस्थागत रूप से की हैं। यहां तक की आजादी के बाद भी प्रतिवर्ष सैकड़ों हजारों हत्याएं हमारा समाज करता आ रहा है, अब भी कर रहा है। सैकड़ों हत्याएं तो केवल अलग-अलग जाति के लड़का लड़की के प्रेम के कारण आनर किलिंग के कारण होती हैं।
बीमारियों से मौतें
यदि हम यह मानते हैं कि ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याएं बीमारियां फैला कर जानबूझकर कीं। तो यही बात हमें अपने समाज पर भी लागू करनी पड़ेगी क्योंकि हैजा, चेचक, मलेरिया जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों में से अधिकतर मौतें शूद्रों की ही होती थीं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि शूद्रों की हत्याएं करने के लिए ऐसी बीमारियां फैलाई जातीं थीं। भारत में प्रतिवर्ष विभिन्न माध्यमों से लाखों शूद्रों की हत्याएं होतीं थीं।
अकाल से मौतें
भारत में पिछले लगभग 150 वर्षों में अकाल से लगभग 6 करोड़ मौतें हुईं। इनमें से अधिकतर मौतें शूद्रों की हुईं। जाति व्यवस्था के कारण सामाजिक आर्थिक ढांचा ऐसा रहा कि अकाल के कारण करोड़ों शूद्रों की मौतें हुईं।
स्त्री-भ्रूण हत्याएं
हम और हमारा समाज इतना रेसिस्ट है कि केवल लिंगभेद के कारण ही सख्त कानूनों व जागरूकता के बावजूद केवल पिछले 20 वर्षों में ही एक करोड़ से अधिक स्त्री-भ्रूण हत्याएं की हैं। मतलब यह कि हमारा समाज प्रति वर्ष उतनी स्त्रियों की हत्या उनके जन्मने के पहले ही कर देता है, जितनी लगभग ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जनसंख्या थी, जब 1788 में ब्रिटिशर्स ऑस्ट्रेलिया पहली बार पहुंचे थे। हमें ब्रिटिशर्स का रेसिज्म दीखते है लेकिन अपना रेसिज्म नहीं दीखता है, जबकि हमारा रेसिज्म बेहद अधिक घिनौना व भयानक है।
दहेज हत्याएं
हमें यह दीखता है कि संपत्ति के लिए ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की हत्याएं 200-225 वर्ष पहले कीं। हमें यह भी देखना चाहिए कि हमने आजादी के बाद दहेज में संपत्ति के लिए कितनी महिलाओं की हत्याएं कीं। जितनी हत्याएं ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की कुल हत्याएं की, उस संख्या से तो तुलना ही नहीं हो सकती क्योंकि हमने केवल दहेज के चक्कर में ही ऑस्ट्रेलिया में कुल आदिवासियों की संख्या से अधिक हत्याएं की हैं।
धार्मिक-दंगों में हत्याएं
आजादी के समय, 1964 में गुजरात दंगे, 1984 में सिखों के विरुद्ध दंगे (20,000 से अधिक सिख मारे गए) 50,000 से अधिक सिख-घर जलाए गए।
माओवादियों द्वारा हत्याएं
1970 के बाद भारत में माओवादियों की जमात ने पिछले लगभग 50-60 वर्षों में अपने ही देश के हजारों लोगों व आदिवासियों की हत्याएं की हैं। इससे बहुत ही कम हत्याएं 200-225 वर्ष पहले ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की थी, वह भी तब जब ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी न तो ब्रिटिश थे न ही गोरे लोग थे। भारत में माओवादियों ने भारतीय आदिवासी समाजों की संस्कृति लगभग पूरी तरह नष्ट कर दी, उनको अपना मानसिक गुलाम बना रखा है। छोटी-छोटी बात पर प्रतिवर्ष अनेकों आदिवासियों की हत्याएं आज भी कर रहे हैं।
चीन में माओवाद/वामपंथ की हिंसा (माओवाद के प्रति रोमांस रखने वालों के लिए)
यदि माओ द्वारा सत्ता प्राप्ति की प्रक्रिया में व सत्ता प्राप्ति के बाद करवाई जाने वाली करोड़ों हत्याओं की चर्चा न भी की जाए, तब भी चीन ने केवल 1989 में ही अपने ही देश के दसियों बीसियों हजार युवाओं को तियाननमेन चौक पर गोलियों से भून दिया। यह संख्या उन कुल हत्याओं से भी अधिक है जो ब्रिटिश ने ऑस्ट्रेलिया में 200-225 वर्ष पूर्व के समय से लगभग 150 वर्षों में कीं।
जितनी हत्याएं चीन ने 1989 में केवल तियाननमेन चौक पर कीं, उसकी तुलना ब्रिटिशर्स द्वारा की गई ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याओं से हो ही नहीं सकती, जबकि वे ऑस्ट्रेलिया में बाहर से आकर कब्जा कर रहे थे।
चलते-चलते
हमारे भारतीय समाज में सोशल मीडिया का प्रयोग करने वाले ऐसे बहुत लोग हैं, जिनके पेट भरे हैं, भारी भरकम वेतन व सुविधाएं पाते हैं। जीवन में कभी भी समाज में जाकर कोई भी ठोस व गंभीर काम/प्रयास तक नहीं किए होते हैं। ठोस व गंभीर काम/प्रयास छोड़िए दूसरों के गंभीर कामों/प्रयासों में सक्रिय भागीदारी तक नहीं किए होते हैं। कुल मिलाकर बात यह कि समाज क्या है, समाज के लोग क्या हैं, इत्यादि को जानने समझने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं, कोई जीवंत अनुभव नहीं। समाज को समझने के लिए अपने अनुभव का कुछ न कुछ तो आधार होना ही चाहिए। यदि ऐसा नहीं तो जो कुछ भी है वह सिवाय तर्कबाजी या बतोलेबाजी के कुछ भी नहीं। बिना वस्तुनिष्ठता के तर्कों का कोई भी वास्तविक मोल नहीं, बौद्धिक विलासिता जरूर होती है।
ऐसा भी नहीं कि ये लोग जमीन पर ठोस व गंभीर काम/प्रयास नहीं करते हैं, तो गंभीर व विस्तृत स्वाध्याय ही करते हों। पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहते हैं, अपने मन में पहले से अपनी पसंद नापसंद के आधार पर तय कर लेते हैं। इसके बाद गूगल में सर्च करते हैं या कुछ किताबों को सरसरी दृष्टि से पढ़ लेते हैं। फिर कुछ अपना टटपुंजिया कमेंट के रूप में कुछ शब्दों या कुछ लाइनों का एडिटर्स नोट टाइप लगाते हुए कोई लिंक उठाकर चिपका देते हैं या कभी कभार कुछ फालतू समय हुआ या आफिस में बैठे-बैठे ऊबऊ महसूस कर रहे हों तो गूगल में कहीं कुछ मनचाहा मिल गया हो तो उसका हिंदी अनुवाद करके चिपका देते हैं, दो चार शब्दों या लाइनों का अपने ज्ञान का तड़का भी लगा सकते हैं।
इसमें से कहीं भी, कुछ भी ऐसा नहीं, जिसमें समाज को जानने समझने के प्रति गंभीरता, वस्तुनिष्ठता, ईमानदारी, संवेदनशीलता इत्यादि होती हो।
करेला ऊपर से नीम चढ़ा वाली स्थिति यह होती है कि, भारतीय समाज में कोरी भावुकता सबसे अधिक प्रभावी रहती है। अधकचरी व यहां वहां से नकल उतारी जानकारी को उटपटांग तरीके से तोड़मोड़ देना ज्ञानी होना होता है। अहंकार भी इतना कि मानसिक व भावनात्मक हिंसा की हदों की सीमा ही नहीं। तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता के साथ चर्चा हो ही नहीं सकती है। जब गंभीरता है ही नहीं, तो जानने समझने का गंभीर व ईमानदार प्रयास हो ही नहीं सकता, संभव ही नहीं। सबकुछ पूर्वाग्रह व व्यक्तिगत पसंद नापसंद व रोमांटिज्म के द्वारा ही नियंत्रित होता है, इस प्रकार के चरित्र से तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा करना ही व्यर्थ होता है।
यह पोस्ट पेट भरे, सुरक्षित व सुविधाओं से युक्त लग्जरियस जीवन जीने वाले उन वामपंथी व माओवादी सोच के लोगों के लिए भी है जिनके खाते में सिर्फ बतोलेबाजी के सिवाय, ईमानदार गंभीर सामाजिक सक्रियता व योगदान नहीं आते हैं। यदि किंचिंत मात्र सा भी चिंतन करने, देखने समझने, महसूस करने का ईमानदार शऊर होगा, तो उनको इस पोस्ट से कुछ सीखने समझने को मिल ही जाएगा। अन्यथा जैसा उनकी सोच व चरित्र है, वह तो है ही।
चिंतन व विश्लेषण पूर्वाग्रह, व्यक्ति पसंद नापसंद से इतर वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। ऐसा होना तभी हो पाता है जब समझने में जीवन विभिन्न स्तरों में जीवन लगाया गया हो। नहीं तो क्षुद्र चिंतन तो हजारों वर्षों से अनेक लोग करते चले आ रहे ही हैं, इतिहास पुरुषों के रूप में प्रायोजित भी होते रहते हैं, जबकि समाज उत्तरोत्तर अधिक सड़ता रहता है। हम वास्तव में कैसे हों, हमारी सोच व मानसिकता कैसी हो, हमारी समझ का स्तर क्या हो, हमारे ज्ञान का स्तर क्या हो, यह निर्णय तो हमें ही लेने होते हैं।
He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.
For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.
He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.
मनुष्य के बिना परिवार, समाज व देश नहीं हो सकता; जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहाँ परिवार, समाज व देश होगा ही होगा। मनुष्य परिवार, समाज व देश से बड़ा है, क्योंकि वह निर्माता है। देश व समाज की सत्ता, जीवन-मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही निर्मित, निर्धारित व परिवर्तित करता है। यही सहज सामाजिक तथ्य है; शेष राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व के लिए तोड़मरोड़ कर निहित-स्वार्थों के लिए थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं।
मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिए देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है, जिसका निर्माता स्वयं मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़, गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है। देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचना है। इसलिए जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है। परिवार, देश व समाज का निर्माण व विकास करना मनुष्य की जिम्मेदारी है।
जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की पुस्तकों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा। यही वास्तविक व व्यापक परिवर्तन होगा। मानव निर्मित सत्ता तंत्रों को चलाने वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है।
नेतृत्व
“मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के द्वारा व्यापक सामाजिक-परिवर्तन के लिए सामाजिक-नेतृत्व प्रस्फुटित नहीं होता; सामाजिक-नेतृत्व राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम समाज की मौलिकता व गुणवत्ता से स्वतःस्फूर्त रूप में प्रस्फुटित होता है“
राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भी सामाजिक-अवतार नहीं होता। जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्हीं तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जाने का साहस व दृष्टि हो ही नहीं सकती है। इसीलिए तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते हैं। ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।
सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह कभी भी मानव समाज का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता। क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह गढ़ी गईं है, जिनमें सबसे नीचे के आधार सबसे चौड़े और सबसे ऊपर की चोटियाँ सबसे नुकीली व सबसे कम चौड़ी होती हैं।
मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाते हुए, निरंतर दबाए रहते हुए ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिए मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, न ही व्यापक-समाधान की दृष्टि रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।
भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिष्ठापित किए गए हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।
विश्व में अन-आयुधिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलते हुए ही अस्तित्व में आए हैं।
सामाजिक-नेतृत्व
सामाजिक-परिवर्तन व निर्माण कर पाने में सक्षम नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण मौलिकता, गुणवत्ता, दूरदर्शिता, स्वतः स्फूर्ति के मिथकों के प्रयोजन बिना ही होता है। भारत जैसे बड़े देश व समाज में स्वतः स्फूर्त व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण न हो पाने के प्रमुख कारण जाति-व्यवस्था, ईश्वरीय अवतारों व इन अवतारों का धरती पर ईश्वरीय व्यवस्था के प्रयोजन के कारण अवतरित होने की अवधारणाएं, साहित्यिक काव्यों/ग्रंथों को संपूर्ण ज्ञान व ईश्वरीय मानने की अवधारणा, पोथियाँ, पौराणिक कथाएं व सामंतवादी मानसिकता आदि रहे हैं।
— जाति
जाति-व्यवस्था के कारण सामाजिक-नेतृत्व का मूल-आधार पुरुषार्थ, कर्म व क्षमता आदि जैसे तत्व नहीं हो पाये। ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य जाति के लोगों के पास ही सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक नेतृत्व के जन्मजात अधिकार रहे। इसीलिए नेतृत्व की दावेदारी समाज की मौलिकता व गुणवत्ता के बजाय जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था के कारण समाज के बहुत ही छोटे हिस्से में संकुचित रही। जन्मजात नेतृत्व की दावेदारी करने वाले समाज के इस हिस्से की अधिकतर ऊर्जा जाति-व्यवस्था को ईश्वरीय प्रयोजन सिद्ध करते रहने के लिए कपोल कल्पित ईश्वरीय गाथाएं, मिथक व कपोल कल्पित ईश्वरीय अवतार प्रायोजित करने व गढ़ने में ही लगती रही।
सामाजिक-नेतृत्व के सतही व अवैज्ञानिक होने, ढोंग व मिथकों आदि के द्वारा प्रायोजित होते रहने के कारण मौलिक, गुणवान् व दृष्टिवान् सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं का भ्रूण भी नहीं पनप पाया।
सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग की अवधारणा, जन्मजात जाति-व्यवस्था, धर्म का क्षय होने पर धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के द्वारा अवतार लेने की अवधारणा, मंत्रों व ईश्वरीय नाम के जाप द्वारा सुविधा/प्रतिष्ठा/समृद्धि आदि का मनचाहा वरदान या सिद्धि प्राप्त कर पाने की अवधारणा, सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य सत्य में देवतुल्य था; आदि आदि जैसी विभिन्न अवैज्ञानिक अवधारणाओं ने भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की भ्रूण-संभावना को ही नष्ट कर दिया और भ्रूण-संभावना का यह नष्टीकरण परंपरा में हजारों वर्षों तक व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक मानसिकता आदि के विभिन्न स्तरों में गहरे अनुकूलन को प्रायोजित व स्थापित करने के साथ होता रहा।
ज्ञान व सामाजिक-नेतृत्व के लिए ब्राह्मण जाति में पैदा होकर पोथियाँ, पुराण, महाकाव्य, काव्य आदि रट कर उनको मुंह से बोलना व उनमें बताए हुए कर्मकांड आदि को करना ही पर्याप्त रहा। मिथकों के प्रायोजन; व प्रायोजित मिथकों पर शाब्दिक व साहित्यिक विशेषज्ञता आदि के आधार पर सामाजिक-नेतृत्व का स्तर व प्रतिष्ठा निर्धारित होती रही। ब्राह्मण वर्ग की अधिकतर ऊर्जा इन्ही सबमें लगती रही और ऐसा करने को ही संस्कृति, संस्कार, पुरुषार्थ, ज्ञान, योग्यता आदि का नाम दे दिया गया।
भारत की सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी का सबसे प्रमुख कारण यही रहा कि क्षत्रिय वर्ग को दरबारी भाटों, चाटुकारों व मिथक-साहित्य विशेषज्ञों ने झूठी कहानियाँ व मिथक गढ़ कर ही ईश्वरत्व रूप में जन्मजात पुरुषार्थी, निर्भय, रक्षक, शासक, राजनैतिक दूरदर्शिता व दृष्टिकोण आदि से संपन्न प्रायोजित कर दिया। गढ़े हुए मिथकों की पुष्टि करने के लिए ब्राह्मण वर्ग ने अनेकों पौराणिक कथाएं परंपरा में सत्य कथाओं के रूप में प्रायोजित करके, राजनैतिक सत्ता से अपना संबंध स्थापित करने के लिए क्षत्रिय वर्ग के द्वारा राजनैतिक सत्ता के भोग को ईश्वरीय प्रावधान के दायित्व का निर्वहण प्रायोजित कर दिया।
यदि पौराणिक कथाओं को संज्ञान में लिया जाए तो मानव समाज की समस्यायें समाधानित करने के लिए, मानव समाज को विकास की ओर गतिमान करने के लिए ईश्वर खुद अवतार के रूप में आवश्यकता पड़ने पर बारंबार सामाजिक-नेतृत्व करने आता रहा। इस प्रकार सामाजिक-नेतृत्व मनुष्य के वास्तविक पुरुषार्थ एवम् समझ की क्षमता से अर्जित न होकर ईश्वरीय योजनाओं के निर्वाहक या परिपूरक के रूप में प्रायोजित व स्थापित रहा। इन मिथकों से भारतीय समाज में अकर्मण्यता प्रतिष्ठित हुई और मौलिक-गुणवत्ता की निरंतर भ्रूणहत्या होती रही।
समय के साथ अवतारों के बजाय अवतारों की गाथाएं गढ़ने वाले, अवतारों की चर्चा करने वाले, ग्रंथों/महाकाव्यों/काव्यों आदि को रटने वाले, धार्मिक अनुष्ठानों व कर्मकांडों आदि को करने वाले ही सामाजिक-नेतृत्व के रूप में प्रायोजित व स्थापित किए जाने लगे। ब्राह्मण व क्षत्रिय को सिर्फ जाति विशेष में पैदा होने के कारण ही ‘सामाजिक-नेतृत्व’ की मान्यता दी जाती रही। परिणामस्वरूप ‘सामाजिक-नेतृत्व’ भी जन्म के आधार पर प्रायोजित होता रहा।
भारत में ‘सामाजिक नेतृत्व’ लोगों में ‘आभामंडल-सत्ता’ स्थापित करने का और विभिन्न सत्ताओं द्वारा प्रायोजित होने का ही रहा है, इसीलिये ‘सामाजिक नेतृत्व’ और ‘सत्ताओं’ का आपस में बहुत गहरा व विश्वसनीय रिश्ता रहा है। यही कारण रहा कि भारत में शताब्दियों के बाद आज तक भी भारतीय समाज में स्वत: स्फूर्त ‘सामाजिक नेतृत्व’ आकार नहीं ले पाया।
चूंकि समाज में जाति-व्यवस्था के कारण स्वतः स्फूर्त, वास्तविक-गुणवान् व मौलिक नेतृत्व विकसित होने की परंपरा नहीं बनने दी गई इसीलिए समाज के लोग धूर्त, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी, कामचोर और अवसरवादी आदि होते चले गए, क्योंकि जाति-व्यवस्था के निरंतर स्थापना-प्रयोजन के लिए यही आधारभूत मूल्य व तत्व होते हैं। जाति-व्यवस्था के कारण भारतीय समाज कभी देश व समाज के प्रति ईमानदार व प्रतिबद्ध नहीं हो पाया केवल व्यक्तिगत लिप्साओं, स्वार्थों, भोगों, विलासिताओं, बाजार के उपभोक्तवाद पर आधारित उपभोक्ता बने रहने की व्यक्तिगत आर्थिक सुरक्षा आदि स्वार्थ-केंद्रित महात्वाकांक्षाओं के लिए प्रयत्न करना ही जीवन के मायने मान लिया गया।
भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की वास्तविकता समझने के लिए एक कहानी को ही समझना पर्याप्त है। महान् गुरू के रूप में स्थापित द्रोणाचार्य ने अद्वितीय प्रतिभाशाली किशोर एकलव्य के दाहिने हाथ का अगूँठा केवल इसलिए कटवा दिया क्योंकि एकलव्य आदिवासी था और द्रोणाचार्य अपने शिष्य, जो एक बहुत बड़े राज्य का राजकुमार था, को महान् धनुर्धारी के रूप में प्रायोजित करना चाहते थे। यह कहानी उस समाज की है जो गुरू-शिष्य परंपरा की संस्कृति की बात करता है और जिस समाज ने द्रोणाचार्य को महानतम गुरू का स्थान दे रखा है। द्रोणाचार्य बहुत कुशल धनुर्धारी हो सकते थे लेकिन उन्होंने सामाजिक गुरू होने के मूल्यों का ही पतन किया और भारतीय समाज को एकलव्य जैसे अद्वितीय धनुर्धारी से वंचित कर दिया। भारतीय समाज ने विभिन्न स्तरों व क्षेत्रों में अगणित एकलव्यों के अगूँठे काटे हैं। काश! यदि इन एकलव्यों के अगूँठे नहीं काटे गए होते, काश! विभिन्न स्तरों पर प्रायोजित लोग स्थापित नहीं किए गए होते तो आज भारत को प्राचीन-काल की गाथाएं गाकर खुद को महान् सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती, न ही भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहता और न ही आज पिछलग्गू होता।
— स्त्री
समाज का बहुत बड़ा हिस्सा शूद्र-वर्ण में रखा गया, जिसको जीवन के मौलिक अधिकार पशुओं जैसे तक नहीं थे। शूद्र-वर्ण के अतिरिक्त जो वर्ण थे, उन वर्णों की भी लगभग आधी जनसंख्या अर्थात् स्त्री को पशु और वस्तु की श्रेणी में रख दिया गया। इस प्रकार समाज का पाँच में से चार जैसा बहुत बड़ा हिस्सा परंपरा में अपनी मौलिकता की भ्रूण-हत्या व अघोषित दासता का बर्बर-शोषण ही झेलता रहा। बचा-खुचा एक-पाँचवा हिस्सा परंपरागत मूर्खतापूर्ण सीमा में ही तथाकथित सामाजिक-नेतृत्व देता रहा।
प्रायोजित सामाजिक-नेतृत्व ने स्त्री, जो जीवंत व चेतनशील मनुष्य है, उसको वस्तु के रूप में प्रायोजित कर दिया। मनुष्य के रूप में स्त्री के अस्तित्व व चेतनशीलता का कोई वजूद ही नहीं रहने दिया गया। स्त्री को पुरुष की अघोषित संपत्ति बना दिया गया। स्त्री जिस पुरुष की संपत्ति है, उस पुरुष के अस्तित्व में ही अपने अस्तित्व को बिना सवाल विलीन करने व ऐसा करने में अपने जीवन का लक्ष्य, सफलता व गौरव मानने के लिए निरंतर अनुकूलित किया जाता रहा।
जो संस्कृति स्त्री को देवी मानने का दावा करती है उसी के समाज में स्त्री को प्रेम करने से वंचित कर दिया गया, अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार नहीं दिए। यहाँ तक कि स्त्री को अपना पति तक चुनने का अधिकार नहीं रहा। जिस स्त्री को देवी कहा गया उसी को पर्दे में धकेल दिया गया, शिक्षा से वंचित रखा गया व संपत्ति में अधिकार नहीं दिए गए ताकि वह सदैव पुरुष की दासी बनी रहे। स्थिति की भयावहता की कल्पना इस बात से की जा सकती है कि आज भी प्रतिवर्ष लाखों स्त्रियों की हत्या माता के गर्भ में ही खुद उनके ही माता-पिता द्वारा कर दी जाती है। आज भी हजारों स्त्रियों की हत्या उनके ही माता-पिता व परिवार के द्वारा केवल इसलिए कर दी जाती है, क्योंकि स्त्री अपने माता-पिता व परिवार की इच्छा के विरुद्ध जाकर अपनी इच्छा से प्रेम-विवाह करना चाहती है।
स्त्री जिसे देवी कहा गया वही स्त्री प्रेम करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पर्दा न करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पुरुष की उपस्थिति में खुलकर खिलखिलाकर हँस ले तो वह चरित्रहीन व कुलटा। स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया लेकिन स्त्री के द्वारा पुरुष के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व देखने को ही उसका देवी होना प्रायोजित कर दिया गया। स्त्री के द्वारा परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष और पुरुष के परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष, फिर भी स्त्री पुरुष की अर्धांगिनी। स्त्री के गृहस्थ कार्यों को श्रम की श्रेणी में नहीं रखा गया जबकि वह संतान की जननी व पालन पोषण करने वाली भी है। स्त्री की कर्मशीलता को पुरुष के कारण होना मान लिया गया परिणामस्वरूप स्त्री के द्वारा सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं के भ्रूण की भी संभावना की स्थिति समाप्त हो गई। यही कारण हैं कि बलात्कार होने पर या स्त्री के साथ दुर्व्यवहार होने पर, समाज स्त्री को ही दोषी ठहराता रहा है। चूंकि स्त्री को मनुष्य माना ही नहीं गया, इसीलिए स्त्री के पहनावे या बोलचाल या व्यवहार के तरीके को बलात्कार का कारण ठहराया जाता है। इसको कुछ इस रूप में देखा जाए जैसे कोई वस्तु यदि रात में घर के बाहर पड़ी है तो कोई भी उसे चुराकर ले जा सकता है, उसी प्रकार स्त्री यदि रात में घर से बाहर है तो कोई भी उसके साथ बलात्कार कर सकता है। कोई महंगी वस्तु यदि छिपाकर न रखी जाए तो उस पर चोरों की नजर पड़ी रहेगी और वे चुराने का प्रयास करेंगे, वैसे ही स्त्री यदि छोटे कपड़े पहने है तो पुरुष स्त्री का स्त्रीत्व चुराएगा। एक समाज जो स्त्री को देवी मानता है, वही समाज स्त्री के बारे में सब कुछ बहुत ही अधिक वीभत्सपूर्ण घिनौनेपन और असंवेदनशीलता से तय करता है, जैसे स्त्री निर्जीव-वस्तु हो।
— शाब्दिक/कृत्रिम तार्किकता व प्रायोजित विद्वता बनाम कर्मकांड व संस्कृति
प्रकृति व ईश्वर को समझने का दावा करके प्रतिपल कर्मकांडों को रचने व महिमामंडित करने वाली संस्कृति वास्तव में केवल दर्शन की शाब्दिक व कृत्रिम तार्किकता की अव्यावहारिक विद्वत्ता ही होकर रह गई। यदि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था नहीं होती, स्त्री को मनुष्य माना गया होता और दर्शन को शाब्दिक तार्किकता व कृत्रिमता आदि से ऊपर उठकर समझने व जीने की चेष्टा की गई होती तो भारतीय समाज एक ढोंगी, कुंठित व पिछलग्गू समाज होने के बजाय विश्व के वास्तविक सर्वश्रेष्ठ समाजों में से होता और वास्तव में ही विश्व को विकास व समृद्धि के सार्थक मायने समझाते हुए समाधानित कर रहा होता।
भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व आज तक भी मौलिकता, गुणवत्ता व पुरुषार्थ से इतर अवसरवादिता, छद्म, ढोंग, मोहकता व आकर्षण आदि के प्रायोजन से देश, समाज व आने वाली पीढ़ियों की कीमत पर, पूरी निर्लज्जता और निरंकुशता के साथ प्रायोजित किये जाते हैं।
सामाजिक-नेतृत्व को परंपरा में विभिन्न सत्ता केंद्रों द्वारा प्रायोजित व स्थापित करते रहने के कारण भारतीय समाज अपने लिए ही क्रूरता की हद तक असंवेदनशील समाज के रूप में दृढ़ होता गया। बचपन से ही अपनी कमजोरियों को देखने, उनके कारणों को समझने और उनको दूर करने की चेष्टा करना सिखाए जाने के बजाय ढोंगो व सतही प्रायोजनो से दूसरों को निर्दयता व असंवेदनशीलता पूर्वक अपने से खराब साबित करके खुद को अच्छा एवम् कर्म व पुरुषार्थ साबित करने की तकनीक सिखाई जाती है। यह मानसिकता ही बचपन से ही जाने-अनजाने चाहे-अनचाहे समाज में भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता, क्रूरता व सामंतवादिता के बीज को पोषित करती रहती है।
हम यदि खुद के जीवन को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि हमारा अपना पूरा का पूरा जीवन ही झूठ और दिखावे का पुलिंदा है। हमें बचपन से ही दिखावे की पुनरुक्ति के लिए इस तरह का अभ्यास करवाया जाता है कि हम खुद अपने आपको ही भूल जाते हैं और अपने ढोंग, खोखलेपन, निर्दयता, असंवेदनशीलता, अवैज्ञानिक-तर्कशीलता व अतथ्यात्मकता आदि को ही अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकता और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि व उद्देश्य मानने लगते हैं। हमें पता ही नहीं चलता और हम सड़ने लगते हैं। जब हमें अपने सड़ने की बदबू आती है, हम बदबू का कारण बाहर खोजते हैं। हम बदबू का कारण बाहर इसलिए नहीं खोजते क्योंकि हमें बदबू का कारण वास्तव में खोजना होता है। ढोंगो और प्रायोजन के आदी हम वास्तव में अपने से अधिक बदबूदार को खोजना चाहते हैं ताकि खुद को उसकी तुलना में खुशबूदार साबित करके खुद को बेहतर प्रायोजित कर खुद को महान् मान लें। यही कारण है कि हम दिन-प्रतिदिन और अधिक सड़ते जाते हैं लेकिन फिर भी दूसरों की तुलना में खुद को खुशबूदार मानते हैं।
— स्वयं के प्रति असंवेदनशीलता
यह हमारी स्वयं के प्रति घोर निर्दयता व असंवेदनशीलता ही है कि हम वास्तविक खुशबू में जीने के प्रयास करने के बजाय अपनी सड़ाँध व बदबू को ही खुशबू के रूप में प्रायोजित करने में अपनी ऊर्जाएं लगाते हैं। हम पूरा जीवन नशे व बेहोशी में जीते हैं, और बेहोशी में जीवन जीने को हम जीवन की व्यावहारिकता कहते व साबित करते हैं; जबकि वास्तव में यह हमारा अपने खुद के प्रति ही और अधिक असंवेदनशील होना ही है।
हम स्वयं को विकसित करने के लिये, स्वयं को बेहतर बनाने के लिए कर्म, प्रयास या चेष्टा नहीं करना चाहते हैं। स्व-निर्माण की प्रसव पीड़ा नहीं झेलना चाहते हैं। इसीलिए हम अपने जीवन के लिए , परिवार के लिए , समाज के लिए व देश के लिए ऐसे सामाजिक-नेतृत्व प्रायोजित करते हैं; जो हमारे जैसे ही हों। सामाजिक-नेतृत्व छोड़िए हमने तो अपने ईश्वर भी अपने ही जैसे बना रखे हैं।
सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण वास्तविक कर्म से हुआ करता है। ढोंग व सतहीपन से युक्त विभिन्न स्तरों पर अनुकूलताओं के प्रयोजन से नहीं। भारत में पारंपरिक रूप से सामाजिक-नेतृत्व समाज की बेहतरी के लिए किए गए पुरुषार्थ, कर्म, सक्रिय चिंतन, जीवंत कर्म-अनुभव आदि मूल्यों के आधार पर नहीं स्वीकृत किए गए हैं। परिणामस्वरूप भारतीय समाज ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक विकास व वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि में बहुत ही पीछे रह गया। शताब्दियों तक राजनैतिक गुलाम रहा और आज भी मानसिक गुलाम है।
— स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व की आवश्यकता
भारत सामाजिक रूप से बहुत अधिक विद्रूपताओं और विविधताओं का देश है। इसलिए भारत का राष्ट्रीय सामाजिक-नेतृत्व वही कर सकता है जो भारत को भारत की विद्रूपता और विविधताओं के साथ स्वीकारे और फिर सबको साथ लेकर चलते हुए बढ़े। सामाजिक नेतृत्व का सामाजिक सरोकारों से बहुत गहरा व स्पष्ट संबंध होता है, बिना सामाजिक सरोकारों व सामाजिक संबंधों को समझे कोई भी सामाजिक नेतृत्व नहीं हो सकता है। भारतीय समाज को शताब्दियों के अनुकूलन से बाहर आकर अपनी वास्तविक स्थिति, गति को स्वीकारते हुए विभिन्न स्तरों पर वास्तविक परिवर्तकों को “सामाजिक-नेतृत्व” के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है।
शाब्दिक व दार्शनिक तर्कशीलता के मानदंडों में अद्वितीय व विलक्षण संस्कृति वाला समाज व्यावहारिक धरातल की वास्तविकता में बहुत ही अधिक अमानवीयता व खोखलेपन को ही पोषित करता व जीता रहा। दर्शन को व्यवहारिक-जीवंतता के स्थान पर केवल शाब्दिक तर्कशीलता तक ही सीमित किया जाता रहा। वास्तव में भारतीय समाज की सबसे बड़ी ऋणात्मकताएं ढोंग, अमानवीयता व असंवेदनशीलता हैं और ये तत्व ही मूलभूत कारण हैं कि भारतीय समाज बहुत ही वीभत्सता के स्तर तक आंतरिक रूप से सड़ा हुआ है। फिर भी समाज के लोग जो खुद अपने ही जीवन में खोखले होते हैं, रटे-रटाए दर्शन की कृत्रिम शाब्दिक-तार्किकता से अपने को व अपनी संस्कृति को जबरन महान् सिद्ध करने में ही अपनी ऊर्जा लगाने में गौरव का अनुभव करते हैं। गीता को महान् बताने वाला समाज, कर्म को ही उपेक्षित रखता आया है।
यदि भारत को वास्तव में आगे बढ़ना है तो पूरी कठोरता व इच्छाशक्ति के साथ बिना लाग-लपेट के सामाजिक-नेतृत्व के प्रायोजनों की परंपरा व अनुकूलता से दृढ़तापूर्वक बाहर निकलकर वास्तविक स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व के प्रस्फुटीकरण का बीजारोपण करना होगा। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं।
He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.
For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.
He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.
20 लाख से अधिक लोगों से पूरे बिहार राज्य के हजारों गावों में विभिन्न माध्यमों से शराब के नशे की लत से नुकसान पर सीधा संवाद व चर्चा किया गया।
10 लाख लगभग महिलाओं का पूरे बिहार राज्य के हजारों गावों में सक्रिय सहयोग रहा।
35 जिलों के 5000 गांवों में गोकुल सेना आंदोलन लेकर पहुंची।
35 जिलों के 5000 गावों में 5000 जनसभाएं गोकुल सेना ने लोगों से सीधा संवाद व जागरूकता के लिए किया गया।
9 जिलों में 500 गावों में लगभग 800 किलोमीटर की अलख यात्रा लोगों से संवाद व जागरूकता के लिए किया गया।
आंदोलन में स्थानीय स्तर पर छोटे-बड़े सामाजिक संस्थाएं व संगठन औपचारिक व अनौपचारिक रूप से समय-समय पर जुड़ते रहे।
प्रस्तावना:
20 नवंबर 2015 को नितीश कुमार जी बिहार के पांचवी बार मुख्यमंत्री बने। 26 नवंबर 2015 को उन्होंने घोषणा की, कि अप्रैल 2016 से बिहार में शराब बंद हो जाएगी। 5 अप्रैल 2016 को नितीश कुमार जी ने पूरे बिहार में आधिकारिक तौर पर पूर्णरूप से शराब बंदी लागू कर दी।
24 नवंबर 2005 से आजतक लगातार नितीश कुमार जी की पार्टी जनतादल (यूनाइटेड) की सरकार बिहार राज्य में रही है, वर्तमान सरकार का कार्यकाल नवंबर 2020 तक है। 20 मई 2014 से 22 फरवरी 2015 के समय, जब जनतादल (यूनाइटेड) के ही जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री रहे, को यदि छोड़ दिया जाए तो 24 नवंबर 2005 से आजतक नितीश कुमार जी लगातार बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं, नवंबर 2020 तक रहने की संभावना भी है।
यह वही नितीश कुमार जी थे, यह वही जनतादल (यूनाइटेड) की सरकार थी, जिन्होंने बिहार में पंचायत स्तर तक शराब के ठेके खुलवाए और शराब से सरकारी आय को कई सौ करोड़ रुपए से कई हजार करोड़ रुपए सालाना पहुंचाया।
लगातार 10 वर्षों तक शराब बिक्री को प्रोत्साहित करने वाले नितीश कुमार जी को नवंबर 2015 में पांचवी बार मुख्यमंत्री बनते ही अचानक ऐसा क्या हुआ कि शराब-बंदी लागू करनी पड़ी।
दरअसल यह न तो अचानक हुआ और न ही यह नितीश कुमार जी की अपनी मौलिक सोच के कारण हुआ। यह निर्णय पूरे बिहार राज्य में निचले स्तर पर व्यापक हो रहे जनांदोलन की देन है। यह आलेख शराब-बंदी की आवश्यकता व शराब क्रांति के जनांदोलन के बारे में चर्चा करता है।
शराब-बंदी की आवश्यकता क्यों:
बहुत लोग जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है या जिनको शराब पीने की लत है। उनको शराब बंदी पसंद नहीं, इसलिए शराब बंदी के विरोध में या माखौल उड़ाने के लिए या आलोचना करने के लिए अपनी शाब्दिक व तार्किक कौशल का प्रयोग करते हुए अपनी बात रखते हैं। दुख इस बात का होता है कि अपनी व्यक्तिगत लत, पसंद या अहंकार के कारण ऐसे लोग अपनी मानसिक ऊर्जा, अपना तार्किक व संवाद कौशल्य का प्रयोग वृहद सामाजिक हित के विरोध में प्रयोग करते हैं।
बच्चों को भोजन न देकर, बच्चों को कपड़े न देकर, बच्चों को शिक्षा न देकर, रुपयों को शराब में बर्बाद करके जीवन नशे में धुत होकर जीना क्योंकर उचित हो सकता है!
शराब पीकर नशे में धुत होकर पत्नी व बच्चों के साथ मारपीट करना क्योंकर उचित हो सकता है!
पत्नी यदि अपने बच्चों को पालने के लिए मजदूरी करे तो उसकी कमाई को झीन झपट कर शराब पीना क्योंकर उचित हो सकता है!
पिता की शराब की लत के कारण बच्चों को बाल्यवस्था में या किशोर होते ही मजदूरी करने पर बाध्य होना क्योंकर उचित हो सकता है!
बिहार में लाखों लोग तो ऐसे हैं जो परंपरागत रूप से दूसरे के खेतों से चूहे खोदकर निकाल कर खाने को मजबूर हैं, इनकी जाति का नाम ही मुसहर दिया गया। फिर भी कहीं कुछ मजदूरी करके या सरकारी नीतियों इत्यादि किसी जुगाड़ से जो थोड़े बहुत रुपए उनको कहीं से मिलते भी हैं वे उन रुपयों को शराब के नशे में उड़ा देते हैं।
लाखों परिवारों के पास अपनी जमीन नहीं, घर नहीं, लेकिन पिता अपनी हाड़तोड़ मेहनत से कमाई गई मजदूरी को पंचायतों में सहजता से उपलब्ध शराब के ठेकों में जाकर शराब के नशे में धुत होने में उड़ा देता है। पैसे न होने पर या तो उधार लेता है या शोषण करवाता है या चोरी करता है या अपराधों में भागीदार बनता है या पत्नी बच्चों को बेचने तक का काम कर डालता है।
ऐसे वातावरण व परिस्थितियों में बड़े होने वाले बच्चे स्वयं भी नशे का शिकार हो जाते हैं, अपनी माताओं, बहनों, पत्नियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, अपराध करते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी यही परंपरा में चलता रहता है।
क्या ऐसा वातावरण या ऐसी परिस्थितियां या ऐसी परिणिति किसी समाज के लिए उचित हैं! नहीं बिलकुल नहीं! सरकार प्रत्येक व्यक्ति को शराब न पीने के लिए बाध्य नहीं कर सकती है, लेकिन शराब की उपलब्धता तो नियंत्रित कर सकती है, शराब के ठेकों की स्थापना तो बंद कर सकती है, शराब बेचने को गैरकानूनी बना सकती है! यही करवा पाना ही शराब जनांदोलन का उद्देश्य रहा।
शराब क्रांति:
आज से कुछ वर्ष पूर्व बिहार के औरंगाबाद जिले से “गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय” की सामाजिक आंदोलनकारी ईकाई “गोकुल-सेना” द्वारा शुरू किया गया पंचायतों से शराब के ठेकों को हटवाने का आंदोलन बढ़ते-बढ़ते राज्य स्तर तक पहुंचा, चतुर राजनेता नितीश कुमार जी शराब-बंदी लागू करके श्रेय स्वयं ले गए।
जीत की शुरुआत एक पंचायत में शराब का ठेक बंद करवाने से शुरू होकर पूरे राज्य में शराब बंदी तक पहुंची। लेकिन इसके लिए बहुत अधिक मेहनत, संघर्ष व व्यवहारिक रणनीतियों का अथक निवेश करना पड़ा।
गोकुल सेना ने बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले के एक प्रखंड से आंदोलन शुरू किया जो व्यवहारिक रणनीतियों व लगातार जनसंवाद के कारण व्यापक होता चला गया।
गोकुल सेना ने बिहार के 35 जिलों व झारखंड के 5 जिलों, दोनों राज्यों के कुल 40 जिलों में लाखों लोगों से संवाद किया, हजारों जनसभाएं की, पदयात्राएं की, अलख यात्राएं की, रथयात्राएं निकालीं। लाखों महिलाओं को शराब क्रांति आंदोलन से जोड़ा।
बिहार राज्य के संदर्भ में शराब क्रांति आंदोलन की कुछ जानकारियां, जिनसे आंदोलन की सघनता व स्तर का अनुमान किया जा सकता है-
बिहार राज्य के 35 जिले।
बिहार राज्य के 35 जिलों के 5000 गांवों में गोकुल सेना आंदोलन लेकर पहुंची।
बिहार राज्य के 35 जिलों के 5000 गावों में 5000 सभाएं गोकुल सेना ने लोगों से सीधा संवाद व जागरूकता के लिए किया।
बिहार राज्य के 9 जिलों में 500 गावों में लगभग 800 किलोमीटर की अलख यात्रा लोगों से संवाद व जागरूकता के लिए किया।
शराब क्रांति आंदोलन में गोकुल सेना ने 20 लाख से अधिक लोगों से विभिन्न माध्यमों से संवाद व चर्चा किया व शराब के नशे की लत से नुकसान पर अपनी बात रखी।
इस आंदोलन में बिहार राज्य के हजारों गांवों की लगभग 10 लाख महिलाओं का सहयोग रहा।
इस आंदोलन में स्थानीय स्तर पर छोटे-बड़े सामाजिक संस्थाएं व संगठन औपचारिक व अनौपचारिक रूप से समय-समय पर जुड़ते रहे।
गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय की आंदोलनकारी ईकाई गोकुल सेना द्वारा इस आंदोलन का नेतृत्व किया गया। पूरे आंदोलन में लगभग एक करोड़ रुपए का कुल खर्च हुआ होगा, एक एक पैसे का भार आम समाज के लोगों ने वहन किया। एक दमड़ी भी देशी विदेशी, सरकारी गैरसरकारी किसी भी प्रकार की फंडिंग संस्था से नहीं लिया गया।
चलते-चलते:
बहुत लोग कहते हैं कि बिहार में शराब बंदी सफल नहीं है। भारत के सरकारी तंत्र व तंत्र में बैठे अधिकतर लोगों का व्यवहारिक चरित्र इतना भ्रष्ट, सामंती अहंकार, असंवेदनशील व अकल्याणकारी है कि किसी भी जनांदोलन का माखौल उड़ाना, हतोत्साहित करना, नीतियों को लागू करने में तिरस्कार इत्यादि करना सामान्य मानसिकता है।
भले ही शराब-बंदी नितीश कुमार जी की अपनी मौलिक सोच नहीं थी, उन्होंने चतुर राजनेता होने के कारण एक सामाजिक मुद्दे पर निर्णय लिया। लेकिन कम से कम उन्होंने एक बहुत अच्छा निर्णय तो लिया, निर्णय ठीक से लागू हो पाए इसलिए कठोर नियम तो बनाए। एक मुख्यमंत्री के तौर पर वे जो कर सकते थे उन्होंने किया। सरकारी ढांचे, व्यापारी वर्ग, शराब पियक्कड़ वर्ग इत्यादि सभी खांचों में प्रत्येक पर नियंत्रण कर पाना किसी भी व्यक्ति की क्षमता नहीं हो सकती है।
हो सकता हो कि चोरी से शराब की उपलब्धता हो। लेकिन उपलब्धता उतनी सहज नहीं होगी जितनी हर पंचायत, कस्बे, बाजार व शहर में जगह-जगह शराब की दुकानें होने से होती है। शराब बंदी से शराब की सहज उपलब्धता में बहुत अधिक नियंत्रण होता है।
इतनी व्यवहारिक ऋणात्मकताओं के बावजूद बिहार में शराब बंदी से निःसंदेह शोषित व गरीब वर्ग के लाखों परिवारों को बहुत लाभ मिल रहा है। कम से कम आने वाली पीढ़ी में शराब के नशे में धुत होने की लत तो बहुत ही अधिक नियंत्रित हो रही है।
इसलिए बेहतर कि सामाजिकता के लिए, अगली पीढ़ी के लिए, शोषितों व गरीबों के लिए महिलाओं के लिए, बच्चों के लिए शराब बंदी के साथ सक्रिय रूप में खड़ा हुआ जाए।
अखबारों में खबरें
गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय के संजय सज्जन सिंह का शराब के विरोध में मुख्यमंत्री नितीश कुमार को पत्र
Vivek “सामाजिक यायावर” Founder Editor, Ground Report India Co-founder and Vice Chancellor, Gokul Social University
1974 के बिहार व आज के बिहार व झारखंड राज्यों के मुख्यतः सात जिलों के हजारों गांवों में असिंचित होने के कारण बंजर पड़ी कृषिभूमि को सिंचित करके हजारों किसान परिवारों को आर्थिक रूप से समृद्ध करने के लिए झारखंड से निकली उत्तर कोयल नदी सिचाई परियोजना का जन्म हुआ था।
लगभग 43 वर्ष पहले शुरु हुई सिचाई परियोजना का काम सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो चुकने के बावजूद लगभग 28 वर्षों से बंद पड़ा रहा। हजारों गांवों के लाखों लोगों ने इस परियोजना के पूरा होना पर जितना विकास करना था वह तो हुआ ही नहीं उल्टे पीछे चलते चले गए। गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब व दिल्ली जैसे राज्यों में पीढ़ी दर पीढ़ी मजदूरी करने, शोषण कराने व अपमान झेलने के लिए अभिशप्त हो गए।
समय के साथ आम किसान परिवारों के बीच बढ़ते जनाधार व विश्वास से उत्साहित होकर गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय के जनांदोलन संगठन गोकुल-सेना ने कुछ वर्ष पूर्व इस सिचाई परियोजना को पूरा कराने की सामाजिक प्रतिबद्धता स्वीकार किया।
जनांदोलन की विजय
स्थानिय़ स्तर से लेकर देश की राजधानी तक धरना, प्रदर्शन, घेराव, यात्राओं, जेल भरो अभियान व न्यायलय में रिट दायर करने जैसे संघर्ष के विभिन्न तौर तरीकों से गोकुल-सेना ने भारत सरकार को विवश कर दिया कि 43 वर्षों से अपूर्ण पड़ी उत्तर कोयल सिचाईं परियोजना को पूरा किया जाए।
अभी कुछ दिनों पहले, यूं कहें कि पिछले सप्ताह ही भारत सरकार ने उत्तर कोयल सिचाई परियोजना को पूरा करने के लिए 1194 करोड़ रुपए देने की घोषणा की है।
जनसंपर्क अभियान व प्रदर्शन (26 फोटो)
जेल भरो अभियान व पुलिस-सुरक्षा (14 फोटो)
दिल्ली में प्रदर्शन (7 फोटो)
उत्तर कोयल नदी सिचाई व कुटकू डैम परियोजना – परिचय
यह नदी 250 किलोमीटर से अधिक लंबी नदी है तथा सोन नदी में जाकर विलीन होती है। झारखंड राज्य की प्रमुख नदियों में से है। 1974 में शुरू हुई इस सिचाई परियोजना का प्रमुख उद्देश्य बिहार व झारखंड राज्यों के पलामू, लातेहर, गढ़वा, गया, औरंगाबाद, जहानाबाद व अरवल जिलों के हजारों गांवों के 300,000 (तीन लाख) एकड़ से अधिक असिंचित होने के कारण बंजर पड़ी कृषि भूमि को सिंचित किया जाना था।
चूंकि इस परियोजना में कुटकू में लगभग 65 मीटर ऊंचाई का डैम भी बनना था, डैम का पानी सिंचाई के लिए मोहम्मदगंज बैराज व इंद्रापुरी बैराज में प्रयोग किया जाना था, सहयोगी नहरें बननी थीं। इसलिए संसाधनों के अतिरिक्त उपयोग के लिए 24 मेगावाट की जल-विद्युत परियोजना भी थी।
1974 में शुरू हुई परियोजना का 1989 तक धीरे-धीरे होता हुआ तीन चौथाई से अधिक काम पूरा हुआ और रुक गया। लगभग 67 मीटर ऊंचा व 270 मीटर से अधिक लंबा डैम बनकर तैयार हो चुका था। बिजली बनाने के लिए टरबाइनें आ चुकी थीं। डैम में गेट लगने शेष थे। डूबने वाले गांवों के अधिकतर परिवारों को क्षतिपूर्ति दी जा चुकी थी। एक इंजीनियर की हत्या होने के चलते सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो चुकने के बावजूद इस परियोजना का काम पूरा होने के पहले रुक गया, फिर रुका ही रहा।
1974 में शुरू हुई परियोजना 42 वर्षों तक भी आधी अधूरी रुकी रही। 1989 तक जितना काम हुआ था, वह भी खंडहर जैसा हो गया।
संघर्ष यात्रा
2014 में बिहार के गया जिले में चुनाव सभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री गुजरात सरकार व वर्तमान प्रधानमंत्री भारत सरकार नरेंद्र मोदी जी ने वादा किया कि यदि वे भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं तो उत्तर कोयल सिचाई परियोजना पूरा कराना उनकी प्रथम प्राथमिकताओं में से होगी।
हजारों गांवों के लोग आशान्वित थे कि मोदी जी अपने वायदे को पूरा करेंगे। लेकिन सरकार बनने के बाद मोदी जी समाज के लोगों के सामने किए गए इस वायदे को भूल गए।
गोकुल सेना ने स्थानीय स्तर से लेकर देश की राजधानी तक धरना, प्रदर्शन, घेराव, यात्राओं, जेल भरो अभियान व न्यायलय में रिट दायर करने रूपी विभिन्न तौर तरीकों से एक साथ संघर्ष शुरू किया ताकि देश के प्रधानमंत्री व केंद्र सरकार को समाज के लोगों से किया गया वादा याद दिलाया जा सके व वादा पूरा करवाया जा सके।
विभिन्न स्तरों पर हो रहे जनांदोलनों के दबाव व न्यायालय में दायर की गई रिट के कारण बिहार व झारखंड राज्यों के संबंधित विभागों के प्रमुख मंत्रियों को न्यायालय आकर जवाब देने को विवश होना पड़ा।
देश की राजधानी दिल्ली में जलसंसाधन विकास मंत्री, पर्यावरण मंत्री इत्यादि कैबिनेट मंत्रियों से चर्चा। जंतर मंतर पर धरना व घेराव। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी की बिहार में जनसभा में विरोध प्रदर्शन इत्यादि तरीके भी आम आदमी की आवाज सरकार के कानों तक पहुंचाने के लिए आजमाए गए।
After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.
Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.
To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.
He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.
In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.
He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.
Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.
Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.
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For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.
He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.
मजबूत व बड़ी पथरीली चट्टानों वाले जिंदा पहाड़ को काटकर 22 फुट गहरी, 17 फुट चौड़ी व 2 किलोमीटर लंबी नहर निकाली गई। इस नहर को “रामरेखा नहर” नाम दिया गया है।
श्रमदान, स्थानीय सामग्री, पत्थर, बालू इत्यादि सहित नहर व बांध की कुल लागत 5 करोड़ रुपए से अधिक।
100 गांवों के 40,000 से अधिक लोगों का सहयोग।
40 गांवों के 25,000 से अधिक लोगों के द्वारा श्रमदान किया जाना।
प्रतिदिन 1000 से अधिक लोगों द्वारा 60 से अधिक दिनों तक सुबह से लेकर शाम तक श्रमदान किया जाना।
औसतन 100 लोगों द्वारा प्रतिदिन सुबह से शाम, लगातार दो वर्षों तक श्रमदान किया जाना।
“बूढ़ा-बूढ़ी” वर्षा-जल संग्रहण बांध बनाना। मार्च 2016 के बाद से अब तक केवल 15 महीनों में दिखने वाले प्रभाव (लाभ से प्रभावित गांवों व किसान परिवारों की संख्या तीन चार वर्षों में गुणात्मक रूप से बढ़ेगी)
भारत की आजादी के पहले सूख चुकी “रामरेखा” नदी का कई दशकों बाद पुनर्जीवित होना व नदी में वर्ष भर पानी रहना।
लगभग 100 गांवों को नहर व नदी के माध्यम से सीधा फायदा पहुंचना।
25,000 एकड़ से अधिक बंजर पड़ी कृषि-जमीन का सिंचित हो जाना।
10,000 से अधिक किसान परिवारों को आर्थिक लाभ पहुंचना।
50 करोड़ से अधिक प्रतिवर्ष आय का बढ़ जाना (100 गांवों के 10,000 से अधिक किसान परिवार)।
लगभग 200 गांवों में जलस्तर की बढ़ोत्तरी स्पष्ट महसूस होना। जल स्तर में कम अधिक बढ़ोत्तरी लगभग 500 गांवों में।
नक्सल गतिविधियों का लगातार तीव्रता से कम होना, जबकि यह इलाका पूरी तरह से नक्सल प्रभावित इलाका था। इलाके में जगह-जगह कोबरा बटालियन पड़ी रहतीं हैं।
बिहार राज्य के बहुत जिलों के ग्रामीण इलाके कम या अधिक स्तर पर नक्सल प्रभावित हैं। कुछ इलाके तो गंभीर रूप से नक्सल प्रभावित हैं वहां नक्सलियों का समानांतर सत्ता चलती है। गया, जहानाबाद व औरंगाबाद जिलों के कई इलाके गंभीर रूप से नक्सल प्रभावित हैं।
ऐसे ही गंभीर रूप से नक्सल प्रभावित एक पथरीली पहाड़ियों वाले बंजर व अतिपिछड़े इलाके के 40 से अधिक पिछड़े व गरीब गांवों के लोगों ने अनूठा इतिहास रच दिया। इन गावों के 25000 से अधिक लोगों ने लगभग दो वर्षों तक आर्थिक सहयोग के साथ श्रमदान भी किया। लगभग 100 गांवों के 40,000 लोगों ने आर्थिक सहयोग दिया। इस इलाके में जाने के लिए सड़के नहीं हैं। जहां तहां नक्सलियों के विभिन्न समितियों के नोटिश बोर्ड लगे मिल जाते हैं।
राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त सामाजिक क्षेत्र के सेलिब्रिटियों का कोई सहयोग नहीं। इन सामाजिक सेलिब्रिटियों को आमंत्रित करके स्थानीय मीडिया व स्थानीय लोगों को प्रभावित करने जैसे शार्टकट्स व सतही आयोजन नहीं।
किसी नौकरशाह या बड़े अधिकारी का सहयोग या नाम या प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष प्रभाव इत्यादि का कोई प्रयोग नहीं। किसी सरकारी विभाग, मंत्री या संस्थान का कोई सहयोग नहीं। किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था का कोई सहयोग नहीं। स्थानीय क्षेत्र के बाहर के लोगों को जोड़ने या प्रभावित करने के लिए राज्य या देश की राजधानी में कोई धरना प्रदर्शन हंगामा या मीडियाबाजी नहीं।
ऐसा भी नहीं कि इन गांवों के किसान समृद्ध थे तथा उनके पास पैसा था या हर एक किसान परिवार के पास ढेर सारी जमीनें थीं। ढंग के संपर्क मार्ग तक नहीं। कई दशकों से आर्थक विभीषिका का दंशा झेलने वाला इलाका। पूरा का पूरा इलाका नक्सलवाद से प्रभावित।
बिना लागलपेट, सीधे तौर पर यह कह सकते हैं कि इस बृहद आयोजन में किसी प्रकार के शार्टकट के प्रयोग की संभावना नहीं, जबकि कुल छः वर्षों में लगभग चार वर्ष स्थानीय गांवों के ग्रामीणों को मानसिक रूप से तैयार करने में लगे।
शुरुआत
सन् 2011 में नक्सल प्रभावित इस इलाके के ग्रामीण गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय (गोकुल परिवार) के पास अपनी गरीबी, बेबसी व पानी की समस्या को लेकर आए। उनके आने का उद्देश्य था कि गोकुल परिवार इलाके की पानी समस्या हल करवाने के लिए सरकार पर धरना प्रदर्शन विरोध व मांग इत्यादि तरीकों से दबाव डालने में उनका सहयोग करे।
गोकुल परिवार ने प्रस्ताव दिया कि जब आप सन् 1952 से धरना प्रदर्शन विरोध व मांग इत्यादि तरीकों से सरकार पर दबाव डाल ही रहे हैं, और सरकार व सरकारी नौकरशाही के कानों में जूं तक नहीं रेंगती तो वही सब दोहराते रहने का औचित्य क्या है… बेहतर कि इस समस्या का समाधान हम और आप मिलकर खोजें।
गोकुल परिवार का यह जबाव संभवतः ग्रामीणों को अनपेक्षित लगा, इसलिए इस प्रथम मीटिंग के बाद जवाब लंबे समय तक नहीं आया। लेकिन गोकुल परिवार ग्रामीणों के संपर्क में बना रहा, उनको धीरे-धीरे प्रेरित करता रहा। धीरे-धीरे कुछ लोग सहमत हुए, फिर और लोग सहमत हुए। एक दिन ऐसा भी आया कि 40 से अधिक गांवों के पचीसों हजार लोग सहमत हो गए। हजारों लोगों का अनूठा कारवां बनने में लगभग चार वर्ष लग गए।
इस बांध व नहर के पहले गोकुल परिवार ने इस तरह का कोई काम न किया था। न ही कहीं से कोई फंडिंग का जरिया ही था। लेकिन गोकुल परिवार को यह विश्वास था कि राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मित्रों, शुभचिंतकों व नेटवर्क के माध्यम से काम कर ले जाएंगे।
− फोटो अलबम (13 फोटो) −
“रामरेखा” नहर
सैकड़ों लोग अपने-अपने गांवों से कुदालें, फावड़े इत्यादि लेकर आते और काम पर जुट जाते। सामाजिक काम था, हजारों लोग जुड़े हुए थे इसलिए स्थानीय प्रशासन भी विरोध नहीं कर पा रहा था। लोग अपने सिर व हाथों से पत्थर ढोकर लाते, ट्रैक्टर भी पत्थर व बालू ढोते। सैकड़ों हजारों ग्रामीण लोग अपनी शारीरिक क्षमता व स्थानीय उपलब्ध सामग्रियों के साथ जुटे पड़े थे। धीरे-धीरे औरंगाबाद जिले व पड़ोसी जिलों के समृद्ध व सामाजिक सोच के लोगों ने अपनी जेसीबी व पोपलेन मशीनें भी देनी शुरू कर दीं।
इतने बड़े सामाजिक आयोजन व प्रयास में प्रशासन के सहयोग की भी चर्चा कर ली जाए।
मजबूत चट्टानी पहाड़ काटने में भीषण दिक्कतें आ रहीं थीं। एक-एक चट्टान को काटने में कई-कई दिन, यहां तक कि कभी-कभी सप्ताहों लग रहे थे। इस संदर्भ में जब गोकुल परिवार के लोग नागरिक प्रशासन से सहयोग के लिए जिलाधिकारी के पास गए, तब जिलाधिकारी का कहना हुआ कि आप लोग सरकार को बिना रायल्टी दिए ही पहाड़ों व जमीन से पत्थर व बालू निकाल कर प्रयोग कर रहे हैं, चूंकि आपके साथ हजारों लोग साथ खड़े हैं इसलिए हम कोई कार्यवाही नहीं कर सकते हैं, कार्यवाही न करना ही हमारा सहयोग मान लीजिए।
पुलिस व कोबरा बटालियन का सहयोग यह रहा कि उनसे यह निवेदन किया गया कि इस सामाजिक आयोजन को नक्सल गतिविधि न समझा जाए। गांवों व लोगों का आर्थिक विकास होगा, जीवन को जीने में सहूलियत मिलेगी तो नक्सल समस्या भी घटेगी। पुलिस ने कभी किसी को परेशान नहीं किया। इस काम में प्रयोग होने वाले माल ढुलाई वाहनों को जांच इत्यादि के नाम पर बेजा परेशान नहीं किया।
रामरेखा नहर के निर्माण कार्य में लगभग दो साल लग गए। नहर का निर्माण कार्य बांध निर्माण कार्य के पहले शुरू हुआ और बाद तक चलता रहा। पहाड़ काटना आसान नहीं था, मजबूत चट्टानों वाला जिंदा पहाड़ था। लेकिन नहर बनाना बहुत जरूरी था क्योंकि वर्षा-जल संग्रहण वाले बांधे से पानी को नहर के माध्यम से ही गांवों तक ले जाना था। कल्पना कीजिए कि मजबूत चट्टानी पहाड़ को कितने तरीकों व परिश्रम से लोगों ने काटकर 22 फुट गहरी, 17 फुट चौड़ी व 2 किलोमीटर लंबी नहर कैसे निकाली होगी। लेकिन लोगों ने कर दिखाया। नहर का काम आज भी चल रहा है, नहर में पानी आने के बाद कमियों व गलतियों का अहसासा हुआ, इसलिए अभी नहर का काम चलेगा। इस 2 किलोमीटर लंबी नहर में लगभग 1.5 किलोमीटर नहर चट्टानी पहाड़ काट कर बनाई गई है।
रामरेखा नहर निर्माण में किसी संस्था का रंचमात्र कोई भी सहयोग नहीं। सबकुछ स्थानीय समाज के सहयोग से हुआ। बांध व नहर की कुल लागत का दो तिहाई से अधिक केवल रामरेखा नहर निर्माण की लागत रही।
− फोटो अलबम (14 फोटो) −
“बूढ़ा-बूढ़ी” बांध
रामरेखा नदी इतिहास में कभी बहती हुई नदी हुआ करती थी, बारहों महीने नदी में पानी रहता था। पिछले कई दशकों से नदी पूरी तरह से सूखी पड़ी थी। बरसात के दिनों में वर्षा होने के स्तर के आधार पर कुछ घंटे या कुछ दिन बहती थी, वर्षा के पानी को बहा ले जाने का काम करती थी। वर्षा का पानी जमीन के भीतर पहुंच नहीं पाता था, नदी में पानी रुकता नहीं था। गांवों की जमीने बिना पानी बंजर पड़ी हुईं थीं।
गोकुल परिवार ने निर्णय लिया कि रामरेखा नदी में वर्षा-जल संग्रहण के लिए बांध बनाया जाए ताकि पानी रुके, जमीन के अंदर जाए, इलाके के गांवों का जल स्तर ऊपर उठे, पानी की समस्या हल हो।
मुंबई, महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित उद्योगपति परिवार की समाजसेवी सुश्री अमला रुइया गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय के संस्थापकों को व्यक्तिगत रूप से मित्रवत जानती हैं व वृहद सामाजिक परिवार का हिस्सा हैं। अमला रुइया जी की संस्था आकार चैरिटेबल ट्रस्ट, राजस्थान व अन्य राज्यों में स्थानीय लोगों के द्वारा किए जा रहे जल संग्रहण के प्रयासों को सहयोग करती है। अमला रुइया जी की संस्था ने बांध के निर्माण में तकनीकी व 25 लाख रुपए का आर्थिक सहयोग दिया।
बांध निर्माण का कार्य लगभग 6 महीने चला व मार्च 2016 में पूर्ण हो गया। बांध निर्माण कार्य में अमला रुइया जी की संस्था के 25 लाख रुपए के आर्थिक सहयोग के अतिरिक्त किसी संस्था या सरकारी विभाग का कोई आर्थिक सहयोग नहीं रहा, सबकुछ स्थानीय समाज ने अपने दम पर किया।
बांध निर्माण के स्थान व आकार का चुनाव व निर्माण इतना बेहतर किया गया तथा सन् 2016 में वर्षा भी अच्छी हुई कि केवल एक वर्ष की वर्षा के पानी से ही पूरा बांध भर गया। बांध से पानी के रिसाव व जमीन के भीतर पानी पहुंचने के कारण रामरेखा नदी में दशकों बाद पहली बार पूरे वर्ष पानी रहा। दोनों ओर के पांच-पांच, दस-दस किलोमीटर दूरी के पचासों गांवों में जल स्तर ऊपर उठ गया।
नदी से दूरी पर स्थित कई गांवों के लोग जिन्हें भूजल रिचार्ज की वैज्ञानिक जानकारी नहीं, उनको लगता है कि उनकी ग्राम-देवी ने अचानक प्रसन्न होकर कुओं का जल स्तर ऊपर उठा दिया है। इसलिए इसे ग्राम-देवी का चमत्कार मानते हुए बाकायदा पशु बलि के साथ पूजापाठ हवन इत्यादि धार्मिक अनुष्ठान किए हैं। ऐसा उन गावों में हो रहा है जिनको यह लगता था कि चूंकि उनके गांव नहर या बांध या नदी के निकट नहीं हैं इसलिए नहर व वर्षा-संग्रहण बांध निर्माण से उनके गांवों को लाभ नहीं पहुंचेगा, इसलिए उन्होंने इस सामाजिक आयोजन में भागीदारी नहीं की थी। गोकुल परिवार धीरे-धीरे अब इन गांवों में भी जल-साक्षरता का कार्यक्रम शुरू कर रहा है।
− फोटो अलबम (12 फोटो) −
स्थानीय ग्रामीण नेतृत्व
− फोटो अलबम (25 फोटो) −
गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय का संक्षिप्त परिचय
गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय की वैचारिक स्थापना सन् 2006/2007 में बिहार के औरंगाबाद जिले के एक गांव में संजय सज्जन सिंह, विवेक उमराव “सामाजिक यायावर” , संजीव नारायण सिंह व साथियों के द्वारा हुई थी। अशालीन भाषा में संजय सज्जन सिंह, संजीव नारायण सिंह व विवेक उमराव “सामाजिक यायावर” को गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय का संस्थापक कह सकते हैं। कुछ और अशालीनता के साथ यह जानकारी कि विवेक उमराव “सामाजिक यायावर”, गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय की स्थापना के समय से इस सामाजिक विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर हैं।
यह एक खुला सामाजिक विश्वविद्यालय है जो गाय, कृषि व प्राकृतिक संसाधन आधारित ग्रामीण अर्थशास्त्र, स्वावलंबन व विकास के संदर्भ में जीवंत व व्यवहारिक कामों व प्रयासों को शिक्षा मानता है। इस सामाजिक विश्वविद्यालय के कैंपस में तालाब है, गाय है, पेड़ हैं, खेती है, गांवों के गरीबे बच्चों के लिए कम संसाधनों से चलने वाला विद्यालय है। इस विश्वविद्यालय का यूजीसी जैसी किसी संस्था से कोई संबंध नहीं है और न ही पारंपरिक विश्वविद्यालयों जैसा विद्यार्थियों के लिए बड़े बड़े भवनों वाला सुविधा संपन्न कैंपस ही है। आर्थिक विपन्नताओं के कारण जब तक गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय कैंपस में शौचालय नहीं बने थे तब तक हम सभी लोटा लेकर खेतों में ही शौच के लिए जाते थे।
गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय को गांवों व लोगों से जोड़ने के लिए सन् 2008 में औरंगाबाद जिले व पड़ोसी जिलों के सैकड़ों गांवों की सघन पदयात्रा भी की गई थी। इसके बाद समय-समय पर पदयात्राओं की श्रंखला चली। पदयात्राओं के अतिरिक्त शिक्षा व ग्रामीण स्वावलंबन को लेकर गांवों में सेमिनार, सभाएं व चर्चाएं इत्यादि लगातार विभिन्न स्तरों पर आयोजित होती रहीं।
बिहार सरकार द्वारा शराब-बंदी करने के की वर्ष पहले से गोकुल परिवार शराब-बंदी के लिए अभियान छेड़े हुए था। इस अभियान में हजारों ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी शुरु हो चुकी थी। विभिन्न गांवों में शराब के ठेकों को अहिंसात्मक स्थानीय ग्रामीण जनांदोलनों के द्वारा बंद करवाए जाना शुरू हो चुका था।
गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय को सैकड़ों गांवों के लोग गोकुल परिवार के नाम से जानते हैं। गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय के पास तामझाम भले ही न हो। भले ही छोटा सा बेतरतीब सा ही कैंपस हो। लेकिन गोकुल परिवार की सामाजिक मुद्दों के संदर्भ में गतिविधियों के कारण साख व लोगों का विश्वास लगातार बढ़ता रहा।
After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.
Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.
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In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.
He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.
Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.
Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.
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For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.
He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.
डा० राकेश सक्सेना “रफीक” से मेरी पहली मुलाकात आज से तकरीबन ग्यारह-बारह वर्ष पहले मेरे एक पत्रकार मित्र के घर में हुई थी। राकेश युवा-भारत से जुड़े हुए थे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली से डाक्टरेट राकेश सक्सेना मुरादाबाद के किसी डिग्री कालेज में अतिथि-व्याख्याता के रूप में पढ़ाते थे। एक दिन लखनऊ में राकेश मुझसे कहते हैं कि वे और उनके एक स्थानीय स्तर के नेता मित्र एक विद्यालय खोलना चाह रहे हैं जिसमें बच्चों के ‘मनुष्य’ होने पर प्राथमिकता दी जायेगी और शिक्षा के प्रयोग होगें। राकेश ने कहा कि मैं विद्यालय में शिक्षा निर्देशन का काम संभालूं, शिक्षा से संबंधित अनुप्रयोगों को करने के लिए मुझे सारे अधिकार रहेंगें, संस्थापक-मंडल का हस्तक्षेप नहीं होगा उल्टे मेरे अनुप्रयोगों में सहयोग ही दिया जाएगा। मैं राकेश को नहीं जानता था, ना ही जीवन में कभी उनका मित्र रहा था, केवल चंद औपचारिक मुलाकातें पत्रकार मित्र के यहाँ हुईं थीं। फिर भी ‘शिक्षा’ में प्रयोग के लालच में मैंने अपनी सहमति दे दी। सहमति देने के कारणों में गांवों के बच्चों के विकास के लिए काम करने से प्राप्त होने वाली आत्मिक संतुष्टि और एक अनजान क्षेत्र में अनजान लोगों के बीच जाकर उनके लिए काम करने की सार्थकता आदि भी थे।
जिन दिनों मुझे विद्यालय पहुँचना था, उन्हीं दिनों मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत ही गहरे आंतरिक दु:ख से गुजर रहा था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई खतम हो चुकी थी। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) व टोक्यो यूनिवर्सिटी जापान की विकेंद्रित ऊर्जा व्यवस्था संयुक्त शोध परियोजना में शोध कार्य भी कर रहा था। माता-पिता ने मेरी सामाजिक गतिविधियों के कारण अपने दिल व पैतृक संपत्तियों से पहले ही बेदखल कर दिया था, आजतक बेदखल हूँ। कई अच्छी नौकरियों के प्रस्ताव थे, नामचीन संस्थानों से पीएचडी करने के भी प्रस्ताव थे। किंतु जीवन में जो प्रताड़नाएं व असंवेदनशीलताएँ भोग चुका था, हजारों किताबों का वर्षों तक रात-दिन जो स्वाध्याय किया था, सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी, जीवन को जिस सामाजिक प्रतिबद्धता व सक्रियता के लिए अनेक वर्षों में ढाला था। अजीब उहापोह में था कि जीवन की दिशा क्या चुनूं। यही वह समय था जब अपने जीवन की दिशा तय होनी थी।
जीवन की दिशा चुनने वाला निर्णय लेने के लिए मैंने सोचा कि सबसे बेहतर रहेगा कि शरीर की जरूरतों से ऊपर उठकर, मन की भोग-लिप्सा व इच्छाओं से ऊपर उठकर, अहंकार से ऊपर उठकर निर्णय लिया जाए। इसलिए लंबा उपवास करने का निर्णय लिया। जीवन का सबसे लंबा उपवास किया, कुल अठारह दिनों का उपवास। लगातार अठारह दिनों तक नींबूं, पानी व नमक के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। नींबू व नमक भी कई दिन के बाद लेना शुरू किया था।
स्वयं में इच्छाशक्ति संवर्धित करने व जीवन की दिशा चुनने वाला निर्णय लेने में सक्षम हो पाने के लिए अठारह दिनों का नीबूं-पानी उपवास किया। इसी उपवास की समाप्ति के अगले दिन भीषण शारीरिक कमजोरी की हालत में भी मैंने भारी पिठ्ठू-बैग अपनी पीठ पर लादा और भारतीय रेल के ‘जनरल डिब्बे’ में किसी तरह ठुंसते हुए निकल पड़ा सक्रिय-यायावरी की अपनी यात्रा में। मुरादाबाद रेलवे स्टेशन से पिठ्ठू बैग लादकर पैदल लगभग दो किलोमीटर दूर बस-स्टैंड, वहां से भरी हुई सरकारी खटारा बस में किसी तरह से ठुस-ठुसा कर अत्यधिक खराब हालात के सड़क-मार्ग से गंतव्य तक पहुंचा।
बिलारी तहसील मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर एक गाँव की सीमा में सुनसान खेतों के बीच में एक छोटा सा विद्यालय था। छोटे-छोटे तीन कमरे, एक दो तरफ से बिना दीवारों का हरी बरसाती-पालीथीन से ढका स्थान, एक हैंडपंप, एक खुला मूत्रालय, एक शौचालय, एक ईटों का ढेर लगाकर ऊपर से ढककर बनाई गई बहुत ही छोटी रसोई और छोटा सा क्रीडा-स्थल कुल मिलाकर विद्यालय-कैंपस था। विद्यालय से सटा हुआ एक और विद्यालय था उसके अतिरिक्त दूर-दूर तक केवल खेत थे।
शिक्षा में मेरे प्रयोग
शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ प्रयोग
विद्यालय की स्थापना का पहला वर्ष था। विद्यालय प्रशासन के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर डा० शीला डागा को और शिक्षा में अनुप्रयोगों के लिए मुझे बाहर से बुलाया गया था। हम दो लोगों को छोड़कर शेष लोग स्थानीय या आसपास के क्षेत्रों के थे। विद्यालय में प्रि-नर्सरी से लेकर नौवीं कक्षा तक कुल मिलाकर ग्यारह कक्षायें थीं। इन ग्यारह कक्षाओं व तीन सौ से अधिक छात्र-छात्राओं के लिए कुल नौ शिक्षक-शिक्षिकाएं थीं। इनमें भी कुछ शिक्षक-शिक्षिकाएं युवा भारत संगठन के स्वयंसेवक थे, जिन्होंनें जीवन में कभी कोई धरातलीय प्रयोग नहीं किए थे, शिक्षा की समझ नहीं थी फिर भी इनका मानना था कि वे बहुत ही बेहतर शिक्षाविद हैं। शिक्षक-शिक्षिकाओं की इस जमात से केवल अजयवीर ऐसा युवा था जो मेरा सहयोगी बन पाया था और हर कदम पर मेरे अनुप्रयोगों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर खड़ा रहा।
शिक्षक-शिक्षिकाओं के लिए जब साक्षात्कार शुरू हुए तो मुझे मालूम पड़ा कि यहाँ शिक्षा पर अनुप्रयोग करना मतलब रेगिस्तान में पानी निकालना है। अंग्रेजी में परास्नातक को साधारण अनुवाद तो दूर की बात है छोटी-छोटी वर्तनी भी शुद्ध लिखनीं नहीं आती हो, गणित से एम.फिल को आठवीं क्लास के सवाल हल करना मुश्किल हो, भूगोल से परास्नातक को नक्शा देखना नहीं आता हो आदि-आदि। ऐसे लोगों में से विद्यालय के लिए शिक्षक-शिक्षिका छाँटना था, ऊपर से इनमें से लगभग सभी को अहंकार कि इनके इतना कोई योग्य नहीं। जो उपलब्ध थे उनमें से तुलनात्मक जो बेहतर थे, उनको लेकर विद्यालय शुरू हुआ। कुछ दिनों तक शिक्षक आते-जाते रहे। सप्ताह दो सप्ताह में ऐसे ही हिचकोले लेते हुए शिक्षा के अनुप्रयोगों के तौर-तरीकों को सुनकर और संस्थापकों के प्रयास से विद्यालय को मनीषा शर्मा, रुपाली शर्मा, सुभाषिनी वर्मा, प्रियंका शर्मा, रेखा सक्सेना व दीपशिखा तोमर जैसी शिक्षिकाएं मिलीं। सुभाषिनी वर्मा व रेखा सक्सेना छोटे बच्चों को पढ़ातीं थीं। पाँचवीं और पाँचवी से नौंवीं कक्षा तक के स्तर के शिक्षकों की भारी कमी थी। विश्वविद्यालयी डिग्रियाँ तो परास्नातक की थीं लेकिन योग्यता नहीं थी। यूं समझिए कि यदि चंद अपवाद शिक्षकों को छोड़ दिया जाए तो उनमें पांचवीं कक्षा के सामान्य विषय पढ़ाने की भी वास्तविक योग्यता नहीं थी। जबकि कोई-कोई तो दो या तीन विषयों में परास्नातक थे एक-दो तो शायद कहीं से डाक्टरेट भी कर रहे थे। शिक्षकों का वेतन पाँच सौ रुपए महीना से एक हजार रुपया महीना तक था।
कौन शिक्षक किस विषय को किस कक्षा तक तुलनात्मक रूप से ठीक से पढ़ा सकता है, यह समझने के लिए मैं लगभग रोज शिक्षकों, कक्षाओं व विषयों को यादृच्छिक रूप से फेंटता था। उनकी कक्षाओं में बच्चा की तरह बैठता था ताकि समझ सकूं कि कौन सा शिक्षक किस विषय को किस कक्षा तक तुलनात्मक पढ़ा सकता है।
मैं रोज विद्यालय समाप्ति के बाद शिक्षकों को लगभग दो घंटे पढ़ाता। छात्र, शिक्षक व शिक्षा पर संवाद की चर्चायें करता। मनीषा, रुपाली, सुभाषिनी व रेखा जैसी कुछ शिक्षिकाओं को छोड़कर किसी को भी इस प्रकार की चर्चाएं पसंद नहीं थीं। मैं शिक्षक-शिक्षिकाओं को जागृत करना चाहता था, उनका बेतहरीन बच्चों के विकास में प्रयोग करवाना चाहता था। बने बनाए दस्तूरों से हटकर जो भी मैंने करना चाहा, उस हर बात में मेरा विरोध व असहयोग हुआ। मैं हार नहीं मानता था, दृढ़ता से अपनी बात में अड़ा रहता था। कुछ दिनों के बाद शिक्षक मेरी बात मानते थे, मेरे हर नये विचार पर बार-बार यही होता था। किसी भी नए विचार को लागू करने के पहले मैं खुद को मानसिक रूप से तैयार करता था कि दो या तीन दिन तक मुझे शिक्षकों का बहुत अधिक विरोध झेलना पड़ेगा। कभी कभी तो शिक्षक स्तीफे तक की धमकी देते थे। किंतु कभी कोई गया नहीं उल्टे समय के साथ-साथ बच्चों के साथ प्रेम के साथ काम करने लगे थे।
विद्यालय, कक्षाएं, छात्रगण और छात्रों से मेरे संबंध
मेरे रहने का इंतजाम विद्यालय से लगभग तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर पास के कस्बे में पतली गंदी गलियों में से चलकर मिलने वाले एक घर में किया गया था जो एक संस्थापक का पैतृक घर था। पैतृक घर होने के बावजूद घर बहुत छोटा था, दो कमरे, एक बाथरूम, एक शौचालय व एक पेड़ था। पेड़ को छोड़कर सभी का आकार बहुत छोटा-छोटा था एवम् छत की ऊंचाई बहुत ही कम थी। घर के सामने से गंदी नाली बहती थी जिसके कारण मच्छरों का भयंकर प्रकोप था। रोज सुबह जल्दी उठकर नगरपालिका की सप्लाई वाला पानी भरना, दो-चार केले खाकर लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर फिर रिक्शा करके विद्यालय पहुंचना, इसी तरह शाम को वापस लौटना। इस प्रक्रिया में रोज का दो से तीन घंटे का समय, मानसिक व शारीरिक थकावट, केलों और रिक्शा के किराए में रुपए खर्चना।
बच्चों व शिक्षकों को अधिक समय दे पाऊं। विद्यालय का खर्च कम से कम हो इसलिए मैंने विद्यालय में ही रहने का निर्णय लिया। जब मैंने कहा कि मैं विद्यालय में ही रुकूंगा, उस समय विद्यालय से लगभग एक किलोमीटर तक कोई घर नहीं था केवल खेत थे। मुझसे कहा गया कि रात में जंगली जानवर आते हैं, बिस्तर नहीं है आदि आदि। मैंने कहा कि यदि जंगली जानवरों के हाथों मारा जाऊंगा तो कम से कम ‘आत्महत्या के दोष’ से मुक्त रहूंगा। मैंने विद्यालय में रहना शुरु किया। मेरे साथ अजयवीर ने भी हिम्मत दिखाई। हम दोनों रात में बच्चों की बैठने वाली बेंचों को जोड़कर बिना गद्दे व बेडशीट के ही सोते थे। मच्छरों के लगातार हमलों से परेशान होकर मच्छरदानी ले आये, फिर एक बेडशीट और दो तकिया। जब तक विद्यालय में रहे ऐसे ही सोए हम दोनों लोग। फिर वीरेंद्र भी हम लोगों के साथ सोने लगे थे। वीरेंद्र भी अजयवीर की तरह परिश्रमी थे, शिक्षक के रूप में बेहतर न होते हुए भी बच्चों को खेलकूद अच्छा सिखाते थे और मेरे अनुप्रयोगों का विरोध नहीं करते थे।
विद्यालय में ही सोने के कारण सुबह तीन-चार बजे जगना जुगाड़ में बैठकर दूरदराज के गावों से बच्चों को विद्यालय लेकर आना संभव हो पाया। रास्ते में बच्चों से बातें करना, हसते गाते उनसे चर्चा करना, उनको समझना, उनके साथ उनके घर में हो रही घटनाओं को समझना आदि-आदि यही करता था लगभग रोज सुबेरे बच्चो के साथ जुगाड़ की कुछ घंटे की यात्रा में। अधिकतर गांवों के रास्ते मिट्टी व ईटों के खड़ंजे के होते थे। बारिश होने पर कीचड़ में जुगाड़ का फंस जाना, सारे बच्चों का नीचे उतरना, हम सब का मिलकर जुगाड़ में धक्का लगाकर कीचड़ से बाहर निकालना, फिर जुगाड़ में चढ़ना। कभी-कभी यह प्रक्रिया कई-कई बार दोहरानी पड़ जाती थी। जीवन में पहली बार जुगाड़ में यहीं बैठा था। मेरे लिए जुगाड़ की यात्रा बहुत थकावट भरी होती थी लेकिन जुगाड़ में मेरे जाने से मुझे बच्चों के साथ विद्यालय के बाहर उनकी अपनी उन्मुक्तता व सहज जीवंतता के साथ रहने को मिलता था। मेरे व बच्चों के मध्य विश्वसनीय व अपनत्व भरे रिश्ते बनते थे और बच्चे मेरे सामने उन्मुक्त होकर व्यवहार करते थे।
कई बच्चों को घर से निकलते ही भूख भी लगती थी तो वे जुगाड़ में ही अपना टिफिन खोलकर खाना भी खाने लगते थे। मैंने भी उनसे एक-दो कौर लेकर खाना शुरू कर दिया था। विद्यालय में भोजनावकाश होने पर मैंने बच्चों के टिफिन में से एक-दो कौर निकाल कर खाना शुरू कर दिया था। बच्चों को मेरे द्वारा उनके टिफिन से खाना खाया जाना बहुत अच्छा लगा। बच्चे मेरे लिए एक रोटी अतिरिक्त लाने लगे, इस तरह मेरे पास प्रतिदिन बहुत रोटियां हो जातीं थीं। इन्हीं रोटियों में से मैं उन बच्चों को खाना खिलाता जो किसी कारणवश टिफिन नहीं ला पाते थे। इससे दो फायदे हुए, दलितों सहित विभिन्न जाति व धर्मों के बच्चे एक दूसरे के टिफिन से खाना खाते, बच्चों से मेरे मित्रवत रिश्ते बनते। शिक्षक व शिक्षिकाएं भी बच्चों के साथ ही भोजन करेंगे ऐसा नियम बनाया, शुरू-शुरू में मेरे इस नियम का विरोध हुआ लेकिन बेहतर परिणामों को महसूस करके कुछ शिक्षिकाओं ने भी अपने घर से अतिरिक्त भोजन लाना शुरू कर दिया था और बच्चों के साथ अपना भोजन करने लगीं। शनिवार व रविवार को मुझे व डा० शीला डागा को बच्चों के अभिभावक व्यक्तिगत रूप से दूर दराज के गांवो से भोजन के आमंत्रित करते थे।
मैंने बच्चों के साथ बिलकुल उन्हीं की तरह बच्चा बनकर उन्हीं के बनाए नियमों के तहत खेलना शुरू किया। शिक्षकों के द्वारा बच्चों को डांटने व मारने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। धीरे-धीरे मैं छोटे शिशु से लेकर किशोर तक लगभग सभी बच्चों का मित्र हो चुका था और इतना विश्वास प्राप्त कर चुका था कि वे मेरी बात पर अनुप्रयोग करने को तैयार हो चुके थे। विद्यालय में बच्चों व शिक्षक के मध्य का संबंध शिक्षा का मुख्य आधार होता है, यही संबंध सब कुछ तय करता है।
बच्चों व शिक्षकों के साथ विश्वासपूर्ण संबंध बनते ही मैंने आमूलचूल परिवर्तन के लिए दस्तूरों से हटकर कुछ बड़े निर्णय लिए जैसे कि –
विद्यालय व कक्षा में बच्चे को अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी
कक्षा में बच्चे अपना मनचाहा विषय पढ़ सकते थे। एक ही समय में एक ही कक्षा में बच्चे गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, चित्रकला आदि अपनी पसंद के अनुसार कोई भी विषय पढ़ सकते थे। एक शिक्षक पर्यवेक्षक की तरह कक्षा में रहता था। बच्चे को अपने विषय के लिए आवश्यकता होने पर या तो उस विषय के शिक्षक के पास जाने या यदि शिक्षक खाली है तो शिक्षक कक्षा में आता था। यदि किसी बच्चे की इच्छा कोई भी विषय पढ़ने की नहीं है तो उस बच्चे को कक्षा से बाहर जाकर खेलने कूदने की स्वतंत्रता थी। बच्चे की इच्छा होने पर वह कक्षा के में लेटकर पढ़ व सो भी सकता था। जिन कक्षाओं में यह प्रयोग मैने किया उनके बच्चों की गुणवत्ता व सीखने की क्षमता तेजी से बढ़ी। कभी-कभी कुछ विषयों जैसे कि अंग्रेजी, विज्ञान, गणित आदि के लिए कई कक्षाएं जैसे कि छठवीं, सातवीं, आठवीं व नौवीं कक्षाएं मिला दी जातीं थीं ताकि बच्चे एक दूसरे को सिखाते हुए सीख सकें और उनमें एक दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान व जिम्मेदारी के भाव विकसित हों।
परीक्षा प्रणाली में आमलचूल परिवर्तन
मैंने हमेशा से महसूस किया है कि विद्यालयों में परीक्षा प्रणाली व पाठ्यक्रम का पूरा ढांचा ही गलत है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि गणित की परीक्षा है और दस प्रकार के नियम पढ़ाए गए। एक छात्र आठ प्रकार के नियमों को जानता है और दूसरा छात्र केवल दो प्रकार के नियमों को जानता है। परीक्षा में प्रश्न पत्र बनाने वाले शिक्षक ने यदि दो नियमों पर आधारित प्रश्न पत्र बना दिया तो जिसको आठ नियम आते हैं वह शून्य अंक पाएगा और जिसको केवल दो नियम आते हैं वह पूरे अंक पाएगा। ऐसी परीक्षा प्रणाली में जो बहुत योग्य है वह नाकारा साबित हो जाता है और जो कम योग्य है वह विशेषज्ञ साबित हो जाता है।
मैंने प्रत्येक विषय के प्रत्येक अध्याय/नियम को प्रश्न पत्र में स्थान दिलवाया। प्रत्येक नियम/अध्याय की लिखित परीक्षा करवानी शुरू की। प्रत्येक बच्चा खुद को और अपने सहपाठियों को हर नियम/अध्याय में ग्रेड देता था। मतलब यह कि बच्चा स्वयं व अपनी कक्षा के सहपाठियों का मूल्यांकन उस विषय के लिए करता। इससे बच्चों में एक दूसरे के प्रति स्वीकार्यता बढ़ी और वे एक दूसरे से/को सीखने व सिखाने लगे।
बच्चा प्रत्येक विषय के शिक्षक की ग्रेडिंग करता था और विषय का शिक्षक बच्चे की ग्रेडिंग करता था। बच्चे व शिक्षक दोनों को ही यह मालूम पड़ता था कि वे एक दूसरे के बारे में क्या विचार रखते हैं? इस पद्धति ने बच्चे का शिक्षक और स्वयं के ऊपर विश्वास बढ़ाया।
यह पद्धति बच्चों को इतनी मजेदार लगी कि वे हर दूसरे दिन परीक्षा देने को तैयार रहते, कुछ बच्चे तो जिद करते कि परीक्षा आज ली जाए।
ब्लैकबोर्ड का प्रयोग बंद करवाना
मैंने कक्षाओं में ब्लैकबोर्ड का प्रयोग बंद करवा दिया था। मेरा तर्क था कि ब्लैकबोर्ड से पढ़ाई फेंककर दी जाती है, जो बच्चा उस फेंकी हुई पढ़ाई को लपक लेता है वह पढ़ जाता है जो बच्चा उस फेंकी हुई पढ़ाई को नहीं लपक पाता वह नहीं पढ़ पाता है। पढ़ाई बच्चे के हाथ में ठीक से सहेजकर पकड़ाई जानी चाहिए। शिक्षक को प्रत्येक बच्चे पर ध्यान देना होता था। कक्षाओं में कुर्सी-मेज का प्रयोग भी बंद करवा दिया था।
बच्चों को शिक्षक व आंतरिक प्रबंधक बनाना
बड़ी कक्षा के बच्चे छोटी कक्षा के बच्चों को शिक्षक की तरह पढ़ाते थे। जिन बच्चों को जिस विषय में बेहतर जानकारी होती थी वे उस विषय को अपनी कक्षा या अपनी से ऊंची कक्षा के बच्चों को पढ़ाते थे। विद्यालय का आंतरिक प्रबंधन भी बच्चों को सौंपा गया, उनके द्वारा लिए गए निर्णय शिक्षकों को भी मानने होते थे।
……. आदि आदि कई अनुप्रयोग मैंने किये।
इन प्रयोगों के लिए मेरे मन में मनीषा शर्मा, रुपाली शर्मा, अजयवीर व डा० शीला डागा का विशेष स्थान है। इन लोगों ने कभी मेरा विरोध नहीं किया। सदैव सहयोग दिया। विद्यालय में दो सत्ता-केंद्रों के होने के बावजूद कभी भी एक पल के लिए महसूस नहीं हुआ कि दो सत्ता-केंद्र हैं। डा० शीला डागा ने कभी अपने अहंकार को तवज्जो नहीं दी। वे बच्चों व शिक्षिकाओं को प्रेम करतीं थीं और उनका विकास देखना चाहतीं थीं। उनके लिए या मेरे लिए एक छोटे से विद्यालय का प्रधानाचार्य या शिक्षाधिकारी होना एक तरह से अपनी पहचान खोकर ही समाज के लिए काम करना था। हम दोनो एक दूसरे के संपूरक की तरह काम करते थे। शिक्षा के मेरे अनुप्रयोगों में डा० शीला डागा सदैव साथ खड़ी रहीं। मेरे व संस्थापकों के बीच संघर्ष होने की स्थिति में बीच में ढाल की तरह खड़ी हो जाती थीं। दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर का प्रधानाचार्या के रूप में नाम ही उनके छोटे से विद्यालय को उस क्षेत्र में पहचान देता था, इसलिए डा० शीला डागा का नाम विद्यालय से जुड़े रहना संस्थापकों के लिए ताकत थी।
मेरा विद्यालय को छोड़ना
मेरी इच्छा थी कि लगभग एक साल रह कर इस विद्यालय में शैक्षिक अनुप्रयोगों को स्थापित करके जाऊं। किंतु जैसा सामान्यतयः भारत में विकृतिपूर्ण मानसिकता है कि जो काम नहीं करते हैं उनको काम करने वालों की लोकप्रियता से असुविधा होती है और अहंकार में चोट पहुंचती है। यहां भी ऐसा ही हुआ, संस्थापकों को मेरे अनुप्रयोगों की सफलता व उपलब्धियों को देखने के बावजूद मेरे अनुप्रयोगो से असुविधा होने लगी। मैं सोचता था कि जब तक बच्चे, कुछ शिक्षक-शिक्षिकाओं व डा० शीला डागा साथ दे रहे हैं, संस्थापकों के द्वारा किए जा रहे अपमानों में ध्यान दिए बिना बच्चों के विकास के लिए प्रयोग करते जाऊं। बच्चों का ही कुछ भला होगा, इनके माता-पिता की ही कुछ सोच बदल जाये।
मेरी एक आदत रही है, अब भी है कि मैं सामाजिक कामों को करते समय बिलकुल खुद को भूल कर काम करने लगता हूँ और अपने मान-अपमान व प्रतिष्ठा आदि की जरा सा भी परवाह नहीं करता। तो अधिकतर होता यह है कि बहुत लोग मेरे बारे में यह सोचने लगते हैं कि मेरी कोई विवशता है। ऐसे लोगों को यह लगता है कि आखिर कोई क्यूंकर किसी अनजान जगह जाकर, अनजान लोगों के लिए इतनी मेहनत से काम करेगा। ऐसे लोग जो सिर्फ पहचान, प्रतिष्ठा व सत्ता के लिए ही सामाजिक कामों का दिखावा करते हैं को यह समझ ही नही आता कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो निःस्वार्थ भाव से दूसरों के विकास में भारी असुविधाएं व अपमान झेलकर भी भागीदार बनने में आत्म-संतुष्टि की प्राप्ति करते हैं।
रात में विद्यालय में बच्चों के बैठने की बेंचों को जोड़कर सोना, बिना एक रुपया वेतन लिए विद्यालय के लिए काम करना, सुबह चार बजे जगकर लकड़ी के पटरों को जोड़कर बनाए गए जुगाड़ में बैठकर बिना सड़कों वाले गांवों में जाकर बच्चों को विद्यालय लाना, बच्चों के टिफिनों से दो-दो कौर रोटी लेकर अपने भोजन का इंतजाम करना आदि-आदि जैसे तौर-तरीकों को देखकर संस्थापकों के अंदर मेरे प्रति आदर भाव या प्रेम भाव जगने की बजाए मेरे प्रति उपेक्षा व तिरस्कार का भाव जगा। उनको यह लगा कि मैं इसी तरह की बेगार मजदूरी के ही लायक हूं, यही मेरा स्तर है। स्थितियाँ यहाँ तक पहुंची कि एक दिन मुझे अपने आपको वहां से अलग करना पड़ा। मेरे हटने के अगले ही दिन से मेरे सारे प्रयोग बंद कर दिए गए और विद्यालय को दूसरे स्कूलों की तरह बना दिया गया। यदि कोई बच्चा कभी यह कह देता कि विवेक सर बहुत अच्छे थे तो उसको दंड दिया जाता। अगले सत्र में बच्चों की संख्या बहुत अधिक घटी और दो-तीन साल में ही विद्यालय बंद हो गया। जबकि मेरे निकलने के बाद विद्यालय में कई कमरे बने, विद्यालय का भवन दुमंजिला हुआ, अच्छे चमकदार शौचालय बने, खेलकूद के सामान आदि भी आये।
मेरी जिद, अनुप्रयोगों को करते हुए संवाद-प्रक्रिया व असहयोगों के बावजूद हार न मानना आदि कारण रहे होगें कि बच्चों के साथ-साथ संवेदनशील शिक्षकों को भी बहुत कुछ सीखने समझने को मिला इसीलिए आजतक मुझे प्रेमभाव से याद करते हैं। मुझे आज भी याद आता है, उस विद्यालय में मेरा अंतिम दिन जब तीन सौ से अधिक बच्चे व शिक्षक-शिक्षिकाओं घंटो रोए थे। बच्चों व शिक्षको के परिवारों ने मेरे साथ पारिवारिक रिश्ते बनाए। उनमें से कुछ के परिवारों का अभिन्न भाग बन चुका हूँ। इन परिवारों के कारण मुझे यूँ लगता है जैसे बिलारी मेरी अपनी ही मातृभूमि है। जब भी बिलारी अपने इन सामाजिक परिवारों से मिलने जाता हूँ तो विद्यालय के संस्थापकों से भी औपचारिक मुलाकात करने जाता हूँ पता नहीं क्यों आज भी उनका व्यवहार उपेक्षा व अपमान से युक्त दिखावटी ही रहता है। संस्थापकों की पता नहीं कैसी मानसिकता व सोच है कि आज तक एक छोटी सी बात नहीं समझ पाए कि मैंने उनको दिया ही है, उनसे कुछ लिया नहीं। मेरे अहसान उन पर हैं, उनका कोई अहसान मुझ पर नहीं। उनको मेरे प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। यह मेरी विनम्रता व उदारता है कि मैं उनसे मिलने जाता हूँ।
जब भी मैं इस विद्यालय के संदर्भ में अपने अनुप्रयोगों के बारे में सोचता हूँ तो यह पाता हूँ कि अयोग्य शिक्षकों व न्यूनतम संसाधनों के बावजूद विद्यालय को जिस मुकाम तक लाकर मैने खड़ा किया था। यदि शिक्षा की समझ संस्थापकों के पास होती तो यह विद्यालय बंद होने की बजाए आज देश में शिक्षा के प्रतिष्ठित माडलों में से एक होता।
चलते-चलते
जिस इलाके में यह विद्यालय था वहां किसी छात्र द्वारा विज्ञान वर्ग से दसवीं कम अंकों से भी पास कर लेना बड़ी बात मानी जाती थी। हमारे पढ़ाए हुए बच्चों ने कुछ महीनों के इन प्रयोगों से प्राप्त अपने आत्मविश्वास व सोच के दम पर कुछ वर्षों बाद दसवीं व बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में जिले स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त की। जब कुछ महीनों का रिश्ता बच्चों में इतना आत्मविश्वास व सोच पैदा कर सकता है तो यदि बच्चों को अच्छे शिक्षक मिल जायें तो बच्चे क्या नहीं कर सकते हैं।
मेरा बहुत ही दृढ़ता से मानना है कि किसी समाज या देश का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि वह देश या समाज अपने बच्चों से व्यवहार कैसा करता है, अपने बच्चों को शिक्षा कैसे देता है। मेरा यह भी मानना है कि शिक्षा बिना सुविधाओं के भी संभव है किंतु केवल सुविधाओं से शिक्षा संभव नहीं है। बहुत लोग रोज मैकाले की शिक्षा पद्धति की आलोचना करते हैं किंतु उनकी खुद की अपनी समझ भी मैकाले शिक्षा पद्धति की अनुकूलता से बाहर की नहीं होती।
इस प्रयोग की विस्तृत चर्चा मेरी किताब “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” में की गई है। आप चाहें तो किताब भी पढ़ सकते हैं। किताब यहां से प्राप्त की जा सकती है – ‘मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर‘
He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.
For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.
He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.
अभी इस विमर्श को छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद वहां के आदिवासी समाज के लिए प्रतिबद्ध, ईमानदार व कल्याणकारी है या नहीं, यह भी छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद बस्तर के आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व वास्तव में करता है या नहीं, सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण तथ्य कि बस्तर का माओवादी, माओवाद को जानता समझता भी है या नहीं इस विमर्श को भी छोड़ देते हैं। मैं इस किताब में यह विमर्श विस्तार से करूंगा भी नहीं क्योंकि पूर्वाग्रहों से इस विमर्श के दूषित होने का खतरा है, भिन्न पूर्वाग्रहों के लोगों के दावे भिन्न होंगें। मैं इस किताब में बस्तर में चल रहे प्रयासों की तथ्यात्मक चर्चा करूंगा, पुस्तक को पढ़ने के पश्चात आप स्वयं ही बस्तर के माओवाद के संदर्भ में विमर्श कर सकने में सक्षम होंगें, ऐसी आशा मैं करता हूं।
साम्यवादी विचारधारा को मानने वाले लोगों में यह विरोधाभास रहता है कि वे सत्ता के राजसी ढांचे को साम्यवादी ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति मानते हैं लेकिन सत्ता के साम्यवादी ढांचे को लोकतंत्रीय ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति नहीं मानते हैं, इसे क्रांति न मानने के लिए विभिन्न तर्क देते हैं जबकि यदि देखा जाए तो सत्ता के ढांचों में परिवर्तन की दोनों घटनाओं का चरित्र एक सा है तथा दोनों घटनाएं आम लोगों द्वारा घटित हुईं। यूं लगता है कि क्रांति को स्थापित करने के लिए क्रांति की परिभाषा को पूर्वाग्रह के अनुसार गढ़ लिया जाता है।
माओवाद के संदर्भ में मूलभूत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति जिसने किसी चीटी को नहीं मारा होता है वह दूसरे व्यक्तियों की नृशंस हत्याएं करने में गौरव का अनुभव करने लगता है, स्वयं को परिवर्तन के महान यज्ञ में आहुति डालने वाला समझने लगता है, कैसे क्रांति में योगदान करने के लिए किसी की भी निर्दोष व मासूम की भी हत्या करने के लिए स्वयं में महिमामंडित करते हुए गौरवांवित महसूस करते हुए स्वीकृति प्राप्त कर लेता है!! आगे की चर्चा ऐसा क्योंकर होता है, समझने में मदद करती है।
सत्ता को अपरिहार्य मानना तथा सत्ता परिवर्तनों को जिस रूप में प्रस्तुत किया जाता है या जाता रहा है, इस अनुकूलता के अंतर्गत बेहतर व्यवस्था के निर्माण के लिए सत्ता के ढांचों में परिवर्तन ही एकमात्र रास्ता दृष्टिगत होता है, जिसे क्रांति का नाम दिया जाता है जिससे संबद्धित व्यक्ति स्वयं को क्रांतिकारी कहता है। व्यक्ति के विचार, सोच व मानसिकता की अनुकूलता यूं कर दी जाती है कि व्यक्ति यह मानने लगता है कि वर्तमान व्यवस्था नष्ट करने से बहुत अधिक अव्यवस्था होगी जिसका उपयोग वर्गविहीन सामाजिक व्यवस्था में किया जा सकता है। वर्तमान व्यवस्था को भी अव्यवस्था ही माना जाता है। वर्गविहीन आदर्श सामाजिक व्यवस्था के निर्माण व निर्माण प्रक्रिया में लोगों की हत्याएं होना व करना तो महान क्रांति के लिए आहुति मात्र ही हुईं।
क्रांति का सबसे भयावह तथ्य यह है कि वर्तमान में जीवन जीने वाले मनुष्यों के जीवन का मूल्य, भविष्य के अजन्में मनुष्यों के जीवन मूल्य की तुलना में नगण्य है, कमतर है। इतना नगण्य है कि जीवित मनुष्य के जीवन की हत्या, भविष्य के काल्पनिक मनुष्य के आभासी बेहतर भविष्य के लिए करते हुए, गौरव महसूस किया जा सकता है।
भविष्य अनिश्चित होता है। काल्पनिक भविष्य के लिए वर्तमान की बलि चढ़ाना प्रपंच, तर्क-छद्म व प्रवंचना से इतर कुछ भी नहीं। क्रांतिकारियों को भविष्य के प्रति इतना निश्चिंत-विश्वास कैसे हो सकता है, वर्तमान में हत्याएं करते हुए, भय स्थापित करते हुए, मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करते हुए कैसे भविष्य में मानवीय व्यवस्था का दावा कर देते हैं? क्या हिंसा करना, हत्या करना, हथियार का प्रयोग करना, भय स्थापित करना इत्यादि से भविष्य को देख सकने व महसूस कर सकने की दृष्टा क्षमता विकसित होती है?
माओवाद अच्छा हो सकता है, आदर्श हो सकता है, किंतु हिंसा आदर्श नहीं हो सकती, हिंसा अच्छा नहीं हो सकती, हिंसा अनुचित है, हिंसा अस्वीकार्य है, हिंसा प्रवंचना है, हिंसा आत्मछल है। अहिंसा उचित है, अच्छा है, इस तथ्य को कोई भी मनुष्य अस्वीकार्य नहीं कर सकता। माओवाद मनुष्य को मतवादी के रूप में बेसुध करके हिंसक बनाने व हिंसा करने में गौरवांवित महसूस करने की आत्म-प्रवंचना की ओर ढकेलता है। ऐसा मनुष्य बिना हिंसा के नहीं रह सकता, क्रांति के नाम पर ऐसा क्रांतिकारी मनुष्य हिंसा करता है, जो अनुचित है व अस्वीकार्य है।
ऐसी क्रांतियां मात्र प्रतिक्रियाएं होती हैं, विपक्षी होने की प्रतिक्रियाएं, प्रतिक्रियाओं की प्रतिक्रियाएं। प्रतिक्रियाओं की शृंखला से इतर कुछ भी नहीं। प्रतिक्रियाओं, कल्पनाओं व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति वस्तुतः क्रांति हो ही नहीं सकती, इसे भले ही इसे कितना भी जोर लगाकर क्रांति का नाम दिया जाए।
कल्पना व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति को कितना ही महिमामंडित किया जाए, कितना भी सुसंगत तर्क दे लिए जाएं, कितने भी ऐतिहासिक प्रमाणों से मेल खाती हो, समानता नहीं ला सकती है। इसको यूं समझने का प्रयास किया जाए कि कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से विश्व को बचाना चाहते हैं, कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से। बेहतर व आदर्श व्यवस्था बनाने के नाम पर एक दूसरे की परस्परता को खंडित करते हैं, एक दूसरे के अस्तित्व को जड़ सहित समाप्त करना चाहते हैं। जबकि वास्तव में इनमें से किसी को भी बेहतर समाज का निर्माण करने की अभिलाषा नहीं होती है वरन अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार व्यवस्था को मनचाहा आकार देना चाहते हैं, ऐसा कर पाने के लिए हिंसा, शक्ति, सत्ता, प्रपंच, छल, छद्म इत्यादि का प्रयोग करते हैं। कल्पना विलगाव पैदा करती है, दूसरे समूह व व्यक्ति को निम्न स्तर का मानती है।
यह क्रांति केवल सत्ता पर एक समूह के स्थान पर दूसरे समूह को स्थापित कर देती है। नया सत्ताधारी समूह विभिन्न सत्ताओं को अपने अधिकार में कर लेता है। फिर एक नया उच्च वर्ग बनता है जो विभिन्न प्रकार के विशेष अधिकारों से स्वयं को शक्तिशाली बनाता है। क्रांतियों के नाम पर विभिन्न स्तरों पर व तौर-तरीकों से इसी प्रक्रिया का दुहराव चलता रहता है। सत्ता-क्रांति कभी भी विषमता न तो कभी नष्ट करती है और न ही नष्ट करने की अभिलाषा व क्षमता ही रखती है। सत्ता-क्रांति महत्वपूर्ण बन पाने का वंचना तंतु है, संपूर्ण रूप से प्रतिक्रिया या प्रतिक्रिया की शृंखला पर आधारित। प्रतिक्रिया संघर्ष उत्पन्न करती है तात्पर्य कभी समाधानित न होने वाला वैमनस्य व हिंसा, परस्परता की हत्या। इस प्रकार की क्रांति सार्थक, मानवीय व समता वाली कैसी हो सकती है?
मोटे तौर पर वर्तमान साम्यवाद पूंजीवाद के विरोध पर आधारित है। साम्यवाद में आर्थिक समता की कल्पना परोसी जाती है, कल्पना परोसना इसलिए कह रहा हूं क्योंकि गहराई से समझने पर साम्यवाद का चरित्र भी पूंजीवादी चरित्र का ही है। साम्यवाद का पूंजीवाद राजकीय होता है, राजकीय-पूंजीवाद। पूंजीवाद चाहे व्यक्ति का हो, व्यक्तियों के समूह का हो या राज्य का हो, कभी समतापूर्ण व कल्याणकारी नहीं हो सकता, संभव ही नहीं।
साम्यवाद ही नहीं, अभी तक समाजवाद व पूंजीवाद में भी जो अंतर माना जाता है वह यह कि पूंजी की स्वछंदता व शक्ति व्यक्ति के पास न होकर राज्य व शासन के पास रहती है। इसका बेहतर समाज व व्यवस्था निर्माण से कोई रिश्ता नहीं होता क्योंकि राज्य अपने आपमें कोई जीवंत वस्तु नहीं होता जो स्वयं को स्वतः संचालित करता हो। राज्य को व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह द्वारा ही संचालित किया जाता है। इस प्रकार नाम परिवर्तन के बावजूद शक्ति व सत्ता कुछ व्यक्तियों या व्यक्ति-समूहों के हाथ में ही केंद्रित रहती है।
पूंजीवाद की ही तरह साम्यवाद का आधार भी आर्थिक ही है इसीलिए इसका मूल चरित्र भिन्न नहीं है। व्यक्ति के अंदर आर्थिक संपन्नता के लिए जो वासना रहती है, साम्यवाद की आर्थिक समता का आधार यही वासना है। साम्यवाद आधार प्रतिक्रिया है यही कारण रहा कि यह वर्ग विग्रह में लिप्त होकर एक ऐसा तंत्र बन गया जो मनुष्य का प्रयोग करता है तथा घृणा, द्वेष, हिंसा, हत्या आदि को आवश्यक व अनिवार्य मानने की कट्टरता रूपी आत्मछल को प्रवंचना के साथ कोरे आदर्श व गौरव के रूप में प्रतिष्ठित व पोषित करता है। पूंजीवाद व साम्यवाद में मूलभूत चारित्रिक अंतर नहीं।
लोकतंत्र में मूलभूत आदर्श प्रबल होना चाहिए। राजकीय व शासकीय मानसिकता को लोकतंत्र का नाम देने तथा शास्त्रों में, दस्तावेजों में, भाषा में, तर्कों इत्यादि में लोकतंत्र-लोकतंत्र की रट लगाने से लोकतंत्र को झुठलाया ही जाता है। वास्तविक लोकतंत्र का मूलभूत आदर्श, लोकविश्वास के आधार पर नीतियों को स्थापित करते हुए राज्य-शासन को कम करते हुए शासन मुक्त समाज की स्थापना व मनुष्य का परिष्करण करने के वृहद अवसर उपलब्ध कराना है।
विनाश को केवल और केवल वही लोकतंत्र रोक सकता है जो अहिंसा, सामाजिक समता व कल्याण को अपनी दीर्घकालिक नीति मानेगा, इसी के अनुरूप अपने आर्थिक, प्रशासनिक व राजनैतिक ढांचे बनाएगा। अभी तक की पद्धतियों में सबसे बेहतरीन पद्धति लोकतंत्र है। पुरानी क्रांतियों को व्यवस्थित या ऊटपटांग तरीकों से दोहराया जाना औचित्यहीन है। मूलभूत बात है मानवीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति व रचना “अहिंसा” को जानने, समझने, स्वीकारने व प्रमाणिकता में जीने की। सत्य के आग्रह के साथ अहिंसा को समझना, स्वीकारना व प्रमाणिकता में जीना। मैं गांधी को मानवीय इतिहास के लिए इसीलिए अत्यधिक महत्वपूर्ण व दृष्टा व्यक्ति मानता हूं क्योंकि वे मानवीय लोकतंत्र के दृष्टा थे, उनकी अहिंसा सत्य के निकट थी व स्वअनुशाषित थी।
मैं साम्यवाद, माओवाद पूंजीवाद, लोकतंत्र आदि विषयों पर गहरी व विस्तृत चर्चा इस पुस्तक में नहीं करना चाहता क्योंकि इस पुस्तक का मुख्य विषय बस्तर में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन के लिए रचनात्मक प्रयास हैं, पुस्तक अपने मूल विषय से भटक जाएगी। संक्षिप्त रूप से जितनी भी चर्चा इन विषयों पर प्रस्तावना अध्याय में हुई, आशा करता हूं कि उससे आपको यह महसूस हो रहा होगा कि मुझे साम्यवाद, माओवाद, क्रांति, परिवर्तन, पूंजीवाद आदि की समझ है, साथ ही यह पुस्तक रचनात्मक समाधान का प्रशस्तिगान करती हुई प्रतीत न हो, वरन् वस्तुस्थिति व रचनात्मक समाधान के प्रयासों को समझने में उपयोगी हो ताकि आप भी अपना योगदान सुनिश्चित करने की ओर मनन कर सकें, निर्णय ले सकें।
मेरा निवेदन स्वीकारें और खुले दिमाग से व्यवहारिकता के साथ इस लेख को पढ़ने का प्रयास कीजिए। लेख कुछ लंबा है इसलिए धैर्य की भी महती जरूरत है।
यदि हम बस्तर क्षेत्र में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन में अपना योगदान देना चाहते हैं तो हमें बस्तर को वास्तविक धरातल से समझना पड़ेगा। बस्तर को समझने के लिए हमें पूर्वाग्रहों, पक्षपातों, पूर्वधारणाओं, भ्रांतियों व फ्रैबीकेटेड-तथ्यों आदि से मुक्त होना पड़ेगा। हमें फ्रैबीकेशन, प्रायोजित-प्रतिस्थापनाओं व प्रायोजित आदिवासी हीरोज के जाल से बाहर आना पड़ेगा। यदि हम वास्तव में बस्तर के आम आदिवासियों के प्रति संवेदनशील हैं तो हमें बस्तर के वास्तविक धरातल को गहराई से समझना पड़ेगा।
बहुत अधिक संभावना इस बात की है कि मेरे इस लेख से छत्तीसगढ़ के नीतिनिर्माता नौकरशाह व नागरिक प्रशासनिक नौकरशाह आदि भी असहमत हों, मुख्यधारा के लोग जो बस्तर की धरातलीय वास्तविकता से परिचित नहीं है उनका असहमत होना तो अवश्यंभावी है।
अधिकतर लोगों के द्वारा असहमत होने की प्रबल संभावनाओं के बावजूद मैं बस्तर समाधान के मुद्दे पर भिन्न दृष्टिकोण से कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारियों के योगदान पर अपनी बात रखना चाहता हूं। कई बार हम वस्तुस्थिति व तथ्यों से परिचित न होने के कारण भिन्न दृष्टिकोण से वस्तुस्थितियों को नहीं देख पाते हैं। बस्तर जैसे क्षेत्रों में समाधान के लिए हमें बहुत सारे कोणों से वस्तुस्थितियों को समझना पड़ता है। पूर्वाग्रहों, पक्षपातों तथा मनगढ़ंत व फ्रैबीकेटेड तथ्यों की भरमार के कारण वस्तुस्थिति को समझ पाना असंभव सा हो जाता है, इसलिए बहुत बार हम इन कारकों के आधार पर अपनी कल्पना, तार्किकता व सैद्धांतिकता के कारण अपना पक्ष चुन लेते हैं जो गलत भी हो सकता है।
जब बात बस्तर की आती है तो माओवाद, आदिवासी, सलवाजुडूम व आदिवासी हीरोज की बात आती ही है। आदिवासी हीरोज से मेरा तात्पर्य उन लोगों से है जिनको बस्तर के आदिवासी लोगों के लिए नागरिक व पुलिस प्रशासन के शोषण के खिलाफ संघर्ष व आदिवासियों के लिए विकास के कार्य करने वालों के रूप में, कुछ NGOs, माओवाद के प्रति झुकाव लिए हुए प्रतिष्ठित लेखकों, प्रोफेसरों व मीडिया आदि के द्वारा प्रायोजित किया जाता है। तथ्यों के फ्रैबीकेशन का मूलभूत कारण निहित-स्वार्थ, पूर्वाग्रह, पक्षों के प्रति झुकाव व वस्तुस्थिति की सही सूचनाएं न होना ही है।
बस्तर में चल रहे कान्फ्लिक्ट-रिजोलूशन के दीर्घकालिक-रचनात्मक समाधान के प्रयासों की चर्चा मैं बस्तर पर अपनी आगामी किताब में कर रहा हूं। यहां इस लेख में बहुत तत्वों पर बात करना संभव नहीं इसलिए केवल कुछ भ्रांतियों पर प्रथम दृष्टया-चर्चा करना चाहता हूं। यदि हम बस्तर से संबंधित कुछ मूलभूत भ्रांतियों को समझ लें तो कल्लूरी जैसे अधिकारियों की जरूरत व योगदान की व्यवहारिकता स्वतः समझ में आने लगती है। यह भी समझ आता है कि कल्लूरी जैसे अधिकारियों के व्यवहारिक योगदान को यूं ही नहीं नकारा जा सकता है।
भ्रांतियां व हमारे मानदंडों का घिनौना दोगलापन
बस्तर से जुड़े कुछ मुद्दों पर बेहिसाब व अनापशनाप भ्रांतियां फैलाई गई हैं। फ्रैबीकेशन व भ्रांतियों का स्तर इतना अधिक संगठित है कि उच्चतम न्यायालय तक को तथ्यों के फ्रैब्रीकेशन से भ्रम में डाल दिया जाता है।
माओवादी व आदिवासी :
बस्तर के बारे में सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि माओवादी आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, आदिवासियों के हित के लिए काम करते हैं और स्थानीय आदिवासी ही माओवादी है। बस्तर के आम आदिवासी की बात तो छोड़ ही दीजिए, वह आदिवासी भी जो संघम का सक्रिय सदस्य है तक भी माओवाद का ककहरा नहीं जानता है। कुछ लोगों को माओवाद के शब्द रटा दिए गए है। जब 12-13 वर्ष की आयु के बच्चों को उनके माता पिता के घर से जबरिया अपहृत कर ट्रेनिंग कैंपों में डालकर कई-कई वर्षों तक वही शब्द व तर्क जबरिया ठूंस-ठूंस कर रटाए जाएंगें तो इससे मानसिक विकास व सोचने विचारने की शक्ति विकसित होगी या कुंठित होगी। स्वयं सोच लीजिए। क्या यह हिंसा नहीं है। बेहद ही खतरनाक हिंसा है। पीढ़ी दर पीढ़ी तक अनवरत चलने वाली हिंसा है।
आदिवासियों की हालत यह है कि वे दिन में सड़क बनाते हैं तो रात में माओवादियों के दबाव में सड़क खोदते हैं लेकिन कहते हैं कि हमने स्वेच्छा से सड़क खोदी। प्रशासन के पास चुपके से आते हैं, कहते हैं कि हमको सड़क चाहिए, स्कूल चाहिए, अस्पताल चाहिए लेकिन माओवादियों को पता न चले कि हम यह सब मांग रहे हैं।
संभव है कि भारत के दूसरे क्षेत्रों में माओवादियों की कोई विचारधारा हो जिसका आदिवासियों या आम लोगों की दुख तकलीफ आदि से रिश्ता हो, लेकिन बस्तर में ऐसा बिलकुल भी नहीं है। बस्तर में माओवाद कैसे पनपा इस पर विस्तृत बात बस्तर पर मेरी आने वाली किताब में होगी। प्रथम दृष्टया आप यह समझिए कि बस्तर में माओवाद बस्तर के आम आदिवासियों का प्रतिनिधित्व बिलकुल नहीं करता है, उल्टे आम आदिवासी माओवाद से त्रस्त है।
सलवा-जुडूम :
सलवा जुडूम के बारे में इतनी अधिक भ्रांतिया फैलाईं गईं कि सलवा जुडूम का नाम लेना भी गाली देना जैसा बना दिया गया। उच्चतम न्ययालय को प्रतिबंध लगाना पड़ गया। अंदाजा लगाया जा सकता है कि तथ्यों को फैब्रीकेट करने व भ्रांतियां फैलाने की श्रंखला कितनी गहरी व ढांचागत है।
सलवा जुडूम के बारे में कितनी ही कहानियां गढ़ी गईं। चूंकि लोग सलवा जुडूम व बस्तर की आदिवासी संस्कृति व धरातल से परिचित नहीं इसलिए गढ़ी गई कहानियां सच मान ली जाती रहीं।
सलवा जुडूम की शुरुआत बीजापुर जिले के एक माओवाद से त्रस्त गांव के तीन-चार बिलकुल निरक्षर व मासूम आदिवासी बंधुओं ने की थी। उनके पास इच्छा तो थी लेकिन ताकत नहीं थी माओवाद की हिंसा से लड़ने के लिए। सलवा जुडूम एक खालिस स्वतःस्फूर्त जनांदोलन था। हजारों-हजार आम आदिवासी इसके साथ खड़ा था। माओवादी नहीं चाहते थे कि इस तरह का कोई जनांदोलन खड़ा हो पाए क्योंकि ऐसा स्वतःस्फूर्त आंदोलन उनके अस्तित्व को खतम कर सकता था। मुख्यधारा के लोगों की इस भ्रांति को खतम कर सकता था कि माओवादी आदिवासियों के प्रतिनिधि हैं।
माओवादियों के कारण सैकड़ों गांवों को वीरान होना पड़ा। सैकड़ों हजारों मासूम आदिवासियों की हत्याएं कर दी गईं। हजारों आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा। लेकिन ठीकरा हमेशा फोड़ा गया सलवा जुडूम के ऊपर।
यदि हम माओवाद के नामपर आदिवासियों के हथियार उठाने को न्यायोचित मानते हैं तो जब माओवाद की हिंसा व शोषण से ऊबकर आम आदिवासी माओवाद का संगठित विरोध करने के लिए स्वतःस्फूर्त जनांदोलन सलवा जुडूम बनाता है तो हम उसका विरोध क्यों करते हैं, जबरिया बदनाम क्यों करते हैं, उसको नष्ट करने के लिए पूरी ताकत क्यों लगा देते हैं। हमारे मानदंड इतने सतही खोखले व दोगले क्यों हैं।
हत्याएं, शोषण व यौन-शोषण :
बस्तर में पुलिस जब किसी का इनकाउंटर करती है तो हम यह साबित करके ही दम लेते हैं कि इनकाउंटर बिलकुल गलत था। लेकिन हम माओवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं का विरोध क्यों नहीं करते हैं जबकि माओवादियों ने पुलिस की तुलना में कई गुना अधिक मासूम आदिवासियों की हत्याएं की हैं। हम एक लाइन का भी विरोध नहीं करते हैं। पुलिस को नियंत्रित करने के लिए न्यायालय है, मानवाधिकार आयोग हैं, हम और आप हैं। लेकिन हम आदिवासियों की सुरक्षा व विकास व मानवाधिकार के नाम पर माओवादियों का विरोध क्यों नहीं करते, क्या वे ईश्वरीय अवतार हैं। हमारे मानदंड इतने दोगले क्यों हैं।
हम पुलिस कस्टडी में दी जाने वाली प्रताड़नाओं की सच्ची झूठी कहानियों की सत्यता की परख किए बिना तुरंत से सच मानकर पुलिस का विरोध करना शुरू कर देते हैं। लेकिन प्रतिवर्ष माओवादियों द्वारा सैकड़ों 12-13 वर्ष के बच्चे-बच्चियों को बर्बरता पूर्वक उठाकर ट्रेनिंग कैंपों में डाल दिए जाने व वहां पर होने वाले शोषण व यौन-शोषण का विरोध हम क्यों नहीं करते हैं।
क्या यह मान लिया जाए कि किशोरियों का ट्रेनिंग कैंपों में लगातार होने वाला यौन-शोषण, ब्रेन-वाश कर दिए जाने के कारण यौन-शोषण नहीं रह जाता है। महान मानवीय संवेदनशील व उच्चतर सामाजिक मूल्यों वाला विशिष्ट तत्व हो जाता है।
जांचों व रिपोर्टों की विश्वसनीयता का स्तर
CBI आदि जैसी आधुनिक तकनीक व सुविधाओं से समृद्ध विशेषज्ञ व प्रतिष्ठित संस्थाओं की जांचे भी बस्तर जैसे इलाकों में कितनी सही या गलत हो सकती हैं इसको सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है।
मान लीजिए आप बस्तर के बीजापुर जिले के सुदूर इलाके में जा रहे हैं। रास्ते में आपको दो बच्चे मिलते हैं जिनकी उम्र महज 9 से 13 वर्ष है। वे पत्तों के बने दोनों में जामुन लिए हैं कि यदि कोई उस रास्ते से गुजरे और उनसे जामुन खरीदता है तो उनको पांच दस रुपए मिल जाएंगे। आप जामुन खरीदते हैं। आपको पता नहीं होता लेकिन आपके उस रास्ते से गुजरने की जानकारी ये बच्चे संघम के सदस्यों को देते हैं। लौटते समय माओवादी या संघम सदस्य आपकी खाल को भोथरे पत्थर से छील-छील कर घंटों तड़पा-तड़पा कर आपकी हत्या कर दी जाती है।
अगले दिन वही बच्चे फिर से दोनों में जामुन लिए खड़े होते हैं। आपकी दृष्टि में ये बच्चे नृशंस हत्या के अपराध में भागीदार हैं या नहीं। यदि आप उन बच्चों को हत्या के अपराध में भागीदार मानते हैं तब भी जब तक खुद संघम सदस्य या खुद वे बच्चे नहीं स्वीकारेंगे तब तक आप कैसे साबित कर सकते हैं या जान सकते है कि वे बच्चे हत्या के अपराध में भागीदार थे। आदिवासी यदि संघम सदस्य नहीं भी है तो भी वह क्यों माओवादियों व संघम के विरुद्ध जाने की कोशिश करेगा यह जानते हुए भी कि अगले ही दिन उसकी सपरिवार तड़पा-तड़पा कर हत्या कर दी जाएगी।
अनुवादक यदि स्थानीय है तो क्या वह अपने पूर्वाग्रह के अनुसार तथ्यों को तोड़मरोड़ नहीं सकता। यदि अनुवादक बाहरी है तो वह शाब्दिक व व्याकरणीय अनुवाद तो कर सकता है लेकिन भावात्मक अनुवाद तो नहीं ही कर सकता है जब तक कि स्थानीय समाज को बेहतर तरीके से समझता नहीं होगा। इस तरह के अभावात्मक अधकचरे अनुवाद से कही गई बात का वास्तविक अर्थ व संदेश पूरी तरह से कुछ का कुछ और निकल सकता है। जब CBI जैसी सक्षम अत्याधुनिक तकनीक व सुविधाओं से युक्त संस्थाओं की जांच दावे से पूरी सही नहीं कही जा सकती। जब CBI की भी अपनी सीमाएं हैं तो बाहरी लोग कुछ घंटे या कुछ दिन के लिए किसी स्थान में जाकर वहां के चुनिंदा स्थानीय लोगों से चर्चा करके बिलकुल सही व निष्पक्ष जांच कर पाने का दावा कैसे ठोंक सकते हैं।
ऐसी जांचों का परिणाम मूलभूत रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि जांच कर्ता के समक्ष जिस स्थानीय व्यक्ति या समूह को प्रस्तुत किया गया है वह किस पक्ष की ओर झुकाव रखता है। पुलिस आम आदमी की सुरक्षा सुदूर गावों में हर क्षण नहीं कर सकती है, इसलिए अधिकतर ऐसी जांचों में माओवाद के विरुद्ध बात न करना व पुलिस के विरुद्ध में बात करना जीवन के लिए बहुत अधिक सुरक्षित होता है।
मीडिया के जो लोग पहुंचते हैं और कहीं कुछ दिन रुककर लोगों से कुछ चर्चा करते हैं। स्थानीय आदिवासी मीडिया के लोगों का पक्ष व पूर्वाग्रह समझ कर ही अपनी बात रखेगा। बाहर से जाने वाले कितने मीडिया वाले लोग हैं जिनको माओवादियों द्वारा बर्बरता से की जाने वाली हत्याओं की जानकारी दी जाती है। माओवादी गावों से 12-13 साल की लड़कियों को उठा ले जाते हैं, इसकी चर्चा तो उठाई गई लड़कियों के माता-पिता भी बाहरी मीडिया के लोगों से नहीं करते हैं। क्यों करेंगें, क्यों वे अपनी व अपने परिवार की जान खतरे में डालेंगें।
मीडिया के लोगों की रिपोर्टें इस बात पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं कि उन्होंने जिन लोगों से बात कीं उन लोगों का झुकाव किस तरफ है तथा खुद मीडिया के लोगों का झुकाव किस तरफ है।
बस्तर के वर्तमान पुलिस महानिरीक्षक “कल्लूरी”
कल्लूरी को मैं प्रत्याक्रमण का विशेषज्ञ पाता हूं। ध्यान दीजिए मैं कह रहा हूं कि वे प्रत्याक्रमण के विशेषज्ञ हैं, मैं यह नहीं कह रहा कि वे आक्रमण के विशेषज्ञ हैं। बस्तर में सुदूर गांवों तक में बिलकुल नीचे तक सूचनाओं के बेहद व्यवस्थित श्रंखला तंत्र की स्थापना व मजबूत पकड़ रखने वाले कल्लूरी हर स्तर पर प्रत्याक्रमण करते हैं माओवादियों की हिंसक घटनाओं जैसी प्रत्यक्ष आक्रमण के प्रत्याक्रमण से लेकर माओवादियों के समर्थकों के द्वारा फ्रैबीकेटेड तथ्यों व आदिवासी हीरोज के प्रायोजन रूपी अप्रत्यक्ष आक्रमण के प्रत्याक्रमण तक।
हर स्तर पर प्रत्याक्रमण की विशेषज्ञता ही कल्लूरी को चहुंओर से आलोचनाओं का शिकार बना देती है। माओवादी, माओवादी समर्थक तथा क्रांति के साथ रोमांस की भावना से नियंत्रित होने वाले वे लोग जो वास्तविक धरातल से अपरिचित हैं या फ्रैबीकेटेड तथ्यों को ही अकाट्य सच मान लेते हैं, आदि जैसे लोग कल्लूरी जैसे अधिकारियों के इस स्तर के भयंकर विरोधी बन जाते हैं कि अपने अंदर वास्तविकता व व्यवहारिकता को समझकर विश्लेषण की संभावना के भ्रूण को भी नहीं उत्पन्न होने देते हैं। धरातलीय वस्तुस्थिति को कान्फ्लिक्ट-रिजोलूशन के व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखने समझने की बात तो कल्पनातीत है।
कल्लूरी व आदिवासी समाजबस्तर में रहने वाला आम आदिवासी व आम गैर-आदिवासी लोग, जिनका NGO-दुकानदारी या राजनैतिक या माओवाद का समर्थन आदि पर आधारित निहित स्वार्थ नहीं हैं, अपवाद छोड़कर वे सभी एक तथ्य को स्वीकार करते हैं कि जब से कल्लूरी बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक बने हैं तब से माओवादियों की गतिविधियां बहुत अधिक नियंत्रित हुई हैं। घोर माओवादी नियंत्रित इलाकों में भी सड़के, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक वितरण आदि नागरिक सेवाएं पहुंची हैं। सैकड़ों गावों के आम आदिवासियों ने स्वयं को सुरक्षित महसूस करना शुरू किया है।
पुलिस व नागरिक प्रशासन के बेहतर तालमेल से ही सुदूर माओवादी इलाकों में विकास व शांति का पहुंच पाना संभव हो पा रहा है। अन्यथा विकास केवल जिला मुख्यालयों तक ही सीमित था क्योंकि तुलनात्मक रूप से जिला मुख्यालय आदि ही सबसे सुरक्षित इलाके थे। जिसने भी अंदर के इलाकों में जाने का प्रयास किया उसकी स्थिति सुकमा के पूर्व जिलाधिकारी अलेक्स पी मेनन जैसी कर दी गई। अलेक्स मेनन ग्रामीण विकास के बेहतरीन आइडियाज के साथ गांव-गांव जा रहे थे, लोगों पर विश्वास करके बिना सुरक्षा के आम-आदिवासी के पास उसके जैसा बनकर पहुंचते थे। सैंद्धांतिक रूप से यह बेहतर बात थी लेकिन व्यवहारिक रूप में यह हुआ कि उनकी इस शैली ने माओवादियों को उनका अपहरण करने के लिए प्रोत्साहित किया। बेहतरीन आइडियाज रखे रह गए।
ज्यों-ज्यों स्थितियां नियंत्रण में आती चली जाती हैं या परिस्थितियां परिवर्तित होती हैं त्यों-त्यों कल्लूरी की क्रियान्वयन नीतियां भी बदलती जाती हैं। माओवाद का प्रभाव क्षेत्र कम होने के साथ ही कल्लूरी ने माओवादियों के आत्मसमर्पण व पुनर्वास की नीति को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया। आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवनयापन करने में भी भरपूर सहयोग करते हैं। कुछ माओवादियों की धूमधाम से शादी भी कराई।
इस लेख में कल्लूरी की कुछ फोटो दे रहा हूं, इनमें से हर एक फोटो बिना शब्दों के ही बहुत कुछ कहती है।
चलते-चलते
मैंने पिछले ग्यारह-बारह वर्षों में बस्तर को बदलते देखा है। बस्तर के दूर-दराज के कई सैकड़ा गांवों को एक दशक पहले ही देख चुका था। तब बस्तर में सड़कें नहीं होतीं थीं, पेट्रोलपंप नहीं होते थे, मोबाइल नहीं होते थे। एक गांव से दूसरे गांव में जाने के लिए जंगली रास्ते होते थे, माओवाद अपने पूरे उफान पर था ही। न मेरी कोई NGO उस समय थी और न ही आज है, न मुझे वहां जाने के लिए कहीं से कोई फंड मिलता था, न ही मैंने कभी कहीं माओवाद पर कोई लेख या रिपोर्ट ही लिखा। तात्पर्य यह कि मेरा कोई निहित स्वार्थ नहीं रहा, अपितु केवल वस्तुस्थिति को समझने व आम आदिवासियों के विकास की चेष्टा करना ही उद्देश्य रहा। एक दशक से अधिक समय तक मैंने बस्तर को धैर्य के साथ धरातल में रहते हुए देखा, समझा व जाना है।
बस्तर बहुत अधिक बदल रहा है। बस्तर में रचनात्मक विकास की क्रांति हो रही है। यह क्रांति करने वाले बाहर से आए हुए लोग नहीं है वरन हमारे ही देश के वे नौजवान हैं जो कि IAS व IPS बनते हैं। बस्तर में प्रशासन का तालमेल दिखता है। नए अधिकारियों के द्वारा पूर्व के अधिकारियों के काम को आगे बढ़ाया जाना दिखता है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कितना अच्छे हैं या कितना बुरे यह मैं दावे से नहीं जानता। लेकिन एक बात मैं दावे से जानता हूं कि बस्तर में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन की दिशा में जो गंभीर व दीर्घकालिक रचनात्मक विकास व समाधान के कार्य हो रहे हैं, वह रमण सिंह की नेतृत्व दूरदृष्टि के बिना बिलकुल भी संभव नहीं। यह रमण सिंह की इच्छाशक्ति, दृढ़ता व अपने निर्णय शक्ति पर विश्वास ही है कि अनगिनत आलोचनाएं झेलने के बावजूद वे बस्तर में जुझारू व कर्मठ अधिकारियों को भेजते हैं, उन पर विश्वास करते हैं तथा उनको प्रोत्साहन देते हैं।
मैं छत्तीसगढ़ सरकार की कई नीतियों व तौर तरीकों से बिलकुल सहमत नहीं, लेकिन जब बात बस्तर में सामाजिक समाधान व रचनात्मक विकास की आती है तब मैं अपने आपको छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, उनकी सलाहकार टोली व बस्तर के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ खड़ा पाता हूं। बस्तर में जैसी गति व दिशा चल रही है यदि वैसी ही चलती रही तो आगामी कुछ वर्षों में बस्तर क्षेत्र विकास व नागरिक सुविधाओं के मुद्दे पर देश के सबसे बेहतरीन इलाकों में से होगा। इसका संपूर्ण श्रेय रमण सिंह, उनकी सलाहकार टोली व प्रशासनिक अधिकारियों को ही जाता है।
IAS अधिकारियों को तो उनके प्रयासों के लिए प्रशंसा व पुरस्कार मिल जाते हैं लेकिन कल्लूरी जैसे अधिकारियों को मिलती हैं सिर्फ गालियां व आलोचनाएं। जबकि बस्तर में कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति के बिना नागरिक प्रशासन सामान्य मलहम लगाने जैसा छिटपुट सेवा जैसा काम तो करता रह सकता है लेकिन विकास के ठोस व दीर्घकालिक कार्यक्रम नहीं चला सकता है, सुदूर इलाकों में तो बिलकुल भी नहीं।
यदि बस्तर की पुलिस व कल्लूरी सच में वैसे ही राक्षस हैं, रावण हैं जैसा कि प्रायोजित किया जाता है तो बस्तर में विकास व रचनात्मक कार्य संभव ही नहीं हो पाता। रचनात्मक विकास की वास्तविकता तो यह है कि पुलिस का नागरिक प्रशासन के साथ संपूरकता का तालमेल है तभी वहां इतनी गति से काम हो पा रहे हैं।
इसलिए बस्तर को यदि अनबलगन, आर० प्रसन्ना, ओमप्रकाश चौधरी, पी० दयानंद, नीरज बनसोड़, के० देवासेनापथि, अमित कटारिया, अब्दुल हक, अलेक्स मेनन, डा० अय्याज तांबोली, टामन सिंह सोनावानी, सौरभ कुमार व सुश्री अलारमेलमंगई आदि-आदि जैसे IAS अधिकारियों की जरूरत है तो स्व० राहुल शर्मा, अमरेश मिश्र, अभिषेक मीणा, के एल ध्रुव, कल्यान इलेसा, कामलोचन कश्यप, एम० एल० कोटवानी, आर० एन० दास व संतोष सिंह आदि-आदि जैसे IPS अधिकारियों व कल्लूरी जैसे प्रत्याक्रमण विशेषज्ञ पुलिस अधिकारियों की भी जरूरत है।