विस्तृत

Dheeraj Kumar

जो था स्वयं विस्तृत
ज्यादा विस्तार पाता हुआ
विस्तारित हो चला.....

स्वयं के भीतर 
गहरे चलने की मार्ग की खोज का
मार्ग प्रशस्त होता गया

यद्यपि कि
विस्तार का मार्ग से
या, विस्तारित होने का चलने से
प्रत्यक्ष या परोक्ष 
कोई भी संबंध जोड़ना मुश्किल था
तो भी....
एक अदृश्य और अबूझ बंधन से
मजबूती से बंधे हुए थे वे

गहरे भीतर की हरेक यात्रा का
ठहराव का बिन्दु
समय के तीर की दिशा मे
बहता ही चला गया......

बहते जाने के क्रम मे
मष्तिष्क या स्पेस की छननी मे
आसन्न अवशेष के बचे रह जाने की संभावित अवधारणा
ज्यों ज्यों तिरोहित होता गया
अनजाना और अनदेखा सा 
एक तल उभरने की 
प्रक्रियागत रूझान सामने 
दिखने लगा .....

एक तल 
जिसपर रूकने या पैर टिकाने की
कोई संभावना या प्रायिकता 
नही होनी थी
बस
स्वयं चलकर
विस्तारित होते हुये
विस्तृत हो जाना था....

Dhiraj Kumar

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