Category: आदि हैरिसन गलेंडेनिंग उमराव

  • Video: Aadi reads words himself (वीडियो: आदि शब्द स्वयं पढ़ लेते हैं)

    Video: Aadi reads words himself (वीडियो: आदि शब्द स्वयं पढ़ लेते हैं)

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    साढ़े तीन वर्षीय आदि पूरी एबीसीडी जानते हैं, किस अक्षर को किस ध्वनि के साथ पढ़ते हैं, यह भी जानते हैं। इसलिए अब शब्दों को एबीसीडी अक्षरों व ध्वनि से संयुक्त करके पढ़ लेते हैं। एबीसीडी के अक्षरों को पहचानने, ध्वनि को समझना व शब्दों को अक्षरों व ध्वनि से संयुक्त करके पढ़ना। यह सब आदि ने अपने आप सीखा है। मैंने या डा० क्लेयर ने कभी आदि को कुछ रटाया नहीं है, न ही आदि ऐसे किसी स्कूल जाते हैं जहां यह सब सिखाया पढ़ाया रटाया जाता हो।

    आदि ने यह सबकुछ अपने आप खेल-खेल में सीखा है। आदि पिछले कई महीनों से अपना नाम लिख लेते हैं। आजकल अपने आप एबीसीडी लिखने का अभ्यास भी करते रहते हैं। अंको को भी लिखने का अभ्यास करते रहते हैं। आदि यह सब अपने आप खेल-खेल में मस्ती से सीखते समझते रहते हैं। मैं या डा० क्लेयर कभी भी आदि पर कभी भी किसी प्रकार का दबाव नहीं डालते हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • आग, बचाव व बच्चों का प्रशिक्षण — Vivek Umrao Glendenning

    आग, बचाव व बच्चों का प्रशिक्षण — Vivek Umrao Glendenning

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ​ऑस्ट्रेलिया में आग व बचाव सेवाएं कहा जाता है, बहुत महत्वपूर्ण व सम्मानित सेवा मानी जाती है। छोटे-छोटे बच्चों के लिए वर्ष में कई बार कार्यक्रम आयोजित होते हैं। छोटे-छोटे बच्चों जिनको ढंग से चलना व बोलना तक नहीं आता, उन बच्चों को भी आग व बचाव सेवाओं के वाहनों व यंत्रों से परिचित करवाया जाता है। पूरा का पूरा अत्याधुनिक वाहन बच्चों के हवाले कर दिया जाता है, बच्चे उसमें चढ़ सकते हैं, बटनें दबा सकते हैं, स्टियरिंग से खेल सकते हैं। खुद करते हुए अपनी जिज्ञासाएं शांत कर सकते हैं। बच्चों को इस सेवा से जुड़े खिलौने उपहार के रूप में दिए जाते हैं, ताकि बच्चे घर में भी सीख समझ सकें।

    आग व बचाव सेवाओं  के लोग बहुत ही मिलनसार होते हैं, यदि आपातकाल में नहीं जा रहे हैं तो किसी बच्चे की रुचि होने पर वाहन में बैठाकर घुमाने जैसी क्रिया कोई बड़ी बात नहीं। यदि आग व बचाव सेवाओं का कोई वाहन जा रहा है, तो रास्ते में मिलते बच्चों से सेवाओं के लोगों द्वारा हाय हेलो बोलना, मुस्कुराना इत्यादि सामान्य बात है।

    आग व बचाव सेवाएं बच्चों के लिए डरावनी नहीं है, न ही बच्चों की पकड़ व पहुंच से दूर। बच्चों के साथ विश्वास व सम्मान का रिश्ता कायम होता है, जो बड़े होने तक चलता रहता है।

    ​आग व बचाव सेवाओं के कई स्तर होते हैं, छोटी से लेकर बड़ी दुर्घटना से लड़ने व बचाव के लिए। यह सेवा केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं है, यह सेवा पेड़-पौधों, जंगल, जानवर, पक्षी सभी प्रकार के जीव-जंतुओं की सेवा व सुरक्षा के लिए है। यह सेवा कुत्ता बिल्ली इत्यादि को भी बचाती है। यह सेवा किसानों की फसलों व किसानों के पशुओं को भी बचाती है। आग हो, बाढ़ हो, तूफान हो या अन्य मामले, यह सेवा लोगों व जीव-जंतुओं को बचाने का प्रयास करती है, ईमानदारी व प्रोफेशनल तरीके से करती है।

    ​मेरा पुत्र आदि जब एक वर्ष का था तब वह फायर ब्रिगेड के अत्याधुनिक वाहन के अंदर घुसकर सबकुछ देख चुका था। चालक की कुर्सी पर बैठकर स्टियरिंग घुमा चुका था। स्कूलों में यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों को भी आग, आग का प्रयोग, सावधानी व बचाव के तरीके सिखाए जाते हैं।

    मेरा पुत्र लगभग पौने तीन वर्ष का है। बिना भवन व ढांचे वाले जंगल-पहाड़ स्कूल जाता है। जंगली जीव-जंतुओं, पहाड़, जंगल, नदी-नालों में उछलते-कूदते हुए सीखता समझता है। हजारों एकड़ का जंगल है, पहाड़ है, जाहिर है जहरीले सांप, चीटियां, लिजर्ड इत्यादि भी होते हैं। इनसे डरने की बजाय इन जीवों के साथ तालमेल व उनको हानि पहुंचाए बिना स्वयं को सुरक्षित रखना सिखाया जाता है।

    आजकल इस जंगल पहाड़ स्कूल में आदि व अन्य बच्चों को आग के बारे में सिखाया जा रहा है। कितने प्रकार से आग जलाई जा सकती है। धातुओं व पत्थरों के घर्षण, माचिस व अन्य तरीकों से आग जलाना सिखाया जाता है। आग जलाते समय चोट लगने पर क्या किया जाए, सिखाया जाता है। आग कैसे बुझाई जाए, सिखाया जाता है। कहां आग जलानी है, कहां नहीं जलानी है, यह सिखाया जाता है।

    प्राकृतिक-संरक्षित जंगल में बच्चे आग की जानकारी प्राप्त करते हुए

    ​आदि धातुओं के घर्षण से आग जलाना सीखते हुए

    बच्चे छोटे हैं, वे पूरी तरह से सीख नहीं पाते हैं, न ही याद कर पाते हैं। लेकिन उनका मस्तिष्क इन जानकारियों को ​संरक्षित तो करता ही है, स्टोर की गई इन जानकारियों का प्रयोग बच्चों के कुछ बड़े होने पर मस्तिष्क बेहतर तरीके से करता है, यदि सीखने सिखाने का क्रम चलता रहा।

    ऑस्ट्रेलिया में कई प्रकार के जंगल होते हैं। एक श्रेणी प्राकृतिक संरक्षित जंगल की होती है, प्राकृतिक संरक्षित जंगलों में आग नहीं जलाई जा सकती है, जंगल में कुछ छोड़ कर आना व जंगल से कुछ लेकर आना प्रतिबंधित होता है। प्रतिबंध का मतलब यह नहीं कि प्रवेशद्वार पर पुलिस लगती है या जांच होती है। एक छोटा सा सूचनापट लगा देना ही पर्याप्त होता है।
    आदि जिस जंगल-पहाड़ स्कूल में जाते हैं, वह प्राकृतिक संरक्षित जंगल है। वहां आग नहीं जला सकते तो बच्चों को घेरा बनाकर, लकड़ी रखकर काल्पनिक आग जलाने व काल्पनिक आग से जानकारी दी गई। अब अगले चरण में उनको ऐसे पार्क में ले जाया जाएगा जहां आग जलाने की सुविधा है। वहां बच्चे असल आग जलाना व सुरक्षा/सावधानी के साथ प्रयोग करना सीखेंगे।

    मस्ती की मस्ती, सीखना का सीखना।

    कोई भी व्यवस्था रातोंरात कानून बनाने से नहीं बनती है। समाज को जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, पीढ़ी दर पीढ़ी सीखने-सिखाने का काम बिना थके, बिना ऊबे करते रहना पड़ता है। अपने आप कुछ भी नहीं होता है। यदि समाज जागरूक नहीं, यदि समाज अपनी जिम्मेदारी नहीं महसूस करता उल्टे राजनैतिक/धार्मिक/आर्थिक सत्ताओं के हाथ में छोड़ देता है तो ऐसा समाज अपनी स्वतंत्रता, विकास व परिष्करण सबकुछ सत्ताओं के हाथों में गिरवी रख कर गुलाम बन जाता है।

    यदि समाज व लोग जागरूक व जिम्मेदार हैं तो व्यवस्था की इतनी औकात हो ही नहीं सकती कि सीढ़ी छोटी पड़ जाए, बैराज के पानी निकालने वाले छेद खुले रह जाएं और समाज के बच्चे अकाल मृत्यु प्राप्त करते रहें।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • Video: आदि का स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलना व उल्टा चढ़ना

    Video: आदि का स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलना व उल्टा चढ़ना

    लगभग साढ़े सात महीने की आयु में पहली बार दो कदम अपने आप चले। आठवें महीने में दोनों हाथों की मेरी उंगलियां पकड़ कर चलने लगे। दसवें महीने में सिर्फ एक उंगली पकड़ कर चलने लगे। एक-एक दिन में कई-कई किलोमीटर चल जाते। 


    आदि बिना किसी ट्रेनिंग के एक झटके में सीढ़ियां चढ़ना शुरू किए, एक झटके में ही एक दिन सीढ़ियां उतरना भी शुरू किए। यूं लगता है आदि अपने मन के अंदर आब्जर्व करते हुए सीखते रहते हैं, आब्जर्व करते हुए एक दिन जब उनको विश्वास हो जाता है कि वे ऐसा कर सकते हैं तब वे एक झटके में कर जाते हैं या कर डालने का प्रयास करते हैं।


    आदि कुछ दिन बाद साढ़े पंद्रह महीने के होगें। अब आदि पार्क में आदि स्लाइडर में फिसलने के लिए लोहे की ऊंचे-स्टेप वाली सीढ़ियां अपने आप चढ़ते हैं, फिर स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलते हैं। फिर स्लाइडर में फिसलन की ओर से ऊपर चढ़ने का प्रयास करते हैं। थकने पर पानी पीने जाते हैं। 


    इन सभी गतिविधियों को इस वीडियो में देखा जा सकता है। 

  • Video: जोखिम उठाने वाला “आदि”

    Video: जोखिम उठाने वाला “आदि”

    आदि को ज्यों ही यह अनुमान लग जाता है कि वह ऐसा कर सकते हैं, तब वे बिना डरे वैसा कर गुजरने की इच्छाशक्ति रखते हैं। पार्क में खेलने आते समय उन्होंने कई बार देखा कि सात-आठ वर्ष के बच्चे लकड़ी के इन लाग्स के ऊपर संतुलन बनाते हुए चलते हैं। आदि की इच्छा रहती रही कि वे भी ऐसा करें लेकिन समझ गए कि अभी वे ऐसा नहीं कर सकते हैं। बहुत दिनों से मन ही मन में गुणा-गणित लगा रहे होंगे, चुपचाप आब्जर्व कर रहे होंगे, अपनी शारीरिक क्षमता को नाप-तौल रहे होंगे। दो दिन पहले उनको लगा कि वे ऐसा कर सकते हैं इसलिए जोखिम लिया जा सकता है। वीडियो को देखकर स्वयं ही आनंद लीजिए, आदि की एक नई गतिविधि का, जोखिम लेने के साहस का।

     

  • Video: पढ़ाकू आदि

    Video: पढ़ाकू आदि

    ज्यों ज्यों आदि बढ़े होते जा रहे हैं उनकी रुचि किताबों में बढ़ती जा रही है। अपना काफी समय किताबों के साथ गुजारते हैं, वह भी आपके बिना अपने हिसाब से। आदि अब हर समय आपके साथ रहना नहीं चाहते हैं, आपको आपकी जगह छोड़कर अपने पसंदीदा कोनों में जाकर अपनी किताबों के साथ समय गुजारना भी पसंद करते हैं। कभी कभार आदि लगभग आधा घंटा या अधिक समय भी अकेले अपनी किताबों के साथ अपने हिसाब से गुजारते हैं। अपनी पसंद की किताबें निकाल कर उनके पन्ने उलटते हुए पढ़ते रहते हैं। लगभग 6 मिनट का यह वीडियो आपको रुचिकर भी लग सकता है या बोरियत वाला भी। 

  • आदि व टोस्ट – अपना काम खुद करने का गर्व

    आदि व टोस्ट – अपना काम खुद करने का गर्व

    आदि की टोस्ट खाने की इच्छा थी। आदि के लिए टोस्ट का छोटा सा डिब्बा किचन बेंच पर रखा रहता है। जब उनको खाने की इच्छा हो वह मांग सकते हैं या खुद अपने सीढ़ीदार स्टूल पर चढ़कर हाथ बढ़ा कर ले सकते हैं। शायद आदि की टोस्ट खाने की इच्छा रही होगी, इसीलिए आदि पहले सीढ़ीदार स्टूल पर चढ़े, हाथ बढ़ाया लेकिन टोस्ट-डिब्बा उनकी पहुंच से दूर था। अब आदि के सामने दो विकल्प थे, आदि मुझे आवाज लगाते या किसी तरह डिब्बे तक पहुंचने का जुगाड़ स्वयं करते। आदि ने दूसरे विकल्प को चुनते हुए प्रयास करने का निर्णय लिया।

    आदि स्टूल से किसी तरह नीचे उतरे (कभी कभार जुगाड़ जमाकर उतर लेते हैं नहीं तो हमको आवाज लगाते हैं, उनको अच्छा लगता है जब हम उनको हवा में उड़ाते हुए उनके सीढ़ीदार स्टूल से नीचे उतारते हैं)।

    स्टूल से अपने आप नीचे उतर कर, अपनी छोटी सी डायनिंग कुर्सी पर चढ़े, कुर्सी से अपनी डायनिंग मेज पर चढ़े, अब टोस्ट-डिब्बे की ओर अपना हाथ बढ़ाया, यहां से टोस्ट-डिब्बे तक पहुंच गए। यदि न भी पहुंच पाते तो हमें तो आवाज लगाकर डिब्बा मांग ही लेते। लेकिन अपना काम खुद करने की खुशी आदि के लिए अलग ही रही।

    हमारी ओर देख कर खूब जोर की आवाज लगाई और बहुत अधिक खुशी व गर्व के साथ हमको अपना टोस्ट डिब्बा दिखाए। आदि को अपने काम खुद करने व हमारे कामों में सहयोग करने में बेहद खुशी होती है। कामों को अपनी उपलब्धि के तौर पर लेते हुए खुशी भी महसूसते हैं।

    आदि
    (उम्र 15 महीने 10 दिन)
  • Video: आदि, किताबें व आदि का अपना पुस्तकालय

    Video: आदि, किताबें व आदि का अपना पुस्तकालय

    लगभग एक मिनट के इस वीडियो में  आपको आदि के चेहरे व व्यवहार के कई आयाम दिखाई देंगे। यह वीडियो आपको आनंद देगा यह मेरा विश्वास है। कैसे आदि अपनी पसंद की किताब लाने के लिए आपकी बताई किताब का नाम मटेर देते हैं। कैसे उनकी पसंद की किताब बताने पर खुशी मन से किताब लाने जाते हैं। आपकी बताई किताब लाने के बावजूद, आपसे वही किताब पढ़ने को कहते हैं जो किताब वह पढ़ना चाहते हैं।

    एक समय था जब आदि लगभग आठ महीने के थे, तब बिस्तर में ढेर लगी किताबों में से किताब का नाम बताने पर किताब निकाल कर देते थे। फिर समय आया जब वे दूसरे कमरे में से नाम बताने पर किताब लाकर देने लगे। अब समय आ गया है जब आदि अपनी पसंद की किताब लाकर देने लगे हैं। आपकी जिद पर पसंदीदा किताब ला तो देते हैं लेकिन किताब कौन सी पढ़नी है, यह आदि ही तय करते हैं।