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  • विज्ञान से संस्कृति देवी और इतिहास बाबू के प्रश्न – भाग 1

    विज्ञान से संस्कृति देवी और इतिहास बाबू के प्रश्न – भाग 1

    Sanjay Shramanjothe

    एक दिन पश्चिम का विज्ञान भारत घूमने आया. भारत के ज्ञानपुर में आते ही उसने भारत की “संस्कृति देवी” और भारत के “इतिहास बाबू” को कुश आसन पर पद्मासन में बैठे गहन धार्मिक (गधा) विमर्श करते हुए देखा. ये दोनों जुड़वा भाई बहन थे.

    थोड़ी देर उसने उनकी बातें सुनने की कोशिश की लेकिन संस्कृत भाषा के सूत्रों और मन्त्रों से भरी बातचीत वो समझ न सका. तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने नवागंतुक को देखकर नमस्कार किया और उनका आपस में परिचय हुआ.

    विज्ञान से पूछा गया कि आप कहाँ से आये हैं आपका वर्ण कुल गोत्र और जाति क्या है?

    विज्ञान ये प्रश्न समझ नहीं सका… वर्ण जाति कुल गोत्र आदि के महान भारतीय आविष्कारों से परिचित न था।

    लेकिन संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने जिद पकड़ ली उन्होंने कहा कि “भद्रपुरुष जब तक हम वर्ण गोत्र और जाति न जान लें तब तक हमारी धमनियों में रक्त जमा रहता है, हमारा भोजन नहीं पचता हमारा मल मूत्र विसर्जन भी रुक जाता है”

    ऐसी भीषण अवस्था देखकर विज्ञान को दया आई, वो बोला “मैं पश्चिम देश से आया हूँ मेरे पिता का नाम प्रयोग और माता का नाम जिज्ञासा है. मैं असल में वर्ण संकर हूँ मेरे माता पिता के अन्य कई मित्र सहयोगी हैं जो एकसाथ रहते हैं, कौशल, साहस, सहकार, सभ्यता और खोज और आविष्कार ये सब हमारे परिवार में इकट्ठे रहते हैं, आप समझ लें मैं इन सबको माता पिता समान समझता हूँ”

    अब वर्ण संकर शब्द सुनते ही भारतीय संस्कृति और इतिहास ने नाक भौं सिकोड़ ली लेकिन ऊपर ऊपर सभ्य बने रहे, भारतीय मेजबानों को ये बात समझ न आई कि ये “प्रयोग” क्या होता है और “जिज्ञासा” क्या होती है, साहस, सहकार सभ्यता भी उनके लिए बिल्कुल नए नाम थे. फिर भी वे मूढ़ नजर नहीं आना चाहते थे इसलिए बनावटी हसी हंसते हुए बोले “अच्छा अच्छा हम इन्हें जानते हैं, खूब जानते हैं”.

    विज्ञान ने साहस बटोरते हुए मेजबानों के माता पिता का नाम पूछा तो दोनों मेजबान बोले “हमारे माता पिता दोनों एक ही हैं, न सिर्फ माता पिता बल्कि वे ही हमारे दादा दादी पितामह महापितामह इत्यादि भी हैं, वे ही हमारे अतीत हैं और वे ही हमारे भविष्य भी हैं.”

    अब विज्ञान चक्कर खाकर गिरने को हुआ. उसने पूछा ये क्या गजब की बात कर रह हैं आप ऐसा कैसे हो सकता है?

    संस्कृति देवी और इतिहास बाबू बड़ी सयानी हंसी हँसते हुए बोले “महाशय आप इस पुण्यभूमि पर नए नए आये हैं अभी तो चमत्कारों की शुरुआत भर है”. विज्ञान हाँफते हुए बोला कि ठीक है मैं सदैव नए ज्ञान को सीखने का प्रयास करता हूँ अब कृपया अपने माता पिता का नाम तो बताइये. तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने दोनों हाथों से अपने कान छूते हुए आँख बंद करके एक स्वर में कहा “पुराण हमारी माता है और पुराण ही हमारा पिता है, वही अतीत है वही भविष्य भी है”

    विज्ञान ने ये “पुराण” शब्द पहली बार सुना था, वो सहज जिज्ञासा करते हुए पूछने लगा कि ये उभयलिंगि प्राणी हमारे देश में नहीं होता ये प्राणी, मतलब अपने माता पिता करते क्या हैं? मेजबान बोले “ वे स्वयं कुछ नहीं करते बल्कि जो कुछ भी दूसरों का किया धरा है उसे अपने श्रीमुख से संस्कृत सुभाषित बनाकर बोल देते हैं. वे जो बोलते हैं उसी को हम वचनामृत समझकर गृहण करते हैं और उसी का चरणामृत इस पुण्यभूमि पर बांटते निकल पड़ते हैं”

    विज्ञान की उत्सुकता बढती गयी. उसने कहा कि ये तो गजब की बात है क्या आप मुझे पुराण जी से मिलवा सकते हैं? संस्कृति देवी और इतिहास बाबु बोले “हाँ-हाँ क्यों नहीं वे अभी लोटा लेकर जंगल मैदान गए हैं निपट के आ जाएँ फिर यहीं बैठकर तत्वचर्चा करते हैं”

    पांच मिनट बाद ही पुराण महाशय ढीली धोती, खडाऊ, लोटा और जनेऊ संभाले हुए और संस्कृत मन्त्र बुदबुदाते हुए चले आ रहे थे. उनके आज्ञाकारी पुत्र-पुत्री ने उनके चरण स्पर्श किये. विज्ञान ने उनसे हाथ मिलाना चाहा

    लेकिन मंत्रपाठी पुराण जी ने दूर से ही नमस्कार किया और जींस टीशर्ट पहने खड़े इस गौर वर्ण युवक को घूरने लगे. इतिहास बाबू ने परिचय दिया “ये विज्ञान महाशय हैं, पश्चिम देश से आये हैं. सौभाग्यवती जिज्ञासा देवी और चिरंजीव प्रयोग बाबु के सुपुत्र हैं यहाँ पुण्यभूमि पर आपसे तत्वचर्चा कर धर्मलाभ लेने आये हैं”

    जिज्ञासा और प्रयोग का नाम सुनकर पुराण जी भी कुछ समझ न पाए लेकिन विश्वगुरु की गर्वीली मुस्कान बिखेरते हुए बोले “अच्छा अच्छा … जिज्ञासा और प्रयोग … जानते हैं … खूब जानते हैं इन्हें … ये पहले भारत वर्ष में ही रहते थे, यहीं अपने सत्यनारायण महाराज के मंदिर के पीछे वाली गली में. हमने इन्हें अपनी गोद में खिलाया है” …

    विज्ञान बाबु ये सुनकर गदगद हो गये कि चलो परिचय का कोई तो सूत्र निकल आया, लेकिन वे इस चमत्कार को समझ न सके. वहीँ संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने अपने पिता के दुबारा चरण छुए और अपने चमत्कारी पिता पर गर्व से फूल बरसाए…

    क्रमशः…

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • जबरन पढ़ाने की परिपाटी

    जबरन पढ़ाने की परिपाटी

    Chaitanya Nagar

    दक्षिण अफ्रीका के टॉलस्टॉय फार्म में पढ़ने वाले बच्चों में से एक बहुत ही उपद्रवी और अनुशासनहीन था| मजबूर होकर महात्मा गांधी ने एक दिन उसे छडी से मारा| बाद में उन्होंने लिखा कि उस बच्चे को मारते वक़्त वह भीतर तक काँप गए थे| उन्होंने लिखा कि उन्हें तुरंत यह अहसास हुआ कि उन्होंने बच्चे को ‘ठीक’ करने के इरादे से नहीं, बल्कि अपने क्रोध को व्यक्त करने के लिए मारा था| गांधी जी लिखते हैं कि वह बच्चा ही मेरा शिक्षक बन गया क्योंकि उसने मुझे सिखाया कि मैं क्रोध करता हूँ| गांधी जी के इस वक्तव्य को किसी भी विचारक की शिक्षा संबंधी गंभीरतम अंतरदृष्टियों में से शामिल किया जा सकता है| यह पूरी बात गांधी जी की जीवनी लिखने वाले फ्रेंच लेखक लुई फिशर ने बताई है। शिक्षा के क्षेत्र में टॉलस्टॉय फार्म गाँधी जी का एक प्रयोग था. सजा अक्सर अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए दी जाती है, न बच्चे को पढ़ाने या सुधारने के लिए। इसकी जड़ में स्वार्थ-केन्द्रित भावना होती है।        

    परंपरागत शिक्षा का आधार हमेशा से सजा और ईनाम रहा है| घरों में और स्कूलों में भी इसी आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती रही है| खास तौर पर बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को| लम्बे समय से विद्यार्थियों को नियंत्रित करने के लिए धमकी, जोर-जबरदस्ती, शारीरिक दंड और लालच का इस्तेमाल किया जा रहा है, बिना यह जाने और सोचे कि उसका बच्चे के कोमल मन पर क्या प्रभाव पड़ता है और कैसे इन रास्तों को अपना कर हम एक अंततः एक भ्रष्ट और हिंसक समाज के निर्माण में जाने-अनजाने योगदान दे रहे हैं| जो बच्चा ईनाम के लालच में पढ़ेगा वह बड़ा होकर ईनाम के लालच में ही अपना काम भी करेगा और बुनियादी अर्थ में भ्रष्टाचार तो यही है| जो बच्चा भय के कारण पढ़ेगा उसका डर जीवन के कई क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से व्यक्त होगा। वह यह मान बैठेगा कि कुछ करने के लिए कुछ मिले. यह जरूरी है. जब वह सरकारी अधिकारी बनेगा तो वह इसी ईनाम की अपेक्षा करेगा. ‘कुछ हमें दो, अतिरिक्त कुछ, तभी हम ये काम करेंगे’। यही तो भ्रष्टाचार की मौलिक, स्थूल परिभाषा है।   

    डांटने-डपटने, सजा देने और सिखाने के बीच के फर्क को जानना जरूरी है। किसी खतरे के आने पर चीखना, डांटना, डपटना जरूरी भी है | पशु पक्षी भी खतरे में अपने बच्चों को आगाह करते हैं| बिजली के सॉकेट या आग के पास जाते इंसानी बच्चे को भी तेज आवाज़ में समझाना हिंसा नहीं है, न ही उसे वहां से जबरन हटाकर उसके रोने को बर्दाश्त करना क्रूरता है|

    बच्चे या विद्यार्थी को मार-पीट या डांट-धमका कर एक बार काबू में तो किया जा सकता है लेकिन इस प्रक्रिया में शिक्षा कहीं पीछे छूट जाती है| इसका दूसरा पहलू है कि अगर शिक्षक दंड न दे तो विद्यार्थी पूरी कक्षा में अव्यवस्था फैला देते हैं और पढ़ना-पढ़ाना ही मुश्किल हो जाता है| इसलिए इस समस्या को बड़ी बारीकी और धैर्य से समझना होगा|

    यह समझना आवश्यक है कि हम, शिक्षक और अभिभावक, भी बच्चे के साथ-साथ सीख सकते हैं और दोनों ही जीवन की गुत्थियाँ सुलझाते हुए आगे बढ़ सकते हैं| हम बड़े लोगों के पास कुछ ऐसा नहीं है जो बहुत ख़ास हो और उसे हमें बच्चे को सिखाने की जरूरत हो| स्कूल जाने के ठीक पहले की उम्र में जब किसी बच्चे को निहारें, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि ऐसा क्या है कि हम इसे सिखा देंगे? उसकी मासूमियत के सामने हमारा समूचा ज्ञान निरर्थक ही नहीं, खतरनाक भी है! क्या हम इस बात का विशेष ध्यान रख सकते हैं कि हमारे संस्कार, भय, आदतें और ढर्रे कहीं उस तक संप्रेषित न हो जाएँ| हमारे पास बस कुछ अधिक तकनीकी जानकारी, किसी ख़ास विषय संबंधी सूचनाएं हैं जो हमें उसे उपयुक्त तरीके से, समझदारी के साथ देते रहना चाहिए| पर ये जानकारियां हमें बच्चे से बेहतर नहीं बनातीं. शिक्षा छात्र और शिक्षक की साझा सहयात्रा है, जिसमे किसी विषय, जीविका और जीवन —सभी के बारे में साथ साथ सीखा जाना चाहिए| इस सीख की आवश्यकता शिक्षक को भी है और छात्र को भी.

    ज्यादातर शिक्षक पढ़ाने के तरीकों, विद्यार्थी के मनोविज्ञान और इस क्षेत्र में किए जा रहे शोधों के बारे में अनभिज्ञ होते हैं| जीवनयापन के साधन के तौर पर वह अध्यापन को चुन लेते हैं, पर उनमें शिक्षण की कम समझ होती है और अपने काम के लिए उत्कटता का भी अभाव होता है| देश में आमतौर पर व्याप्त शिक्षा प्रणाली पर भी नजर डाली जाए तो उसमें आज भी बाबा-आदम के ज़माने के तरीके ही आजमाए जा रहें हैं| पढाई के वही पुराने तरीके हैं, रटो और परीक्षा में उगल दो| बढ़िया उगल दिया तो अच्छे अंक मिलते हैं पर कितना सीखा, कितना जाना, कितना नया करने की प्रेरणा मिली इसका महत्व नहीं होता| कहीं सूचनाओं को रटना शिक्षा है तो कहीं शिक्षक की चापलूसी, जुगाड़ और नकल सबसे बड़ी शिक्षा है| यह कोशिश नहीं की जाती कि छात्र सही अर्थ में अपनी रूचि, अपनी प्रतिभा का पता कर सके.

    तथाकथित ‘समस्या से पीड़ित’ और ‘अनुशासनहीन’ बच्चों के साथ संवाद टूट जाता है और चूँकि वे ‘सुनते ही नहीं’ इसलिए उनके साथ संवाद नहीं बन पाता| ऐसे बच्चों से कई अध्यापकों को  संवाद स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए| ऐसे बच्चों को खेल में लगाना भी उपयोगी हो सकता है| योग और ध्यान की कुछ तकनीकें भी लाभदायक हो सकती हैं| ऐसे मामलों में घर-परिवार के सदस्यों से बात करना जरुरी है| यह भी जरुरी है कि कुछ समय के लिए उन पर पढ़ाई का दवाब कम करके उनको दूसरी गतिविधियों में लगाया जाए| जो बातें अध्यापकों पर लागू होती हैं, वही अभिभावकों और माता पिता पर भी लागू होती हैं.

    ये सारे उपाय सिर्फ संकेत भर हैं| वास्तविक काम तो खुद उस अध्यापक या अभिभावक खुद ही करना होगा जिसे इन बच्चों से स्नेह है और वह जानता है कि बच्चों के इस तरह के व्यवहार का कोई गहरा कारण है और इसलिए उनको पढ़ाने का भी एक ख़ास तरीका जरूरी है| जब एक ‘स्पेशल एजुकेटर’ आक्रामक मानसिक रूप से अक्षम बच्चों को पढ़ा सकता है तो फिर अपने को शिक्षक कहने वाला इतनी आसानी से हार मान कर मारने-पीटने पर क्यों उतारू हो जाता है| शारीरिक दंड की एक स्नेहपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में कोई जगह ही नहीं होनी चाहिए| यदि शारीरिक दंड जरुरी भी लगे, तो यह उनके लिए ही होना चाहिए जो इसके हिमायती हैं!

    Chaitanya Nagar


    Chaitanya Nagar

  • तथाकथित ईश्वर की सरंचना – ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह –Sanjay Jothe

    तथाकथित ईश्वर की सरंचना – ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह –Sanjay Jothe

    Sanjay Shramanjothe

    भारत की सँस्कृति में ‘उर्ध्वमूल अश्वत्थ’ की धारणा है, जो कहती है कि जगत परमात्मा का पतन है, इसलिए जागतिक ज्ञान भी ईश्वरीय ज्ञान का पतन है, ईश्वरीय ज्ञान सब कुछ है.

    अब ईश्वरीय ज्ञान इतना हवा हवाई और सब्जेक्टिव है कि उसे किसी भी दिशा में किसी भी तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. इतिहास बताता है कि धर्म-धूर्तों ने उसे कैसे इस्तेमाल किया है. उनके पास एक कर्मकांड या यहाँ तक कि एक मन्त्र पढ़कर भी इस ईश्वरीय ज्ञान को घोटकर पी जाने के उपाय हैं. वहीं वे धूर्त ये भी कहते हैं कि ये तो जन्मो जन्मों की साधना से मिलता है.

    जन्मों जन्मों के पुरुषार्थ के परिणाम में ये ज्ञान मिलता है तो लोग इस बात से डर जायेंगे, लेकिन उनके पास ईश्वरीय ज्ञान का क्रेश-कोर्स भी है. चार पुडिया खाकर भी आप परम स्वास्थय का लाभ ले सकते हैं. सिर्फ एक मन्त्र, एक दीक्षा एक कान फुन्कवाई या तीसरे नेत्र पर एक छूवन और आप इश्वरी ज्ञान के महल में अंदर!

    तब असल खेल शुरू होता है. अगर ईश्वरीय ज्ञान चुटकी बजाते मिल सकता है तो ‘नीच’ जागतिक ज्ञान की किसे और क्यों जरूरत है? वे ईश्वरीय ज्ञान का ढोल बजाकर लौकिक या भौतिक जगत के ज्ञान को दुत्कारते रहे हैं. ये एक भयानक पैरालिसिस है भारतीय मन का, इसने भारत मे सभ्यता के विकास को रोक रखा है.

    प्राचीन यूरोप में भी यही बीमारी थी, ज्ञान का फल चखना हव्वा और आदम का सबसे बड़ा अपराध माना गया है. लेकिन बाद में उस फल की फसल बोना, काटना और उसका अचार मुरब्बा जेली इत्यादि बनाना उन्होंने ठीक से सीख लिया और जिस इश्वर ने उन्हें अदन के बगीचे से निकाला था उसी इश्वर को उन्होंने अब अपने इंसानी बगीचे से धक्के देकर बाहर निकाल दिया है. नतीजा सामने है. अब ईश्वरीय ज्ञान के ठेकेदार जागतिक और भौतिक ज्ञान में अपने लिए समर्थन खोजते फिरते हैं.

    भारत में भी बाबाजी लोग क्वांटम फिजिक्स बखानते रहते हैं. वेद वेदान्त में घुसने से ठीक पहले क्वांटम फिजिक्स उनका अनिवार्य पड़ाव है. उन्हें पता है कि अब भौतिकशास्त्र इस स्तर पर आ गया है कि जगत और जीवन की उत्पत्ति सहित परम निर्वात पर भी बहुत ठोस जानकारी दे पा रहा है. वे इसी जानकारी का पूरा इस्तेमाल अपनी जहरीली इबारत लिखने में करते हैं. और आधुनिक विज्ञान जहां बात खत्म करता है या जिन प्रश्नों को भविष्य के लिए छोड़ देता है उन्ही प्रश्नों को आधार बनाते हुए हमारे जगतगुरु लोग भौतिक ज्ञान को ब्रह्म ज्ञान से जोड़ देते हैं. पश्चिम के वैज्ञानिक ही नहीं पूरा पश्चिमी समाज इन पर हंसता है लेकिन इन्हें ज़रा शर्म नहीं आती.

    यूरोप के विपरीत भारत में इश्वर लगातार मजबूत हो रहा है. पूरब पश्चिम को एक करने की बात करने वाले अरबिंदो घोष से लेकर जोरबा दी बुद्धा की अजीब बहस चलाने वाले ओशो रजनीश और उनके बाद न जाने कहाँ कहाँ के सद्गुरु और विश्वगुरु अभी भी बहुत प्रभावशाली बने हुए हैं. इसका सीधा परिणाम भारत की शिक्षा व्यवस्था ही नहीं बल्कि शिक्षा और ज्ञान की मूलभूत अवधारणा के पतन में ही साफ़ नजर आता है.

    भारत के उपनिषद् ही नहीं बल्कि धार्मिक कानून (धर्मशास्त्र और स्मृतियाँ) ब्रह्म और ब्रह्मज्ञान की इस व्यर्थ की बहस से भरे पड़े हैं. उपनिषद् काल में एक ही ढंग का आदमी हुआ है जिसने इस पूरी परम्परा को कड़ी टक्कर दी थी.

    छान्दोग्य उपनिषद् के उद्दालक ने कार्य कारण और जीवंत प्रेक्षण के आधार पर जगत और जागतिक प्रक्रियाओं की व्याख्या का पहला वैज्ञानिक प्रयास किया था, जिसे पोंगा पुराण रचने वालों ने बर्बाद कर दिया. भारतीय दार्शनिक साहित्य में उस समय में और उसके बाद भी उद्दालक और याज्ञवल्क्य का आपसी विरोध बहुत महत्वपूर्ण है.

    उद्दालक ने हवा हवाई ज्ञान के खिलाफ कार्य कारण आधारित ज्ञान का पक्ष लिया था. लेकिन बाद के वर्षों में उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु के एक संवाद को इस तरह से रचा गया की उद्दालक के मुंह से ही ईश्वरीय ज्ञान की महिमा बुलवा ली गयी. यह कबीर के मुह से रामानन्द बुलवाने जैसी चाल है. ये कथा रची गयी की श्वेतकेतु जब गुरुकुल से घर लौटता है तो उसका पिता उद्दालक उसे ब्रह्मज्ञान सीखने को प्रेरित करता है. इस कथा को ओशो रजनीश ने बड़ी कुशलता से इस्तेमाल करते हुए हवा हवाई ब्रह्मज्ञान की महिमा को फिर से स्थापित किया है.

    यही उद्दालक, आधुनिक भारत के महान दार्शनिक देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय की नजरों में भारतीय भौतिकवाद के आदि पुरुष बन जाते हैं.और इन्ही को ओशो रजनीश जैसे पोंगा पंडित ब्रह्मज्ञानी बना डालते हैं. देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय ज्ञान के जिस फल की पूरी फसल को संरक्षित करके भारत के गरीबों में बाँट देना चाहते हैं उसे ओशो रजनीश जैसे लोग फिर से ईश्वरीय लोक के अदृश्य समन्दर में फेंक आते हैं.

    अभी भारत में शिक्षा ही नहीं बल्कि ज्ञान मात्र का जो तिरस्कार हो रहा है उसे समझना इतना आसान नहीं है. आपको ये समझने के लिए याज्ञवल्क्य जैसे ब्राह्मणवाद के पुराने चैम्पियंस को और ओशो रजनीश जैसे नये ब्राह्मणवादी चैम्पियंस को भी ठीक से समझना होगा.

    ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का ये एक सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह है. ये जहरीली नदी अगर बहती रहती है तो भारत की शिक्षा व्यवस्था याज्ञवल्क्य और ओशो रजनीश के मानस पुत्रों द्वारा बार बार बर्बाद की जायेगी. जब तक इस ईश्वरीय ज्ञान की बकवास को बंद नहीं किया जाता तब तक भारत सभ्य नहीं हो सकेगा.

    भारत की शिक्षा की दुर्दशा स्वयं में बड़ा विषय है लेकिन ये खुद भी अपने आपमें कहीं बड़ी बीमारी का लक्षण भर है.

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • दूध को भी दूहने का खेल

    दूध को भी दूहने का खेल

    Kashyap Kishor Mishra

    “रोटी तेल नमक प्याज दाल दही घी” एक सामान्य भारतीय किसान की थाली इतने से पूरी हो जाती थी । पर सरकार बहादुर तो सरकार बहादुर ठहरी । रोटी का आटा ब्रान्डेड हुआ, सरसो तेल के खिलाफ सधे कदमों से चले व्यापारिक चालों नें कब रिफाइंड तेल को सरसो तेल का स्थानापन्न बना दिया पता न चला ।

    नमक के साथ आयोडीन का खेला हुआ और रूपये दो रुपये किलो का नमक पच्चीस पचास और सौ रुपये किलो तक बिक रहा है, जिसमें वैक्यूम पैक्ड तक के शब्द जाल शामिल हैं । प्याज का हाल यह कि किसान के खेत में बिकने को तरसती प्याज सड़कों पर फेंक दी जाती है और पहली बारिश के साथ उसकी गिनती कब मंहगी सब्जी में बदल जाती है पता नहीं चलता, पर इस खेल का खिलाड़ी किसान नहीं आढ़तिया होता है और किसान सिर्फ़ अपनी बदहाली रोता है । दाल तो पता नहीं कब से अमीरों की थाल की शोभा बन चुकी है । आखिर में बचे दही और घी जिसका जरिया दूध है ।

    हालांकि कारपोरेट स्पान्सर्ड हमारी सरकार बहादुर, चाहे वो बजाज और बिड़ला की पोषित कांग्रेसी सरकारें रहीं हों या अडाणी अम्बानी पोषित भाजपा सरकारें सबने दूध को पैक्ड और ब्रान्डेड करने की बड़ी कोशिश की पर बात बनी नहीं ।

    कारपोरेट घरानों की दूध के बाजार पर गहरी नजर रही पर ग्वालों से पोषित दूध वितरण प्रणाली में कारपोरेट जगत चाह कर भी अपनी अनुमान के मुताबिक मुनाफा नहीं बना पाया । हांलाकि इस मूल्क में दूध तक को दूह लेने के निराले खेल चलते रहे हैं, मसलन एक आम पैक्ड दूध का इस्तेमाल करने वाला भारतीय यह जानता ही नहीं कि जिस टोन्ड मिल्क का वो इस्तेमाल करता है वो शुद्ध रुप से एक भारतिय जुगाड़ है, यह विशुद्ध भारतिय जुगाड़ू दूध है, जिसमें भैंस का स्कीम्ड दूध, पाऊडर दूध, पानी और और भी बहुत कुछ मिला दूध बना दिया जाता है ।

    एक आम भारतीय जिसे पाश्चुरीकृत और टोन्ड दूध का फर्क नहीं पता, उसे नहीं पता कि होमोनाइज्ड और स्कीम्ड के मानी क्या है वो बस एक फर्क जानता है फुल क्रीम दूध मंहगा होता है क्योंकि उसमें क्रीम निकाला नहीं जाता और बाकी दूध सस्ते होते हैं क्योंकि उनसे क्रीम निकाल ली जाती है । हालांकि सत्य यह भी नहीं है । उसे टोन्ड और प्राकृतिक दूध के फर्क से भी शायद ही मतलब हो, पर बात इससे बन नहीं रही थी ।

    बाजार के खिलाड़ियों की दूध से कमाई की कोशिशों पर ग्वालों का दूध पानी फेर देता था लिहाजा सरकार बहादुर नें अबकी बार एक आजमाया और सफल तरीका अजमाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं जिसका नाम है “मिल्क फोर्टीफिकेशन” ।

    आदमी के भीतर के डर को बाजार में तब्दील करने का खेल पुराना है । नमक और आयोडीन नमक का फर्क और उससे की जा रही मुनाफाखोरी इसका सीधा उदाहरण है ठीक उसी तरह दूध में भी और पोषक तत्व जोड़ कर इसके बाजारीकरण का खेल “मिल्क फोर्टीफिकेशन” है ।

    इसे यूं समझें, एक रुपये किलो से कम कीमत पर मौजूद सामान्य नमक बेचना अपराध है लिहाज़ा उससे बीस पच्चीस गुना महंगी कीमत पर उपभोक्ता आयोडीन युक्त नमक खरीदता है ठीक वैसे ही सरकार बहादुर की चाल है कि दूध में कुछ पोषक तत्वों को मिलाकर बिना फोर्टिफाइड किए दूध न बेचा जाए ।

    दूध के इस फोर्टीफिकेशन की प्रक्रिया दूध को नमक की तरह पूरी तरह एक ब्रान्डेड उत्पाद में बदल देगी और गौ पालकों द्वारा दूध का बेचा जाना, चूँकि वह फोर्टिफाइड नहीं होगा, एक गैरकानूनी कृत्य होगा ।

    सरकार बहादुर बड़े व्यापारिक घरानों के सांठगांठ से बड़े सधे कदमों से भय का बाजार बनाने लगी है जो जल्दी ही आपके सामने होगा, पर एक जागरूक तबके में सरकार की मंशा भांप विरोध भी शुरू हो चुका है । एप्पल कारपोरेशन के पूर्व वैज्ञानिक और वैदिक ट्री फांउडेशन के अध्यक्ष अभिनव गोस्वामी सवाल खड़े करते हैं कि दूध अपने आप में एक सम्पूर्ण आहार है फिर इसे और फोर्टिफाइड करने की अनिवार्यता किसानों से उनके उत्पाद को छीनकर बाजार के हवाले कर देना है ।

    अनिवार्य फोर्टिफिकेशन के विरोधी मुखर हैं और वो सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करने लगे हैं पर बड़ा सवाल एक किसान और इस मुल्क के आम गृहस्थ का है कि क्या सरकारें सिर्फ और सिर्फ आम आदमी के निवाले को मंहगा और और मंहगा करते जाने के लिए ही हैं या बाजार से इतर एक किसान के हक को भी सोचती हैं ।

    Kashyap Kishor Mishra


    Kashyap Kishor Mishra

  • सच की रोशनी, झूठ के अँधेरे

    सच की रोशनी, झूठ के अँधेरे

    Kanupriya

    मृत्यु के साथ जुड़ी सबसे बड़ी बात ये होती है कि शव आपके सामने होता है, साक्षात सत्य की तरह, भ्रम की कोई गुंजाइश नही. सत्य के साथ सबसे बड़ी बात ये कि चाहे उसका स्वाद कैसा भी क्यो न हो वो स्वीकारा जा सकता है, उसे गले लगाकर जीवन मे पुनः लौटा जा सकता है. राम नाम सत्य है या नही पता नही, मगर सत्य एक बड़ी राहत होता है, झूठ और भ्रम में आप आशा निराशा के बीच झूलते रहते हैं, जूझते, लड़ते और पीड़ा में रहते हैं, ये सारी लड़ाई दरअसल सत्य के उद्घाटन के लिये है, फिर वो चाहे जैसा क्यो न बेहद शांति लेकर आता है.

    इन दिनों जाने क्यों वेन्या की बहुत याद आई, डॉक्टर्स ने साफ कह दिया था कोई उम्मीद नही मगर मैं एक उम्मीद के लिये लड़ती रही, वो 24 घण्टे में से 18 घण्टे मेरी गोद मे होती और मैं इंटरनेट पर स्टेम सेल से लेकर जाने किन किन तकनीकों से ब्रेन की रिकवरी के बारे में पागलो की तरह पढती रहती, मैंने उसके ब्रेन डैमेज का सच जानकर भी स्वीकार नही किया. क्या होता अगर मैं इंटरनेट बन्द करके उससे ढेर सारी एकतरफा बातें करती, उसे बेहद प्यार करती, क्या इंटरनेट पर उसके लिये समाधान ढूँढती माँ उसे कितना प्यार करती है वो कभी जान पाई?

    गहरी पीड़ाएँ, गहरी उदासी कभी कभी गहरे भ्रमों का द्योतक होती है. अफ्रीका में कपड़े के फुटबॉल से गन्दी झुग्गी में खेलते हुए बच्चो की खुशी और आनन्द का सिरा पकड़ने की कोशिश करती थी तो सोचती थी क्या हमारा समाज परम्परा से हमे भ्रमो में रहना सिखाता है? राम नाम सत्य कहने वाला समाज राम नाम पर कितना बड़ा भ्रम खड़ा करता है जो सिवा पीड़ा, तकलीफ और घृणा के कुछ पैदा नही करता, क्या सत्य कभी ये सबकुछ उतपन्न कर सकता है.

    जिनकी जिंदगियों की प्रत्यक्षतः वाट लगी होती है उनके भीतर जीवन का वो कौनसा स्रोत होता है जो उनके चेहरे पर खुशी बनकर चमकता है, क्या वो बिना बड़े बड़े ज्ञानोपदेश पढ़े सत्य को स्वीकारने और गले लगाने जैसी सबसे कठिन साधना सरलता से अनजाने में साध चुके होते हैं?

    हमारा समाज जाने कितने असत्यों का निर्माण करता है, जिंदगी जाने कितने भ्रम बुनती है, हमे परम्पराओ के टूटने से डर लगता है, धर्म की अवधारणा के खण्डित होने से डर लगता है, जाति का नियम टूटने से डर लगता है, हम व्यक्तिगत जीवन के भ्रमो के टूटने से डरते रहते हैं, और इस तरह एक समाज के तौर पर और व्यक्ति के तौर पर मानो किसी प्रेत योनि की तरह हम अनन्त जूझन, अंतहीन पीड़ाओं और व्यर्थ संघर्षों से गुजरते एक भ्रम से दूसरे भ्रम के बीच भटकते रहते हैं और राहत नही मिलती. हम अपने बनाये असत्यों के खण्डित होने और सत्य से जुड़ी पीड़ा से इतना डरते हैं कि उसके द्वार को खोलना स्थगित करते रहते है.

    मृत्यु के बाद जीवन की अवधारणा सम्भवतः अनन्त पीड़ा के बाद पैदा हुए शिशु के सुंदर मुख की तरह है, जिसके बाद सारी पीड़ा भूल जाती है और उस प्रेम, सुख और शांति के लिए ज़रूरी है कि हम मृत्यु से, व्याप्त अवधारणाओं के खंडन से, सत्य का द्वार खोलने से डरे नही. भय से बड़ा सम्भवतः हमारा शत्रु कोई नही.

    नोट: यह पोस्ट मृत्य से उपजी है मगर इस पोस्ट का अटल बिहारी जी की मृत्यु से कोई सम्बन्ध नही, न इसे केरल के बाढ़पीड़ितों के प्रति किसी असम्वेदना का द्योतक समझा जाये.

    Kanupriya

    Kanupriya


  • मुल्ला तो औकात मा है!

    मुल्ला तो औकात मा है!

    Ajay Kabir

    खेतवा सारे बैल चरि गए,
    घरे न आवा अनाज।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा हैं।

    नोटबन्दी मा छुटि नौकरी,
    पेट मा परि गा लात।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा है।

    ई टैक्स, उ टैक्स, जीएस टैक्स,
    दुकान मा परि गा ताला।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा हैं।

    शिक्षामित्र भये कंगाल,
    खाई न जा रही है दाल।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा है।

    पढ़ाई भई इतना महंगी,
    कि गई हाथ से छूट।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा है।

    नही चुका पाइन जो ब्याज,
    बप्पा खाय लिहिन सल्फास।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा हैं।

    चहुँ ओर हो रहा विकास,
    आखिर मुल्ला तो औकात मा हैं।

    Ajay Kabir

  • गाय कटने से बाढ़ नहीं आती अंधभक्तों !

    गाय कटने से बाढ़ नहीं आती अंधभक्तों !

    Bhanwar Meghwanshi

    कुछ लोग केरल आपदा को गाय से जोड़ रहे है तो कुछ सबरीमाला मन्दिर में स्त्री प्रवेश से ।

    दोनो ही तरह के बंदबुद्धि भक्तों को यह समझना पड़ेगा कि ऐसी अवैज्ञानिक और मूर्खतापूर्ण बातें सिर्फ जबानी जुमलेबाजी करने तक ही ठीक हो सकती है ,वरना तर्क की कसौटी पर तो यह कतई खरी नहीं उतरती है ।

    इस भक्त प्रजाति को कहना चाहता हूं कि गायें सिर्फ केरल में ही नही कटती ,गोवा ,बंगाल और पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यो सहित विश्व भर के सैंकड़ों देशों में गौकशी होती है । वहां पर अभी सब कुछ सामान्य है ।

    जिन्हें लगता है कि यह सबरीमाला मन्दिर की वजह से हुआ है, उनको भी अपने मस्तिष्क को खोलना होगा कि दुनियाभर के तमाम मंदिरों व अन्य धर्मस्थलों में स्त्रियां प्रविष्ट होती है, वहां कोई दिक्कत नहीं है।

    केरल की बाढ़ अत्यधिक बारिश की वजह से है ,यह कुदरत का निजाम है, इसकी चपेट में आस्तिक नास्तिक सब है ,जो गाय को पूजते है वो भी डूब रहे है और जो गाय खाते हैं वो भी, जो मन्दिर जाते है वह भी मर रहे है और जो ईश्वर में यकीन नहीं रखते है वो भी, जो पानी के कहर से बचे हुये है, वो सभी आराम से जिंदा है।

    बाढ़ के वैज्ञानिक कारण है, यह गौहत्या अथवा सबरीमाला से जुड़ा हुआ मामला नहीं है, यह समय केरल के मुसीबतजदा भारतीयों की मदद करने का है, गाय और सबरीमाला के नाम पर मूर्खतापूर्ण बातें करने का नहीं है।

    यह बाढ़ केरल के हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, आस्तिक, नास्तिक, कम्युनिष्ट, कांग्रेसी, भाजपाई सबको लील रहा है, बिना विचारधारा का फरक किये, बिना धर्म, जाति पूछे। इसलिए अगर कुछ कर सके तो कीजिये, नहीं कर सकते है तो चुप रहिये, मगर ऐसी बेहूदी बातें मत कीजिये। यह वक़्त केरल के साथ खड़े होकर सच्चे भारतीय होने का फर्ज अदा करने का है, अपनी मूर्खता दिखाने का नहीं।

    Bhanwar Meghwanshi


    Bhanwar Meghwanshi

  • स्पेस

    स्पेस

    Dhiraj Kumar

    वहाँ कुछ भी नही होना था
    ऐसा कुछ मानना भी था
    और वहाँ कुछ था भी नही
    ऐसा मान भी लिया गया

    वहाँ मगर बहुत कुछ था
    इतना ज्यादा कि 
    पृथ्वी जैसी चीज का निशान ढूंढना
    नामुमकिन !

    वहाँ स्पेस था,टाइम था 
    डार्क मैटर था ,डार्क एनर्जी था ….
    और भी न जाने क्या क्या था ….

    तज्जुब कि….
    जो स्पेस-टाइम का 
    चार विमाओं वाला फेब्रिक 
    निरंतर फैल रहा था ……

    और तो और…..
    यह जो स्पेस-टाइम से बुना हुआ
    जो फैब्रिक था 
    उसमे ब्लैक होलों के टक्कर से
    या जुड़वा न्यूट्रॉन तारों के
    परस्पर घूर्णन से
    तरंग भी उठता था 
    बिल्कुल तलाब मे डाले गये 
    कंकड़ से उठने वाले तरंग की तरह

    वहाँ ….
    पहले भी बहुत कुछ था
    अब भी बहुत कुछ हो रहा है…..

    किसी द्वारा कुछ मानने या
    न मानने से क्या फर्क पड़ता है !
    वहाँ अभी भी बहुत कुछ होना है 

    Dhiraj Kumar

  • एक कॉल गर्ल का इंटरव्यू

    एक कॉल गर्ल का इंटरव्यू

    Sanjiv Kumar Sharma

    (सिगरेट, शराब या असुरक्षित सेक्स प्राणघाती भी हो सकता है)

    जहां इंटरव्यू होना था वह एक आलीशान कमरा था। फर्श पर बेहतरीन कार्पेट, दीवारों पर नायाब पेटिंग्स, छत पर टंगा भव्य झाड़फानूस और अनेक खूबसूरत लाइटें; साथ में भव्य सोफे और देवदार की कांच लगी नक्काशीदार दर्शनीय मेज। दीवार पर बनी लकड़ी की अल्मारियों में किताबें, शोपीस और खूबसूरत मूर्तियां।

    जब अनीता जी इंटरव्यू के लिए आकर बैठी तो लगा कोई महारानी बैठी है। मैरून रंग की बेशकीमती सिल्क की साड़ी, मैचिंग स्लीवलेस ब्लाउज, गले में छोटा सा लेकिन रत्नजडि़त हार और एक हाथ में राडो की घड़ी तो दूसरे हाथ में सिर्फ एक हीरे का कंगन। तीखे नाक-नक्श और संतुलित मेकअप, करीने से कटे कंधों पर बिखरे घने बाल, व्यायाम से साधा हुआ सुगठित शरीर और साथ में इतनी गहरी मुस्कान कि पता लगाना मुश्किल, बनावटी है या असली।

    देखिए जरा समय के पाबंद रहिए और समय से अपना इंटरव्यू खत्म कीजिए। मैं समय की भारतीय अवधारणा में विश्वास नहीं रखती, मेरे लिए एक-एक मिनट कीमती है। – अनीता जी ने घड़ी देखते हुए कहा। मुस्कराहट के साथ स्वर में ऐसी सख्ती दुर्लभ होती है।

    मैंने पैड संभाला और मोबाइल का रेकॉर्डर चालू करके मेज पर रख दिया। मेज पर रखा कॉफी का कप उठा कर एक सिप लिया और पहला सवाल पूछा।

    जी बिलकुल! तो मेरा पहला सवाल है कि आप इस प्रोफेशन में कैसे आयीं?

    देखिए मेरा इस प्रोफेशन में आना कोई बड़ी घटना नहीं है। जब दुनिया मुद्रा, आई मीन करेंसी, के चारों ओर घूम रही है तो हर इंसान की ये मजबूरी है कि वह कोई ऐसा काम करे जिसके बदले में उसे पैसे मिलें वर्ना वो चाहे आईन्स्टीन हो या मोजार्ट उसे धकिया कर हाशिए पर फैंक दिया जाएगा। मुद्रा एक प्रतीक थी, सुविधा के लिए बनायी गयी थी। लेकिन प्रतीक की जगह वह खुद ही सब कुछ बन बैठी, जैसे आप अपने पिता की मूर्ति बना लें और उसे ही अपने बाप समझें। और पैसे मिलने का एक ही तरीका है कि हम अपना कुछ बेचें। जब हम बाजार में बेचने निकलते हैं तो ज्यादातर दुकानें कबाडि़यों की नजर आती है जो ’क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘रंगीली रातों’ को एक ही भाव खरीदते हैं। ऐसे में फिर आपके पास यही रास्ता बचता है कि आप धूर्त हो जाएं और वो बेचें जो आपके पास है ही नहीं या किसी और का छीनें। इसलिए मुझे लगा अपना जमीर बेचने से अच्छा है कि हम अपना जिस्म बेचें। कम से कम अपने खुद के सामने तो नजर उठा कर बात कर सकेंगे। मैंने इस प्रोफेशन में आने का डिसीजन लिया और मुझे इस पर गर्व है।

    आपको गर्व है?? आपको किसी तरह का शर्म का अहसास नहीं होता?

    क्या बकवास कर रहे हैं आप? इसमें शर्म की क्या बात है? शर्म की बात तो तब होती जब मैं किसी सरकारी नौकरी में जाकर देश की बर्बादी में हाथ बंटाती या लुटेरे कारपोरेट के समूह में शामिल हो जाती। मल्टी नैशनल कंपनी में अपना दिमाग बेचकर जिंदगी होम करने वाले हाइली पेड बंधुआ मजदूरों से मैं लाख गुना बेहतर हूं। अपनी मर्जी से काम करती हूं, अपनी शर्तों पर काम करती हूं। किसी को धोखा नहीं देती। मैं एक एन्ट्रप्रेन्योर हूं, इसमें शर्म की नहीं गर्व की बात है। कानूनी काम करती हूं और पूरा टैक्स भरती हूं।

    कानूनी?

    जी हां कानूनी! अगर आपकों कानूनों की जानकारी नहीं है तो पहले थोड़ा पढ़ कर आएं फिर इस पर बात करेंगे।

    अच्छा ये बताइए आपकी धर्म और ईश्वर के बारे में क्या धारणा है? आप किसे मानती हैं?

    निहायत वाफियात सवाल है। इससे बेहतर सवाल होता कि आप ये पूछते कि मैं कौन-सा सेनेटरी नैपकिन या किस कंपनी की हेयर रिमूविंग क्रीम इस्तेमाल करती हूं। देखिए, धर्म एक नितांत व्यक्तिगत चीज है और उसका कोई छोटे-से-छोटा भाग भी प्रकट हो रहा है तो वह अश्लीलता है।

    आपने कभी शादी, परिवार के बारे में सोचा है?

    जी हां कई बार सोचा है लेकिन हर बार मन नकारात्मक भावों से भर गया है। देखिए जिस ढंग से हमारे यहां शादियां होती हैं वो बड़ा घिनौना है। जाति, धर्म, लालच और अन्याय उसमें इस तरह भरा है कि किसी जागरुक व्यक्ति के लिए शादी करना आसान नहीं है। सामाजिक मान्यता प्राप्त और थोड़ी-बहुत सामाजिक सुरक्षा और पेंशन वगैरह की सुविधा प्राप्त वेश्याओं को पत्नी कहा जाता है। लेकिन उनके पास कॉल गर्ल्स जैसे अधिकार नहीं होते। रही परिवार की बात, तो मेरा परिवार बहुत बड़ा है और उसमें ज्यादातर सदस्य जैनेटिक रूप से नहीं जुड़े हैं। जैनेटिक परिवार तो मजबूरी और स्वार्थ की डोर से बंधे होते हैं।

    देश के हालात पर आपकी राय?

    देखिए इस सवाल की इतनी बेइज्जती हो चुकी है कि मैं इसका जवाब नहीं देना चाहूंगी। हर आदमी चाहे वो कितना ही जाहिल और निकम्मा क्यों न हो इस सवाल का जवाब एक्सपर्ट की तरह देता है।

    समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में कुछ कहना चाहेंगी आप?

    हमारे समाज के ऊपर दो सबसे बड़े घाव हैं – मौत और सेक्स। इन्हीं दो से भागता है और इन्हीं दोनों के फोबिया और मेनिया के बीच पेंडुलम की तरह झूलता रहता है। पूरी जिंदगी इन दो पाटों के बीच पिस कर रह गयी है। शायद इसे ही कबीर ने ‘दुई पाटन के बीच साझा बचा न कोय’ कहा है| जो इलाज किए गए वो बीमारी से भी ज्यादा खतरनाक निकले। लोगों को नियंत्रित करने के लिए धर्म ने सेक्स का सहारा लिया और खाने, पीने, सोने जैसी साधारण और सहज चीज को टैबू करके उसे असाधारण ताकत दे दी और ‘फ्रैंकस्टीन’ बना दिया। नतीजा ये हुआ कि हमारी गालियों से लेकर विज्ञापनों या फिल्मों तक, मंदिरों से लेकर घरों तक हर चीज सेक्स से सन गयी। कभी आपने चूहों के स्ट्रिप शोज़ देखें हैं? हमारी पूरी पीढ़ी ही इन्टरनेट के सामने बैठ गयी दूसरों को सेक्स करता हुआ देखने के लिए। उससे भी तृप्ति नहीं मिली तो आज वीभत्स से वीभत्स तरीके खोज रही है सेक्स के। इन्टरनेट के लिए सैक्स कर रही है! मौत के लिए तो मैं कुछ नहीं कर सकती लेकिन सेक्स को लेकर बने इस कैंसर के लिए मैं कुछ सकारात्मक करने की कोशिश करती हूं। एक हीलर की तरह काम करती हूं। कई लोगों को मैंने ठीक किया है। सीनियर सिटीजन्स और डिफरेन्टली एबल्ड लोगों के साथ भी मैंने कई बार बिना किसी फीस के काम किया है।

    बलात्कार के मामलों पर आपका क्या कहना है?

    ये सवाल भी अपनी गरिमा खो चुका है। सब के सब या तो बलात्कार कर रहे हैं या बलात्कार पर अपनी राय दे रहे हैं। एक बीमार समाज का सबसे खास लक्षण बलात्कार होता है। जब बीमारी है तो लक्षण भी रहेंगे। फिलहाल बीमारी को दूर करने की मंशा मुझे तो कहीं दिखती नहीं।

    अच्छा इंटरव्यू के लिए आपका धन्यवाद। मेरा किसी से अपायंटमेंट है, मुझे अब जाना होगा। आप कॉफी और लेंगे? – अनीता जी अचानक घड़ी देखते हुए बोलीं।

    नहीं कॉफी तो नहीं! लेकिन मैडम कुछ सवाल रह गए हैं।

    कोई बात नहीं! उन्हें अगली बार के लिए रखिए। नमस्ते। हैव अ नाइस डे।

    Sanjiv Kumar Sharma

    Editor, Ground Report India

    An author, thinker, translator and a travel-enthusiastic visited almost all states of India in his wheelchair. He had polio paralysis of both the lower limbs at an early age and could not get into the formal system of education, ie schooling. On his own, he started with formal mainstream education at home, and appeared in few exams privately but soon realised about the inadequacy of traditional approach to education and started self-study in his way.

    Sanjiv stayed in a room for more than 12 years and spent time in reading books, writing, translating and contemplating on vital issues of human life, society and religion. He has studied literature, philosophy, science, religion and psychology. He started writing during adolescent and continues to write till the date. He has written many articles, poems and stories which got published in various newspapers and magazines. With the area of social media, he also has turned into a prolific writer on the internet.

  • समय

    समय

    Mukesh Kumar Sinha

    1.
    मिट्टी हो रहे 
    हैं समय के साथ 
    भूल जाना तो नियति है
    पर याद रखना, 
    अंकुर फूटेंगे फिर कभी

    बस मन को नम रखना
    ताकि सहेजे पल, 
    खिलखिला पड़े, 
    तुम्हारे होंठो पर !!

    2.
    प्रेमसिक्त ललछौं भोर से 
    डूबते गुलाबी सूरज तक का 
    बीता हुआ समय

    पाँव भारी कर गया उन्मुक्त जवां दिलों को 
    कि अब रिश्ता उम्मीद से है !

    3.
    दस्तक समय की 
    बताने को आतुर, कि
    चूक चुके हो तुम

    याद रखना 
    नहीं होता कोई अपना!

    4.
    जिंदगी की धूप छाँव में
    कुछ तो हरियाली होगी ही

    बहती जा रही समय की 
    इस नदी में
    प्रेम के कुछ द्वीप तो होंगे ही

    5.
    हथेली पर पगडंडी सी रेखाएँ 
    और घड़ी की सुइयां
    बदस्तूर 
    बढ़ते हुए बता रही हैं

    बदलते समय के साथ, 
    बदलेगी जिंदगी
    उम्मीद बनाये निहार रहा हूँ ।

    6
    समय, 
    तेरी लकीरें 
    क्यों खारिज कर देती है 
    मुझे हरबार!

    Mukesh Kumar Sinha