कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

Gourang

अक्सर ऐसा ही होता है। लुढ़कते, झनझनाते पसिंजर ट्रेन जब सियालदह स्टेशन पर रुकती है, घड़ी तारीख के आखरी पड़ाव पर होने की संकेत देती है। मैंने भी आदत के जब्त में आ कलाई की घड़ी देखी। उम्मीद के अनुसार घड़ी ने रात के साढ़े ग्यारह के सुई दिखाये। बैक पैक पीठ में डाल मैं प्लैटफ़ार्म से बाहर निकलने के जुगत बनाने लगा। अजीब स्टेशन है, इस वक्त भी भीड़ बेशुमार है। लोग जगह बनाते हुए तेजी से गुजर रहे हैं। एक उम्र दराज औरत मुझसे तेज निकलकर आगे चली गई। जाते जाते बड़बड़ाई - 'स्टेशन कोई टुरिस्ट प्लेस नहीं कि आराम से चलो, लोग समझते नहीं।' इससे पहले कि मैं समझता यह डायलॉग किसके लिए गिफ्ट है, एक चालीस के करीब औरत ने ट्राली बैग से मुझे धक्का दिया। मैं गिरते गिरते बचा। वो बड़बड़ाई - 'लगता है मैं स्टेशन में चलने का कोचिंग सेंटर खोल दूँ, खूब चलेगा।' मैं अभी इस सदमें गोता खा ही रहा था कि टिकट कलेक्टर ने मुझे टोक दिया - "ए जरा टिकट दिखाईये।" 
मैं और हड़बड़ाया। चालीस के करीब औरत ने फिर कहा - "टिकट बाबू, जरा ठीक से टाइट करियेगा, बहुत स्मार्ट बन रहा है।" 
टिकट कलेक्टर मुझ पर और ज़ोर देकर देखा और बोला - 'निकालो, निकालो।' 
मैं हकलाया फिर बोला - "मैं तो धन्य हो गया, इतने दिनों में पहली बार किसी ने टिकट देखने की मर्जी दिखाई।"
वो बोला - "साईड में आओ।" 
मैं उसके साथ किनारे पर आ गया। फिर मोबाइल निकालकर एम-टिकट दिखाया। वह चिढ़ गया और बोला - "टिकट है तो इतना नाटक क्यों किया?" 
"कितना नाटक?" मैंने मजा लेते हुए कहा। 
वह घूर कर मुझे देखा। मैंने उसकी परवाह न करते हुए बोला - "उस लड़की के पास टिकट नहीं थी, तुम गलत चुनाव कर बैठे।" फिर मैं लंबे डग भरते निकल आया। मुझे खूब अंदाजा था कि मेरे पीठ पीछे टिकट कलेक्टर के आँखों से अंगार निकल रहे होंगे।

स्टेशन के बाहर आकर मैंने प्री पैड टैक्सी के काउंटर पर लाईन लगाई। पर कोई भी टैक्सी मौजूद नहीं थी। काउंटर बॉय बोला - "इंतजार करिए।" 
मैंने आसमान की ओर देखा। बादलों ने तारों को छुपा लिया था। टैक्सी के न मिलने की वजह समझ आई। एक तो रात फिर बारिश के अंदेशे ने शहर को थमा दिया था। 
कुछ सोचने के बाद मैंने मोबाइल निकाला, उबेर पर लोकेशन टाइप कर रिक्वेस्ट डाल दिया। आस पास कोई भी टैक्सी न दिखी ऐप्प में। समय कोई बीस मिनट। खैर, वही सही। मैंने कन्फ़र्म कर दिया। कोई आठ मिनट में सुमन नाम दिख गया, टैक्सी नंबर भी उभर आया। मैंने कॉल नंबर ढूंढ कॉल कर दिया। रिंग होता रहा पर उधर से उठाया नहीं। ऐसा ही होता है, शहर को अभी न्यूयार्क होने में बरसों देरी है। फिर मैंने आसमान की ओर देखा, बिजली चमकने शुरू हो गए थे। भीड़ बारिश देख स्टेशन कॉम्प्लेक्स पर ही ठहर गई थी। अभी मैं दुबारा रिंग करने ही वाला था कि बूँदा बाँदी शुरू हो गई। फिर बादल भी गरजने लगे। कुछ देर मैं ठिठका। अभी वापस स्टेशन कॉम्प्लेक्स में लौट जाऊँ कि नहीं सोच ही रहा था, ठीक तभी टैक्सी वाले ने कॉल बैक किया। क्या आश्चर्य !! यह तो पहली बार हुआ। मैंने कॉल रिसीव किया और कड़कते हुए पूछा - "कहाँ पर हैं?" इनसे कड़क व्यवहार ही काम आता है। 
उधर से एक घरघराती सी आवाज आई - "ऐप्प आपसे दस मिनट की दूरी दिखा रहा है। उधर बारिश शुरू हो गई?" आवाज कुछ पतली सी थी। बारिश की आवाज में सुनने में तकलीफ हो रही थी। 
मैंने रूखा सा जवाब दिया - "हाँ। मैं इधर शेड पर खड़ा हूँ।" मैं शेड की ओर बढ़ता हुआ बोला। 
उधर से फिर आवाज आई - "दस मिनट।" और कॉल कट गई। 
बारिश ज़ोरों से शुरू हो गई थी। इंतजार के अलावा और कुछ बचा न था। मैं मोबाइल पर मेसेज स्क्रोल करता हुआ वक्त काटने लगा। कुछ देर बाद एक टैक्सी थमने की आवाज आई। मैंने सर उठाया। नंबर वही था। किसी तरह दौड़कर बारिश में भींगते हुए मैं टैक्सी में बैठा। ड्राइवर ने कन्फ़र्म किया - "गौरांग? लोकेशन गड़िया? 
मैं चौंककर सर उठाया। अब पतली आवाज का रहस्य खुला। वो कोई तीस साल की औरत थी। मेरा मुँह खुला रह गया। मैं बस पूछा - "आप?"
"कोई तकलीफ?" आवाज आई। 
मैं संभला और बोला - "नहीं।" चलिये।" अब मेरी आवाज नरम और मीठी थी। 
मैंने बैक मिरर पर नजर डाली। वो भी मुझे ही देख रही थी। अच्छी सूरत थी। पर सूखी सी थी। शायद रात को खाया न हो, मैंने सोचा। मुझे याद आया, खाया तो मैं भी नहीं था।। मैंने गौर किया, बारिश में वो दक्षता से ड्राइव कर रही थी। मैं मुस्कुराया। वो नहीं मुस्कुराई। मुझे तकलीफ हुई। 
मैं धीरे से बोला - "सॉरी।" 
"किस बात का?" वो पूछी। 
"मेरी आवाज बहुत रूखी थी। दरअसल किसी और का गुस्सा आप पर निकल आया।" मैंने संजीदगी से कहा। अब वो मुस्कुराई। तभी गाड़ी रेड सिग्नल पर खड़ी हो गई।
"इतनी रात गए गाड़ी चलाते आपको........." 
उसने बात बीच में ही काट दिया - "लड़की हूँ, टैक्सी ड्राइवर हूँ, मर्दाना काम है। देर रात के झमेले हैं। अच्छे बुरे पसिंजर भी मिलते हैं। ऑड लोकेशन्स भी होते हैं। सब है। पर मेरा पेशा मेरा चुना हुआ है, चैलेंज है तो है। सबको बार बार जवाब देते देते थक जाती हूँ।" मैं हड़बड़ाया। मैं फिर मुस्कुराया। मगर वो फिर नहीं मुस्कुराई। 
सिग्नल हरा हो गया। उसने गियर बदला, ऐक्सिलेटर पर दबाव डाला। गाड़ी सड़क पर फिसलने लगी। खामोशी ने पाँव पसार दिये। 

कुछ दूर जाते ही मुझे दूर से वह डॉमिनो का काउंटर दिख गया। मुझे पता था, यह देर रात तक खुला रहता है। मैं चिल्लाया - रोको, रोको। गाड़ी बाएँ रोको।" 
वो हड़बड़ाते हुए कस कर ब्रेक मार गाडी साईड में खड़ी कर पूछी - "क्या हुआ?" 
मैं डॉमिनो की ओर इशारा कर बोला - "बस एक मिनट। बहुत भूख लगी है।" वो कुछ गुस्सा, कुछ निराशा भाव लिए देखी। मगर कुछ बोली नहीं। मैंने कार का दरवाजा खोलते हुए उसे देखा, वो अपने होठों पर जीभ फिरा रही थी। 
बारिश घट गई थी। बस कुछ बूँदा बाँदी ही चल रही थी। कोई दस मिनट में मैं लौटा। वो बहुत गुस्से में दिखी। इसके पहले कि कुछ कहती मैं उसे एक पैकेट और कोक के बोतल पकड़ाते हुये कहा - "बस दो मिनट ही लगेंगे। ये उन्होंने गर्म कर दिये हैं।" वो अब मुझे आश्चर्य से देखने लगी। 
मैं अब पूरे अधिकार से कहा - "जल्द खा लीजिये। लड़कियों को भी लड़कों की तरह ही भूख लगती है।" उसने अब थाम लिया। उसके चेहरे की शिकन अब मिट चुकी थी। मैं अंदर बैठ खाने लगा और उसे मिरर में देखा। वो संतोष से खाने लगी, आँखें पनियाई हुई थी। वो भी सचमुच बहुत भूखी थी।

कुछ देर बाद गाड़ी फिर चलने लगी। मैं बाहर रात के शहर को देखने लगा। अधिकतर दुकानें बंद ही थी। बत्तियों से रोशन सड़कें, बड़े बड़े होर्डिंग्स सब तेजी से गुजरने लगे। अचानक मैंने महसूस किया, वो मुझे मिरर से देख रही थी। मैंने उसे देखा। वो मुस्कुराई। मैं मुस्कुराया। फिर मैं रात के शहर को देखने लगा। कुछ देर बाद मेरा डेस्टिनेशन आ जाएगा। 

यूँ ही सोचते सोचते ओवर ब्रीज क्रॉस हो गया। अचानक मैंने देखा वो मुझे फिर मिरर से देख रही थी। मैंने भी उसे फिर मिरर में देखा। मैं मुस्कुराया। वो झेंप कर मुस्कुराई जैसे चोरी पकड़ी गई हो। मैं भी मुस्कुराया। अब हम दोनों मुस्कुराते हुए मिरर में ही देखने लगे। वो कभी सड़क तो कभी मिरर पर देख रही थी। दोनों मुस्कुरा रहे थे।
कुछ देर बाद अचानक गाड़ी रुक गई। मैंने मिरर में सवालिया निगाहों से देखा। वो हँसी और बोली - "कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं।" 
मैंने देखा, मेरा डेस्टिनेशन आ चुका था। टैक्सी से निकल उसके पैसे चुकाए। फिर उसकी आँखों में झाँक उसे कहा - "थैंक्यू।" वो भी मेरी नजरों से नजर मिलाई और सर हिलाई। 
मैं घूमकर अपने कैंपस की ओर जाने लगा। कुछ दूर जा अचानक मुझे सुनाई दिया - "सुनिए!" 
मैं सुन घूम खड़ा हुआ। वो पूछी - "आपकी शादी हो गई है?"
मैं मुस्कुराया और हाँ में सर हिलाया। थोड़ी देर मुझे देखने के बाद वो भी मुस्कुराई और सर हिलाई। मैं खड़ा रहा।

टैक्सी स्टार्ट हुई और तेजी से निकल गई।

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