Category: पुरस्कृत रचनाएं

  • जाणे मेरा जीवड़ा — Vijendra Diwach

    जाणे मेरा जीवड़ा — Vijendra Diwach

    Vijendra Diwach

    मैं बेटी
    इस धरती पर आई,
    मेरी मां मुझे इस संसार में लेकर आई,
    लेकिन मेरी मां नारी होकर भी मुझे नहीं समझ पायी,
    मेरे लड़की रूप में पैदा होने पर
    नारी ने ही रो-रोकर आंखें सुजाई।

    कहते हो मिश्र की सभ्यता में नारी का सम्मान था,
    राजा की कुर्सी के उत्तराधिकार पर बेटी का हक था,
    लेकिन बताओ
    भाई की बहन से शादी,
    यहां यह कौनसा मेल था?
    यह तो सब पुरुषों का
    बहन के हाथों से सत्ता पाने का खेल था,
    कहते हैं मैं पहले आदमी द्वारा पूजी जाती थी,
    लेकिन इस आदमी ने कैसे मुझे पूजा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    रामराज्य के राम ने मुझे
    सीता के रूप में अपवित्र कहकर वन में भेजा,
    तथाकथित महान विद्वानों की सभा में
    मुझे द्रोपदी के रूप में लूटा।
    सबने देखा
    धृतराष्ट्र की अंधी जैसी आंखो ने भी देखा,
    दोनों ही जगह पर
    मेरा ही दमन करने की साजिशें रची गयी,
    लेकिन अपने को बड़े-बड़े गुरु-धर्मगुरु
    और महान कहने वालों की जुबान ना खुली,
    क्योंकि सबको सत्ता के साथ सुख भोगना था,
    मुझे किस-किस कृष्ण के आगे हाथ फैलाना पड़ा,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मध्यकाल में मुझे मीरा के रूप में सताया है,
    यहां भी मैं रजिया के रूप में शासिका बनी तो
    मुल्ला-मौलवियों ने स्त्री होने की वजह से,
    मैं शासिका नहीं बन सकती ऐसा फरमान फ़रमाया है,
    मैं नहीं हटी तो पुरुष मानसिकता ने
    सत्ता की शक्ति के लिये,
    मुझे मार के हटाया है।

    अपने को खुदा के बन्दे कहने वालों ने
    तीन तलाक कहकर ठुकराया है,
    बुर्के में ढका है मुझे,
    मेरे स्वतंत्र विचारों को दफनाया है,
    सबने मिलकर मुझे
    जिंदा ही सती के रूप में जलाया है,
    अपनी इज्जत के लिये
    मैंने आग में अपना जौहर कराया है।

    आधुनिक युग वालों ने तो
    और भी बर्बर जुल्म ढायें हैं,
    मुझे लूटने के लिये
    पशुता से भी क्रूर तरीके अपनायें है,
    हर युग में मुझे ही दैहिक अग्निपरीक्षा से क्यों गुजरना पड़ा,
    कैसे मैंने खुद का वजूद बचाया
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कुछ समय पहले ही
    जब मैं जन्म लेती थी,
    एक मां-बाप के घर हम नौ-नौ बहनें पैदा हो जाती,
    लेकिन मां-बाप को कुल चलाने के लिये बेटे की चाहत होती,
    कैसे ऐसे माहौल में हम बहनें बिना प्यार के जी पाती,
    कितना रोता मेरा हीवड़ा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कुछ समय पहले ही
    कुछ मां-बाप मुझे जन्मते ही
    जिंदा ही कलश में रखकर किसी नदी में बहा देते,
    या फिर गड्डा खोदकर जिंदा ही दबा देते,

    कितना मेरा जी ता तड़पाया,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कितना मेरा जी था तड़पाया,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    आज भी मुझे
    जब लोगों को पता चले कि गर्भ में बेटी है,
    सब मिलकर मार देते हैं,
    जन्मते ही किसी नाले में
    या फिर कहीं झाड़ियों में फेंक देते हैं,
    धरती पर आने से पहले कसूर क्या था मेरा,
    यही ना कि मैं लड़की थी,
    नहीं था पेट में लड़का,
    क्या मैंने सहा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कभी लगता है
    अब स्थिति कुछ ठीक है,
    लेकिन जब जाती हूं स्कूल-कॉलेजों में,
    हर गली,हर कोने पर कई आंखों ने मेरे शरीर को ताड़ा,
    कई नामर्दों की पुरुष मानसिकता ने अपनी गन्दी नजरों से
    मेरी शारीरिक बनावट का एक्सरे खींच डाला,
    मुझे लगा कैसा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मेरे पहनावे पर सवाल खड़े किये जाते हैं,
    पर अपनी सोच के कभी निरीक्षण नहीं किये जाते हैं,
    कपड़ों पर सवाल उठाने वाले
    मन्दिर-मस्जिदों में दो-दो साल की मासूमों से
    रेप के जुर्म में पकड़े जाते हैं,
    अरे आदमी तेरी सोच गन्दी है
    और ढीला है तेरे मनरूपी पायजामे का नाड़ा,
    मैं एक मासूम बच्ची थी,
    क्या मेरे पर बीती
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    सब कहते हैं तुम लड़की हो,
    कमजोर हो,
    अपने साथ में बदमाशों के लिये मिर्च स्प्रे रखो,
    आठ-दस वर्ष की मासूम यह सब क्या जाने कि
    कौन बदमाश है,
    कौन है शैतान,
    अब तो बाप भी गोद में लेता है
    तो लगता है
    आ गया फिर कोई हैवान,
    आदमी तेरी आत्मा और दिमाग में है सब सड़ा-सड़ा,
    बचपन मेरा कैसे खोया,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मेरे पैदा होते ही
    तैयारी शुरू कर देते हैं मेरी शादी की,
    बालविवाह करके मेरा,
    घड़ी तय कर देते हैं मेरी बर्बादी की,
    मजबूरी में बचपन में दुल्हन बनना पड़ा,
    मेरे बालमन पर क्या असर पड़ा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मेरी शादी घर के बड़े ही तय करते हैं,
    ना मुझसे मेरे मन की पूछते हैं
    यदि शक्ल मेरी अच्छी नहीं तो वरमाला में देखते ही,
    मेरे जीवनसाथी बनने वाले ने मुंह मुझसे मोड़ा,
    यदि उसने दबाव में शादी कर भी ली तो
    प्रेम वाला नाता हमेशा के लिये तोड़ा,
    सब मेरे फिजिकली शरीर और सूरत देखते हैं,
    ना किसी ने मेरे गुण देखे,
    ना कोई मेरी सीरत देखते हैं,
    अरे ओ जीवनसाथी बनने वाले मर्द,
    मैंने भी तो बिना सोचे समझे तेरे संग अपना रिश्ता जोड़ा,
    अपना आंगन,अपने परिचितों को छोड़कर
    तुम जैसे अजनबी का हाथ पकड़ा,
    ओ मर्द?तुमने ना मेरी रूह देखी,
    क्या बीता मुझ पर
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    नारी शक्ति की पूजा करते हो,
    लेकिन घर में ‘कन्या ना आ जाये’
    ऐसे मन्त्र पढ़कर कन्या से
    पीछा छुड़ाने की जुगत लगाते हो,
    मनुष्य होकर क्यों खुद को पशु बनाते हो,
    पशु भी जेंडर भेदभाव तो नहीं करते हैं,
    तुम मनुष्य होने का ढोंग करके
    प्रकृति को छलाने की कोशिश करते हो,
    मां-पत्नी तो चाहते हो,
    लेकिन बेटी को गर्भ में ही मारते हो,
    अरे आदमी!मर गया है तेरी इंसानियत का कीड़ा,
    आगे मुझे बढ़ना है,
    रुकना अब मुझे जंचता नहीं,
    मुझे बढने नहीं देते हो आगे
    तभी तुमने राह में मेरी डाला है रोड़ा,
    इससे कितनी हुई मुझे पीड़ा,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    अरे नर मेरे जिन दो अंगों के पीछे तु है पड़ा,
    उनमें से एक से मैंने तुझे जन्म दिया,
    दूसरे से मैंने तुम्हें दूध पिलाकर यह जीवन दिया,
    फिर भी तु मेरी आत्मा की परवाह किये बगैर,
    मुझे भोग्या बनाने के पीछे है पड़ा,
    तु यह सब बहुत गलत करता है,
    क्यों तुमने अपने इस अंतर्मन को नहीं झिंझोड़ा,
    मेरी आत्मा कैसे रोती है,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    आओ मुझे सम्मान दो,
    सच्ची नियत से साथ दो,
    अपनी गन्दी नजरों को उतार दो,
    इंसानियत वाला दिल बना लो,
    मेरे मां-बाबा आप दहेज के पैसों से
    मुझे पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होने दो,
    परिवार में जेंडर भेदभाव मिटा दो,
    मेरी एक बहन कल्पना चावला की तरह
    मेरे सपनों के पंखों को एक नई उड़ान दो।

    अब मैं नारी अपने लक्ष्य खुद बनाऊंगी,
    टक्कर तो तब भी दी थी शास्त्रार्थों में
    याज्ञवल्क्य जैसे ज्ञानियों को गार्गी के रूप में,
    जब हारने लगे मेरे आगे तो
    धमकियां दी की मैं चुप हो जाऊं,
    नहीं तो मेरा सिर तोड़ दिया जायेगा,
    अब सच के लिये चुप नहीं रहूंगी,
    सच्चाई और मानवता की आवाज बनूंगी,
    मेरे ऊपर लगाये गए प्रतिबन्धों के ऊपर से रास्ता नया बनाऊंगी,
    नारी हूं,नर-नारी को साथ लेकर चलूंगी,
    बार-बार गिरकर,उठकर फिर चलूंगी।

    अब यह नारी आगे बढेगी,
    खुद को मनुष्य मानकर परतन्त्रता की जंजीरें तोड़ेगी,
    अरे आदमी देख लेना इतनी ऊचाइयों पर पहुंच जाऊंगी,
    मेरे कद के बराबर आने के लिये
    आरक्षण जैसी व्यवस्था याद आएगी।

    मेरी राह में लगा देना पहरा कितना भी कड़ा,
    आदमी को मनुष्य के स्तर पर पहुंचाकर खुश होगा मेरा हीवड़ा,
    औरत हूं ना
    प्रकृति का दु:ख कैसे ना जाणे मेरा जीवड़ा।।

    Vijendra Diwach

  • गाँव – स्मृतियों की पोटली — Mukesh Kumar Sinha

    गाँव – स्मृतियों की पोटली — Mukesh Kumar Sinha

    Mukesh Kumar Sinha

    पहुंचा हूँ गाँव अपने….
    जाने कितनी भूली बिसरी सुधियों की पोटली सहेजता..
    अब ज़रा सा आगे ही रुकेगी बस 
    और, दूर दिखाई दे रहा है वो ढलान 
    चौक कहते थे सब ग्रामवासी
    कूद के बस से उतरा और निगाहें खोजने लगीं 
    वो खपरैल जिसमें चलता था 
    “चित्रगुप्त पुस्तकालय” 
    कहाँ गया वो .?

    कहाँ गयी वो लाईब्रेरी 
    जिसने हमें मानवता का पहला पाठ पढ़ाया 
    हमें मानव से इंसान बनाया था
    बचपन के ढेरों अजब-गजब पल
    खुशियां-दर्द-शोक, हार-जीत
    सहेजा था इसके खंभे की ओट से झांकते हुए
    धूम धूम धड़ाम धड़ाम 
    यादों के लश्कर दिमाग़ में अंधेरा कर गये
    फिर स्मृति की मशाल लिये लौटा वही 
    जहाँ जीया था मैंने, मेरा बचपन
    इन दिनों ‘मनरेगा’ ने बदल दी रंग रूपरेखा 
    नहीं दिखी वो अपनी पुरानी लाइब्रेरी!

    यहीं तो पढ़ी थी प्रेमचंद की गोदान
    कैसी टीस से भर गया था बालमन
    और वो, राजन इकबाल सीरीज के बाल उपन्यास 
    अहा कैसे ढल जाते थे हम भी उन पात्रों में
    यहीं चोरी से पढ़े थे इब्ने सफ़ी और 
    सुरेन्द्र मोहन पाठक के जासूसी, थ्रिलर नावेल
    फिर खुद में फीलिंग आती शरलॉक होम्स की
    की थी गांव की लड़कियों की जासूसी
    ये लोकप्रिय उपान्यास
    लुगदी साहित्य कहलाता है इन दिनों

    हाँ, एक रूमानी बात बताऊँ तो
    वहीँ सीखी, रानी को अपना बनाना
    हर दिन घंटो कैरम पर फिसलती उंगलियां
    और क्वीन मेरी हो, सबसे पहले
    इसकी होती जद्दोजहद ! 
    क्या क्या जतन करते थे उसे पाने के लिये
    क्या करेगा उस शिद्दत से कोई आज का आशिक़ 
    अपनी माशूक़ के लिये उस दर्ज़े की मशक़्कत
    वही होती थी टारगेट 
    यहीं खेल-खेल में चमकी थी
    क्वीन सी एक प्यारी सी लड़की
    फ्रॉक व लहराते बालों में

    हाँ इसके सामने हुआ करती थी
    हमारी परचून की दूकान
    जहां संतरे की गोली की मिठास…
    वो हाज़में की चटकारा देती गोलियां
    या लाल मिर्च से रंगी दाल मोठ
    सब हासिल था चवन्नी में
    दस पैसे की जीरा-मरीच 
    या अठन्नी का सरसो तेल भी बेचा
    छोटे छोटे हाथों से 
    यहीं पर जाना था भूख दर्द देती है
    और नमक की बोरी रहती थी बाहर पड़ी
    वैसे ही
    जैसे उनदिनों आंसुओं से बनता हो नमक

    स्कूल से लौट कर या जाने से पहले
    वजह बेवजह 
    जब भी *मैया* का अचरा नहीं मिला तो
    उदासियों के आंसुओं को सहेजा था 
    इसके भुसभुसे से दीवाल में 
    एक दो तीन अल्हड़ फ्रॉक वाली लड़कियों को
    निहारा भी, छिप कर यहाँ

    और बताना भूल गया
    यही है वो जगह जहां बसंत पंचमी झूमती
    वीणावादिनी की मधुर तान अलापती
    वो प्रसाद को ललचाती हमारी जिव्हायें
    क्या भूलें क्या सुनायें
    खेत-गाछी-टाल-नदी
    जाते आते लोग
    गाय-भैंस-बकरियां सूअर की संवेदनाएं भी
    देखते हुए वहीँ घंटों बतियाते अपने से
    कितनी हलचल… कैसा कोलाहल
    तितली के पीछे भागते, जुगनू पकड़ते
    तब किसे पता था क्या होती है हमिंग बर्ड

    नम आँखों से बस् सोच रहे
    जाने कहाँ खो गया बचपन हमारा
    खुश्क है दम
    आँख है नम.
    काश.!!!
    लौट आये
    बचपन की
    वो बयार पुरनम……।

    आखिर इसी पुस्तकालय ने कहा था कभी
    तू सच में बच्चा है !
    सोचता हूँ, फिर ढूंढूं वहीँ बचपन !
    एक प्रतिध्वनि कौंधी कहीं अंदर
    कि
    क्या सच्ची स्मृतियां कविता नहीं हो सकती !

    Mukesh Kumar Sinha

  • बदली — Hukum Singh Rajput

    बदली — Hukum Singh Rajput

    ​हुकुम सिंह राजपूत

    ​रहती हू———घर नही!
    भागती हू——-डर नही!
    उड़ती हू—— –पर नही!
    देती हू ——- कर नही!
    आदि से हू —–अमर नही!
    नारी हू ———–नर नही!
    बिन मेरे गुजर बसर नही!
    इस पहेली का अर्थ है 
    बदली

    आइये बदली पर प्रकाश डाले:

    नित्य कहॉ से आती बदली,
    नित्य कहॉ जाती है बदली!
    अपना रङ्ग जमाती बदली,
    सबको नाच नचाती है बदली!

    झटपट रङ्ग बदल देती बदली,
    सफेद से लाल काली हो जाती है बदली!
    तुरन्त आकाश से हट जाती बदली,
    कभी आकाश पर छाई रहती है बदली!

    जङ्गल देख धीरे धीरे चलती बदली,
    रूखी धरती दोड़ खूब लगाती है बदली!
    सीधी कभी ना चलती बदली,
    गोल गोल घूमती रहती है बदली!

    पर्वत पर छा जाती बदली,
    अपना रङ्ग दिखाती है बदली!
    चन्दा सूरज छुपाती बदली,
    कभी खूद छुप जाती है बदली!

    हवा को पलट देती बदली,
    कभी हवा के सङ्ग चल देती है बदली!
    ओष को रोक देती बदली,
    ओले खूब गिराती है बदली!

    प्रात: तूषार गिराती बदली,
    जल खूब बरसाती है बदली!
    गरज गरज कर चलती बदली,
    बिजली खूब चमकाती है बदली!

    इन्द्रधनुष रच देती बदली,
    मयूर को नाच नचाती है बदली!
    धारवा छोड़ देती बदली,
    मूसलाधार जल बरसाती है बदली!

    बेजान झरनो मे जान डालती बदली,
    धरती पर स्वर्ग बनाती है बदली!
    गरजती तो बॉस उगाती बदली,
    चमकती तो आम के फूल जलाती है बदली!

    ठण्ड खूब गिराती बदली,
    गर्मी भी गिराती है बदली!
    सिमट सिमट कर सिमट जाती बदली,
    छोटी से बड़ी हो जाती है बदली!

    बूदबूद कर जल बरसाती बदली,
    फूर फूर से भी काम चला लैती है बदली,
    सागर से गुजर जाती बदली,
    खारे पानी को मीठा बना देती है बदली!

    घट घट कर घट जाती बदली,
    आकाश से हट जाती है बदली!
    कहॉ से जल लाती बदली,
    कोन जाने जल कैसे बरसाती है बदली!

    धरती पर हरियाली करती बदली,
    हरे रङ्ग को हर लेती है बदली!
    सागर की पनिहारी बदली,
    गगन की पटराणी है बदली!
    पल मे ​LOC पार करती बदली,
    बिन पासपोर्ट देश विदेश घूमती है बदली!
    बिना जङ्गल पानी नही बरसाती है बदली,
    बिन पेड़ धरती से प्यार नही करती है बदली!

    कोइ कहे सागर से पानी लाती बदली,
    कोइ कहे पर्वत पर सो जाती है बदली!
    कहे राजपूत बदलीबदली फिरती बदली,
    क्योआपने जङ्गल काटे ऐसा कहती है बदली!

    कटे जङ्गल देख तड़प तड़प कर भागती बदली,
    कही सूखा,कही ज्यादाजल बरसातीहै बदली!
    ज्यादा कम के चक्कर मे खुद फट जाती बदली,
    सारा का सारा जल एक स्थान पर डाल देतीहै बदली!

    पेड लगाओ सीचो संभालो ऐसा कहती बदली,
    कभी धार चलाना नही समझाती है बदली!
    नाच नाच कर पैडृ मुझे नचाता बतलाती बदली ,
    होगा जङ्गल होगा मङ्गल पुकारती है बदली!

    मेडक को आजाद करती बदली,
    पपीहे को पानी पिलाती है बदली!जब जब बरसन लगती बदली,
    दिन रात बरसती रहती है बदली!
    बडै बडे बॉध तोड़ देती बदली,
    बाढ़ नदियो मे लाती है बदली!
    सब कुछ बहा देती बदली,
    जब जब घनघोर बरसती है!

    अलग अलग दल मे रहती है बदली,
    बरसने पर एक हो जाती है बदली!
    जग मै सबसे बडी दाता बदली,
    जग की जीवन जननी है बदली!

    घणा जल है सागर मै बताती बदली,
    बिन जङ्गल जल कैसे बरसायै सोचती है बदली!
    सागर से मिलकर आई कालीकाली बदली,
    अथाह जल भर कर लाई , नही बरसाती है बदली 

    अल्प विराम (क्षमा करना)

    बदली हमे क्या कहती है?
    नाच नाच कर पेड बादल को नचाने वाला है,
    तवासी जलती धरती पर पेड ही जल बरसाने वाला है!
    सागर वही है, पानी वही है, बादल वही है, हवा वही है, फिर सूखा क्यो पडृ जाता है ?
    बस जङ्गल नही है?
    बादल जङ्गल की रानी,
    सागर से लाती है पानी!
    बिन जङ्गल कैसे बरसाये पानी!!
    सूखा ऐसे पड जाता है?

    कारी बदरी घिरघिर आई,
    अथाह जल भर कर लाई!
    बिन जङ्गल होगयी पराई!!
    सूखा—————*

    हमने जङ्गल काटने की ठानी,
    सो बादल नही बरसाती है पानी!
    बादल करती है मनमानी!!
    सूखा————-*

    हमने हाथो से हर लिया मङ्गल,
    काट दिया देखो सब जङ्गल!
    अब घर घर होता देखो दङ्गल!!
    सूखा बार बार पड जाता है
    सूखा—-‘———

    बिन जङ्गल बादल भटकाई,
    कही सूखा कही बरसाई!
    भटकत भटकत बादल फटजाई!
    देखो नयी मूसीबत आई 
    सूखा जबजब पड जाता है—
    जङ्गल कटा तो सब कुछ जल गया???
    छाछ मिली—-‘दु:ख जल गया!
    दूध मिला—–मुख जल गया!
    माचीस मिली—दिया जल गया!
    सहेली मिली—-पिया जल गया!
    चाय मिली——तन जल गया!
    नजर मिली—-मन जल गया!
    पक्षी मिला—-विमान जल गया!
    कूर्सी मिली—-ईमान जल गया!
    हवामिली–पसीना अपने आप जल गया!
    नोकरी छुटी–‘हसीनो का बाप जल गया!
    ज्यादा करन्ट मिला—t—-b जल गयी!
    जेब खाली हुई—b—b’–जव गयी!
    धुम्रपान किया—बहुत कूछ जल गया!
    और
    जङ्गल काटा—तो—‘सब कुछ जल गया!

    ​Hukum Singh Rajput

    ​Hukum Singh Rajput, around 85 years, is a farmer, a poet, an inventor and an innovative community scientist. He is a part of a group of farmers who changed the entire face of their local communities.

  • हमारी दुनिया — Anand Kumar

    हमारी दुनिया — Anand Kumar

    ​Anand Kumar

    ​ये कविता एक प्रयास है असमानता के दुनिया भर के कुछ उदाहरणों को साथ लेते हुए। इसे पढ़े तब कल्पना करें की कोई अश्वेत या दलित या महिला कुछ कहना चाह रहे हैं या जिन्होंने भी समानता के लिए कुछ किया या सोचा,  उनकी सोच कैसी रही होगी, बदले की और किस तरह के बदले की।

    कविता के तकनीकी पहलुओं में गड़बडियो के लिए माफ़ी चाहता हूँ, पहला प्रयास है। आशा है इसमें आपको बताये गये तीनो लोग, अश्वेत दलित व महिला मिल जायेंगे। कविता मे हुई भूल चूक के लिए माफ़ी।

    ​हमारी दुनिया

    ​तुम्हारी दुनिया में न मैं था न थे सपने मेरे
    पीढ़ी दर पीढ़ी दफ़्न कर रहे थे तुम निशां मेरे
    हक़, सम्मान और आवाज़ छीन चुके थे तुम
    रोटी,पानी और ज़मीन भी बीन चुके थे तुम
    अफ़्रीका से उठा बाज़ारों में बेचा
    श्रम को मेरे तुमने खूब नोचा
    गर्म तेल से नहला रहे थे
    शहरों से भगा रहे थे
    और इसी बीच
    अपने ग्रंथों में भी
    मेरे वजूद को अपनी दुनिया के लिए भद्दा बता रहे थे तुम।

    घर में कैद किया
    या छिपा के रख लिया  
    कमतर हुँ ये गाये जा रहे थे तुम
    कमर तोड़ दी और आशा भी
    पर छिपाने को परदे बहुत सुनहरे लगाये जा रहे थे तुम
    बस यूँ कहुँ की जाने किस आदर्श पे चलके
    न जाने किसकी दुनिया बसा रहे थे तुम।

    पर मेरी दुनिया थोड़ी अय्याश और
    तुम्हारे आदर्शों को ठेंगा दिखने वाली होगी
    कैद न हो कोई
    पीछे न रह जाये कोई
    फिर कोई अपने घरों से उजाड़ा न जाये
    प्रेम की हवा पे पहरा न लगाया जाये  
    धर्म के आगे कोई बहरा न हो जाये
    कुछ ऐसी ही बातों की मटकी फिर न टूटे
    इसकी गारन्टी देने वाली होगी
    मेरी दुनिया थोड़ी अय्याश और
    आदर्शों को ठेंगा दिखाने वाली होगी।

    तुमने जो सब करने से रोका मुझे
    जैसा मेरा वजूद सोचा तुमने
    मैं तुमसे जी भरके बदला लूंगा
    जैसा किया उसके उलट कर दूंगा।
    अपने हक़ को तो तुमसे लड़ूंगा ही
    तुम्हारे हक की भी बात करूँगा
    बोलना भुलाया तुमने मेरा
    मैं तुम्हारा बोलना न भूलने दूंगा
    न रहना इस ग़लत फ़हमी में की सहूँगा अब
    पर तुम्हे भी सहने नहीं दूंगा
    मैं तुमसे जी भरके बदला लूंगा।

    विज्ञानं साहित्य और कला के आगे किसी को आने नहीं दूंगा
    खुद को सिखाऊंगा सीखूंगा गिरूंगा उठूंगा फिर से लिखूंगा
    पर इस बार किसी को किसी का वजूद कमतर न लिखने दूंगा
    अब इस दुनिया से जी भर के बदला लूंगा।

    माना कुछ पुरानी बातें भी लिख दी है
    सुधरे है हालात काफ़ी
    पर ये भी सच है कि अभी चलना है और दूर और काफ़ी
    तुम्हारी दुनिया में मैं न था
    पर हमारी दुनिया मै ऐसा न होगा।

    Anand Kumar

  • भंगण मां — Vijendra Diwach

    भंगण मां — Vijendra Diwach

    Vijendra Diwach

    मैं एक औरत हूँ
    मेरी जाति मुझे भंगी बतायी गयी है,
    घर वालों ने बचपन से ही मुझे
    हाथों में झाड़ू पकड़ाई है,
    मेरी कमर में आभूषण के
    रूप में झाड़ू ही सजायी है।

    कोई मौसम नहीं देखते हैं
    बस निकल पड़ते हैं,
    कथित विद्वान चौक-रास्ते तो साफ करवाते हैं,
    लेकिन अपनी सामन्ती सोच पर कभी झाड़ू नहीं मारते हैं।

    गलियारे बुहारने पर मिल जाती है
    कुछ रोटियां और थोड़ा अनाज,
    कभी कोई बुलाकर पड़ोसियों को
    देता है पुराने कपड़ो का दान,
    खुला प्रदर्शन करके खुद ही खुद को
    समझता है बन्दा नवाज।

    एक सुबह
    जाने वाली बारात का बैंड-डीजे बज रहा था
    मेरी झाड़ू का तिनका-तिनका
    रात्रिभोज में कथित सभ्यजनों द्वारा फैलायी गयी
    गन्दगी पर चल रहा था,
    शादी की सफाई में
    कुछ हरी मिर्च और थोड़े टमाटर मिले,
    रात के थोड़े कचौरे-पकौड़े भी मिले,
    कुछ पकौड़े मुंह में डाले,
    कुछ परिवार के लिये थैले में डाले।

    एक बालक की नजर हम पर पड़ी,
    उसकी जुबान कुछ इस तरह से चली-
    मांजी ये कचौरे-पकौड़े बेसन के और कल के हैं,
    आप बीमार हो जाओगे,
    पेट बिगड़ जायेगा।

    मैंने भी उत्तर दिया-
    छप्पन भोग और खाने वालों के पेट खराब होते हैं,
    बेटा हमें कुछ नहीं होगा।

    वह फिर बोला-
    हरी मिर्च और टमाटर के बीज निकाल के खाना,
    सुना है इनके बीजों से पेट में पथरी बनती है,
    मैंने फिर जवाब दिया-
    बेटा जो पत्थर ही खाते हैं उनका क्या?
    ज़िन्दगी तो उनकी पत्थरों के सहारे ही चलती है।

    द्वार पर जाते ही
    सब कहते हैं भंगण मां आ गयी,
    ये मेरी तौहीन है या फिर मेरा सम्मान,
    मैं भी खुद को भंगण मां कहने लगी हूँ,
    भूल गयी मां-बाबा ने क्या रखा था मेरा असली नाम।

    आज भी हम शमशान घाट से कपड़े उठाते हैं,
    अर्थियों के कफनों से चादरें और कम्बले बनाते हैं,
    आधुनिक कहे जाने वाले युग में
    आज भी हम सामन्ती बेड़ियों में जकड़े जाते हैं,
    सभ्यता का ढोंग करके
    कुंठित लोग झूठे ही सभ्य होने का उत्सव मनाते हैं,
    ऐसे झूठे उत्सव केवल इंसानियत को छलाते हैं,
    एक नजर हम पर डालो
    देखों कैसे जीवन हम चलाते हैं।

    ये गलियारे तो हम सदियों से साफ कर रहे हैं,
    मगर समाज और देश के
    कथित विद्वानों अपने मन की भी सफाई करो,
    इंसान को इंसान समझों,
    सामान्य मानविकी को भी मानव स्वीकार करो,
    भंगी और हमारे जैसी अन्य मैला ढोंने वाली जातियों को,
    दिल अपना बड़ा करके
    माथे पर बल लाकर रोटी देने की जगह
    अपनेपन और शिक्षा का उपहार दो।
    हमने तुम्हारें घर गलियारों को बहुत साफ किया है,
    एक बार तुम भी हमारे घर गलियारों को देखों,
    अपनी आँखों की असली पट खोलो,
    हो यदि सच में तुम मानवीय तो
    देखकर हमारा ज़िंदगीनामा द्रवित हो तुम्हारा ह्रदय,
    तुम भी थोड़ा रो लो।

    हमारे बच्चों की कमर में झाड़ू की जगह
    कंधों पर किताबों का थैला हो,
    उनकी भी आँखों में सुंदर भविष्य का सपना हो,
    मानवता जगाने वाली शिक्षा से ही इनका वास्ता हो,
    ये चले हमेशा नैतिकता पर चाहे कैसा भी रास्ता हो।
    हमारी बेटियां भंगण मां नहीं अपने असली नामों से पहचानी जायें,
    हमारी बस्ती भी इंसानों की बस्ती समझी जायें।।

    Vijendra Diwach