Author: .

  • फ्रैंक हुजूर का सामान सड़क पर फेंका जाना

    फ्रैंक हुजूर का सामान सड़क पर फेंका जाना

    Vidya Bhushan Rawat

    हमारे प्रिय मित्र फ्रैंक हुजूर ने अपनी आखिरी रात किताबों के ढेर और उनकी प्यारी बिल्लियों के साथ खुले में बिताई क्योंकि शहरी विभाग के अधिकारियों ने उन्हें जबरन बाहर निकाल दिया था।

    यह देखकर दुख हुआ कि लखनऊ के दिलकुशा कॉलोनी स्थित घर से फ्रैंक को बाहर निकालने के लिए अधिकारी किस तरह से हड़बड़ी में थे। यह घर शायद तब आवंटित किया गया था जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। फ्रैंक ने वहां समाजवादी फैक्टर पत्रिका शुरू की और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति के बारे में नियमित रूप से लिखते और रिपोर्ट करते रहे हैं।

    हम नहीं जानते कि इन मकानों के आवंटन और रद्द करने के नियम और नियम क्या हैं। मुझे पता है कि लखनऊ के पॉश इलाकों में कई ‘पत्रकारों’ को घर मिल चुके हैं। बहुत से ‘कागजात’ भी मौजूद नहीं हैं, लेकिन सरकार की दया पर ‘पितृकार’ हैं। फ्रैंक प्रति माह बिजली के बिलों के अतिरिक्त तेईस हजार रुपये की बाजार दर का भुगतान कर रहे थे। जब वह आपको बाजार किराए पर दे रहे थे, तब उसे बेदखल करने का कोई कारण नहीं था क्योंकि सभी पत्रकार और पत्रकार ऐसे ही रहते थे। फ्रैंक कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। एक पत्रकार से अधिक, वह एक लेखक हैं और दिल्ली में हिंदू कॉलेज में अपने छात्र दिनों के दौरान एक थिएटर कार्यकर्ता थे। उनका पहला नाटक ‘हिटलर और मैडोना “काफी लोकप्रिय था क्योंकि इसने सांप्रदायिक मुद्दे को उठाया था जब लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी नफरत भरी रथ (रथ) यात्रा शुरू की थी, जिसके परिणाम आज भी देखे जा रहे हैं।

    कीमती किताबों और पत्रिकाओं को सड़कों पर पड़ा देखना एक परेशान और दर्दनाक था। इन ‘कर्मचारियों’ के साथ समस्या यह है कि वे यह भी नहीं समझते हैं कि विचारों की दुनिया कितनी कीमती है। आदमी के पास विचार नहीं हैं तो क्या है। फ्रैंक के घर में कई अद्वितीय गुण थे। जब भी मैं लखनऊ में था, मैंने उनसे कई बार मुलाकात की थी और यह हमेशा वहाँ बैठे रहने और कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत करने और अपनी जमीनी रिपोर्ट साझा करने में एक खुशी थी।

    फ्रैंक एक अद्भुत मेजबान है और शायद उन सभी लोगों को जिन्होंने उसके आतिथ्य को देखा है वे इसे अच्छी तरह से जानते हैं। उनका घर हमेशा लखनऊ शहर आने वाले आगंतुकों और कार्यकर्ताओं के लिए खोला जाता था। फ्रैंक के परिवार का सबसे आश्चर्यजनक हिस्सा, उनकी पत्नी फेमिना मुक्ता सिंह और बेटे मार्कोस के अलावा, लगभग 40 + बिल्लियाँ हैं। इन बिल्लियों में से प्रत्येक को फ्रैंक द्वारा एक अलग नाम दिया गया है और मैंने फ्रैंक की तरह किसी अन्य बिल्ली प्रेमी को नहीं देखा है जहां बिल्लियों की स्थिति और कुछ समय से अधिक है, इंसान। वे सोफे पर बैठते थे और सभी आगंतुकों का अभिवादन करते थे। जब वे डाइनिंग टेबल पर बैठते तो वे घूमते रहते। मुझे इन बिल्लियों से प्यार मिला, जिन्हें उन्होंने अपना समाजवादी परिवार कहा, बस अद्भुत। पालतू जानवरों को संभालने के लिए आपको बहुत धैर्य की आवश्यकता होती है और फ्रैंक ने ऐसा किया है।

    लखनऊ में अधिकारियों ने कभी भी नहीं सोचा कि व्यक्ति अपने सामान के साथ कहां जाएगा। 2017 में योगी आदित्यनाथ की सरकार के सत्ता संभालने के बाद, फ्रैंक नियमित रूप से उनके बारे में कहानियां बनाते हुए भाजपा के हमदर्द मीडिया का निशाना बन गए। उनकी बिल्लियों को पड़ोसियों के लिए उपद्रव पैदा करने के लिए दोषी ठहराया गया था, जिसे हम सभी जानते हैं कि इन बिल्लियों की देखभाल के लिए फ्रैंक के धन का एक बड़ा हिस्सा निवेश किया गया था।

    सरकार को पत्रकारों और लेखकों को मकान आवंटित करने की इन नीतियों पर ध्यान देने की जरूरत है। पता करें, इन आवंटित मकानों में कितने ‘असली’ पत्रकार और लेखक रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार को ‘सरकार सेवा’ के लिए जाना जाता है, ताकि पाटीदार प्रशासन के भक्त बन जाएं। उनकी ओर से, मुझे लगता है कि अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को फ्रैंक का समर्थन करना चाहिए और स्थायी समाधान की तलाश करके इस मुद्दे को हल करने की कोशिश करनी चाहिए। यह राजनीतिक दलों के लिए अपने स्वयं के पेशेवर मीडिया सेल बनाने का समय है, बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं का समर्थन करना है और सबसे अच्छा तरीका है कि अपने कार्यालयों का निर्माण किया जाए जहां कुछ लेखकों और लेखकों के लिए भी आवासीय कॉलोनियां विकसित की जा सकती हैं। जो उन्हें इस तरह के अपमान से बचाएगा। नेता, विधायक, सांसद के लिए, हमारे पास फ्लैट हैं और उनकी निजी संपत्तियां हैं, यह समय है कि वे इन मुद्दों पर गंभीरता से गौर करें।

    फ्रैंक के साथ हमारी एकजुटता और आशा है कि वह ऐसा करना जारी रखेगा जो वह इन वर्षों में कर रहा है। यह समय बाबा साहेब अम्बेडकर, ज्योति बा फुले और ईवीआर पेरियार के उच्चं के अनुसार बहुजन समाज के सांस्कृतिक कथानक के निर्माण का है। ये चुनौतियाँ न्याय और गरिमा के संघर्ष का हिस्सा हैं। जुल्म और दमन से लड़ाई नहीं रुकती। सामाजिक परिवर्तन का संकल्प मजबूत और अधिक शक्तिशाली हो जाता है। हमें अपना सिर ऊंचा रखने पर मार्च करना चाहिए।

    Vidya Bhushan Rawat


  • कन्यादान टीम की ग्यारहवीं बिटोली जाएगी ससुराल

    कन्यादान टीम की ग्यारहवीं बिटोली जाएगी ससुराल

    Ashish Sagar Ashish

    2 जून,2019,बाँदा :-

    * कालिंजर की तलहटी में वाल्मीकि समुदाय के बीच प्रकृति सम्यक होगा विवाह। यूपी बुंदेलखंड के बाँदा में एक बार पुनः आगामी 15 जून को प्राकृतिक संसाधनों के बीच कन्यादान टीम अपने वार्षिक अभियान की ग्यारहवीं बिटिया का ब्याह करेगी। उल्लेखनीय है बाँदा की नरैनी तहसील के मोहनपुर खलारी प्रधान सुमनलता पटेल पत्नी अध्यापक यशवंत पटेल और उनके साथी हर वर्ष किसी एक कन्या का विवाह करते है। इस सामाजिक सरोकारी कार्यक्रम में हमेशा जातिवाद, धर्म,रंग-भेद की मिथक दीवारों को तोड़ा जाता है। प्रधान सुमनलता और उनके पति सहित सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर ने बताया कि हमने कभी बेटियों के कन्यादान में मजहब और जाति का ख्याल नहीं किया है। ऐसा किसी भी सरोकारी को करना भी नहीं चाहिए। संकल्प के मुताबिक इस वर्ष कालिंजर गांव के महादलित वाल्मीकि परिवार की बेटी रेखा पुत्री बाबू समुद्रे का की वैवाहिक रस्में गढ़ा-गंगापुरवा के किशन पुत्र कारेलाल मतेल के साथ सम्पन्न की जाएगी। सामाजिक समरसता के संदेश देने की मुहिम ऐसे आयोजन का हिस्सा होता है। बतलाते चले बीते शनिवार कन्यापक्ष के गांव जाकर कन्यादान टीम साथियों ने गंवई चौपाल में इस प्रकृति सहपूरक विवाह की मंत्रणा की। शादी को देशी गंवई अंदाज में वैकल्पिक प्राकृतिक साधनों के साथ आयोजित करने निर्णय किया गया है। पेशे से अध्यापक खुद किसान परिवार से आते है और उन्होंने अपनी भतीजी का ब्याह भी इस अभियान की कड़ी में बीते 26 जून 2018 को बैलगाड़ियों से बारात की अगवानी करके किया था। समाज मे इस ब्याह की खासी चर्चा रही थी। इसके पूर्व निषाद समाज की गरीब मैकी देवी की शादी भी गंगापुरवा में बीते 7 जून 2017 को बैलगाड़ियों से की थी।….15 जून को होने वाली रेखा परिणय किशन के ब्याह में भी पर्यावरण का ख्याल रखते हुए ग्रामीण परंपरा के अनुरूप कार्बन उत्सर्जन करने वाले साधनों को परहेज रखा जाएगा। मसलन डीजे,आतिशबाजी और फूहड़ता से दूरी बनाते हुए बारात की अगवानी में छियूल की लकड़ी से बने फूलों,बांस,कांस के मंडप के बीच बिटिया के पैर पूजे जाएंगे। साथ ही वरपक्ष के स्वागत में दोना-पत्तल की पंगत में शुद्ध ईंधन में पका भोजन परोसा जाएगा। मिट्टी के कुल्हड़ में जलपान होगा तो आम और जामुन के पत्तों से बना हाथी दरवाजा,पुराने वाद्य यंत्र से ग्रामीण महिलाओं के मंगल गीत दुहला-दुल्हन आशीर्वाद देते दिखलाई पड़ेंगे। कन्यादान टीम रेखा के परिवार के साथ विवाह की तैयारियों में जुट गई है। अयोजन कर्ता सदस्यों ने बताया कि बिना किसी चमक-दमक के गांव की जीवनशैली को सहेजने की दिशा में यह ग्याहरवीं लड़की की शादी है। वह यह आयोजन व्यक्तिगत साधनों से करते है । जिसमें समाज की दुआएं शामिल होकर आयोजन को सफल बनाती है। 

    11 जून :- 

    पंद्रह जून को होने वाले प्रकृति सम्यक विवाह के आयोजन पूर्व आज कन्यापक्ष द्वारा ‘ छुई-माटी ‘ की रश्म ( मिट्टी के बर्तन मसलन चुहला निर्माण व घर की चूना, गोबर,गंवई रंग से लिपाई-पुताई / रंग रोगन का कार्यक्रम शुरू हुआ ) सम्पन्न हो गई। इन मिट्टी के बर्तनों को मंडप के पास रखा जाता है। फ़ोटो में मिट्टी के चुहले बनाती कन्या रेखा वाल्मीकि के पारिवारिक जन, रिश्तेदार व पड़ोसीजन। आज से अलग- अलग वैवाहिक रीति रिवाजों के पड़ाव शुरू होंगे। यथा माईंन, तेल, हल्दी-उपटन,मंडप आदि महिलाओं को बुलौआ लगाकर आयोजित होते है। न्योता देने आदि का कार्य नाउन दाई करती है। वहीं वरपक्ष में भीखी,जनेऊ यदि यग्योपवीत अलग से नहीं किया तो होता है । जैसा ग्रामीण परिवेश में ब्याह के वक्त बिटिया के घर होता है। आज बिटिया रेखा के घर खलारी प्रधान पति अध्यापक यशवंत पटेल ने उपस्थिति बनाये रखी । 

    Ashish Sagar Ashish        

  • भारतीय शास्त्रीय कलाएं और सामाजिक सरोकार

    Sanjay Shramanjothe

    आपने हाल ही में भारत के कलाकारों, खिलाड़ियों अभिनेताओं और लेखकों के वक्तव्य और कृत्य देखे होंगे। उनके बचकाने राजनीतिक वक्तव्य और सामाजिक मुद्दों पर उनकी तटस्थता बहुत परेशान करती है। यह स्थिति यूं ही निर्मित नहीं हो गयी है। इसके पीछे सदियों तक लंबा काम हुआ है।

    भारतीय कलाकारों, खिलाड़ियों, गायकों नृत्यकारों के वक्तव्य बहुत निराश करते हैं। उनके वक्तव्यों में आम भारतीय मजदूर या किसान या गरीब के सामाजिक सरोकार एकदम से गायब हैं। उन्होंने कला को व्यक्तिगत मोक्ष या अलौकिक आनन्द की जिन शब्दावलियों में गूंथा है उसमें फसकर कला और कलात्मक अभव्यक्तियाँ भी इस लोक की वास्तविकताओं के लिए न सिर्फ असमर्थ हो गए हैं बल्कि उसके दुश्मन भी बन गए हैं। हालांकि अभी कुछ वर्षों से पश्चिमी प्रभाव में एक भिन्न किस्म की कला उभर रही है वह एक नई घटना है, उससे कुछ उम्मीद जाग रही है।

    भारत का उदाहरण लें तो साफ नजर आता है कि कला, भाषा, संगीत काव्य आदि सृजन के वाहक होने के साथ ही शोषक परम्पराओं और धर्म के भी वाहक बन जाते हैं। खासकर भारत मे संगीत और साहित्य ने जो दिशा पकड़ी है उसका मूल्यांकन आप समाज की सेहत के संदर्भ में करेंगे तो आपको चौंकानेवाले नतीजे मिलेंगे। 1935 के पहले तक का नख शिख वर्णन और भक्ति सहित नायिका विमर्श वाले साहित्य को दखिये और आज तक के शास्त्रीय संगीत और नर्तन को दखिये – ये सब शोषक धर्म और संस्कृति के कथानकों, मिथकों, गीतों का ही मंचन, गायन और महिमामंडन करते आये हैं।

    नृत्य की प्रमुख शास्त्रीय शैलियो को देखिये वे किसी न किसी मिथक या अवतार की लीला से आरंभ होकर उस अवतार या मिथक से जुड़े सामाजिक मनोविज्ञान को सुरक्षित रखने का काम करती आई है। अधिकांश शास्त्रीय गायक अपनी गायकी जिन काव्य प्रतीकों और छंदों में बांधते हैं वे काव्य अंश सामंती दास्यभाव की भक्ति के गुणगान से या परलोकी वैराग्य और काल्पनिक ईश्वर के महिमामंडन से भरी होती है।

    यह सब सीधे तरीके से ब्राह्मणी वेदांत और ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की वर्णाश्रमवादी सामाजिक संरचना को बनाये रखने का एक सूक्ष्म हथियार बन जाता है। एक खास किस्म का कल्पनालोक इन शास्त्रीय कलाओं से जन्म लेता है और स्वयं को हर पीढ़ी में आगे सौंपता जाता है। इसी से प्रेरणा लेकर हमारा फिल्मी और टेलीविजन का संगीत और नृत्य विकसित/पतित होता है। इस ढंग ढोल में जन्मे संगीत नृत्य खेल साहित्य आदि में समाज के वास्तविक सरोकारों को कोइ स्थान नहीं मिलता है। यही भारतीय कला की हकीकत रही है।

    हमारे साहित्य, संगीत, खेल और फ़िल्म सहित मीडिया की किसी भी विधा के चैम्पियनों को उठाकर देख लीजिए। उनकी कला न उनके हृदय में सामाजिक सरोकारों को पैदा कर पा रही है न उनसे प्रभावित लोगों में किसी सामाजिक शुभ को प्रेरित कर रही है।

    हां, ये ठीक है कि एक व्यक्तिगत अर्थ में, एक व्यक्ति की सृजन प्रेरणाओं को ऊर्जा और आकार देने में ये विधाएं ठीक ढंग से काम करती आई हैं लेकिन इसका सामाजिक या सामूहिक शुभ से कोई अनिवार्य संबन्ध नहीं बनता। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारी कलाएं और उनकी अभिव्यक्तियाँ ठोस और जमीनी सरोकारों से एक खास किस्म की तटस्थता सायास बनाकर चलती हैं।

    यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोक कलाओं और जनजातीय कलाओं में यह समस्या नहीं है। लेकिन चूंकि उनका विकास अब अवरुद्ध सा हो गया है और उनके अपने वाहक अब “सभ्य” होने लगे हैं, सो उनमे पुरानी लोक कलाओं को सहेजने या विकसित करने की प्रवृत्ति क्षीण हो रही है। एक पॉप्युलर कल्चर और उसका आभामण्डल उनपर हावी हो रहा है। अब वे भी चलताऊ किस्म के न्यूज चैनल्स की शैली में परोसीे गई कला, गीत, संगीत, मंचीय काव्य, शायरी और जगरातों कथा पंडालों से प्रभावित हो रहे हैं।

    कुल मिलाकर एक सामान्य स्थिति यह है कि अब लोक कलाओं का नाम लेने वाले समूह और समुदाय ही नहीं बल्कि व्यक्ति और संस्थाएं भी सिकुड़ रही हैं। ऐसे में फिल्म या टेलीविजन पर सवार कला ही सामान्य जनसमुदाय के लिए एक बड़ी खुराक का निर्माण करती है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारा आम भारतीय कलाओं की बहुत निकृष्ट और व्यक्तिगत मोक्ष के अर्थ वाले संस्करणों से कला की प्रेरणा लेता है। यह एकांत में तनाव मुक्ति का या किसी तरह के मनोलोक में खो जाने का उपाय भर होता है। इसका समाज की सामूहिकता पर क्या प्रभाव होता है यह एक अन्य भयानक तथ्य है।

    अब कलाकारों और आम जन को लोक कला सहित लोक और लोकतंत्र से ही कोई सरोकार नहीं रह गया है। ऐसे में कला खेल संगीत नृत्य आदि लोकतंत्र के खिलाफ खड़ी हुई फासीवादी शक्तियों का गुणगान करने लगे हैं। हमारा बोलीवूड, क्रिकेट, टेलीविजन और शास्त्रीय संगीत अब अपनी सांस्कृतिक समझ और राजनीतिक रुझान की घोषणा कर रहा है।

    उदारीकरण के बाद राजनीति, धर्म और व्यापार की त्रिमूर्ति ने जिस नये और सर्वयव्यापी ईश्वर को रचा है अब उस ईश्वर के गुणगान में भारतीय शास्त्रीय संगीत, नृत्य, खेल आदि कलाएं भी दोहरी हुई जा रही है। पहले देवी देवताओं और सामंतों की स्तुति होती थी अब थोड़े बदले ढंग से बाजार और राजनेता की स्तुति हो रही है। ये स्तुति प्रत्यक्ष नजर नहीं आएगी लेकिन प्रचलित राजनीति और राजनीतिक आका जिन मिथकों और महाकाव्यों से अपने विषबुझे तीर हासिल करते हैं उन्ही प्रतीकों को अपने गायन नर्तन में जिंदा रखकर असल मे ये कलाएं और कलाकार एक खास राजनीति की ही सेवा करते आये हैं।

    आश्चर्य नहीं कि कलाकार हद दर्जे के अंधविश्वासी, कर्मकांडी, ज्योतिष वास्तु आदि के गुलाम और परलोकवादी होते हैं। इनकी संगीत और काव्य की प्रशंसा सुनें तो साफ नजर आएगा कि ये संगीत या काव्य की प्रशंसा उसके आलौकिक या समयातीत होने की उपमा देते हुए करते हैं। किसी अव्यक्त अज्ञात या अज्ञेय के नजदीक जाने के उपकरण की तरह इन्हें वह संगीत नृत्य या काव्य उपयोगी नजर आता है। ऐसे में संगीत, नृत्य और काव्य स्वयं में एक काल्पनिक ईश्वर के प्रचारतंत्र के दलाल बन जाते हैं।

    इस भूमिका के बाद आप भारतीय कलाकारों,संगीतकारों, खिलाड़ियों और कुछ हद तक साहित्यकारों के समाज विरोधी वक्तव्यों को दखिये, आप देख सकेंगे कि भारतीय कला और कलाकार असल मे प्रतिक्रांति के प्राचीन उपकरण रहे हैं जिनमे शहरी मध्यम वर्ग की असुरक्षाओ और नव उदारीकरण के कीटाणुओं ने नई धार और नया जहर भर दिया है

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • महलों का घर

    महलों का घर

    Mukesh Kumar Sinha

    देखी है मैंने
    ऊँची चहारदीवारियों के बीच 
    बड़े गेट के पीछे छिपा 
    बिन खिड़कियों का घर

    चहारदीवारी में छिपके 
    सांस थामें
    बिना हिले डुले 
    आहिस्ते से अपने टांगों पर
    टिका हुआ घर

    इंटरकॉम और
    स्क्रीन वाले फोन के साथ
    धुंधले पड़े गेट पे लगे
    डोर आईज से 
    पूरा पता लेकर 
    बताता है सन्तरी
    कोई आया है।
    फिर भी, ऐसे घरों में
    बना रहता है डर

    बिन बच्चों के खिलखिलाहट के भी
    हवाओं के सहारे झूलते झूले 
    उनींदी सी खोयी रहती है 
    किसी अनजाने के आने के उम्मीद में
    जबकि 
    शेर से दिखने वाले
    दहाड़ रहे होते हैं कुत्ते
    पर, बैठे होते हैं 
    वो कुछ खास लोग 
    घर के अंदर 
    जहाँ होता है तलघर

    बेशक इन घरों में भी 
    जीवंत होती हैं साँसे 
    पर रुक-रुक कर थमती सी लगती है 
    ये साँसे 
    ईंट गारे से नींव की शुरुआत के साथ 
    जिन्होंने पूरी उम्र काट दी फ़ुटपाथ पे रहकर
    वे मजदूर बना रहे होते हैं विशाल घर

    चंचल चमकते ख़्वाबों के साथ 
    बनता हुआ 
    विशाल महलों सा घर 
    कब पैसों की अधिकतम आवाजाही 
    और उसके बाद देख कर 
    सिसकता डर 
    मजार सा बन जाता है घर

    अपने ख्वाबों की विशाल चमक को 
    आँखों के सामने खिलते देखने की चाह लिए
    महल को मज़ार बनते देख
    एकांतवास में 
    सिसकता है अंदर का डर

    तभी तो
    ठिठकती साँसों की सरगोशी में
    परकोटों के सन्नाटों की चुभन
    जोहती हैं आमद आहट का धन
    चाहरदीवारी बनना चाहता है
    किलकारियों वाला घर।

    Mukesh Kumar Sinha

  • गाँव – स्मृतियों की पोटली — Mukesh Kumar Sinha

    गाँव – स्मृतियों की पोटली — Mukesh Kumar Sinha

    Mukesh Kumar Sinha

    पहुंचा हूँ गाँव अपने….
    जाने कितनी भूली बिसरी सुधियों की पोटली सहेजता..
    अब ज़रा सा आगे ही रुकेगी बस 
    और, दूर दिखाई दे रहा है वो ढलान 
    चौक कहते थे सब ग्रामवासी
    कूद के बस से उतरा और निगाहें खोजने लगीं 
    वो खपरैल जिसमें चलता था 
    “चित्रगुप्त पुस्तकालय” 
    कहाँ गया वो .?

    कहाँ गयी वो लाईब्रेरी 
    जिसने हमें मानवता का पहला पाठ पढ़ाया 
    हमें मानव से इंसान बनाया था
    बचपन के ढेरों अजब-गजब पल
    खुशियां-दर्द-शोक, हार-जीत
    सहेजा था इसके खंभे की ओट से झांकते हुए
    धूम धूम धड़ाम धड़ाम 
    यादों के लश्कर दिमाग़ में अंधेरा कर गये
    फिर स्मृति की मशाल लिये लौटा वही 
    जहाँ जीया था मैंने, मेरा बचपन
    इन दिनों ‘मनरेगा’ ने बदल दी रंग रूपरेखा 
    नहीं दिखी वो अपनी पुरानी लाइब्रेरी!

    यहीं तो पढ़ी थी प्रेमचंद की गोदान
    कैसी टीस से भर गया था बालमन
    और वो, राजन इकबाल सीरीज के बाल उपन्यास 
    अहा कैसे ढल जाते थे हम भी उन पात्रों में
    यहीं चोरी से पढ़े थे इब्ने सफ़ी और 
    सुरेन्द्र मोहन पाठक के जासूसी, थ्रिलर नावेल
    फिर खुद में फीलिंग आती शरलॉक होम्स की
    की थी गांव की लड़कियों की जासूसी
    ये लोकप्रिय उपान्यास
    लुगदी साहित्य कहलाता है इन दिनों

    हाँ, एक रूमानी बात बताऊँ तो
    वहीँ सीखी, रानी को अपना बनाना
    हर दिन घंटो कैरम पर फिसलती उंगलियां
    और क्वीन मेरी हो, सबसे पहले
    इसकी होती जद्दोजहद ! 
    क्या क्या जतन करते थे उसे पाने के लिये
    क्या करेगा उस शिद्दत से कोई आज का आशिक़ 
    अपनी माशूक़ के लिये उस दर्ज़े की मशक़्कत
    वही होती थी टारगेट 
    यहीं खेल-खेल में चमकी थी
    क्वीन सी एक प्यारी सी लड़की
    फ्रॉक व लहराते बालों में

    हाँ इसके सामने हुआ करती थी
    हमारी परचून की दूकान
    जहां संतरे की गोली की मिठास…
    वो हाज़में की चटकारा देती गोलियां
    या लाल मिर्च से रंगी दाल मोठ
    सब हासिल था चवन्नी में
    दस पैसे की जीरा-मरीच 
    या अठन्नी का सरसो तेल भी बेचा
    छोटे छोटे हाथों से 
    यहीं पर जाना था भूख दर्द देती है
    और नमक की बोरी रहती थी बाहर पड़ी
    वैसे ही
    जैसे उनदिनों आंसुओं से बनता हो नमक

    स्कूल से लौट कर या जाने से पहले
    वजह बेवजह 
    जब भी *मैया* का अचरा नहीं मिला तो
    उदासियों के आंसुओं को सहेजा था 
    इसके भुसभुसे से दीवाल में 
    एक दो तीन अल्हड़ फ्रॉक वाली लड़कियों को
    निहारा भी, छिप कर यहाँ

    और बताना भूल गया
    यही है वो जगह जहां बसंत पंचमी झूमती
    वीणावादिनी की मधुर तान अलापती
    वो प्रसाद को ललचाती हमारी जिव्हायें
    क्या भूलें क्या सुनायें
    खेत-गाछी-टाल-नदी
    जाते आते लोग
    गाय-भैंस-बकरियां सूअर की संवेदनाएं भी
    देखते हुए वहीँ घंटों बतियाते अपने से
    कितनी हलचल… कैसा कोलाहल
    तितली के पीछे भागते, जुगनू पकड़ते
    तब किसे पता था क्या होती है हमिंग बर्ड

    नम आँखों से बस् सोच रहे
    जाने कहाँ खो गया बचपन हमारा
    खुश्क है दम
    आँख है नम.
    काश.!!!
    लौट आये
    बचपन की
    वो बयार पुरनम……।

    आखिर इसी पुस्तकालय ने कहा था कभी
    तू सच में बच्चा है !
    सोचता हूँ, फिर ढूंढूं वहीँ बचपन !
    एक प्रतिध्वनि कौंधी कहीं अंदर
    कि
    क्या सच्ची स्मृतियां कविता नहीं हो सकती !

    Mukesh Kumar Sinha

  • महलों सा घर

    महलों सा घर

    Mukesh Kumar Sinha

    देखी है मैंने
    ऊँची चहारदीवारियों के बीच 
    बड़े गेट के पीछे छिपा 
    बिन खिड़कियों का घर

    चहारदीवारी में छिपके 
    सांस थामें
    बिना हिले डुले 
    आहिस्ते से अपने टांगों पर
    टिका हुआ घर

    इंटरकॉम और
    स्क्रीन वाले फोन के साथ
    धुंधले पड़े गेट पे लगे
    डोर आईज से 
    पूरा पता लेकर 
    बताता है सन्तरी
    कोई आया है।
    फिर भी, ऐसे घरों में
    बना रहता है डर

    बिन बच्चों के खिलखिलाहट के भी
    हवाओं के सहारे झूलते झूले 
    उनींदी सी खोयी रहती है 
    किसी अनजाने के आने के उम्मीद में
    जबकि 
    शेर से दिखने वाले
    दहाड़ रहे होते हैं कुत्ते
    पर, बैठे होते हैं 
    वो कुछ खास लोग 
    घर के अंदर 
    जहाँ होता है तलघर

    बेशक इन घरों में भी 
    जीवंत होती हैं साँसे 
    पर रुक-रुक कर थमती सी लगती है 
    ये साँसे 
    ईंट गारे से नींव की शुरुआत के साथ 
    जिन्होंने पूरी उम्र काट दी फ़ुटपाथ पे रहकर
    वे मजदूर बना रहे होते हैं विशाल घर

    चंचल चमकते ख़्वाबों के साथ 
    बनता हुआ 
    विशाल महलों सा घर 
    कब पैसों की अधिकतम आवाजाही 
    और उसके बाद देख कर 
    सिसकता डर 
    मजार सा बन जाता है घर

    अपने ख्वाबों की विशाल चमक को 
    आँखों के सामने खिलते देखने की चाह लिए
    महल को मज़ार बनते देख
    एकांतवास में 
    सिसकता है अंदर का डर

    तभी तो
    ठिठकती साँसों की सरगोशी में
    परकोटों के सन्नाटों की चुभन
    जोहती हैं आमद आहट का धन
    चाहरदीवारी बनना चाहता है
    किलकारियों वाला घर।

    Mukesh Kumar Sinha

  • भारतीय बाबाओं की अवसरवादिता एवं धूर्त्तता

    भारतीय बाबाओं की अवसरवादिता एवं धूर्त्तता

    Sanjay Shramanjothe

    भारतीय इतिहास या संस्कृति के किसी भी मुद्दे पर बात करिए, एक बात भयानक रूप से चौंकाती है. सामान्य ढंग के भक्त और कम शिक्षित लोगों में जानकारी का अभाव होता है, इसलिए उनकी बातें बस प्रचलित नारों की प्रतिध्वनी भर होती है. खैर ये बात कम पीड़ित करती है. ज्यादा दुःख होता है रजनीश भक्तों से, इसमें श्री श्री और जग्गी वासुदेव के शिष्य भी जोड़े का सकते हैं. ये लोग एकदम दिशाहीन होते हैं.

    बात बात में ध्यान या समाधि के अनुभव की बात करते हैं. सीधे जाकर ध्यान करने की सलाह देते हैं, सलाह देते हुए जताते जाते हैं कि ये तो बुद्धपुरुष बन ही चुके हैं। कोई भी मुद्दा हो उसकी ऐसी व्याख्या बताएँगे कि बस हंसने और रोने के आलावा कोई रास्ता ही नहीं बचता.

    अभी नास्तिकता और बुद्ध पर बात निकली, दो रजनीश भक्त कहीं से निकल आये और कहने लगे कि शब्दों को छोड़कर अनुभव में जाइए बुद्ध आस्तिक और नास्तिक का अतिक्रमण हैं. ठीक है भाई. मान लिया भाई. अब इसका अर्थ आप ही समझाइये, अर्थ से ज्यादा इसके इम्प्लिकेशन पर भी आइये. ये लोग स्वयंसिद्ध बुद्ध पुरुष हैं. रजनीश ने ऐसे स्वयंसिद्ध लोगों की फ़ौज खड़ी की है और इसी फ़ौज की मूर्खता में वे खुद भी दब मरे. अमेरिका में उनकी जो गत हुई वो बाहरी षड्यंत्र से कम भीतरी षड्यंत्र से ज्यादा हुई.

    इस झटके में जो बुद्धि आई उसके बाद उनका अंदाज ही बदल गया. लेकिन उसके पहले उन्होंने जो सैकड़ों किताबें रंग डालीं थीं उनकी मूर्खताओं से लोगों को निकालना मुश्किल है. ओशो बनकर उन्होंने खुद ही इन किताबों को नकारने का पूरा प्रयास किया था लेकिन भक्त क्यों सुनेंगे?और जो सुन ले वो फिर भक्त ही किस काम का.

    अब बुद्ध और शून्य की बात करते हैं. रजनीश जिन्दगी भर समझाते रहे शून्य और पूर्ण एक ही हैं. उनकी भी बीमारी वही है जो उनके भक्तों की है. फल से पता चलता है पेड़ कैसा था. शुन्य और पूर्ण उनके लिए एक हैं. इसका मतलब हुआ कि जिस अनुशासन या अंतर्दृष्टि से शून्य का अनुभव होता है वो औपनिषदिक या ब्राह्मणी दृष्टि के समान ही है.

    अगर ये बात सच है तो बुद्ध ने नाहक श्रम किया. रजनीश अगर सही हैं तो महावीर और बुद्ध दोनों मूर्ख हैं जो इतने साल तक वेदों और परमात्मा को नकारते रहे. भगवान रजनीश दर्शन की जलेबियाँ बनाते हुए कहते हैं कि जिस तरह शंकर प्रच्छन्न बौद्ध हैं उसी तरह बुद्ध प्रच्छन्न वेदांती हैं.

    ये रजनीश के पाखण्ड की अंतिम उंचाई है. इसके बाद वे सीधे नीचे लुढकते हैं और रजनीशपुरम की राख में औंधे मुंह गिरते हैं. और ऐसे गिरते हैं कि उनकी तैयार की हुई फौज में से एक भी ऐसा आदमी आज तक खड़ा न हो सका जो उनके अंतिम समय की समझ को थोड़ा सा आगे बढा सके. सब के सब कॉपीराइट और सम्पत्ति के नाम पर लड़ रहे हैं।

    जितने भक्त हैं वे सब दाढ़ी बढ़ाकर चोगा पानकर आँखें चौड़ी कर करके फोटो खिंचाते रहते हैं. कुछ अन्य हैं जो नोंनवेज जोक्स सुनाकर ही समाधि लाभ करते रहते हैं. अभी हरियाणा में एक आश्रम खुला है ओशो के नाम पर वे चौरासी दिनों में चौरासी लाख योनियों से शर्तिया छुटकारा दिलाते हैं. ये रजनीश की कन्फ्यूज्ड शिक्षाओं का स्वाभाविक परिणाम है. ये न हो तो आश्चर्य होगा. ये हो रहा है तो एकदम सही हो रहा है. कई सूरमा यहीं फेसबुक पर हैं, खुद के नाम के आगे ओशो लगाकर लोगों की कुंडलिनी जगा रहे हैं. मतलब खुद की तो जग गयी अब जगत का कल्याण कर रहे हैं.

    एक अजीब सी प्रवृत्ति है इन वेद वेदान्त के प्रेमियों में वे किसी मुद्दे को उसके तर्क और उसके इम्प्लिकेशन के संदर्भ में देखते ही नहीं. कभी नहीं सोचते कि उनकी जलेबिदार व्याख्या का फलित क्या होगा. अब रजनीश को देखिये वे शून्य और पूर्ण को एक ही बताते हैं. इस व्याख्या में वे तर्क कम और आंतरिक अनुभव की ज्यादा बात करते हैं. इसे वे कहते हैं आंतरिक अनुभव की परिपक्वता और उससे जन्मी स्थित्प्रग्यता और तटस्थता. खुद तो इसे भांज ही रहे हैं औरों को भी ये जहरीली भांग तैयार करने का प्रशिक्षण दे जाते हैं.

    अब उनके मूर्खता का आलम देखिये शून्य और पूर्ण एक ही हैं, भक्ति और ज्ञान एक ही है, कर्म और अकर्म एक ही है. तर्क और कुतर्क एक ही है. जय और पराजय एक ही है. तो फिर वही होना है जो आज तक हुआ है. फिर ये भी मान लीजिये कि रजनीशपुरम का होना और मिटना भी एक ही है. लेकिन जब रजनीशपुरम को बुलडोजरों से तोड़ा गया तब रजनीश बहुत क्रोधित हुए. जमाने भर में प्रेस कान्फ्रेरेंस करते रहे.

    कुछ विडिओ तो ऐसे हैं जिनमे रजनीश पत्रकारों पर क्रोधित हो रहे हैं. अब कहाँ गयी तटस्थता?भक्त भी गजब हैं. कुछ फोटो हैं जिनमे रजनीश हथकड़ी लगाये खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं. भक्त इसे शेयर करके कहते हैं कि ये है स्थितप्रज्ञ समाधिस्थ व्यक्ति जो दुःख में भी मुस्कुरा रहा है.

    इन्ही भक्तों की वाल पर रजनीश का चीखता हुआ वीडियो भी मिलेगा उसके परिचय में लिखा मिलेगा – ओशो का रौद्र रूप. गजब है भाई. अब मुस्कुराहट और रौद्र रूप अलग क्यों हो गये? ये क्यों नहीं कहते कि ओशो संतुलन खो चुके हैं.

    बस भक्त जन ऐसी ही जलेबियाँ बनाते हैं. भक्त किसी राजनेता के हों या धर्मगुरु के उनकी लीला ही न्यारी है. वो जो न करें सो कम है. दुर्भाग्य ये कि इन सभी भक्तों में अचानक भाईचारा जाग उठा है. कुम्भ मेलों के बिछड़े इन सभी भक्तों का अचानक से भारत मिलाप हो गया है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • खिलखिलाती पहचान

    खिलखिलाती पहचान

    Mukesh Kumar Sinha

    खिलखिलाहट से परे
    रुआंसे व्यक्ति की शायद बन जाती है पहचान, 
    उदासियों में जब ओस की बूंदों से
    छलक जाते हों आंसू 
    तो एक ऊँगली पर लेकर उनको
    ये कहना, कितना उन्मत लगता है ना 
    कि इस बूंद की कीमत तुम क्या जानो, लड़की

    खिलखिलाते हुए जब भी तुमने कहा 
    मेरी पहचान तुम से है बाबू 
    मैंने बस उस समय तुम्हारे
    टूटे हुए दांतों के परे देखा 
    दूर तक गुलाबी गुफाओं सा रास्ता 
    ये सोचते हुए कि 
    कहीं अन्दर धड़कता दिल भी तो होगा ना 
    मेरे लिए 
    गुलाबी श्वांस नली, लग रही थी आकाशगंगा 
    और खोज जारी थी मेरे लिए धधकते गुलाबी दिल की 
    कुछ बृहस्पति ग्रह की तरह

    खिलखिलाहट और मेरी खीज 
    अन्योनाश्रय संबंधो में बंधा प्रेम ही तो था 
    जिस वजह से 
    झूलती चोटियों के साथ तुम्हारी मुस्कुराती, गाती आँखें
    और चौड़ा चमकता माथा 
    चमकीली किरणों सा आसमान एक
    जो फैलकर 
    बताता सूर्योदय के साथ
    कि पकी बालियों सी फसल बस कटने वाली है 
    या फिर 
    कुम्भ सा पवित्र चेहरा तो नहीं तुम्हारा 
    जहाँ त्रिवेणी छमकते हुए मिट जाती हैं

    सुनो मेरी खीज से परे 
    बस तुम खिलखिलाना 
    सौगंध है तुम्हें
    ताकि बस तुम हो तो लगे ऐसा कि 
    मेरे आसमान में भी उगती है धनक,
    कभी न कभी 
    बारिश के बाद निकलती है एक टुकड़ा धूप 
    और खिलती है फ़िज़ा
    सिर्फ मेरे लिए 
    सुन रहे हो न मेरी आकाश गंगा

    सुनो कि 
    बार बार हूँ कह रहा
    खूब खिलखिलाती रहना 
    महसूस करना
    मेरे साथ बह रही एक नदी 
    मचलती, बिफरती, डूबती, उतराती
    जीवंत खिलखिलाती नदी 
    बेशक मुझपर पड़ती रहे 
    मासूम बूंदों की फुहार … 
    याद रखना नदियाँ चुप नहीं रहती

    समझे ना !

    Mukesh Kumar Sinha

  • रामभरोसे जलेबी जासूस (कहानी )

    रामभरोसे जलेबी जासूस (कहानी )

    Gourang 

    रामभरोसे कई दिनों से उसे नोटिस कर रहा था। वह सवेरे ही आकर एक बेंच कब्जा लेता और जाने क्या अपने में सोचता रहता। उसके पीठ पीछे हरे रंग का एक झोला टंगा होता। झोला भी क्या मानो खूब इस्तेमाल किया हुआ। रंग बिलकुल उजड़ा हुआ था, मगर मजबूत था और कुछ वजनी भी था। कई दिनों से उसे देखते रहने से रामभरोसे को पता था कि उस बैग में एक लैपटाप था, जिसे वह निकालता और गोद में रख लेता। फिर कुछ टाईप भी करने लगता। मगर हमेशा नहीं। अमूमन तो वह अपने बेतरतीब बालों और दाढ़ी में हाथ फेरेते हुए कुछ सोचता ही रहता। रामभरोसे कुछ कौतुहुल से ही उस पर नजर रखता। वैसे रामभरोसे अकेला नहीं था, आस-पास के रेगुलर कस्टमर की भी उस पर नजर थी। वे आपस में छुपकर खुसुर-पुसुर से बतियाते। रामभरोसे के कान खूब तेज थे। हाथ काम करते मगर वह आस-पास के बातों पर कान रखता। उस दिन उसने सुना।
    एक ने कहा – “कोई रिसर्च वाला लगता है।” 
    दूसरे ने कहा – “मुझे तो कोई जासूस लगता है, ये लोग स्वांग धरने में माहिर होते हैं।”
    तीसरे को जासूस वाली आईडिया कुछ जमने लगी तो वह भी बात आगे बढ़ा दिया – “ठीक कह रहे हो भाई, आजकल इधर बहुत हलचल बढ़ गई है।”
    पहले को अपनी थ्योरी पिटती नजर आई। वह प्रोटेस्ट के सुर में बोला – “खामख्वाह? इसके बेतरतीब बाल, बढ़ी दाढ़ी, खद्दर के कुर्ते और उजड़े जींस, खोई-खोई आँखें देखो। फिर, खाने का भी कोई ठिकाना नहीं। अरे, मैं तो बोलूँ जिसे रामभरोसे के गरम-गरम दूध-जलेबी भी खींच न सके, वह दार्शनिक नहीं तो और क्या?” वह रामभरोसे को अपने पाले में खींचने की कोशिश में बोला। 
    रामभरोसे को उसके बात में कुछ दम भी नजर आया। आम कस्टमर से इसका एक बुनियादी फर्क था, वह कुछ खाता-पीता न था। कोई आर्डर भी नहीं। पहले दिन तो रामभरोसे को इस सरफिरे पर बड़ा गुस्सा आया, कोई आर्डर नहीं, बस बेंच कब्जाये बैठा है। मगर शाम को जाते-जाते वह रामभरोसे को पचास का एक नोट पकड़ाया और बड़े मुलायम स्वर में कह गया – “इस बेंच को मेरे लिए रिजर्व रख दीजिये।” तो एक एग्रीमेंट सा ही हो गया, दिहाड़ी का पचास रुपया। लोग भी उस बेंच पर बैठने से परहेज करते। जो हो, रामभरोसे ने पहले को देख हामी में सर हिलाया और फिर गरम जलेबियों को चीनी के चासनी में डुबोया।
    दूसरा अब भी जासूसी के दलील पर कायम था। फिर उसे दार्शनिक की थ्योरी में कोई थ्रिल भी अनुभव नहीं हुआ। वह कदरन ऊँचे आवाज में बोला – “यही तो करिश्मा है। जैसा मेक-अप वैसा ही एक्टिंग, अगर धर ही लिए तो जासूस क्या?”
    तीसरे ने भी दुक्की लगाई – “बिलकुल सही कहे, फिल्म में भी तो ऐसा ही दिखाता है।”
    पहला अच्छा तर्कवीर था। झट दूसरे को काट दिया – “मगर यहाँ जासूसी के लिए रखा क्या है? आधा गाँव आधा शहर में कौन सा तेल का कूँआ निकला है जो जासूस पग धरेगा? यहाँ तो बस एक हमारा रामभरोसे ही है दूध-जलेबी लेकर। फिर तो ये जलेबी जासूस ही है।” मौज हो गई। सब हँसने लगे। दूसरे की भद पिट गई। तीसरा भी मूँह छुपाने लगा। 
    बात कुछ तभी के लिए खत्म हो गई। मगर रामभरोसे के लिए खत्म न थी। आखिर यह आदमी सप्ताह भर से आकर यहाँ पड़ा क्यों है? कोई जवाब तो होना चाहिए। वह मन ही मन स्थिर कर लिया। शाम को जब परदेशी जाने को हुआ तो उससे रुपये लेने के बाद आखिर रामभरोसे ने पूछ ही लिया – “साहेब, यहाँ रहे कहाँ हैं?” 
    परदेशी मुस्कुराया। अपनी बैक-पैक को पीठ में एडजेस्ट करते हुए बोला – “नदी के उस पार।“ 
    “उस पार? अरे उधर तो जंगल है।” रामभरोसे अचकचाया। 
    “वहीं कुछ मछुआरे भी रहते हैं। वहीं रह रहा हूँ। हर दिन वे नाव से इस पार छोड़ देते हैं। फिर शाम ढले ले जाते हैं।” परदेशी का शांत मीठा आवाज भी रामभरोसे के हैरानी को कम न कर सका। 
    “अरे साहेब, आप इतना बड़ा आदमी, उस गंदी बस्ती में रहने की क्या जरूरत है? हमसे कहिए, हम यहाँ आपकी रहने की व्यवस्था कर देंगे। वैसे भी लोग न जाने क्या-क्या कह रहे हैं।” रामभरोसे को परदेशी से सहानुभूति हो गई थी। 
    परदेशी ने फिर मुसकुराते हुए जवाब दिया – “पता है। मगर मैं वहीं ठीक हूँ।” 
    रामभरोसे फिर फेर में पड़ गया। वह असमंजस में पूछा – “तो लोग सही कह रहे हैं?” 
    परदेशी बोला – “आधा सच। एक लेखक किसी जासूस से कुछ कम नहीं होता। वह किरदारों की जासूसी करता रहता है, फिर उसे कहानी में ढाल लेता है। मैं भी तो यही कर रहा हूँ।” 
    ब्रीफिंग पर रातों रात स्टोरी मुकम्मल हो गई। उस छोटे से शहर में हर जुबान पर एक ही कहानी थी – कोई परदेशी लेखक आया है जो राम भरोसे पर स्टोरी लिख रहा है। वह हर दिन घंटों आकर रामभरोसे को वाच करता रहता है।
    फिर अगले दिन रामभरोसे किसी हीरो से कम नहीं लग रहा था। खास हो गया था। दूध-जलेबी की बिक्री भी अचानक बढ़ गई। लोग जलेबी जासूस को देखने आने लगे। यही अब परदेशी का उपनाम हो गया। 
    उस दिन फिर एक कस्टमर ने रामभरोसे को छेड़ा – “तो रामभरोसे जी शूटिंग कब से शुरू है?” 
    “कैसा शूटिंग?” रामभरोसे आसमान से गिरा। 
    “अरे! आप छुपाएंगे और समझते है कि हमको कुच्छों पता नहीं चलेगा? अब हीरो बन ही गए हैं तो फिर इतना सीक्रेट वाला गेम काहे खेल रहे हैं?” 
    “कौन हीरो और कैसा सीक्रेट? ” रामभरोसे छटपटाया। 
    “अब हम ही से कहलवाना चाहते हैं? अब तो सारा शहर जान गया। आपका फिल्म बन रहा है, आप ही हीरो हैं। जलेबी जासूस यहाँ शूटिंग का लोकेशन तलाशने आया है। देखिये, हमारे लिए भी कोई छोटा-मोटा रोल निकलवाईए न, साईड वाला।” वह एक एक्टिंग का पोज लेते हुए बोला। 
    “अरे भंगी हो क्या? ई बे सिर पैर वाला बात कौन उड़ाया?” रामभरोसे बौखलाया। 
    मगर कौन सुने रामभरोसे की। लोग रामभरोसे को बधाई देने लगे। फिर कुछ ने जलेबी की आर्डर भी दे दिये और कहने लगे – “अपना राम भरोसे तो अब बंबई चला जाएगा, क्या पता फिर कभी उसके हाथों की बनी जलेबी मिले न मिले।”
    उलझन में भी खुशी तारी थी। धंधा जो चमक गया था। रामभरोसे दूकानदारी में पनाह खोजने लगा। मगर शाम को फिर बात और आगे निकल गई। कुछ लोगों ने परदेशी को घेर लिया। फिर खुशामद करने लगे – “एकाध रोल हमारे लिए भी निकालिए महाराज।“ कुछ तो बाकायदा पोज भी देने लगे। कुछ ने एक कदम आगे निकलकर दो चार फिल्म के हिट डायलाग भी सुना दिया। 
    परदेशी मुस्कुराया फिर मीठी आवाज में बोला – “वैसे तो ठीक है, मगर एक माईनोर सी टेंशन है। हिरोईन राजी नहीं हो रही। जो होगा हिरोईन का मामला सुलझने के बाद ही होगा। तब तक देखते हैं।” कहकर वह मुस्कुराकर निकल गया। लोगों ने खुशी से तालियाँ बजाई, शोर भी हुआ। 
    एक ने सुनते ही चुटकी लिया – “अरे हमसे कहे न, हम हिरोईन वाला रोल भी कर लेंगे। रामलीला में सीता वाला रोल तो किए ही हैं। फिर कौन मुश्किल काम है!” 
    शहर में अब कोई किन्तु, परंतु वाली बात ही न रही। अब रामभरोसे का दर्जा अब किसी स्टार से कम न था। लोग हीरोईन पर कयास लगाने लगे। रामभरोसे के भाग्य पर भी कुछ को ईर्ष्या हुई। रामभरोसे ने भी अगले दिन कुछ साफ और चमकदार कपड़े पहने, आखिर इतनी बातों से असर तो होता ही है। वह भी कुछ जोश में था, मगर उसे अपने बारे में परदेशी बाबू से पूछने में शर्म सी हो रही थी। वह कभी-कभी शरमाकर उसे देख लेता। कस्टमर छेड़ रहे थे, मगर आज उसे गुस्सा नहीं आ रहा था, वह कुछ लाजुक सा हँसते-हँसते ही दूकानदारी कर रहा था। 
    इसी तरह दिन बीता। जलेबी जासूस जाने को हुआ तो कुछ लोगों ने फिर घेर लिया – “हीरोईन का मामला सुलझा?” 
    परदेशी हँसते हुए बोला – “करीब-करीब।” 
    “फिर कब से शुरू कर रहे हैं?” एक आवाज आई। 
    “बस, अब कल फ़ाईनल हो जाएगा।” वह विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन बोला। 
    “हमारा ख्याल तो रखिएगा न!” कई आवाजें एक साथ आई। 
    “जरूर, जरूर।” कहता हुआ वह निकाल गया। 
    शहर भर में अब एक ही चर्चा थी। लोगों ने फिल्म का नाम भी दे डाला था – ‘रामभरोसे जलेबी जासूस’, वैसे तो यह दोनों के जुगलबंदी की बावद टाईटल बनी थी, मगर शहर वालों को भा गई थी। अगले दिन रामभरोसे के दुकान के आगे अच्छी-ख़ासी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। लोग उत्सुक थे, उन्हे भरपूर तमाशा की उम्मीद थी, कुछ को इसमें मौके भी नजर आ रहे थे। 
    मगर परदेशी न आया। रामभरोसे भी नदारद था। लोगों ने स्वाभाविक अनुमान लगाया कि फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। काफी देर लोग खड़े रहे। अपनी-अपनी राय जाहिर करने लगे। किसी ने कहा – मुहूर्त किसी मंदिर में रखा होगा, वहीं होंगे दोनों। दूसरे ने कहा – शूटिंग से पहले रिहर्सल करना पड़ता है, वही चल रहा होगा। तीसरे ने रोस प्रकट किया – हमारा तो ख्याल न रखा। किसी और ने कहा – जो हो, शहर का नाम रौशन हो गया। हर मुँह नए-नए कयास थे। दिन निकलता रहा, बातें जारी रही। मगर काफी देर तक कोई न आया। दोपहर हो गया। अब भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी। कोई कितना धीरज धरे। इसी तरह शाम होने को आया। 
    आखिर रामभरोसे आया। वह काफी थका हुआ था। उसके चेहरे पर फटकार बरस रही थी, रंग उजड़ा हुआ था। वह भारी कदम जाकर परदेशी के बेंच पर ही बैठ गया, और ऊपर की ओर देखने लगा। उसे चन्दन राय की दुमंजिला साफ दिखने लगी। दुमंजिला इमारत की खिड़की अमूमन खुली रहती थी मगर आज बंद थी। इने-गिने लोग वहाँ फिर भी थे। उन्होंने उसे घेर लिया। वे भी पास बैठ गए। एक ने धीरे से पूछा – “शूटिंग बहुत मेहनत वाला काम है न!” 
    रामभरोसे कुछ न बोला। वह एकटक खिड़की को देखने लगा। 
    एक दूसरा आदमी बोला – “डिस्टार्ब मत करो इसको अभी, कल के शूटिंग का रिहर्सल कर रहा है।” 
    रामभरोसे से रहा न गया। वह क्रोध में फट पड़ा और बोला – “फराड है वह। चन्दन राय के लड़की को भगा के ले गया है। यहीं से हर दिन उससे लैपटॉप में चैट करता था। बंद खिड़की देख रहे हो, वहीं से इशारेबाजी होती थी।” सबने बंद खिड़की को देखा। 
    रामभरोसे फिर रूआंसे बोला – “अभी हम थाना से आ रहे है। सवेरे से बहुत खिंचाई हुई हमारी। बहुत हाथ-पैर धर कर छूटे हैं हम।“ 
    सब अवाक होकर कभी रामभरोसे कभी बंद खिड़की को देख रहे थे।

    Gourang


    Gourang

  • युध्द, राष्ट्र और राजा

    युध्द, राष्ट्र और राजा

    Bhanwar Meghwanshi

    एक दौर की बात है,
    एक देश था,एक राजा था
    चुना हुआ प्रतिनिधि
    पर उसे राजा होने का
    गुमान था।

    देश के लिए,देश के नाम पर
    उसने सब कुछ किया।
    कुर्बानियां दी,बलिदान किये
    शहादतें करवाई।
    वैसे ही,जैसे हर राजा करवाता है ।

    राजा –
    मरवाता रहा सैनिक
    प्रजा –
    देती रही श्रद्धांजलियाँ

    रह रह कर
    उठता रहा ज्वार 
    राष्ट्रभक्ति का ..

    चलती रही गोलियां 
    होते रहे विस्फोट
    मरते रहे सैनिक
    बहता रहा लहू 
    चीखते रहे चैनल्स

    प्रजा 
    मनाती रही शोक
    शहीदों को चढ़ाती रही पुष्प

    राजा 
    करता रहा राज 
    इसके अलावा वह 
    कर भी क्या सकता था बेचारा ?

    शहादत का ज्वार 
    उठता रहा,गिरता रहा
    कूटनीति का वार
    चलता रहा,छलता रहा।

    देशभक्त जनता
    सड़कों पर आ गई
    आक्रोश कर गया हद पार 
    युद्ध करो,युद्ध करो
    के नारे गूंजने लगे।

    जब युद्ध का उन्माद 
    फैल गया पूरे राष्ट्र में 
    तब राजा ने
    दुखी राष्ट्र को संबोधित किया
    आक्रोशित राष्ट्र के नाम सन्देश दिया

    राष्ट्र से की
    अपने मन की बात
    राष्ट्र के नाम पर खरीदे हथियार
    राष्ट्र के नाम पर लड़ा गया चुनाव
    और राष्ट्र ही के नाम पर जीता भी

    राजा बड़ा नेक था
    और राष्ट्रभक्त भी
    उसने सब कुछ
    राष्ट्र के नाम पर किया

    तब से राष्ट्र और राजा में 
    कोई फर्क ही नहीं बचा
    राजा ही राष्ट्र हो गया 
    और राष्ट्र ही राजा 
    इस तरह अवतरित हुआ
    ” राष्ट्र राज्य .”

    उसके बाद 
    फिर वहां 
    न चुनाव की जरुरत पड़ी
    न लोकतंत्र की,
    और न ही संविधान की
    सारे झमेलों से
    मुक्त हो गया राष्ट्र
    इस तरह राष्ट्र के लिए
    बहुत उपयोगी साबित हुआ युद्ध

    Bhanwar Meghwanshi