Category: सामाजिक यायावर

  • स्त्री के प्रति हमारा नजरिया और शुचिता का आडंबर

    स्त्री के प्रति हमारा नजरिया और शुचिता का आडंबर

    Vivek “सामाजिक यायावर” 
    मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक से

    स्त्री को माहवारी झेलना पड़ता है, स्त्री गर्भवती होती है, स्त्री अपने गर्भ में बच्चे को नौ महीने पालती है और एक दिन स्त्री बच्चे को अपने यौनांग से धरती पर अवतरित कराती है। जीवन देने की क्षमता के कारण स्त्री के आंतरिक शरीर की बनावट पुरुष से भिन्न होती है। इसलिए पुरुष व स्त्री दोनो को ही स्त्री शरीर के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, यह संवेदनशीलता स्त्री शरीर के प्रति समुचित जानकारी के बिना नहीं आ सकती है।

    देश की अधिकतर महिलाएं किसी न किसी स्त्री रोग से पीड़ित रहती है और अपने ही परिवार में संकोचवश, लज्जावश कुछ कह नहीं पाती हैं क्योंकि परंपरा में उनको यह बताया गया है कि स्त्री व स्त्री के गुप्तांग इतने दूषित होते हैं कि उन अंगों का नाम लेना भी टुच्चापन है। बिचारी महिला आजीवन शारीरिक कष्ट केवल इस कारण भोगती है क्योंकि स्त्री गुप्तांगों का नाम लेना ओछापन, अभद्रता व कुसंस्कार है। पुरुष को स्त्री अंगों की जानकारी नहीं होती और उसे बताया जाता है कि स्त्री दूषित है, स्त्री अंग दूषित हैं इसलिए वह स्त्री के प्रति संवेदनशील भी नहीं हो पाता।

    यकीन मानिए यदि हम यौनांगों को दूषित मानने की बजाय शरीर का महत्वपूर्ण अंग मानना शुरु कर दें, तो हमें गुप्तरोगों के हाशमी दवाखानों, गुप्तरोगों के जैन क्लीनिकों, सुहागरात की रात में सैकड़ों रुपए की कीमत का पलंगतोड़-पान खाने व दूध का गिलास पीने आदि की जरूरत नहीं रहेगी।

    संस्कृति, संस्कार, संभ्रांतता व भद्रता आदि के कारण के यौनांगों का नाम लेने को दूषित मानने की परंपरा के कारण बच्चे से लेकर वृद्ध तक अपनी शारीरिक परेशानियों को खुल कर व्यक्त न करने वाले हम लोगों के सामाजिक मूल्यों को जीने के दावों की, तो हम जानते हैं कि – हमने अपवाद छोड़ हर गाली स्त्री अंगों व स्त्री के रिश्तेदारों तक ही सीमित कर रखी है। हम दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बनने का दैवीय सौभाग्य प्राप्त करने जा रहे हैं। हम दलित महिलाओं को नंगा करके बीच चौराहे घुमा देते हैं, भले ही महिला के यौनांग का नाम अपने मुंह से न लेते हों। हम छोटी-छोटी बच्चियों का बलात्कार करके उनके नंगे शरीर के चीथड़े चौराहों में छोड़ देते हैं ताकि हम लोग फोटो लेकर सोशल साइट्स में साझा कर सकें और महिला शोषण पर अपने क्रांतिकारी विचार रख सकें।

    हमारे समाज में सामाजिक शुचिता को जीना बड़ा आसान है। शुचिता के लिए कर्मशील होना जरूरी नहीं, शब्दों के आडंबर को जीना जरूरी है। अपने रिश्तेदारों या परिवार की किसी बच्ची का यौन शोषण करने वाला भी शाब्दिक ढकोसलेबाजी करके खुद को आजीवन शुचिता का ठेकेदार साबित करता रह सकता है जबकि एक दिल का साफ आदमी केवल इस कारण चरित्रहीन घोषित किया जा सकता है क्योंकि वह लोगों के सामने स्थानीय भाषा में स्त्री गुप्तागों का नाम ले लेता है।

    हमारे देश में शुचिता का ढोंग इस कदर जिया जाता है कि स्त्री अंगों का नाम लेना भी गुनाह माना जाता है जबकि ऐसे हजारों सच्चे किस्से हैं जिनमें पिता अपनी पुत्री से बलात्कार करता है, भाई अपनी बहन से बलात्कार करता है, न केवल बलात्कार करते हैं बल्कि स्थायी रूप से उनको अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। भारत में लड़कियों की कुल जनसंख्या की आधी से बहुत अधिक संख्या, किसी न किसी प्रकार का यौन-शोषण झेलती है और अधिकतर अपने परिवार के सदस्यों या निकट रिश्तेदारों से ही झेलती है। लेकिन कभी अपना विरोध नहीं दर्ज करा पाती है। बहुत सारे ऐसे ढोंगी लोग होगें जिन्होने किसी न किसी न बच्ची का किसी न किसी प्रकार से यौन शोषण किया होगा, लेकिन समाज के सामने शुचिता के ठेकेदार व लंबरदार बने घूमते हैं।

    क्या हमें संस्कृति व संस्कारों के दिखावों व ढोंगों को बंद नहीं कर देना चाहिए? हमें अपने वास्तविक चरित्र, सोच व मानसिकता के यथार्थ को स्वीकार करते हुए स्वयं में बदलाव का प्रयास करते हुए स्त्री के प्रति हमें वास्तव में संवेदनशील होने का प्रयास नहीं करना चाहिए। समाज की नैतिकता या संस्कृति की समृद्धि शाब्दिक ढोंगों से नहीं होती लोगों के कर्म व वास्तविक चरित्र से होती है।

  • भारतीय जाति-व्यवस्था ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने वाली सामाजिक-दासत्व व्यवस्था है

    भारतीय जाति-व्यवस्था ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने वाली सामाजिक-दासत्व व्यवस्था है

    Vivek “सामाजिक यायावर” 

    भारतीय जाति-व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था न होकर, श्रम को तिरस्कृत मानने वाली सामाजिक दासत्व को स्थापित करने वाली व्यवस्था थी। दरअसल जाति-व्यवस्था कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था हो ही नहीं सकती थी। वास्तव में जाति-व्यवस्था समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व श्रमशीलता को तिरस्कृत करने की मानसिकता का आधारभूत पोषक तत्व है। भारतीय जाति-व्यवस्था के नियम, विधियां व मान्यतायें आदि ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने के आधार पर स्थापित थे, और आज भी कमोवेश वैसे ही है। शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों को उपेक्षित व तिरस्कृत जातियों में रखा गया, उनके सामाजिक संपत्तियों पर अधिकार नगण्य थे, व्यक्तिगत संपत्ति रखने के, शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बनने के सहज, सरल व समान अधिकार नहीं थे। समाज की मुख्यधारा में उनका कोई स्थान नहीं था। वे शारीरिक श्रम करने वाले, मुख्य सामाजिक व्यवस्था से अलग तिरस्कृत सामाजिक-दास व्यवस्था में रहने के लिए  विवश सामाजिक-गुलाम थे।

    मानव समाज का विकास और सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं आदि का उन्मूलन व समाधान आदि  बिना वैज्ञानिक दृष्टि आधार के नहीं प्राप्त किया जा सकता है।  किसी सामाजिक व्यवस्था की मूल अवधारणा की प्रामाणिकता को उसके विभिन्न तत्वों के आधार पर ही विश्लेषित किया जा सकता है। अवधारणा की प्रामाणिकता को जबरन साबित करने के लिए  सुविधानुसार मनचाहे तत्वों व तथ्यों को ही प्रमाणिक मान लेने से वास्तविक तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं हो पाता है। शोषक वर्ग द्वारा प्रायोजित व लिखित ग्रंथों में जो लिखा है उसको ही प्रमाणित मानने के स्थान पर यदि व्यावहारिकता व तर्कों के आधार पर यह स्वीकारते हुए कि मानव व मानव समाज समय के साथ सीखता है और परिपक्वता की ओर गति करता है, तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखने लगता है कि जाति-व्यवस्था ईश्वरीय व प्राकृतिक व्यवस्था न होकर, मनुष्य-निर्मित बहुत ही सोची समझी, चतुराई व कपट के साथ स्थापित सामाजिक दासत्व की कपटी व्यवस्था थी।

    जाति-व्यवस्था के मूलभूत-कारकों को समझने के लिए , हमें जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल्यांकन करना पड़ेगा। जाति-व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था मानने का मतलब है कि बहुत सारे ऊलजुलूल, अव्यावहारिक व मनगढ़ंत तथ्यों को, भलीभांति जानते हुए कि वे नितांत ही अपुष्ट व निराधार तथ्य हैं, स्वीकारना पड़ेगा।

    वर्तमान पीढ़ी ही भविष्य की पीढ़ियों की समझ का आधार होती है। हम जो बीज आज बोते हैं, जिन व्यवस्थाओं का निर्माण करते हैं, उनके आधार पर भविष्य की पीढ़ियां अपने जीवन में सामाजिक-अनुकूलन स्वीकारती हैं। इसलिए   जाति-व्यवस्था रूपी सामाजिक-दासत्व की व्यवस्था के स्थापना काल में ऐसे नियम व विधियाँ बनाइ गईं; ऐसा साहित्य व इतिहास आदि लिखा व प्रायोजित किया गया कि सामाजिक-दासत्व की यह व्यवस्था शोषक वर्ग द्वारा स्थापित व्यवस्था के स्थान पर ईश्वरीय प्रावधान व मनुष्य के पूर्व-जन्मों के कर्मों की नियति-व्यवस्था प्रमाणित हो।

    धूर्ततापूर्ण चतुराई के साथ प्रायोजित व स्थापित सामाजिक-दासत्व व्यवस्था को समय के साथ पूर्व में रही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था मान लिया गया। चूंकि समाज के बहुसंख्यक ‘अवर्णों’ के पास संपत्ति, शिक्षा, ज्ञान व आत्मसम्मान के अधिकार नहीं थे, और बहुसंख्यक अवर्णों के परिश्रम के उत्पाद पर अल्पसंख्यक सवर्णों का अधिकार होता था, लालच व स्वार्थ के कारण सवर्णों ने जाति-व्यवस्था को और मजबूत ही किया और कालांतर में यह व्यवस्था पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित दैवीय प्रयोजन व व्यवस्था के रूप में स्वीकृत व प्रमाणित मान ली गई।

    जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में कमी का आना

    जाति-व्यवस्था की वीभत्सता व घिनौनापन महापुरुष बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर, महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी, अंग्रेजों आदि के कारण कुछ औंस कम हुई। फिर भारत की राजनैतिक आजादी के बाद समाज के सबसे दबे-कुचले शोषित वर्ग के लिए  शिक्षा व सरकारी नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण के कारण, कुछ आर्थिक व राजनैतिक शक्ति मिलने से स्थितियां पहले से बेहतर हुईं। जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में जो कुछ अंतर अभी आ रहे हैं, उसके तीन प्रमुख कारण हैं। जिनके परिणामस्वरूप, शोषक समाज को शोषित वर्ग के साथ अपने व्यवहारों में दिखावटी तौर पर ही सही लेकिन कुछ अंतर, न चाहते हुए भी करने के लिए  विवश होना पड़ा।

    एक- संवैधानिक आरक्षण के कारण शोषित समाज के लोगों की बढ़ती आर्थिक व राजनैतिक शक्ति। 

    दो- शिक्षा व ज्ञान के अवसरों के कारण बढ़ती जागरूकता।

    तीन- विकसित देशों में रहकर उच्चशिक्षा ग्रहण करने वाले सवर्णों में से ऐसे ईमानदार मानवीय व सामाजिक सोच के लोग जिनकी समझ में आ गया कि जाति-व्यवस्था दैवीय प्रावधान न होकर सामाजिक दासत्व की व्यवस्था है – का भारत के शोषित समाज के उत्थान के लिए  काम करने का प्रयत्न करना। भले ही ऐसे लोगों का प्रतिशत नगण्य हो।

    इन तीन कारकों के कारण शोषित समाज की शक्ति व दावेदारी मुख्य रूप से बढ़ी और जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में कुछ कमी आई।


    यह लेख मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर पुस्तक से लिया गया है।


  • पौराणिक मनगढ़ंत दैवीय कथाएं व वैदिक-काल की तथाकथित महानता बनाम मनुष्य की कर्मशीलता

    पौराणिक मनगढ़ंत दैवीय कथाएं व वैदिक-काल की तथाकथित महानता बनाम मनुष्य की कर्मशीलता

    हर सभ्यता व धर्म की अपनी पौराणिक कथायें होती हैं, जो काल्पनिक होती हैं। सभ्यता के लोग काल्पनिक कहानियों को सच मानकर अपनी सभ्यता की गति अवरुद्ध कर देते हैं कभी-कभी तो गति का यह ठहराव उन लोगों को हिंसक तक बना बना देता है। किसी भी सभ्यता या धर्म की अधिकतर पौराणिक कथायें, उस सभ्यता के लोगों के मानसिक अनुगमन व भावनात्मक आस्था के अनुकूलन की स्थापना के लिए ही लिखी जाती हैं। यही कारण है कि पौराणिक कथायें, कथाओं में सत्य तथ्यों के अस्तित्व का भ्रामक अनुभव कराती हुई, मनुष्य सभ्यता के विकास का दावा करते हुए उसको अपनी अनुकूलता की घेरेबंदी में मजबूती से बंद रखती हैं। वैदिक काल के समय के दावेदार साहित्य, महाग्रंथों, महाकव्यों आदि में उद्धत कथाओं को यदि संज्ञान में लिया जाए तो वैदिक काल में मानव समाज एक आदर्श समाज था, जीवन मंगलमय था, व्यवस्था कल्याणकारी थी, सब कुछ संतुलित व व्यवस्थित था। धर्म, विज्ञान, तकनीक व मानव का विकास अपने चरम पर था। 

    हवन-यज्ञ आदि समय समय पर होते रहने, हर घर में पूजापाठ होते रहने, मनुष्य के धार्मिक कर्मकांडों में रत रहने आदि  के कारण, मनुष्य का ईश्वरीय सत्ता व तंत्र से बेहतर संबंध थे। संबंधों की मधुरता का स्तर यह था कि आवाहन करने पर देवलोक व ब्रह्मलोक से देवगण और ईश्वर के प्रतिनिधि लोग मानवों से मिलने, उनके मुद्दों को समझने और ईश्वर की कल्याणकारी योजनाओं की स्थिति-गति जानने समझने के लिए आते रहते थे।

    ऐसा माना जाता है कि वैदिक काल में हम आज के पाश्चात्य विज्ञान की तुलना में हजारों लाखों साल आगे का उन्नत विज्ञान रखते थे। हमें यह तक पता था कि ब्रह्मा जी का एक दिन लगभग 4 अरब वर्ष का होता है और रात भी लगभग 4 अरब वर्ष की होती थी और ब्रह्मा जी का पूरा दिन (मतलब कुल लगभग 8 अरब साल) गुजरने पर “प्रलय” होती है। हमने हर बात की गणना कर रखी थी और हमारा दावा है कि सब कुछ वैज्ञानिकी था और सच्चे तथ्यों पर आधारित था।

    अपनी सभ्यता की श्रेष्ठता को प्रमाणित करने के लिए इन दावों को करते हुये, हम एक तथ्य भूल जाते हैं कि लगभग हमारा पौराणिक साहित्य, महाग्रंथ, महाकाव्य आदि की लगभग प्रत्येक घटना दैवीय व ईश्वरीय इच्छा, संबंध व सहयोग पर निर्भर थी। छोटी से छोटी बात अर्थात् निंद्रा के लिए बिस्तर किस धातु का बना हो, किस दिशा में हो, पैर व सिर किस दिशा में हो से लेकर परमाणु आयुध व पुष्पक विमान आदि आदि तक प्रत्येक बात के लिए हमें दैवीय व ईश्वरीय निर्देश का पालन करना पड़ता था, हम पूरी तरह से ईश्वरीय व दैवीय सहायताओं पर ही निर्भर थे। आइए इस बात का विश्लेषण करते हुए समझने की चेष्टा की जाए।

    मान लीजिए किसी राजा को राक्षसों से अपने राज्य की रक्षा के लिए , अपने राज्य में शांति स्थापित करने के लिए  अत्याधुनिक आयुध चाहिये, तो उसको अपने राज्य में वैज्ञानिक संस्थानोंं, तकनीकी संस्थानोंं आदि की स्थापना करने की आवश्यकता नहीं है। राजा को या राजपरिवार के किसी व्यक्ति को जंगल में, पर्वत में, पानी में या कहीं और जाकर चुपचाप उस आयुध को धारण करने वाले देवता के नाम का जाप कई वर्ष तक करना है और देवता को प्रसन्न करके आयुध प्राप्त कर लेना है। पुष्पक विमान चाहिएतो उसको रखने वाले देवता के नाम का जाप रूपी तप कर लिया और पुष्पक विमान प्राप्त कर लिया। मनुष्य को जिस भी गुण, वस्तु, सुविधा आदि की इच्छा हुई तो उसको धारण करने वाले देवी या देवता जेसे कि बुद्धि नहीं है तो बुद्धि की देवी, धन नहीं है तो धन की देवी, यौवन नहीं है तो यौवन के देवता आदि को उपयुक्त धार्मिक कर्मकांड से प्रसन्न कर लीजिए और अपनी इच्छानुसार गुण, वस्तु व सुविधा आदि बना बनाया प्राप्त कर लीजिए। तात्पर्य यह कि हर चिल्लर बात के लिए भी दैवीय व ईश्वरीय सहायता उपलब्ध थी, बस धारण करने वाले देवता का नाम, पता और उसको प्रसन्न करने का कर्मकांड करना आता हो, मंत्र आता हो।

    कोई आदमी बीमार है उसे आक्सीजन चाहिए तो प्रतापी चिकित्सक महोदय ने मंत्र का जाप किया और “पवन” देवता आक्सीजन लेकर दरवाजे पर उपस्थित। आक्सीजन के निर्माण की प्रक्रिया जानने समझने की कोई आवश्यकता नहीं, आक्सीजन के लिए किसी यंत्र की कोई आवश्यकता नहीं। मनुष्य व देवताओं के मध्य संबंधों की प्रामाणिकता की वजह से पवन देवता मंत्रों व कर्मकांडों द्वारा आवाहन किएजाने पर आक्सीजन लेकर रोगी मनुष्य की सहायता के लिए  प्रस्तुत। 

    वर्षा नहीं हो रही है तो वर्षा के देवता का आवाहन कीजिए अपनी समस्या उनके समक्ष रखिए, देवता को प्रसन्न करने के लिए  यथोचित कर्मकांड कीजिए और देवता वर्षा करा देगा। दैवीय व्यवस्थाओं के कारण चूंकि वर्ष के कुछ महीनों के अतिरिक्त वर्षा का प्रबंध करना देवता के लिए  भी संभव नहीं तो नदियों को धारण करने वाले ईश्वरीय प्रतिनिधि के नाम का जाप करके प्रसन्न करके नदियों को देवलोक से धरती पर उतार कर लाया जा सकता था। वर्षा संग्रहण, जल संग्रहण आदि तकनीक को जानने, समझने व विकसित करने की आवश्यकता नहीं है।

    किसी महिला का पति नपुंसक है कोई बात नहीं। महिला मनचाहे देवता के आवाहन के लिए  मंत्र जाप व कर्मकांड  करती थी, और देवता उस महिला के साथ यौनसंबंध स्थापित करके संतान उत्पत्ति में भी सहयोग करने के लिए उपलब्ध।

    नदियां, पर्वत, समुद्र आदि परिवार वाले होते थे, उनके पति/पत्नी/पुत्र/पुत्री/भाई/बहन आदि होते थे और कभी कभार तो इनके पारिवारिक सदस्यों के विवाह व यौन संबंध मनुष्यों के साथ होते थे। मनुष्यों व पशुओं, मनुष्यों व पक्षियों, मनुष्यों व जलचरों आदि के मध्य यौनक्रिया हो सकती थी और संताने भी होती थी।

    यदि पौराणिक गाथाओं को सच भी मान लिया जाएतो इस तथाकथित उच्च-पराकाष्ठा वाली अति-उन्नति के पीछे का आधार मनुष्य की अपनी कर्मशीलता नहीं वरन् दैवीय व ईश्वरीय सहायता व प्रयोजन थे। मनुष्य हर छोटी-छोटी बात के लिए देवताओं व ईश्वर की सहायता पर निर्भर थे। लोग कुछ नहीं करते थे, लोग कुछ नहीं बनाते थे, कुछ निर्मित नहीं करते थे। लोग तो देवताओं व ईश्वरीय सहायता से बना बनाया प्राप्त करते थे।

    इतना सब कुछ मिलने के बदले में मनुष्य को हर क्षण ईश्वर भक्ति में लिप्त रहना पड़ता था। हर क्षण भक्ति में रहना पड़ता था। ईश्वर के विभिन्न नामों का जाप, प्रसन्न करने की विभिन्न विधियां, हवन-यज्ञ व बलि आदि का कर्मकांड निरंतर करते रहना पड़ता था। हर क्षण इस बात के लिए  सतर्कता रखनी पड़ती थी कि किसी छोटी सी त्रुटि से देवता क्रोधित न हो जायें।

    कर्मकांडों में किंचित भी मात्र त्रुटि न हो, इसलिए  कर्मकांडों के विशेषज्ञ रखे गए होगें। जिन्हे “ब्रह्म” के मामलों की विशेषज्ञता रखने के कारण “ब्राह्मण” कहा गया होगा। सांसारिक कामों के चक्कर में “ब्राह्मणों” को अपनी थोड़ी सी भी ऊर्जा का अपव्यय न करना पड़े, इसलिए  वे जिसके भी दरवाजे पहुंच जाते थे और जो भी बोल देते थे वह यजमान को करना ही होता था। और ऐसा न करने पर यजमान के लिए  दंड व प्रताड़ना का प्रावधान था। बहुत बार तो विशेषज्ञ लोग क्रोधित होकर देवताओं से यजमान को दंडित करवाते थे, जिसे उस समय की तकनीकी भाषा में “श्राप” देना कहा गया होगा। 

    ब्राह्मण को भी पारलौलिक सत्ता से संवाद व संपर्क में बने रहने के लिए हमेशा पवित्र रहना पड़ता था। इसलिए   दिन में कई बार नहाना, स्वच्छ वस्त्र पहनना, बदबूदार चीजों जैसे लहसुन व प्याज आदि नहीं खाना, अपनी टट्टी नहीं साफ करना इसलिए  उनकी टट्टी साफ करने वालों की अलग जमात बनाई गई और यह निर्धारित किया गया कि इस जमात के लोगों को चलते समय अपने पदचिन्हों को भी साफ करते हुए चलना पड़ेगा ताकि ब्राह्मण उन पदचिन्हों पर अपना पैर रखकर अपवित्र न हो जाए।

    माथे पर चंदन का लंबा तिलक ताकि मन में सुगंध व शीतलता व्याप्त रहे, जिससे देवताओं से संवाद करते समय व्यवहार में शीतलता रहे। सिर में लंबी चोटी रखना ताकि देवगणों व ईश्वरीय व्यवस्था से अदृश्य तरंगों द्वारा सीधा संपर्क व संवाद बना रहे। इन ब्राह्मणों ने देवताओं के साथ संपर्क व संवाद के अनुभवों के आधार पर ग्रंथ व पुराण लिखे। जिनमें विस्तार से वर्णन किया गया कि किस मामले का देवता कौन है, और किस देवता को किस समय और किन तरीको से कितनी देर के लिए किस काम के लिए आवाहित किया जा सकता है। ग्रंथ व पुराण पढ़िएऔर मनचाहे देवता को वर्णित कर्मकांड से आवाहित कीजिएऔर अपनी इच्छा पूर्ति कीजिए।

    मानव जीवन का हर एक क्षण देवताओं की दृष्टि, गणना व लेखे-जोखे में होता था। शादी हो, बच्चा पैदा हो, बच्चे का नामकरण हो, युवा-युवती पहली बार यौन-क्रीडा करने जा रहे हों, पति-पत्नी संतान प्राप्ति के लिए यौन-क्रिया करने जा रहे हों आदि आदि अर्थात् हर एक क्षण का लेखा जोखा देवगणों के पास।   जीवन की हर क्रिया के लिए देवताओं का आवाहान, ताकि कुछ ऊंचनीच मतलब मनचाहा न होने पर देवताओं के समक्ष दावे किए जा सके। आदि आदि हजारों उदाहरण हैं, जो पौराणिक कथाओं में मिलते हैं, जिनसे उस समय की मानव-सभ्यता कितनी उन्नत थी यह मानना होता है।

    यदि यह मान लिया जाए कि वैदिक काल आदर्श व अति-पराकाष्ठा तक उन्नत था। तो भी इसका श्रेय मनुष्य की कर्मशीलता को न जाकर देवताओं व ईश्वरों की कर्मशीलता व उनके अंदर मनुष्यों के प्रति अथाह प्रेम को जाता है। मनुष्य तो केवल उनको खुश करने के लिए पूजा पाठ करता था, कर्मकांड करता था। यह भी मानना पड़ेगा कि उस समय के देवगण और ईश्वर भी बहुत विनम्र और कर्मशील होते थे, मनुष्य जीवन की हर क्रिया के समय आवाहित किएजाने पर आने को तैयार। हर एक मनुष्य का जन्म-जन्मांतर का संपूर्ण सूक्ष्म विस्तृत लेखाजोखा रखते थे और जरूरत पड़ने पर प्रस्तुत करते थे, ताकि व्यवस्था में त्रुटि न हो।

    यदि वैदिक काल की अवधारणाओं को सत्य माना जाए तो यह भी स्वीकारना पड़ेगा कि इतनी बेहतरीन दैवीय आदर्श व्यवस्था; दैवीय व ईश्वरीय सहायताओं, सुविधाओं व सहयोगों वाले देवों व मनुष्यों के मध्य प्रमाणित व विश्वसनीय संबंध टूटे और पूरी तरह से हमेशा के लिए  टूटे। देवलोक में मनुष्यों की विश्वसनीयता पूरी तरह से इस प्रकार से समाप्त हुई कि देवों व मनुष्यों के संबंधों के पुनर्जीवित हो पाने की किसी संभावना के भ्रूण तक को नष्ट कर दिया गया।

    चूंकि मनुष्य ने दैवीय संपर्क व संवाद के लिए  विशेषाधिकार व विशेष सुविधाओं से संपन्न विशेषज्ञ लोग रख रखे हुए थे, इसके बावजूद मनुष्य व देवों के इतने प्रगाढ़ व विश्वसनीय संबंध पूरी तरह से टूट गए। तो इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि इन विशेषज्ञों ने एक से बढ़कर एक भयंकर अपराध लगातार किए। जिसके कारण देवगण मनुष्यों पर क्रोधित होते चले गए और मनुष्यों के संबंध हमेशा के लिए  टूट गए। और इन विशेषज्ञों ने अपने द्वारा किए गए भयंकार अपराधों के बारे में मानवीय समाज को जानकारी नहीं दी और पतन के कारणों को ईमानदारी से न स्वीकारते हुये, सारा दोष युग-काल परिवर्तन को दे दिया और युग-काल परिवर्तन को ईश्वरीय प्रावधान बता दिया।

    चूंकि ईश्वर व देवगण नाराज हो चुके थे तो उन्होंने मनुष्यों को उनके अपने ही कर्म के आधार पर छोड़ दिया। लेकिन चूंकि हम लोगों को केवल मंत्र जाप करके कुछ कर्मकांड करके बिना वास्तविक पुरुषार्थ भोगने की लत लग गयी थी, इसलिए  हम आज तक मंत्र जाप व कर्मकांडों को किएजा रहे हैं इस लालच में कि शायद कभी कुछ मामला फिट हो और जैकपाट लग जाए और विशेषज्ञ लोग अपने को मिलने वाली विशेषाधिकारों व विशेष सुविधाओं को भोगते रहने के लालच व स्वार्थ में, यह सत्य स्वीकारने को तैयार नहीं कि वे भी दूसरे मनुष्यों की तरह ही साधारण मनुष्य हैं। क्योंकि सत्य स्वीकारते ही उनको अपने द्वारा किए गए उन भयंकर अपराधों को भी स्वीकारना पड़ेगा जिनके कारण देवों व मनुष्यों के अत्यधिक प्रगाढ़ संबंध पूरी तरह से टूट गए।

    ऐसे अवैज्ञानिक व अतार्किक तथ्यों पर आधारित वैदिक काल की अवधारणा को सत्य मान भी लिया जाए और यह भी स्वीकार कर लिया जाए कि उस काल में बहुत ही गजब व उन्नत व्यवस्था थी। लेकिन इसमें वैज्ञानिकता कहीं नहीं है और न ही इस प्रक्रिया में समाज के मनुष्य की दृष्टि का कोई वैज्ञानिक विकास ही होता है। उल्टे अवैज्ञानिकता व अतार्कितता ही पोषित होती है।

    यदि वैदिक काल में सच में ही हमारा समाज अति-उन्नत होता तो भले ही हमारे समाज में सब कुछ भी होता लेकिन हमारे समाज में वर्णव्यवस्था कभी नहीं होती। क्योंकि ऐसा समाज जो समाज के सबसे बड़े हिस्से को जन्म लेते ही मानसिक व ज्ञान के विकास से अवरुद्ध कर देता हो, जिस समाज में मानवीय-संसाधन की कोई अहमियत नहीं हो। और जो है उसी को संपूर्ण माना जाता हो, वह समाज कभी भी वैज्ञानिक दृष्टि का समाज नहीं हो सकता है। जिस समाज में पोथियां रटने को ज्ञान माना जाता हो, पोथियों को रटकर बोल देना विद्वत्ता मानी जाती हो, जिस समाज के मानवों की अधिकांश जीवनी ऊर्जा विभिन्न कर्मकांडों को करने में ही व्यय हो जाती हो, वह समाज कैसा भी हो लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि का बिलकुल भी नहीं हो सकता है।

    विज्ञान करते हुएसीखने व समझने की निरंतर गतिशील प्रक्रिया है, न कि तथाकथित संपूर्णता के साथ ठहरे हुए ज्ञान को रटने की प्रक्रिया।

    वैदिक काल की अवधारणा को स्वीकारते ही, हम मनुष्य की कर्मशीलता को उपेक्षित व तिरस्कृत कर देते है। बिना वास्तविक पुरुषार्थ के भोग करने के हमारे चरित्र के कारण हममें कृतज्ञता का मूल्य पोषित नहीं हो पाया, इसीलिए  हम अपने जीवन की अधिकांश सुख व सुविधाएं भोगते तो पाश्चात्य देशों के ज्ञान व विज्ञान के कारण ही हैं, लेकिन उनके प्रति कृतज्ञता का भाव न रखकर उल्टे अपने भूतकाल की श्रेष्ठता की कुंठा व अहंकार को जबरन प्रमाणित बताते हुए रात दिन पाश्चात्य देशों व उनके लोगों को पानी पी-पीकर कोसते हैं, गरियाते हैं और अपने कुंठित व क्षुद्र अहंकार को तुष्ट करते हैं।

    निर्णय तो हमें ही लेना है कि हम कर्मशील बनकर अपना समाज व देश बेहतर बनायेंगें या सिर्फ भोगने की लत को ही जीते रहेंगें और कुतर्की बकवास करते रहेंगें।

    ईश्वर भी कर्मशीलता को प्यार करता है, कर्मकांड व मक्खनबाजी को नहीं। यह मानव-सभ्यताओं का बेबाक व ईमानदार अध्ययन करने से साफ साफ मालूम देता है।

  • इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता – कपिल चौधरी : किसान के बेटे ने इंजीनियरिंग के बाद इंट्रप्रेन्योरशिप को चुना

    इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता – कपिल चौधरी : किसान के बेटे ने इंजीनियरिंग के बाद इंट्रप्रेन्योरशिप को चुना

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता। काम शुरू करने के पहले बहुत योजनाएं बनानी पड़तीं हैं, बहुत सारी तैयारियां करनी पड़तीं हैं, रिस्क लेने पड़ते हैं। भारतीय समाज में इन सबके अतिरिक्त सबसे बड़ा काम जो करना पड़ता है जिसमें पुरखे याद आ जाते हैं वह यह कि माता-पिता व परिवार को तैयार कैसे करें कि योग्यता होने के बावजूद सरकारी या ऊंचेवेतनमान की गैरसरकारी नौकरी करने की बजाय अपना व्यवसाय करेंगे। वह भी तब जबकि उस व्यवसाय को परिवार में कभी किसी ने न किया हो। बहुत लोगों को तो पूरे जीवन अपने माता-पिता का विरोध व गालियां सिर्फ इसलिए खानीं पड़तीं हैं क्योंकि उन लोगों ने अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहा। वे लोग सौभाग्यशाली होते हैं जिनके माता-पिता थोड़ी सी बहसबाजी के बाद ही सही लेकिन बात सुनने समझने को तैयार हो जाते हैं।

    काम शुरू होने के बाद भी जीवन भर लगातार नवीन योजनाओं के साथ काम करना पड़ता है, जीवन भर प्रतिस्पर्धा में बने रहना पड़ता है, प्रतिस्पर्धाओं में बने रहते हुए सफल भी होना पड़ता है। व्यवसाय आर्थिक विकास का मूलभूत व सबसे महत्वपूर्ण चक्र होता है। उन लोगों के लिए तो बहुत ही मुश्किल होता है जिनको अपने माता पिता से व्यवसाय बना-बनाया नहीं मिलता है। अपना व्यवसाय करना ही आपकी मेधाविता, क्षमता व प्रयोगशीलता का वास्तविक मानदंड होता है।

    Kapil Chaudhary

    कपिल चौधरी:
    कपिल चौधरी मुरादाबाद के एक सामान्य गांव के किसान के पुत्र हैं। कपिल चौधरी की शुरुआती पढ़ाई लिखाई गांवों के विद्यालयों में हुई। माता-पिता की इच्छा थी कि कपिल इंजीनियरिंग करें, उसके बाद कोई अच्छी सी सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करें, विवाह करें फिर बच्चे पैदा करते हुए सकून से अपना जीवन यापन करें। 

    लेकिन कपिल चौधरी व उनके मित्र कपिल वर्मा अपने जीवन के रास्ते व शैली खुद चुनना चाहते थे। इन लोगों को लगा कि नौकरी करने से बेहतर है अपना स्वयं का व्यवसाय करना। इंजीनियरी की पढ़ाई करते हुए ही योजनाएं बनाने लगे। योजनाओं को जमीन पर कैसे उतारा जाए इसके लिए तैयारियां करने लगे। इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाई भी करते, पढ़ाई करने के अतिरिक्त जिस समय अन्य छात्र लोग मौजमस्ती करते तब ये दोनों युवा अपनी योजनाओं की तैयारी के लिए मार्केटिंग रिसर्च व अन्य गतिविधियों के लिए भागदौड़ करते। घर से मिलने वाली पाकेटमनी का प्रयोग इन सब कामों में करते।

    Kapil Verma and Kapil Chaudhary in Mr Caps Cafe

    कपिल के माता-पिता किसान। किसी किसान से उनका पुत्र जो इंजीनियरिंग कर रहा हो, वह यह कहे कि वह नौकरी नहीं करना चाहता है बल्कि अपना स्वयं का व्यवसाय करना चाहता है। अपवाद छोड़ दीजिए तो किसान हत्थे से उखड़ कर ही बात करेगा। कपिल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पढ़ते हुए लगभग दो वर्षों तक धीरे-धीरे अपने माता-पिता के मन को तैयार किया ताकि वे कपिल के निर्णय को स्वीकार कर पाएं।

    पिछले वर्ष 2017 के नवंबर महीने में कपिल चौधरी ने अपने मित्र कपिल वर्मा के साथ मिल कर Mr Caps काफी कैफे की स्थापना की। मेरठ के बाद मुरादाबाद, उसके बाद भारत के अन्य शहरों में भी श्रंखला खोलने की योजना बनाए हुए हैं।

    Mr Caps Cafe

    कपिल चौधरी का कहना है कि इंजीनियरी की पढ़ाई के बाद जितना रुपया छात्र माता-पिता से लेकर सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं या जुगाड़ में खर्च करके नौकरियां पाते हैं या उच्च शिक्षा में खर्च करते हैं। उसकी तुलना में बहुत कम आर्थिक सहयोग माता-पिता से लिया है वह भी लोन के रूप में।

    गांवों के बहुत लोग ऐसे होते हैं जो अपने मित्रों व रिश्तेदारों का प्रयोग करके अखबारों में अपने उन बच्चों का नाम व फोटो छपवाकर अपने भीतर के कुंठित अहंकार को तुष्ट करते हैं, जो किसी सरकारी नौकरी को पा गए होते हैं। मेरी दृष्टि में विकसित समाज व देश के लिए कपिल चौधरी जैसे स्वावलंबी, रोजगार देने वाले व  अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदारी करने वाले युवा आदर्श होने चाहिए न कि सरकारी नौकरी करने वाले।

    सरकारी नौकरी बनाम इंट्रेप्रिन्योरशिप:
    हममें से बहुत लोग लंबी-लंबी बातें करते हैं। इंट्रेप्रेन्योरशिप की बात करते हैं, सेमिनार्स में भाषण देते हैं। पुरस्कार जीतते है। लेकिन जब अपने घर की बात आती है तो हमारी पहली प्राथमिकता यही रहती है कि हमारी संतान या हमारे परिवार वाले ऊंची सरकारी नौकरी में जाएं या ऊंचे वेतनमान वाली गैरसरकारी नौकरी करें। ऊंची सरकारी नौकरी करने का उद्देश्य समाज के लिए कुछ करने का उद्देश्य नहीं होता। समाज के लिए कुछ करने के लिए न तो सरकारी नौकरी और न ही पैसा ही मूलभूत तत्व होते हैं।

    अपवादों में भी अपवाद को छोड़कर सरकारी नौकरी करने के पीछे के कई बड़े व मूलभूत आकर्षण होते हैं (ढोंग चाहे जो कहा व किया जाए) –

    • जवाबदेही का न होना
    • मेहनत कम होना
    • भ्रष्टाचार का होना
    • दहेज का मिलना
    • सामंतवादी मानसिकता का होना

    सरकारी नौकरियों के इन्हीं आकर्षणों के कारण स्थिति यहां तक है कि इंजीनियरिंग, एमसीए, एमबीए इत्यादि प्रोफेशनल डिग्रीधारी युवा बीटीसी, बीएड करके सरकारी स्कूलों में अध्यापक बनने का भी काम करते हैं। जीवन में संघर्ष व मेहनत से पलायनवादी इन युवाओं के जीवन का अंतिम लक्ष्य महज एक अदद सरकारी नौकरी पाना होता है। सरकारी नौकरी व जेब में पैसा आने के बाद क्रांतिकारिता, विचारशीलता, चिंतनशीलता व सामाजिक सोच तो अपने आप आ ही जाती है। इनको अधिलाभांश के रूप में लीजिए।

    यदि इन आकर्षणों व अधिलाभांशों को हटा दिया जाए तो कोई भी व किसी भी स्तर की सरकारी नौकरी समकक्ष स्तर के स्व-व्यवसाय की तुलना में कहीं नहीं ठहरती है। लेकिन भारत जैसे अलोकतांत्रिक व सामंती चरित्र के समाज व लोगों वाले देशों में दो-चार या दस-बीस या सौ-पचास किताबें रटकर परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी पाने का सबसे प्रमुख व वास्तविक उद्देश्य समाज व लोगों के संसाधनों के ऐश्वर्य व शक्ति का अनियंत्रित भोग करना होता है।

    चलते-चलते:
    कपिल चौधरी से मेरा लगाव इसलिए है क्योंकि मुरादाबाद के जिस गांव में मैंने शिक्षा के नवीन प्रयोग किए थे, कपिल उस समय मेरे छात्र थे और छठवीं कक्षा में पढ़ते थे, मुझे आजतक नहीं भूले हैं। कपिल का मानना है कि उनके जीवन में सोच बदलने में मेरा भी योगदान रहा है। 

    आप जब भी मेरठ जाएं या आपका कोई मित्र, जानपहचान या रिश्तेदार मेरठ में रहता हो या मेरठ आना-जाना होता हो। आप कपिल चौधरी को एक अवसर अवश्य दें। मेरठ से गुजरने वाले व्यस्त हाईवे में ही उनका अत्याधुनिक व खूबसूरत कैफे है। नीचे दी हुई फोटो में पता व संपर्क दिया हुआ है। फोटो पर क्लिक करने से फोटो बड़ी होकर दिखेगी।

  • लहसुन व जुकीनी के सिरका वाले अचार बनाने की घरेलू विधि

    लहसुन व जुकीनी के सिरका वाले अचार बनाने की घरेलू विधि

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    आज हमने सेब से बने सिरका में लहसुन व जुकीनी के अचार रख दिए। यहां सिडनी में भारतीय दुकानों से खरीदे गए तेल से बनाए गए अचारों के जारों को धो कर, सुखाकर अपने द्वारा बनाए गए सिरका के अचारों में प्रयोग कर लिया। थोड़ा देशी पुट भी हो गया। लहसुन का अचार बहुत आसान है, जुकीनी वाले में कुछ झाम करना पड़ता है। जुकीनी की खोज अमेरिका महाद्वीप में हुई थी। वैज्ञानिकी श्रेणियों के रूप में यह एक फल है लेकिन सब्जियों की तरह प्रयोग किया जाता है। तरोई/तोरी व जुकीनी में अंतर होता है। तरोई को लुफ्फा या चाइनीज ओकरा के नाम से जाना जाता है।

    बाएं- लहसुन, दाएं-जुकीनी

    लहसुन का सिरका वाला अचार:

    लहसुन को छील लें, एक लहसुन की कली को या तो दो टुकड़ों में लंबाई में काट लीजिए या यदि कली छोटी हो तो समूची रहने दीजिए।

    यदि एक कप लहसुन है तो एक तिहाई कप सिरका व दो तिहाई कप पानी में सरसों (थोडा सा कूट लीजिए), नमक, मिर्च पाउडर, शक्कर, सौंफ, मेथी, काली मिर्च इत्यादि अपने स्वादानुसार मिलाकर उबलने तक गर्म कीजिए, गर्म करते समय चम्मच से चलाते भी रहिए ताकि नमक व शक्कर अच्छी तरह से मिल जाए। (लहसुन को इसमें नहीं डालेंगे)

    एक दूसरे पात्र में इतना पानी डालकर उबलने तक गर्म कीजिए कि एक कप लहसुन पूरी तरह डूब जाए। जब पानी उबलने तक गर्म हो जाए तो गैस बंद करके पात्र में लहसुन डाल दीजिए, कुछ मिनट तक लहसुन उसमें पड़ा रहने दीजिए। पानी से लहसुन को निकाल कर कुछ मिनट तक सुखा लीजिए।

    लहसुन को कांच के एक जार में डाल दीजिए, लहसुन डालने के बाद सिरका पानी व मसालों का जो मिक्सचर बनाए थे, उसको डाल दीजिए। जार का मुंह मजबूती से बंद कर दीजिए। जार को कुछ मिनट उल्टा करके रख दीजिए। फिर जार को सीधा करके ठंडा होने तक रख दीजिए। ठंडा होने पर फ्रिज में कुछ दिनों के लिए रख दीजिए।

    जुकीनी का सिरका वाला अचार:

    जुकीनी को छीलकर या बिना छीले जैसे आपकी इच्छा हो, चौड़ाई की ओर से पतले-पतले छल्लों के रूप में काट लीजिए। एक तसले में जुकीनी के छल्लों को रख दें, उन पर नमक छिड़क दें, उछाल-उछाल कर हिलाएं ताकि सभी छल्लों पर नमक पहुंच जाए। अब इसको ढककर लगभग एक घंटे के लिए रख दीजिए।

    एक घंटे बाद आप देखेंगे कि जुकीनी ने नमक के कारण पानी छोड़ा है। जुकीनी के छोड़े हुए पानी को फेंक सकते हैं या यदि आप पीना चाहें तो पी भी सकते हैं (नमक के कारण नमकीन बहुत होगा)। जुकीनी के छल्लों पर जो पानी होगा उसको भी कागज वाले टिशू पेपर से या पेपर टावल से या किसी अन्य विधि से सुखा लें।

    पानी व सिरका के घोल की मात्रा इतना होनी चाहिए कि घोल में जब जुकीनी डाली जाए तब अच्छी तरह डूब जाए, घोल कुछ ऊपर तक भी रहे। पानी व सिरके का अनुपात एक तिहाई सिरका व दो तिहाई पानी होना चाहिए।

    पानी व सिरके के घोल में सरसों (कूटकर), नमक, शक्कर, मिर्च, हींग, हल्दी इत्यादि डालकर उबलने तक गर्म करें, थोड़ी देर उबलनें दें (एक या दो मिनट), चम्मच से चलाते रहें। ठंडा होने दीजिए।

    जुकीनी के छल्लों और इस को अच्छी तरह मिला कर जार में डाल दीजिए। जार को मजबूती से बंद करके कुछ देर तक उल्टा रख दीजिए। फिर कुछ दिनों के लिए फ्रिज में रख दीजिए।

    खाइए व खिलाइए।

  • अति दुर्लभ 233 वर्ष पुराने “बौल्टन व वाट इंजन” के फोटो : दुनिया का सबसे पुराना रोटेटिव सिस्टम इंजन

    अति दुर्लभ 233 वर्ष पुराने “बौल्टन व वाट इंजन” के फोटो : दुनिया का सबसे पुराना रोटेटिव सिस्टम इंजन

    Vivek Umrao Glendenning “सामाजिक यायावर”

    “बौल्टन व वाट इंजन” दुनिया का सबसे पुराना रोटेटिव सिस्टम इंजन है। इस इंजन को स्कॉटलैंड के इंजीनियर जेम्स वाट ने डिजाइन किया था, जिसे उनके व्यापारी सहयोगी मैथ्यू बौल्टन के सहयोग से बनाया गया था। इसीलिए इस इंजन का नाम “बौल्टन व वाट इंजन” रखा गया। “बौल्टन व वाट इंजन” दुनिया के पहले सफल इंजन थे जो ऊर्जा पैदा करते थे तथा जिनका कामर्शियली प्रयोग किया गया। ये इंजन हवा, पानी या मानवश्रम से नहीं चलते थे। 

    लेख में जिस अति-दुर्लभ “बौल्टन व वाट इंजन” के चित्र हैं वह इंजन पहली बार लंदन की एक फैक्ट्री में 1785 में प्रयोग किया जाना शुरू किया गया। इस इंजन ने लंदन की फैक्ट्री में लगभग 102 वर्ष तक काम किया। इसके पश्चात यह इंजन यादगार के रूप में आस्ट्रेलिया भेज दिया गया। आगे चलकर सन् 1988 में यह इंजन सिडनी के पावरहाउस संग्रहालय में स्थापित किया गया।

    सिडनी पावरहाउस संग्रहालय विश्व के बेहतरीन विज्ञान व तकनीक संग्रहालयों में आता है। इस संग्रहालय को ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया के संस्थापक व मुख्य संपादक विवेक उमराव “सामाजिक यायावर” की पत्नी के पिता, जो विश्व में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध आर्किटेक्ट्स के रूप में जाने जाते हैं, ने डिजाइन किया था।

    (फोटो को बड़े आकार में देखने के लिए फोटो पर क्लिक कीजिए)

    Vivek’s life-partner and his son with Boulton and Watt Engine 1775

  • जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत

    जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत

    मित्र : भारत में ऐसी मान्यता है कि भारत शताब्दियों पहले इतना अमीर था कि सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस मुद्दे पर आपका क्या मत है? 

    नोमेड : भारत में बहुत ऐसी मान्यताएं हैं जिनमें शताब्दियों पहले भारत दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश था। मान्यताओं का क्या, जो भी प्रयोजित कर दिया जाए वही मान्यता बन जाती है। जिस भारत में कुल जनसंख्या के पाँच मे से चार हिस्सों को शिक्षा, समाज के लिए सोचने-विचारने, अभिव्यक्ति, मानव के रूप में प्रकृति से सहज भाव से प्राप्त मौलिक अधिकार आदि भी न रहे हों; वहाँ मान्यताएं क्या कहतीं हैं से क्या फर्क पड़ता है। मेरा मानना है कि भारतीय समाज में इतिहास व मान्यताओं के नाम पर अपवाद छोड़कर जो भी है, वह लगभग सब कुछ प्रायोजित ही है और सामाजिक-कपट व ढोंग के साथ प्रायोजित है। प्रायोजित तर्कों से ऊपर उठकर यदि सामाजिक प्रतिबद्धता व ईमानदारी से सोचिए, तो आप मेरे विश्लेषण कि जाति-व्यवस्था के होते हुए भारत के आर्थिक विकास व समृद्धि की कल्पना ही असंभव और अव्याहारिक है, से सहमत होगें।


    भारत के सैकड़ों जिलों के हजारों गाँवों के लाखों लोगों से संवाद करके उनको जीवन जीते देख कर, उनके विकास के लिए उनके ही जैसे होकर धरातलीय कार्यों को करते हुए, जो समझ व अनुभव हुए उनसे मैं इन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचता हूँ। समाज के लोगों की वास्तविक जीवन-शैली, मान्यताओं, जीवन-मूल्यों और दर्शन आदि में भारी अंतर दिखता है। क्या आपको नहीं लगता कि भारत के लोग दोहरे चरित्र के होते हैं। उनकी कथनी, करनी व प्रस्तुतीकरण आदि में भयंकर व विरोधात्मक अंतर होता है। कभी-कभी तो विपरीत ध्रुवों जैसा अंतर होता है।


    मित्र : जी बिलकुल लगता है?

    नोमेड : क्योंकर लगता है, आपको?


    मित्र : जीवन को उनके साथ जीने की प्रक्रिया में स्पष्ट अनुभव होता है, इसलिए लगता है।

    नोमेड : सबको तो नहीं लगता है, आपको ही क्योंकर लगता है?


    मित्र : संभवतः मैं कारकों को देखने की चेष्टा करता हूं, इसलिए लगता है।

    नोमेड : संभवतः नहीं। यही यथार्थ है कि चूंकि आप कारकों को देखने की चेष्टा करते हैं या कारकों को समझना चाहते हैं, इसलिए आपको दिखना शुरु हो जाता है। वैसे ही मुझे भी जीवन जीने की प्रक्रिया में अनुभव होता है। मेरी व आपकी दृष्टि व समझ में अंतर सिर्फ मात्रा, गुणवत्ता व चरित्र आदि का हो सकता है। 


    मित्र : आप क्या मानते हैं कि भारत कभी सोने की चिड़िया रहा होगा?

    नोमेड : जी बिलकुल मानता हूँ कि भारत सोने की चिड़िया नहीं, सोने का डायनासोर रहा होगा। 


    मित्र : इसका मतलब भारत का समाज बहुत समृद्ध रहा होगा।

    नोमेड : बिलकुल नहीं।


    मित्र : ऐसा कैसे हो सकता है?

    नोमेड : क्यों नहीं हो सकता है। आज भारत में कुछ लोग बहुत अमीर हैं, दुनिया भर के ऐशोआराम में हैं, लेकिन समाज की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग पौष्टिक भोजन, अच्छे कपड़े व सामान्य स्तर का घर तक नहीं पाती है। 


    मित्र : जी सहमत हूँ, लेकिन तब भी ऐसा ही अंतर रहा होगा, ऐसा क्योंकर हो सकता है?

    नोमेड : तब तो और भी वीभत्स अंतर रहा होगा। अब तो जाति-व्यवस्था का अपवाद स्वरूप ही सही किंतु कुछ क्षय हो रहा है, तब तो जाति-व्यवस्था ही समाज व अर्थ-शास्त्र का मूल-आधार थी।


    मित्र : जी।

    नोमेड : दरअसल यदि भारत कभी भी समाज के रूप में समृद्ध समाज रहा होगा तो उसके कुछ अवशेष तो दिखने ही चाहिए। एक ऐसा समाज, जिसमे समाज की कुल जनसंख्या के बहुत बड़े प्रतिशत भाग को वैज्ञानिक प्रयोगों, आर्थिक व्यवस्था प्रयोगों, शोधों व प्रबंधनों को करने की बात तो छोड़िए खुद के परिश्रम के द्वारा उत्पादित संपत्ति पर ही अधिकार नहीं रहा हो, सामान्य जानकारियों को प्राप्त करने की शिक्षा का भी अधिकार नहीं रहा हो, अपने व अपने परिवार के विकास व प्रगति आदि के संदर्भ में विचार करने व अपने मन की बात की अभिव्यक्ति का अधिकार तक नहीं रहा हो, ऐसा समाज समृद्ध हो सकता है, इसका प्रश्न का ही कोई औचित्य नहीं है और आप समाज की समृद्धि की प्रासंगिकता की बात करना चाह रहे हैं।


    मित्र : अभी आप ही ने कहा कि भारत सोने की चिड़िया क्या डायनासोर रहा होगा। आपके ऐसा कहने का क्या तात्पर्य है?

    नोमेड : दरअसल भारत की अर्थव्यवस्था का आधार समाज में अच्छी अर्थ-व्यवस्था या संसाधनों का बेहतर प्रबंधन या वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि नहीं था। यदि होता तो अवशेष दिखाई पड़ते जैसे अन्य तत्वों के अवशेष दिखाई पड़ते हैं। अवशेष न भी दिखाई देते तो परंपराएं दिखाई पड़तीं, जैसे अन्य तत्वों की परंपराएं दिखाईं पड़ती हैं, भले ही विकृत रूप में दिखाई पड़तीं। 


    जाति-व्यवस्था के कारण शूद्र को दासों की तरह आजीवन लगातार परिश्रम करके उत्पादन करना पड़ता था और परिश्रम करके उत्पादित संपत्ति के एवज में पशुओं की तरह घिसटकर जी लेने लायक सामग्री ही प्राप्त होती थी; ताकि परिश्रम करने वाले दासों की संख्या कम न हो जाए। जाति-व्यवस्था के कारण व्यापार का अधिकार केवल व्यापारी वर्ग को रहा। इन सब तत्वों को जोड़कर देखने से यह मालूम होता है कि व्यापारी को किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं थी और उत्पादन के लिए व्यापारी को नगण्य के बराबर निवेश करना पड़ता था। इस तरह परंपरा में व्यापारी जाति-व्यवस्था के कारण बिना कुछ किए ही दूसरों के परिश्रम के उत्पादन से बैठे-बैठे व्यक्तिगत लाभ कमाने की अवस्था में रहा है। इस प्रकार के व्यापार से केवल व्यापारी और राज-सत्ताओं का ही लाभ हुआ। 


    शूद्र उत्पादन करता रहा और व्यापारी और राज-सत्ताएं शूद्र के आजीवन व अनवरत अवैतनिक-परिश्रम से भरपूर ऐश करतीं रहीं। इसीलिए भारत में व्यापारियों ने विज्ञान-तकनीक, शोध व मौलिक सोच आदि को प्रोत्साहित करने के बजाय कुंठित ही किया, ताकि दूसरों के परिश्रम के द्वारा भरपूर लाभ बटोरा जा सके। भारत के उद्योपतियों व व्यापारियों की मानसिकता आज भी ऐसी ही है। इसीलिए ये लोग पूरी निर्दयता, निरंकुशता व दृष्टिहीनता के साथ भारत के लोगों के परिश्रम व सामाजिक संसाधनो को कब्जाने व सभी स्तरों पर शोषणों के द्वारा अर्जित लाभ की तकनीक पर ही व्यापार करते हैं।

    लाभ का बटवारा व्यापारी-वर्ग व राज-सत्ताओं के मध्य होने की परंपरा आज भी वैसे की वैसी ही है। आम-आदमी के परिश्रम की उपेक्षा तब भी थी और आज भी है; आम-आदमी के हाथों में संसाधनों व उसके द्वारा अर्जित संपत्ति का अधिकार व नियंत्रण तब भी नहीं था और आज भी नहीं है। पहले जो केवल शूद्रों के साथ होता था, आज पूरे आम-समाज के लोगों के साथ हो रहा है, यदि इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो आज की स्थितियाँ और अधिक भयावह हैं और इन सबकी वीभत्सता व भयावहता आदि का आधार जाति-व्यवस्था ही है। यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो समाज की मानसिकता व अनुकूलन ऐसा नहीं होता, जिनके कारण ऐसी भयावह परिस्थितियाँ निर्मित हो चुकी हैं। 


    मित्र : बहुत विचारक किस्म के लोगों से सुनता हूँ कि अंग्रेजो के पहले भारत के लोगों की स्थितियाँ बिलकुल ही भिन्न थीं। भारत के लोग बहुत समृद्ध थे और भारत के गाँवो में स्वावलंबन की बहुत ही अद्वितीय व्यवस्था थी। अंग्रजों ने भारत के इतिहास को तोड़-मरोड़ दिया ताकि विश्व में भारत की महानता नहीं सिद्ध हो सके।

    नोमेड : बिलकुल सही सुनते हैं आप, मैं भी यही सुनता आया हूँ। 


    मित्र : आपके क्या विचार हैं, इन सब मान्यताओं के बारे में?

    नोमेड : आधारहीन मान्यताएं हैं।


    मित्र : कैसे?

    नोमेड : इन मान्यताओं को मानते ही, यह मानना पड़ेगा कि भारत के प्रत्येक गाँव में अधिकतर लोगों के घर समृद्ध थे और सुविधाओं से संपन्न थे। मैंने भारत के लगभग पचास हजार छोटे-बड़े गाँवों को देखा है, खुद भी ग्रामीण परिवेश से हूँ, लगभग दो दशकों से भारत के अतिपिछड़े गाँवों के लिए धरातलीय काम कर रहा हूँ। गाँव में जमींदारों, लंबरदारों, व्यापारियों व राज-सत्ता के चाटुकारों आदि के अलावा किसके पास समृद्धि व सुविधा थी? लुहार, बढ़ई, माली, कहार आदि परंपरा में सैकड़ों वर्षों तक पीढ़ी दर पीढ़ी वही काम करते हुए भी कभी भी दो-जून की रोटी, जैसे तैसे तन ढकने वाले मांगकर लाए गए कपड़ों के टुकड़ों व जमींदार के तालाबों से खोद कर लाई गई मिट्टी के छोटे-छोटे घरों आदि से ऊपर न उठ पाए।


    जिस समाज में लोगों को पेट भरने के लिए सामाजिक कार्यक्रमों में बड़े लोगों द्वारा अपनी खाई हुई पत्तलों में अपना जूठा खाना इसलिए छोड़ने की घिनौनी परंपरा बनाई गई कि भूखे पेट लोग उस बचे-खुचे जूठे खाने को खाकर जूठा खाना छोड़ने वाले की उदारता के प्रति कृतज्ञता महसूस करेंगे और अवसर पड़ने पर उसके लिए बेगार करेंगे; ऐसी परंपराएं शोषित वर्ग के लोगों का आत्मविश्वास तोड़ने व अंतःमन में शोषण को ईश्वरीय प्रयोजन व अपने जीवन की नियति स्वीकारने के लिए बनाईं गईं। उनको सुंदर शाब्दिक तर्को से गढ़ा हुआ कृत्रिम किंतु सुंदर आवरण चढ़ा कर ढक दिया गया। स्वावलंबन व सुसंस्कृत संस्कृति की अजीबोगरीब कसौटियाँ और मानदंड हैं, जहाँ घोर अमानवीयता को भी निर्लज्जता के साथ महानता व संवेदनशीलता परिभाषित कर दिया जाता है।

    लुहार का बेटा लुहार, बढ़ई का बेटा बढ़ई, माली का बेटा माली, कहार का बेटा कहार आदि आदि का तथाकथित स्वावलंबन भीषण शोषण व दया पर आधारित था, न कि व्यवस्थित आर्थिक व्यवस्था पर। लुहार का बेटा सुनार नहीं बन सकता, सुनार का बेटा लुहार नहीं बन सकता। शोध, विकास व नई तकनीक आदि की दूर-दूर तक कोई भी संभावनाएं नहीं। जो है, जैसा है उसी को उटपटांग तरीके से या सुलझे हुए तरीके से आगे बढ़ाना।


    ऐसे इतने कुंठित व परतंत्र तंत्र को स्वावलंबन की अद्वितीय व्यवस्था कहा व सिद्ध किया जाता है। दरअसल जाति-व्यवस्था जन्म आधारित दास-व्यवस्था थी। लेकिन इसको कर्म-आधारित व्यवस्था मानने के मिथक को सही मान लिया गया है। इसे सही मानने के पीछे अनेकानेक निहित स्वार्थ, सामाजिक-कपट व दुर्भावनाएं पोषित होती हैं। किंतु यदि संवेदनशीलता, जातिगत दुर्भावना से ऊपर उठकर, सामाजिक-ईमानदारी व जीवन-मूल्यों के आधार पर विश्लेषण कीजिए, आपको समतामूलक स्वावलंबन कही नहीं दिखेगा। 


    यदि आपके द्वारा उद्धृत विचारक किस्म के लोगों की मान्यताएं मान ली जाएं तो यह भी मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने हर गाँव में सैकड़ों सुविधा-संपन्न व समृद्ध घरों को उजाड़ कर खेती की लहलहाती जमीन को ऐसे बदल दिया मानो वहाँ कभी कुछ था ही नहीं और गाँवों में सुअर के गंदे बाड़ों जैसी मलिन-बस्तियाँ बना दीं। यदि अंग्रेजों के पास आज से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व भवनों को नष्ट करके उपजाऊ भूमि में बदलने की इतनी उन्नत तकनीक थी। तो आज हमें उनकी उस जमाने की इस अद्वितीय तकनीक को सीखने की जरूरत है क्योंकि भारत की आजादी के बाद जिस तरह से कृषि भूमि के विकास के नाम पर अधिग्रहण करके कंक्रीट के जंगल खड़े किए हैं; वह भी बिना किसी खास प्रयोग व प्रयोजन के। उनको तोड़ कर उपजाऊ कृषि भूमि में बदल कर देश के लोगों के सामने सुरसा जैसे मुँह बाए खड़ी खाद्य व भूजल की भयावह समस्या को हल करने की जरूरत सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता के रूप में है।   


    यदि कभी वास्तव में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता होगा, तो मैं इसका सिर्फ यह मतलब निकालता हूँ कि उस समय भारत के व्यापारियों व राजाओं आदि के पास खूब संपत्ति रही होगी। चूंकि भारत में सैकड़ों राज्य होते थे, जिनमें राजा, प्रधानमंत्री, दीवान, मंत्री, सेनापति, रिश्तेदार व चाटुकार आदि होते थे। राज्यों में व्यापारी होते थे। इसलिए समाज की अधिसंख्य जनसंख्या के शोषित होने के बावजूद, भारत सोने की चिड़िया लगा करता होगा। यदि वास्तव में भारत सोने की चिड़िया कहलाने लायक जैसा समृद्ध होता तो समाज की समृद्धि के अवशेष समाज की परंपराओं में मिलते। 


    कोई भी समाज जो सांस्कृतिक व आर्थिक रूप से समृद्ध होता है, वह अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों का शोषण बर्बरता से नहीं करता है और न ही खुद अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों से विद्रूपता के साथ घृणा ही करता है।

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से लिया गया लेख (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • सामाजिक न्याय :: जाति-व्यवस्था-सामाजिक-आरक्षण बनाम संवैधानिक-आरक्षण

    सामाजिक न्याय :: जाति-व्यवस्था-सामाजिक-आरक्षण बनाम संवैधानिक-आरक्षण

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से

    (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारहवें महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)


    मित्र : आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं?

    नोमेड : जी बिलकुल।


    मित्र : क्यों?

    नोमेड : क्योंकि संवैधानिक-आरक्षण, शोषक-वर्गों द्वारा शोषित-वर्ग के साथ सैकड़ों वर्षों तक लगातार प्रति क्षण की गई क्रूरता व बर्बरता का सक्रिय माफीनामा है। और साथ ही एकमात्र औजार है, जिससे जाति-व्यवस्था के पारंपरिक अन्याय को सामाजिक-न्याय में बदला जा सकता है।


    मित्र : क्या आपकी रोजी-रोटी, व्यवसाय आदि में संवैधानिक आरक्षण का योगदान है?

    नोमेड : बिलकुल नहीं, मैं ऐसा कोई व्यवसाय नहीं करता,  मैं ऐसी कोई नौकरी नहीं करता जिस तक पहुंचने के लिए  मुझे संवैधानिक आरक्षण मिला हो। मेरी क्रियाशीलता, मेरी गतिविधियों, मेरी सोच, मेरी समझ, मेरे व्यक्तित्व आदि में संवैधानिक आरक्षण का कोई योगदान नहीं रहा। मैंने बचपन से लेकर आज तक संवैधानिक आरक्षण की रोटी व सुविधा नहीं खाई। मेरे पिता की रोजी-रोटी, आर्थिक-आय आदि में उनको कभी संवैधानिक आरक्षण नहीं मिला। मेरी पत्नी को नहीं मिला। मेरी संतानों को नहीं मिलेगा।


    मित्र : फिर भी आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं, क्यों?

    नोमेड : क्योंकि मानवता, संवेदना, न्याय आदि तत्व समाज, देश, देश की भावी-पीढ़ियों के लिए  मानव-निर्मित राजनैतिक, आर्थिक व धार्मिक तंत्रों आदि को धनात्मक, कल्याणकारी, सृजनशील, ईमानदार व सामाजिक प्रतिबद्ध बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। ध्यान से देखा जाए तो शक्तिशालियों, विजेताओं और तंत्रों को बनाने व चलाने वालों ने शोषक वर्ग व शोषक वर्ग के सहयोगी वर्गों के हितों के लिए जाति-व्यवस्था के रूप में “सामाजिक आरक्षणों” का स्थायी प्रबंध कर दिया।


    मित्र : सामाजिक आरक्षण किसको कह रहे हैं आप?

    नोमेड :  सामाजिक आरक्षणों का तात्पर्य यह कि समाज की शक्तियों, सत्ताओं, संपत्तियों व संस्कृति आदि पर जन्मजात केवल जाति विशेष का होने के कारण ही अधिकार मिल जाना। हर स्तर पर जन्म के आधार पर सामाजिक आरक्षण रहे और शताब्दियों तक रहे, यदि सतयुग से कलियुग तक के युग-चक्र की अवधारणा को सत्य मान लिया जाए तो लाखों वर्षों से ये सामाजिक आरक्षण निर्बाध रूप से आज तक लागू हैं।


    संपत्ति पर सामाजिक आरक्षण –

    खेतों में काम करके उत्पादन करने वाला शूद्र पूरे साल प्रतिदिन बिना अवकाश के भरपूर बेगार परिश्रम करने के बावजूद, उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रखता था। यहां तक कि उसे अपना व अपने परिवार का पेट भरने, तन पर कपड़े ढकने व टुटही झोंपड़ी के लिए  भी शोषक जाति के लोगों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था। परिश्रम का अर्थ तिरस्कार व कर्म का अर्थ शोषण करना/बर्बरता/क्रूरता/कब्जाना/हड़पना/प्रपंच/छल/छद्म आदि। परिश्रम व कर्मशीलता के कोई मायने ही नहीं। 


    शक्ति व सत्ता पर सामाजिक आरक्षण –

    चूंकि उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था, इसलिए   समाज की वास्तविक शक्ति व सत्ता पर कोई अधिकार नहीं रहा और न ही हो पाया। शूद्रों ने अपने बहुत ही सीमित, बिना स्वतंत्रता वाले कुंठित समाज में भी किसी तरह से कोई आंतरिक व सापेक्षिक सत्ता बना ली हो जो उनके अपने ही बीच में श्रेष्ठता को प्रायोजित कर सके तो इतर बात है।


    ज्ञान पर सामाजिक आरक्षण –

    शूद्रों को ज्ञान का अधिकार नहीं, वेदों-उपनिषदों की ऋचाएं यदि किसी शूद्र के कानों ने सुन लीं तो सुनने वाले कानों को बहरा कर देना।  किसी शूद्र ने भूलवश यदि मुंह से वेदों उपनिषदों की ऋचाएं टूटेफूटे तरीके से भी बोल दीं तो जीभ काट देना आदि आदि। यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ना।


    संस्कृति पर सामाजिक आरक्षण –

    ग्रंथ आदि लिखकर अपने स्वार्थों के लिए  पूर्वनिर्धारित कर्मकांड से भरी परंपराएं बना दी गईं। समाज के द्वारा सहज स्फूर्त तरीके से कला, संस्कृति को विकसित पल्लवित नहीं होने दिया गया, कुछ लोगों ने ही सबकुछ तय कर दिया। इसे तय करने में शूद्रों के लिए कोई आधार नहीं छोड़ा गया।


    मित्र : सामाजिक आरक्षणों से हुई क्षतियां कैसीं रहीं?

    नोमेड :  सैकड़ों वर्षौ की जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज की लाखों प्रतिभाओं की प्रतिवर्ष भ्रूण हत्या की है।


    मित्र :  प्रतिभाओं की भ्रूणहत्या, वह कैसे?

    नोमेड :  जन्म के आधार पर ही आदमी की व्यक्तिगत योग्यता, व्यक्तिगत चरित्र व सामाजिक प्रतिष्ठा तय करने की बर्बर व क्रूर जाति-व्यवस्था के कारण लाखों करोड़ों संभावित प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या प्रतिवर्ष लगातार शताब्दियों तक कैसे होती रही, इस बात को समझने के लिए तथ्यों को खुले व साफ मन से समझने की आवश्यकता है।


    मित्र :  जी

    नोमेड : 

    • ब्राह्मण का पुत्र भले ही मूढ़-बुद्धि हो, उसे विद्वान, पवित्र व प्रतिष्ठित ही माना जाएगा। अपने पूरे जीवन में उसका काम सिर्फ और सिर्फ कुछ पोथियों को सीधा, उल्टा-पुल्टा या ऊटपटांग गलत तरीके से बांच देना है।  घोर से घोर मूढ़ को भी महानता व विद्वत्ता की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए केवल किसी ब्राह्मण के यहां जन्म लेना पर्याप्त।

    • इसी प्रकार घोर से घोर कायर को भी क्षत्रिय के यहां जन्म लेना मात्र ही उसके अद्वितीय बहादुर होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए  पर्याप्त।

    • वैश्य के पुत्र को व्यापार व प्रबंधन का ककहरा न आते हुए भी, व्यापार व प्रबंधन का पुरोधा होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता केवल उसका जन्म वैश्य जाति में होने मात्र से ही मान लिया गया।

    • शूद्र को जन्म से ही किसी लायक नहीं माना गया, उसको पशुओं से भी निकृष्ट माना गया।  जिस समाज में गाय को पूजा गया, सुअर को दैवीय अवतार माना गया।  उसी समाज में शूद्र को इतना निकृष्ट माना गया कि उसे अछूत कर दिया गया, शूद्र यदि ज्ञान को सुन भी ले तो ज्ञान अपवित्र मान लिया जाता था।  इसीलिए  शूद्र को ऊपर के तीन वर्णों के दास के रूप में जबरन स्थापित किया गया और इसको ईश्वरीय प्रयोजन साबित करके ईश्वरीय दंड-विधान आदि तय करके, जबरन थोपी गई सामाजिक-दासता को जन्म के आधार पर दैवीय-नियति के रूप में स्वीकारे जाने के लिए  समाज की मानसिकता को ही अनुकूलित कर दिया गया।

    बात ज्ञान के ऊपर दावेदारी की हो, पौरुष के ऊपर दावेदारी की हो या व्यापार-प्रबंधन की दावेदारी की हो। भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था ने लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण-हत्या हर साल लगातार हजारों वर्षों तक की है और पूरी धूर्तता, कपट व सामाजिक/शारीरिक/मानसिक क्रूर-हिंसा के साथ की है।


    मित्र :  जी

    नोमेड :  सोचिये, यदि शोषक जातियों के बच्चों को पैदा होते ही जन्म के आधार पर बिना कुछ किए बैठे बिठाए ही महान, विद्वान, विशेषज्ञ व प्रतिष्ठित न माना जाता होता; तो उनको अपने पुरुषार्थ से विद्वता, विशेषज्ञता व प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए  समाज के वास्तविक विकास के लिए  अपनी ऊर्जा का प्रयोग करना पड़ता न कि शोषित जातियों का शोषण करते रहने के लिए नित्य नए कपटों व धूर्तताओं में लगाना पड़ता। शोषित जातियों के लोगों को पैदा होते ही वे तिरस्कृत व अपमानित होने के लिए  ही पैदा हुए हैं ऐसा स्वीकारते हुए शोषक जाति के लोगों की सेवा करने को ही जीवन-धर्म मानने को विवश किया गया।


    शोषित जातियों के लोगों को अपनी प्रतिभा को दिखाने का अवसर मिला होता तो संभव है कि दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक भारतीय समाज ने दे दिए होते। यदि जातियाँ न होतीं तो हो सकता है कि किसी ब्राह्मण जाति में पैदा होने वाले बच्चे की चमड़े के काम के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो संभव है कि उसने पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। यदि क्षत्रिय जाति में पैदा होने वाले बच्चे की लुहार-गिरी के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो लौह-यंत्रों की पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। ऐसे ही सैकड़ों-हजारों उदाहरण सोचे जा सकते हैं और बहुत ही सहजता से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि जाति-व्यवस्था ने कैसे प्रति वर्ष लाखों प्रतिभाओं की लगातार सैकड़ों हजारों वर्षों तक पूरी बेशर्मी व घिनौनी सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ भ्रूण हत्याएं की।


    भारत में जाति-व्यवस्था के कारण योग्यता व प्रतिभा को कभी सहेजा ही नहीं गया, ऊंची जातियों के बहुत ही सीमित दायरे में यदि कोई तुलनात्मक रूप से कुछ बेहतर निकल गया तो उसको हीरो के रूप में प्रायोजित कर दिया गया और यही तरीका आज तक भी लागू है।


    इन सामाजिक आरक्षणों से अपूरणीय क्षतियां हुईं, पूरा भारतीय समाज सड़ गया। भारत में वैज्ञानिक आविष्कारों और भारत के लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास की संभावननाओं का पतन हुआ।  भारत सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी और फिर मानसिक गुलामी में फँस गया। 


    मित्र :  संवैधानिक आरक्षण का विरोध कौन करते हैं, क्यों करते हैं।

    नोमेड :  जाति-व्यवस्था के हजारों वर्षों के काल में जबकि शूद्रों को समाज में मनुष्य की तरह जीने के मौलिक अधिकार भी नहीं थे, सैकड़ों हजारों वर्षों तक जिन्होंने शूद्रों को कुचला है और उसी कुचलते जाने के परिणाम स्वरूप आज तक जो संसाधनों व विभिन्न सत्ताओं के भोग करने के मजे ले रहे हैं। हजारों साल तक पारंपरिक व सामाजिक भ्रष्टाचार को महिमामंडित करते हुए जिन्होंने उनकी मेहनत का शिद्दत के साथ बिना उत्तरदायित्व के खाया है। इस वर्ग के प्रति थोड़ी सी भी ईमानदारी और प्रेम उनके साथ साझा करने की मानवीयता न दिखा पाने की जड़ता व असंवेदनशीलता भी जाति-व्यवस्था से ही आई है।


    संवैधानिक आरक्षण का विरोध केवल असंवेदनशील व स्वार्थ में अंधे लोग करते हैं।  जिनकी सामाजिक दूर दृष्टि नहीं और जिनके लिए  मानवीयता, न्याय व सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों के कोई मायने नहीं। योग्यता के नाम पर संवैधानिक आरक्षण का विरोध किया जाता है। जिसको योग्यता कहा जाता है वह तथाकथित योग्यता का मापदंड सरकारी नौकरी प्राप्त करने जैसी वाहियात और बेफिजूल की कसौटियों के आधार पर किया जाता है। शताब्दियों के सामाजिक आरक्षणों का भोग करते हुए तो योग्यता का कोई प्रमाण कथा कहानियों व प्रायोजनों से आगे नहीं बढ़ा और सरकारी नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण की बात आते ही, योग्यता का मुद्दा उठा दिया जाता है।


    दरअसल शोषक जातियों ने आज तक कभी शूद्रों को अपने समकक्ष मनुष्यों के रूप में स्वीकारा ही नहीं, कभी भी समाज को जाति-व्यवस्था से ऊपर उठकर देखने की चेष्टा ही नहीं की। जाति-व्यवस्था का विरोध केवल सरकारी नौकरियों में शूद्रों के हिस्से को खतम करने के लिए और राजनैतिक सत्ता में उनकी बढ़ती भागीदारी से डर कर किया जाता है। जो लोग इस दावे या भ्रम में जीते हैं कि भारत में सामाजिक रूप से “जाति-व्यवस्था” खतम हो रहा है, तो वे लोग खुद के ही बनाए हुए झूठों में जीते हैं और “जाति-व्यवस्था” जैसी सामाजिक विभीषिका को स्व-केंद्रित स्वार्थों से परे नहीं देखना चाहते हैं।


    ज्यों ज्यों शूद्र जातियाँ प्रशासनिक व राजनैतिक ताकत प्राप्त करतीं जा रहीं हैं, त्यों त्यों शोषक जातियों को समाज से “जाति-व्यवस्था” खतम होते दिख रहा है, इसलिए  “आरक्षण” व “जाति-व्यवस्था की राजनीति” का विरोध किया जाता है। दूर से देखने में भले ही सुंदर लगे कि यह विरोध “जाति-व्यवस्था” के विरोध में है। बहुत सुंदर तर्क भी दिए जाते हैं, किंतु यथार्थ में संवैधानिक आरक्षण के विरोध का आधार तो उनके अपने स्वार्थ ही हैं।


    मित्र : जी

    नोमेड :  सैकड़ों सालों तक शोषक जातियों ने अपना अधिकांश जीवन/मानसिक/सामाजिक ऊर्जा समाज के बहुसंख्य को अघोषित दास बनाए रखने में लगाया।  इससे पूरा समाज जड़ हो गया। शोषक जातियाँ भी और शोषित जातियाँ भीं। यदि मानवीयता व सामाजिकता के व्यापक संदर्भों में सूक्ष्मता से देखा जाए तो जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के स्तर तक पहुंचाया है। किंतु शोषक जातियों के लोग अपने विद्रूप अहंकारों और स्व-केंद्रित-स्वार्थ को जीवन का परम-लक्ष्य मानने के कारण, अब भी यह चिंतन करने को तैयार नहीं हैं कि भारतीय समाज भीषण रूप से जड़ हो चुका है, सड़ांध से भरपूर है। और इस सड़ांध के पराकाष्ठा तक पहुंचाने और समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, मूल्यों व भावों को जड़ करने व जड़ता में ही बनाए रखने में केवल और केवल जाति-व्यवस्था की परम्परा का ही हाथ रहा है।


    शोषक जातियों को बिना वास्तविक पुरुषार्थ के ही उपलब्ध समस्त विलासिताओं को भोगने की बड़ी भयंकर लिप्सा हमेशा से रही है और आज भी है। और इसी लिप्सा-भोग प्राप्ति के लिए  किए जाने वाले विभिन्न प्रायोजनों को हम सामाजिक परिवर्तन, समाज निर्माण व देश का विकास आदि के लुभावने नामों से प्रायोजित करते आए हैं। यह लिप्सा ही सामाजिक आरक्षण अर्थात् जाति-व्यवस्था का मूलभूत कारण रही और आज भी हमारे समाज की जड़ता के मूलभूत कारकों में से है।


    दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक मानने वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील मानने वाले लोगों में, जो शोषक जातियों के हैं, अपने स्वार्थ की लिप्सा व जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिए  घृणा का भाव रखते हैं, क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करने लगा है और शोषक जातियों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करने लगा है।


    मित्र :  समाधान कैसे होगा।

    नोमेड : समाधान तभी होगा जबकि जाति-व्यवस्था की विद्रूपता व गहरी जड़ों को ईमानदारी व बिना पूर्वाग्रह के सामाजिक उत्तरदायित्व पूर्वक न्यायपूर्ण भाव से समझने की चेष्टा की जाएगी। और ईमानदारी से समाधान की चेष्टा की जाएगी। बिना सामाजिक ईमानदारी के “जाति-व्यवस्था” का पत्ता भी नहीं हिलने वाला। शोषक जातियों की ओर से जब भी जाति-व्यवस्था के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- “ संवैधानिक-आरक्षण “ और “ जाति-व्यवस्था की राजनीति “।  दोनों ही मुद्दे शक्ति व सत्ता प्राप्त करने के अवयव हैं।


    यदि शोषक जातियाँ सच में ही सामाजिक ईमानदार होतीं और जाति-व्यवस्था को खतम करने के लिए थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करतीं तो जाति-व्यवस्था कब की खतम हो गई होती।  शोषक जातियों को केवल अपने अंदर से जाति-व्यवस्था की भावना वास्तव में खतम करनी है। इसके लिए बिना ढोंग के जीवंत रूप में जाति-व्यवस्था की भावना को गहरे से खींचकर खतम करने की जरूरत है। जो ईमानदार व मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अपने अंदर गहरे जमी हुई घृणा व जाति-व्यवस्था की श्रेष्ठता के छुपे हुए अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालने से ही संभव है। जाति-व्यवस्था लोगों के मन में बहुत गहरे स्थापित है जो शाब्दिक भाषणों, परिभाषाओं, लिखावटों आदि से खतम नहीं होगी।


    जाति-व्यवस्था का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ ईमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है। यह समाधान ही नए समाज, नए देश व नए सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर व वास्तविक होगें और बिना कपट व धूर्तता के होगें।

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से

    (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)

     

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • चाकलेट प्रेमियों के लिए: Yummsss (यम्म्‌स्स्स) हाथ से बनाई अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की चाकलेट, भोपाल, मध्यप्रदेश

    चाकलेट प्रेमियों के लिए: Yummsss (यम्म्‌स्स्स) हाथ से बनाई अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की चाकलेट, भोपाल, मध्यप्रदेश

    Vivek Umrao Glendenning

    मैं भारत में अपने मित्रों से कहा करता हूँ कि यदि भारत में हाथ से बनी अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की चाकलेट का स्वाद लेना है वह भी तर्कसंगत कीमत पर तो आपको Yummsss की चाकलेट खानी चाहिए। जैसा कि नाम में ही दिखता है Yummy का Yumm मतलब बहुत ही स्वादिष्ट, फिर sss मतलब बिना मुंह से कुछ बोले केवल स्वाद का आनंद लीजिए, पूरा नाम हुआ Yummsss.

    हुआ यूं कि अपने मित्र सचिन खरे व उनकी जीवन संगिनी ने सोचा कि क्यों न भारत में भी उचित कीमत पर हाथ से बनी असली चाकलेट लोगों को उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने चाकलेट के बारे में अध्ययन करना शुरू किया। महीनों तक इंटरनेट में घंटों-घंटों चाकलेट से संबंधित जानकारियों व उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन करते। कई देशों के लोगों से संपर्क करना शुरू किया ताकि इंटरनेट के बाहर की भी जानकारी उपलब्ध हो पाए।

    खरे दंपत्ति को अहसास हुआ कि भारत में चाकलेट के नाम पर सुगर (शक्कर/चीनी) खिलाई, पिलाई जाती है। चाकलेट के असली स्वाद से बहुत लोग परिचित ही नहीं है। असली चाकलेट स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है, जबकि भारत में बेची जानी वाली अधिकतर चाकलेट शरीर के लिए नुकसानदायक होती है। 

    Yummsss की शुरूअात:

    कम-ज्यादा लगभग डेढ़ साल पहले खरे दंपत्ति ने भोपाल में Yummsss के बैनर तले हाथ से बनी चाकलेट बनानी शुरू की। असली व बेहतरीन स्वाद के लिए यह लोग बेल्जियम से भी चाकलेट मंगाते हैं, फिर बेल्जियम चाकलेट से अपने घर में चाकलेटों के विभिन्न संस्करण तैयार करते हैं। मानव शरीर के लिए कौन सा तत्व बेहतर है, इसका अध्ययन करते हुए, विभिन्न प्रकार के स्वाद-संस्करण तैयार करते हैं। स्वाद-संस्करणों की विभिन्नता के लिए रसायनों का प्रयोग करने की बजाय प्राकृतिक रूप से उपलब्ध फल, मेवा, ड्राई-फ्रूट्स, फूल, पत्ती, रस इत्यादि का प्रयोग करते हैं। डार्क चाकलेट भी उपलब्ध कराते हैं।

    Yummsss बनाम बाजार व कीमत:

    खरे दंपत्ति चाहता तो भोपाल के किसी पॉश इलाके में चाकलेट की दुकान खोल सकता था। दुकान के किराए, दो चार पांच लोगों को दुकान की रखवाली करने के लिए रखते। इस प्रकार के ऊंचे आवर्ती खर्चों के कारण चाकलेट की कीमतें ऊंची रखनी पड़तीं। लागत निकालने के लिए चाकलेट का पुराना स्टाक प्रयोग करना पड़ता। खराब हो चुकी चाकलेट को बहुत अच्छा बताते हुए बेचना पड़ता। चाकलेट की कीमतें कम से कम रख पाएं, चाकलेट के स्वाद व गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ करने के लिए विवश न होना पड़े इसलिए इन्होंने चाकलेट की कोई दुकान नहीं खोली।

    इनका मुख्य उद्देश्य चाकलेट को उसके असली स्वाद व लाभदायक गुणों के साथ उपलब्ध कराना था। दंपत्ति ने विचार किया और निर्णय लिया कि जब तक बेहद आवश्यकता नहीं पड़ती है तब तक चाकलेट को घर में ही बनाया जाएगा व बिना किसी दुकान के आनलाइन बेचा जाएगा। घर में चाकलेट बनाते हैं, आनलाइन बेचते हैं। इनकी अपनी वेबसाइट है, जिस पर जाकर पूरे भारत से चाकलेट का आर्डर दिया जा सकता है। 

    Yummsss व सामाजिक जिम्मेदारी:

    खरे दंपत्ति चाकलेट से होने वाली आय का दस प्रतिशत से अधिक सामाजिक कार्यों में सहयोग करते हैं। समय-समय पर विकलांग, मूक, बधिर, अंधे व मानसिक रूप से अक्षम बच्चों के लिए स्वादिष्ट चाकलेट खिलाने का कार्यक्रम भी आयोजित करते रहते हैं।

    चलते-चलते:

    यदि मुझे भारत में किसी को मिठाई खिलानी होती है तो मैं यहीं सिडनी, आस्ट्रेलिया में बैठे-बैठे Yummsss की वेबसाइट में जाकर चाकलेटों का आनलाइन आर्डर कर देता हूँ। यदि आप चाहें तो आप अपने, अपने बच्चों, रिश्तेदारों, मित्रों व उनके बच्चों के जन्मदिनों में Yummsss की चाकलेट खिलाकर, उपहार देकर बच्चों को बेहतर चाकलेट उपलब्ध करा सकते हैं।

    शादी के पहले लड़के-लड़कियों की देखा-दूखी में भी Yummsss की चाकलेट खिलाकर दाम्पत्य जीवन की संभावनाओं की शुरूआत असली स्वाद से कर सकते हैं।

    आप में से जो लोग अफोर्ड कर सकते हों वे प्रतिदिन अपना दिन हाथ से बनी असली चाकलेट के स्वाद से शुरू कर सकते हैं।

    यदि आप Yummsss की चाकलेट खा चुके हैं या खाने वाले हैं तो स्वाद कैसा रहा, यह बताना न भूलिएगा।

  • यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो

    यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो

    Vivek Umrao Glendenning

    भारत के लोगों व राजनीतिक दलों के लिए दो बातें क्रिस्टल क्लियर साफ हैं। या तो आप सच में मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है या आप नहीं मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है। ईवीएम में छेड़खानी की जा सकती है या नहीं, यह चर्चा का वास्तविक मुद्दा बिलकुल भी नहीं हो सकता है क्योंकि दुनिया की कोई भी मशीन परफेक्ट नहीं। मुद्दा सिर्फ यह हो सकता है कि आप ईवीएम में छेड़खानी की जाती है, ऐसा मानते हैं या नहीं मानते हैं।

    यदि आप ईवीएम में छेड़खानी नहीं मानते हैं:

    यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी नहीं की जाती है तो चुनाव प्रक्रिया होते समय व चुनाव परिणाम आने के बाद ईवीएम को दोष देना बिलकुल भी उचित नहीं। चुनाव प्रक्रिया के समय व चुनाव परिणाम आने के बाद ईवीएम ईवीएम चिल्लाना बिलकुल ही गलत है।

    यदि आप ईवीएम में छेड़खानी मानते हैं:

    लेकिन यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो सारे कामकाज छोड़कर केवल और केवल ईवीएम के विरोध में बहुआयामी व्यापक अभियान तब तक चलाया जाना चाहिए जब तक ईवीएम का प्रयोग पूरी तरह से हमेशा के लिए बंद न हो जाए।

    ईवीएम का विरोध करने के लिए फेसबुक व व्हाट्सअप इत्यादि में फर्जी क्रांतिकारी बनने, फर्जी क्रांतिकारिता का ढोंग करने, गाली बकने, लाइक करने, शेयर करने, कमेंट करने से कुछ भी नहीं होने वाला। आपको अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आना होगा, आपको वास्तविक धरातल पर आना होगा, आपको वास्तविक लोगों के बीच वास्तविकता में जाकर वास्तव में खतरे उठाते हुए संघर्ष करना होगा।

    यदि आपको शून्य दशमलव शून्य एक (0.01) प्रतिशत भी लगता है कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो आपको सारे कामकाज रोक कर सबसे पहले ईवीएम के प्रयोग के खिलाफ अनवरत अनथक अभियान चलाना चाहिए।

    जो जो राजनैतिक दल व मतदातागण वास्तव में ईवीएम के प्रयोग के विरोध के प्रति गंभीर हैं तो आपको बिना किसी नानुकुर व किंतु परंतु के प्रारंभिक चरण में निम्न कार्यक्रम तत्काल प्रभाव से करने ही चाहिए –

    • जिन जिन राज्यों में आपकी सरकारें हैं, वहां से स्तीफा दीजिए।
    • राजनैतिक दलों के सभी सासंदों व विधायकों को पूरे देश में एक साथ त्यागपत्र देना चाहिए, बिना किसी ढोंग या नौटंकी के।
    • ईवीएम के प्रयोग बंद होने तक किसी भी चुनाव में भागीदारी बिलकुल बंद कर देनी चाहिए।
    • चुनाव होने के समय स्थानीय स्तर व व्यापक स्तर पर असहयोग आंदोलन व जेल भरो आंदोलन चलाए जाने चाहिए, बिना किसी ढोंग या नौटंकी के।
    • ईवीएम के मुद्दे के अतिरिक्त किसी भी चुनावी मुद्दे पर कोई मीडिया चर्चा नहीं, मीडिया में चुनाव से संबंधित अन्य किसी मुद्दे पर चर्चा का पूरी तरह से बहिष्कार।
    • जिन मतदाताओं का मानना है कि ईवीएम में छेड़खानी होती है उनको भी चुनाव प्रक्रिया में असहयोग आंदोलन करना चाहिए।
    • जब तक ईवीएम का प्रयोग पूरी तरह से बंद न हो जाए तबतक किसी भी मनोविज्ञान व रणनीति के जाल से अप्रभावित रहना चाहिए।

    यदि आप बहानेबाजी करने की बजाय सच में ही यह मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो केवल यही लोकतांत्रिक व समाधान का रास्ता है, ईवीएम के प्रयोग को बंद करवाने का।

    रास्ता मुश्किल है, गंभीर त्याग व संघर्ष भी मांगता है, लेकिन यदि इच्छाशक्ति से चले तो विजय सुनिश्चित है। रास्ता मुश्किल है लेकिन बहुत जल्द समाधान मिलेगा। कोई और रास्ता भी नहीं। सोशल नेटवर्किंग साइट पर क्रांति की नौटंकी तो बिलकुल ही बेबुनियाद व दिशाहीन रास्ता है।