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भारतीय जाति-व्यवस्था ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने वाली सामाजिक-दासत्व व्यवस्था है

Vivek "सामाजिक यायावर" 

भारतीय जाति-व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था न होकर, श्रम को तिरस्कृत मानने वाली सामाजिक दासत्व को स्थापित करने वाली व्यवस्था थी। दरअसल जाति-व्यवस्था कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था हो ही नहीं सकती थी। वास्तव में जाति-व्यवस्था समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व श्रमशीलता को तिरस्कृत करने की मानसिकता का आधारभूत पोषक तत्व है। भारतीय जाति-व्यवस्था के नियम, विधियां व मान्यतायें आदि ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने के आधार पर स्थापित थे, और आज भी कमोवेश वैसे ही है। शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों को उपेक्षित व तिरस्कृत जातियों में रखा गया, उनके सामाजिक संपत्तियों पर अधिकार नगण्य थे, व्यक्तिगत संपत्ति रखने के, शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बनने के सहज, सरल व समान अधिकार नहीं थे। समाज की मुख्यधारा में उनका कोई स्थान नहीं था। वे शारीरिक श्रम करने वाले, मुख्य सामाजिक व्यवस्था से अलग तिरस्कृत सामाजिक-दास व्यवस्था में रहने के लिए  विवश सामाजिक-गुलाम थे।

मानव समाज का विकास और सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं आदि का उन्मूलन व समाधान आदि  बिना वैज्ञानिक दृष्टि आधार के नहीं प्राप्त किया जा सकता है।  किसी सामाजिक व्यवस्था की मूल अवधारणा की प्रामाणिकता को उसके विभिन्न तत्वों के आधार पर ही विश्लेषित किया जा सकता है। अवधारणा की प्रामाणिकता को जबरन साबित करने के लिए  सुविधानुसार मनचाहे तत्वों व तथ्यों को ही प्रमाणिक मान लेने से वास्तविक तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं हो पाता है। शोषक वर्ग द्वारा प्रायोजित व लिखित ग्रंथों में जो लिखा है उसको ही प्रमाणित मानने के स्थान पर यदि व्यावहारिकता व तर्कों के आधार पर यह स्वीकारते हुए कि मानव व मानव समाज समय के साथ सीखता है और परिपक्वता की ओर गति करता है, तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखने लगता है कि जाति-व्यवस्था ईश्वरीय व प्राकृतिक व्यवस्था न होकर, मनुष्य-निर्मित बहुत ही सोची समझी, चतुराई व कपट के साथ स्थापित सामाजिक दासत्व की कपटी व्यवस्था थी।

जाति-व्यवस्था के मूलभूत-कारकों को समझने के लिए , हमें जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल्यांकन करना पड़ेगा। जाति-व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था मानने का मतलब है कि बहुत सारे ऊलजुलूल, अव्यावहारिक व मनगढ़ंत तथ्यों को, भलीभांति जानते हुए कि वे नितांत ही अपुष्ट व निराधार तथ्य हैं, स्वीकारना पड़ेगा।

वर्तमान पीढ़ी ही भविष्य की पीढ़ियों की समझ का आधार होती है। हम जो बीज आज बोते हैं, जिन व्यवस्थाओं का निर्माण करते हैं, उनके आधार पर भविष्य की पीढ़ियां अपने जीवन में सामाजिक-अनुकूलन स्वीकारती हैं। इसलिए   जाति-व्यवस्था रूपी सामाजिक-दासत्व की व्यवस्था के स्थापना काल में ऐसे नियम व विधियाँ बनाइ गईं; ऐसा साहित्य व इतिहास आदि लिखा व प्रायोजित किया गया कि सामाजिक-दासत्व की यह व्यवस्था शोषक वर्ग द्वारा स्थापित व्यवस्था के स्थान पर ईश्वरीय प्रावधान व मनुष्य के पूर्व-जन्मों के कर्मों की नियति-व्यवस्था प्रमाणित हो।

धूर्ततापूर्ण चतुराई के साथ प्रायोजित व स्थापित सामाजिक-दासत्व व्यवस्था को समय के साथ पूर्व में रही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था मान लिया गया। चूंकि समाज के बहुसंख्यक ‘अवर्णों’ के पास संपत्ति, शिक्षा, ज्ञान व आत्मसम्मान के अधिकार नहीं थे, और बहुसंख्यक अवर्णों के परिश्रम के उत्पाद पर अल्पसंख्यक सवर्णों का अधिकार होता था, लालच व स्वार्थ के कारण सवर्णों ने जाति-व्यवस्था को और मजबूत ही किया और कालांतर में यह व्यवस्था पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित दैवीय प्रयोजन व व्यवस्था के रूप में स्वीकृत व प्रमाणित मान ली गई।

जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में कमी का आना

जाति-व्यवस्था की वीभत्सता व घिनौनापन महापुरुष बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर, महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी, अंग्रेजों आदि के कारण कुछ औंस कम हुई। फिर भारत की राजनैतिक आजादी के बाद समाज के सबसे दबे-कुचले शोषित वर्ग के लिए  शिक्षा व सरकारी नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण के कारण, कुछ आर्थिक व राजनैतिक शक्ति मिलने से स्थितियां पहले से बेहतर हुईं। जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में जो कुछ अंतर अभी आ रहे हैं, उसके तीन प्रमुख कारण हैं। जिनके परिणामस्वरूप, शोषक समाज को शोषित वर्ग के साथ अपने व्यवहारों में दिखावटी तौर पर ही सही लेकिन कुछ अंतर, न चाहते हुए भी करने के लिए  विवश होना पड़ा।

एक- संवैधानिक आरक्षण के कारण शोषित समाज के लोगों की बढ़ती आर्थिक व राजनैतिक शक्ति। 

दो- शिक्षा व ज्ञान के अवसरों के कारण बढ़ती जागरूकता।

तीन- विकसित देशों में रहकर उच्चशिक्षा ग्रहण करने वाले सवर्णों में से ऐसे ईमानदार मानवीय व सामाजिक सोच के लोग जिनकी समझ में आ गया कि जाति-व्यवस्था दैवीय प्रावधान न होकर सामाजिक दासत्व की व्यवस्था है - का भारत के शोषित समाज के उत्थान के लिए  काम करने का प्रयत्न करना। भले ही ऐसे लोगों का प्रतिशत नगण्य हो।

इन तीन कारकों के कारण शोषित समाज की शक्ति व दावेदारी मुख्य रूप से बढ़ी और जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में कुछ कमी आई।


यह लेख मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर पुस्तक से लिया गया है।


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