Category: सामाजिक यायावर

  • वीडियो: सामाजिक न्याय – वाराणसी सम्मेलन 2018 मार्च 17-18

    वीडियो: सामाजिक न्याय – वाराणसी सम्मेलन 2018 मार्च 17-18

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • बेसन पूड़ी, इमली की चटनी व खुली कड़ाही सब्जी

    बेसन पूड़ी, इमली की चटनी व खुली कड़ाही सब्जी

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    बेसन पूड़ी:

    बेसन व बेसन की मात्रा की दुगुनी मात्रा में गेहूं का आटा अलग-अलग ले लीजिए। जीरा, सौफ, खड़ी धनिया व अजवाइन को इतनी मात्रा में तवे पर भून कर ओखली में पीस लीजिए कि बेसन व गेहूं के आटे दोनो के लिए बराबर मात्रा में हो जाए। जीरा, सौफ आदि कि भूनने के बाद आग बंद करके गर्म तवे पर हल्दी पाउडर, सोंठ पाउडर, हींग पाउडर को भून लीजिए। इनकी मात्रा भी उतनी हो कि बेसन व गेहूं के आटे दोनो के लिए हो जाए।

    एक कड़ाही में थोड़े से तेल में बेसन को हल्का भूरा होने तक भूनिए। जब बेसन हल्का भूरा होने लगे तब इसमें ओखली में पिसी हुई सौंफ, जीरा, धनिया व अजवाइन तथा हल्दी, सोंठ व हींग मिला दीजिए। स्वादानुसार नमक भी मिला लीजिए। जब बेसन हल्का होने तक भुन जाए तब इसको किसी खुले पात्र में रख कर ठंडा होने के लिए रख दीजिए।

    गेहूं के आटे में ओखली में पिसी हुई सौंफ, जीरा, धनिया व अजवाइन तथा हल्दी, सोंठ व हींग मिलाकर गूंथिए। ठीक से गूंथने के बाद कपड़े से ढककर रख दीजिए।

    ठंडे हो चुके बेसन में तेल मिलाइए फिर थोड़ा-थोड़ा पानी डाल कर गूंथिए। गेहूं के आटे से जितनी लोइयां बन सकती हों उतनी लोइयां बेसन की भी बना लीजिए।

    गेहूं के गुंथे हुए आटे की लोइयां बनाइए। आटे की लोई को हाथों से बड़ा करके उसके बीच में बेसन की लोई रखकर आटे की लोई को चारों ओर से अच्छी तरह बंद कर बेलिए। 

    कड़ाही में तेल गर्म कीजिए और मध्यम आंच में इन पूड़ियों को तलिए। यदि आटे व बेसन की गुथाई अच्छी तरह से हुई होगी तो आपकी पूड़ी दोनो ओर से फूलेगी।

    बेसन पूड़ी जैसे ही आप सत्तू पूड़ी भी बना सकते है। सत्तू पूड़ी थोड़ी आसान रहती है क्योंकि सत्तू पहले से ही भुना होता है इसलिए उसको भूनने की जरूरत नहीं रहती, चाहें तो कड़ाही में थोड़ा गर्म कर सकते हैं। शेष बेसन पूड़ी जैसे ही।

    इमली व गुड़ की चटनी:

    इमली को गर्म पानी में डालकर दो मिनट तक गर्म करते रहें। फिर 15-20 मिनट के लिए ठंडा होने के लिए छोड़ दीजिए। खूब अच्छी तरह मसल दीजिए।

    जीरा भून व ओखली में कूट लीजिए, सोंठ का पाउडर, पिसी लाल मिर्च, कुटी हुई खड़ी धनिया, खुशबू के लिए कुछ देर तक भुनी हुई फिर ओखली में कुटी हुई थोड़ी सी सौंफ, हींग मिलाकर रख लीजिए।

    जितनी इमली ली, उसका आधा गुड़ ले लीजिए। इमली में नमक डालकर फिर से धीमी आंच में गर्म करिए, गुड़ डाल दीजिये और गुड़ के पिघल कर मिलने तक चलाते रहिए। पिघलने तक गुड़ को टुकड़ों को चम्मच से तोड़ते व मसलते रहिए। गुड़ पिघलने के बाद आंच बंद कर दीजिए तथा मसाले अच्छी तरह मिलाने के बाद ठंडा होने तक रख दीजिए।

    इस चटनी को खाते ही आप समोसा के साथ होटलों में मिलने वाली इमली चटनी को भूल जाएंगे।

    बेसन पूड़ी, इमली-गुड़ चटनी व खुली कड़ाही सब्जी

    खुली कड़ाही में पकाई गई सब्जी:

    फोटो में जो सब्जी (आलू, प्याज, लहसुन, फली, मटर इत्यादि) है उसकी भी खासियत है। खासियत यह है कि लोहे की कड़ाही में पकाई गई है वह भी लगातार तेज आंच में बिना ढके हुए खुली कड़ाही में पकाई गई है। इस पद्धति में सब्जी को लगातार चलाते रहना पड़ता है। थोड़ा अटपटा है लेकिन सब्जी में स्वाद बहुत रहता है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • जल-उपवास : वास्तविक शारीरिक व मानसिक फिटनेस तथा उम्र व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ना, कैंसर अल्सर ट्यूमर डायबिटीज जैसी बीमारियों में अद्वितीय लाभ

    जल-उपवास : वास्तविक शारीरिक व मानसिक फिटनेस तथा उम्र व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ना, कैंसर अल्सर ट्यूमर डायबिटीज जैसी बीमारियों में अद्वितीय लाभ

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    शारीरिक व मानसिक फिटनेस

    इससे पहले कि मैं जल-उपवास की चर्चा करूं, मैं अपने शरीर की चर्चा करना चाहता हूं। मैंने पूरा जीवन अपने शरीर का बहुत ही आड़े-तेड़े तरीके से प्रयोग किया है। मैं बहुत कम सोता हूँ। सोने का मेरा औसत महज चार से पांच घंटे है। मैंने बहुत बार बिना सोए हुए 72 घंटों या इससे भी कुछ अधिक लगातार काम किया है, वह भी मानसिक काम। लेकिन कभी मस्तिष्क या शरीर ने धोखा नहीं दिया।

    कभी दिन में तीन बार नहाया तो कभी भीषण गर्मियों में भी कई-कई दिन नहीं नहाया या भीषण सर्दियों में ठंडे पानी से कई बाल्टी नहा लिया। गर्म के पहले ठंडा, ठंडा के पहले गर्म जब जो जैसा मिला वैसा खा पी लिया। भीषण सर्दियों में फ्रिज से पानी निकाल कर पी लिया, फ्रिज से ठंडा खाना निकाल बिना गर्म किए खा लिया। कहावत है कि रात में मूली नहीं खानी चाहिए। मैंने अपने जीवन में मूलियां अधिकतर रात में ही खाईं हैं। आप मुझे कोई भी कंद मूल कभी भी खाने को दीजिए, मैं खा लेता हूँ। कभी शरीर ने कोई असहमति नहीं प्रकट की।

    बहुत लोगों को मैंने देखा है कि वे आठ-नौ घंटे सो चुकने के बावजूद, जगने के बाद पंद्रह से आधा घंटा या अधिक समय तक ले लेते हैं, पूरी तरह से चैतन्य होने में। मैं भले ही कई दिनों से दो से तीन घंटे की ही नींद ले पा रहा होऊं, लेकिन यदि आप मुझे एक घंटे की नींद के बाद भी जगाएं तो मैं आपको जगने के पल से ही पूरी तरह चैतन्य मिलूंगा। इधर आंख खुली, उसी पल से पूरा शरीर व मस्तिष्क जागृत, कोई झोल नहीं, कोई बहाना नहीं, चाय-काफी किसी चीज की कोई तलब नहीं।

    मैंने जब से अपने हिसाब से अपना जीवन जीना शुरू किया तबसे अपने जीवन में सोने व खाने की कभी कोई व्यवस्थित दिनचर्या नहीं बनाई। जब मिला या जब जरूरत हुई तब खा लिया, जब जरूरत हुई सो लिया। यहां सिडनी, आस्ट्रेलिया में भी खाने व सोने की कोई व्यवस्थित दिनचर्चा नहीं है। किसी दिन सुबह सात बजे डटकर खा लिया तो किसी दिन शाम को पांच बजे नास्ता किया। 

    मैं कई-कई घंटे पेशाब बहुत आराम से रोक लेता हूं। बहुत तेज पेशाब आई होगी लेकिन यदि कुछ लिख रहा हूँ या किसी काम में व्यस्त हूँ तो कई-कई घंटे पेशाब रोक कर काम करते रह लेता हूँ। वर्षों हो गए ऐसा करते हुए, आजतक कभी पेशाब पैंट में नहीं छूटी।

    मैंने हजारों किलोमीटर की पदयात्राएं की हैं। औसतन 20 से 50 किलोमीटर प्रतिदिन चलते हुए वह भी बहुत बार दिन में केवल एक बार भोजन प्राप्त करते हुए, वह भी ग्रामवासियों व अनजान लोगों से जो भी प्रेम व श्रद्धा से मिल गया। वाहन यात्राएं भी बहुत करता आया हूँ, जहां जो मिला वह खाया, जो पानी मिला वह पिया। सोने को कुछ नहीं मिला तो सड़क किनारे ही सिर के नीचे पत्थर रख कर सो गया।

    मैंने बहुत बार 20-20 घंटों से अधिक लगातार गाड़ी चलाई है, वह भी ऊबड़ खाबड़ रास्तों में, भीड़ वाले रास्तों में। मालूम नहीं होता कि कब कु्त्ता या बकरी या गाय या सुअर या कोई बच्चा या साइकिल चलाता कोई आदमी अचानक से रास्ते पर आ जाए, इसलिए हर पल चाक-चौबंद रहते हुए गाड़ी चलाना। 

    इन सब क्रियाकलापों का भी कोई व्यवस्थित ढांचा नहीं। मालूम पड़ा कि कई महीने गाड़ी की स्टियरिंग भी नहीं छुई और अचानक कई-कई दिन 20-20 घंटे गाड़ी चला रहा हूँ, वह भी केवल दो से तीन घंटे सोकर। जीवन में लगभग 100,000 (एक लाख) किलोमीटर कार व लगभग 300,000 (तीन लाख) किलोमीटर मोटरसाइकिल चला चुका हूँ, कभी कोई सड़क दुर्घटना नहीं हुई, कभी किसी को मेरी ड्राइविंग के कारण खरोच तक नहीं पहुंची। 

    कई-कई महीनों तक कोई शारीरिक अभ्यास नहीं करता, फिर अचानक एक दिन सुबह उठकर 100 दंड बैठक लगाता हूँ, दो-दो घंटे तक 5-5 किलो के डम्बेल लेकर खूब एक्सरसाइज करता हूँ। ऐसा कुछ दिन किया, फिर बंद कर दिया, फर कभी मन हुआ तो फिर शुरू कर लिया। बेतरतीब, शरीर भी आदी हो गया है, प्रतिक्रिया नहीं देता।

    2004 में जब 18 दिनों का जल-उपवास किया था तब पीठ पर लगभग 20 किलो का भारी बैग लाद कर ट्रेन के जनरल डिब्बों में लंबी यात्राएं भी कर रहा था। भीड़ भरी सरकारी ग्रामीण बसों में धक्के खाते यात्राएं कर रहा था। शरीर व मस्तिष्क की ओर से कोई शिकवा-शिकायत नहीं। 

    मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि इतना बेतरतीब जीवनशैली होने के बावजूद, मेरे शरीर व मस्तिष्क की क्षमता दुरुस्त है। मैं शरीर व मस्तिष्क का बिना चिंता किए मनचाहा इस्तेमाल कर लेता हूँ। अब जबकि मेरी आयु 40 वर्ष से अधिक है, तब भी अभी तक ठीकठाक ही चल रहा है। बीमार नहीं पड़ता। दवाएं नहीं खाता। विटामिन की गोलियां नहीं खाता। सप्लीमेंट्स नहीं लेता। जबकि मांस मछली नहीं खाता, शाकाहारी हूँ। मुझमें शराब, काफी, चाय इत्यादि की कोई भी लत नहीं, कभी नहीं प्रयोग करता। पिछले दो सालों से तो काफी भी नहीं पी, जबकि पहले महीने में एकाध बार काफी पी लेता था। 

    मैंने अपने जीवन में लंबे समय तक बहुत अधिक शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक प्रताड़नाएं झेली हैं। इसके बावजूद मुझे आजतक न तो डायबिटीज है, और न ही उच्च या निम्न किसी प्रकार का ब्लड-प्रेशर ही है।

    मेरा मानना है कि मेरा शरीर फिट है। भले ही मैं मैराथन नहीं दौड़ता होऊं, तैराकी नहीं करता होऊं, जिमनास्ट न होऊं। फिटनेस का मतलब केवल खेलकूद करना ही नहीं होता। मेरा मानना है कि फिटनेस का सही मायने यह है कि आप विभिन्न स्थितियों परिस्थितियों में लंबे समय तक व अचानक बिना किसी पूर्व नोटिश के भी सहजता से बिना शरीर व मस्तिष्क का आपा खोए हुए रह सकते हैं।

    मैं अपनी शारीरिक व मानसिक फिटनेस का श्रेय जल-उपवास करने की जीवन-शैली को देता हूँ। यदि आप चाहें तो जल-उपवास से होने वाले लाभों के बारे में इस लेख में आगे पढ़ सकते हैं। यहां जल-उपवास का मतलब कम से कम पांच दिन की अवधि का जल-उपवास। 


    जल-उपवास : परिचय

    यदि आप अपने शरीर के प्रति गंभीर हैं और जल-उपवास करना चाहते हैं। आपको कम से कम पांच दिन का जल-उपवास करना चाहिए। जल-उपवास का मतलब पानी के अलावा कुछ भी नहीं ग्रहण करना। पानी के अतिरिक्त फल, सब्जी, अनाज इत्यादि किसी भी रूप व मात्रा में नहीं, जूस भी नहीं। स्पष्ट रूप से यह समझिए कि केवल और केवल पानी।

    यदि आपको डायबिटीज है। इतना तय मानिए कि यदि आप जल-उपवास कर लिए तो आपको बहुत आराम मिलेगा। जल-उपवास शरीर में इन्सुलिन का तंत्र बेहतर करता है। लेकिन डायबिटीज होने के कारण पहली बार जल-उपवास कैसे करेंगे यह जानकारी प्राकृतिक शैली वाले किसी जेनुइन विशेषज्ञ चिकित्सक से ले लीजिए। यदि आपकी इच्छा हो तो मैं आपका संपर्क बेहतरीन प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञों से करवा सकता हूँ। आप उनसे परामर्श ले सकते हैं।

    हममें से बहुत लोग एक दिन भी बिना भोजन किए या कुछ न कुछ खाए नहीं रह सकते हैं। उनके दिलोदिमाग में ऐसा बैठ गया है कि यदि नहीं खाया गया तो बहुत नुकसान होगा, कुछ लोग तो यहां तक सोचते हैं कि नहीं खाने से मर जाएंगे। बहुत भ्रांतियां हैं। जिन लोगों ने एक या दो दिनों का जल-उपवास रखा भी है तो भी उनको पांच दिवसीय या अधिक दिनों के जल-उपवास के लाभों व अनुभवों के बारे में अंदाजा नहीं होगा, इन लोगों को भी कई भ्रांतियां रहतीं हैं। 

    जब आप शरीर को केवल पानी पर रखते हैं। तो पहले के दो से तीन दिनों तक आपका शरीर भोजन वाले मोड में ही रहता है। आपके शरीर में उपस्थित विषाक्त पदार्थों व तत्वों की मात्रा व प्रकार के आधार पर आपका शरीर भोजन के लिए भयंकर मांग रखता है या एक तरह से कह लीजिए कि छटपटाता है। शरीर को लगता है कि मांग करने पर आप उसकी मांग पूरी करेंगे ही, इसलिए वह पूरी ताकत के साथ भोजन के लिए अपनी मांग रखता है। मेरा मानना है कि अधिकतर यह मनोवैज्ञानिक कारणों व कंडीशनिंग के कारण होता है, शरीर की अपनी विशुद्ध मांग उतनी नहीं होती है जितनी प्रतीत होती है या जितना शरीर हल्ला-गुल्ला मचाता है।

    मेरी स्थिति तो यह है कि मैं शरीर को बता देता हूँ कि अब भोजन नहीं मिलेगा, तुम्हारे पास जो है उसी से काम चलाओ। शरीर बहुत हीला-हवाला नहीं करता है, आदेश मान लेता है। यह आपके अपने शरीर के ऊपर निर्भर करता है कि आपका शरीर दो दिनों बाद या तीन दिनों बाद भोजन के लिए बाहरी मांग करने की बजाय, शरीर में ही उपस्थित तत्वों से काम चलाना शुरू कर देता है।


    नए ऊतकों का निर्माण, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ना, पाचन तंत्र की मरम्मत व नवीनीकरण

    आपका शरीर जब बाहरी मांग करने की बजाय शरीर के भीतर उपस्थित तत्वों के प्रयोग करने के मोड में आता है तो वह कुछ मूलभूत प्रक्रियाओं को करता है। ऊर्जा बचाने के लिए शरीर में उपस्थित फालतू व विषाक्त द्रव्यों, तत्वों को बाहर करना शुरू करता है। आपके शरीर में जो फालतू चर्बी जमा होती है, उसको पिघला कर प्रयोग करना शुरू करता है। इससे आपके शरीर का अतिरिक्त वजन मतलब आपका मोटापा भी घटता है।

    शरीर अपने भीतर के तत्वों से काम चलाने के मोड में जब आ जाता है और चूंकि आप केवल जल ही ग्रहण कर रहे होते हैं इसलिए शरीर को भोजन को पचाने के लिए प्रयोग होने वाली आग नहीं दहकानी पड़ती है। शरीर के तत्वों व ऊतकों इत्यादि का जलाव नहीं होता है। मतलब यह कि शरीर की बहुत बड़ी ऊर्जा व मशीनरी का प्रयोग केवल भोजन को गलाना, जलाना व फिर विभिन्न भंडारगृहों में पहुंचाना इत्यादि कार्यों में नहीं हो रहा होता है। शरीर अपनी ऊर्जा का प्रयोग नए ऊतकों व कोशिकाओं के निर्माण में लगाता है। परिणामस्वरूप पाचन प्रक्रिया व अंगों के पूरे तंत्र का नवीनीकरण होता है। 


    विभिन्न बीमारियों का इलाज व उनके द्वारा हुई क्षति की मरम्मत तथा आयु का बढ़ना 

    ऊर्जा का प्रयोग शरीर के ढांचो की मरम्मत होने के कारण शरीर के विभिन्न आंतरिक अंगों में सूजन में कमी आती है। ऊतकों व कोशिकाओं के नवीनीकरण के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। तनाव घटता है तो रक्तचाप अपनेआप संतुलित होने लगता है। शरीर बेहतर जीवंतता व सुगमता की ओर बढ़ता है। चूंकि शरीर में पानी के अलावा कुछ और जाता ही नहीं है इसलिए इन्सुलिन तंत्र की संवेदनशीलता भी बढ़ती है। डायबिटीज में लाभ पहुंचता है।

    शरीर के पाचन तंत्र वाले अंग व तंत्र फुर्सत में रहते हैं तो नए ऊतकों इत्यादि का निर्माण करते हैं, मरम्मत करते हैं। इन सब प्रक्रियाओं में गास्ट्रिटिस, आंतों में तनाव, कब्ज, दस्त, अपच, इत्यादि का तो शर्तिया इलाज शरीर खुद ही बिना किसी टालमटोल के कर लेता है।

    शरीर की आयु बढ़ती है, मस्तिष्क की क्षमता व उम्र बढ़ती है। ह्रदय संबंधित बीमारियों के होने की संभावना कम होती है तथा बीमारियों का प्रतिरोध होता है।


    कैंसर, अल्सर, ट्यूमर जैसी बीमारियों में अद्वितीय लाभ

    ऊर्जा को व्यर्थ में नष्ट होने से बचाने के लिए तथा अपने भीतर ही उपस्थित तत्वों को इस्तेमाल करने के आटोमेशन के कारण नए बेहतरीन ऊतकों का निर्माण करता है। चूंकि शरीर विषाक्त व रद्दी कोशिकाओं व तत्वों को बाहर निकालने व नए बेहतरीन ऊतकों के निर्माण की प्रक्रिया में लग जाता है। इसलिए जिनको कैंसर है उनकी कैंसर कोशिकाओं के विस्तार व प्रसार को रोकता है। केंसर कोशिकाओं के प्रसार में रोक लगने व नई बेहतर कोशिकाओं के निर्माण के कारण कैंसर जैसी बीामरियों में भी लाभ पहुंचता है। जिनको कैंसर नहीं है, उनको कैंसर होने की संभावना क्षीण होती है।

    चलते-चलते: 

    शरीर के साथ छेड़खानी न कीजिए। शरीर का तंत्र हमारी आपकी कल्पना से बहुत ही अधिक परे आटोमैटिक, व्यवस्थित व अद्वितीय है। शरीर के साथ सद्भाव में रहने से शरीर बहुत ही आज्ञाकारी, विश्वसनीय व बेहतरीन साथी के रूप में आपके लिए जीता है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • 11 फरवरी 2018 से 15 फरवरी 2018 तक चले पांच दिवसीय जल-उपवास में मेरी दिनचर्या –सामाजिक यायावर

    11 फरवरी 2018 से 15 फरवरी 2018 तक चले पांच दिवसीय जल-उपवास में मेरी दिनचर्या –सामाजिक यायावर

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मैंने अपने जीवन में बहुत उपवास किए हैं। महीने में कई बार उपवास करना, मेरे जीवन की सामान्य चर्या रही है। मैंने अपने जीवन में सबसे लंबा उपवास 18 दिवसीय किया। इस उपवास में सातवें दिन से नींबू व नमक लेना शुरू कर दिया था, छठवें दिन तक केवल पानी। सन् 2004 में इस उपवास के बाद मैंने उपवास करना लगभग बंद कर दिया। कई-कई महीनों में वर्ष में एक दो बार, कभी कभार एक से दो दिन के उपवास करता रहा लेकिन लंबे उपवास नहीं किए। दो दिवस से अधिक लंबा उपवास लगभग 14 वर्षों बाद फरवरी 2018 में किया। 

    11 फरवरी 2018 से 15 फरवरी 2018 तक चले पांच दिवसीय जल-उपवास की दिनचर्या: (कुछ फोटो भी हैं)

    पहला दिन

    दूसरा दिन

    तीसरा दिन

    चौथा दिन

    पांचवा दिन

    योजना है कि हर महीने पांच दिन तक जल-उपवास किया जाए। जल-उपवास का अर्थ केवल जल ग्रहण करना और कुछ भी नहीं। अगला उपवास 3 मार्च 2018 से 7 मार्च 2018 तक चलेगा।

    (*आदि मेेरी एकमात्र संतान हैं, जिनकी आयु सत्रह महीने की पूरी हो चुकी है।)

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • दलित-नट जाति की सरिता भारत व जाट जाति के वीरेंद्र क्रांतिकारी ने जातीय प्रपंचों को रचनात्मक क्रियाशीलता व सांगठनिक कौशल से समाज के बीच रहते हुए तोड़कर आदर्श स्थापित किया

    दलित-नट जाति की सरिता भारत व जाट जाति के वीरेंद्र क्रांतिकारी ने जातीय प्रपंचों को रचनात्मक क्रियाशीलता व सांगठनिक कौशल से समाज के बीच रहते हुए तोड़कर आदर्श स्थापित किया

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    सरिता भारत उत्तरप्रदेश के हरदोई जिले के एक गांव की दलित नट जाति की हैं। वीरेंद्र क्रांतिकारी उत्तरप्रदेश के ही अमरोहा जिले के एक जाट बाहुल्य गांव सुल्तानपुर के जाट जाति के हैं। वीरेंद्र अक्खड़ व क्रांतिकारी प्रवत्ति के इसी कारण उनके मित्रों/सहपाठियों इत्यादि ने “क्रांतिकारी” कहना शुरू कर दिया। सरिता भारत भावुक व शोषित समाज व शोषित जाति के लोगों के लिए संवेदनशील। मेरी इन दोनों के साथ पहली मुलाकात लगभग चौदह (14) वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के एक गांव में हुई थी। यह तब की बात है जब स्वयं सरिता भारत व वीरेंद्र क्रांतिकारी भी नहीं जानते होंगे कि वे दोनों एक दूसरे के जीवन साथी बनेंगे, दूर-दूर तक ऐसी संभावना नहीं दीखती थी।

    अंतर्जातीय विवाह:

    भारतीय समाज में अंतर्जातीय विवाह करने वाले लोग हैं। इन उदाहरणों में से अधिकतर में पुरुष अपने से ऊंची जाति की लड़की से विवाह करते हैं। इनमें से भी अधिकतर पुरुष अच्छी सरकारी नौकरी करने वाले होते हैं या अच्छे वेतन की बेहतर नौकरी किसी अच्छी कंपनी में या अच्छा खासा व्यापार करते होते हैं। 

    आपको ऐसे बहुत उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें सरकारी अधिकारी दलित-पुरुष, प्रोफेसर दलित-पुरुष या राजनेता या पढ़े लिखे आर्थिक रूप से संपन्न पुरुष इत्यादि के साथ ब्राह्मण स्त्री ने विवाह किया। आपको कुछ ऐसे भी उदाहरण भी मिल जाएंगे जिनमें ब्राह्मण पुरुष ने दलित स्त्री से विवाह किया, इनमें भी अधिकतर घटनाएं ऐसी कि दलित स्त्री संपन्न व प्रतिष्ठित दलित परिवार से होती है।

    यदि इन उदाहरणों को ध्यान से देखा जाए तो इनमें एक महत्वपूर्ण उभयनिष्ठ-तत्व यह है कि इन अंतर्जातीय विवाहों में स्त्री पुरुष दोनों को ही समाज के उन दायरों में नहीं रहना पड़ता है जो जाति के इर्द गिर्द घूमते हैं। इन विवाहों में अधिकतर में पुरुष की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, सुरक्षित व बेहतर भविष्य व जीवन की आश्वस्ति होती है तथा पति-पत्नी किसी मेट्रो या बड़े शहर में निवास करते हैं। 

    चूंकि अच्छी नौकरी है, अच्छी आय का बेेहतर ढांचा है, मेट्रो या बड़े शहरों में रहना है जहां पड़ोसी से भी अभिवादन महीनों में होता है, इसलिए इन अंतर्जातीय विवाहों में पारिवारिक व सामाजिक विरोध का खास मतलब नहीं होता है। विवाह के पूर्व व बाद में कुछ समय तक पारिवारिक विरोध हुआ, चूंकि परिवार व समाज के साथ रहना नहीं होता, उनके ऊपर आर्थिक निर्भरता नहीं होती इसलिए उनके विरोध का ठोस दुष्प्रभाव जीवन में नहीं पड़ता है। कुछ समय पश्चात परिवार ऊपरी नौटंकी व ढोंग इत्यादि दिखाकर विवाह को स्वीकार भी कर लेता है, यदि नहीं भी करता है तो भी जीवन में बहुत अंतर नहीं आता है।

    लेकिन कुछ अंतर्जातीय विवाह अपवाद होते हैं, आदर्श होते हैं। इन विवाहों में जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने का चारित्रिक गुण होता है। सामाजिक मानदंडों को परिवर्तित करने का चरित्र रखते हैं। यह लेख ऐसे ही दम्पति की कहानी है।

    पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहां प्रेम विवाह के कारण माताएं तक अपनी पुत्रियों की हत्याएं कर देतीं हैं। यह लेख इसी क्षेत्र के वीरेंद्र क्रांतिकारी व उनकी पत्नी सरिता भारत के विवाह के ऊपर है। इनका विवाह सही मायने में जाति को तोड़ने का आदर्श स्थापित करता है। यदि आप जाति व्यवस्था को नहीं स्वीकारते हैं तो आपको इनके विवाह के बारे में जानकर अच्छा लगेगा। इन दोनों ने अपना विवाह आम समाज के आम लोगों के समक्ष रचनात्मक तरीके से जाति व्यवस्था का समाधानात्मक विरोध करते हुए किया। ढंके की चोट पर समाज के सामने रचनात्मक तरीके से किए जाने के कारण तथा विवाह के बाद आम समाज के बीच में ही रहते हुए दाम्पत्य जीवन जीने के कारण प्रतिमान बन जाता है।

    विवाह के लिए आपसी सहमति:

    Virendra Krantikari and Sarita Bharat

    मार्च 2008 में वीरेंद्र क्रांतिकारी ने अपने गांव में देश भर के कई राज्यों से लोगों को आमंत्रित करके एक बड़ा आयोजन किया। शहीद भगत सिंह की प्रतिमा स्थापित की। यहीं से आगे चलकर वीरेंद्र व सरिता का झुकाव एक दूसरे की ओर होने लगता है। दिसंबर 2008 में दोनों तय करते हैं कि विवाह करेंगे तथा शोषितों के लिए, गरीबों के लिए एक दूसरे के साथ जीते हुए मिलकर जीवन लगाएंगे।

    ये लोग चाहते तो बिना हंगामे के परिवार व समाज को बिना बताए चुपचाप विवाह करके सकून से दाम्पत्य जीवन जीते। चुपचाप वाले विवाह से जाति के घिनौनेपन में कोई प्रहार भी नहीं होना था, लोगों की मानसिकताएं भी नहीं टूटनीं थीं, एक तरह से जाति व्यवस्था के समक्ष समर्पण कर देने जैसी बात थी। वीरेंद्र क्रांतिकारी व सरिता भारत की क्रांतिकारी व सामाजिक न्याय वाली विचारधारा, जाति के कारण इस तरह की विवशता को स्वीकारने को तैयार नहीं थी कि चुपचाप विवाह किया जाए।

    Virendra Krantikari

    दिसंबर 2008 में विवाह का निर्णय लेने के बाद वीरेंद्र क्रांतिकारी ने अपने परिवार को धीरे-धीरे तैयार किया। कुछ महीने चर्चाओं के दौर चले, विरोध झेलना पड़ा लेकिन वीरेंद्र ने अपने परिवार को इस विवाह के लिए तैयार कर लिया। समाज की सोच बदलने के लिए समय-समय पर जाति, समाज इत्यादि मु्द्दों पर चर्चाओं के कई आयोजन किए, एक तरह से गांव-समाज के बीच वैचारिक अभियान चलाया। 

    सरिता भारत हरदोई जिले की दलित-नट जाति से हैं। इस जाति की अपनी जाति पंचायत होती है, अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं, जिनको तोड़कर इस विवाह के लिए सहमति देना सरिता के परिवार के लिए संभव रहा भी नहीं होगा। सरिता भारत के पिता बचपन में ही गुजर गए थे। पिता के गुजरने के बाद जाति पंचायत ने सरिता भारत की माता का विवाह उनके देवर, सरिता के चाचा, के साथ कर दिया। इस तरह सरिता का पालन-पोषण उनके सौतेले पिता/चाचा के द्वारा हुआ। 

    विवाह-समारोह:

    वीरेंद्र क्रांतिकारी ने अपने गांव, पड़ोसी गांवों व समाज के हजारों लोगों को आमंत्रित करते हुए विवाह का आयोजन किया।आर्यसमाज पद्धति से विवाह की रीति संपन्न हुई। लोगों को आमंत्रित करने के लिए बाकायदा पर्चा छपवाए, गांवों-गांवों में बांटे। गरीबों के मुद्दों के लिए काम करने के लिए सरिता व वीरेंद्र ने एक संगठन “भारतीय गरीब जन आन्दोलन” बनाया था, उसी के बैनर तले विवाह समारोह के लिए दो-दिवसीय जनसभा व सामाजिक चर्चा का आयोजन किया। अच्छी पुस्तकों व साहित्य को बांटा। 21 व 22 फरवरी 2009 के दो दिनों के इस आयोजन में 21 फरवरी को विवाह व सामूहिक भोज संपन्न हुआ, 22 फरवरी को जाति व अन्य सामाजिक मुद्दों पर खुलकर चर्चाएं कीं। विवाह में विभिन्न राज्यों व गांवों से आए दो हजार (2000) से अधिक लोगों ने भोजन ग्रहण किया।

    Virendra Krantikari and Sarita Bharat (Marriage Ceremony, the first day)

    Virendra Krantikari and Sarita Bharat (Marriage Ceremony, the second day)

    विवाहोपरांत दलित-नट जाति-पंचायत से दंडित होना:

    विवाह के बाद वीरेंद्र क्रांतिकारी व सरिता भारत दलित-नट जाति की जाति-पंचायत के सामने प्रस्तुत हुए तथा जाति-पंचायत की प्रक्रियाओं से गुजरे व जो दंड दिया गया उस दंड को स्वीकारा। अब इनका विवाह दोनों पक्षों के परिवारों की ओर से स्वीकृत है। इनकी एक संतान/पुत्र है जिसका नाम “संकल्प” है।

    Sarita Bharat, Virendra Krantikari with Sankalp

    सरिता भारत सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ शिक्षिका भी हैं। वीरेंद्र क्रांतिकारी पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, कहीं नौकरी नहीं करते हैं, कहीं से वेतन नहीं प्राप्त करते हैं। किसानों, जाति व साम्प्रदायिकता के मुद्दों पर उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा व अन्य राज्यों के गांवों में जमीन पर काम करते हैं। घर के कामकाज में खाना बनाने, कपड़े धोने व बच्चे की देखभाल तक सारे घरेलू कार्यों में पत्नी का पूरा सहयोग करते हैं।

    वीरेंद्र की माता को कैंसर है, उनकी देखभाल दोनों पति-पत्नी मिलकर करते हैं। 21 फरवरी को उनके विवाह की वर्षगांठ है, आप चाहें तो उनको इस लेख में कमेंट्स के द्वारा इनको शुभकामनाएं दे सकते हैं, आपकी शुभकामनाएं सरिता व वीरेंद्र तक ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया द्वारा ससम्मान व सप्रेम पहुंचा दी जाएंगीं। मेरी ओर से दम्पति को कोटि-कोटि शुभकामनाएं।

    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • संदीप वर्मा : एक आम आदमी की वैचारिक-यात्रा की बेतरतीब कहानी

    संदीप वर्मा : एक आम आदमी की वैचारिक-यात्रा की बेतरतीब कहानी

    Vivek “Samajik Yayavar”

    संदीप वर्मा के पिता के बचपन में ही उनकी माता का देहांत हो चुका था। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण कभी इस रिश्तेदार के यहां, कभी उस रिश्तेदार के यहां भटकते हुए बिन माता के बालक संदीप के पिता का बचपन से किशोरावस्था का समय किसी तरह व्यतीत हुआ। किसी तरह दिल्ली पहुंचे, वहां जिन मुस्लिम व्यक्ति के यहां घड़ी सुधारने का काम सीखा, ताकि जीवन की गुजर बसर हो सके, आजीवन उनको अपना गुरू मानते रहे, पैर छूकर आदर देते रहे, गुरू शिष्य की परंपरा का निर्वाह करते रहे। सर्वधर्म सौहार्द का भाव व विनम्रता संदीप को उनके पिता से ही प्राप्त हुए।

    संदीप ने लखनऊ विश्वविद्यालय से विज्ञान की पढ़ाई की है। संदीप वर्मा की पढ़ाई उनके गांव व लखनऊ शहर के सस्ते सरकारी स्कूलों व लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई। संदीप को पत्रिकाएं पढ़ने का बहुत शौक था लेकिन खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे। इसलिए यहां वहां से उधार मांग कर जुगाड़ करते थे।

    पिछड़े जाति के होने का दंश भोगने व बचपन से ही शोषण व व्यवस्था की खामियां भोगते रहने के कारण भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े होना है, करना है; कुछ ऐसी सोच बनी। संभवतः पत्रिकाएं व पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति के कारण जो ढोंग है, जो प्रायोजित है, उससे इतर भेद कर देखने की दृष्टि भी बननी शुरू हुई। 

    Sandeep Verma

    संदीप वर्मा भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रति विशेष अनुराग व आदर का भाव रखते हैं। इसका कारण वीपी सिंह के द्वारा राजनैतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाना तथा मंडल कमीशन जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक न्याय के कार्य इत्यादि हैं। उस समय किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ रहे संदीप वर्मा राजनैतिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वीपी सिंह के आवाहन के साथ जमकर, परिश्रम करते हुए भरपूर सक्रियता के साथ जुटे पड़े थे।

    भारत में आम आदमी वह भी जो सरल आदमी हो, उसके लिए संभावनाएं नहीं रहतीं हैं, उल्टे शोषण तिरस्कार अपमान ही मिलता है। लेकिन मन के अंदर सामाजिक न्याय के लिए करते रहने की भावना कुछ न कुछ किसी न किसी मार्ग से करवाती रही। इसी प्रक्रिया में लगभग छः वर्ष पहले फेसबुक में आने के बाद संदीप वर्मा को महसूस हुआ कि सोशल मीडिया का सामाजिक न्याय व राजनैतिक चेतना के लिए बेहतर प्रयोग किया जा सकता है। संदीप लग गए वीपी सिंह की दलितों पिछड़ों व सामाजिक न्याय के प्रति सोच को लेकर। 

    सामाजिक न्याय व चेतना के प्रयासों को विस्तार देने के लिए लगभग तीन वर्ष पहले “जमावाड़ा” के नाम से सामाजिक चर्चाओं की सभाओं के आयोजन में। तीन लोगों से आरंभ हुआ जमावाड़ा आज पचास से अधिक लोगों का मंच है जो वैचारिक चर्चाएं करता है तथा घृणा की प्रचलित राजनीति के विपरीत जाकर प्रेम, सद्भाव और सहयोग के लिए प्रयास करता है। 

    मेरी मुलाकात:

    मैं लखनऊ गया हुआ था। फेसबुक से सूचना पाकर संदीप वर्मा मुझसे मिलने आए। शिक्षक हैं, लेकिन केवल मेरे साथ दिन बिताने के लिए अपना काम-काज छोड़कर साथ रहे, जबकि इनकी परिस्थिति रोज कुआं खोदना व रोज पानी पीने जैसी है। उनकी इच्छा थी कि मैं उनके घर चलकर रूखा-सूखा जो है वह भोजन करने चलूं, लेकिन उस दिन मेरी इतनी व्यस्तता थी कि संभव नहीं था। फिर भी संदीप भाई के ऊपर भोजन उधार है, जब भी भारत में कुछ दिनों के लिए पहुंचूंगा तब उधार वसूला जाएगा।

    बेहद विनम्र व सरलमना व्यक्ति। मेरी पहली मुलाकात थी। सोशल मीडिया में बहुत बार ऐसा होता है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का ठीक से अनुमान नहीं हो पाता। पूरा दिन साथ रहने के बाद मेरे अनुभव संदीप भाई के साथ बहुत अच्छे रहे। मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि एक आम आदमी जो सरलमना है, दांवपेच नहीं खेलता, मन में जो भाव हुआ उस आधार पर सोशल मीडिया पर अपनी बात रखता है। तब से मैंने संदीप भाई की फेसबुक पोस्टों व टिप्पणियों को अलग भाव व दृष्टि से देखना समझना शुरू किया, मुझे यह महसूस होना शुरू हुआ कि संदीप भाई संवेदनशीलता के साथ लिखते हैं।

    फेसबुक के माध्यम से मालूम हुआ कि संदीप भाई को कांग्रेस ने लखनऊ का विचार विभाग का दायित्व सौंपा है। संदीप जैसे आम आदमी, सरल आदमी जिसे राजनैतिक दांवपेच का ककहरा भी नहीं आता; कांग्रेस ने ऐसे बेहद सामान्य आदमी को लखनऊ जैसे आधुनिक शहर व उत्तर प्रदेश की राजधानी का विचार विभाग का दायित्व देकर, छोटा सा ही सही लेकिन कम से कम बदलाव का एक संदेश तो दिया ही है। 

    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • डा० उदित राज की आरक्षण मुद्दे पर बातचीत

    डा० उदित राज की आरक्षण मुद्दे पर बातचीत

    Dr Udit Raj

    डा० उदित राज की आरक्षण मुद्दे पर यह बातचीत दिसंबर 2009 की है। आप आरक्षित अनारक्षित किसी भी वर्ग के हों, मेरा सुझाव यह है कि आप अपनी पसंद नापसंद से ऊपर उठकर इस बातचीत को सुनें। आरक्षण के संदर्भ में आपकी सोच संभवतः परिवर्तित हो या नई समझ-दिशा मिले।
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    सामाजिक यायावर

  • शाकाहार मांसाहार बनाम ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत

    शाकाहार मांसाहार बनाम ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत

    ब्राह्मणवाद का विरोध हो, दलित समर्थन हो या भारत की माओवादी क्रांतिकारिता हो। शाकाहार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विरोध उभयनिष्ठ तत्व है। बहुत ऐसी घटनाएं हैं जिनमें शाकाहारी लोगों को माओवादियों द्वारा मांस खाने के लिए बाध्य किया गया या धोखे से मांस खिलाया गया। मैं नहीं जानता कि मानसिकता की शुरुआत कब व कैसे हुई, लेकिन शाकाहार को बहुतेरे दलित चिंतक ब्राह्मणवाद से जोड़कर देखते हैं तथा मांसाहार को ब्राह्मणवाद के विरोध के रूप में देखते हैं। इस धींगामुस्ती के लिए तर्क खोज कर लाते हैं, अच्छी खासी ऊर्जा का अपव्यय करते हैं। समाज में वैसे ही लोगों की मान्यताओं के कारण बहुत सारी खाइयां हैं। मांसाहार शाकाहार वाली खाई भी पैदा कर दी जाती है। आइए मांसाहार शाकाहार से संबंधित कुछ तथ्यों को देखते समझते हैं।

    आधुनिक भारतीय परिवेश में गरीब लोगों के लिए शाकाहार सरल, सुलभ व सस्ता है:

    • वे लोग जो जंगलों में रहते हैं:

      भारत में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो जंगलों में रहते हैं। जो लोग जंगलों में रहते हैं उनको भी पशु उपलब्ध नहीं हैं। जो समाज जंगलों में रहते हैं उनके लिए भी पशुओं की उपलब्धता कम होने के कारणों में पशुओं की प्रजातियों का विलुप्त होना, पशुओं की संख्या कम होते जाना व जंगलात के कानून हैं। जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोगों को जंगल में रहने के बावजूद पौष्टिक भोजन मिल पाना संभव नहीं रहा। पेड़ों की छालें, पत्तियां व पौधों को पानी में उबालकर खाते पीते रहे। चावल का विभिन्न प्रकार से प्रयोग प्रमुख खाद्य रहा।

    • वे लोग जो जंगलों में नहीं रहते हैं (मुख्यधारा के लोग):

      मांसाहार के लिए पशु चाहिए या जलचर चाहिए। पशुओं के लिए चारगाह व पानी स्रोत चाहिए। जलचरों के लिए तो पानी स्रोत चाहिए ही चाहिए। एक समय था जब गांवों में तालाब होते थे, छोटी-छोटी सरिताएं होतीं थीं। मछली अपने आप उत्पादित होती थी। कोई भी गया तालाब में घुसा, मछली निकाल लाया और पका कर खा लिया। अनेक प्रकार के छोटे-मोटे पशु सहजता से उपलब्ध रहते थे। कुछ नहीं तो खेतों में चूहे तो मिल ही जाते थे। अब तो रासायनिक खादों व कीटनाशकों के प्रयोग के कारण व इनके प्रयोग से जमीन कड़ी हो जाने के कारण खेतों में चूहों व अन्य जानवरों की उपलब्धता बहुत तेजी से घटी है।

      पहले लोग जानवरों से खेती करते थे। जानवरों की मृत्यु होती रहती थी जिनका प्रयोग अछूत माने जाने वाले लोगों को करने के दे दिया जाता था। किसी गांव की अछुत बस्ती में जाते ही सुअर दिखने शुरू हो जाते थे, अछूत लोग खूब सुअर पालते थे, जो नालियों में लोटते रहते थे, कुछ नहीं तो गंदगी खा करके ही मस्त रहते थे, कुलमिलाकर सुअर अपने खाने का जुगाड़ खुद ही कर लिया करता था। भैंस, सुअर इत्यादि जैसे जानवर अछूतों के भोजन का अभिन्न अंग थे।

      अब बहुत कुछ बदल चुका है। स्थितियां परिस्थितियां व मानसिकताएं बदलीं हैं। कितने दलित लोग ऐसे हैं जो नालियों में लोटने वाले सुअर को खाना चाहते हैं। लोग अब जानवरों के मरने का इंतजार नहीं करते हैं, जिस जानवर का भी दूध कम हुआ उमर बढ़ी उसको स्लाटर हाउस में बेच कर पैसे कमा लिए। बछड़ों को तो बैल बनने ही नहीं दिया जाता, क्योंकि खेती में बैलों का प्रयोग किया ही नहीं जाता, बछड़ों को तब तक घर में रखा जाता है जब तक उसको पैदा करने वाली गाय का दूध निकालने के लिए बछड़े की जरूरत रहती है। यह जरूरत खतम होते ही बछड़े को स्लाटर हाउसों को बेच दिया जाता है।

      यदि गांवों के तालाबों में अछूतों का प्रवेश निषेध रहा तो आसपास की किसी छोटी बड़ी नदी में चले गए जलचरों का जुगाड़ कर लिया। अब या नदियां सूख गई हैं या इतनी अधिक प्रदूषित हो चुकी हैं कि जलचरों की संख्या नगण्य हो चुकी है। तालाब बचे नहीं, नदियां बचीं नहीं, बचे भी हैं तो उनमें मछलियों का उत्पादन व्यवसायिक हो चुका है।

    यह एक कटु सत्य है कि दलितों के लिए मांस के जो स्रोत पहले सहजता से उपलब्ध थे वे अब उपलब्ध नहीं हैं। अपवाद इलाकों की बात अलग है। यहां अपवादों की बात हो भी नहीं रही।

    गरीबों के लिए आधुनिक भारत में मांसाहार उत्पादन बनाम शाकाहर उत्पादन:

    मांसाहार उत्पादन शाकाहार उत्पादन की तुलना में अधिक खर्चीला है। जिनके पास दाल चावल उगाने की जमीन नहीं वे पशुओं के उत्पादन के लिए जानवरों के लिए चारागाह कहां से लाएंगें। दूसरी बात यह कि मुख्यधारा वाले इलाकों में अब चारागाह बचे ही कहां हैं। तालाब बचे नहीं तो पशुओं को पानी कहां से मिलेगा। पशु तो हैंडपंप से पानी निकाल पी नहीं सकते हैं। अब पशुओं का उत्पादन करना पड़ता है, स्वतः पशुओं का उत्पादन स्वतः होने वाली सामाजिक जीवन शैली अब नहीं रही। वर्ष भर में मांस के लिए एक परिवार को जितने पशु चाहिए, उनके लिए जितने बड़े चारगाह की जरूरत होगी उससे बहुत कम जमीन में वर्ष भर की जरूरत का अनाज उगाया जा सकता है। मांसाहार की तुलना में शाकाहार उत्पादन में बहुत कम पानी की आवशयकता होती है।

    मान लीजिए कि यदि मुर्गी भी पाली जाए तो मुर्गी दाना खाती है। यदि मुर्गी को दालें व अनाज देने लायक क्षमता है तो स्वयं भी तो उस अनाज का प्रयोग किया जा सकता है। यह तो केवल मांसाहार करने के लिए गरीबी में भी अतिरिक्त निवेश करना हुआ। शाकाहार ही तो सरल सुलभ हुआ।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मांसाहार वाले भी रोटी, चावल इत्यादि खाते हैं। ऐसा तो है नहीं कि केवल मांस खाकर ही जीवित रहते हैं। रोटी चावल इत्यादि अनाजों का इंतजाम तो कहीं न कहीं से किसी न किसी जुगाड़ से करते ही हैं।

    गरीब से गरीब आदमी भी अपनी झोपड़ी में लौकी, तरोई, कद्दू इत्यादि उगा सकता है। सिर्फ एक पौधा ही पूरे परिवार को पूरे मौसम सप्लाई कर सकता है। घर में प्रयोग किए जाने वाले पानी में से ही पौधों को दो चार लोटा पानी दिया जा सकता है। जरूरी तत्वों वाली सब्जियों का उत्पादन झोपड़ी में ही किया जा सकता है वह भी बिना अतिरिक्त खर्च के। अब रही बात रोटी व चावल की तो मांसाहार करते समय रोटी चावल का जुगाड़ जहां से करता है, वहीं से करे।

    मेरा सिर्फ यह कहना है कि आधुनिक परिवेश में भारत में गरीब आदमी के लिए मांसाहार की तुलना में शाकाहार सरल व सुलभ विकल्प है। 

    शाकाहार बनाम मांसाहार:

    दुनिया में ऐसे बहुत देश हैं, ऐसे क्षेत्र हैं जहां शाकाहार से मनुष्य को भोजन उपलब्ध करा पाना संभव नहीं। यूरोप में ऐसे अनेक देश हैं जहां वर्ष में महीनों ऐसी स्थिति रहती है कि शाकाहार का उत्पादन संभव नहीं। ऐसे बहुत देश व क्षेत्र हैं जहां जमीन कम पानी अधिक है। दुनिया में ऐसे कई देश हैं जहां कृषि के लिए उपजाऊ जमीन नहीं। यदि सार्वभौमिकता के साथ विचार किया जाए तो दुनिया में केवल शाकाहार पर निर्भरता संभव नहीं। भिन्न-भिन्न भोगोलिक परिस्थितयों के आधार पर वहां के लोगों ने खानपान, रहनसहन व आचार विचार की परंपराएं बनाईं व स्थापित की। यही सांस्कृतिक विभिन्नता है।

    • क्या केवल मांसाहार संभव है:

      अपवाद क्षेत्रों व अपवाद लोगों को यदि छोड़ दिया जाए तो केवल मांसाहार संभव नहीं। दुनिया में ऐसे अपवाद लोग ही हैं जो पूरा जीवन केवल और केवल मांस खाकर रहते हों। जो लोग मांस खाते हैं वे लोग भी बहुत मात्रा में पास्ता खाते हैं, तोफू खाते हैं, दालें खाते हैं, दूध की बनी वस्तुएं खाते हैं, चीज खाते हैं, मक्खन खाते हैं, सब्जियां खाते हैं, ब्रेड खाते हैं, फल खाते हैं, मेवे खाते हैं, अन्य शाकाहारी वस्तुएं खाते हैं। ऐसे लोग विरले ही होंगे जो मांस व मछली के अतिरिक्त किसी प्रकार का शाकाहारी भोजन न करते हों।

    • क्या केवल शाकाहर संभव है:

      बिलकुल संभव है। हममें आपमें से बहुत लोग ऐसे हैं जिन्होंने जीवन में कभी मांसाहार न किया होगा। दरअसल मानव के क्रमिक विकास की प्रक्रिया में मानव बनने तक की प्रक्रिया में मानव बनने तक सभी पूर्वज शाकाहारी ही रहे थे। मानव भी शाकाहारी था, लेकिन मौसम परिवर्तन व भौगोलिक परिस्थितयों के कारण केवल शाकाहार पर निर्भर रह पाना संभव नहीं था इसलिए मनुष्य ने शाकाहार के साथ-साथ मांसाहार का प्रयोग भी करना शुरू किया। मानव शरीर शाकाहार के लिए अधिक उपयुक्त है।

    चलते-चलते:

    मैं शाकाहारी हूँ इसके बावजूद मैं मांसाहार को गलत नहीं मानता। आप मेरी थाली में मांस रखकर मेरे साथ एक ही थाली में भोजन कर सकते हैं। यदि आपके मांस का शोरबा बहता हुआ मेरी दाल या सब्जी में मिल जाता है तब भी मुझे आपके साथ एक ही थाली में भोजन करने में समस्या नहीं। मेरे लिए शाकाहार या मांसाहार  किसी व्यक्ति, धर्म, समुदाय, समाज, सभ्यता या देश का मूल्यांकन करने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। शाकाहार मांसाहार के आधार पर मूल्यांकन करने को मैं निहायत ही वाहियात बात मानता हूँ।

    यह लेख मांसाहार का विरोध करने के लिए नहीं है क्योंकि यह एक तथ्य है कि दुनिया के सभी मनुष्यों का पेट शाकाहार व मांसाहार से ही हो सकता है। हजारों वर्षों पहले मनुष्य ने शाकाहारी होने के बावजूद मांसाहार करना सीखा तब भी सर्वाइव करना ही कारण था।

    यह लेख ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत करने के विरुद्ध तथ्यात्मक आलेख है। यह लेख यह भी बताता है कि आधुनिक भारत में गरीबों के लिए शाकाहारी होना मांसाहारी होने की तुलना में अधिक सरल व सुलभ है।

  • बंदर को पूर्वज मानते ही जाति व्यवस्था, संस्कृति का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिक-श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाती है

    बंदर को पूर्वज मानते ही जाति व्यवस्था, संस्कृति का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिक-श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाती है

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मंत्री जी का बयान तथा समाज का वैज्ञानिक दृष्टिकोण:

    मेरा अनुमान है कि मंत्री जी का भाव दूसरा था, मंत्री जी को यह लगता है कि मनुष्य सीधे आसमान से टपका था। मंत्री जी का बंदर को मनुष्य का पूर्वज मानने से विरोध इसलिए है क्योंकि यदि बंदर को मनुष्य का पूर्वज मान लिया जाएगा तो ईश्वर की काल्पनिक अवधारणाओं, पौराणिक कथाओं व पुराणों का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिकता पूरी तरह से खतरे में पड़ जाएगी। ब्राह्मण मुंह से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य कही और से व शूद्र पैरों से पैदा हुआ मानने वाली जाति व्यवस्था का आधार छिन्न भिन्न हो जाएगा।

    स्वर्ग नर्क की अवधारणा खतरे में पड़ जाएगी। स्वर्ग नर्क, देवी देवताओं, देवराज इत्यादि की आधार पर गढ़ी गईं सैकड़ों हजारों कहानियों व सांस्कृतिक तामझाम के आमूलचूल अस्तित्व पर खतरा आ जाएगा। पुष्पक विमान, सूक्ष्म शल्य चिकित्सा व अन्य वैज्ञानिक दावों का वजूद पूरी तरह से ही खतम हो जाएगा।

    किसी कागज में चार लकीरें खींच कर, ग्रहों का एक घर से दूसरे घर में जाना। ग्रहों के इस प्रकार एक घर से दूसरे घर में आने-जाने का किसी मानव के जीवन के उतार चढ़ाव यहां तक कि वह किससे शादी करेगा, कब सेक्स करेगा, कब खाना खाएगा, कब मूत्र-त्याग करेगा, कब शौच क्रिया करेगा, शौच क्रिया करते समय किस-किस पशु-पक्षी से मुलाकात होगी, किस दिन किस समय क्या खाएगा, इत्यादि-इत्यादि की गणना तक कर ली जाती है। सैकड़ों-हजारों वर्षों से चली आ रही इन सब फर्जी वैज्ञानिकता, विशेषज्ञता, शुचिता व ईश्वरीय संबंधों इत्यादि के फर्जीवाड़े के तामझाम पर सवाल उठना शुरू हो जाता है।

    मैं यह नहीं मानता कि मंत्री जी ने इस प्रकार का बयान किसी धूर्तता पूर्ण सोची समझी साजिश के कारण दिया। मेरा मानना है कि सैकड़ों-हजारों वर्षों से यह सब हमारे आपके दिलोदिमाग में बहुत गहरे पैठ गया है। हम कितना भी विज्ञान पढ़ लें। वैसे भी हम विज्ञान नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं। जिसे हम पढ़ना कहते हैं उस पढ़ने का मतलब होता है रट लेना। रट कर परीक्षा की उत्तर पुस्तिका में उल्टी करके लिख देना।

    लोग IIT के पढ़े होंगे, कम्प्यूटर प्रयोग करते होंगे, स्मार्ट फोन प्रयोग करते होंगे। जल, जंगल, जमीन, आसमान, पशु-पक्षियों, रसायनों व अंतरिक्ष विज्ञान को समझने का दावा करते होंगे। खुद समझने का दावा न भी कर पाते हों तो भी दूसरों के किए गए दावों से खुश होते हैं।

    अपने बच्चों के लिए छोटी उम्र से ही IIT में भेजने की योजना बनाते हैं। छोटी कक्षाओं से ही बच्चों के मन-मस्तिष्क में भर देते हैं कि IIT पहुंचना है। यहां मैं IIT का नाम केवल इसलिए ले रहा हूं क्योंकि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में न होने के बावजूद भारत में सबसे बेहतर संस्थान माने जाते हैं। पटाक से नौकरी लगती है। चूंकि अंधों में काने राजा हैं ही तो ऊंची सरकारी नौकरियां भी पटाक से लगतीं हैं।

    आप इन पढ़े लिखे लोगों की जीवन शैली देखिए। इनके घरों में छोटे-मोटे मंदिर तक मिलेंगे। पूजा पाठ करेंगे व बच्चों से करवाएंगे। वह भी इसलिए क्योंकि बच्चे को अच्छे नंबर मिलें, बच्चे को परीक्षाओं में सफलता मिले, बच्चे को मनचाही नौकरी मिले।

    ऐसा ही बहुत कुछ और भी।

    एक तरफ तो विज्ञान की किताबें रटा रहे हैं ताकि नौकरी मिले, ऐशो-आराम वाली तरक्की मिले। दूसरी तरफ बच्चे के दिलोदिमाग में कूट-कूट कर भर रहे हैं कि देवी-देवता होते हैं जो सबकुछ निर्धारित करते हैं। किसी खास तरीके से कुछ कर्मकांड करने से जीवन में यह सफलता मिलती है, वह मिलता है। बच्चा भले ही IIT या IISc से विज्ञान या तकनीक में PhD कर ले। लेकिन उसकी मानसिकता तो वही रहेगी जैसी बचपन से वह अपने इर्द-गिर्द देखता आया है।

    यही कारण है अपवादों को छोड़कर अपने समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लोग होना बहुत मुश्किल होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना अलग बात है, वैज्ञानिक पदों, विज्ञान के शिक्षकों, विज्ञान या तकनीक के विषयों की प्रोफेसरी इत्यादि की नौकरियां करना बिलकुल अलग बात है। जिस समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव हो, उस समाज के मंत्री जी ने जो बयान दिया है। वह इस कारण भी हो सकता है कि मंत्री जी को सच में ही ऐसा लगता हो। यह जरूरी नहीं कि मंत्री जी के बयान के पीछे कोई सोची-समझी धूर्तता ही हो।

    यह कल्पना करने में क्या जाता है कि हम पुष्पक विमान बनाते थे, हम सूक्ष्म शल्य-चिकित्सा करते थे, हम वानर-मनुष्य के पसीने से मछली को मुंहे से गर्भवती कराकर वानर-मनुष्य पैदा करवाते थे। हम पहले विज्ञान में बहुत ही आगे थे, फिर कुछ ऐसा हुआ कि सबकुछ अचानक तहस-नहस हो गया, केवल इन वैज्ञानिक उपलब्धियों की बात करने वाले ग्रंथ किसी तरह बचे रह गए, जिससे हमको मालूम पड़ता है कि हम कितने विकसित व महान थे। हमारे काल्पनिक ऋषि मनीषी बहुत महान थे, पूरी सृष्टि व ब्रह्मांण की चिंदी-चिंदी समझ रखी थी। सबकुछ वैदिक-संस्कृत जैसी गूढ़ भाषा के गूढ़ मंत्रों में दिया गया है। दुनिया का सारा ज्ञान इन मत्रों में समाया है, सभी मंत्रों में गूढ़ व सूक्ष्म विज्ञान छुपा है, बस समझने वाली बात है।

    लीजिए कर लीजिए जो बन पड़े। वैज्ञानिकता गई तेल लेने। स्वंभू विज्ञान, स्वयंभू वैज्ञानिकता, स्वयंभू वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

    मेरी बात कि बंदर मनुष्य के पूर्वज नहीं थे:

    मैं लंबे समय तक यही मानता रहा कि बंदर ही मनुष्य के पूर्वज हैं। जीव विज्ञान की किताबों में यही पढ़ाया गया था। इधर कुछ वर्षों में कुछ गंभीर व विश्वविख्यात वैज्ञानिकों की कुछ पुस्तकें हाथ लगीं। मालूम पड़ा कि क्रमिक विकास की प्रक्रिया में बंदर मनुष्य के पूर्वज नहीं थे वरन् बंदर व मनुष्य के पूर्वज एक ही थे। मालूम पड़ा कि एप, चिम्पाजी व बंदर में अंतर होता है। मालूम पड़ा कि एप मनुष्य के पूर्वज थे। मालूम पड़ा कि चिम्पाजी मनुष्य के पूर्वज थे। बंदर मनुष्य के पूर्वज न होकर सहोदर थे, समान पूर्वजों से निकली एक दूसरी शाखा।

    हमारे समाज की शिक्षा-प्रणाली ऐसी है कि हमें गंभीर स्वाध्याय करने की जरूरत नहीं रहती। हमारा लक्ष्य केवल परीक्षाओं में नंबर पाना होता है। आपको विज्ञान, गणित या किसी अन्य विषय की समझ हो, आप बहुत अधिक अध्ययन करते हों यह भी संभव है कि आपको अपने विद्यालय में विषय के शिक्षकों से अधिक आता हो लेकिन यदि आप परीक्षा में नंबर नहीं ला पाते हैं। यदि आप नौकरी नहीं पा पाते हैं तो आपको कुछ नहीं आता। परीक्षा में नंबर व नौकरी ही आपकी योग्यता के मानदंड हैं।

    अपने समाज में अधिकतर लोग ऐसे होते हैं जिन्होंने कभी भी गंभीर व विस्तृत स्वाध्याय नहीं किया होता है। विषय वस्तु को गहराई व वस्तुनिष्ठता से समझने जानने के गंभीर प्रयास की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपनी या अपनी मानसिकता को पसंद आने वाला या मुफीद बैठने वाला कुछ पढ़ पुढ़ लेते हैं, फिर उसी को आधार बना कर अपनी तार्किक क्षमता व स्तर के घालमेल करते हुए अपने भीतर एक अनुकूलता तैयार कर लेते हैं, फिर उसी अनुकूलता से देखते समझते व दिखाते समझाते हैं। ऐसा करते-करते अनुकूलता की पैठ इतनी हो जाती है कि इन लोगों को यह लगने लगता है कि ये सबकुछ समझते हैं। दुनिया की सारी थियरीज, सारे सिद्धांत, सारी अवधारणाएं सभी कुछ समझे हुए हैं या समझने की क्षमता रखते हैं। रटना, मान लेना, पहले से ही रटे हुए व माने हुए को तर्क से साबित करना तथा माने हुए को अधिक पुख्ता करना …. इसी प्रकार के तथाकथित विद्वानों व ज्ञानियों की समझ, ज्ञान, विद्वता, चिंतन, विचाशीलता इत्यादि का कुल यही जमा खाता होता है।

    चूंकि ऐसे लोगों की विद्वता, ज्ञान, समझ इत्यादि सभी कुछ शब्दों के रटाव व मानने तथा रटे हुए शब्दों व मानने के तार्किक झोलझाल तक सीमित रहता है; इसलिए इन लोगों की जीवन शैली, जीवन के प्रति सोच, जीवन के प्रति मानसिकता आदि में बेहद खोखलापन व विरोधाभास रहता है। लेकिन तार्किक झोलझाल वाली विद्वता, ज्ञान व समझ का अहंकार इतना अधिक होता है कि विरोधाभास व खोखलापन दिखाई भी नहीं देता है।

    ऐसे लोग मानसिक, वैचारिक व भावनात्मक रूप से विकृत व कुंठित होते हैं क्योंकि इनका जीवन की सार्थकता, समाज व समाधान से कोई ईमानदार व प्रतिबद्ध लेना देना नहीं होता। उल्टे ये लोग इन सब तत्वों को मूर्खता मानते हैं। काश ये लोग तार्किक क्षमता का बेहतर प्रयोग कर पाते। लेकिन शायद इनकी तार्किक क्षमता भी सूक्ष्मता के स्तर की नहीं ही होती है, अन्यथा सूक्ष्मता देख पाने, स्वीकार कर पाने व उसको जी पाने की क्षमता भी होती।

    इतना ही नहीं बल्कि दुनिया के लोग जो अध्ययन करते हैं, आविष्कार करते हैं, मौलिक शोध करते हैं, एक एक बिंदु की सूक्ष्मता को समझने के लिए सालों लगाते हैं, यहां तक कि अपना जीवन तक लगाते हैं, कुछ लोग तो अपने ऊपर ही जीवंत प्रयोग तक करके देखते हैं, बार बार असफल होने के बावजूद लगे रहते हैं …. इत्यादि लोग अयोग्य होते हैं, नासमझ होते हैं मूर्ख होते हैं। ये नासमझ व मूर्ख लोग बिना मतलब निरंतर इतनी मेहनत करते हैं, धैर्य रखकर समझने का प्रयास करते हैं। इतनी मेहनत व धैर्य इत्यादि की बजाय यदि ये लोग भी अपनी पसंद/नापसंद के आधार पर तर्क/वितर्क/कुतर्क के साथ इस अनुच्छेद के ऊपर वाले बाक्स में तीन अनुच्छेदों में बताए गए विद्वानों व ज्ञानियों की तरह कुछ पढ़ पुढ़ लेते, कुछ रट रटा लेते तो दुनिया की सारी थियरीज, सारे सिद्धांत, सारी अवधारणाएं सबकुछ अपने आप ही समझ कर विद्वान व ज्ञानी हो जाते।  

    चलते-चलते:

    भारत के एक मंत्री जी ने संभवतः एक बयान दिया कि मनुष्यों के पूर्वज बंदर नहीं थे। मैंने भी कई पोस्टें लिखीं जिनमें कहा कि बंदर मनुष्य का पूर्वज नहीं था। मेरी बात व मंत्री जी की बयान के पीछे के भावों व कारणों में बहुत अधिक अंतर है।

    वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संभावना का हनन, खाचों को प्राथमिकता देने के कारण ही होता है। यह खांचा भले ही ब्राह्मणवाद हो या ब्राह्मणवाद का विरोध या किसी राजनैतिक दल या विचार का समर्थन या विरोध। सामाजिक समाधान व वास्तविक शिक्षा बेहद गूढ़, सूक्ष्म व दृष्टि वाली बात होती है।  

     

  • मोदी जी की पकोड़ों वाली बात का समर्थन करता हूँ : लेकिन बिना गंभीरता, दृढ़ता व दूरदर्शिता के केवल बयान देने भर से कुछ नहीं होने वाला

    मोदी जी की पकोड़ों वाली बात का समर्थन करता हूँ : लेकिन बिना गंभीरता, दृढ़ता व दूरदर्शिता के केवल बयान देने भर से कुछ नहीं होने वाला

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    सुनने में आया है कि मोदी जी ने लोगों को पकोड़े बनाकर बेचने या इस जैसे ही रोजगारों की ओर रुचि लेने का सुझाव दिया है, प्रोत्साहित किया है। या ऐसा ही कुछ। बड़ा हंगामा पड़ा हुआ है फेसबुक, व्हाट्सअप व अन्य सोशल मीडिया पर। इस बयान की खिल्लियां उड़ाई जा रहीं हैं। लोगबाग अपने-अपने राजनैतिक खांचों के आधार पर बयान के समर्थन विरोध में जुटे पड़े हैं।

    Narendra Modi


    मेरा मानना है कि मोदी जी की पकोड़ों वाली बात सूक्ष्मदृष्टि वाली बात है। भारतीय समाज के लिए लाभकारी बात है। लेकिन केवल बयान देने भर से काम नहीं चलेगा। देश के प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी को कुछ दूरदर्शी व ठोस निर्णय भी लेने होगें। इन निर्णयों के लिए मोदी जी को उसी इच्छाशक्ति व लोगों की चीख-चिल्लाहट पर बिलकुल ध्यान न देने जैसी दृढ़ता का पालन करना होगा जैसे कि उन्होंने नोटबंदी में दिखाया था। नोटबंदी से तो खैर कोई लाभ नहीं था, लेकिन पकोड़े बात के विस्तार से बेशक भारतीय समाज को बहुत लाभ होगा। लेकिन पहली व अंतिम शर्त यह है कि मोदी जी ऐसा कर पाएं, तब।

    नौकरी:

    सरकारी नौकरी या प्राइवेट नौकरी कभी भी किसी समाज के लिए समाधान दे ही नहीं सकती है। यह संभव ही नहीं कि सभी को सरकारी नौकरी दी जा सके। सभी को निजी संस्थान नौकरी दे सकें। स्वावलंबन व स्वावलंबन से जुड़े व्यापार व बाजार किसी समाज के आर्थिक विकास की मूलभूत शर्त हैं।

    भारत में शिक्षा, योग्यता, मेधाविता व प्रतिभा के मानदंड केवल स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में चलनी वाली पुस्तकों को रटने तक ही पूरी तरह प्रतिष्ठित कर दिए गए हैं। ऐसा शुरू से ही रहा है, पहले पोथियां रटीं जातीं थीं, जो ब्राह्मण पुरोहित गुरु जितनी पोथियां रट कर शब्दशः दोहरा ले, वह उतना ही अधिक महान योग्य व प्रतिष्ठित।

    यह सारी शिक्षा, योग्यता, मेधाविता व प्रतिभा इत्यादि का अंतिम लक्ष्य सरकारी या गैरसरकारी नौकरी पाना ही रहा। किसी भी देश समाज में हो, सरकारी नौकरियां हमेशा ही लोगों की संख्या से बहुत कम होती हैं। फिर भारत जैसे देशों में तो केवल नौकरियां देने के लिए ही जरूरत बिलकुल भी न होने के बावजूद अनेक विभागों व अनेक पदों का सृजन किया गया। शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य सरकारी नौकरी पाना रहा।

    पीवी नरसिंहाराव जी ने बाजार खोला तो गैरसरकारी नौकरियां भी पैदा हुईं। समय के साथ परिवर्तन हुए, गैरसरकारी नौकरियों में ऊंचे वेतन मिलने लगे। जो लोग सरकारी नौकरी न प्राप्त कर पाते वे ऊंचे वेतन वाली गैरसरकारी नौकरियों की ओर जाने लगे।

    लेकिन सरकारी नौकरियों के प्रति भयंकर आकर्षण आजतक व्याप्त है। सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण खतम होते ही नौकरियों के प्रति आकर्षण स्वतः खतम होने लगेगा। तब ऐसा समय आएगा जब मोदी जी की पकोड़ों वाली बात की गहराई लोगों को समझ में आ पाएगी। तब तक यह बात भी एक जुमला ही बनकर रह जाएगी।

    सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण के मुख्य कारण हैं। सरकारी कर्मचारियों व नौकरशाहों को भारतीय समाज का मालिक होना, सार्वजनिक संपत्तियों यहां तक कि आम लोगों के जीवन पर इन लोगों का निरंकुश अधिकार होना। जब तक ऐसा रहेगा, तब तक न दहेज बंद होगा, न हिंसा, न भ्रष्टाचार, न गैरजिम्मेदारानापन (मोदी जी चाहें तो हर महीने नोटबंदी लागू करते रहें)। 

    लोगों की सोच बदलनी होगी कि नौकरी करने वाला महान नहीं होता। अभी यह माना जाता है कि जिसने कोई परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी पा ली है वह योग्य है, प्रतिभावान है, मेधावी है। जबकि नौकरी मिलने का मानदंड या तो कुछ किताबों को रटना होता है या भ्रष्टाचार।

    कोई पकोड़े क्यों बेचे:

    कोई पकोड़े बेचकर भले ही करोड़पति हो जाए लेकिन एक अदना सा सरकारी अधिकारी उसको सड़कछाप कुत्ते की तरह नचा सकता है। पकोड़े बेचना वाला वर्षों तक प्रतिदिन रातदिन मेहनत करके अपने व्यापार को स्थापित करेगा, एक मुकाम तक पहुंचाएगा। वहीं एक सरकारी अधिकारी जो कुछ किताबें रटकर नौकरी पाया होता है वह जब चाहे तब व्यापारी को सड़कछाप कुत्ते की तरह नचा सकता है, जब मन हो तब नचा सकता है, जब तक मन हो तब तक नचा सकता है।

    आदमी मेहनत भी करे, रिस्क भी ले, जीवन भी खपाए और कुत्ता भी बनना पड़े। कुत्ता न बनना हो तो भ्रष्टाचार के नेक्सस का अंग बने। इतनी माथापच्ची से बेहतर कि सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करते हुए सकून के साथ जीवन गुजारा जाए।

    जाति-व्यवस्था का दंश:

    हजारों वर्षों से जाति व्यवस्था के कारण समाज की अधिसंख्य जनसंख्या को सार्वजनिक संपत्तियों पर अधिकार नहीं रहे। कागज में भारत के लोकतांत्रिक होने के बावजूद, वास्तव में भारत का सरकारी तंत्र लोकतांत्रिक न होकर सामंती है। सरकारी कर्मचारियों व नौकरशाही को निरंकुश सामंती अधिकार हैं। अधिकारी स्वयं को सेवक न मानकर, अभिभावक मानने के दंभ में जीते हैं। सामंती सोच का स्तर यह है जो स्वयं को अभिभावक मानता है उसको बहुत अच्छा व जिम्मेदार नौकरशाह माना जाता है, बाकायदा पुरस्कार मिलते हैं। 

    मोदी जी क्या करें:

    सरकारी नौकरियों में काम नहीं लेकिन भारीभरकम वेतन व सुविधाएं। विभागों व पदों के आधार पर भ्रष्टाचार का महासागर बहता रहता है, जवाबदेही बिलकुल नहीं। कोई क्यों पकोड़े तले…. ।

    पहले योग्यता, प्रतिभा, मेधाविता, परिश्रम इत्यादि के प्रति मिथक दूर कीजिए, कंडीशनिंग दूर कीजिए, वाहियात व बेबुनियाद प्रतिष्ठापनाएं हटाइए। सरकारी कर्मचारियों व नौकरशाहों के अनियंत्रित अधिकार बहुत कम कीजिए, अधिकारों का चरित्र लोकतांत्रिक कीजिए, आम आदमी के प्रति पूरी तरह से जवाबदेह बनाइए। सरकारी तंत्र के पूरे ढांचे को लोकतांत्रिक बनाइए व आम लोगों के प्रति जिम्मेदार व सम्मानपूर्ण बनाइए। इसके बाद ही पकोड़ों वाली बात का वास्तव में कोई सार्थक मायने होगा। लोग स्वयं ही पकोड़े तलने लगेंगे।

    बात सिर्फ मोदी जी की दृढ़ता व ईच्छाशक्ति की है।