Category: सामाजिक यायावर

  • गोरखपुर में बच्चों की मौत का वास्तविक जिम्मेदार कौन

    गोरखपुर में बच्चों की मौत का वास्तविक जिम्मेदार कौन

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”
    संस्थापक सह मुख्यसंपादक, ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    संस्थापक सह वाइसचांसलर, गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय

    कटु सच्चाई है कि हम समाज के रूप में बहुत कमजोर, भयंकर असंवेदनशील व बेहद गैरजिम्मेदार हैं। पूरे देश में प्रतिदिन अनेक भयावह व लज्जित करने वाली घटनाएं होतीं हैं, अधिकतर घटनाएं सामने आ ही नहीं पातीं हैं। हम, हमारा समाज, हमारा मीडिया व हमारे आग्रह सभी का चरित्र व्यक्तिनिष्ठ चयनात्मक हैं।

    हम घटनाओं के होने के बाद राजनैतिक दलों के प्रति अपनी निष्ठा, पसंद नापसंद व स्वार्थों के पूर्वाग्रहों के आधार पर अपना पक्ष चुनते हैं। गोरखपुर मेडिकल कालेज में बच्चों के मरने की घटना को ही ले लीजिए। हम दिखावा तो ऐसा कर रहे हैं कि बच्चों की मृत्यु से अंदर तक झिंझूड़ गए, लेकिन सच्चाई यह नहीं है। सच यह है कि हम संवेदनशीलता का चोला ओढ़ कर अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों को जी रहे हैं।

    एक समय था जब केवल नेता लोग ही राजनैतिक पूर्वाग्रहों व सामाजिक असंवेदनशीलता को जीते थे। क्योंकि अखबारों व टीवी चैनल्स में बात रखने की उपलब्धता कम होने से हम लोगों को अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों व सामाजिक असंवेदनशीलता को जी पाने का अवसर नहीं मिलता था। किंतु अब सोशल मीडिया के आने से समय बदल गया है, हमें भी अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों व सामाजिक असंवेदनशीलता को जी पाने का माध्यम व अवसर मिल गया है।

    इस माध्यम से अब हम विकृति, कुंठाओं व मानसिक हिंसा की सीमा तक जाकर अपने पूर्वाग्रहों को जीते हैं। जो अपवाद लोग पूर्वाग्रहों को नहीं जीते हैं, हम उन लोगों को मूर्ख मानते हैं, अव्यवहारिक मानते हैं, अपरिवर्तनशील व अजागरूक मानते हैं। हमने अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार अपनी परिभाषाएं गढ़ ली हैं।

    इसी घटना को लीजिए, जो भाजपा या योगी विरोधी हैं, वे जुट पड़े हैं संवेदनशीलता का ढोंग करते हुए अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों को जी सकने पर। जो भाजपा या योगी समर्थक हैं, वे इस जुगत में जुटे पड़े हैं कि कैसे मामले का ठीकरा अपने सर फूटने से बचा जाए। दोनों ही सूरतों में वास्तविक संवेदनशीलता व सामाजिक ईमानदारी कहां है !!

    यदि अखिलेश यादव जी भी मार्च में चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनते तब भी बच्चे यूं ही मरते। तब क्या अखिलेश यादव दोषी होते। दरअसल योगी आदित्यनाथ जी या अखिलेश यादव जी दोषी तब होते जब सरकारी ढांचे व सामाजिक तानेबाने का चरित्र संवेदनशील व जिम्मेदार होता। तब ऐसी घटनाएं होने पर सरकार का मुखिया का दोषी होता। लेकिन चूंकि अब सबकुछ राजनैतिक पूर्वाग्रहों से ही तय होता है, राजनैतिक पूर्वाग्रह ही सामाजिक संवेदनशीलता, परिवर्तन, जागरूकता का रूप ले चुके हैं। हममें से अपवाद छोड़कर सभी लोग इसी धींगामुस्ती में लिप्त हैं।

    चलते-चलते

    दरअसल हम व हमारा समाज बेहद असंवेदनशील, गैरजिम्मेदार व पूर्वाग्रहों से भीषण रूप से ग्रस्त है। बात केवल सरकारी डाक्टरों की नहीं है। जो जहां पर है वहां पर जितना तरव जिस स से असंवेदनशील हो सकता है उतना है, पूरी ताकत व जोरशोर के साथ है, बिना रुके लगातार है।

    हमारा समाज ऐसे ही लोगों को बना रहा है। हम संवेदनशील तब होगें जब हम ऐसी घटनाओं के मूल कारणों व समाज के लोगों के मनोविज्ञान को समझें। स्वयं की मानसिकता, समाज की मानसिकता को बदलने का ईमानदार प्रयास करें। राजनैतिक पूर्वाग्रहों से देखना व प्रतिक्रिया देना बंद करें। समाज को वास्तव में संवेदनशील बनाने का प्रयास करें।

    कुछ न कर पाएं तो कम से कम संवेदनशीलता के ढोंग को जीना बंद कर दें। दोषी राजनेता नहीं। हम आप व समाज है। बाकी मुद्दों को छोड़िए। व्यक्तिगत स्तर पर, परिवार स्तर पर, समाज स्तर पर; हम वास्तव में बच्चों के लिए ईमानदारी से कितना संवेदनशील हैं, इसका ही मूल्यांकन ईमानदारी से अपने भीतर करके देखा जाना चाहिए।

  • संघ-विरोधियों को संघ से सीखना चाहिए

    संघ-विरोधियों को संघ से सीखना चाहिए

    Vivek “Samajik Yayavar”

    राजनैतिक ईकाईयां

    संघ ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में भारतीय जनसंघ ने अपने आपको जनता पार्टी में समाहित कर दिया, जनता पार्टी की सरकार बनी जो 1977 से 1980 तक चली। 1980 में संघ ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। 2013 में जनता पार्टी ने अपने आपको भारतीय जनता पार्टी में समाहित कर दिया। 1989 में जनता दल के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई जो 1990 तक चली।

    दरअसल जो लोग संघ को पानी पी-पीकर कोसते हैं, उन्होंने संघ की राजनैतिक इकाइयों के साथ मिलकर समय समय पर सरकारें बनाईं हैं। जयप्रकाश नारायण के अनुयायी लोगों ने 1977 में संघ की राजनैतिक ईकाई के साथ मिलकर सरकार बनाई। आगे चलकर 1989 में फिर से संघ की राजनैतिक ईकाई के साथ मिलकर सरकार बनाई।

    भारतीय जनता पार्टी 1996 में 13 दिनों के लिए सरकार में आई। 1998 में एक साल के लिए सरकार में आई, 1999 में फिर सरकार में आई।

    भारतीय जनता पार्टी केंद्र में कुल लगभग 6 वर्षों तक सरकार में रही वह भी गठबंधन करते हुए। फिर 10 वर्षों तक लगातार सरकार में नहीं रही। इसके बावजूद 2014 में भारी बहुमत के साथ केंद्र में सरकार बनाती है। आज की तारीख में देश के अधिकतर राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की या भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सरकारें हैं।

    रणनीतिक कुशलता, सांगठनिक क्षमता व लचीनापन की रणनीति

    राजनैतिक रणनीतिक लचीलापन इतना अधिक कि 1951 को स्थापित की गई राजनैतिक ईकाई को संघ जरूरत पड़ने पर 1977 में जनता पार्टी में समाहित कर देता है। 1989 में जनता दल के साथ गठबंधन करके सरकार बनाता है। 1998 में देश भर की राजनैतिक पार्टियों को बटोर कर सरकार बनाता है।

    भ्रष्टाचार की बात अपनी जगह, रणनीतिक तौर तरीकों की बात अपनी जगह, व संघ के एजेंडे के साथ सहमति असहमति अपनी जगह। लेकिन संघ का हर कदम एजेंडे की ओर गति करता है, यह एक सच्चाई है। भले ही 1996 में 13 दिन की सरकार हो या कुछ और।

    उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी जो दलितों की पार्टी है, जिसकी उत्पत्ति ही संघ के एंजेडे के विरोध में है उसने भी संघ की राजनैतिक ईकाई भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई।

    मायावती की भी मान-मनौवल करते हुए बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ सरकार बनाता है। छोटी-छोटी पार्टियों को भी साथ मिलाकर सरकार बनाता है। यदि किसी पार्टी से कुछ हजार मतों का भी लाभ मिलना होता है तो भी उसको गठबंधन में लाने का प्रयास करता है।

    1977 में स्वयं को जनता पार्टी में समाहित कर देना, 1989 में जनता दल का पिछलग्गू बनना। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाजवादी पार्टी का पिछलग्गू बनना। बिहार में नितीश कुमार का पिछलग्गू बनना।

    भारतीय जनता पार्टी सरकार चलाती है तब भी संघ लोगों के बीच निरंतर संगठन प्रसार में लगा रहता है। क्योंकि संघ का मूल एजेंडा सत्ता प्राप्ति व सत्ता भोगना तक ही सीमित नहीं है। सत्ताएं तो मूल एजेंडे के लिए औजार हैं।

    संघ विभिन्न दिशाओं में समानांतर रूप में लगातार काम करता रहता है। पूरे देश में विद्यालय खोले। पूरे देश में शाखाएं चलाईं। आपदाओं में राहत कार्य के लिए पहुंचते रहे। लोगों का विश्वास जीतने, लोगों की सोच बदलने, लोगों के दुख में सहयोगी के रूप में खड़े होने जैसे विभिन्न स्तरों पर लगातार जमीनी प्रयास किए।

    जरूरत पड़ी तो राम मंदिर, कश्मीर में धारा 370 इत्यादि को बहुत बड़ा मुद्दे बनाए ताकि लोगों का राजनैतिक ध्रुवीकरण हो। जब राजनैतिक लाभ मिल गया तब इन मुद्दों को ठंडे बस्ते डाल दिया गया। क्योंकि यह सब संघ के मूल एजेंडा है ही नहीं। यह सब तो रणनीतियां हैं। संघ ने सबसे पहले हिंदुत्व के मूल एजेंडे से ऊंची जातियों को अपने साथ जोड़ा, फिर पिछड़ी जातियों को जोड़ा, अब दलितों को जोड़ रहा है।

    संघ अपनी रणनीतियां बदलता है, राजनैतिक लचीलापन रखता है लेकिन अपने मूल एजेंडे से कभी नहीं भटकता है। संघ अपने एजेंडे के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहता है, दृष्टि व चिंतन में स्पष्टता रखता है, लोगों के साथ लगातार संवाद में रहता है, संगठन का दायरा बढ़ाता रहता है।

    संघ-विरोध

    उत्तर प्रदेश में मायावती को अवसर मिला पांच वर्षों तक बहुमत से सरकार चलाई। दलितों के प्रति, सामाजिक न्याय के प्रति कोई एजेंडा नहीं। जमीनी संगठन के लिए क्या किया। कांसीराम ने जो बनाया था उसको सत्ता प्राप्ति के चक्कर में नेस्तनाबूत कर दिया।

    उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को अवसर मिला पांच वर्षों बहुमत से सरकार चलाई। समाजवाद व सामाजिक न्याय के प्रति कोई गंभीर एजेंडा नहीं। जमीनी संगठन के लिए क्या किया। मुलायम यादव ने संघर्ष करके जो संगठन बनाया उसको सहेज तक न पाए, समृद्ध करना तो दूर की बात है।

    बिहार में लालू यादव ने 15 वर्षों तक सरकार चलाई, एजेंडा क्या रहा, केवल सरकार में बने रहना, सत्ता भोगना। 1990 में आडवाणी का रथ रोक दिया, चरवाहा विद्यालय की घोषणा कर दी। बस हो गए सांप्रदायिक शक्तियों के विरोध व सामाजिक न्याय के ऐतिहासिक पुरोधा। 15 वर्षों तक सरकार में रहते हुए सामाजिक न्याय के एजेंडे को कितना मजबूत किया जा सकता था, इस पर कोई चर्चा नहीं। कोई प्रश्न नहीं। सत्ता भोगना ही सामाजिक न्याय हो गया, चरवाहा विद्यालय की घोषणा ही हो गई वंचितों की मजबूती के लिए सुनहरे अक्षरों में लिखी जाने वाली ऐतिहासिक सामाजिक क्रांति।

    पहले संघ की राजनैतिक ईकाईयों के साथ मिलकर कांग्रेस का विरोध, फिर कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा का विरोध। कुल जमा मूल बात सत्ता भोगना ही रही। दीवालियेपन में इसी को सामाजिक न्याय कह लिया जाए या सांप्रदायिकता-विरोध या कुछ और। 

    समाज तो चाहता रहा कि सामाजिक न्याय की बात हो, जाति से मुक्त हुआ जाए, सांप्रदायिक सौहार्द की बात हो इसीलिए तो गैरभाजपा, गैरकांग्रेस सरकारें बनतीं रहीं। लेकिन जिनकी सरकारें बनतीं रहीं वे सत्ता भोगने के अलावे करते क्या रहे, उनके मूल चरित्र में अंतर क्या रहा ….

    गुजरात में 2002 के बाद भारत में सैकड़ों NGO, सामाजिक/NGO सेलिब्रिटी, मैगसेसे पुरस्कृत लोगों ने मानवाधिकार के नाम पर, सांप्रदायिका के नाम करोड़ों रुपए की ग्रांट पाई। संघ, भारतीय जनता पार्टी व नरेंद्र मोदी का पानी पी-पीकर विरोध किया।

    विरोधी पानी पी-पीकर विरोध करते रहे, जबकि संघ ने भरपूर दुस्साहस के साथ नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे कर दिया। विरोधियों ने लगातार जमकर नरेंद्र मोदी के विरोध में हंगामा काटा लेकिन नरेंद्र मोदी धुआंधार बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बन गए। यह है संघ का रणनीतिक कौशल्य व जमीनी सांगठनिक क्षमता व व्यापकता।

    संघ विरोधी लोग बिना जमीन में गंभीरता से गए ऊपरी तौर पर बिना स्पष्ट दृष्टि व बिना प्रतिबद्धता के संगठित होते हैं। जबकि संघ जमीन पर अपने संगठन का अधिक मजबूती से विस्तार करता चला जाता है।

    संघ-विरोधी लोग हल्ला गुल्ला करते हैं, आजकल सोशल मीडिया भी हो गया है तो उसमें संघ विरोध को नशे की तरह ओढ़ते बिछाते, खाते-पीते शौच करते, थूका-थाकी करते हुए खुद को क्रांतिकारी चिंतक व सामाजिक लंबरदार मान लेते हैं, लाइकों की संख्या पाकर सामाजिक परिवर्तन करते हैं।

    जबकि संघ जमीन पर लोगों के साथ सीधे संवाद व काम करते अपने एजेंडे के लिए परिश्रम करता है। सोशल मीडिया वाले लोगों का मनोरंजन करने के लिए, व्यस्त रखने के लिए, क्रांतिकारी/परिवर्तनकारी होने के अहंकार को पोषित करने के लिए, हल्ला-गुल्ला बना रहे, के लिए समय-समय पर कुछ सुर्रा छोड़ देता है। संघ-विरोधी लोग सुर्रों पर पिल पड़ते हैं।

    जो जितना अधिक पिलता है उसको उतना बड़ा चिंतक व क्रांतिकारी मान लिया जाता है। यह माना जाता है कि संघ यही करके शक्तिशाली बन पाया है, तो यही करके संघ को सत्ताओं से हटाया जा सकता है। इसी कारण पिले रहते हैं संघ विरोध को नशे की तरह ओढ़ते बिछाते, खाते-पीते शौच करते, थूका-थाकी करते हुए। इस मानसिकता को मूर्खता कह लीजिए, टटपुंजियागिरी कह लीजिए, मक्कारी कह लीजिए, भ्रांति कह लीजिए, कुछ भी कह लीजिए।

    राजनैतिक सत्ता भले ही कुछ-कुछ समय के लिए संघ के हाथ से निकलती रहें लेकिन संघ भारत में प्रमुख शक्ति तब तक बनी रहेगी जबतक बेहद दूरदर्शी, गंभीर व ठोस प्रयास निरंतर-प्रतिबद्धता व भीषण संघर्षों के साथ नहीं शुरू किए जाएंगे।

    संघ-विरोधियों को एक कटु यथार्थ स्वीकार कर लेना चाहिए कि हवाई तौर-तरीकों, सतहीपन, खोखलाहट, टटपुंजियागिरी से व बिना जमीन पर गंभीरता व ठोस रूप से उतरे हुए कभी भी संघ के विरोध में वास्तविक शक्ति नहीं खड़ी कर सकते हैं।

    चलते-चलते

    संघ के सांगठनिक ढांचे, मनोविज्ञान व समाजविज्ञान की गुणवत्ता यह है कि राजनैतिक रणनीतियों के तहत अनेकानेक उटपटांग एजेंडों को प्रमुख व महत्वपूर्ण एजेंडों के रूप में वर्षों तक पोषित व प्रायोजित करते रहने के बावजूद मूल एजेंडे को ही समृद्धि व शक्ति मिलती रहती है।

    संघ को बैठे बिठाए, चुटकुले सुनाने, प्रेस रिलीज जारी करने, भाषण रटकर विद्वान व क्रांतिकारी बनने जैसी चोचले बाजियों या टटपुंजिएपन से यह सब प्राप्त नहीं हुआ है।

    संघ के एजेंडे के प्रति सहमति असहमति हो सकती है। लेकिन संघ की दृष्टि-स्पष्टता, सामाजिक मनोविज्ञान की विशेषज्ञता, प्रचार तंत्र, सांगठनिक ढांचा, संगठन, एजेंडे के प्रति प्रतिबद्धता, व परिश्रम के संदर्भ में प्रश्न नहीं खड़े किए जा सकते हैं।

    संघ बहुत अधिक व्यवहारिक व व्यापक जमीनी संगठन है। संघ अपने मूल एजेंडे के लिए जरूरत पड़ी तो भारतीय समाज से जाति को खतम करने में गंभीरता से जुट जाएगा।

    संघ का तोड़ भारत में किसी भी पार्टी के पास नहीं है। संघ के परिश्रम, दृष्टि की स्पष्टता, कर्मठता, रणनीतिक कौशल, सांगठनिक क्षमता व कौशल व एजेंडे के प्रति प्रतिबद्धता को नकारना सबसे बड़ी मूर्खता है।

    विरोधी की क्षमताओं, कौशल व विशेषज्ञता को नकारने की बजाय, सीखना चाहिए। विभिन्न रणनीतियां बनाते हुए, लाचीलापन रखते हुए स्पष्ट दृष्टि व प्रतिबद्धता के साथ एजेंडे के लिए एकाग्रता के साथ काम करते रहने की कला संघ से सीखना चाहिए।

  • पानी, भूजल व नदियों के संदर्भ में हमारी समझ : निर्मल गंगा अविरल – प्राकृतिक नियम, परस्परता व संतुलन बनाम जादू-टोना/दैवीय मिथक

    पानी, भूजल व नदियों के संदर्भ में हमारी समझ : निर्मल गंगा अविरल – प्राकृतिक नियम, परस्परता व संतुलन बनाम जादू-टोना/दैवीय मिथक

    Vivek “Samajik Yayavar”

    गंगा

    गंगा व गंगा की सहयोगी नदियां भारत के लगभग 11 राज्यों में बहती हैं तथा भारत के लगभग 50 करोड़ लोगों का जीवन प्रभावित करतीं हैं। गंगा में प्रतिदिन लगभग 300 करोड़ लीटर सीवर गिरता है। एक समय की पवित्र गंगा आज दुनिया की सबसे अधिक जहरीली व विदूषित नदियों में से है। गंगा में प्रतिवर्ष लगभग 10 करोड़ लोग पापों से मुक्ति होने के लिए स्नान, शव-दाह, शव-प्रवाह इत्यादि क्रियाओं से गंगा को विदूषित करने का काम करते हैं।

    Ganga
    Ganga

    प्रस्तावना

    मैंने बिहार राज्य में बिहार का शोक कही जाने वाली कोसी नदी की बाढ़ों की विभीषिकाओं में कई वर्ष सैकड़ों गांवों में राहत व पुनर्वास के लिए काम किए हैं। कोसी नदी की बाढ़ को समझने व राहत कार्यों के लिए मैने सप्ताहों 12 से 14 घंटे प्रतिदिन कोसी बाढ़ में तेज प्रवाहित नदी में बहती हुई सैकड़ों लाशों को देखते हुए नावों में यात्रा करते हुए गुजारे हैं ताकि बीहड़ से बीहड़ गावों में पहुंच कर लोगों का जीवन बचाने में योगदान कर सकूँ।

    बाढ़ से ग्रस्त गांवों में ही रहना। जो मिला वह खा लेना। अधिकतर सूखा चूड़ा, नमक व प्याज से ही काम चलता था। खेतों में नदी का पानी भरा होने के कारण बांस से बने जुगाड़ू टट्टी-घर मे टट्टी जाना जिसमें टट्टी जाने के लिए पूरा गांव सुबह पंक्तिबद्ध रहता था। रुके हुए पानी व सड़ी हुई लाशों के कारण संक्रमित बीमारियों का खतरा ऊपर से।

    Kosi River Flood

    कोसी बाढ़ की विभीषिकाओं को नजदीक से देखने महसूस करने के बाद मेरा यह भी प्रयास रहा कि दुनिया के जल, नदी व बाढ़ प्रबंधन के विशेषज्ञों को जोड़कर सामाजिक प्रबंधन की दिशा मे काम करूं। मैंने नीदरलैंड्स, आस्ट्रेलिया व संबंधित वैश्विक संस्थानों के वैज्ञानिकों से संपर्क किया। एक-एक विशेषज्ञ को जोड़ने में समय, संसाधन व ऊर्जा लगी।

    इन्हीं प्रयासों के तहत चाहे-अनचाहे यूरोपियन यूनियन संसद व अन्य वैश्विक स्तर पर जल संबंधित कई वैश्विक दस्तावेजों को तैयार करने में भी मेरा योगदान हो गया।

    नीदरलैंड्स समुद्र से घिरा व समुद्री सतह से नीचे स्थित बेहद घनी जनसंख्या वाला भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से छोटा सा देश है। हम लोग हर बात के लिए भारत की जनसंख्या को एक मूलभूत बहाने के रूप में प्रयोग करते हैं। जबकि नीदरलैंड्स की जनसंख्या का घनत्व भारत की जनसंख्या घनत्व से काफी अधिक है। नीदरलैंड्स में वर्ष में कई महीने बर्फ के कारण पूरे देश की जमीनें बंजर पड़ी रहती हैं। समुद्री सतह से नीचे बसे होने के कारण पूरे वर्ष समुद्री व समुद्री नदियों के कारण बाढ़ की स्थिति। नीदरलैंड्स के लोगों ने बाढ़ के साथ व्यवस्थित संतुलन स्थापित करके जीना सीखा परिणामतः दुनिया में नीदरलैंड्स बाढ़ प्रबंधन का विशेषज्ञ माना जाता है। इतनी विषम परिस्थितियों के बावजूद नीदरलैंड्स ने वैज्ञानिक खोजें की, कृषि व दूध पर दुनिया को नए आयाम दिए। दुनिया के सबसे विकसित, सुविधासंपन्न व कल्याणकारी देशों में से एक है। कृषि से संबंधित दुनिया का सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालय भी यहीं स्थापित है। आस्ट्रेलिया का स्थान दुनिया में जल प्रबंधन के लिए विशेषज्ञ माने जाने वाले सबसे ऊपर के देशों में आता है।

    भारतीय समाज का मनोविज्ञान 

    मैंने यह महसूस किया कि भारतीय समाज में ऐसा माना जाता है कि हर बात का समाधान मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री के पास है। बिहार का शोक कोसी नदी की बाढ़ विभीषिका हो या गंगा का निर्मल अविरल होना या कोई अन्य मुद्दा। यह माना जाता है कि यदि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चाह लें तो कोसी की बाढ़ रुक जाएगी व गंगा निर्मल व अविरल हो जाएगी। धरना, प्रदर्शन, लेखन, मीडिया इत्यादि की दिशा इसी मानसिकता के इर्दगर्द ही रहती है।

    राजनेतागण व उनके समर्थक लोग भी यही माहौल बनाते हैं कि उनके पास जादुई ताकत है, वे पलक झपकते ही परिवर्तन कर देंगे। भारत चूंकि पौराणिक मिथकों व जादुई सिद्धियों की कहानियों को मानने वाला सामंती मानसिकता का समाज है इसलिए अवतारवाद व जादुई ताकतों पर विश्वास भी किया जाता है।

    मैं मजाक में कहा करता हूं कि यदि बिहार का मुख्यमंत्री कोसी नदी को बाढ़ न लाने का आदेश दे दे, कैबिनेट कोसी नदी को बाढ़ न लाने का प्रस्ताव पारित कर दे तो कोसी बाढ़ लाना बंद कर देगी। देश का प्रधानमंत्री गंगा को आदेश दे कि वह निर्मल व अविरल हो जाए या देश की कैबिनेट गंगा के लिए निर्मल व अविरल होने का प्रस्ताव पारित कर दे तो गंगा निर्मल व अविरल हो जाएगी।

    बात केवल दो नदियों की नहीं है। बात किसी भी नदी की हो, जंगल की हो, प्राकृतिक संसाधन की हो, कुरीतियों की हो; हमारे समाज व समाज के लोगों के अधिकतर प्रयास सरकार के खिलाफ धरना, प्रदर्शन, प्रेस कन्फेरेंश, विदेशी फंडिंग संस्थाओं को आकर्षित करने, कुछ दिखावटी जमीनी कामों के तामझाम व अवतारवाद इत्यादि तक ही संकुचित व कुंठित रहते हैं।

    गंगा में व्यवसायिक जल-यातायात

    एक खबर जोरशोर से आती है कि देश के परिवहन मंत्री श्री गडकरी जी की दृढ़ इच्छा है कि गंगा में व्यवसायिक जल परिवहन शुरू हो, गंगा में जहाज चलें। जैसा यातायात ट्रेनों व सड़कों से होता है वैसा यातायात गंगा नदी में भी शुरू हो। ऐसा हो इसके लिए मंत्री जी व सरकार पूरी तरह से कटिबद्ध है। जोरशोर से प्रयास जारी हैं ऐसा मीडिया में बारबार बताया गया। 

    किंतु मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट अपना संदेह व्यक्त करते हुए, यह कहते हुए लिखी, कि जल परिवहन के लिए प्रथम मूलभूत तत्व गंगा में पर्याप्त व निरंतर जल स्तर व प्रवाह का बने रहना है। यह कैसे संभव होगा। बिना इसके परिवहन संभव ही नहीं। जिन लोगों को यह लगता है कि प्रकृति नियमों, परस्परता व संतुलन की बजाय अवतारवाद, नारों व जादू-टोनों से चलती है, उन लोगों को मेरी यह बात पसंद नहीं आई।

    दरअसल गंगा का निर्मल व अविरल होना तथा गंगा में जल-यातायात होना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इनको अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता है, न ही अलग-अलग करके समाधानित किया जा सकता है।

    मीडिया से मालूम पड़ा कि भारत के सर्वोच्च तकनीकी संस्थानों, भारत सरकार के जल से संबंधित विभागों के वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों ने गहन विचार विमर्श करके गंगा नदी में ड्रेजिंग की जाएगी, निष्कर्ष निकाला। सरकार ने तीसियों हजार करोड़ रुपए की लगत से गंगा नदी में ड्रेजिंग की जाने की घोषणा की।

    जल यातायात के लिए नदी में निरंतर जल की मात्रा व प्रवाह होना आवश्यक है। नदी में जल की मात्रा व प्रवाह मूलभूत रूप से नदी व नदी की सतह (बेड) के भूजल-स्रोतों पर निर्भर करता है।

    ड्रेजिंग

    ड्रेजिंग से नदी की सतह को खुरचा जाता है। ऐसा माना जाता है कि नदी की सतह को खुरचने से नदी के भूजल-स्रोत खुल जाएंगे और नदी में जल की मात्रा व प्रवाह बढ़ जाएगा। खुरचने की क्रिया को ड्रेजिंग कहते हैं।

    ड्रेजिंग तकनीक नदियों के लिए हानिकारक होती है, विशेषकर उन नदियों के लिए ताबूत में अंतिम कील की श्रेणी की हानिकारक होती है जिनके भूजल स्रोत मृतप्राय हो चुके होते हैं। ऐसी नदियों में ड्रेजिंग भूजल स्रोतों के साथ नदी की जल-शिराओं को नष्ट कर देती है, क्योंकि नदी में जल लाने वाले भूजल-स्रोतों के मृत हो जाने से नदी में जल लेकर आने वाले प्रवाह मृत हो जाते हैं, जिसके कारण अंदर से जल-शिराएं बनना कम होकर बंद हो जाती हैं। नई जल-शिराओं के बनने की प्रक्रिया में भयंकर कमी, ऊपर से ड्रेजिंग के कारण जल-शिराओं का अपने बचे-खुचे स्रोतों से रिश्ता टूटना, कुछ समय के लिए अस्थाई रूप से जल स्तर का बढ़ना लक्षित हो सकता है, लेकिन नदी के दीर्घकालीन जीवन के लिए बहुत अधिक भयानक होता है।

    Narmada River

    भूजल स्रोतों की जल-शिराओं व नदी का रिश्ता समझने के लिए नर्मदा नदी बहुत बेहतर उदाहरण है। नर्मदा नदी की उत्पत्ति एक छोटे से कुंड से होती है, तेज प्रवाह नहीं, यदि बताया न जाए तो अंदाजा लगाना मुश्किल कि नर्मदा इसी कुंड से निकलती हैं। कई किलोमीटर तक नर्मदा नदी एक पतली सी धारा के रूप में बहती है, मोटी भैंस खड़ी होकर नदी का प्रवाह अवरुद्ध सकती है। यही नदी भूजल स्रोतों व जल-शिराओं से संबंधित होते हुए मध्य भारत की सबसे महत्वपूर्ण व विशालकाय नदी के रूप में विकसित होती है।

    गंगा के लिए प्रयास

    • गंगा महासभा
      मदनमोहन मालवीय ने 1905 में गंगा को हिंदुओं की पवित्र नदी के रूप में ब्रिटिश हुकूमत से स्वीकृति दिलाने के लिए गंगा महासभा की स्थापना की। लगभग दस वर्षों के संघर्ष के पश्चात 1914 में ब्रिटिश हुकूमत ने गंगा को हिंदू धर्म की मान्यताओं के तहत पवित्र नदी का दर्जा दिया। 5 नवंबर 1914 को “अविरल गंगा समझौता दिवस” का नाम दिया गया। 1916 में यह समझौता लागू भी हो गया। लेकिन आजादी के बाद गंगा नदी का प्रयोग बिजली उत्पादन, बांध बनाने, सिचाई के लिए नहर निकालने, औद्योगिक अपद्रव्य व सीवर इत्यादि प्रवाहित के लिए राज्य व केंद्र सरकारों व उद्योगपतियों ने लगातार धुआंधार प्रयोग किया।
    • गंगा एक्शन प्लान
      जनवरी 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने व अविरल प्रवाह के लिए गंगा एक्शन प्लान की स्थापना की।
    • नेशनल रिवर गंगा बेसिन अथारिटी व गंगा राष्ट्रीय नदी

      गंगा को सन् 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने “राष्ट्रीय नदी” घोषित किया। फरवरी 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार ने नेशनल रिवर गंगा बेसिन अथारिटी की स्थापना की। 2010 में आगामी दस वर्षों के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपयों की घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा की गई। 2011 में विश्व बैंक ने लगभग 6000 करोड़ रुपए का अनुदान दिया।
    • नमामि गंगे व गंगा मंथन
      वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद आगामी पांच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपयों की घोषणा “नमामि गंगे” नाम देते हुए कर दी। 7 जुलाई 2014 को गंगा के संदर्भ में विचार विमर्श, चिंतन मनन इत्यादि करने के लिए “गंगा मंथन” कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम को आयोजित करने में अरबों रुपए खर्च हुए। नमामि गंगे कर तहत 2014 से 2016 तक दो वर्षों में लगभग 3000 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 

    उपसंहार

    सन् 2014 में जब माननीय नरेंद्र मोदी जी देश के प्रधानमंत्री बने तब मित्र सचिन खरे को प्रधानमंत्री आवास में प्रधानमंत्री से मिलने व भोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वहां से लौटने के बाद जब मित्र सचिन खरे ने बताया कि उनको प्रधानमंत्री आवास में बेहद स्वादिष्ट आमों का स्वाद लेने का अवसर मिला तो हम अपना मन मसोस कर रह गए, आमों के बारे में मुझे अपने वे दिन याद आ गए जब भारत के “औद्यानिकी विभाग” के राष्ट्रीय महानिदेशक महोदय प्रतिवर्ष देश के सबसे बेहतरीन कई प्रकारों के आमों के कई बड़े डिब्बे हमारे घर भिजवाते थे। उन आमों में कई प्रजातियां तो ऐसी थीं कि खाने के बाद कई-कई दिन तक पेट के भीतर से मुंह में अच्छी सुगंध आती रहती थी, स्वाद बना रहता था।

    मित्र सचिन खरे ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया के पुराने पाठकों में से हैं। उन्हें पता था कि मैंने भारत देश के कई राज्यों के सैकड़ों गांवों में भूजल व कृषि मुद्दों पर स्थानीय सामाजिक स्तर पर हो रहे जमीनी प्रयासों के संदर्भ में “जल व कृषि” पर आनलाइन व प्रिंट दोनों पत्रिकाओं में लाखों रुपयों की लागत से विशेषांक निकाले थे।

    उन्होंने हमसे पूछा कि गंगा के लिए सरकार को क्या करना चाहिए, वे कोशिश करेंगे कि मेरे सुझावों को सरकार, प्रधानमंत्री व गंगा मंत्री तक पहुंचाएं। हमने उनको एक सीधा फार्मूला बताया और कहा कि इस फर्मूले के अलावे कोई अन्य वास्तविक समाधान भी नहीं है, यह भी कहा कि इस फार्मूले को तभी लागू किया जा सकता है जब प्रधानमंत्री महोदय नौकरशाही व सरकारी मंत्रालयों, विभागों व संस्थानों में ऊंचे पदों व ऊंचे वेतनमानों व सुविधाओं के साथ कार्यरत इंजीनियरों व वेतनभोगी जल वैज्ञानिकों की नहीं सुनेंगे। मित्र महोदय ने “जल व कृषि” के विशेषांक की कुछ प्रतियां मुझसे लीं और कहा कि कुछ दिनों में उनकी मुलाकात गंगा मंत्री सुश्री उमा भारती से होने वाली है। वे कोशिश करेंगे कि मेरे सुझाव व प्रतिकाएं उन तक पहुंचा दें, आगे मंत्री जी जानें सरकार जाने।

    अब तक तो इन्हीं सब तथाकथित जल-विशेषज्ञों की बातें ही सुनी व मानी जा रहीं हैं। पिछले कुछ दशकों में गंगा व देश की लगभग सभी नदियां मरणासन्न स्थितियों में पहुंच गईं हैं, गांवों में तालाब, कुएं व सोख्ते नष्ट हो चुके हैं, जमीन के पानी का जलस्तर लगातार तेजी से नीचे जा रहा है। अब चेतने का अंतिम समय है, बेहतर कि इन तथाकथित विशेषज्ञों व कार्यकारी ढांचे को लक्ष्य दिया जाए, लक्ष्य को प्राप्त करने का तरीका बताया जाए। ये लोग सिर्फ लक्ष्य व लक्ष्य प्राप्ति के तरीकों का अनुसरण करें। इन लोगों की विशेषज्ञता, ज्ञान व समझ का परिणाम स्पष्ट दीख रहा है। बेहतर कि प्राकृतिक नियमों, संबंधों व संतुलनों का अनुसरण किया जाए, दुनिया के जो समाज वास्तव में विशेषज्ञ हैं उनसे सीखा जाए।

    चलते-चलते :

    इतने रुपए, संसाधन, चिंतन मनन, तामझाम इत्यादि के बावजूद गंगा नदी दिन प्रतिदिन मरती जा रही है। कारण सिर्फ यह है कि हम भूजल व नदी के प्राकृतिक संबंध, तालमेल व समता को समझना नहीं चाह रहे हैं। हम अपने-अपने स्वार्थों, लोभों, ग्लैमर, भोगों व अहंकारों में लिप्त हैं। हम भोगने की दौड़ में हैं, अगली पीढ़ियां भोग सकें इस चकरघिन्नी में लिप्त हैं, रात दिन व्यस्त हैं, लेकिन एक क्षण के लिए यह नहीं सोचते कि जब जीवन ही नहीं रहेगा तो भोगेंगे कैसे।

    गंगा को पवित्र या दैवीय न मानिए, क्योंकि ऐसा मानते ही हम उसकी चिंता करना बंद कर देते हैं। बेहतर कि गंगा को नदी मानिए, ऐसी नदी जो हमारे कारण मर रही है, जहरीली हो चुकी है, जो जीवनदायिनी व पापनाशक मानी जाती है उसे हमने अपने पापों से जहरीले पाप में परिवर्तित कर दिया है। हम ही गंगा को बचा सकते हैं।

    अन्यथा न देश बचेगा, न देश के लोग। जब देश के लोग ही नहीं रहेंगे तो देश की संस्कृति, अस्मिता, आकार-प्रकार, परंपरा या सभ्यता इत्यादि का कोई मायने क्योंकर हो सकता है।

  • नितीश कुमार, भाजपा व बिहार : पसंद नापसंद के खाचों से इतर व्यवहारिक चर्चा

    Vivek “Samajik Yayavar”


    यदि मार्च 2000 में जब नितीश कुमार केवल 8 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, को छोड़ दिया जाए तो नितीश कुमार नवंबर 2005 में स्थाई रूप से बिहार के मुख्यमंत्री बने। 2005 में जनतादल (यू) व भाजपा ने बिहार में चुनाव मिल कर लड़ा था, वह भी लालू यादव के विरुद्ध। 2005 से 2010 तक जनतादल (यू) व भाजपा ने मिलकर सरकार चलाई। 2010 के बिहार चुनावों में इस गठबंधन ने दुबारा सरकार बनाई 243 सीटों में 206 सीटें जीतकर, जिसमें जनतादल (यू) ने 115 व भाजपा ने 91 सीटें जीती थीं।

    नितीश कुमार ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार का चेहरा बदल दिया। यदि बिहार व गुजरात का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए तो बिहार में विकास विपरीत परिस्थितियों में बहुत बदहाल स्थिति से हुआ था। गुजरात की परिस्थितियां से बिलकुल भिन्न व बहुत अधिक दुरूह।

    भाजपा ने बिहार में सरकार में गठबंधन में होते हुए कभी सीमा से अधिक दबाव नहीं डाला नितीश कुमार के काम करने के तौर तरीकों में। तालमेल से सरकार चल रही थी। गड़बड़ तब हुई जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया। जबकि नितीश कुमार की दबी हुई इच्छा थी उनको बनाया जाए। नितीश कुमार का अनकहा तर्क, यदि NDA द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार का चुनाव विकास से ही तय होना था तो नितीश कुमार का चुनाव होना चाहिए था।

    जून 2013 में नरेंद्र मोदी जी का नाम प्रधानमंत्री के रूप में आगे आते ही, कुछ ही दिनों में जनतादल (यू) पार्टी भाजपा गठबंधन से अलग हो गई, जबकि जनतादल (यू) के ही शरद यादव NDA के राष्ट्रीय समन्वयक थे। नितीश कुमार ने लालू यादव के सहयोग से सरकार बनाई लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में करारी हार हुई। भाजपा ने 40 में से 32 सीटें जीतीं। नितीश कुमार, लालू यादव व कांग्रेस 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव मिलकर लड़े, सरकार बनाई।

    लेकिन नितीश कुमार व लालू यादव का तालमेल दो साल भी नहीं चल पाया। नितीश कुमार को भी यह अहसास हो चुका था कि अब प्रधानमंत्री बनना नहीं। बेहतर कि सकून के साथ तालमेल के साथ पहले जैसे सफलता से सरकार चलाई जाए। लालू यादव के साथ तालमेल न तो चल पा रहा था और न ही चलना ही था, किसी तरह गाड़ी खिंच रही थी। लालू यादव अपनी संतानों को राजनीति में लंबी दूरी के लिए सेट करने की हड़बड़ी में भी हैं।

    नितीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन करके नई सरकार बनाकर छठवीं बार मुख्यमंत्री बने। मेरा मानना है कि नितीश कुमार 2015 के बाद से ही भाजपा के साथ गठबंधन करके सरकार चलाना चाहते थे। नितीश कुमार व भाजपा दोनों बिहार में एक दूसरे के साथ पूरकता में लंबे समय तक सरकार अच्छे से चला चुके हैं। भाजपा ने नितीश के ऊपर बिहार में सरकार चलाते हुए सीमा से अधिक दबाव नहीं डाला, उंगलबाजी नहीं की। दोनों ने बिहार के लिए बेहतर काम भी किए।

    2013 से 2017 तक के चार वर्षों के चक्र में मेरे अनुमान के अनुसार नितीश कुमार से राजनैतिक गणनाओं में दो बार गलतियां हुईं।

    1. 2013 में छिपी हुई प्रधानमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा के कारण नितीश कुमार NDA से अलग हुए। उन्होंने नरेंद्र मोदी के प्रबंधन को हलके में लिया। उनको लगा कि त्रिशंकु संसद में उनकी संभावना रहेगी, उनको यह भी लगा कि वे संसदीय चुनावों में बिहार राज्य में 15 से 20 सीटें निकाल ले जाएंगे।
    2. 2014 में लोकसभा चुनावों में भाजपा की भयंकर जीत व मीडिया प्रबंधन के कारण नितीश कुमार डर गए, उनको लगा कि यदि वे अकेले चुनाव लड़ते हैं तो वे सरकार नहीं बना पाएंगे। यदि बिहार में भाजपा की सरकार बन गई तो मोदी उनके राजनैतिक भविष्य को पूरी तरह खतम कर देंगे।इसलिए नितीश कुमार बिहार चुनाव में अकेले उतरने की बजाय लालू यादव के साथ उतरे। लालू यादव अपने साथ कांग्रेस को भी उतार लाए। जबकि यदि नितीश कुमार यदि हिम्मत दिखाते तो अकेले चुनाव लड़कर भी अच्छी स्थिति में रहते। आवश्यकता पड़ती तो चुनाव के बाद गठबंधन बनाते।

    भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार होने के बावजूद नितीश कुमार ने बिहार में कभी सांप्रदायिक माहौल नहीं बनने दिया। दलितों महादलितों व पिछड़ी जातियों के लिए काम किया। बिहार के लोग आराम चाहते हैं, विकास चाहते हैं, तुलनात्मक बेहतर गवरनेंस चाहते हैं। वे विकास व तुलनात्मक बेहतर गवरनेंस का स्वाद चख चुके हैं।

    इसमें कोई संदेह नहीं कि नितीश कुमार ने बिहार में विकास के माध्यम से चेहरा बदला। नितीश कुमार को बिहार की पिछड़ी जातियां, दलित, महादलित व मुस्लिम पिछड़ी जातियां पसंद करते हैं। नितीश कुमार ने जातिगतता से ऊपर उठकर सर्वमान्य रूप में लोकप्रियता अपने कामों व गवर्नेंस से हासिल की। बिहार का चेहरा बदलने का काम वास्तव में किया, तब भाजपा के साथ ही गठबंधन सरकार में थे। अभी भी उनके पास तीन सालों का समय है। पिछले लगभग 12 सालों से सरकार चला ही रहे हैं, जिसमें लगभग आठ साल सरकार भाजपा के साथ मिलकर ही चलाई है। लोगों का दिल फिर से जीतना असंभव भी नहीं।

  • सामाजिक यायावर के शिक्षा के प्रयोग (सन् 2004): उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले की बिलारी तहसील के एक गांव में एक विद्यालय

    सामाजिक यायावर के शिक्षा के प्रयोग (सन् 2004): उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले की बिलारी तहसील के एक गांव में एक विद्यालय

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    डा० राकेश सक्सेना “रफीक” से मेरी पहली मुलाकात आज से तकरीबन ग्यारह-बारह वर्ष पहले मेरे एक पत्रकार मित्र के घर में हुई थी। राकेश युवा-भारत से जुड़े हुए थे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली से डाक्टरेट राकेश सक्सेना मुरादाबाद के किसी डिग्री कालेज में अतिथि-व्याख्याता के रूप में पढ़ाते थे। एक दिन लखनऊ में राकेश मुझसे कहते हैं कि वे और उनके एक स्थानीय स्तर के नेता मित्र एक विद्यालय खोलना चाह रहे हैं जिसमें बच्चों के ‘मनुष्य’ होने पर प्राथमिकता दी जायेगी और शिक्षा के प्रयोग होगें। राकेश ने कहा कि मैं विद्यालय में शिक्षा निर्देशन का काम संभालूं, शिक्षा से संबंधित अनुप्रयोगों को करने के लिए मुझे सारे अधिकार रहेंगें, संस्थापक-मंडल का हस्तक्षेप नहीं होगा उल्टे मेरे अनुप्रयोगों में सहयोग ही दिया जाएगा। मैं राकेश को नहीं जानता था, ना ही जीवन में कभी उनका मित्र रहा था, केवल चंद औपचारिक मुलाकातें पत्रकार मित्र के यहाँ हुईं थीं। फिर भी ‘शिक्षा’ में प्रयोग के लालच में मैंने अपनी सहमति दे दी। सहमति देने के कारणों में गांवों के बच्चों के विकास के लिए काम करने से प्राप्त होने वाली आत्मिक संतुष्टि और एक अनजान क्षेत्र में अनजान लोगों के बीच जाकर उनके लिए काम करने की सार्थकता आदि भी थे।

    विद्यालय में मेरा पहुंचना/प्रथम-दिन

    जिन दिनों मुझे विद्यालय पहुँचना था, उन्हीं दिनों मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत ही गहरे आंतरिक दु:ख से गुजर रहा था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई खतम हो चुकी थी। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) व टोक्यो यूनिवर्सिटी जापान की विकेंद्रित ऊर्जा व्यवस्था संयुक्त शोध परियोजना में शोध कार्य भी कर रहा था। माता-पिता ने मेरी सामाजिक गतिविधियों के कारण अपने दिल व पैतृक संपत्तियों से पहले ही बेदखल कर दिया था, आजतक बेदखल हूँ। कई अच्छी नौकरियों के प्रस्ताव थे, नामचीन संस्थानों से पीएचडी करने के भी प्रस्ताव थे। किंतु जीवन में जो प्रताड़नाएं व असंवेदनशीलताएँ भोग चुका था, हजारों किताबों का वर्षों तक रात-दिन जो स्वाध्याय किया था, सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी, जीवन को जिस सामाजिक प्रतिबद्धता व सक्रियता के लिए अनेक वर्षों में ढाला था। अजीब उहापोह में था कि जीवन की दिशा क्या चुनूं। यही वह समय था जब अपने जीवन की दिशा तय होनी थी।  

    जीवन की दिशा चुनने वाला निर्णय लेने के लिए मैंने सोचा कि सबसे बेहतर रहेगा कि शरीर की जरूरतों से ऊपर उठकर, मन की भोग-लिप्सा व इच्छाओं से ऊपर उठकर, अहंकार से ऊपर उठकर निर्णय लिया जाए। इसलिए लंबा उपवास करने का निर्णय लिया। जीवन का सबसे लंबा उपवास किया, कुल अठारह दिनों का उपवास। लगातार अठारह दिनों तक नींबूं, पानी व नमक के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। नींबू व नमक भी कई दिन के बाद लेना शुरू किया था।

    स्वयं में इच्छाशक्ति संवर्धित करने व जीवन की दिशा चुनने वाला निर्णय लेने में सक्षम हो पाने के लिए अठारह दिनों का नीबूं-पानी उपवास किया। इसी उपवास की समाप्ति के अगले दिन भीषण शारीरिक कमजोरी की हालत में भी मैंने भारी पिठ्ठू-बैग अपनी पीठ पर लादा और भारतीय रेल के ‘जनरल डिब्बे’ में किसी तरह ठुंसते हुए निकल पड़ा सक्रिय-यायावरी की अपनी यात्रा में। मुरादाबाद रेलवे स्टेशन से पिठ्ठू बैग लादकर पैदल लगभग दो किलोमीटर दूर बस-स्टैंड, वहां से भरी हुई सरकारी खटारा बस में किसी तरह से ठुस-ठुसा कर अत्यधिक खराब हालात के सड़क-मार्ग से गंतव्य तक पहुंचा।

    बिलारी तहसील मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर एक गाँव की सीमा में सुनसान खेतों के बीच में एक छोटा सा विद्यालय था। छोटे-छोटे तीन कमरे, एक दो तरफ से बिना दीवारों का हरी बरसाती-पालीथीन से ढका स्थान, एक हैंडपंप, एक खुला मूत्रालय, एक शौचालय, एक ईटों का ढेर लगाकर ऊपर से ढककर बनाई गई बहुत ही छोटी रसोई और छोटा सा क्रीडा-स्थल कुल मिलाकर विद्यालय-कैंपस था। विद्यालय से सटा हुआ एक और विद्यालय था उसके अतिरिक्त दूर-दूर तक केवल खेत थे।

    शिक्षा में मेरे प्रयोग

    शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ प्रयोग

    विद्यालय की स्थापना का पहला वर्ष था। विद्यालय प्रशासन के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर डा० शीला डागा को और शिक्षा में अनुप्रयोगों के लिए मुझे बाहर से बुलाया गया था। हम दो लोगों को छोड़कर शेष लोग स्थानीय या आसपास के क्षेत्रों के थे। विद्यालय में प्रि-नर्सरी से लेकर नौवीं कक्षा तक कुल मिलाकर ग्यारह कक्षायें थीं। इन ग्यारह कक्षाओं व तीन सौ से अधिक छात्र-छात्राओं के लिए कुल नौ शिक्षक-शिक्षिकाएं थीं। इनमें भी कुछ शिक्षक-शिक्षिकाएं युवा भारत संगठन के स्वयंसेवक थे, जिन्होंनें जीवन में कभी कोई धरातलीय प्रयोग नहीं किए थे, शिक्षा की समझ नहीं थी फिर भी इनका मानना था कि वे बहुत ही बेहतर शिक्षाविद हैं। शिक्षक-शिक्षिकाओं की इस जमात से केवल अजयवीर ऐसा युवा था जो मेरा सहयोगी बन पाया था और हर कदम पर मेरे अनुप्रयोगों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर खड़ा रहा।

    शिक्षक-शिक्षिकाओं के लिए जब साक्षात्कार शुरू हुए तो मुझे मालूम पड़ा कि यहाँ शिक्षा पर अनुप्रयोग करना मतलब रेगिस्तान में पानी निकालना है। अंग्रेजी में परास्नातक को साधारण अनुवाद तो दूर की बात है छोटी-छोटी वर्तनी भी शुद्ध लिखनीं नहीं आती हो, गणित से एम.फिल को आठवीं क्लास के सवाल हल करना मुश्किल हो, भूगोल से परास्नातक को नक्शा देखना नहीं आता हो आदि-आदि। ऐसे लोगों में से विद्यालय के लिए शिक्षक-शिक्षिका छाँटना था, ऊपर से इनमें से लगभग सभी को अहंकार कि इनके इतना कोई योग्य नहीं। जो उपलब्ध थे उनमें से तुलनात्मक जो बेहतर थे, उनको लेकर विद्यालय शुरू हुआ। कुछ दिनों तक शिक्षक आते-जाते रहे। सप्ताह दो सप्ताह में ऐसे ही हिचकोले लेते हुए शिक्षा के अनुप्रयोगों के तौर-तरीकों को सुनकर और संस्थापकों के प्रयास से विद्यालय को मनीषा शर्मा, रुपाली शर्मा, सुभाषिनी वर्मा, प्रियंका शर्मा, रेखा सक्सेना व दीपशिखा तोमर जैसी शिक्षिकाएं मिलीं। सुभाषिनी वर्मा व रेखा सक्सेना छोटे बच्चों को पढ़ातीं थीं। पाँचवीं और पाँचवी से नौंवीं कक्षा तक के स्तर के शिक्षकों की भारी कमी थी। विश्वविद्यालयी डिग्रियाँ तो परास्नातक की थीं लेकिन योग्यता नहीं थी। यूं समझिए कि यदि चंद अपवाद शिक्षकों को छोड़ दिया जाए तो उनमें पांचवीं कक्षा के सामान्य विषय पढ़ाने की भी वास्तविक योग्यता नहीं थी। जबकि कोई-कोई तो दो या तीन विषयों में परास्नातक थे एक-दो तो शायद कहीं से डाक्टरेट भी कर रहे थे। शिक्षकों का वेतन पाँच सौ रुपए महीना से एक हजार रुपया महीना तक था।

    कौन शिक्षक किस विषय को किस कक्षा तक तुलनात्मक रूप से ठीक से पढ़ा सकता है, यह समझने के लिए मैं लगभग रोज शिक्षकों, कक्षाओं व विषयों को यादृच्छिक रूप से फेंटता था। उनकी कक्षाओं में बच्चा की तरह बैठता था ताकि समझ सकूं कि कौन सा शिक्षक किस विषय को किस कक्षा तक तुलनात्मक पढ़ा सकता है।

    मैं रोज विद्यालय समाप्ति के बाद शिक्षकों को लगभग दो घंटे पढ़ाता। छात्र, शिक्षक व शिक्षा पर संवाद की चर्चायें करता। मनीषा, रुपाली, सुभाषिनी व रेखा जैसी कुछ शिक्षिकाओं को छोड़कर किसी को भी इस प्रकार की चर्चाएं पसंद नहीं थीं। मैं शिक्षक-शिक्षिकाओं को जागृत करना चाहता था, उनका बेतहरीन बच्चों  के विकास में प्रयोग करवाना चाहता था। बने बनाए दस्तूरों से हटकर जो भी मैंने करना चाहा, उस हर बात में मेरा विरोध व असहयोग हुआ। मैं हार नहीं मानता था, दृढ़ता से अपनी बात में अड़ा रहता था।  कुछ दिनों के बाद शिक्षक मेरी बात मानते थे, मेरे हर नये विचार पर बार-बार यही होता था। किसी भी नए विचार को लागू करने के पहले मैं खुद को मानसिक रूप से तैयार करता था कि दो या तीन दिन तक मुझे शिक्षकों का बहुत अधिक विरोध झेलना पड़ेगा। कभी कभी तो शिक्षक स्तीफे तक की धमकी देते थे। किंतु कभी कोई गया नहीं उल्टे समय के साथ-साथ बच्चों  के साथ प्रेम के साथ काम करने लगे थे।

    विद्यालय, कक्षाएं, छात्रगण और छात्रों से मेरे संबंध

    मेरे रहने का इंतजाम विद्यालय से लगभग तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर पास के कस्बे में पतली गंदी गलियों में से चलकर मिलने वाले एक घर में किया गया था जो एक संस्थापक का पैतृक घर था। पैतृक घर होने के बावजूद घर बहुत छोटा था, दो कमरे, एक बाथरूम, एक शौचालय व एक पेड़ था। पेड़ को छोड़कर सभी का आकार बहुत छोटा-छोटा था एवम् छत की ऊंचाई बहुत ही कम थी। घर के सामने से गंदी नाली बहती थी जिसके कारण मच्छरों का भयंकर प्रकोप था। रोज सुबह जल्दी उठकर नगरपालिका की सप्लाई वाला पानी भरना, दो-चार केले खाकर लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर फिर रिक्शा करके विद्यालय पहुंचना, इसी तरह शाम को वापस लौटना। इस प्रक्रिया में रोज का दो से तीन घंटे का समय, मानसिक व शारीरिक थकावट, केलों और रिक्शा के किराए में रुपए खर्चना। 

    बच्चों व शिक्षकों को अधिक समय दे पाऊं। विद्यालय का खर्च कम से कम हो इसलिए मैंने विद्यालय में ही रहने का निर्णय लिया। जब मैंने कहा कि मैं विद्यालय में ही रुकूंगा, उस समय विद्यालय से लगभग एक किलोमीटर तक कोई घर नहीं था केवल खेत थे। मुझसे कहा गया कि रात में जंगली जानवर आते हैं, बिस्तर नहीं है आदि आदि। मैंने कहा कि यदि जंगली जानवरों के हाथों मारा जाऊंगा तो कम से कम ‘आत्महत्या के दोष’ से मुक्त रहूंगा। मैंने विद्यालय में रहना शुरु किया। मेरे साथ अजयवीर ने भी हिम्मत दिखाई। हम दोनों रात में बच्चों की बैठने वाली बेंचों को जोड़कर बिना गद्दे व बेडशीट के ही सोते थे। मच्छरों के लगातार हमलों से परेशान होकर मच्छरदानी ले आये, फिर एक बेडशीट और दो तकिया। जब तक विद्यालय में रहे ऐसे ही सोए हम दोनों लोग। फिर वीरेंद्र भी हम लोगों के साथ सोने लगे थे। वीरेंद्र भी अजयवीर की तरह परिश्रमी थे, शिक्षक के रूप में बेहतर न होते हुए भी बच्चों को खेलकूद अच्छा सिखाते थे और मेरे अनुप्रयोगों का विरोध नहीं करते थे। 

    विद्यालय में ही सोने के कारण सुबह तीन-चार बजे जगना जुगाड़ में बैठकर दूरदराज के गावों से बच्चों को विद्यालय लेकर आना संभव हो पाया। रास्ते में बच्चों से बातें करना, हसते गाते उनसे चर्चा करना, उनको समझना, उनके साथ उनके घर में हो रही घटनाओं को समझना आदि-आदि यही करता था लगभग रोज सुबेरे बच्चो के साथ जुगाड़ की कुछ घंटे की यात्रा में। अधिकतर गांवों के रास्ते मिट्टी व ईटों के खड़ंजे के होते थे। बारिश होने पर कीचड़ में जुगाड़ का फंस जाना, सारे बच्चों का नीचे उतरना, हम सब का मिलकर जुगाड़ में धक्का लगाकर कीचड़ से बाहर निकालना, फिर जुगाड़ में चढ़ना। कभी-कभी यह प्रक्रिया कई-कई बार दोहरानी पड़ जाती थी। जीवन में पहली बार जुगाड़ में यहीं बैठा था। मेरे लिए जुगाड़ की यात्रा बहुत थकावट भरी होती थी लेकिन जुगाड़ में मेरे जाने से मुझे बच्चों के साथ विद्यालय के बाहर उनकी अपनी उन्मुक्तता व सहज जीवंतता के साथ रहने को मिलता था। मेरे व बच्चों के मध्य विश्वसनीय व अपनत्व भरे रिश्ते बनते थे और बच्चे मेरे सामने उन्मुक्त होकर व्यवहार करते थे। 

    कई बच्चों को घर से निकलते ही भूख भी लगती थी तो वे जुगाड़ में ही अपना टिफिन खोलकर खाना भी खाने लगते थे। मैंने भी उनसे एक-दो कौर लेकर खाना शुरू कर दिया था। विद्यालय में भोजनावकाश होने पर मैंने बच्चों के टिफिन में से एक-दो कौर निकाल कर खाना शुरू कर दिया था। बच्चों को मेरे द्वारा उनके टिफिन से खाना खाया जाना बहुत अच्छा लगा। बच्चे मेरे लिए एक रोटी अतिरिक्त लाने लगे, इस तरह मेरे पास प्रतिदिन बहुत रोटियां हो जातीं थीं। इन्हीं रोटियों में से मैं उन बच्चों को खाना खिलाता जो किसी कारणवश टिफिन नहीं ला पाते थे। इससे दो फायदे हुए, दलितों सहित विभिन्न जाति व धर्मों के बच्चे एक दूसरे के टिफिन से खाना खाते, बच्चों से मेरे मित्रवत रिश्ते बनते। शिक्षक व शिक्षिकाएं भी बच्चों के साथ ही भोजन करेंगे ऐसा नियम बनाया, शुरू-शुरू में मेरे इस नियम का विरोध हुआ लेकिन बेहतर परिणामों को महसूस करके कुछ शिक्षिकाओं ने भी अपने घर से अतिरिक्त भोजन लाना शुरू कर दिया था और बच्चों के साथ अपना भोजन करने लगीं। शनिवार व रविवार को मुझे व डा० शीला डागा को बच्चों के अभिभावक व्यक्तिगत रूप से दूर दराज के गांवो से भोजन के आमंत्रित करते थे।

    मैंने बच्चों के साथ बिलकुल उन्हीं की तरह बच्चा बनकर उन्हीं के बनाए नियमों के तहत खेलना शुरू किया। शिक्षकों के द्वारा बच्चों  को डांटने व मारने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। धीरे-धीरे मैं छोटे शिशु से लेकर किशोर तक लगभग सभी बच्चों  का मित्र हो चुका था और इतना विश्वास प्राप्त कर चुका था कि वे मेरी बात पर अनुप्रयोग करने को तैयार हो चुके थे। विद्यालय में बच्चों व शिक्षक के मध्य का संबंध शिक्षा का मुख्य आधार होता है, यही संबंध सब कुछ तय करता है।

    बच्चों व शिक्षकों के साथ विश्वासपूर्ण संबंध बनते ही मैंने आमूलचूल परिवर्तन के लिए दस्तूरों से हटकर कुछ बड़े निर्णय लिए जैसे कि – 

    विद्यालय व कक्षा में बच्चे को अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी

    कक्षा में बच्चे अपना मनचाहा विषय पढ़ सकते थे। एक ही समय में एक ही कक्षा में बच्चे गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, चित्रकला आदि अपनी पसंद के अनुसार कोई भी विषय पढ़ सकते थे। एक शिक्षक पर्यवेक्षक की तरह कक्षा में रहता था। बच्चे को अपने विषय के लिए आवश्यकता होने पर या तो उस विषय के शिक्षक के पास जाने या यदि शिक्षक खाली है तो शिक्षक कक्षा में आता था। यदि किसी बच्चे की इच्छा कोई भी विषय पढ़ने की नहीं है तो उस बच्चे को कक्षा से बाहर जाकर खेलने कूदने की स्वतंत्रता थी। बच्चे की इच्छा होने पर वह कक्षा के में लेटकर पढ़ व सो भी सकता था। जिन कक्षाओं में यह प्रयोग मैने किया उनके बच्चों की गुणवत्ता व सीखने की क्षमता तेजी से बढ़ी। कभी-कभी कुछ विषयों जैसे कि अंग्रेजी, विज्ञान, गणित आदि के लिए कई कक्षाएं जैसे कि छठवीं, सातवीं, आठवीं व नौवीं कक्षाएं मिला दी जातीं थीं ताकि बच्चे एक दूसरे को सिखाते हुए सीख सकें और उनमें एक दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान व जिम्मेदारी के भाव विकसित हों। 

    परीक्षा प्रणाली में आमलचूल परिवर्तन

    मैंने हमेशा से महसूस किया है कि विद्यालयों में परीक्षा प्रणाली व पाठ्यक्रम का पूरा ढांचा ही गलत है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि गणित की परीक्षा है और दस प्रकार के नियम पढ़ाए गए। एक छात्र आठ प्रकार के नियमों को जानता है और दूसरा छात्र केवल दो प्रकार के नियमों को जानता है। परीक्षा में प्रश्न पत्र बनाने वाले शिक्षक ने यदि दो नियमों पर आधारित प्रश्न पत्र बना दिया तो जिसको आठ नियम आते हैं वह शून्य अंक पाएगा और जिसको केवल दो नियम आते हैं वह पूरे अंक पाएगा। ऐसी परीक्षा प्रणाली में जो बहुत योग्य है वह नाकारा साबित हो जाता है और जो कम योग्य है वह विशेषज्ञ साबित हो जाता है। 

    मैंने प्रत्येक विषय के प्रत्येक अध्याय/नियम को प्रश्न पत्र में स्थान दिलवाया। प्रत्येक नियम/अध्याय की लिखित परीक्षा करवानी शुरू की। प्रत्येक बच्चा खुद को और अपने सहपाठियों को हर नियम/अध्याय में ग्रेड देता था। मतलब यह कि बच्चा स्वयं व अपनी कक्षा के सहपाठियों का मूल्यांकन उस विषय के लिए करता। इससे बच्चों में एक दूसरे के प्रति स्वीकार्यता बढ़ी और वे एक दूसरे से/को सीखने व सिखाने लगे।

    बच्चा प्रत्येक विषय के शिक्षक की ग्रेडिंग करता था और विषय का शिक्षक बच्चे की ग्रेडिंग करता था। बच्चे व शिक्षक दोनों को ही यह मालूम पड़ता था कि वे एक दूसरे के बारे में क्या विचार रखते हैं? इस पद्धति ने बच्चे का शिक्षक और स्वयं के ऊपर विश्वास बढ़ाया। 

    यह पद्धति बच्चों को इतनी मजेदार लगी कि वे हर दूसरे दिन परीक्षा देने को तैयार रहते, कुछ बच्चे तो जिद करते कि परीक्षा आज ली जाए।

    ब्लैकबोर्ड का प्रयोग बंद करवाना

    मैंने कक्षाओं में ब्लैकबोर्ड का प्रयोग बंद करवा दिया था। मेरा तर्क था कि ब्लैकबोर्ड से पढ़ाई फेंककर दी जाती है, जो बच्चा उस फेंकी हुई पढ़ाई को लपक लेता है वह पढ़ जाता है जो बच्चा उस फेंकी हुई पढ़ाई को नहीं लपक पाता वह नहीं पढ़ पाता है। पढ़ाई बच्चे के हाथ में ठीक से सहेजकर पकड़ाई जानी चाहिए। शिक्षक को प्रत्येक बच्चे पर ध्यान देना होता था।  कक्षाओं में कुर्सी-मेज का प्रयोग भी बंद करवा दिया था।

    बच्चों को शिक्षक व आंतरिक प्रबंधक बनाना

    बड़ी कक्षा के बच्चे छोटी कक्षा के बच्चों को शिक्षक की तरह पढ़ाते थे। जिन बच्चों को जिस विषय में बेहतर जानकारी होती थी वे उस विषय को अपनी कक्षा या अपनी से ऊंची कक्षा के बच्चों को पढ़ाते थे। विद्यालय का आंतरिक प्रबंधन भी बच्चों को सौंपा गया, उनके द्वारा लिए गए निर्णय शिक्षकों को भी मानने होते थे।

    ……. आदि आदि कई अनुप्रयोग मैंने किये। 

    इन प्रयोगों के लिए मेरे मन में मनीषा शर्मा, रुपाली शर्मा, अजयवीर व डा० शीला डागा का विशेष स्थान है। इन लोगों ने कभी मेरा विरोध नहीं किया। सदैव सहयोग दिया।  विद्यालय में दो सत्ता-केंद्रों के होने के बावजूद कभी भी एक पल के लिए महसूस नहीं हुआ कि दो सत्ता-केंद्र हैं। डा० शीला डागा ने कभी अपने अहंकार को तवज्जो नहीं दी। वे बच्चों  व शिक्षिकाओं को प्रेम करतीं थीं और उनका विकास देखना चाहतीं थीं। उनके लिए या मेरे लिए एक छोटे से विद्यालय का प्रधानाचार्य या शिक्षाधिकारी होना एक तरह से अपनी पहचान खोकर ही समाज के लिए काम करना था। हम दोनो एक दूसरे के संपूरक की तरह काम करते थे। शिक्षा के मेरे अनुप्रयोगों में डा० शीला डागा सदैव साथ खड़ी रहीं। मेरे व संस्थापकों के बीच संघर्ष होने की स्थिति में बीच में ढाल की तरह खड़ी हो जाती थीं। दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर का प्रधानाचार्या के रूप में नाम ही उनके छोटे से विद्यालय को उस क्षेत्र में पहचान देता था, इसलिए डा० शीला डागा का नाम विद्यालय से जुड़े रहना संस्थापकों के लिए ताकत थी। 

    मेरा विद्यालय को छोड़ना

    मेरी इच्छा थी कि लगभग एक साल रह कर इस विद्यालय में शैक्षिक अनुप्रयोगों को स्थापित करके जाऊं। किंतु जैसा सामान्यतयः भारत में विकृतिपूर्ण मानसिकता है कि जो काम नहीं करते हैं उनको काम करने वालों की लोकप्रियता से असुविधा होती है और अहंकार में चोट पहुंचती है। यहां भी ऐसा ही हुआ, संस्थापकों को मेरे अनुप्रयोगों की सफलता व उपलब्धियों को देखने के बावजूद मेरे अनुप्रयोगो से असुविधा होने लगी। मैं सोचता था कि जब तक बच्चे, कुछ शिक्षक-शिक्षिकाओं व डा० शीला डागा साथ दे रहे हैं, संस्थापकों के द्वारा किए जा रहे अपमानों में ध्यान दिए बिना बच्चों  के विकास के लिए प्रयोग करते जाऊं। बच्चों का ही कुछ भला होगा, इनके माता-पिता की ही कुछ सोच बदल जाये। 

    मेरी एक आदत रही है, अब भी है कि मैं सामाजिक कामों को करते समय बिलकुल खुद को भूल कर काम करने लगता हूँ और अपने मान-अपमान व प्रतिष्ठा आदि की जरा सा भी परवाह नहीं करता। तो अधिकतर होता यह है कि बहुत लोग मेरे बारे में यह सोचने लगते हैं कि मेरी कोई विवशता है। ऐसे लोगों को यह लगता है कि आखिर कोई क्यूंकर किसी अनजान जगह जाकर, अनजान लोगों के लिए इतनी मेहनत से काम करेगा। ऐसे लोग जो सिर्फ पहचान, प्रतिष्ठा व सत्ता के लिए ही सामाजिक कामों का दिखावा करते हैं को यह समझ ही नही आता कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो निःस्वार्थ भाव से दूसरों के विकास में भारी असुविधाएं व अपमान झेलकर भी भागीदार बनने में आत्म-संतुष्टि की प्राप्ति करते हैं। 

    रात में विद्यालय में बच्चों  के बैठने की बेंचों को जोड़कर सोना, बिना एक रुपया वेतन लिए विद्यालय के लिए काम करना, सुबह चार बजे जगकर लकड़ी के पटरों को जोड़कर बनाए गए जुगाड़ में बैठकर बिना सड़कों वाले गांवों में जाकर बच्चों को विद्यालय लाना, बच्चों  के टिफिनों से दो-दो कौर रोटी लेकर अपने भोजन का इंतजाम करना आदि-आदि जैसे तौर-तरीकों को देखकर संस्थापकों के अंदर मेरे प्रति आदर भाव या प्रेम भाव जगने की बजाए मेरे प्रति उपेक्षा व तिरस्कार का भाव जगा। उनको यह लगा कि मैं इसी तरह की बेगार मजदूरी के ही लायक हूं, यही मेरा स्तर है। स्थितियाँ यहाँ तक पहुंची कि एक दिन मुझे अपने आपको वहां से अलग करना पड़ा। मेरे हटने के अगले ही दिन से मेरे सारे प्रयोग बंद कर दिए गए और विद्यालय को दूसरे स्कूलों की तरह बना दिया गया। यदि कोई बच्चा कभी यह कह देता कि विवेक सर बहुत अच्छे थे तो उसको दंड दिया जाता। अगले सत्र में बच्चों  की संख्या बहुत अधिक घटी और दो-तीन साल में ही विद्यालय बंद हो गया। जबकि मेरे निकलने के बाद विद्यालय में कई कमरे बने, विद्यालय का भवन दुमंजिला हुआ, अच्छे चमकदार शौचालय बने, खेलकूद के सामान आदि भी आये।

    मेरी जिद, अनुप्रयोगों को करते हुए संवाद-प्रक्रिया व असहयोगों के बावजूद हार न मानना आदि कारण रहे होगें कि बच्चों  के साथ-साथ संवेदनशील शिक्षकों को भी बहुत कुछ सीखने समझने को मिला इसीलिए आजतक मुझे प्रेमभाव से याद करते हैं। मुझे आज भी याद आता है, उस विद्यालय में मेरा अंतिम दिन जब तीन सौ से अधिक बच्चे व शिक्षक-शिक्षिकाओं घंटो रोए थे। बच्चों  व शिक्षको के परिवारों ने मेरे साथ पारिवारिक रिश्ते बनाए। उनमें से कुछ के परिवारों का अभिन्न भाग बन चुका हूँ। इन परिवारों के कारण मुझे यूँ लगता है जैसे बिलारी मेरी अपनी ही मातृभूमि है। जब भी बिलारी अपने इन सामाजिक परिवारों से मिलने जाता हूँ तो विद्यालय के संस्थापकों से भी औपचारिक मुलाकात करने जाता हूँ पता नहीं क्यों आज भी उनका व्यवहार उपेक्षा व अपमान से युक्त दिखावटी ही रहता है। संस्थापकों की पता नहीं कैसी मानसिकता व सोच है कि आज तक एक छोटी सी बात नहीं समझ पाए कि मैंने उनको दिया ही है, उनसे कुछ लिया नहीं। मेरे अहसान उन पर हैं, उनका कोई अहसान मुझ पर नहीं। उनको मेरे प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। यह मेरी विनम्रता व उदारता है कि मैं उनसे मिलने जाता हूँ।

    जब भी मैं इस विद्यालय के संदर्भ में अपने अनुप्रयोगों के बारे में सोचता हूँ तो यह पाता हूँ कि अयोग्य शिक्षकों व न्यूनतम संसाधनों के बावजूद विद्यालय को जिस मुकाम तक लाकर मैने खड़ा किया था। यदि शिक्षा की समझ संस्थापकों के पास होती तो यह विद्यालय बंद होने की बजाए आज देश में शिक्षा के प्रतिष्ठित माडलों में से एक होता।

    चलते-चलते

    जिस इलाके में यह विद्यालय था वहां किसी छात्र द्वारा विज्ञान वर्ग से दसवीं कम अंकों से भी पास कर लेना बड़ी बात मानी जाती थी। हमारे पढ़ाए हुए बच्चों ने कुछ महीनों के इन प्रयोगों से प्राप्त अपने आत्मविश्वास व सोच के दम पर कुछ वर्षों बाद दसवीं व बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में जिले स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त की। जब कुछ महीनों का रिश्ता बच्चों में इतना आत्मविश्वास व सोच पैदा कर सकता है तो यदि बच्चों को अच्छे शिक्षक मिल जायें तो बच्चे क्या नहीं कर सकते हैं। 

    मेरा बहुत ही दृढ़ता से मानना है कि किसी समाज या देश का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि वह देश या समाज अपने बच्चों से व्यवहार कैसा करता है, अपने बच्चों को शिक्षा कैसे देता है। मेरा यह भी मानना है कि शिक्षा बिना सुविधाओं के भी संभव है किंतु केवल सुविधाओं से शिक्षा संभव नहीं है। बहुत लोग रोज मैकाले की शिक्षा पद्धति की आलोचना करते हैं किंतु उनकी खुद की अपनी समझ भी मैकाले शिक्षा पद्धति की अनुकूलता से बाहर की नहीं होती। 

    इस प्रयोग की विस्तृत चर्चा मेरी किताब “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” में की गई है। आप चाहें तो किताब भी पढ़ सकते हैं। किताब यहां से प्राप्त की जा सकती है – ‘मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • ग्रामीण किसान-महिला बेहद परिश्रमी, उत्पादक व Entrepreneur (व्यवसायी) होती है

    Vivek Umrao Glendenning
    “SAMAJIK YAYAVAR/ Social Wayfarer”

    बेहद परिश्रमी :

    पूरे वर्ष सर्दी, गर्मी, बरसात कोई भी मौसम हो सुबह लगभग चार बजे उठना। गाय भैंस बकरी की देखभाल करना। देखभाल करने की प्रक्रिया में जानवरों को यहां से वहां बांधना ताकि रात भर में एक ही जगह खड़े या बैठे होने से शरीर की जड़ता टूटे ताकि दूध का संचार ठीक से हो पाए। भूसे को बड़ी-बड़ी टोकरियों में लादकर नांद तक पहुंचाना व जानवरों को देना या चारा मशीन को हाथ से चलाकर चारा काटकर जानवरों को देना।

    कुएं या हैंडपंप से ढेरों बाल्टी पानी खींच कर जानवरों के बैठने व रहने की जगह को साफ करना। अमूमन हैंडपंप बहुत कड़े होते हैं, दिन भर बहुत अधिक इस्तेमाल होता रहने से लुब्रीकेशन जल्द खत्म हो जाने के कारण तथा भूजल स्तर के उतार चढ़ाव के कारण हो जाता है।

    हाथों से जानवरों के थनों से दूध निकालना। देखने में यह प्रक्रिया भले ही आसान लगती हो लेकिन कभी दूध निकाल कर देखिए, मालूम पड़ेगा कि उंगलियों, हथेली व पंजो की कितनी तकनीक व मेहनत लगती है।

    घर के प्रयोग के लिए दूध निकाल कर, शेष दूध को गांव में डेयरी कलेक्शन केंद्र में जाकर दूध देने जाना। यह दूरी घर से काफी दूर भी हो सकती है, बाल्टी व दूध का वजन लाद कर दूरी तय करके डेयरी में दूध देने जाना।

    बच्चों के लिए नास्ता बनाना, स्कूल ले जाने के लिए भोजन बनाना, उनको स्कूल के लिए तैयार करना। घरवालों के लिए भोजन बनाना। बच्चों ने कुछ विशेष फरमाइश कर दी तो वह भी बनाना।

    भोजन बनाने का मतलब सौ-पचास-दो सौ रोटियां, चावल, दाल, सब्जी इत्यादि। यह सब चूल्हे में बनाना, धुआं झेलते हुए। फिर ढेर सारे बर्तनों को धोना।घर की अंदर बाहर बैठकी इत्यादि सभी स्थानों में सफाई करना। कभी कभार गोबर लीपना। कंडे पाथना। रसोई के इस्तेमाल के लिए कुएं या हैंडपंप से पानी भरना। परिवार के ढेरों कपड़े हाथ से धोना।

    दिन में कई बार समय-समय पर जानवरों की सेवा-टहल करना। उनको पानी पिलाना, यहां से वहां बांधना। चारा देना। शाम को फिर दूध निकालना। फिर से डेयरी में दूध देने जाना।

    खेतों पर जाना व खेतों पर काम करना। जानवरों के लिए चारा खेतों से काटना, लादना व ढोकर घर तक लाना। खेतों से घर की दूरी कई किलोमीटर भी हो सकती है।

    बच्चों के स्कूल से लौटने पर उनसे बातें भी करती है। उनको फिर से खिलाती है। खुद भले ही पढ़ी लिखी न हो लेकिन बच्चों को पढ़ने लिखने के लिए कहती है, इंतजाम करती है।

    ग्रामीण परिवेश में रिश्तों के बहुत मायने होते हैं। रिश्तेदारों से उनके रिश्ते के अनुसार जिम्मेदारी का निर्वाह व देखभाल भी करती है।

    रोजमर्रा के प्रयोग के लिए सब्जियों का उत्पादन भी कर लेती है। दूध का खोया बनाकर मिठाई का उत्पादन भी घर में घर लेती है।

    उत्पादक :

    ग्रामीण किसान-महिला उत्पादन करती है, उत्पादन का प्रारंभिक प्रसंस्करण भी करती है। यदि दाल, अचार, पापड़ इत्यादि की बात की जाए तो संपूर्ण प्रसंस्करण भी करती है। यदि गन्ना की खेती करती है तो प्रसंस्करण करके गुड़ बना लेती है, सिरका भी बना लेती है। दूध का प्रसंस्करण करके छाछ, मक्कन व घी का उत्पादन करती है। आलू चिप्स का उत्पादन करती है।

    कृषि से जुड़ा अनेक काम करना जैसे खेतों की निराई गुड़ाई सिचाई, बीज डालना, खर पतवार हटाना, कीटनाशक डालना, खाद डालना, गोबर की खाद बनाना, फसल काटना, फसल ढोना, उत्पादन का भंडारण तथा भंडार का प्रबंधन।

    बाजार में बेचने के लिए खेतों में उगाई जाने वाली सब्जियों की बात न भी की जाए, केवल घरेलू प्रयोग के लिए उगाई गई सब्जियों की ही बात की जाए तो भी प्रति वर्ष दसियों हजार रुपए की सब्जी का उत्पादन ग्रामीण किसान-महिला बैठे-ठाले ही कर लेती है।

    डेयरी में बेचे जाने वाले दूध की बात न भी की जाए, केवल घरेलू प्रयोग के लिए दूध उत्पादन की ही बात की जाए तो भी प्रतिवर्ष दसियों हजार रुपए के दूध का उत्पादन ग्रामीण किसान-महिला कर लेती है।

    घरेलू प्रयोग के लिए छाछ, मक्खन व घी का प्रसंस्करण पद्धति से उत्पादन करती है। इन्हीं वस्तुओं का सालाना उत्पादन बीसियों हजार रुपए होता है।

    Entrepreneur (व्यवसायी) :

    ग्रामीण महिला-किसान जिन वस्तुओं का उत्पादन व प्रसंस्करण घरेलू व पारिवारिक प्रयोग के लिए करती है, जैसे आलू चिप्स, पापड़, अचार, आम-पापड़, दूध, खोया, मक्खन, छाछ, घी, सब्जी इत्यादि।केवल इन वस्तुओं इन जैसी अन्य वस्तुओं की ही यदि बाजार भाव से गणना की जाए तो यह कई लाख रुपए प्रति वर्ष का हिसाब-किताब बैठेगा।

    यदि खेती में उसके योगदान की गणना भी कर ली जाए बाजार भाव पर तो उसकी वार्षिक आय सरकारी प्राथमिक टीचर की तुलना पर पहुंच जाएगी।यहां ध्यान देने की बात यह है कि मैं उत्पादन व प्रसंस्करण की आय की बात कर रहा हूं। मैं घरेलू कार्यों में दी जाने वाली सेवाओं की बात नहीं कर रहा हूं। मैं खाना बनाने, देखभाल करने, कपड़े धोने, घर में झाड़ू पोछा लगाने जैसी सेवाओं की बाजार भाव की गणना करने की बात नहीं कर रहा हूं।

    मैं ग्रामीण किसान-महिला की उत्पादकता व इकोनोमी में सीधे योगदान की बात कर रहा हूं।

    दूध का उत्पादन (दूध खरीदना नहीं), उत्पादित किए दूध का प्रसंस्करण करके छाछ, मक्खन, घी, खोया इत्यादि बनाना।
    सब्जी उगाना (सब्जी बाजार से खरीद कर पकाना नहीं)।
    आलू उगाकर उसका चिप्स व पापड़ बनाना (आलू खरीद कर चिप्स बनाना नहीं)।

    ग्रामीण किसान-महिला उत्पादन में बाजार रिस्क लेती है। उत्पादन का भंडारण-प्रबंधन करती है। बहुत कुछ करती है, बहुत ही अधिक स्किल्ड होती है।

    अब सवाल यह है कि जो ग्रामीण किसान-महिला इतनी स्किल्ड है, इतनी परिश्रमी है, इतनी आय करती है, देश की इकोनॉमी व JDP में जबरदस्त व सीधा योगदान करती है। उसकी हमारे समाज में व हमारे मन के अंदर वास्तविक प्रतिष्ठा क्या है?

    प्रतिष्ठा का स्तर तो यह है कि जो महिलाएं शहरों या कस्बों में रहती हैं जिनके पति दस-बीस हजार महीना कमा लेते हैं, वे भी ग्रामीण किसान-महिला को निकृष्ट मानती है उपहास उड़ाती है। जबकि शहरी महिला का वास्तविक उत्पादन, इकोनॉमी व GDP में योगदान नहीं होता है। रिस्क क्या है नहीं जानती। दो-तीन कमरों के घर में झाड़ू पोछा करने को, मशीन से कपड़े धोने को, कुछ रोटियां पकाने खाना बनाने को बहुत बड़ा काम मानती है। अपने इन कामों की तुलना नौकरों के वेतन से करती है।

    दरअसल यह चरित्र जानबूझकर जिया जाने वाला भयंकर व बेईमान विरोधाभास है। 

    चलते – चलते :

    यदि हवाई नारेबाजी तथा वस्तुनिष्ठता-हीन-तर्क वाले शाब्दिक तामझाम वाले दर्शन को तर्कसंगत (रेशनल) न माना जाए तो दरअसल भारतीय समाज में परंपरा में ही हजारों वर्षों से परिश्रम को उपेक्षित, तिरस्कृत व अछूत माना गया है। यही कंडीशनिंग हमें गांव, ग्रामीण व किसान को मूर्ख, निठल्ला, उपेक्षित, निरीह, तिरस्कृत व असभ्य मानने की मूर्खतापूर्ण मानसिकता में रखे रहती है।

    इस मानसिकता की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगया जा सकता है कि भारत का शहरी समुदाय, गांव व ग्रामीणों को गाली मानता है तभी “गवांर” शब्द गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है।

    किसान पुरुष को निठल्ला माना जाता है, किसान महिला को अजागरूक माना जाता है, किसानों की संतानों का मजाक उड़ाया जाता है, उनको दोयम स्तर का माना जाता है।

    भारतीय राष्ट्रीय मीडिया लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा मेट्रो व बड़े शहरों की बात करते हुए प्रयोग करता है, शेष लगभग दो प्रतिशत में पूरा भारत, इस बचे हुए दो प्रतिशत के भी अधिकतर प्रतिशत में छोटे शहर ही रहते हैं।

    गांव व ग्रामीण का मानों कोई अस्तित्व ही नहीं, कीड़े-मकोड़े हैं। ग्रामीण को भी इंसान समझा जाए, वे भी प्रतिष्ठित हों, उनका आर्गनाइज्ड (organised) शोषण व तिरस्कार बंद हो, बहुत बड़ी प्राथमिकता है।

    दरअसल भारतीय समाज में स्किल व श्रम को हमेशा उपेक्षित किया गया है। स्किल व श्रम को कभी ठीक से न समझा गया, न ही परिभाषित किया गया।ग्रामीन किसान-महिला जो बहुत स्किल्ड है, उत्पादक है, Entrepreneur है, उसको जागरूक करने के लिए कुछ-कुछ हजार रुपल्ली वेतन पाने वाले NGO वेतनभोगी कर्मचारी रखे जाते हैं, आशा जैसी सरकारी कर्मचारी रखी जाती हैं, प्राइमरी स्कूल की शिक्षिकाएं रखी जाती हैं।

    इतना तो कामन सेंस होना ही चाहिए कि ककहरा व गिनती रटाना अधिक स्किल का काम है या ग्रामीण किसान-महिला के उत्पादन व प्रसंस्करण के काम। ककहरा, गिनती रटाने वाले प्राइमरी स्कूल टीचर का, एक NGO कर्मचारी का, आशा का देश की इकोनॉमी व GDP में वास्तविक उत्पादन योगदान है ही नहीं। फिर भी इनका अहंकार आसमान पर रहता है।

    ग्रामीण किसान-महिला जो इन सबसे बहुत अधिक स्किल्ड है, देश की इकोनॉमी व GDP में बहुत योगदान करती है, को निकृष्ट माना जाता है, इससे सीखने की बजाय, सिखाने जाया जाता है। ग्रामीण महिला-किसान को जागरूक बनाने के लिए अभियान चलते हैं, सेमिनार होते हैं। स्किल्ड बनाने के लिए योजनाएं बनती हैं। स्किल डेवेलपमेंट कार्यक्रम चलते हैं।दरअसल जब तक हम, हमारा समाज व हमारे देश का तंत्र इन सब चूतियापों से ऊपर उठकर श्रम व स्किल को ठीक से परिभाषित नहीं करेगा तब तक हमारा समाज व देश बेहूदगी, फूहड़ता व संघटित शोषण से बाहर नहीं निकल पाएगा।

    हमें स्किल, श्रम व इकोनॉमी को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है न कि तर्क-असंगतता, मूर्खता व शोषण के तामझाम व प्रपंचो को विस्तारित करते रहने की।

  • अखिलेश सिंह यादव को मुख्यमंत्री मोड से बाहर आ जाना चाहिए

     
    Akhilesh Yadav

    मैं अखिलेश सिंह यादव का प्रशंसक रहा हूं जबकि उनसे कभी आमने सामने नहीं मिला। उनसे या उनकी सरकार से या उनकी पार्टी से या उनके कार्यकर्ताओं से मैंने कभी एक रुपए का कोई लाभ नहीं लिया।

    किंतु इधर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में उनके समर्थकों व मीडिया में अखिलेश के बयानों से यूं लग रहा है कि अखिलेश अपने अंदर से अभी यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वे अब मुख्यमंत्री नहीं रहे हैं। यह भी लगता है कि मान बैठे हैं कि वे अगली बार 2022 में यूपी में सरकार बनाने जा ही रहे हैं जैसे 2012 में बनाई थी। 2012 की परिस्थितियां भिन्न थीं लोग बसपा से लोग चिढ़े हुए थे, भाजपा कमजोर थी, सपा की सरकार बननी ही थी। अखिलेश यादव के प्रचार ने इसमें सहूलियत दी और सपा सरकार में ढंग से आ गई।

    2012 में सपा की लड़ाई बसपा व मायावती जैसे नान-प्रोफेशनल्स से थी, ट्रांसफर-पोस्टिंग में माल कमाने, जन्मदिन में महंगे उपहार लेने जैसे बहुत टटपुंजिया जैसे क्रियापलापों से लोग ऊब चुके थे। ऊपर से इनके पास दूसरी पंक्ति लीडरशिप नहीं, ठोस जमीनी संगठन नहीं, लोगों से संवाद का नेटवर्क नहीं। ऐसी परिस्थितियों में साइकिल चला कर, रथ निकाल कर, प्रेस कान्फेरेंश करके चुनाव जीता सकता है।

    वर्तमान मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से गलतियां होगीं, पिछड़ा व दलित वर्ग सवर्णों की तानशाही व आक्रामकता से ऊबकर अखिलेश के साथ खड़ा होगा क्योंकि अखिलेश ही एकमात्र विकल्प हैं। इस धारणा के कारण मीडिया में बयानबाजी करते रहने के भरोसे ही 2022 की चुनावी बैतरणी पार करने की रणनीति पर काम करने की बजाय अखिलेश यादव को अगले पांच के लिए ठोस जमीनी क्रमागत सामाजिक योजनाओं का क्रियान्वयन करना चाहिए।

    2022 में अखिलेश यादव का मुकाबला भाजपा जैसी प्रोफेशनल व भारत की सबसे ताकतवर पार्टी से होगा जो चुनावी जीत के लिए कुछ भी करती है। संघ व भाजपा का व्यापक व मजबूत संगठन है। हर स्तर पर विभिन्न योग्यताओं व विभिन्न क्षमताओं के प्रतिबद्ध लोग हैं पार्टी व संगठनों में हैं। संघ व भाजपा से संबद्ध सैकड़ों संगठन हर स्तर पर हैं।

    जैसे अखिलेश यादव स्वयं को देश के प्रधानमंत्री बनने की दौड़ की महात्वाकांक्षा रखते हैं, वैसे ही आदित्यनाथ योगी भी प्रधानमंत्री बनने की दौड़ की महात्वाकांक्षा रखते हैं। भाजपा का विस्तार व नेटवर्क तो पूरे देश में है ही। समाजवादी पार्टी तो यूपी में ही सिकुड़ रही है। अखिलेश यादव को तो बहुत ही अधिक मेहनत, दूरदर्शिता व धैर्य की मूलभूत जरूरत है।

    सपा के कार्यकर्ताओं का मनोबल वैसे तो 2014 से ही टूटना शुरू हो चुका था, लेकिन 2017 के चुनावों में हार होने सत्ता न रहने के बाद मनोबल बहुत तेजी से टूट रहा है। धैर्य तो अभी से ही खतम हो रहा है जबकि सत्ता गए हुए दो महीने ही हुए हैं, पूरे पांच साल अभी बाकी हैं।

    पांच साल सत्ता में रहते हुए अखिलेश जी ने

    नौकरशाही को जवाबदेह बनाने का प्रयास नहीं किया,
    पिछड़ों, दलितों व मुसलमानों के लिए दूरदर्शी प्रयास नहीं किए,
    पिछड़ों व दलितों की सामाजिक राजनैतिक व वैचारिक जागरूकता के लिए ठोस कार्य योजनाबद्ध तरीके से नहीं किया,
    शिक्षा की गुणवत्ता व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए कार्य नहीं किए,
    पिछड़ों, दलितों व मुसलमानों के लिए आर्थिक विकास के लिए दूरदर्शी योजनाएं लेकर नहीं आए,
    सामाजिक न्याय के लिए गंभीर व दूरदर्शी प्रयास नहीं किए,  

    ……. सत्ता रूपी अवसर व संसाधन मिलने के बावजूद बहुत कुछ नहीं किया, जो किया ही जाना चाहिए था।

    मैं अखिलेश सिंह यादव जी को सुझाव देना चाहूंगा कि –

    पिछड़े, दलित व मुसलमानों के लिए जमीन पर उतर कर काम व संघर्ष कीजिए। बिना बिस्तर के सोइए। घर में रहने व खाने की बजाय, गरीब लोगों के घरों में जाकर रहिए, खाइए। लोगों का मतलब यादव नहीं है, यादव जाति के बाहर भी लोग हैं। जमीनी संगठन बनाइए जिसमें सभी जातियों व वर्गों से अच्छे व जमीनी लोगों को जोड़िए, उनसे विश्वसनीय संबंध बनाइए, उनको महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीजिए। विश्वास कीजिए यादव जाति के बाहर भी चिंतक होते हैं, विचारक होते हैं, सांगठनिक क्षमता के लोग होते हैं।

    अध्ययन कीजिए, वैचारिक स्वाध्याय कीजिए। समाजवाद व सामाजिक समता को गहराई से जानने समझने का प्रयास कीजिए। सामाजिक लीडरशिप क्या होती है, यह जानने समझने का प्रयास कीजिए।

    समाजवादी पार्टी मतलब “समाजवाद”, समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता मतलब “समाजवादी”, उसमें भी यादव हुआ और बड़ा वाला “समाजवादी” इत्यादि टाइप के मोडों से बाहर आइए।

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