जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत

मित्र : भारत में ऐसी मान्यता है कि भारत शताब्दियों पहले इतना अमीर था कि सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस मुद्दे पर आपका क्या मत है? 

नोमेड : भारत में बहुत ऐसी मान्यताएं हैं जिनमें शताब्दियों पहले भारत दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश था। मान्यताओं का क्या, जो भी प्रयोजित कर दिया जाए वही मान्यता बन जाती है। जिस भारत में कुल जनसंख्या के पाँच मे से चार हिस्सों को शिक्षा, समाज के लिए सोचने-विचारने, अभिव्यक्ति, मानव के रूप में प्रकृति से सहज भाव से प्राप्त मौलिक अधिकार आदि भी न रहे हों; वहाँ मान्यताएं क्या कहतीं हैं से क्या फर्क पड़ता है। मेरा मानना है कि भारतीय समाज में इतिहास व मान्यताओं के नाम पर अपवाद छोड़कर जो भी है, वह लगभग सब कुछ प्रायोजित ही है और सामाजिक-कपट व ढोंग के साथ प्रायोजित है। प्रायोजित तर्कों से ऊपर उठकर यदि सामाजिक प्रतिबद्धता व ईमानदारी से सोचिए, तो आप मेरे विश्लेषण कि जाति-व्यवस्था के होते हुए भारत के आर्थिक विकास व समृद्धि की कल्पना ही असंभव और अव्याहारिक है, से सहमत होगें।


भारत के सैकड़ों जिलों के हजारों गाँवों के लाखों लोगों से संवाद करके उनको जीवन जीते देख कर, उनके विकास के लिए उनके ही जैसे होकर धरातलीय कार्यों को करते हुए, जो समझ व अनुभव हुए उनसे मैं इन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचता हूँ। समाज के लोगों की वास्तविक जीवन-शैली, मान्यताओं, जीवन-मूल्यों और दर्शन आदि में भारी अंतर दिखता है। क्या आपको नहीं लगता कि भारत के लोग दोहरे चरित्र के होते हैं। उनकी कथनी, करनी व प्रस्तुतीकरण आदि में भयंकर व विरोधात्मक अंतर होता है। कभी-कभी तो विपरीत ध्रुवों जैसा अंतर होता है।


मित्र : जी बिलकुल लगता है?

नोमेड : क्योंकर लगता है, आपको?


मित्र : जीवन को उनके साथ जीने की प्रक्रिया में स्पष्ट अनुभव होता है, इसलिए लगता है।

नोमेड : सबको तो नहीं लगता है, आपको ही क्योंकर लगता है?


मित्र : संभवतः मैं कारकों को देखने की चेष्टा करता हूं, इसलिए लगता है।

नोमेड : संभवतः नहीं। यही यथार्थ है कि चूंकि आप कारकों को देखने की चेष्टा करते हैं या कारकों को समझना चाहते हैं, इसलिए आपको दिखना शुरु हो जाता है। वैसे ही मुझे भी जीवन जीने की प्रक्रिया में अनुभव होता है। मेरी व आपकी दृष्टि व समझ में अंतर सिर्फ मात्रा, गुणवत्ता व चरित्र आदि का हो सकता है। 


मित्र : आप क्या मानते हैं कि भारत कभी सोने की चिड़िया रहा होगा?

नोमेड : जी बिलकुल मानता हूँ कि भारत सोने की चिड़िया नहीं, सोने का डायनासोर रहा होगा। 


मित्र : इसका मतलब भारत का समाज बहुत समृद्ध रहा होगा।

नोमेड : बिलकुल नहीं।


मित्र : ऐसा कैसे हो सकता है?

नोमेड : क्यों नहीं हो सकता है। आज भारत में कुछ लोग बहुत अमीर हैं, दुनिया भर के ऐशोआराम में हैं, लेकिन समाज की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग पौष्टिक भोजन, अच्छे कपड़े व सामान्य स्तर का घर तक नहीं पाती है। 


मित्र : जी सहमत हूँ, लेकिन तब भी ऐसा ही अंतर रहा होगा, ऐसा क्योंकर हो सकता है?

नोमेड : तब तो और भी वीभत्स अंतर रहा होगा। अब तो जाति-व्यवस्था का अपवाद स्वरूप ही सही किंतु कुछ क्षय हो रहा है, तब तो जाति-व्यवस्था ही समाज व अर्थ-शास्त्र का मूल-आधार थी।


मित्र : जी।

नोमेड : दरअसल यदि भारत कभी भी समाज के रूप में समृद्ध समाज रहा होगा तो उसके कुछ अवशेष तो दिखने ही चाहिए। एक ऐसा समाज, जिसमे समाज की कुल जनसंख्या के बहुत बड़े प्रतिशत भाग को वैज्ञानिक प्रयोगों, आर्थिक व्यवस्था प्रयोगों, शोधों व प्रबंधनों को करने की बात तो छोड़िए खुद के परिश्रम के द्वारा उत्पादित संपत्ति पर ही अधिकार नहीं रहा हो, सामान्य जानकारियों को प्राप्त करने की शिक्षा का भी अधिकार नहीं रहा हो, अपने व अपने परिवार के विकास व प्रगति आदि के संदर्भ में विचार करने व अपने मन की बात की अभिव्यक्ति का अधिकार तक नहीं रहा हो, ऐसा समाज समृद्ध हो सकता है, इसका प्रश्न का ही कोई औचित्य नहीं है और आप समाज की समृद्धि की प्रासंगिकता की बात करना चाह रहे हैं।


मित्र : अभी आप ही ने कहा कि भारत सोने की चिड़िया क्या डायनासोर रहा होगा। आपके ऐसा कहने का क्या तात्पर्य है?

नोमेड : दरअसल भारत की अर्थव्यवस्था का आधार समाज में अच्छी अर्थ-व्यवस्था या संसाधनों का बेहतर प्रबंधन या वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि नहीं था। यदि होता तो अवशेष दिखाई पड़ते जैसे अन्य तत्वों के अवशेष दिखाई पड़ते हैं। अवशेष न भी दिखाई देते तो परंपराएं दिखाई पड़तीं, जैसे अन्य तत्वों की परंपराएं दिखाईं पड़ती हैं, भले ही विकृत रूप में दिखाई पड़तीं। 


जाति-व्यवस्था के कारण शूद्र को दासों की तरह आजीवन लगातार परिश्रम करके उत्पादन करना पड़ता था और परिश्रम करके उत्पादित संपत्ति के एवज में पशुओं की तरह घिसटकर जी लेने लायक सामग्री ही प्राप्त होती थी; ताकि परिश्रम करने वाले दासों की संख्या कम न हो जाए। जाति-व्यवस्था के कारण व्यापार का अधिकार केवल व्यापारी वर्ग को रहा। इन सब तत्वों को जोड़कर देखने से यह मालूम होता है कि व्यापारी को किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं थी और उत्पादन के लिए व्यापारी को नगण्य के बराबर निवेश करना पड़ता था। इस तरह परंपरा में व्यापारी जाति-व्यवस्था के कारण बिना कुछ किए ही दूसरों के परिश्रम के उत्पादन से बैठे-बैठे व्यक्तिगत लाभ कमाने की अवस्था में रहा है। इस प्रकार के व्यापार से केवल व्यापारी और राज-सत्ताओं का ही लाभ हुआ। 


शूद्र उत्पादन करता रहा और व्यापारी और राज-सत्ताएं शूद्र के आजीवन व अनवरत अवैतनिक-परिश्रम से भरपूर ऐश करतीं रहीं। इसीलिए भारत में व्यापारियों ने विज्ञान-तकनीक, शोध व मौलिक सोच आदि को प्रोत्साहित करने के बजाय कुंठित ही किया, ताकि दूसरों के परिश्रम के द्वारा भरपूर लाभ बटोरा जा सके। भारत के उद्योपतियों व व्यापारियों की मानसिकता आज भी ऐसी ही है। इसीलिए ये लोग पूरी निर्दयता, निरंकुशता व दृष्टिहीनता के साथ भारत के लोगों के परिश्रम व सामाजिक संसाधनो को कब्जाने व सभी स्तरों पर शोषणों के द्वारा अर्जित लाभ की तकनीक पर ही व्यापार करते हैं।

लाभ का बटवारा व्यापारी-वर्ग व राज-सत्ताओं के मध्य होने की परंपरा आज भी वैसे की वैसी ही है। आम-आदमी के परिश्रम की उपेक्षा तब भी थी और आज भी है; आम-आदमी के हाथों में संसाधनों व उसके द्वारा अर्जित संपत्ति का अधिकार व नियंत्रण तब भी नहीं था और आज भी नहीं है। पहले जो केवल शूद्रों के साथ होता था, आज पूरे आम-समाज के लोगों के साथ हो रहा है, यदि इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो आज की स्थितियाँ और अधिक भयावह हैं और इन सबकी वीभत्सता व भयावहता आदि का आधार जाति-व्यवस्था ही है। यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो समाज की मानसिकता व अनुकूलन ऐसा नहीं होता, जिनके कारण ऐसी भयावह परिस्थितियाँ निर्मित हो चुकी हैं। 


मित्र : बहुत विचारक किस्म के लोगों से सुनता हूँ कि अंग्रेजो के पहले भारत के लोगों की स्थितियाँ बिलकुल ही भिन्न थीं। भारत के लोग बहुत समृद्ध थे और भारत के गाँवो में स्वावलंबन की बहुत ही अद्वितीय व्यवस्था थी। अंग्रजों ने भारत के इतिहास को तोड़-मरोड़ दिया ताकि विश्व में भारत की महानता नहीं सिद्ध हो सके।

नोमेड : बिलकुल सही सुनते हैं आप, मैं भी यही सुनता आया हूँ। 


मित्र : आपके क्या विचार हैं, इन सब मान्यताओं के बारे में?

नोमेड : आधारहीन मान्यताएं हैं।


मित्र : कैसे?

नोमेड : इन मान्यताओं को मानते ही, यह मानना पड़ेगा कि भारत के प्रत्येक गाँव में अधिकतर लोगों के घर समृद्ध थे और सुविधाओं से संपन्न थे। मैंने भारत के लगभग पचास हजार छोटे-बड़े गाँवों को देखा है, खुद भी ग्रामीण परिवेश से हूँ, लगभग दो दशकों से भारत के अतिपिछड़े गाँवों के लिए धरातलीय काम कर रहा हूँ। गाँव में जमींदारों, लंबरदारों, व्यापारियों व राज-सत्ता के चाटुकारों आदि के अलावा किसके पास समृद्धि व सुविधा थी? लुहार, बढ़ई, माली, कहार आदि परंपरा में सैकड़ों वर्षों तक पीढ़ी दर पीढ़ी वही काम करते हुए भी कभी भी दो-जून की रोटी, जैसे तैसे तन ढकने वाले मांगकर लाए गए कपड़ों के टुकड़ों व जमींदार के तालाबों से खोद कर लाई गई मिट्टी के छोटे-छोटे घरों आदि से ऊपर न उठ पाए।


जिस समाज में लोगों को पेट भरने के लिए सामाजिक कार्यक्रमों में बड़े लोगों द्वारा अपनी खाई हुई पत्तलों में अपना जूठा खाना इसलिए छोड़ने की घिनौनी परंपरा बनाई गई कि भूखे पेट लोग उस बचे-खुचे जूठे खाने को खाकर जूठा खाना छोड़ने वाले की उदारता के प्रति कृतज्ञता महसूस करेंगे और अवसर पड़ने पर उसके लिए बेगार करेंगे; ऐसी परंपराएं शोषित वर्ग के लोगों का आत्मविश्वास तोड़ने व अंतःमन में शोषण को ईश्वरीय प्रयोजन व अपने जीवन की नियति स्वीकारने के लिए बनाईं गईं। उनको सुंदर शाब्दिक तर्को से गढ़ा हुआ कृत्रिम किंतु सुंदर आवरण चढ़ा कर ढक दिया गया। स्वावलंबन व सुसंस्कृत संस्कृति की अजीबोगरीब कसौटियाँ और मानदंड हैं, जहाँ घोर अमानवीयता को भी निर्लज्जता के साथ महानता व संवेदनशीलता परिभाषित कर दिया जाता है।

लुहार का बेटा लुहार, बढ़ई का बेटा बढ़ई, माली का बेटा माली, कहार का बेटा कहार आदि आदि का तथाकथित स्वावलंबन भीषण शोषण व दया पर आधारित था, न कि व्यवस्थित आर्थिक व्यवस्था पर। लुहार का बेटा सुनार नहीं बन सकता, सुनार का बेटा लुहार नहीं बन सकता। शोध, विकास व नई तकनीक आदि की दूर-दूर तक कोई भी संभावनाएं नहीं। जो है, जैसा है उसी को उटपटांग तरीके से या सुलझे हुए तरीके से आगे बढ़ाना।


ऐसे इतने कुंठित व परतंत्र तंत्र को स्वावलंबन की अद्वितीय व्यवस्था कहा व सिद्ध किया जाता है। दरअसल जाति-व्यवस्था जन्म आधारित दास-व्यवस्था थी। लेकिन इसको कर्म-आधारित व्यवस्था मानने के मिथक को सही मान लिया गया है। इसे सही मानने के पीछे अनेकानेक निहित स्वार्थ, सामाजिक-कपट व दुर्भावनाएं पोषित होती हैं। किंतु यदि संवेदनशीलता, जातिगत दुर्भावना से ऊपर उठकर, सामाजिक-ईमानदारी व जीवन-मूल्यों के आधार पर विश्लेषण कीजिए, आपको समतामूलक स्वावलंबन कही नहीं दिखेगा। 


यदि आपके द्वारा उद्धृत विचारक किस्म के लोगों की मान्यताएं मान ली जाएं तो यह भी मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने हर गाँव में सैकड़ों सुविधा-संपन्न व समृद्ध घरों को उजाड़ कर खेती की लहलहाती जमीन को ऐसे बदल दिया मानो वहाँ कभी कुछ था ही नहीं और गाँवों में सुअर के गंदे बाड़ों जैसी मलिन-बस्तियाँ बना दीं। यदि अंग्रेजों के पास आज से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व भवनों को नष्ट करके उपजाऊ भूमि में बदलने की इतनी उन्नत तकनीक थी। तो आज हमें उनकी उस जमाने की इस अद्वितीय तकनीक को सीखने की जरूरत है क्योंकि भारत की आजादी के बाद जिस तरह से कृषि भूमि के विकास के नाम पर अधिग्रहण करके कंक्रीट के जंगल खड़े किए हैं; वह भी बिना किसी खास प्रयोग व प्रयोजन के। उनको तोड़ कर उपजाऊ कृषि भूमि में बदल कर देश के लोगों के सामने सुरसा जैसे मुँह बाए खड़ी खाद्य व भूजल की भयावह समस्या को हल करने की जरूरत सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता के रूप में है।   


यदि कभी वास्तव में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता होगा, तो मैं इसका सिर्फ यह मतलब निकालता हूँ कि उस समय भारत के व्यापारियों व राजाओं आदि के पास खूब संपत्ति रही होगी। चूंकि भारत में सैकड़ों राज्य होते थे, जिनमें राजा, प्रधानमंत्री, दीवान, मंत्री, सेनापति, रिश्तेदार व चाटुकार आदि होते थे। राज्यों में व्यापारी होते थे। इसलिए समाज की अधिसंख्य जनसंख्या के शोषित होने के बावजूद, भारत सोने की चिड़िया लगा करता होगा। यदि वास्तव में भारत सोने की चिड़िया कहलाने लायक जैसा समृद्ध होता तो समाज की समृद्धि के अवशेष समाज की परंपराओं में मिलते। 


कोई भी समाज जो सांस्कृतिक व आर्थिक रूप से समृद्ध होता है, वह अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों का शोषण बर्बरता से नहीं करता है और न ही खुद अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों से विद्रूपता के साथ घृणा ही करता है।

पुस्तक "मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर" से लिया गया लेख (सामाजिक यायावर 'विवेक उमराव' द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)