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इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता – कपिल चौधरी : किसान के बेटे ने इंजीनियरिंग के बाद इंट्रप्रेन्योरशिप को चुना

Vivek "सामाजिक यायावर"

इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता। काम शुरू करने के पहले बहुत योजनाएं बनानी पड़तीं हैं, बहुत सारी तैयारियां करनी पड़तीं हैं, रिस्क लेने पड़ते हैं। भारतीय समाज में इन सबके अतिरिक्त सबसे बड़ा काम जो करना पड़ता है जिसमें पुरखे याद आ जाते हैं वह यह कि माता-पिता व परिवार को तैयार कैसे करें कि योग्यता होने के बावजूद सरकारी या ऊंचेवेतनमान की गैरसरकारी नौकरी करने की बजाय अपना व्यवसाय करेंगे। वह भी तब जबकि उस व्यवसाय को परिवार में कभी किसी ने न किया हो। बहुत लोगों को तो पूरे जीवन अपने माता-पिता का विरोध व गालियां सिर्फ इसलिए खानीं पड़तीं हैं क्योंकि उन लोगों ने अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहा। वे लोग सौभाग्यशाली होते हैं जिनके माता-पिता थोड़ी सी बहसबाजी के बाद ही सही लेकिन बात सुनने समझने को तैयार हो जाते हैं।

काम शुरू होने के बाद भी जीवन भर लगातार नवीन योजनाओं के साथ काम करना पड़ता है, जीवन भर प्रतिस्पर्धा में बने रहना पड़ता है, प्रतिस्पर्धाओं में बने रहते हुए सफल भी होना पड़ता है। व्यवसाय आर्थिक विकास का मूलभूत व सबसे महत्वपूर्ण चक्र होता है। उन लोगों के लिए तो बहुत ही मुश्किल होता है जिनको अपने माता पिता से व्यवसाय बना-बनाया नहीं मिलता है। अपना व्यवसाय करना ही आपकी मेधाविता, क्षमता व प्रयोगशीलता का वास्तविक मानदंड होता है।

Kapil Chaudhary

कपिल चौधरी:
कपिल चौधरी मुरादाबाद के एक सामान्य गांव के किसान के पुत्र हैं। कपिल चौधरी की शुरुआती पढ़ाई लिखाई गांवों के विद्यालयों में हुई। माता-पिता की इच्छा थी कि कपिल इंजीनियरिंग करें, उसके बाद कोई अच्छी सी सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करें, विवाह करें फिर बच्चे पैदा करते हुए सकून से अपना जीवन यापन करें। 

लेकिन कपिल चौधरी व उनके मित्र कपिल वर्मा अपने जीवन के रास्ते व शैली खुद चुनना चाहते थे। इन लोगों को लगा कि नौकरी करने से बेहतर है अपना स्वयं का व्यवसाय करना। इंजीनियरी की पढ़ाई करते हुए ही योजनाएं बनाने लगे। योजनाओं को जमीन पर कैसे उतारा जाए इसके लिए तैयारियां करने लगे। इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाई भी करते, पढ़ाई करने के अतिरिक्त जिस समय अन्य छात्र लोग मौजमस्ती करते तब ये दोनों युवा अपनी योजनाओं की तैयारी के लिए मार्केटिंग रिसर्च व अन्य गतिविधियों के लिए भागदौड़ करते। घर से मिलने वाली पाकेटमनी का प्रयोग इन सब कामों में करते।

Kapil Verma and Kapil Chaudhary in Mr Caps Cafe

कपिल के माता-पिता किसान। किसी किसान से उनका पुत्र जो इंजीनियरिंग कर रहा हो, वह यह कहे कि वह नौकरी नहीं करना चाहता है बल्कि अपना स्वयं का व्यवसाय करना चाहता है। अपवाद छोड़ दीजिए तो किसान हत्थे से उखड़ कर ही बात करेगा। कपिल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पढ़ते हुए लगभग दो वर्षों तक धीरे-धीरे अपने माता-पिता के मन को तैयार किया ताकि वे कपिल के निर्णय को स्वीकार कर पाएं।

पिछले वर्ष 2017 के नवंबर महीने में कपिल चौधरी ने अपने मित्र कपिल वर्मा के साथ मिल कर Mr Caps काफी कैफे की स्थापना की। मेरठ के बाद मुरादाबाद, उसके बाद भारत के अन्य शहरों में भी श्रंखला खोलने की योजना बनाए हुए हैं।

Mr Caps Cafe

कपिल चौधरी का कहना है कि इंजीनियरी की पढ़ाई के बाद जितना रुपया छात्र माता-पिता से लेकर सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं या जुगाड़ में खर्च करके नौकरियां पाते हैं या उच्च शिक्षा में खर्च करते हैं। उसकी तुलना में बहुत कम आर्थिक सहयोग माता-पिता से लिया है वह भी लोन के रूप में।

गांवों के बहुत लोग ऐसे होते हैं जो अपने मित्रों व रिश्तेदारों का प्रयोग करके अखबारों में अपने उन बच्चों का नाम व फोटो छपवाकर अपने भीतर के कुंठित अहंकार को तुष्ट करते हैं, जो किसी सरकारी नौकरी को पा गए होते हैं। मेरी दृष्टि में विकसित समाज व देश के लिए कपिल चौधरी जैसे स्वावलंबी, रोजगार देने वाले व  अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदारी करने वाले युवा आदर्श होने चाहिए न कि सरकारी नौकरी करने वाले।

सरकारी नौकरी बनाम इंट्रेप्रिन्योरशिप:
हममें से बहुत लोग लंबी-लंबी बातें करते हैं। इंट्रेप्रेन्योरशिप की बात करते हैं, सेमिनार्स में भाषण देते हैं। पुरस्कार जीतते है। लेकिन जब अपने घर की बात आती है तो हमारी पहली प्राथमिकता यही रहती है कि हमारी संतान या हमारे परिवार वाले ऊंची सरकारी नौकरी में जाएं या ऊंचे वेतनमान वाली गैरसरकारी नौकरी करें। ऊंची सरकारी नौकरी करने का उद्देश्य समाज के लिए कुछ करने का उद्देश्य नहीं होता। समाज के लिए कुछ करने के लिए न तो सरकारी नौकरी और न ही पैसा ही मूलभूत तत्व होते हैं।

अपवादों में भी अपवाद को छोड़कर सरकारी नौकरी करने के पीछे के कई बड़े व मूलभूत आकर्षण होते हैं (ढोंग चाहे जो कहा व किया जाए) -

  • जवाबदेही का न होना
  • मेहनत कम होना
  • भ्रष्टाचार का होना
  • दहेज का मिलना
  • सामंतवादी मानसिकता का होना

सरकारी नौकरियों के इन्हीं आकर्षणों के कारण स्थिति यहां तक है कि इंजीनियरिंग, एमसीए, एमबीए इत्यादि प्रोफेशनल डिग्रीधारी युवा बीटीसी, बीएड करके सरकारी स्कूलों में अध्यापक बनने का भी काम करते हैं। जीवन में संघर्ष व मेहनत से पलायनवादी इन युवाओं के जीवन का अंतिम लक्ष्य महज एक अदद सरकारी नौकरी पाना होता है। सरकारी नौकरी व जेब में पैसा आने के बाद क्रांतिकारिता, विचारशीलता, चिंतनशीलता व सामाजिक सोच तो अपने आप आ ही जाती है। इनको अधिलाभांश के रूप में लीजिए।

यदि इन आकर्षणों व अधिलाभांशों को हटा दिया जाए तो कोई भी व किसी भी स्तर की सरकारी नौकरी समकक्ष स्तर के स्व-व्यवसाय की तुलना में कहीं नहीं ठहरती है। लेकिन भारत जैसे अलोकतांत्रिक व सामंती चरित्र के समाज व लोगों वाले देशों में दो-चार या दस-बीस या सौ-पचास किताबें रटकर परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी पाने का सबसे प्रमुख व वास्तविक उद्देश्य समाज व लोगों के संसाधनों के ऐश्वर्य व शक्ति का अनियंत्रित भोग करना होता है।

चलते-चलते:
कपिल चौधरी से मेरा लगाव इसलिए है क्योंकि मुरादाबाद के जिस गांव में मैंने शिक्षा के नवीन प्रयोग किए थे, कपिल उस समय मेरे छात्र थे और छठवीं कक्षा में पढ़ते थे, मुझे आजतक नहीं भूले हैं। कपिल का मानना है कि उनके जीवन में सोच बदलने में मेरा भी योगदान रहा है। 

आप जब भी मेरठ जाएं या आपका कोई मित्र, जानपहचान या रिश्तेदार मेरठ में रहता हो या मेरठ आना-जाना होता हो। आप कपिल चौधरी को एक अवसर अवश्य दें। मेरठ से गुजरने वाले व्यस्त हाईवे में ही उनका अत्याधुनिक व खूबसूरत कैफे है। नीचे दी हुई फोटो में पता व संपर्क दिया हुआ है। फोटो पर क्लिक करने से फोटो बड़ी होकर दिखेगी।

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