Category: सामाजिक यायावर

  • भारत के विकसित, समृद्ध व वास्तविक विश्वगुरू होने की कुंजी भारत की ग्रामीण कृषक महिला है

    भारत के विकसित, समृद्ध व वास्तविक विश्वगुरू होने की कुंजी भारत की ग्रामीण कृषक महिला है

    Vivek Umrao Glendenning

    हम MBA की पढ़ाई करके, इंजीनियरी की पढ़ाई करके, व्यापार करते हुए भले ही व्यापार में हम किसी दुकान में बैठकर चूरन की पुड़िया ही बेचते हों, अर्थशास्त्र पढ़ते या पढ़ाते हुए इत्यादि इत्यादि करते हुए व्यापार, आय, लाभ हानि, श्रम, उत्पादन, सर्विस सेक्टर, लागत इत्यादि की बहुत चर्चाएं करते हैं, गुणा गणित करते हैं।

    बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करते हुए लागत की गणना करते समय बारीक से बारीक चीज यहां तक कि किसी से बात करने, मीटिंग करने इत्यादि की भी गणना करते हुए  आय, लाभ, हानि व लागत इत्यादि का आंकलन करते हैं।

    इस लेख में मैं बहुत ही सरल गणित से आपको भारतीय समाज की सबसे अधिक उपेक्षित मानी जाने वाली ईकाई ग्रामीण कृषक महिला के बारे में बताता हूँ, वह भी जीवंत उदाहरण के साथ। वह ग्रामीण महिला जो काम करती है, लेकिन उपेक्षित है, कुशल प्रबंधक है लेकिन दोयम स्तर की मानी जाती है, योग्यता के साथ उत्पादन करती है लेकिन मूर्ख मानी जाती है, देश की इकानोमी की रीढ़ (बैकबोन) है लेकिन GDP में उसकी गणना तक नहीं होती।

    जो लोग शहरों में रहते हैं यहां तक कि महिलाएं भी, वे स्वयं को ग्रामीण महिलाओं की तुलना में श्रेष्ठ मानने, ग्रामीण कृषक महिलाओं को गवांर कहते हुए स्वयं से निम्नतर व दोयम स्तर का मानने की मानसिकता में जीते हैं। जिन महिलाओं के पति सरकारी नौकरी या ऊंचे वेतनमानों वाली प्राइवेट नौकरी में हैं, वे महिलाएं तो ग्रामीण कृषक महिलाओं को बिलकुल ही दोयम स्तर का मानने की मानसिकता में जीती हैं। जो महिलाएं नौकरी करतीं हैं भले ही दो चार पांच हजार रुपए की ही नौकरी क्यों न हो, ग्रामीण कृषक महिलाओं के प्रति उनकी मानसिकता के तो कहने ही क्या।

    यहां उन ग्रामीण महिलाओं की बात नहीं हो रही है, जो खाना बनाने, घर के दो चार कमरों में झाड़ू मारने, चार पांच कपड़े धोने में ही पूरा दिन गुजार देतीं हैं, हाय-तौबा ऊपर से। यहां उन ग्रामीण महिलाओं की बात हो रही है जो खाना बनाने, झाड़ू मारने, कपड़े धोने जैसे कामों को काम ही नहीं मानती हैं, इन कामों को चुटकी बजाते कर लेती हैं। इनकी दृष्टि में काम का मतलब उत्पादन से जुड़े हुए काम। श्रेणी अलग करने के लिए इस प्रकार की महिला को ग्रामीण कृषक महिला कह रहा हूँ।

    मैं उत्तर प्रदेश के दो भिन्न इलाकों की जिन दो ग्रामीण कृषक महिलाओं की चर्चा उदाहरण के लिए इस लेख में करने जा रहा हूँ। वे दोनों मध्यवर्गीय किसान परिवार से हैं। उनके पति भी किसान हैं, नौकरी नहीं, व्यापार नहीं। कृषि के अतिरिक्त आय का स्रोत नहीं। एक महिला पश्चिमी उत्तर प्रदेश से है व एक महिला मध्य उत्तर प्रदेश से है। हर जिले में आपको इन जैसी सैकड़ों हजारों ग्रामीण कृषक महिलाएं मिल जाएंगी। खेती की जमीन, जानवरों की संख्या व अन्य कारकों के कारण उत्पादन व आय में अंतर हो सकता है। ईमानदारी से गुनिए कि भारत की वास्तविक इकोनोमी  की वास्तविक रीढ़ (बैकबोन) कहां है, कहीं ऐसा तो नहीं कि सबसे उपेक्षित, सबसे तिरस्कृत, सबसे दोयम मानी जानी वाली ईकाई ही वास्तविक बैकबोन है।

    “धर्मवती” पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक ग्रामीण कृषक महिला (आय 60,000 रुपए महीना से अधिक):

    Dharmvati

    यह धर्मवती हैं, उम्र लगभग 52 साल है। गांव में रहतीं हैं। कभी कभार रिश्तेदारों से मिलने या कोई रिश्तेदार बीमार हुआ तो उसको देखने, उसकी सेवा करने इत्यादि के लिए शहर भले ही आ जाएं। पांचवीं तक पढ़ाई की है। घर में टीवी नहीं, फ्रिज नहीं, कार नहीं, एसी नहीं।

    यहां केवल उस आय की चर्चा हो रही है जो शुद्ध रूप से धर्मवती जी की मेहनत का परिणाम है।

    धर्मवती गाय भैंस पालती हैं, उनकी सेवा टहल अपने बच्चों की तरह करती हैं, उनके नखरे झेलतीं हैं। दूध, दही, घी, अचार, सिरका, छाछ व सब्जी का उत्पादन करतीं हैं। खेती के उत्पादन को नहीं जोड़ रहा हूँ क्योंकि उसमें घर के पुरुषों का भी सक्रिय सहयोग रहता है। जानवरों के खानपान की लागत को धर्मवती के खेती उत्पादन में श्रम के योगदान से पूरा किया जा सकता है, धर्मवती भी खेती में सक्रिय सहयोग करतीं हैं। इसलिए जानवरों के भोजन की लागत को आय में से नहीं घटा रहा हूँ।

    यहां उस घी या दही की बात नहीं हो रही है जिसमें बाजार से दूध खरीद कर गर्म करके मलाई रखकर गर्म करके फुर्सत में घी बना लिया गया। यहां बात पूरे उद्योग की हो रही है। जानवर की सेवा टहल से लेकर दूध का उत्पादन फिर दूध को घर में पारंपरिक विधियों से प्रोसेस करके घी, मक्खन, छाछ इत्यादि के रूप में उत्पादित करना।

    दूध, दही, छाछ, घी, मक्खन, सब्जी, सिरका, अचार इत्यादि का जितना भी उत्पादन बाजार में बेचने या घरेलू खपत के लिए धर्मवती अपनी मेहनत व कौशल से करतीं हैं। वह सालाना लगभग 750,000 (साढ़े सात लाख) रुपए है। यदि खेती से होने वाली कुल आय में धर्मवती के श्रम योगदान की गणना को भी संज्ञा में लिया जाए तो यह आय और अधिक बढ़ जाएगी। लेकिन चूंकि बात केवल धर्मवती की आय की हो रही है। तो मैं केवल उस आय की बात कर रहा हूँ जो धर्मवती की मेहनत व कौशल के कारण होती है।

    750,000 (साढ़े सात लाख) रुपए सालाना मतलब 60,000 (साठ हजार) रुपए महीने से भी अधिक जबकि खेती से होने वाली आय इसमें नहीं जुड़ी है। सरकारी प्राथमिक शिक्षक, सरकारी कर्मचारियों व ऊंची कंपनियों में नौकरी करने वाले प्रोफेशनल्स के वेतन से भी अधिक अर्थात 60,000 रुपए महीने से अधिक की आय करने वाली धर्मवती का अपना खर्च औसत लगभग 800 से 900 रुपए महीना है, जिसमें उनके कपड़े, जूते, चप्पल, लिपिस्टिक, क्रीम, बिंदी इत्यादि खर्च सम्मिलित हैं।

    “मनोरमा” मध्य उत्तरप्रदेश की एक ग्रामीण कृषक महिला (आय 60,000 रुपए महीना से अधिक):

    मनोरमा उम्र लगभग 40 वर्ष। गांव में रहतीं हैं। अपने छोटे भाई बहनों की परवरिश में मदद करतीं रहीं, उनके विवाह संपन्न कराए। सुबह चार बजे जगतीं हैं, रात में लगभग दस बजे सोती हैं। दिन में शायद ही कभी आराम करतीं हों। बारहवीं तक पढ़ाई की है।

    बारहवीं तक पढ़े होने के बावजूद बहुत जागरूक महिला हैं। गांव में बिजली होने के बावजूद घर में बिजली नहीं ली, सोलर पैनल से पूरे घर का काम चलता रहा। घर में टीवी, कूलर, फ्रिज, मोटरसाइकिल, कार, एसी नहीं। अभी पिछले साल घर में बिजली लगवाई, फ्रिज लिया। केवल दो लड़कियां हैं, लड़के के लिए कभी मंशा नहीं रही, दो लड़कियों के साथ बेहद खुश।

    [pullquote align=”normal”]दोनों लड़कियों को खूब मजे से रखतीं हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई का पूरा ध्यान। दोनों बच्चियां पढ़ने में बहुत अच्छी हैं। रोज गांव से साइकिल चलाकर दूसरे गांव में स्थापित स्कूल में पढ़ने के लिए भेजती रहीं। गांव के स्कूल में पढ़ने के बावजूद बड़ी लड़की ने दसवीं व बारहवीं की उत्तरप्रदेश बोर्ड परीक्षा में 85% से अधिक नंबर प्राप्त किए। दसवीं या बारहवीं में से किसी एक बोर्ड परीक्षा में शायद 90% के आसपास नंबर थे। आजकल आईआईटी इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही है। छोटी लड़की ने भी उत्तरप्रदेश बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में 85% से अधिक नंबर प्राप्त किए हैं। छोटी लड़की की इच्छा डाक्टरी पढ़ने की है। बड़ी लड़की को भारत सरकार से मेधावी छात्रों के लिए प्रोत्साहन वैज्ञानिकी पुरस्कार व छात्रवृत्ति भी मिल चुके हैं।  [/pullquote]

    बहुत लोग बच्चों से पढाई करने के नाम पर घरेलू काम नहीं करवाते हैं। मनोरमा की दोनों बच्चियां घरेलू व कृषि के कामों में सक्रिय भागीदारी करतीं आई हैं, अपने कपड़े वह भी हैंडपंप से पानी निकाल कर हाथ से धोतीं आईं हैं। इन सब कामकाजों को करते रहने के बावजूद पढ़ने में भी बहुत मेधावी रही हैं। खेती से होने वाली आय का पूरा हिसाब किताब इनकी दोनों बच्चियां ही बचपन से करतीं व रखती आईं हैं। लाखों रुपए का सालाना हिसाब किताब देखने के बावजूद आजतक कभी भी एक रुपए का झोल नहीं। माता-पिता व बच्चियां सभी आपस में विश्वास के साथ जीवन जीते हैं।

    मनोरमा की दोनों पुत्रियां खेतों में काम करते हुए

    चूंकि घर में बंदूक थी इसलिए इन दोनों बच्चियों ने सात-आठ साल की उम्र से ही बंदूक चलाना सीख लिया था। दोनों लड़कियां शालीन हैं, अपने काम से मतलब रखतीं हैं लेकिन स्वाभिमानी व आत्मविश्वास की धनी हैं। यदि किसी ने उटपटांग की बात की तो शालीनता के साथ उसकी समझ में आने वाली भाषा में जवाब हाजिर। गांव में बाकायदा छोटे बच्चों व बच्चियों की वानर सेना बना रखी है। कोई भी स्कूल आने जाने वाले बच्चों बच्चियों को परेशान नहीं कर सकता है। टेंपो टैक्सी बस वाले बच्चा समझ कर अधिक किराया नहीं वसूल सलते हैं। वानर सेना हड़कंप मचाती है। रोज शाम को वानर सेना गीत व नृत्य का कार्यक्रम करती है। शाम के पहले पढ़ाई होती है, रात में पढ़ाई होती है, सुबह जल्दी जगकर पढ़ाई होती है। सबकुछ स्वेच्छा से, कोई दंड नहीं, कोई दवाब नहीं, सहजता व सरलता के साथ।

    मनोरमा गाय भैंस पालती हैं। उनके घर की खेती इनके ही दम पर चलती है। केवल दूध, दही, घी, सब्जी इत्यादि के उत्पादन से ही घरेलू खपत व बाजार विक्रय की 70,000 रुपए से अधिक मासिक आय हो जाती है। इनका अपना व्यक्तिगत खर्च कपड़े, चप्पल, क्रीम, पाउडर इत्यादि का औसत 500 रुपए महीना है।   

    मनोरमा जानवरों के भोजन का इंतजाम करते हुए
    मनोरमा खेतों में काम करते हुए

    चलते-चलते:

    जब भी आपको अपने मन में यह लगे कि ग्रामीण कृषक महिला दोयम है, मूर्ख है, गवांर है, अजागरूक है या आपके किसी मित्र या जानने वाले की मानसिकता हो। आप अपने आसपास उपस्थित ऐसे हजारों उदाहरणों को देखकर अपने भीतर के अहंकार व विकृत मानसिकता को नियंत्रित कर सकते हैं। 

    भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भारत की ग्रामीण कृषक महिला है, न कि बड़े-बड़े कारपोरेट। भारत की सरकारों, समाज व लोगों को ग्रामीण कृषक महिला के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। उनके हित में नीतियां बनाकर क्रियान्वयित करना चाहिए, सबसे प्रमुख प्राथमिकता के साथ।

    भारत की ग्रामीण कृषक महिला बहुत बेहतर प्रबंधक, उद्यमी, कुशल व योग्य है। जरूरत केवल उसे सफल इंट्रेप्रेन्योर के रूप में स्वीकारने, सम्मानित करने व नीति निर्देशक के रूप में स्वीकारने की है।

     

  • खानपान, किवदंतियां, खानपान का मनोविज्ञान व हमारा शरीर

    खानपान, किवदंतियां, खानपान का मनोविज्ञान व हमारा शरीर

    दुनिया की कोई जलवायु हो, मानव शरीर के लिए जो आवश्यक तत्व हैं वे समान ही रहते हैं। प्रकृति ने जलवायु के आधार पर अनाज, फल इत्यादि बनाए हैं आदमी को नहीं बनाया। दुनिया का आदमी समान है। तभी आदमी किसी भी महाद्वीप, उपमहाद्वीप, देश, राज्य, जिला, गांव में जाकर रह सकता है। खाने पीने की आदतों व मान्यताओं के कारण एडजस्ट करने में परेशानियां भले ही आ जाएं, प्रकृति की ओर से ऐसा कोई अंतर नहीं है।

    आदमी धरती में यहां वहां भटकता रहा। जहां-जहां उसने अपना आशियाना बनाया वहां-वहां जो सहजता से उपलब्ध रहा उसके अनुरूप उसने अपनी आदतें बना लीं। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ नियम बना लिए। पुराने समय के नियम किवदंतियों व श्रुतियों के ऊपर आधारित थे, वैज्ञानिक दृष्टिकोण व शोधों पर नहीं। भारत में तो किवदंतियां, श्रुतियां व पोथियां आज भी विज्ञान पर पूरी तरह से हावी हैं।

    विज्ञान के विकास के साथ दुनिया के बहुत क्षेत्रों के लोगों ने अपनी परंपराएं बदल लीं, बहुत क्षेत्रों के लोगों ने पुराने तरीकों के खानपान को चिपकाए रखा, कुछ क्षेत्रों के लोगों ने परंपरा, संस्कृति इत्यादि के नाम पर अहंकार के साथ हानिकारक खानपान के तरीकों को जबरदस्ती चिपकाए रखा। अगली पीढ़ियां खामियाजा भुगत रहीं हैं। यह तो समाज व समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, कंडीशनिंग व दृष्टिकोण की बात है।

    शरीर यह नहीं समझता कि प्रोटीन, वसा, अम्ल, क्षार, विटामिन इत्यादि मांस से आया है या दाल से या अंडे से या बादाम से या दूध से या किसी और वस्तु से। शरीर को सिर्फ तत्वों से मतलब है, हम उन तत्वों को उपलब्ध कराने का माध्यम कुछ भी चुनें।

    माता पिता का शरीर कैसा था, क्या अच्छाईयां खराबियां थीं। माता ने गर्भावस्था में क्या खाया पिया। दुग्धपान के समय माता ने क्या खाया पिया। बच्चे को बचपन में कैसा आहार दिया गया। इन बातों पर भी मनुष्य के शरीर का चरित्र निर्धारित होता है। एक ही प्रकार की जलवायु में पूरा जीवन गुजारने वाले लोगों के शरीरों में विभिन्न अनाज, फल व सब्जी का भिन्न असर होता है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि शरीर को कैसे ढाला गया है।

    किवदंतियां भी मनोविज्ञानिक असर डालती हैं:

    बहुत बच्चे पूरा जीवन यह मानकर जीते हैं कि भूत होते हैं, उनको बाकायदा भूत दिखने का अहसास भी होता है। क्योंकि उनके मन में यह बिठा दिया गया है कि भूत होता है इसलिए उनका मस्तिष्क उनके शरीर व मन की चरित्र उसी प्रकार गढ़ लेता है।

    यही खाने के लिए भी लागू होता है। मैं बहुत लोगों को जानता हूँ जो कुछ भी इतर खा लेंगे तो उनको बीमारी सी महसूस होने लगती है। उनके दिमाग में लोगों की कहानियों, किवदंतियों इत्यादि ने बिठा दिया होता है कि यह खाने से ऐसा होता है, वह खाने से वैसा होता है।

    दुनिया के अधिकतर देशों के लोग, दुनिया की कुल जनसंख्या का 85% से भी अधिक का मुख्य भोजन चावल ही है, चाहे जिस भी जलवायु के हों, चावल ही खाते हैं। लेकिन भारत में बड़ी जनसंख्या वाले कई राज्य ऐसे हैं जहां बुखार आने पर, खासी, जुकाम होने पर वैद्य, हकीम, डाक्टर इत्यादि सबसे पहले चावल बंद करते हैं। जो कंडीशनिंग गहरे घुसी है वह निकाले नहीं निकलती है।

    दुनिया की 85% से अधिक जनसंख्या चावल खाती है, रोटी नहीं खाती। दुनिया को छोड़िए, भारत को ही लीजिए बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलांगाना व केरल जैसों राज्यों के लोग क्या करें। चावल न खाएं तो भूखे रहें। लेकिन भारत में ऐसे बहुत लोग हैं जिनके मन में यह बैठा हुआ है कि चावल नुकसान करता है, रात में नहीं खाना चाहिए, पता नहीं क्या-क्या। चूंकि मन में बैठा हुआ है इसलिए चावल देखते ही मन के माध्यम से शरीर में प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है, चावल खाने के बाद बीमार महसूस करने लगता है। ऐसा ही अन्य खाद्य पदार्थों से जुड़ी किवदंतियों से ग्रस्त मन के विकार के कारण होता है।

    मेरा रहन-सहन:

    मैं शाकाहारी हूँ, आप मुझे किसी भी जलवायु में शाकाहार में जो भी खाने योग्य उत्पाद हैं, कुछ भी खाने को दीजिए, मैं सबकुछ खाता हूँ, मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरा शरीर सामान्य रूप से काम करता रहता है। मैं बहुत ही कम बीमार पड़ता हूँ। मैंने व मेरी पत्नी ने दिल्ली में रहते हुए बिना दवाओं के डेगूं तक ठीक कर लिया था। मैं कई-कई वर्ष एक भी दवा नहीं खाता। जबकि शरीर की ऐसी तैसी भी खूब करता हूँ। कभी कभी 36-36 घंटे या 48-48 घंटे सोता ही नहीं हूँ, लगातार काम करता हूँ। कभी-कभी 24-24 घंटे गाड़ी चलाई है वह भी भीड़भाड़ वाले इलाकों में रात दिन दोपहर। शरीर बिलकुल ठीक से काम करता है। कभी बहुत ही अधिक मुलायम गद्दे कभी पथरीली जमीन, कहीं भी सोने को मिल जाए सो लेता हूं। कभी-कभी दिन-दिन भर पैदल चलना तो कभी सप्ताहों एक ही घर में रहना। कभी-कभी खड़े-खड़े ही सो लिया, कभी-कभी बैठे-बैठे ही सो लिया। चर्चा करते हुए बीच में दो-चार मिनट की नींद मार ली और फिर आगे के दस-बारह घंटों के लिए तैयार।

    मतलब यह कि शरीर ऐसा ढला हुआ है कि कभी भी किसी भी परिस्थिति के लिए हर पल तैयार। अभी तक तो ऐसा ही चल रहा है। अब आगे भविष्य में कुछ गड़बड़ हो तो नहीं कह सकता हूँ। आगे गड़बड़ की संभावनाओं को कम करने के लिए। शरीर के लिए आवश्यक तत्वों का अध्ययन करने में भी लगा हूं, ताकि तत्वों की डिफीशियंसी से शाकाहारी उत्पादों के सेवन से बचा जा सके।

    जब से आस्ट्रेलिया आया हूँ तबसे किस सब्जी में कौन सा तत्व होता है, किस फल में कौन सा तत्व होता है, किस मेवे में कौन सा तत्व होता है। इस सबका अध्ययन करता हूँ। फिर उसी हिसाब से शरीर को पोषक तत्व उपलब्ध कराता हूं। अपना तो प्रयास यही है कि शरीर लंबे समय तक सक्रिय बना रहे। चूंकि यहां इस प्रकार की सब्जियां, साग, फल व मेवे इत्यादि सहजता से उपलब्ध हैं, इसलिए शरीर की भी देखभाल करने के प्रयास में भी हूं।

    जब तक माता पिता के संरक्षण में रहता रहा तब तक हमेशा कमजोर रहा, बहुत कमजोर। क्योंकि मेरी माता किवदंतियों पर चलती हैं। नींबू नहीं खाना, टमाटर नहीं खाना, अचार नहीं खाना, मिर्च नहीं खाना। केवल लौकी, तरोई, कद्दू, पालक पानी व नमक में उबाल कर खा लीजिए। शरीर को इसके अलावा किसी तत्व की जरूरत नहीं। हमेशा बीमार रहा, दिन में पंद्रह से बीस तीस बार पेचिस जाने वाली स्थिति महीने में कम से कम पंद्रह दिन तो रहती ही थी। नारफ्लाक्स-टीजेड का एक दस टेबलेट वाला पत्ता मेरी जेब/पर्स/झोले में हमेशा पड़ा ही रहता था।

    जबसे माता पिता के संरक्षण में रहना छोड़ा तबसे शाकाहार में विभिन्न तत्वों वाले उत्पाद खाने शुरू किए। कभी कोई बीमारी नहीं हुई, उल्टे शरीर और दुरुस्त होता चला गया। जेब या पर्स में छोड़िए घर में दवा नहीं मिलेगी। नारफ्लाक्स-टीजेड तो भूल ही चुका हूँ कि क्या चीज होती है।

    सामाजिक कार्यों को करते हुए हजारों गावों में गया। हजारों गांवों में पानी पिया, खाना खाया, सोया। कभी बीमार नहीं हुआ। कभी थकावट महसूस नहीं की। आप मेरे जमीनी साथियों से पूछ सकते हैं, मेरी जीवन शैली के बारे में।

    कहा जाता है कि ठंठा गरम एक साथ नहीं पीना चाहिए। मुझे आप पहले ठंठा फिर गरम, पहले गर्म फिर ठंठा कैसे भी दीजिए कोई फर्क नहीं पड़ता। सर्दियों में फ्रिज का पानी गटकता हूँ, बर्फ चूसता हूँ। दो-दो दिन का फ्रिज में रखा खाना, फ्रिज से निकाल कर बिना गर्म किए ठंठा ही खाता हूँ, कोई फर्क नहीं। कहा जाता है कि मूली रात में नहीं खानी चाहिए, बहुत नुकसान करती है। मैं रात में खूब मूली खाता हूँ, कभी कोई परेशानी नहीं।

    चलते-चलते:

    मुझे आप किसी भी जलवायु वाले इलाके में कुछ भी शाकाहार खाने को दे दीजिए सब पचा जाता है। मेरा तो अभी तक का पूरा जीवन ही गुजरा है यात्राएं, यात्राएं और यात्राएं करते हुए, विभिन्न जलवायुओं के इलाकों में रहते हुए। मैने आजतक कभी भी किसी भी गांव में खाना परोसने वाले से यह नहीं कहा कि मैं यह नहीं खाता या मुझे फलानी चीज नुकसान करती है। मैं शाकाहार में जो भी खाने योग्य वस्तु परोस दिया गया है, वह मैं खा लेता हूँ। हां खाना परोसने वाले व खाना खिलाने वाले का भाव जरूर जानना समझना चाहता हूँ। यदि कोई भार समझ कर खाना खिलाता है, परोसता है तो मैं उसके यहां खाना कम खाता हूँ या संभव हुआ तो कोई बहाना बना कर खाना खाने से मना कर देता हूँ, भूखे रहना पसंद करता हूँ। मेरा मानना है कि भोजन भले ही बिलकुल साधारण हो लेकिन प्रेम से बनाया व खिलाया जाना चाहिए।


  • Video: आदि का स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलना व उल्टा चढ़ना

    Video: आदि का स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलना व उल्टा चढ़ना

    लगभग साढ़े सात महीने की आयु में पहली बार दो कदम अपने आप चले। आठवें महीने में दोनों हाथों की मेरी उंगलियां पकड़ कर चलने लगे। दसवें महीने में सिर्फ एक उंगली पकड़ कर चलने लगे। एक-एक दिन में कई-कई किलोमीटर चल जाते। 


    आदि बिना किसी ट्रेनिंग के एक झटके में सीढ़ियां चढ़ना शुरू किए, एक झटके में ही एक दिन सीढ़ियां उतरना भी शुरू किए। यूं लगता है आदि अपने मन के अंदर आब्जर्व करते हुए सीखते रहते हैं, आब्जर्व करते हुए एक दिन जब उनको विश्वास हो जाता है कि वे ऐसा कर सकते हैं तब वे एक झटके में कर जाते हैं या कर डालने का प्रयास करते हैं।


    आदि कुछ दिन बाद साढ़े पंद्रह महीने के होगें। अब आदि पार्क में आदि स्लाइडर में फिसलने के लिए लोहे की ऊंचे-स्टेप वाली सीढ़ियां अपने आप चढ़ते हैं, फिर स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलते हैं। फिर स्लाइडर में फिसलन की ओर से ऊपर चढ़ने का प्रयास करते हैं। थकने पर पानी पीने जाते हैं। 


    इन सभी गतिविधियों को इस वीडियो में देखा जा सकता है। 

  • Video: जोखिम उठाने वाला “आदि”

    Video: जोखिम उठाने वाला “आदि”

    आदि को ज्यों ही यह अनुमान लग जाता है कि वह ऐसा कर सकते हैं, तब वे बिना डरे वैसा कर गुजरने की इच्छाशक्ति रखते हैं। पार्क में खेलने आते समय उन्होंने कई बार देखा कि सात-आठ वर्ष के बच्चे लकड़ी के इन लाग्स के ऊपर संतुलन बनाते हुए चलते हैं। आदि की इच्छा रहती रही कि वे भी ऐसा करें लेकिन समझ गए कि अभी वे ऐसा नहीं कर सकते हैं। बहुत दिनों से मन ही मन में गुणा-गणित लगा रहे होंगे, चुपचाप आब्जर्व कर रहे होंगे, अपनी शारीरिक क्षमता को नाप-तौल रहे होंगे। दो दिन पहले उनको लगा कि वे ऐसा कर सकते हैं इसलिए जोखिम लिया जा सकता है। वीडियो को देखकर स्वयं ही आनंद लीजिए, आदि की एक नई गतिविधि का, जोखिम लेने के साहस का।

     

  • Video: पढ़ाकू आदि

    Video: पढ़ाकू आदि

    ज्यों ज्यों आदि बढ़े होते जा रहे हैं उनकी रुचि किताबों में बढ़ती जा रही है। अपना काफी समय किताबों के साथ गुजारते हैं, वह भी आपके बिना अपने हिसाब से। आदि अब हर समय आपके साथ रहना नहीं चाहते हैं, आपको आपकी जगह छोड़कर अपने पसंदीदा कोनों में जाकर अपनी किताबों के साथ समय गुजारना भी पसंद करते हैं। कभी कभार आदि लगभग आधा घंटा या अधिक समय भी अकेले अपनी किताबों के साथ अपने हिसाब से गुजारते हैं। अपनी पसंद की किताबें निकाल कर उनके पन्ने उलटते हुए पढ़ते रहते हैं। लगभग 6 मिनट का यह वीडियो आपको रुचिकर भी लग सकता है या बोरियत वाला भी। 

  • आदि व टोस्ट – अपना काम खुद करने का गर्व

    आदि व टोस्ट – अपना काम खुद करने का गर्व

    आदि की टोस्ट खाने की इच्छा थी। आदि के लिए टोस्ट का छोटा सा डिब्बा किचन बेंच पर रखा रहता है। जब उनको खाने की इच्छा हो वह मांग सकते हैं या खुद अपने सीढ़ीदार स्टूल पर चढ़कर हाथ बढ़ा कर ले सकते हैं। शायद आदि की टोस्ट खाने की इच्छा रही होगी, इसीलिए आदि पहले सीढ़ीदार स्टूल पर चढ़े, हाथ बढ़ाया लेकिन टोस्ट-डिब्बा उनकी पहुंच से दूर था। अब आदि के सामने दो विकल्प थे, आदि मुझे आवाज लगाते या किसी तरह डिब्बे तक पहुंचने का जुगाड़ स्वयं करते। आदि ने दूसरे विकल्प को चुनते हुए प्रयास करने का निर्णय लिया।

    आदि स्टूल से किसी तरह नीचे उतरे (कभी कभार जुगाड़ जमाकर उतर लेते हैं नहीं तो हमको आवाज लगाते हैं, उनको अच्छा लगता है जब हम उनको हवा में उड़ाते हुए उनके सीढ़ीदार स्टूल से नीचे उतारते हैं)।

    स्टूल से अपने आप नीचे उतर कर, अपनी छोटी सी डायनिंग कुर्सी पर चढ़े, कुर्सी से अपनी डायनिंग मेज पर चढ़े, अब टोस्ट-डिब्बे की ओर अपना हाथ बढ़ाया, यहां से टोस्ट-डिब्बे तक पहुंच गए। यदि न भी पहुंच पाते तो हमें तो आवाज लगाकर डिब्बा मांग ही लेते। लेकिन अपना काम खुद करने की खुशी आदि के लिए अलग ही रही।

    हमारी ओर देख कर खूब जोर की आवाज लगाई और बहुत अधिक खुशी व गर्व के साथ हमको अपना टोस्ट डिब्बा दिखाए। आदि को अपने काम खुद करने व हमारे कामों में सहयोग करने में बेहद खुशी होती है। कामों को अपनी उपलब्धि के तौर पर लेते हुए खुशी भी महसूसते हैं।

    आदि
    (उम्र 15 महीने 10 दिन)
  • इवांका मसले से निकली बात : मोदीजी बनाम हमारी सैडिस्टिक-सोच

    इवांका मसले से निकली बात : मोदीजी बनाम हमारी सैडिस्टिक-सोच

    [thrive_headline_focus title=”Vivek Umrao Glendenning” orientation=”right”]

    मोदीजी व सेल्फी

    लगभग पांच वर्ष पहले हमारी मित्र सूची में एक मुस्लिम तथाकथित पत्रकार हुआ करते थे। बहुत लोग इनकी पोस्टें साझा करते रहते हैं, हमको भी इनकी पोस्टें लटक-लुटक कर मिलती रहतीं हैं जबकि इनकी पोस्टों को देखकर ही हमको इनकी सैडिस्टिक सोच से मितली आती है। इन महाशय की शान में कसीदे पढ़ने को गाहे बगाहे मिलते रहते हैं, लोग बाकायदा अपनी पोस्टों में पत्रकारिता के लिए रैंक देते हैं, वह बात अलग है कि पत्रकारिता वास्तव में क्या है इसका ककहरा तक न पता हो, लेकिन रैंक देने के लिए पिले पड़े रहेंगे।

    पत्रकारिता के नाम पर बहुत लोग इनके नाम की कसमें तक उठाते हैं। बीमार मानसिकता के लोगों का बीमार आदर्श। यह महोदय मोदीजी के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं। मोदीजी की सेल्फी प्रेम का उपहास उठाते रहते हैं। मोदीजी को गाली देना ही इनकी जागरूकता, सामाजिक प्रतिबद्धता व क्रांतिकारिता मानी जाती है। यही महोदय पांच वर्ष पहले अपनी एक पोस्ट में बड़े फक्र के साथ यह बता रहे थे कि कैसे उनको एक एसडीएम ने चाय पिलाई। इनके लिए एक एसडीएम के साथ चाय पीना जीवन की उपलब्धियों में से थी। पहले एसडीएम के साथ चाय पीने को बेंचेंगे, फिर डीएम के साथ, फिर कमिश्नर के साथ, फिर सचिव के साथ, फिर मुख्यमंत्री के साथ।

    मोदीजी के सेल्फी प्रेम का उपहास उड़ाने वालों का खुद का अपना स्तर क्या है, इसकी भी बात होनी चाहिए।

    यह कौन सी बात हुई कि आप किसी प्रधान के लिए पलकपावड़े बिछा दें। आपके घर में इलाके का ब्लाक स्तर का अधिकारी आ जाए या एसडीएम के साथ चाय पी लें या ऐसा ही कुछ-कुछ और हो जाे तो आप खुद को महान समझने लगें। इसको छोड़िए आपका बच्चा किसी महंगे स्कूल में पड़ने जाता हो तो आप खुद को तोप मानने लगें। यह भी छोड़िए आपका बच्चा अपने स्कूल की क्लास में अच्छे नंबर पा जाता है तो आप चौड़े से अंकतालिका की सेल्फी लेकर अपने लिए सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं। बच्चे की मेहनत पर अपना कब्जा जमाते हैं, पूरी निर्दयता व बेशर्मी के साथ। खुद तो जीवन में पहचान बना नहीं पाए लेकिन बच्चे की मेहनत से अपनी पहचान खोजते हैं। बच्चे की मेहनत से अपनी पहचान खोजने की बीमार मानसिकता के कारण बच्चे को कितना तनाव देते हैं, कितनी हिंसा करते हैं, उसका बचपन मार डालते हैं।

    हममें से हजारों लोग जनरल डिब्बों में भेड़ों की तरह नर्कीय यात्रा करते हुए मुंबई जाते हैं। आंधी, वर्षा, तूफान, गर्मी, सर्दी में भूखे प्यासे सिनेमा में रद्दी अभिनय करने वाले अभिनेताओं व अभिनित्रियों के घरों के सामने उनकी एक झलक पाने के लिए घंटों, दिनों, सप्ताहों, महीनों खड़े रहते हैं। अभिनेता या अभिनेत्री हाथ की उंगलियों को हल्की सी जुंबिश भी दे देता है तो हम अपना जीवन धन्य मान लेते हैं। 

    हमें अपनी इन टपोरी छिछली व बीमार मानसिकता वाली सेल्फियां नहीं दीखती हैं। लेकिन यदि मोदीजी जापान, चीन या अमेरिका के राजनेताओं के साथ सेल्फी ले लेते हैं तो हमें बड़ी परेशानी होती है। हमें अपना गिरेबां भी झांकना चाहिए।

    मोदीजी व लखटकिया सूट

    हम आदमी का मूल्यांकन उसके कपड़ों से करने की बीमार मानसिकता में जीते हैं। यदि किसी ने महंगा ब्रांडेड कपड़ा पहन रखा है, महंगा ब्रांडेड जूता पहन रखा है तो हम उसको बड़ा आदमी मानते हैं, उसको आदर देते हैं। यदि किसी ने सस्ते कपड़े व सस्ते चप्पल पहन रखे हैं तो उसे छोटा आदमी मानते हैं। तिरस्कृत करते हैं, दुत्कारते हैं। उसको चोर उचक्का उठाईगीर मान लेते हैं।

    महंगे कपड़े व जूते पहनने के लिए हम भ्रष्टाचार करते हैं, दलाली करते हैं, बेईमानी करते हैं, झूठ बोलते हैं, फरेब करते हैं, शोषण करते हैं, हिंसा करते हैं। यदि मोदीजी लखटकिया सूट पहनते हैं तो हमें परेशानी क्यों होती है। मोदीजी तो हमारी ही मानसिकता का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं।

    मोदीजी व डिग्री

    बहुत लोगों को मोदीजी के इतिहास ज्ञान व उनकी डिग्रियों के संदर्भ में बहुत तकलीफ रहती है। चाहे व दक्षिण भारत हो या उत्तरी भारत। उन्नीस बीस, ढका-मुंदा सभी जगहों पर शिक्षा के नाम पर जमकर मजाक होता है, फर्जीवाड़ा होता है। वह बात अलग है कि बदनाम केवल बिहार ही होता है। बिहार बदनाम इसलिए होता है क्योंकि वहां लालू प्रसाद यादव जैसे नेता सबकुछ खुलासे में करने लगते हैं, बिना लाग-लपेट के। लालू सचिन तेंदुलकर से कह देते हैं कि आइए आपको डिग्री हम अपने राज्य से दिलवा देते हैं। लालू यादव गांव से हैं, एडीकेट नहीं जानते हैं, हर बात को राजनैतिक हानि-लाभ से जोड़कर देखते हैं। प्लीज, थैंक्यू, एक्सक्यूज मी जीवन में शायद ही कभी किसी को कहे हों। राबड़ी जी को प्रेम में चुटकी लेते हुए बोल देते हों तो बात अलग है।

    जो जानकार हैं, जिनके सोर्स हैं, जिनके पास जानकारियां रहतीं हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि दिल्ली व मेट्रो शहरों के नामचीन स्कूलों जिनके बच्चे भारत टाप करते हैं, वे स्कूल वास्तव में कितनी गहराई व चतुराई से शिक्षा के फर्जीवाड़े के दलदल में घुसे हुए हैं। सारा फर्जीवाड़ा बहुत ही सूक्ष्म रूप में, बेहद व्यवस्थित रूप से, बहुत सुरक्षित नेक्सस के रूप में होता है। आप फर्जीवाड़े की एक चिंदी तक साबित नहीं कर सकते, जबकि पूरा तंत्र ही फर्जीवाड़े में जमाने से लिप्त है।

    लाखों छात्र हर साल नकल करते हैं, पेपर लीक करवाते हैं, अपनी जगह किसी और को बैठाल कर परीक्षा दिलवाते हैं। लाखों लोग हर साल गेसपेपर रट कर परीक्षाओं में अच्छे नंबर लेकर आते हैं। यूनिवर्सिटीज, डिग्री कालेज खुलेआम नकल करवाते हैं। छात्र बढ़िया नंबर पाते हैं। अभिभावकों को कोई तकलीफ नहीं। अभिभावक अच्छे नंबरों के लिए रुपिया खर्च करने को तैयार। इंटर पास करते ही प्राइवेट इंजीनियरी, मेडिकल, प्रबंधन व बीएड इत्यादि कालेजों में सीटें खरीदने को कमर कसे तैय़ार। जिसका जुगाड़ हुआ वह सरकारी संस्थानों में जुगाड़ लगाता है। जिनकी पहुंच बहुत ऊंची है वे आईआईटी व आईआईएम में भी चौड़े से प्रवेश पाते हैं।

    [pullquote align=”right”]भारत में एक भी नौकरशाह ऐसा नहीं होगा जो वास्तव में स्पष्ट व सूक्ष्म ईमानदार हो, संभवतः अपवाद भी नहीं। ईमानदारी केवल नेक्सस के बाहर के लोगों के सामने प्रस्तुत की जानी वाली वस्तु है। श्रेणी, स्तर, भूख का स्तर, तौर-तरीके, आकार-प्रकार इत्यादि के चरित्र, प्रकार इत्यादि भिन्न हो सकते हैं। [/pullquote] डिग्री मिलने के बाद लाखों रुपए खर्च करके नौकरियों के शिकार में जुट जाते हैं। नौकरियों के लिए पूरे सरकारी तंत्र को भ्रष्ट करने को कटिबद्ध। एक जमाना था जब सरकारी छापेखाने का चपरासी के भी घर का हर सदस्य IAS हो जाता था। IAS में अब भी झोल होते हैं लेकिन बेहद सुव्यवस्थित नेक्सस से। चिंदी भी साबित करना नामुमकिन। जैसे चेतना को केवल महसूस किया जा सकता है, साबित नहीं किया जा सकता है। वैसे ही इन नेक्सस को महसूस किया जा सकता है, साबित नहीं। भारतीय सरकारी ढांचों में नेक्सस ही चेतना है।

    बारहवीं व स्नातक के बाद शहरों में ककुरमुत्तों की तरह उगी हुई कोचिंगों को क्या कहेंगे? लाखों रुपए साल की फीस, छात्रों के रहने खाने के लिए इलाके के लोगों ने अपने घरों में छोटे-छोटे कमरे निकाल कर लाखों रुपए महीना का स्थाई कारोबार बना रखा है, बाकायदा कोचिंग वालों को कमीशन भी जाता है। व्यवस्थित बाजार। छोटे शहरों के लोग भी चाहते हैं कि उनके घर के आसपास कोई संस्थान खुल जाए ताकि वे भी छात्रों को किराए में कमरे देकर पैसा कमा सकें।

    फर्जी डिग्रियां, फर्जी जाति प्रमाणपत्र, फर्जी डोमेसाइल बनवा कर लोगों ने नौकरियां पाईं/पा रहे हैं। मोदीजी की डिग्री से ही परेशानी है। मोदीजी से इस व्यक्तिगत खुन्नस का कारण क्या? उन्होंने आपकी कौन सी भैंस खोल ली थी। किसको लेना देना है शिक्षा व शिक्षा स्तर से। सबका एक ही लक्ष्य, किसी तरह से पैसा कमाना। शिक्षा का लक्ष्य पैसा कमाना। शिक्षा देने का लक्ष्य पैसा कमाना, अय्याशी करना।

    मोदीजी व लड़की की जासूसी

    ऐसी खबरें सुनने में आतीं रहीं कि मोदीजी ने मुख्यमंत्री रहते हुए किसी लड़की को प्रेम किया, उसकी जासूसी करवाई। इन खबरों में सच्चाई कितनी है मुझे बिलकुल नहीं पता।  मैं इतना जानता हूँ कि अपवाद प्रतिशत छोड़कर अधिकतर नेताओं, नौकरशाहों व व्यापारियों के अपनी पत्नियों से अलग महिलाओं से यौन रिश्ते होते हैं। बहुतों की बाकायदा घोषित/अघोषित रखैंले हैं। जिसकी जितनी औकात व क्षमता है वह उतनी रखता है। रखैलों से बाकायदा संताने हैं। दूसरों से उनकी पत्नियों को छीन कर अपनी रखैलें बनाईं हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि भारत में अपवाद प्रतिशत छोड़कर अधिकतर युवा लड़की पटाते हैं। मारपीट करते हैं। लड़कियों का पीछा करते हैं। पूरे फिल्मी अंदाज में। छेड़खानी करते हैं।

    मोदीजी ने यदि किसी लड़की को प्रेम किया भी तो क्या परेशानी, इतनी हाय तौबा क्यों…बहुत ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने अपनी पहली पत्नियों को छोड़ा और नईं नईं पत्नियां बनाईं। न केवल नईं नईं पत्नियां बनाईं बल्कि उनसे हुई संतानों को राजनीति में आगे भी बढ़ाया।

    मोदीजी व इवांका

    दुनिया के विकसित देशों में यदि इवांका जाएं तो उनको कोई नहीं पूछेगा। जैसे सामान्य पर्यटक आते हैं वही स्तर रहेगा उनका। लेकिन हमारा समाज ऐसा नहीं है। हमारे समाज का ढांचा बिलकुल अलग है। हमारे यहां ज्ञानी की संतान ज्ञानी होती है (ब्राह्मण), बहादुर की संतान बहादुर होती है (क्षत्रिय), अर्थशास्त्री की संतान अर्थशास्त्री होती है (वैश्य) व गुलाम की संतान गुलाम होती है (शूद्र)। 

    हमारे यहां बच्चों के माता पिता क्या हैं इसके आधार पर उनका मूल्यांकन होता है। बच्चे की अपनी गुणवत्ता का कोई मायने नहीं होता है। मेरा ही उदाहरण ले लीजिए, मेरे माता पिता की नजरों में मैं हरामखोर हूँ तो मेरा पुत्र आदि भी उनकी नजरों में हरामखोर है।

    जब नितीश कुमार जी ने राजद से अलग होकर सरकार बनाई तो हमने रातोंरात लालू प्रसाद जी की संतानों को भारत के महान राजनेताओं के रूप में प्रतिष्ठित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नितीश कुमार द्वारा लागू की गई अनेक सामाजिक हित की नीतियां कूड़े के भाव में। लालू जी क्रांतिकारी नेता रहे तो हमने उनकी संतानों को भी बैठे बिठाए क्रांतिकारी नेताओं के रूप में स्थापित कर दिया। सिर्फ इसलिए क्योंकि वे लालू जी के पुत्र हैं। लालू जी की संतान होना ही पर्याप्त है। दो चार लाइन के कुछ सवाल पूछ लेना, एक दो छोटे-मोटे भाषण ही पर्याप्त से अधिक हैं, भारत के सबसे जागरूक, महान व प्रगतिशील सोच के राजनेता हो पाने के लिए।

    लालू जी ही क्यों पूरे भारत में अनेक पार्टियों के राजनेताओं की संतानें अपने माता-पिता की गद्दी संभालती मिल जाएंगीं। न संभाल पाएं गद्दी तब भी विधायक सांसद तो हो ही जाते हैं। पत्नियां हो जातीं हैं, बहुएं, बेटियां माताएं भी विधायक सांसद हो जातीं हैं। और हम लोग उनकी संतानों की शान में कसीदे पढ़ते हुए। बाकायदा तेल-पालिश करते हुए, बटरिंग करते हुए, उनके लिए जीने मरने की कसमें खाते हुए।

    भारत के पर्यटन इलाकों में हजारों युवा विदेशी महिला के साथ फोटो खिचाने को लालायित रहता है। अपने घर की महिलाओं के साथ गाली गलौच करेगा लेकिन विदेश महिला के सामने निहायत सभ्य होने का ढोंग करता है।

    मोदीजी ने दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी की गोरी-चिट्टी, लंबी-तगड़ी बेटी को यदि ठीक से खाना खिला दिया, ठीक से हाय हेलो कर दी। तो इसमें परेशानी क्यों…. इतनी भी खुन्नस किस बात की।

    मित्र की बेटी को अपनी बेटी की तरह प्रेम करना, स्वागत करना गुनाह कब से हो गया। यह तो भारत की पुरानी परंपरा है। यहां तो गांव की बेटी को अपनी बेटी मानने की परंपरा रही है।

    [divider style=’full’]

    चलते-चलते

    यह भी गजब है, बहुतों को गांधीजी से खुन्नस आपको मोदीजी से खुन्नस। फर्क क्या। चरित्र तो एक ही हुआ।

    मोदीजी को आपने चुना है। मोदीजी बंपर बहुमत से सरकार बनाकर आए हैं, आप यह नहीं कह सकते कि आपने नहीं बल्कि आपके पड़ोसी न चुना है। सच यही है कि मोदीजी को आपने केवल इसलिए चुना है क्योंकि मोदीजी में आपको अपना अक्श दिखाई दिया। आपको लगा कि अपने जैसा आदमी आएगा तो फुलटू मौज रहेगी, जीवन अय्याशी व लफ्फाजी से सराबोर रहेगा।

    फेसबुक, व्हाट्सअप व अन्य सोशल मीडिया में मोदी जी के खिलाफ अभियान चलता हैI लोग कापी पेस्ट फारवर्ड करते हुए खुद को किरांतिकारी, जागरूक व सामाजिक ईमानदार जिम्मेदार, प्रतिबद्ध मान लेते हैंI लेकिन हममें से कितने ऐसे हैं जो अपने भीतर के खोखलेपन व बेहद विकृत व बीमार सैडिज्म को देख पाते हैं, सैडिज्म से दूर हो पाने की बात तो कल्पनातीत है।

    सारा मामला खांचों का, कौन किस खांचे में है व सैडिस्टिक मानसिकता का। स्वयं के भीतर के सैडिज्म को देखने व स्वीकारने की हिम्मत होनी चाहिए। दरअसल जब तक आप स्वयं उसी चरित्र के होते हैं जिस चरित्र का विरोध करने का ढोंग कर रहे होते हैं तब तक आप वास्तव में विरोध करते हुए भी विरोध की बजाय पुष्टीकरण ही कर रहे होते हैं।

  • Video: आदि, किताबें व आदि का अपना पुस्तकालय

    Video: आदि, किताबें व आदि का अपना पुस्तकालय

    लगभग एक मिनट के इस वीडियो में  आपको आदि के चेहरे व व्यवहार के कई आयाम दिखाई देंगे। यह वीडियो आपको आनंद देगा यह मेरा विश्वास है। कैसे आदि अपनी पसंद की किताब लाने के लिए आपकी बताई किताब का नाम मटेर देते हैं। कैसे उनकी पसंद की किताब बताने पर खुशी मन से किताब लाने जाते हैं। आपकी बताई किताब लाने के बावजूद, आपसे वही किताब पढ़ने को कहते हैं जो किताब वह पढ़ना चाहते हैं।

    एक समय था जब आदि लगभग आठ महीने के थे, तब बिस्तर में ढेर लगी किताबों में से किताब का नाम बताने पर किताब निकाल कर देते थे। फिर समय आया जब वे दूसरे कमरे में से नाम बताने पर किताब लाकर देने लगे। अब समय आ गया है जब आदि अपनी पसंद की किताब लाकर देने लगे हैं। आपकी जिद पर पसंदीदा किताब ला तो देते हैं लेकिन किताब कौन सी पढ़नी है, यह आदि ही तय करते हैं।

  • मेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे की कहानी

    मेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे की कहानी

    Vivek Umrao Glendenning

    प्रस्तावना परिचय

    प्रस्तावना परिचय से आगे:
    इसी काल में शुरू होती है पूर्वी उत्तर प्रदेश के पिछड़े इलाके के गांव के रमाशंकर पाण्डे की। उन रमाशंकर पाण्डे की, जिन्होंने मुझे तब सहारा दिया जब मुझे चारों तरफ से लातें पड़ रहीं थीं। रमाशंकर पाण्डे एक पिछड़े गांव के सामान्य किसान परिवार से हैं। इनके कई भाई हैं। जयशंकर पाण्डे इनके सबसे बड़े भाई, मेरे सामाजिक मित्र रहे। मेरे व रमाशंकर पाण्डे के बीच संबंधो का रास्ता यही जयशंकर पाण्डे थे। रमाशंकर पाण्डे उन दिनों बनारस के सर्वसेवासंघ में रहा करते थे। दो कमरे, एक रसोई व एक शौचालय।

    मैंने आईआईटी कानपुर के भौतिकी के प्रोफेसर एच सी वर्मा जी से बात की, उनको परिस्थितियों व माता-पिता द्वारा बेदखली से अवगत कराया। उनका कहना हुआ कि मैं भारत के जिस शहर में जाना चाहूं, जैसी भी कोचिंग करना चाहूँ या मैं किसी गांव जाकर वहां कुछ करना चाहूँ तो वे मेरा पूरा खर्च कुछ वर्षों तक बिना शर्त वहन करने को तैयार हैं। मेरे लिए यह बहुत बड़ा संबल था। मैंने सोचा कि यदि जीवन मरण का प्रश्न खड़ा होगा तो यह विकल्प है ही। किंतु उस समय मैंने इस विकल्प को स्वीकार करने से मना कर दिया, भविष्य के गर्भ के लिए विकल्प को संभावनाओं के साथ छोड़ दिया।

    दो सौ रुपए, एक पिठ्ठू बैग, कुछ किताबें, दो जोड़ी कपड़े व कुछ दस्तावेज। कुल जमा यही गृहस्थी थी जिसे लेकर मैं जयशंकर पाण्डे के यहां सर्वसेवासंघ पहुंचा। दो सौ रुपयों में से काफी रुपए कानपुर से वाराणसी पहुंचने में खर्च हो चुके थे। यूं समझिए कि मेरे पास पैसे नहीं थे।

    जयशंकर पाण्डे वहां रहते नहीं थे। रमाशंकर पाण्डे रहते थे। रमाशंकर के पास भी पैसे नहीं होते थे। रमाशंकर संस्कृत से स्नातक की पढ़ाई पढ़ रहे थे। उनको भी घर से खर्च बहुत कम मिलता था। मैं व रमाशंकर दाल चावल, कभी कभी दाल नमक प्याज खाकर कई महीने रहे। मैंने कई मित्रों से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की लेकिन सभी कन्नी काट गए। स्थिति यह थी कि प्रोफेसर एच सी वर्मा जी के पास जाने तक के किराए के लिए पैसे नहीं थे। जीवन को मुख्यधारा की रूटीन हिसाब से इतर अपनी शर्तों में जीने के लिए भारत में बहुत संघर्षों, उपेक्षाओं, प्रताडंनाओं व तिरस्कारों को झेलना पड़ता है।

    उन्हीं दिनों दिल्ली की गांधी निधि, गांधी शांति प्रतिष्ठान, अवार्ड व कनाडा की यूनिवर्सिटी संयुक्त सेमिनार आयोजित करने वाली थी। जागृति राही दीदी व उनके पति संजय सिंह भाई के सहयोग व सुझाव पर मैं दिल्ली पहुंचा जहां मेरी मुलाकात व मित्रता अनुपम मिश्र जी से हुई। दिल्ली पहुंचने पर भी मेरे पास लगभग पचास रुपए व पिठ्ठू बैग वाली गृहस्थी थी। ट्रेन का किराया व टैक्सी का किराया जागृति राही दीदी द्वारा दिया गया था।

    जब क्लेयर से मेरा विवाह हुआ तब मैंने क्लेयर को बताया कि रमाशंकर पाण्डे मेरे जीवन की रक्षा करने वाले लोगों में से एक हैं। मैंने व मेरी पत्नी ने रमाशंकर से पूछा कि वह क्या करना चाहते हैं। रमाशंकर ने दिल्ली आने की इच्छा जाहिर की। रमाशंकर कई वर्षों तक हमारे घर में हमारे सगे छोटे भाई की तरह कई सालों तक रहे। रमाशंकर ने अंग्रेजी स्पीकिंग कोर्स, जिम इत्यादि जो भी सीखना व करना चाहा उसके लिए पूरी सुविधाएं दी गईं जैसे कि अपने घर के बच्चों को दी जातीं हैं।

    वहीं रमाशंकर आज देश भर में बाडी बिल्डिंग में नाम व शोहरत कमा रहे हैं। सामान्य किसान परिवारों का लाखों युवा दिल्ली आकर रोजी रोटी का जुगाड़ करना चहता है, सपने देखता है। रमाशंकर चाहते तो दिल्ली में ही अच्छा खासा जीवन यापन कर सकते थे। लेकिन रमाशंकर वापस अपने गांव लौटे। बिना पूंजी के शुरूआत की, और धीरे-धीरे इलाके का सबसे बेहतर जिम स्थापित किया। 

    रमाशंकर का जिम केवल कसरत नहीं कराता है, वरन् स्वस्थ व सक्रिय रहने की जीवन शैली की बात करता है। खानपान के तौर तरीके बताता है। रमाशंकर ने अपनी मेहनत के दम पर पूरे जिले व पड़ोसी जिलों में अपनी सम्मानपूर्ण पहचान बनाई है। सरकारी अधिकारी व उनके परिवार भी खानपान व स्वास्थ्य के तौर तरौके सीखने समझने आते रहते हैं।

    रमाशंकर पाण्डे राज्य व राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में धमाल मचाते रहते हैं। Mr NCR, Mr North India to Time, Delhi Classic Shree, Mr UP, Mr Delhi जैसी प्रतियोगिताओं में खिताब जीत चुके हैं। ऐसी ही एक प्रतियोगिता में एक अच्छी मोटरसाइकिल भी उपहार में मिली।

    इतने खिताबों को जीत चुकने तथा फिटनेस व हेल्थ सेंटर से अचछा खासा पैसा कमाने के बावजूद, रमाशंकर अपने खेतों में काम करते हैं। मजदूरी करते हैं। मेेेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे ऐसे ही बने रहें, नाम व शोहरत कमाते रहें।

    Ramashankar Pandey

    ramashankar-2017-medals
    ramashankar-2017-awards
    ramashankar-2017-motorcycle
    ramashankar-2017
    ramashankar-2017-delhi-classic
  • राष्ट्रवाद बनाम लोकवाद बनाम निजता

    राष्ट्रवाद बनाम लोकवाद बनाम निजता

    Vivek Umrao Glendenning

    लोक से राष्ट्र होता है। राष्ट्र से लोक नहीं। बिना लोक के राष्ट्र संभव ही नहीं। लोक ही राष्ट्र का निर्माता है। जैसा लोक वैसा राष्ट्र। यदि लोक लोकतांत्रिक मूल्यों को जीता है तो राष्ट्र में भले ही राजा हो लेकिन राष्ट्र का मूल चरित्र लोकतांत्रिक होता है। यदि लोक लोकतांत्रिक मूल्यों को नहीं जीता है तो राष्ट्र भले ही लोकतांत्रिक होने का दावा करे लेकिन उसका मूल चरित्र लोकतांत्रिक नहीं होता है। यदि लोक स्वतंत्रता महसूस करता है तो राष्ट्र स्वतंत्र है, यदि लोक स्वतंत्रता नहीं महसूस करता है तो राष्ट्र कभी सही मायनों में स्वतंत्र नहीं हो सकता, संभव ही नहीं। यदि लोक भ्रष्ट है तो राष्ट्र भ्रष्ट होगा। यदि लोक ईमानदार है तो राष्ट्र किसी भी सूरत में लोक को भ्रष्ट नहीं बना सकता। राष्ट्र का लोक बिना कोई भी वजूद नहीं।

    यदि राष्ट्र से लोक होता तो राष्ट्र के सभी लोग एक ही तरह के होते। राष्ट्र लोक बनाने का सांचा या खांचा नहीं होता कि राष्ट्र से लोक होता हो। राष्ट्र का अस्तित्व लोक से बनता है। लोक बड़ा होता है राष्ट्र से, क्योंकि लोक राष्ट्र का निर्माता व दिशा निर्देशक है। यदि राष्ट्र को संविधान माना जाए तब भी संविधान लोगों ने ही अपनी समझ के अनुसार लिखा या दूसरे के लिखे को नकल करके लिखा। संविधान में संशोधन भी लोग ही करते हैं, क्योंकि जो पहले के लोगों ने सोचा व लिखा वह कालांतर में या तो गलत निकला या मूर्खतापूर्ण निकला। निर्माता व दिशानिर्देशक अंततः लोक ही होता है।

    जो राष्ट्र या संविधान लोक के लिए नहीं, उनका कोई मायने नहीं। जब भी यह कहा जाता है कि राष्ट्र व संविधान के लिए समर्पित तो इसका मतलब सिर्फ यह कि जो लोग विभिन्न स्तरों पर राष्ट्र की विभिन्न सत्ताओं व शक्तियों का भोग करते हैं उनको समर्पित। राष्ट्र एक राजनैतिक सीमाओं की परिकल्पना है, राष्ट्र का स्वयंभू रूप में कोई अस्तित्व नहीं। राष्ट्र एक काल्पनिक व बेहद परिवर्तनशील इंटिटी होती है। भारत में कभी सैकड़ों राष्ट्र थे, हम अपनी जिद में भले ही यह कहते रहें कि भारत एक राष्ट्र था। एक राष्ट्र का मतलब किसी एक का शासन। जिसने जितने राजाओं को पराजित कर लिया वह उतना बड़ा राष्ट्र। बहुत साधारण है समझना।

    राजनैतिक सत्ताओं की देखभाल के लिए लोगों का समर्पण प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड जैसे देशों ने राष्ट्रवाद का कांसेप्ट दिया। मजेदार बात यह है कि जिन्होंने राष्ट्रवाद का कांसेप्ट दिया, उन्हीं लोगों ने सबसे पहले स्वयं को राष्ट्रवाद के कांसेप्ट से मुक्त कर लिया। क्योंकि उनको जल्द ही अहसास हो गया कि राष्ट्र से बड़ा लोक है, इसलिए वे लोग राष्ट्रवाद से लोकवाद पर आ गए। लगातार लोकवाद को परिष्कृत करते जा रहे हैं।

    परिभाषाओं व विचारों को रटना:

    हममें से अधिकतर लोग जीवन में अधिकतर बातें व विचार रटते हैं या कई किताबें/विचार पढ़कर उनका अपने दिमाग में पीसते हुए अपनी सब्जेक्टिविटी/पूर्वाग्रह/वैचारिक-पसंद/नापसंद के आधार पर विभिन्न मसालों का प्रयोग करते हुए चटनी बनाते हैं। इस चटनी बनाने को हम स्वयं का चिंतन करना व स्वयं को चिंतक मान लेते हैं।

    हममें से बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं तो व्यापकता, व्यापक-विभिन्नता, वस्तुनिष्ठता, निरपेक्षता व अननकूलता के साथ अध्ययन व कर्म स्वाध्याय करते हैं या कर पाते हैं।

    हम जीवन भर शब्दों, विचारों, भावों व परिभाषाओं को बिना निरपेक्षता व वस्तुनिष्ठता से समझे हुए ही धड़ल्ले से प्रयोग करते रहते हैं। ऐसा करने को हम अपना विचारशील व चिंतनशील होना भी मानते हैं। जीवन व समाज के हर आय़ाम पर हममें से अधिकतर लोग ऐसा ही जीते हैं।

    मानव समाज ने समय के साथ समझते हुए गति की है। एक समय था जब राजा को भगवान का दूत माना जाता था और राज्य के सारे लोग व संपत्ति राजा के सब्जेक्ट हुआ करते थे। यह मानसिकता वैसी ही है जैसी कि आज हम ताकतवर सरकारी नौकरी करने वालों को, या बड़ी कंपनीज में ऊंचे वेतन व सुविधाओं से नौकरी करने वालों को योग्य, मेधावी, सफल मानते हैं।

    राजा रहा हो या आज के भारतीय समाज के नौकरशाह या ऊंचे वेतनमान के नौकरी करने वाले लोग। मूलभूत मामला संपत्ति के भोग का ही रहा है। संपत्ति हमेशा मूल में रही, पैकिंग बदलती रही। संपत्ति को भोगने को सौभाग्यशाली होना हमेशा माना जाता रहा।

    [themify_quote]समाज जिन परिभाषाओं, विचारों, कंडीशनिंग इत्यादि से अपनी पीढ़ियों को ट्रेन करता है। जिन परिभाषाओं को रटाया जाता है। वे निरपेक्ष नहीं होतीं हैं। बहुत प्रकार के तामझाम व घालमेल के सापेक्षिक होतीं हैं। यह तो व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपना जीवन सापेक्षिक दृष्टि के साथ देखते समझते जीना चाहता है या जो जैसा है उसको वैसा ही देखने समझने की निरपेक्ष दृष्टि का विकास करते हुए जीना चाहता है।[/themify_quote]

    निजता व राष्ट्र:

    बिना लोक के समृद्ध व मजबूत हुए कभी भी राष्ट्र समृद्ध व मजबूत नहीं हो सकता है, संभव ही नहीं। यदि लोक मजबूत व समृद्ध है तो राष्ट्र स्वतः ही समृद्ध व मजबूत होता है। राष्ट्र मजबूत हो फिर लोक मजबूत हो, ऐसा संभव ही नहीं, मूर्ख बनाकर लोक पर सत्ता व शक्ति का भोग करने की कवायद होती है और कुछ भी नहीं। बिना लोक के राष्ट्र अपने आप में कुछ भी नहीं, कोई भी अस्तित्व नहीं।

    बिना निजता के लोक का विकास, समृद्धि व मजबूती संभव ही नहीं। लोक निजता मतलब राष्ट्र की निजता। लोक की निजता जितनी समृद्ध होगी राष्ट्र की निजता उतनी ही समृद्ध होगी। लोक की निजता जितनी कमजोर व निरीह होगी, राष्ट्र की निजता उतनी ही कमजोर व निरीह होगी। लोक की निजता को ध्वस्त करना मतलब राष्ट्र की निजता को ध्वस्त करना।

    लोक की निजता कभी भी राष्ट्र विरोधी हो ही नहीं सकती। असंभव है। (इस बिंदु को सू़क्ष्मता, गहराई व व्यापकता से सोचिए तभी समझ पाएंगे नहीं तो समझना संभव नहीं)।

    चलते-चलते:

    राष्ट्र दरअसल लोक का ईमानदार व पारदर्शी आइना होता है। जैसा लोक वैसा राष्ट्र, बिना किसी लागलपेट के। लोक की निजता मतलब राष्ट्र की निजता। लोक की सुरक्षा मतलब राष्ट्र की सुरक्षा। लोक की समृद्धि मतलब राष्ट्र की समृद्धि। लोक का विकास मतलब राष्ट्र का विकास। लोक का परिष्कृत होना मतलब राष्ट्र का परिष्कृत होना। लोक का ताकतवर होना मतलब राष्ट्र का ताकतवर होना। लोक के बिना राष्ट्र जैसा कुछ होता ही नहीं।

    मेरी बातें बहुत लोगों को फिलासोफिकल लग सकतीं हैं। लेकिन दुनिया का यथार्थ यही है कि जिन-जिन राष्ट्रों ने इसको जीवन में उतार लिया है वे लोक-कल्याण, विकास, समृद्धि, मजबूती, जागरूकता, शिक्षा, स्वास्थ्य, विद्वता, सामाजिक-विश्वास, सामाजिक-न्याय, समता इत्यादि संदर्भों में बहुत आगे निकल गए हैं।