• Home  / 
  • पुस्तक के बारे में
  •  /  पौराणिक मनगढ़ंत दैवीय कथाएं व वैदिक-काल की तथाकथित महानता बनाम मनुष्य की कर्मशीलता

पौराणिक मनगढ़ंत दैवीय कथाएं व वैदिक-काल की तथाकथित महानता बनाम मनुष्य की कर्मशीलता

हर सभ्यता व धर्म की अपनी पौराणिक कथायें होती हैं, जो काल्पनिक होती हैं। सभ्यता के लोग काल्पनिक कहानियों को सच मानकर अपनी सभ्यता की गति अवरुद्ध कर देते हैं कभी-कभी तो गति का यह ठहराव उन लोगों को हिंसक तक बना बना देता है। किसी भी सभ्यता या धर्म की अधिकतर पौराणिक कथायें, उस सभ्यता के लोगों के मानसिक अनुगमन व भावनात्मक आस्था के अनुकूलन की स्थापना के लिए ही लिखी जाती हैं। यही कारण है कि पौराणिक कथायें, कथाओं में सत्य तथ्यों के अस्तित्व का भ्रामक अनुभव कराती हुई, मनुष्य सभ्यता के विकास का दावा करते हुए उसको अपनी अनुकूलता की घेरेबंदी में मजबूती से बंद रखती हैं। वैदिक काल के समय के दावेदार साहित्य, महाग्रंथों, महाकव्यों आदि में उद्धत कथाओं को यदि संज्ञान में लिया जाए तो वैदिक काल में मानव समाज एक आदर्श समाज था, जीवन मंगलमय था, व्यवस्था कल्याणकारी थी, सब कुछ संतुलित व व्यवस्थित था। धर्म, विज्ञान, तकनीक व मानव का विकास अपने चरम पर था। 

हवन-यज्ञ आदि समय समय पर होते रहने, हर घर में पूजापाठ होते रहने, मनुष्य के धार्मिक कर्मकांडों में रत रहने आदि  के कारण, मनुष्य का ईश्वरीय सत्ता व तंत्र से बेहतर संबंध थे। संबंधों की मधुरता का स्तर यह था कि आवाहन करने पर देवलोक व ब्रह्मलोक से देवगण और ईश्वर के प्रतिनिधि लोग मानवों से मिलने, उनके मुद्दों को समझने और ईश्वर की कल्याणकारी योजनाओं की स्थिति-गति जानने समझने के लिए आते रहते थे।

ऐसा माना जाता है कि वैदिक काल में हम आज के पाश्चात्य विज्ञान की तुलना में हजारों लाखों साल आगे का उन्नत विज्ञान रखते थे। हमें यह तक पता था कि ब्रह्मा जी का एक दिन लगभग 4 अरब वर्ष का होता है और रात भी लगभग 4 अरब वर्ष की होती थी और ब्रह्मा जी का पूरा दिन (मतलब कुल लगभग 8 अरब साल) गुजरने पर “प्रलय” होती है। हमने हर बात की गणना कर रखी थी और हमारा दावा है कि सब कुछ वैज्ञानिकी था और सच्चे तथ्यों पर आधारित था।

अपनी सभ्यता की श्रेष्ठता को प्रमाणित करने के लिए इन दावों को करते हुये, हम एक तथ्य भूल जाते हैं कि लगभग हमारा पौराणिक साहित्य, महाग्रंथ, महाकाव्य आदि की लगभग प्रत्येक घटना दैवीय व ईश्वरीय इच्छा, संबंध व सहयोग पर निर्भर थी। छोटी से छोटी बात अर्थात् निंद्रा के लिए बिस्तर किस धातु का बना हो, किस दिशा में हो, पैर व सिर किस दिशा में हो से लेकर परमाणु आयुध व पुष्पक विमान आदि आदि तक प्रत्येक बात के लिए हमें दैवीय व ईश्वरीय निर्देश का पालन करना पड़ता था, हम पूरी तरह से ईश्वरीय व दैवीय सहायताओं पर ही निर्भर थे। आइए इस बात का विश्लेषण करते हुए समझने की चेष्टा की जाए।

मान लीजिए किसी राजा को राक्षसों से अपने राज्य की रक्षा के लिए , अपने राज्य में शांति स्थापित करने के लिए  अत्याधुनिक आयुध चाहिये, तो उसको अपने राज्य में वैज्ञानिक संस्थानोंं, तकनीकी संस्थानोंं आदि की स्थापना करने की आवश्यकता नहीं है। राजा को या राजपरिवार के किसी व्यक्ति को जंगल में, पर्वत में, पानी में या कहीं और जाकर चुपचाप उस आयुध को धारण करने वाले देवता के नाम का जाप कई वर्ष तक करना है और देवता को प्रसन्न करके आयुध प्राप्त कर लेना है। पुष्पक विमान चाहिएतो उसको रखने वाले देवता के नाम का जाप रूपी तप कर लिया और पुष्पक विमान प्राप्त कर लिया। मनुष्य को जिस भी गुण, वस्तु, सुविधा आदि की इच्छा हुई तो उसको धारण करने वाले देवी या देवता जेसे कि बुद्धि नहीं है तो बुद्धि की देवी, धन नहीं है तो धन की देवी, यौवन नहीं है तो यौवन के देवता आदि को उपयुक्त धार्मिक कर्मकांड से प्रसन्न कर लीजिए और अपनी इच्छानुसार गुण, वस्तु व सुविधा आदि बना बनाया प्राप्त कर लीजिए। तात्पर्य यह कि हर चिल्लर बात के लिए भी दैवीय व ईश्वरीय सहायता उपलब्ध थी, बस धारण करने वाले देवता का नाम, पता और उसको प्रसन्न करने का कर्मकांड करना आता हो, मंत्र आता हो।

कोई आदमी बीमार है उसे आक्सीजन चाहिए तो प्रतापी चिकित्सक महोदय ने मंत्र का जाप किया और “पवन” देवता आक्सीजन लेकर दरवाजे पर उपस्थित। आक्सीजन के निर्माण की प्रक्रिया जानने समझने की कोई आवश्यकता नहीं, आक्सीजन के लिए किसी यंत्र की कोई आवश्यकता नहीं। मनुष्य व देवताओं के मध्य संबंधों की प्रामाणिकता की वजह से पवन देवता मंत्रों व कर्मकांडों द्वारा आवाहन किएजाने पर आक्सीजन लेकर रोगी मनुष्य की सहायता के लिए  प्रस्तुत। 

वर्षा नहीं हो रही है तो वर्षा के देवता का आवाहन कीजिए अपनी समस्या उनके समक्ष रखिए, देवता को प्रसन्न करने के लिए  यथोचित कर्मकांड कीजिए और देवता वर्षा करा देगा। दैवीय व्यवस्थाओं के कारण चूंकि वर्ष के कुछ महीनों के अतिरिक्त वर्षा का प्रबंध करना देवता के लिए  भी संभव नहीं तो नदियों को धारण करने वाले ईश्वरीय प्रतिनिधि के नाम का जाप करके प्रसन्न करके नदियों को देवलोक से धरती पर उतार कर लाया जा सकता था। वर्षा संग्रहण, जल संग्रहण आदि तकनीक को जानने, समझने व विकसित करने की आवश्यकता नहीं है।

किसी महिला का पति नपुंसक है कोई बात नहीं। महिला मनचाहे देवता के आवाहन के लिए  मंत्र जाप व कर्मकांड  करती थी, और देवता उस महिला के साथ यौनसंबंध स्थापित करके संतान उत्पत्ति में भी सहयोग करने के लिए उपलब्ध।

नदियां, पर्वत, समुद्र आदि परिवार वाले होते थे, उनके पति/पत्नी/पुत्र/पुत्री/भाई/बहन आदि होते थे और कभी कभार तो इनके पारिवारिक सदस्यों के विवाह व यौन संबंध मनुष्यों के साथ होते थे। मनुष्यों व पशुओं, मनुष्यों व पक्षियों, मनुष्यों व जलचरों आदि के मध्य यौनक्रिया हो सकती थी और संताने भी होती थी।

यदि पौराणिक गाथाओं को सच भी मान लिया जाएतो इस तथाकथित उच्च-पराकाष्ठा वाली अति-उन्नति के पीछे का आधार मनुष्य की अपनी कर्मशीलता नहीं वरन् दैवीय व ईश्वरीय सहायता व प्रयोजन थे। मनुष्य हर छोटी-छोटी बात के लिए देवताओं व ईश्वर की सहायता पर निर्भर थे। लोग कुछ नहीं करते थे, लोग कुछ नहीं बनाते थे, कुछ निर्मित नहीं करते थे। लोग तो देवताओं व ईश्वरीय सहायता से बना बनाया प्राप्त करते थे।

इतना सब कुछ मिलने के बदले में मनुष्य को हर क्षण ईश्वर भक्ति में लिप्त रहना पड़ता था। हर क्षण भक्ति में रहना पड़ता था। ईश्वर के विभिन्न नामों का जाप, प्रसन्न करने की विभिन्न विधियां, हवन-यज्ञ व बलि आदि का कर्मकांड निरंतर करते रहना पड़ता था। हर क्षण इस बात के लिए  सतर्कता रखनी पड़ती थी कि किसी छोटी सी त्रुटि से देवता क्रोधित न हो जायें।

कर्मकांडों में किंचित भी मात्र त्रुटि न हो, इसलिए  कर्मकांडों के विशेषज्ञ रखे गए होगें। जिन्हे “ब्रह्म" के मामलों की विशेषज्ञता रखने के कारण “ब्राह्मण" कहा गया होगा। सांसारिक कामों के चक्कर में “ब्राह्मणों” को अपनी थोड़ी सी भी ऊर्जा का अपव्यय न करना पड़े, इसलिए  वे जिसके भी दरवाजे पहुंच जाते थे और जो भी बोल देते थे वह यजमान को करना ही होता था। और ऐसा न करने पर यजमान के लिए  दंड व प्रताड़ना का प्रावधान था। बहुत बार तो विशेषज्ञ लोग क्रोधित होकर देवताओं से यजमान को दंडित करवाते थे, जिसे उस समय की तकनीकी भाषा में “श्राप” देना कहा गया होगा। 

ब्राह्मण को भी पारलौलिक सत्ता से संवाद व संपर्क में बने रहने के लिए हमेशा पवित्र रहना पड़ता था। इसलिए   दिन में कई बार नहाना, स्वच्छ वस्त्र पहनना, बदबूदार चीजों जैसे लहसुन व प्याज आदि नहीं खाना, अपनी टट्टी नहीं साफ करना इसलिए  उनकी टट्टी साफ करने वालों की अलग जमात बनाई गई और यह निर्धारित किया गया कि इस जमात के लोगों को चलते समय अपने पदचिन्हों को भी साफ करते हुए चलना पड़ेगा ताकि ब्राह्मण उन पदचिन्हों पर अपना पैर रखकर अपवित्र न हो जाए।

माथे पर चंदन का लंबा तिलक ताकि मन में सुगंध व शीतलता व्याप्त रहे, जिससे देवताओं से संवाद करते समय व्यवहार में शीतलता रहे। सिर में लंबी चोटी रखना ताकि देवगणों व ईश्वरीय व्यवस्था से अदृश्य तरंगों द्वारा सीधा संपर्क व संवाद बना रहे। इन ब्राह्मणों ने देवताओं के साथ संपर्क व संवाद के अनुभवों के आधार पर ग्रंथ व पुराण लिखे। जिनमें विस्तार से वर्णन किया गया कि किस मामले का देवता कौन है, और किस देवता को किस समय और किन तरीको से कितनी देर के लिए किस काम के लिए आवाहित किया जा सकता है। ग्रंथ व पुराण पढ़िएऔर मनचाहे देवता को वर्णित कर्मकांड से आवाहित कीजिएऔर अपनी इच्छा पूर्ति कीजिए।

मानव जीवन का हर एक क्षण देवताओं की दृष्टि, गणना व लेखे-जोखे में होता था। शादी हो, बच्चा पैदा हो, बच्चे का नामकरण हो, युवा-युवती पहली बार यौन-क्रीडा करने जा रहे हों, पति-पत्नी संतान प्राप्ति के लिए यौन-क्रिया करने जा रहे हों आदि आदि अर्थात् हर एक क्षण का लेखा जोखा देवगणों के पास।   जीवन की हर क्रिया के लिए देवताओं का आवाहान, ताकि कुछ ऊंचनीच मतलब मनचाहा न होने पर देवताओं के समक्ष दावे किए जा सके। आदि आदि हजारों उदाहरण हैं, जो पौराणिक कथाओं में मिलते हैं, जिनसे उस समय की मानव-सभ्यता कितनी उन्नत थी यह मानना होता है।

यदि यह मान लिया जाए कि वैदिक काल आदर्श व अति-पराकाष्ठा तक उन्नत था। तो भी इसका श्रेय मनुष्य की कर्मशीलता को न जाकर देवताओं व ईश्वरों की कर्मशीलता व उनके अंदर मनुष्यों के प्रति अथाह प्रेम को जाता है। मनुष्य तो केवल उनको खुश करने के लिए पूजा पाठ करता था, कर्मकांड करता था। यह भी मानना पड़ेगा कि उस समय के देवगण और ईश्वर भी बहुत विनम्र और कर्मशील होते थे, मनुष्य जीवन की हर क्रिया के समय आवाहित किएजाने पर आने को तैयार। हर एक मनुष्य का जन्म-जन्मांतर का संपूर्ण सूक्ष्म विस्तृत लेखाजोखा रखते थे और जरूरत पड़ने पर प्रस्तुत करते थे, ताकि व्यवस्था में त्रुटि न हो।

यदि वैदिक काल की अवधारणाओं को सत्य माना जाए तो यह भी स्वीकारना पड़ेगा कि इतनी बेहतरीन दैवीय आदर्श व्यवस्था; दैवीय व ईश्वरीय सहायताओं, सुविधाओं व सहयोगों वाले देवों व मनुष्यों के मध्य प्रमाणित व विश्वसनीय संबंध टूटे और पूरी तरह से हमेशा के लिए  टूटे। देवलोक में मनुष्यों की विश्वसनीयता पूरी तरह से इस प्रकार से समाप्त हुई कि देवों व मनुष्यों के संबंधों के पुनर्जीवित हो पाने की किसी संभावना के भ्रूण तक को नष्ट कर दिया गया।

चूंकि मनुष्य ने दैवीय संपर्क व संवाद के लिए  विशेषाधिकार व विशेष सुविधाओं से संपन्न विशेषज्ञ लोग रख रखे हुए थे, इसके बावजूद मनुष्य व देवों के इतने प्रगाढ़ व विश्वसनीय संबंध पूरी तरह से टूट गए। तो इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि इन विशेषज्ञों ने एक से बढ़कर एक भयंकर अपराध लगातार किए। जिसके कारण देवगण मनुष्यों पर क्रोधित होते चले गए और मनुष्यों के संबंध हमेशा के लिए  टूट गए। और इन विशेषज्ञों ने अपने द्वारा किए गए भयंकार अपराधों के बारे में मानवीय समाज को जानकारी नहीं दी और पतन के कारणों को ईमानदारी से न स्वीकारते हुये, सारा दोष युग-काल परिवर्तन को दे दिया और युग-काल परिवर्तन को ईश्वरीय प्रावधान बता दिया।

चूंकि ईश्वर व देवगण नाराज हो चुके थे तो उन्होंने मनुष्यों को उनके अपने ही कर्म के आधार पर छोड़ दिया। लेकिन चूंकि हम लोगों को केवल मंत्र जाप करके कुछ कर्मकांड करके बिना वास्तविक पुरुषार्थ भोगने की लत लग गयी थी, इसलिए  हम आज तक मंत्र जाप व कर्मकांडों को किएजा रहे हैं इस लालच में कि शायद कभी कुछ मामला फिट हो और जैकपाट लग जाए और विशेषज्ञ लोग अपने को मिलने वाली विशेषाधिकारों व विशेष सुविधाओं को भोगते रहने के लालच व स्वार्थ में, यह सत्य स्वीकारने को तैयार नहीं कि वे भी दूसरे मनुष्यों की तरह ही साधारण मनुष्य हैं। क्योंकि सत्य स्वीकारते ही उनको अपने द्वारा किए गए उन भयंकर अपराधों को भी स्वीकारना पड़ेगा जिनके कारण देवों व मनुष्यों के अत्यधिक प्रगाढ़ संबंध पूरी तरह से टूट गए।

ऐसे अवैज्ञानिक व अतार्किक तथ्यों पर आधारित वैदिक काल की अवधारणा को सत्य मान भी लिया जाए और यह भी स्वीकार कर लिया जाए कि उस काल में बहुत ही गजब व उन्नत व्यवस्था थी। लेकिन इसमें वैज्ञानिकता कहीं नहीं है और न ही इस प्रक्रिया में समाज के मनुष्य की दृष्टि का कोई वैज्ञानिक विकास ही होता है। उल्टे अवैज्ञानिकता व अतार्कितता ही पोषित होती है।

यदि वैदिक काल में सच में ही हमारा समाज अति-उन्नत होता तो भले ही हमारे समाज में सब कुछ भी होता लेकिन हमारे समाज में वर्णव्यवस्था कभी नहीं होती। क्योंकि ऐसा समाज जो समाज के सबसे बड़े हिस्से को जन्म लेते ही मानसिक व ज्ञान के विकास से अवरुद्ध कर देता हो, जिस समाज में मानवीय-संसाधन की कोई अहमियत नहीं हो। और जो है उसी को संपूर्ण माना जाता हो, वह समाज कभी भी वैज्ञानिक दृष्टि का समाज नहीं हो सकता है। जिस समाज में पोथियां रटने को ज्ञान माना जाता हो, पोथियों को रटकर बोल देना विद्वत्ता मानी जाती हो, जिस समाज के मानवों की अधिकांश जीवनी ऊर्जा विभिन्न कर्मकांडों को करने में ही व्यय हो जाती हो, वह समाज कैसा भी हो लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि का बिलकुल भी नहीं हो सकता है।

विज्ञान करते हुएसीखने व समझने की निरंतर गतिशील प्रक्रिया है, न कि तथाकथित संपूर्णता के साथ ठहरे हुए ज्ञान को रटने की प्रक्रिया।

वैदिक काल की अवधारणा को स्वीकारते ही, हम मनुष्य की कर्मशीलता को उपेक्षित व तिरस्कृत कर देते है। बिना वास्तविक पुरुषार्थ के भोग करने के हमारे चरित्र के कारण हममें कृतज्ञता का मूल्य पोषित नहीं हो पाया, इसीलिए  हम अपने जीवन की अधिकांश सुख व सुविधाएं भोगते तो पाश्चात्य देशों के ज्ञान व विज्ञान के कारण ही हैं, लेकिन उनके प्रति कृतज्ञता का भाव न रखकर उल्टे अपने भूतकाल की श्रेष्ठता की कुंठा व अहंकार को जबरन प्रमाणित बताते हुए रात दिन पाश्चात्य देशों व उनके लोगों को पानी पी-पीकर कोसते हैं, गरियाते हैं और अपने कुंठित व क्षुद्र अहंकार को तुष्ट करते हैं।

निर्णय तो हमें ही लेना है कि हम कर्मशील बनकर अपना समाज व देश बेहतर बनायेंगें या सिर्फ भोगने की लत को ही जीते रहेंगें और कुतर्की बकवास करते रहेंगें।

ईश्वर भी कर्मशीलता को प्यार करता है, कर्मकांड व मक्खनबाजी को नहीं। यह मानव-सभ्यताओं का बेबाक व ईमानदार अध्ययन करने से साफ साफ मालूम देता है।

About the author

--

4 comments

Leave a comment: