Category: सामाजिक यायावर

  • संयुक्त राष्ट्र संघ, चाइना की स्थाई सदस्यता/वीटो-पावर व पं० नेहरू

    संयुक्त राष्ट्र संघ, चाइना की स्थाई सदस्यता/वीटो-पावर व पं० नेहरू

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई। पांच स्थाई सदस्य थे – अमेरिका, रूस, फ्रांस, इंग्लैंड व रिपब्लिक ऑफ चाइना। अमेरिका व इंग्लैंड इत्यादि ने द्वितीय विश्व युद्ध में चाइना के सक्रिय सहयोग को ध्यान में रखते हुए रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य बनवाया। चाइना संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से है। मतलब यह चाइना संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य मतलब वीटो वाला सदस्य सन् 1945 से है जब भारत आजाद भी नहीं हुआ था इंग्लैंड का ही हिस्सा हुआ करता था। पं० नेहरू का प्रधानमंत्री बनना तो बहुत दूर की कौड़ी थी उस समय। 

    चाइना व संयुक्त राष्ट्र संघ के मुद्दे को समझने के लिए हमें रिपब्लिक ऑफ चाइना व पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के अंतर को समझना पड़ेगा।

    1945 में जब संयुक्त राष्ठ्र संघ की स्थापना हुई तब चाइना को रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा जाता था और चाइनीज नेशनलिस्ट पार्टी का शासन था। 1949 के लगभग जब माओ ने गृहयुद्ध में चीन में तख्तापलट किया और ताइवान इलाके को छोड़कर पूरे चाइना पर कब्जा कर लिया तब चाइना का नाम पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा गया। ताइवान को रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा गया।

    चूंकि 1945 में जो देश स्थाई सदस्य बना था वह था रिपब्लिक ऑफ चाइना, न कि पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना, इसलिए 1949 के बाद भी संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपब्लिक ऑफ चाइना (1949 के बाद वाला ताइवान ही रहा)। 1949 में रूस द्वारा कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) को सैन्य व अन्य सहयोग दिए जाने तथा आगे चल कर मंचूरिया को रिपब्लिक ऑफ चाइना को वापस करने की बजाय पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को दिलवाने इत्यादि जैसे कार्यों के लिए रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) संयुक्त राष्ट्र संघ में रूस को कंडेम्न करना का प्रस्ताव लाया, और यह प्रस्ताव जीता भी। इतना ही नहीं रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) ने 1955 में मंगोलिया मसले पर वीटो का भी प्रयोग किया।

    1960 के दशक में अल्बानिया ने संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव लाने शुरू किए कि संयुक्त राष्ट्र संघ से रिपब्लिक ऑफ चाइना को चाइना न माना जाए बल्कि पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को चाइना माना जाए, तथा रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ से बाहर कर दिया जाए। 1961 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह प्रस्ताव पारित किया कि रिपब्लिक ऑफ चाइना व पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संदर्भ में बदलाव करने के लिए दो तिहाई मतों की जरूरत होगी। सन् 1969 तक संयुक्त राष्ट्र संघ के विएना कन्वेशन्स इत्यादि में भी रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) ही स्थाई व संस्थापक सदस्य के रूप में हस्ताक्षर करता रहा था। यहां यह ध्यान देने की बात है कि पं० नेहरू का देहांत 27 मई 1964 में ही चुका था।

    1970 के आसपास दुनिया के विकसित व अन्य देशों ने पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का चाइना) को रिकगनाइज करना शुरू किया। 1971 में भी संयुक्त राष्ट्र संघ में पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपब्लिक ऑफ चाइना की जगह स्थाई सदस्य मानने के कई प्रस्ताव खारिज हुए। यहां यह ध्यान देने की बात है कि पं० नेहरू का देहांत 27 मई 1964 को हो चुका था।

    1971 वर्ष के अंतिम महीनों में संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपब्लिक ऑफ चाइना की जगह पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना माना गया। इस तरह पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का चाइना) को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मुख्य चाइना मानते ही वह स्वतः स्थाई सदस्य व वीटो पावर वाला देश बन गया।

    जिस नुक्ते के कारण रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) 1945 से 1971 तक संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई व वीटो पावर वाला देश बना रहा। उसी नुक्ते के कारण पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना के बाद से रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता आज तक नहीं मिल पाई है। क्योंकि जैसे पहले रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चीन माना जाता था तथा पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइन को उसका हिस्सा। उसी तरह 1971 के बाद से पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चीन मानने के बाद से रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) को उसका हिस्सा माना जाता है।

    चलते-चलते​

    यदि रिपब्लिक ऑफ चाइना या पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना मानने के नुक्ते को अलग कर दिया जाए तो मुख्य चाइना संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से ही स्थाई सदस्य व वीटो पावर का देश रहा है। 1945 में भारत आजाद तक नहीं हुआ था। 1971 के बहुत पहले ही पं० नेहरू का देहांत हो गया था।

    पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना माने जाने का प्रस्ताव अल्बानिया लेकर आया था, इस तरह के प्रस्ताव कई बार लाए गए जो 1971 के अंत तक हमेशा अस्वीकृत होते रहे थे।

    इसलिए पं० नेहरू ने चाइना को स्थाई सदस्य बनवाया या वीटो पावर दिलवाया, यह सब फालतू बकवास है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह की बकवास थरूर साहेब अपनी किसी किताब में करें या वर्तमान सरकार के नुमाइंदे।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • ऑस्ट्रेलिया गांव-श्रंखला : मडजी-गांव

    ऑस्ट्रेलिया गांव-श्रंखला : मडजी-गांव

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ऑस्ट्रेलिया में केंद्र या राज्य सरकार की ओर से ग्राम-समाज के लिए नौकरशाही नियुक्त नहीं होता है। कोई नौकरशाह स्थानांतरण होकर नहीं आता है कि राज्य-सरकार या केंद्र-सरकार अपने द्वारा नियुक्त नौकरशाहों को ग्राम-समाज को संचालित करने के लिए भेजे।

    ग्राम समाज अपनी जरूरतों के लिए नौकरियां निकालता है, अपनी नौकरशाही की नियुक्ति स्वयं करता है तथा नौकरशाही पर संपूर्ण नियंत्रण ग्राम-समाज का होता है। ग्राम-समाज नौकरशाही को बर्खास्त कर सकता है। योग्यता के मानदंड सरकारें तय करतीं हैं, वेतन सरकारें देतीं हैं।

    ग्राम-समाज को अपनी सामाजिक संपत्तियों व लगाए गए करों पर अधिकार होता है। रेवेन्यू में से कुछ हिस्सा केंद्र सरकार, कुछ हिस्सा राज्य सरकार को जाता है, बड़ा हिस्सा ग्राम-समाज के पास रहता है। छोटी-छोटी बात के लिए ग्राम-समाज को राज्य या केंद्र सरकार के आगे भिखारी की तरह हाथ नहीं पसारने पड़ते हैं। ग्राम-समाज अपनी संपत्तियों का प्रयोग अपने अनुसार करता है।

    ग्राम-समाज को नियंत्रित करने के लिए ग्राम विकास अधिकारी, ब्लाक विकास अधिकारी, तहसीलदार, उपजिलाधिकारी, जिलाधिकारी जैसी सांमती, राजसी व अलोकतांत्रिक तथा केंद्र/राज्य सरकार केंद्रित नौकरशाही नहीं होती है।

    राज्य की राजधानी से लगभग 260 किलोमीटर तथा विधानसभा क्षेत्र के मुख्यालय से लगभग 130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक गांव है मडजी। यह गांव समुद्र तट पर या समुद्र तट को जोड़ने वाले किसी मार्ग पर भी स्थित नहीं है, पर्यटन स्थल भी नहीं है। कहने का तात्पर्य यह कि यह गांव प्रिविलेज्ड गांव नहीं है, इसके बावजूद इस गांव की जीवन-शैली, जीवन-स्तर, सुविधाओं व सामाजिक-मूल्यों इत्यादि से ऑस्ट्रेलिया की व्यवस्थाओं, सरकारी व सामाजिक तंत्रों की जिम्मेदारी व जवाबदेही के संदर्भ में कल्पना तो की ही जा सकती है।



    लेख के सबसे अंत में हाईस्कूल व प्राइमरी स्कूल की अनेक फोटो हैं, अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया के गांव तक में सरकारी शिक्षा व्यवस्था का स्तर कैसा है।

    (लेख में प्रयुक्त सभी फोटो मडजी गांव की ही हैं)

    —जीवन-स्तर—

    मडजी की जनसंख्या ग्यारह हजार से कम है, लेकिन 60 से अधिक अच्छे रेस्त्रां व 6 से अधिक सुपरमार्केट हैं। 10 से अधिक पेट्रोल पंप हैं। कार कंपनियों के शोरूम हैं। लोग खूबसूरत व अत्याधुनिक सुविधाओं से संपन्न घरों में रहते हैं। घरों की कीमत लगभग एक करोड़ रुपए से शुरू होकर 15-20 करोड़ रुपए या अधिक तक है।

    • हवाई-अड्डा है। रेलवे स्टेशन है। लोकल बस सेवा है। लंबी दूरी बस सेवा है।
    • सीनियर सिटिजन के लिए मुफ्त स्थानीय व अंतःराज्यीय सामुदायिक-यातायात व्यवस्था है। 
    • सामुदायिक स्टेडियम है। गोल्फ-क्लब, क्रिकेट क्लब जैसे विभिन्न प्रकार के खेलों के अनेक क्लब हैं।
    • सामुदायिक तरणताल (स्विमिंग पूल) हैं।
    • सामुदायिक लाइब्रेरी है, सामुदायिक सिनेमा हाल है। थिएटर है।
    • न्यायालय है। अस्पताल हैं। पुलिस स्टेशन है, पोस्ट आफिस है।
    • बैंकों की शाखाएं व अनेक एटीएम हैं।
    • हाईस्कूल है। प्राइमरी स्कूल है।
    • बच्चों के लिए प्लेग्राउंड व पार्क हैं। फुटपाथ हैं।
    • साइकिल के लिए विशेष सड़के हैं। 
    • सेवज ट्रीटमेंट प्लांट है।
    • वर्षा जल-संग्रहण व शुद्ध पेयजल के लिए प्लांट है।
    • चौबीसो घंटे बिजली की आपूर्ति है।
    • चौबीसो घंटे पेयजल की आपूर्ति है।
    • 24 से अधिक बड़े पार्क हैं। 6 बड़े प्रदर्शनी स्थल हैं।

    निवास

    रेस्टोरेंट व सुपरमार्केट

    कार शोरूम

    —ग्राम-समाज के सामाजिक मूल्य—

    ग्राम-सूचना केंद्र

    अशक्त व अक्षम लोगों के लिए मुफ्त भोजन

    जो लोग बहुत कमजोर हैं या वृद्ध हैं या युवा लोग चलने में अक्षम हैं और पहियों पर भोजन की सेवा के लिए अहर्ता रखते हैं उनके लिए ग्राम-पंचायत गर्म व पौष्टिक व स्वादिष्ट भोजन उनके घर पर उपलब्ध कराती है। इसका योजना का नाम पहियों पर भोजन दिया गया है। समाज का मानना है कि सभी को अच्छे भोजन का अधिकार है, इसलिए इस सेवा के लिए जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनसे ही आर्थिक सहयोग लिया जाता है, जो सक्षम नहीं हैं उनको यह सेवा मुफ्त उपलब्ध कराई जाती है।  

    सामुदायिक-यातायात

    ग्राम-पंचायत सामुदायिक-यातायात की सेवा उपलब्ध कराती है। यह सेवा मडजी के आसपास के इलाकों से लेकर राज्य की राजधानी तक ले जाने व वापस लाने तक की सेवा उपलब्ध कराती है। यात्रा का कारण पिकनिक मनाने जाना, मित्रों या रिश्तेदारों से मुलाकात करने जाना, चिकित्सा कारणों से संबंधित यात्रा, दूसरे शहर या दूसरे गांव की बाजार में खरीदारी करने जाना, पर्यटन इत्यादि कुछ भी हो सकता है।

    आवश्यकतानुसार इस सेवा के लिए कारों से लेकर बसें तक उपलब्ध हैं। चालक स्वयंसेवक होते हैं, उनको उनकी सेवा के लिए वेतन नहीं मिलता है। अरबपति खरबपति लोग भी इस सेवा के लिए सहर्ष स्वयंसेवक बनते हैं।

    इस सेवा के लिए कोई बंधा किराया नहीं है क्योंकि यह सेवा व्यापारिक लाभ के लिए नहीं होती। नाममात्र का मेंटीनेंस खर्च (औसत निकाल कर) व पेट्रोल/डीजल का खर्च। वाहन में जितने लोग यात्रा कर रहे होते हैं, यह खर्च उनमें बराबर बांट दिया जाता है।

    जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, उनके लिए यह सुविधा मुफ्त होती है, उनका खर्च ग्राम-पंचायत/सरकार वहन करती है।

    सामुदायिक-सब्जी-उद्यान

    जैविक सब्जियों व फलों के सामुदायिक उत्पादन के लिए मडजी में सामुदायिक उद्यान हैं। यहां उत्पादन में सक्रिय भागीदारी करते हुए सीखने सिखाने का काम होता है। जो भी उत्पादन में सक्रिय भागीदारी करता है उसके लिए उत्पाद मुफ्त उपलब्ध होता है।

    जल-स्रोतों की देखभाल

    ग्राम-पंचायत के क्षेत्र से निकलने वाली नदियों, बरसाती नालों, झीलों, तालाबों इत्यादि की साफ-सफाई, रिपरियन जोन व आसपास के क्षेत्र में पेड़-पौधों का रोपड़ व देखभाल की जिम्मेदारी गांव-समाज ईमानदारी से करता है।

    जल-स्रोतों की देखभाल करने के पीछे के प्रमुख कारण – पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, जलचरों के उत्पादन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, कृषि के लिए जल की शुद्धता व गुणवत्ता सुनिश्चित करना, प्राकृतिक सौंदर्य संरक्षण इत्यादि।

    राजमार्गों व सड़कों इत्यादि के निर्माण कार्य से होने वाली पर्यावरण की क्षति को राजमार्गों व सड़कों के आसपास वृक्षारोपड़ तथा वर्ष-जल-निकास इत्यादि के प्रबंधन की जिम्मेदारी।

    वृक्षारोपड़

    प्रतिवर्ष कई बार ग्राम-पंचायत द्वारा वृक्षारोपड़ अभियान चलाया जाता है। इसके अंतर्गत जल-स्रोतों के किनारों व आसपास, सड़कों, स्कूलों, सार्वजनिक आर्द्रिभूमि इत्यादि क्षेत्रों में पौधारोपड़ किया जाता है। जिसको जिस क्षेत्र में रुचि हो वह उस क्षेत्र के स्वयंसेवक समूह के साथ जुड़ सकता है।

    कूड़ा-प्रबंधन

    सामान्य कूड़ा, कागज-गत्ता वाला कूड़ा, टिन लोहा स्टील एल्म्युनियम कांच प्लास्टिक-बोतल इत्यादि कूड़ा, जैविक कूड़ा; इन चार प्रकार के कूड़ों के लिए हर घर को चार प्रकार के कूड़ा-कोष्ठ मिलते हैं। सामान्य व जैविक दो प्रकार के कूड़ा-कोष्ठ प्रति सप्ताह तथा अन्य दो प्रकार के कूड़ा-कोष्ठ पाक्षिक रूप से ग्राम-पंचायत द्वारा घर से उठाए जाते हैं।

    बच्चों के लिए प्लेग्राउंड व पार्क

    साइकिल के लिए विशेष मार्ग

    —सुविधाएँ—

    हवाई-अड्डा है, रेलवे स्टेशन हैं, लोकल बस सेवा है, सामुदायिक यातायात व्यवस्था है। हाईस्कूल है, प्राइमरी स्कूल हैं। सामुदायिक स्टेडियम है, सामुदायिक तरणताल हैं। गोल्फ-क्लब है। सामुदायिक लाइब्रेरी है, सामुदायिक सिनेमा हाल है। ग्राम-पंचायत का न्यायालय है। अस्पताल हैं, पुलिस स्टेशन है, पोस्ट आफिस है। कई बैंकों की शाखाएं व अनेक एटीएम हैं। फुटपाथ हैं, साइकिल के लिए विशेष सड़के हैं।

    सेवज ट्रीटमेंट प्लांट है। पीने के पानी के लिए प्लांट है। चौबीसो घंटे बिजली की आपूर्ति है। चौबीसो घंटे पेयजल की आपूर्ति है। 24 से अधिक बड़े पार्क हैं। 6 बड़े प्रदर्शनी स्थल हैं।

    सेवज-ट्रीटमेंट प्लांट

    मडजी का सारा सेवज-वाटर पहले ट्रीट किया जाता है, फिर स्थानीय नदी में पहुंचा दिया जाता है।

    वर्षा जल-संग्रहण व पेयजल

    पेयजल व घरेलू आपूर्ति के लिए दो बांध बनाकर बड़ी-बड़ी झीलें बनाई गई हैं। इन झीलों की पानी संग्रहण की क्षमता यह है कि यदि इनमें पानी पूरा भरा है और यदि पानी नहीं बरसे तो उस स्थिति में भी यदि हर परिवार हजार-दो हजार लीटर पानी भी प्रतिदिन प्रयोग करे, झीलों का पानी वाष्पित भी होता रहे तब भी पूरे मडजी को पंद्रह-बीस वर्षों से भी अधिक समय तक पानी की आपूर्ति की जा सकती है। धरती के अंदर के पानी को प्रयोग करने की जरूरत नहीं। पानी की आपूर्ति के पहले उसको पेयजल-वाटर-ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट किया जाता है।

    हवाई-अड्डा

    तकरीबन 250 एकड़ के क्षेत्रफल में मडजी का हवाई-अड्डा बना हुआ है। जिसके मुख्य-रनवे की लंबाई लगभग पौने-दो किलोमीटर है।

    रेलवे-स्टेशन

    चूंकि लोग कारों व छोटे हवाई जहाजों का प्रयोग यातायात के लिए अधिक करने लगे, इसलिए लगभग दो दशकों पूर्व स्थानीय लोगों की सहमति लेकर यहां के लिए रेलवे सेवा बंद कर दी गई। रेलवे-स्टेशन अब भी है, हेरिटेज के रूप में पंजीकृत है। आजकल रेलवे-स्टेशन के एक हिस्से का प्रयोग कला व शिल्प वीथि के रूप में किया जाता है।

    ऑस्ट्रेलियन रूरल एजुकेशन सेंटर

    ऑस्ट्रेलिया में ग्राम-पंचायतों में ऑस्ट्रेलियन रूरल एजुकेशन सेंटर होते हैं। जहां विभिन्न प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है। किसानों के उत्पादों तथा संबंधित विज्ञान, तकनीक इत्यादि के लिए मेले लगते हैं। मेले के दिनों में ग्राम-पंचायत की ओर से मुफ्त बस सेवाएं चलाई जाती है।

    लाइब्रेरी

    लाइब्रेरी में इंटरनेट, प्रिंटिंग, कम्प्यूटर, स्कैनिंग, सभा-कक्ष, प्रोजेक्टर-रूम इत्यादि की सुविधाएं हैं। नवजात शिशुओं से लेकर छोटे बच्चों के आयु-वर्ग के लिए लाइब्रेरी द्वारा हर सप्ताह दो दिन विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

    मोबाइल लाइब्रेरी की भी सुविधा है। मोबाइल लाइब्रेरी स्कूलों व चुने हुए सार्वजनिक स्थानों में हर तीसरे सप्ताह के अंतराल पर पहुंचती है। किस क्षेत्र में किस सप्ताह व किस तारीख को पहुंचेगी इसकी सूचना अग्रिम उपलब्ध रहती है।

    अस्पताल

    बैंक

    न्यायालय

    पुलिस-स्टेशन

    फायर-ब्रिगेड

    पोस्ट-आफिस

    स्टेडियम व थिएटर

    टेनिस क्लब

    थिएटर

    —शिक्षा—

    हाईस्कूल

    पुस्तकालय

    पुस्तकालय

    खेलकूद

    खेलकूद

    छात्रों द्वारा बनाया गया

    छात्रों द्वारा बनाया गया

    प्राइमरी स्कूल

    ऑस्ट्रेलिया में प्राइमरी का मतलब कक्षा 6 तक की पढ़ाई। इस प्राइमरी स्कूल में लगभग 600 छात्र/छात्रा हैं, जिनके लिए कुल 76 स्टाफ हैं। लगभग 150-200 कम्प्यूटर व आई-पैड हैं। वेतन व कैंटीन के खर्चों के अलावा स्कूल का सालाना खर्च लगभग 7.5 करोड़ रुपए है। वेतन व कैंटीन के खर्चों को जोड़कर कुल सालाना खर्च कई गुना अधिक रहता है।

    क्लासरूम

    क्लासरूम

    क्लासरूम

    खेलकूद

    खेलकूद

    खेलकूद

    खाना-पीना

    खेलकूद

    कला

    कला

    कम्प्यूटर

    कम्प्यूटर

    मुख्य-हाल

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • ऑस्ट्रेलिया व ऑस्ट्रेलियाई-आदिवासी बनाम हमारा भारतीय समाज –Vivek Umrao Glendenning

    ऑस्ट्रेलिया व ऑस्ट्रेलियाई-आदिवासी बनाम हमारा भारतीय समाज –Vivek Umrao Glendenning

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    Headlines

    आमुख

    ब्रिटिश लोग 200-225 साल पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के प्रति रेसिस्ट थे। ऑस्ट्रेलिया उनका देश नहीं था, वहां के लोग मतलब आदिवासी उनके अपने देश या समाज के लोग नहीं थे। यहां तक कि उनकी तरह दिखने वाले तक नहीं थे, रंग भी अलग था। इन सबके बावजूद ऑस्ट्रेलिया समाज आज कहां खड़ा है। हम अपने भारतीय समाज व लोगों के गिरेबां में भी झांकें ताकि हमें यह अंदाजा हो सके कि, हम व हमारा समाज अपने ही लोगों के लिए कितना अधिक रेसिस्ट व हिंसक मानसिकता से भयंकर रूप से ग्रस्त है। वह भी तब, जब हमारा देश हमारा ही है/था, हमारा समाज हमारा ही है/था, हमारे लोग अपने ही लोग हैं/थे।

    हमारे कुंठित मन को जब ऑस्ट्रेलिया को गाली देने के लिए कुछ विशेष नहीं मिल पाता तो हम टेरना शुरू कर देते हैं कि ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की बर्बर हत्याएं कीं, ऐसा किया वैसा किया। जबकि अधिकतर होता यह है कि हम अपने पूर्वाग्रह से मनचाही कल्पना करते हुए तर्कशीलता का प्रयोग करते हुए तर्क गढ़ते हैं, गूगल करके कुछ अधकचरे तथ्य जोड़ते हैं, और अपनी मानसिक हिंसक प्रवृत्ति के द्वारा नियंत्रित हो लेते हैं।

    हम यह सब साबित कुछ यूं करते हैं, मानो दुनिया में आज से 200-225 वर्ष पहले के देश, सभ्यताएं व समाज बहुत अधिक अहिंसक, मानवता-वादी हुआ करते थे; उस समय जब सबकुछ आदर्शवादी होता था, मानवीय मूल्य चरम पर थे तब भी ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया में ऐसा किया। 

    हम यह भूल जाते हैं कि भारत में सैकड़ों राजे-रजवाड़े थे। जो छोटी-छोटी बात में आपस में युद्ध करते रहते थे। इन्हीं सब में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की हत्याएं होती थीं। जितने लोगों की हत्याएं हमारा भारतीय समाज प्रतिवर्ष करता था, उतनी तो संभवतः उस समय ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी जनसंख्या भी न होगी।

    हम यह भूल जाते हैं कि, ब्रिटिश लोगों ने लगभग 200-225 वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जितनी हत्याएं की। उससे बहुत-बहुत अधिक हत्याएं तो हम भारतीयों ने आजाद होने के बाद के वर्षों में ही खुद अपने ही समाज के दलितों व आदिवासियों की हत्याएं कर दी हैं, आजतक करते आ रहे हैं।

    हमारे दोहरेपन की हालत यह है कि अपने समाज व अपने अंदर की आज की बर्बरता के बारे में भी बात नहीं करना चाहते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में 200-225 साल पहले हुई घटनाओं को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं।

    हमारी कुंठा हमें यह भी नहीं देखने देती है कि 200-225 वर्षों में ऑस्ट्रेलिया के समाज ने कितनी अधिक लोकतांत्रिक परिपक्वता हासिल की है, मानवाधिकारों की किन ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं। कैसे एक बेहतर समाज का निर्माण किया है। यह सब हो पाना दोहरेपन, आदर्शों की बतोलेबाजी, मानसिक हिंसा व बर्बरता इत्यादि से संभव नहीं होता। यह सब हो पाने का सीधा अर्थ यही है कि समाज ने समय के साथ-साथ अपने आपको परिष्कृत किया है, परिपक्व किया है, सीखा है, समझा है, गलतियों को स्वीकार किया है। 

    हमारे दोहरेपन से यह भी साबित होता है कि हमारे अंदर ऑस्ट्रेलिया जैसे लगातार परिपक्व व बेहतर होते जाने वाले समाजों से कुंठा है, द्वेष है, ईर्ष्या है, जलन है। यही कारण है कि, जब कुछ नहीं मिलता तो 200-225 वर्ष पहले पहुंच कर तथ्यों को तोड़-मोड़कर अपनी कुंठा को खाद-पानी दे लेते हैं। तर्क/वितर्क देकर अपनी मानसिक हिंसा की प्रवृत्ति को जी लेते हैं।

    ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में यह लेख कम से कम उन लोगों को तो लाभ पहुंचा ही सकता है, जो अंदर से मानसिक बीमार नहीं हैं, पूर्वाग्रह से भयंकर स्तर तक कुंठित नहीं हैं, देखने समझने की संभवानाएं शेष हैं। यह लेख शोधपत्र नहीं है, इसलिए यह लेख कामनसेंस के आधार पर ही पढ़ा जाए। लेख लंबा है लेकिन यदि आप पढ़ने में रूचि रखते हैं तो आपको पूरा लेख पढ़ना चाहिए। धन्यवाद।


    1788 के पूर्व ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी

    जिस समय दुनिया की सभी सभ्यताओं ने बड़े-बड़े साम्राज्य बना लिए थे। हजारों वर्षों से नगरीय सभ्यताओं में जी रहे थे। तोपों, बंदूकों का सैकड़ों वर्ष पहले प्रयोग करना शुरू कर चुके थे। स्टीम इंजन का कामर्सियल प्रयोग शुरू हो चुका था। सैकड़ों-हजारों प्रकार के कपड़ों का प्रयोग हो रहा था। बड़े-बड़े समुद्री जहाजों का प्रयोग हो रहा था। लोग हजारों किलोमीटर लंबी समुद्री यात्राएं करते थे। घड़ी का प्रयोग हो रहा था। परमाणु होता है ऐसी कई वैज्ञानिक सिद्धांत आ चुके थे। दूरदर्शी व सूक्ष्मदर्शी यंत्रों का प्रयोग हो रहा था। दुनिया का पहला कैमरा डिजाइन हो चुका था। पूरी दुनिया में शताब्दियों पहले से ही बड़े-बड़े महल, किले व पूजागृह खड़े हो रहे थे।

    उस समय ऑस्ट्रेलिया की सभ्यता यह तक नहीं जानती थी कि एक जगह पर गांव या नगर बनाकर स्थाई रूप से रहना क्या होता है। कपड़ा क्या होता है। ब्रोंज क्या होता है। लोहा क्या होता है। जबकि दुनिया हजारों वर्षों पहले ही ब्रोंज व आयरन युगों को पार कर चुकी थी। ऑस्ट्रेलिया आदिवासी पाषाण युग में ही जी रहे थे, जबकि शेष दुनिया बहुत अधिक आगे आ चुकी थी। 

    नगर/गांव इत्यादि नहीं थे

    ऑस्ट्रेलिया के लोग नहीं जानते थे कि स्थाई रूप से एक ही जगह पर रहना क्या होता है, इसलिए नगर/गांव इत्यादि नहीं होते थे। जब ब्रिटिश पहुंचे तब पूरे आस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या कम अधिक लगभग पांच – सात लाख थी। लिपि नहीं थी। संपत्ति नहीं थी। 700 से अधिक बोलियां थीं। मतलब यह कि हर 700 – 900 लोगों पर बोली बदल जाती थी। स्थाई कबीलाई संस्कृति भी नहीं थी क्योंकि लोग स्थाई तौर एक स्थान पर नहीं रहते थे। समूहों के मुखिया बड़े बुजुर्ग होते थे, अनुभव मायने रखता था।

    भोजन व कृषि

    व्यवस्थित कृषि नहीं थी। पशुपालन नहीं था। शिकार करते थे। 

    धातुओं का प्रयोग

    पाषाण युगीन जीवन था। धातु का प्रयोग करना नहीं जानते थे।

    हथियार

    बिना धातु वाले लकड़ी व पत्थर के हथियार। 

    कला, संगीत इत्यादि

    पाषाण युगीन स्टोन पेंटिंग, वाद्ययंत्र इत्यादि।


    ब्रिटिशर्स का आना
    1788 से ऑस्ट्रेलिया आदिवासी

    ऑस्ट्रेलिया दिवस/ 26 जनवरी

    ऑस्ट्रेलिया दिवस का सिर्फ मतलब यह कि 26 जनवरी 1788 को ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पहली बार 11 जहाजों व 1500 लोगों की ब्रिटिश फ्लीट का पदार्पण हुआ। वैसे यह फ्लीट ऑस्ट्रेलिया 20 जनवरी 1788 के आसपास पहुंच चुकी थी लेकिन समुद्र में तरंगो के बहुत विकराल होने व अन्य कारणों के कारण ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण 26 जनवरी 1788 को हो पाया। इसी दिन 26 जनवरी 1788 को पहली बार ब्रिटेन का झंडा ऑस्ट्रेलिया में गाड़ा गया।

    ऐसा नहीं था कि ब्रिटिश लोगों ने पहले कई वर्षों या दशकों तक ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का कत्लेआम किया या उनके साथ युद्ध लड़े, फिर समूचे ऑस्ट्रेलिया पर विजय प्राप्त होने पर 26 जनवरी 1788 को विजय पताका लहराई, जिसके कारण ऑस्ट्रेलिया-दिवस मनाते हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया दिवस की बात की जाए तो ऑस्ट्रेलिया दिवस का ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के साथ हिंसा का नाता नहीं। यह दिवस सिर्फ यह इंगित करता है कि इस दिन पहली बार ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण किया।

    26 जनवरी को ऑस्ट्रेलिया दिवस के रूप में पूरे देश में मनाया जाएगा और इस दिन पूरे देश में पब्लिक-हालीडे होगा। यह भी तय हुआ 1994 में, महज लगभग 24 वर्ष पूर्व वह भी लोकतांत्रिक तरीके से। ऐसा नहीं है कि सरकार का मना आया और तय कर दिया कि इसको पूरे देश में ऑस्ट्रेलिया-दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

    ऑस्ट्रेलिया में ऐसा कोई दिवस सार्वजनिक रूप से सरकारी तौर पर नहीं मनाया जाता, जिससे यह साबित हो कि कब पूरा ऑस्ट्रेलिया कब्जाया गया या कब वहां ऑस्ट्रेलिया को गुलाम के रूप में इंग्लैंड का संविधान लागू हुआ, इत्यादि-इत्यादि। उल्टे ऑस्ट्रेलिया में प्रतिवर्ष नेशनल सॉरी डे मनाया जाता है। यह सब होना भी आज के ऑस्ट्रेलिया समाज की लोकतांत्रिक परिपक्वता व संवेदनशीलता को ही दर्शाता है।

    बीमारियों से मौतें

    ऑस्ट्रेलिया एक हजारों वर्षों से अछूती जमीन थी, वहां के लोग जंगलों में पाषाण युग की ही तरह रहते थे। बिना वैज्ञानिक विकास के। इसलिए प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार की कोई भी छेड़छाड़ नहीं हुई। इसका परिणाम यह रहा कि आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के शरीर में बाहरी दुनिया की बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो पाई। उनके शरीर दुनिया की सभ्यताओं में मनुष्यों को होने वाली बीमारियों को जानते तक नहीं थे।

    ब्रिटिश जब ऐसी अछूती जगह पहुंचे तो उनके शरीरों से ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के लिए बीमारियां अपने आप हावी होती गईं। आदिवासियों की कुल हुई मौतों में से अधिकतर लगभग 95% मौतें बीमारियों से हुईं। उस समय तकनीक इतनी व्यवस्थित नहीं थी कि बिना बैकफायर हुए खड़यंत्र करके बीमारियों के कीटाणुओं को इंजेक्ट करके सामूहिक हत्याएं वह भी स्थितियों में नियंत्रण रखते हुए की जा सके। आदिवासी लोगों में नगरीय सभ्यता का विकास तक नहीं था कि उन्हें किसी घेरे में आइसोलेट करके बीमारियों के कीटाणुओं से मारा जा सके।

    ब्रिटिश लेखकों की संवेदनशीलता व लेखन-ईमानदारी ही है कि वे बीमारियों से होने वाली मौतों के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते थे/हैं। जबकि उस काल में ऐसा कर पाना नियंत्रित तरीके से संभव नहीं था, कि आदिवासियों को जबरदस्ती बीमारियों के कीटाणु पिला कर उनकी सामूहिक हत्याएं किया जाना संभव हो।  लेकिन ब्रिटिश लेखक यह मानते थे/हैं कि यदि वे लोग नहीं आते तो बीमारियां नहीं फैलतीं और लोग नहीं मरते, इसीलिए वे कहते हैं कि हमने बीमारी फैलाकर आदिवासियों को मारा।

    संघर्ष में मौतें

    ब्रिटिश 1788 में ऑस्ट्रेलिया आए। पहला सामूहिक हत्याकांड 1838 में हुआ जिसमें 28 आदिवासियों की हत्याएं हुईं।1884 में 200 से अधिक आदिवासी मारे गए। ऑस्ट्रेलिया में आने के बाद आदिवासियों के साथ लगभग 200-225 वर्षों के संघर्ष में प्राइवेट हत्याओं को जोड़ते हुए आदिवासियों की लगभग 10 से 20 हजार मौतें हुईं। लगभग डेढ़ से दो शताब्दियों में इतनी हत्याएं दुनिया के इतिहास को देखते हुए तथा ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी व ब्रिटिश के लोगों के विकास व सभ्यताओं के स्तर के भयंकर अंतर को देखते हुए, नगण्य संख्या ही है। पाषाण-काल में जीने वाले ऑस्ट्रेलिया-आदिवासियों की तुलना में ब्रिटिश इतना विकसित थे कि पूरी आदिवासी सभ्यता को ही कुछ महीनों में ही चुन-चुन कर खतम कर सकते थे।


    वर्तमान ऑस्ट्रेलिया व आदिवासी समाज

    जिन लोगों ने वास्तव में कभी भी कहीं भी जमीन पर समाज के लिए गंभीर व बड़े स्तर पर सामाजिक काम किया है, जिन लोगों के पास मौलिक सामाजिक सोच है, जो घृणा, पूर्वाग्रह इत्यादि पर आधारित नहीं है। ऐसे लोगों ने यदि योरप, अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया देशों के समाजों को नजदीक से देखा है। तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वे इस बात से सहमत होंगे कि ऑस्ट्रेलियन्स विनम्र, अहिंसक, लोकतांत्रिक व गैर-सामंती मानसिकता के लोग हैं।

    ऑस्ट्रेलियाई समाज की एक विशिष्टता और है, कि आज ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या के लगभग 65% लोग अनीश्वरवादी हैं। दुनिया में देश की जनसंख्या का प्रतिशत जो अनीश्वरवादी है, ऑस्ट्रेलिया चौथे/पांचवे स्थान पर आता है। मैं यहां चीन जैसे देशों को नहीं जोड़ रहा हूं जहां लोगों की अधिकतर इच्छा अनिच्छा स्वैच्छिक न होकर सरकार के जबरदस्ती थोपे गए नियमों के आधार पर होता है। यदि चीन के सरकारी-गुंडई के दावों को छोड़ दिया जाए तो चीन की जनसंख्या का लगभग 20% लोग ही अनीश्वरवादी हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया के उन लोगों के आकड़े न जोड़े जाएं जो लोग भारत व चीन जैसे देशों से जाकर बसे हैं तो आस्ट्रेलिया दुनिया का पहला या दूसरा ऐसा देश हो सकता है जिसकी जनसंख्या का सबसे अधिक प्रतिशत लोग अनीश्वरवादी हैं।

    किसी भी हिंसक, बर्बर व क्रूर मानसिकता के लोकतांत्रिक समाज के लोग विनम्र, अहिंसक, गैर-सामंती व लोकतांत्रिक मूल्यों के लोग नहीं हो सकते हैं। बहुत बड़ी संख्या में स्वेच्छा से अनीश्वरवादी नहीं हो सकते हैं। लेख में आगे की बातों को समझने व महसूस करने के लिए यह एक मूलभूत तत्व है।

    आदिवासियों का दूतावास

    26 जनवरी 1972 को ऑस्ट्रेलिया दिवस की शाम को चार आदिवासी युवाओं माइकल अंडरसन, बिल्ली क्रैगी, बर्ट विलियम्स और टोनी कूरे ने ऑस्ट्रेलिया संसद के सामने एक बीच छाता लगाकर उसे आदिवासी दूतावास का नाम दे दिया। इस दूतावास को ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी व गैर-आदिवासी नागरिकों का सहयोग मिला, विभिन्न उतार चढ़ाव देखते हुए यह दूतावास 1995 में ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्वपूर्ण स्थानों के रूप में पंजीकृत हुआ।

    आदिवासी संरक्षित क्षेत्र

    ऑस्ट्रेलिया में अनेकों आदिवासी संरक्षित क्षेत्र हैं। इस आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी संस्कृति पूरे सम्मान के साथ जीवित व संरक्षित है। उनकी संस्कृति से न्यूनतम छेड़छाड़ किए हुए बेहतरीन नागरिक सुविधाएं देती है। इन क्षेत्रों में गैर-आदिवासी लोगों का प्रवेश बिना सरकार व बिना आदिवासियों की अनुमति के प्रवेश प्रतिबंधित रहता है।

    आदिवासियों को विशिष्ट सुविधाएं

    आदिवासियों की वर्तमान जनसंख्या लगभग साढ़े सात लाख है। सरकार ने बेहतरीन गुणवत्ता के लगभग दो लाख घर, डेढ़ लाख से अधिक स्विमिंग पूल, पौने दो लाख से अधिक आउटडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग डेढ़ लाख इनडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग पौने दो लाख सामुदायिक/सांस्कृतिक केंद्र तथा लगभग दो लाख अतिरिक्त सुविधाएं आदिवासी समाज के लिए उपलब्ध कराए हैं। 

    आदिवासियों को अनेक प्रकार के विशेष भत्ते मिलते हैं।

    — आदिवासियों को आवास

    सरकार द्वारा आदिवासियों को दिए गए घरों में से एक घर

    — आदिवासियों के लिए प्राथमिक चिकित्सा केंद्र
    — आदिवासियों के लिए शिक्षा
    — आदिवासी बच्चों के लिए स्विमिंग पूल
    आदिवासियों को आरक्षण

    बेहतरीन सुविधाओं के अतिरिक्त जितना प्रतिशत आदिवासियों की संख्या है, उतना प्रतिशत उनको विभिन्न स्तरों पर आरक्षण भी प्राप्त है। चूंकि समय के साथ आदिवासियों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है, इसलिए आरक्षण भी बढ़ता जा रहा है। बढ़ते रहने के बावजूद आरक्षण का गैर-आदिवासियों द्वारा विरोध नहीं होता, उल्टे आरक्षण को सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हैं। यह सामाजिक परिपक्वता ही है कि लगभग 200 वर्ष पहले तक पूरी तरह पाषाण युग में जीने वाले लोगों के लिए मेधाविता, योग्यता इत्यादि कारण बताते हुए आरक्षण का विरोध करने की बजाय, सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हुए, आरक्षण का स्वागत करते हैं। आदिवासियों को दोयम नजरों से नहीं देखा जाता है। उनका अपमान नहीं किया जा सकता है। दबंगों द्वारा उनको चौराहों में नंगा करके पीटा नहीं जाता है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं किया जाता है। जबकि भारत में दलितों के साथ आज भी ऐसा होता है, प्रतिवर्ष ऐसी हजारों घटनाएं होती हैं।

    नेशनल सॉरी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) 26 मई

    बाहरी सभ्यता के ब्रिटिश लोगों के आने के कारण ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की बीमारियों के कारण लगातार मौतें हो रहीं थीं। उनकी संख्या कम होती जा रही थी। ब्रिटिश पुरुषों के संपर्क में आने के कारण आदिवासी महिलाओं से संकर-जाति के आदिवासी बच्चे भी पैदा हो रहे थे। 

    1906 के लगभग आस्ट्रेलिया सरकार ने यह निर्णय लिया कि जो संकर बच्चे हैं उनको उनकी आदिवासी माताओं से लेकर सरकार के संरक्षण में रखा जाए। उनको पढ़ाया लिखाया जाए, प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे आधुनिक सभ्यताओं के साथ तालमेल बना कर जी सकें। ये बच्चे 16 से 18 वर्ष की आयु तक सरकारी संरक्षण में रखे जाते थे। उसके बाद उनको उनके आदिवासी परिवार का परिचय दिया जाता था, उनको अपनी आदिवासी माता का सरनेम लगाने का अधिकार भी दिया जाता था। इन बच्चों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती थी लेकिन उनके पास अपना परिवार नहीं होता था। इस नीति के कारण लगभग 60 वर्षों में लगभग 25,000 बच्चे अपनी आदिवासी माता से अलग करके सरकारी संरक्षण में पाले गए।

    लेकिन कुछ दशकों बाद सरकार को यह महसूस हुआ कि यह तरीका उचित नहीं है, अमानवीय है तथा जो भी होता आया है वह गलत है। तब सरकार ने 1967 में यह नीति बंद कर दिया। आगे चलकर सरकार ने यह स्वीकार किया कि यह आस्ट्रेलिया के लिए सबसे शर्मिदगी वाली नीति रही। ऐसा नहीं होना चाहिए था। 

    सरकार ने पूरे देश की ओर से आदिवासियों से क्षमायाचना करने के लिए 26 मई 1998 को पहली बार आधिकारिक तौर पर नेशनल सारी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) के रूप में मनाया, तब से प्रतिवर्ष 26 मई नेशनल सारी डे के रूप में मनाया जाता है। हजारों-लाखों लोग मार्च करते हैं।

    प्रधानमंत्री ने संसद व सरकार की ओर से आधिकारक रूप से क्षमा मांगी

    आस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री ने पूरे देश की ओर से आधिकारिक तौर पर आदिवासियों से 13 फरवरी 2008 को पुरानी सरकारों व संसदों की ओर से क्षमायाचना की।

    यह आधुनिक ऑस्ट्रेलिया-समाज की परिपक्वता ही है कि उन्होंने समय के साथ परिष्कृत होते हुए, गलतियों को स्वीकारते हुए, एक ऐसा देश बनाया जिसमें लोग अभय के साथ बेहतर जीवन जीते हुए रहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो मौका देखकर आदिवासी व गैर-आदिवासी एक दूसरे की हत्याएं कर रहे होते। जगह-जगह पुलिस व सेना के बैरियर लगे रहा करते। ऑस्ट्रेलिया एक बेहद शांतिप्रिय व लोकतांत्रिक देश नहीं होता।


    हमारा भारतीय समाज

    यदि हम भारतीय भी चिंतन व दस्तावेजी लेखन में ईमानदार होते तो हमारे पास भी दस्तावेज होते जिनमें लिखा होता कि हमारी जाति व्यवस्था के कारण अछूतों को ऐसी गंदी जगहों में रहने के लिए बाध्य होना पड़ा कि हर साल बीमारियों से हजारों लाखों अछूत मरता रहा। यह भी लिखते कि जमीनों में अधिकार न होने, लेकिन उन्हीं जमीनों में रात दिन बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के कारण, अकाल में लाखों अछूतों की हत्याएं की जाती रहीं। लेकिन इतना ईमानदार होने के लिए जिस समझ दृष्टि व जिगर की जरूरत होती है, वह न तब थी और न ही अब उन लोगों के पास है। जो लोग अपने गिरेबां में झांकने की बजाय पूरी बेशर्मी के साथ ऑस्ट्रेलिया को 200-225 वर्ष पहले के लिए गाली देते हैं, उनके अपने ही पूर्वजों व उनके अपने ही समाज ने ऑस्ट्रेलिया की तुलना में सैकड़ों-हजारों गुना अधिक हत्याएं की हैं, वह भी अपने ही समाज के लोगों की।

    जाति-व्यवस्था के द्वारा संस्थागत हत्याएं

    भारतीय समाज ने लाखों शूद्रों की हत्याएं संस्थागत रूप से की हैं। यहां तक की आजादी के बाद भी प्रतिवर्ष सैकड़ों हजारों हत्याएं हमारा समाज करता आ रहा है, अब भी कर रहा है। सैकड़ों हत्याएं तो केवल अलग-अलग जाति के लड़का लड़की के प्रेम के कारण आनर किलिंग के कारण होती हैं।

    बीमारियों से मौतें

    यदि हम यह मानते हैं कि ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याएं बीमारियां फैला कर जानबूझकर कीं। तो यही बात हमें अपने समाज पर भी लागू करनी पड़ेगी क्योंकि हैजा, चेचक, मलेरिया जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों में से अधिकतर मौतें शूद्रों की ही होती थीं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि शूद्रों की हत्याएं करने के लिए ऐसी बीमारियां फैलाई जातीं थीं। भारत में प्रतिवर्ष विभिन्न माध्यमों से लाखों शूद्रों की हत्याएं होतीं थीं।

    अकाल से मौतें

    भारत में पिछले लगभग 150 वर्षों में अकाल से लगभग 6 करोड़ मौतें हुईं। इनमें से अधिकतर मौतें शूद्रों की हुईं। जाति व्यवस्था के कारण सामाजिक आर्थिक ढांचा ऐसा रहा कि अकाल के कारण करोड़ों शूद्रों की मौतें हुईं।  

    स्त्री-भ्रूण हत्याएं

    हम और हमारा समाज इतना रेसिस्ट है कि केवल लिंगभेद के कारण ही सख्त कानूनों व जागरूकता के बावजूद केवल पिछले 20 वर्षों में ही एक करोड़ से अधिक स्त्री-भ्रूण हत्याएं की हैं। मतलब यह कि हमारा समाज प्रति वर्ष उतनी स्त्रियों की हत्या उनके जन्मने के पहले ही कर देता है, जितनी लगभग ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जनसंख्या थी, जब 1788 में ब्रिटिशर्स ऑस्ट्रेलिया पहली बार पहुंचे थे। हमें ब्रिटिशर्स का रेसिज्म दीखते है लेकिन अपना रेसिज्म नहीं दीखता है, जबकि हमारा रेसिज्म बेहद अधिक घिनौना व भयानक है।

    दहेज हत्याएं

    हमें यह दीखता है कि संपत्ति के लिए ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की हत्याएं 200-225 वर्ष पहले कीं। हमें यह भी देखना चाहिए कि हमने आजादी के बाद दहेज में संपत्ति के लिए कितनी महिलाओं की हत्याएं कीं। जितनी हत्याएं ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की कुल हत्याएं की, उस संख्या से तो तुलना ही नहीं हो सकती क्योंकि हमने केवल दहेज के चक्कर में ही ऑस्ट्रेलिया में कुल आदिवासियों की संख्या से अधिक हत्याएं की हैं।

    धार्मिक-दंगों में हत्याएं

    आजादी के समय, 1964 में गुजरात दंगे, 1984 में सिखों के विरुद्ध दंगे (20,000 से अधिक सिख मारे गए) 50,000 से अधिक सिख-घर जलाए गए।

    माओवादियों द्वारा हत्याएं

    1970 के बाद भारत में माओवादियों की जमात ने पिछले लगभग 50-60 वर्षों में अपने ही देश के हजारों लोगों व आदिवासियों की हत्याएं की हैं। इससे बहुत ही कम हत्याएं 200-225 वर्ष पहले ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की थी, वह भी तब जब ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी न तो ब्रिटिश थे न ही गोरे लोग थे। भारत में माओवादियों ने भारतीय आदिवासी समाजों की संस्कृति लगभग पूरी तरह नष्ट कर दी, उनको अपना मानसिक गुलाम बना रखा है। छोटी-छोटी बात पर प्रतिवर्ष अनेकों आदिवासियों की हत्याएं आज भी कर रहे हैं।


    चीन में माओवाद/वामपंथ की हिंसा
    (माओवाद के प्रति रोमांस रखने वालों के लिए)

    यदि माओ द्वारा सत्ता प्राप्ति की प्रक्रिया में व सत्ता प्राप्ति के बाद करवाई जाने वाली करोड़ों हत्याओं की चर्चा न भी की जाए, तब भी चीन ने केवल 1989 में ही अपने ही देश के दसियों बीसियों हजार युवाओं को तियाननमेन चौक पर गोलियों से भून दिया। यह संख्या उन कुल हत्याओं से भी अधिक है जो ब्रिटिश ने ऑस्ट्रेलिया में 200-225 वर्ष पूर्व के समय से लगभग 150 वर्षों में कीं।

    जितनी हत्याएं चीन ने 1989 में केवल तियाननमेन चौक पर कीं, उसकी तुलना ब्रिटिशर्स द्वारा की गई ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याओं से हो ही नहीं सकती, जबकि वे ऑस्ट्रेलिया में बाहर से आकर कब्जा कर रहे थे।


    चलते-चलते

    हमारे भारतीय समाज में सोशल मीडिया का प्रयोग करने वाले ऐसे बहुत लोग हैं, जिनके पेट भरे हैं, भारी भरकम वेतन व सुविधाएं पाते हैं। जीवन में कभी भी समाज में जाकर कोई भी ठोस व गंभीर काम/प्रयास तक नहीं किए होते हैं। ठोस व गंभीर काम/प्रयास छोड़िए दूसरों के गंभीर कामों/प्रयासों में सक्रिय भागीदारी तक नहीं किए होते हैं। कुल मिलाकर बात यह कि समाज क्या है, समाज के लोग क्या हैं, इत्यादि को जानने समझने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं, कोई जीवंत अनुभव नहीं। समाज को समझने के लिए अपने अनुभव का कुछ न कुछ तो आधार होना ही चाहिए। यदि ऐसा नहीं तो जो कुछ भी है वह सिवाय तर्कबाजी या बतोलेबाजी के कुछ भी नहीं। बिना वस्तुनिष्ठता के तर्कों का कोई भी वास्तविक मोल नहीं, बौद्धिक विलासिता जरूर होती है।

    ऐसा भी नहीं कि ये लोग जमीन पर ठोस व गंभीर काम/प्रयास नहीं करते हैं, तो गंभीर व विस्तृत स्वाध्याय ही करते हों। पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहते हैं, अपने मन में पहले से अपनी पसंद नापसंद के आधार पर तय कर लेते हैं। इसके बाद गूगल में सर्च करते हैं या कुछ किताबों को सरसरी दृष्टि से पढ़ लेते हैं। फिर कुछ अपना टटपुंजिया कमेंट के रूप में कुछ शब्दों या कुछ लाइनों का एडिटर्स नोट टाइप लगाते हुए कोई लिंक उठाकर चिपका देते हैं या कभी कभार कुछ फालतू समय हुआ या आफिस में बैठे-बैठे ऊबऊ महसूस कर रहे हों तो गूगल में कहीं कुछ मनचाहा मिल गया हो तो उसका हिंदी अनुवाद करके चिपका देते हैं, दो चार शब्दों या लाइनों का अपने ज्ञान का तड़का भी लगा सकते हैं।

    इसमें से कहीं भी, कुछ भी ऐसा नहीं, जिसमें समाज को जानने समझने के प्रति गंभीरता, वस्तुनिष्ठता, ईमानदारी, संवेदनशीलता इत्यादि होती हो।

    करेला ऊपर से नीम चढ़ा वाली स्थिति यह होती है कि, भारतीय समाज में कोरी भावुकता सबसे अधिक प्रभावी रहती है। अधकचरी व यहां वहां से नकल उतारी जानकारी को उटपटांग तरीके से तोड़मोड़ देना ज्ञानी होना होता है। अहंकार भी इतना कि मानसिक व भावनात्मक हिंसा की हदों की सीमा ही नहीं। तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता के साथ चर्चा हो ही नहीं सकती है। जब गंभीरता है ही नहीं, तो जानने समझने का गंभीर व ईमानदार प्रयास हो ही नहीं सकता, संभव ही नहीं। सबकुछ पूर्वाग्रह व व्यक्तिगत पसंद नापसंद व रोमांटिज्म के द्वारा ही नियंत्रित होता है, इस प्रकार के चरित्र से तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा करना ही व्यर्थ होता है।

    यह पोस्ट पेट भरे, सुरक्षित व सुविधाओं से युक्त लग्जरियस जीवन जीने वाले उन वामपंथी व माओवादी सोच के लोगों के लिए भी है जिनके खाते में सिर्फ बतोलेबाजी के सिवाय, ईमानदार गंभीर सामाजिक सक्रियता व योगदान नहीं आते हैं। यदि किंचिंत मात्र सा भी चिंतन करने, देखने समझने, महसूस करने का ईमानदार शऊर होगा, तो उनको इस पोस्ट से कुछ सीखने समझने को मिल ही जाएगा। अन्यथा जैसा उनकी सोच व चरित्र है, वह तो है ही।

    चिंतन व विश्लेषण पूर्वाग्रह, व्यक्ति पसंद नापसंद से इतर वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। ऐसा होना तभी हो पाता है जब समझने में जीवन विभिन्न स्तरों में जीवन लगाया गया हो। नहीं तो क्षुद्र चिंतन तो हजारों वर्षों से अनेक लोग करते चले आ रहे ही हैं, इतिहास पुरुषों के रूप में प्रायोजित भी होते रहते हैं, जबकि समाज उत्तरोत्तर अधिक सड़ता रहता है। हम वास्तव में कैसे हों, हमारी सोच व मानसिकता कैसी हो, हमारी समझ का स्तर क्या हो, हमारे ज्ञान का स्तर क्या हो, यह निर्णय तो हमें ही लेने होते हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • पालक, टमाटर व आलू की रसीली सब्जी –सामाजिक यायावर

    पालक, टमाटर व आलू की रसीली सब्जी –सामाजिक यायावर

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    पालक
    आलू
    टमाटर
    मिर्च
    प्याज
    लहसुन
    अदरक
    नींबू
    जीरा
    मेथी
    हींग
    आमचूर
    धनिया पाउडर
    सेंधा नमक

    विधि:

    पालक की पत्तियां तोड़ कर धो लीजिए। एक बर्तन में थोड़ा सा पानी डालकर उसमें पालक की धुली हुई पत्तियां डालकर कुछ मिनट तक उबाल लीजिए। उबली हुई पालक को सामान्य तापमान में आने के बाद पीसकर एक पात्र में रख लीजिए।

    टमाटर को भी पीस कर एक पात्र में रख लीजिए। प्याज व मिर्च को भी एक साथ पीस कर एक पात्र में रख लीजिए। लहसुन अदरक का पेस्ट बना लीजिए।आलू को छोटे टुकड़ों में काट कर एक पात्र में रख लीजिए।

    पात्र में तेल डालकर आलू के टुकड़ों को भून लीजिए, आलू के तेल में भुने हुए टुकड़ों को निकाल कर रख लीजिए।

    इसी तेल में हींग, मेथी व जीरा डालकर भूनिए, फिर इसमें लहसुन अदरक का पेस्ट डालकर भूनिए, फिर इसमें पीस कर रखी गई प्याज व मिर्च डालकर भूनिए, फिर इसमें पीस कर रखा गया टमाटर डालकर भूनिए।

    अब इसमें पीसी हुई पालक व तेल में भुनी हुई आलू डाल दीजिए। कुछ देर बाद सेंधा नमक, आमचूर व धनिया पाउडर डाल दीजिए। कुछ मिनट पकने दीजिए। अब आंच बंद करके नीबूं का रस डाल कर मिला दीजिए।

    लीजिए आपकी आलू, पालक व टमाटर की रसीली सब्जी तैयार है। खाइए व खिलाइए।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • कात्सु बहन (कात्सु होरिउची), गांधी शांति-दर्शन, काका कालेलकर व भारत

    कात्सु बहन (कात्सु होरिउची), गांधी शांति-दर्शन, काका कालेलकर व भारत

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    कात्सु होरिउची जब पहली बार भारत आईं थीं तब वे युवती थीं, अब उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष है। हम भारतीय, समाज में शांति के प्रति इनके समर्पण को सम्मान देते हुए, प्रेम व सम्मान से कात्सु बहन पुकारते हैं। लगभग 30 वर्ष से भारत में रह रहीं हैं। इनका जीवन विश्व में शांति का संदेश फैलाने के लिए समर्पित है। जापान से आईं कात्सु बहन लगभग 17-18 वर्ष पहले भारत की नागरिक बन गईं थीं।

    दत्तात्रेय बालकृष्णा कालेलकर, लोकप्रिय नाम “काका कालेलकर”, कात्सु बहन के जीवन गुरुओं में से थे तथा कात्सु बहन को अपनी दत्तक पुत्री मानते थे। 

    महात्मा गांधी की इच्छा थी कि समाज में धर्मवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, संस्कृतिवाद, भाषावाद इत्यादि से ऊपर उठकर लोगों के हृदय मिलने चाहिए, हृदय से एकाकर होना चाहिए। इसके लिए संस्थानों की स्थापना होनी चाहिए। इसी जिम्मेदारी को स्वीकारते हुए काका कालेलकर ने 1955 में दिल्ली के राजघाट में  गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा (सन्निधि)  की स्थापना की।

    काका कालेलकर गुजरात विद्यापीठ के सह-संस्थापक व वाइस-चांसलर रहे। काका कालेलकर भारत के प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग) के अध्यक्ष भी रहे थे।

    कात्सु बहन से मिलने का सौभाग्य मुझे 2005 में हुआ। मैं उन दिनों गांधी स्मारक निधि, राजघाट में रहता था तथा गांधी स्मारक निधि, गांधी शांति प्रतिष्ठान, अवार्ड तथा कनाडा के कुछ विश्वविद्यालयों के द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन में सहयोग कर रहा था तथा गांधी स्मारक निधि के मंत्री के सचिव के तौर पर कार्य कर रहा था।

    उस समय कात्सु बहन की उम्र लगभग 65 वर्ष रही होगी। मैं कात्सु बहन की सहृदयता व विनम्रता से प्रभावित हुआ था, मेरा प्रयास रहता था कि यदि अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार की आयोजन समिति की बैठक शाम को नहीं है, तो भले ही कुछ मिनट के लिए ही सही कात्सु बहन के दर्शन कर लूं। कभी कभार स्वादिष्ट स्नैक्स भी खाने को मिल जाते थे। 2005 के बाद पिछले लगभग साढ़े 13 वर्षों में उनसे कभी कोई संवाद, मुलाकात या संपर्क भी नहीं हुआ। इसलिए कात्सु बहन को शायद ही मेरी याद हो, यदि मैं उनको आज भी याद हूँ तो मेरे लिए यह अत्यधिक सौभाग्य की बात है।

    गांधी शांति-दर्शन से प्रभावित कात्सु बहन हिंदी बहुत अच्छे से जानती हैं। बच्चों के लिए जापानी लोक कथा नामक पुस्तक भी हिंदी में लिखी। सन्निधि की पत्रिका का संपादन भी करतीं थीं। कात्सु बहन की विश्व शांति के लिए शांति स्तूप, इंद्रप्रस्थ, दिल्ली की स्थापना में भी सक्रिय भूमिका रही।

    गांधीवादी रमेश कुमार शर्मा भाई की फेसबुक पोस्ट देखकर कात्सु बहन से जुड़ी मेरी यादें ताजा हो गईं। रमेश भाई को बहुत बहुत धन्यवाद। फोटो में कात्सु बहन, रमेश भाई व विष्णु प्रभाकर जी के पुत्र अतुल प्रभाकर भी हैं, जिन्हें मैं अवसर मिलने पर अपना मित्र कहने का सौभाग्य प्राप्त कर लेता हूँ।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या मोदी जी के विरोध के मायने लोकतांत्रिक होना जरूरी नहीं

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या मोदी जी के विरोध के मायने लोकतांत्रिक होना जरूरी नहीं

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    सन् 2014 के लोकसभा चुनावों के लगभग दो वर्षों पहले से लोकतंत्र की गूढ़ समझ रखने वाला लोकतांत्रिक व्यक्ति हो पाना बहुत ही अधिक सरल हो गया है। मोदी जी का विरोध कीजिए, गाली दीजिए या व्हाट्सअप फेसबुक ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर ऐसे संदेशों को कापी पेस्ट फारवर्ड कीजिए। इतना करते ही व्यक्ति लोकतांत्रिक हो जाता है।

    यह बिलकुल वैसा ही है जैसे मोदी जी का समर्थन करते ही व्यक्ति राष्ट्रप्रेमी, हिंदुत्व की असल समझ रखने वाला व कर्मठ हो जाता है।

    इन चरित्रों में अंतर क्या है यह समझ के बाहर है क्योंकि ऊपरी पैकिंग भले ही अलग रंग की हो लेकिन चरित्र तो बिलकुल एक ही है। चरित्र समान होने के कारण क्या फर्क पड़ता है कि मोदी जी के विरोधी हैं या समर्थक हैं क्योंकि पोषित तो समान सामाजिक मूल्य ही किए जा रहे हैं। इन समान चरित्रों में भी अंतर उन लोगों को दिख सकता है जिन्हें यह लगता है कि किसी लोकतांत्रिक देश में किस पार्टी की सरकार है, इस बात से उस देश व समाज के चरित्र का निर्माण होता है।

    यदि ऐसा होता तो किसी लोकतांत्रिक देश में कभी किसी दूसरी पार्टी की सरकार आनी ही नहीं चाहिए। यदि ऐसा होता तो भारत में हमेशा कांग्रेस की ही सरकार देश व प्रत्येक राज्य में लगातार ही बनती रहती। यदि ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश में मायावती जी की सरकार आने के बाद उन्हीं की बनी रहनी चाहिए थी। यदि ऐसा तो अखिलेश यादव जी की सरकार बनी रहनी चाहिए थी। यदि ऐसा होता तो बिहार में 15 वर्षों तक सरकार रहने के बाद लालू प्रसाद यादव जी की सरकार बनी रहनी चाहिए थी, क्योंकि उनको तो उनके भक्तों/समर्थकों द्वारा सामाजिक न्याय का मसीहा भी कहा जाता है।

    लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि सच यही है कि किसी लोकतांत्रिक देश में सरकारें उस देश व समाज के लोगों की सोच समझ व चरित्र का प्रतिबिंब होतीं हैं। भारतीय समाज, परिवार, नौकरशाही व सरकारों का चरित्र मूल में अलोकतांत्रिक व सामंती है। समाज की इकाई के व्यक्ति के रूप में हमारे जीवन में झूठ, ढोंग व दोहरापन इत्यादि ही हमारे वास्तविक चरित्र हैं। समाज ही नहीं परिवार की इकाई के रूप में भी हम कमोबेश इसी चरित्र के हैं। हमें व्यक्ति, परिवार व समाज के रूप में अपने चरित्र को बदलने की मूलभूत जरूरत है। हमारा ऐसा करना ही वास्तविक क्रांति/परिवर्तन है। वास्तव में यही कर पाना ही क्रांति है। बिना ऐसा किए, रोज सरकारों को बदलते रहिए, रोज सरकारों को दोष दीजिए, रोज सरकारों को गाली दीजिए, रोज क्रांति गढ़िए अपनी पीठ ठोकिए अपने अंदर अहंकार को जीते रहिए। लेकिन ऊपरी पैकिंग के रंगों के अलावा कुछ नहीं बदलेगा।

    चलते-चलते:

    यदि मोदी जी से किसी पार्टी का होने की बजाय देश के लोगों का प्रधानमंत्री होने की अपेक्षा की जाती है जबकि देश का प्रधानमंत्री किसी न किसी पार्टी का प्रतिनिधित्व तो करता ही है वरना कोई प्रधानमंत्री ही नहीं बन सकता। जो लोग जो मोदी जी से देश का प्रधानमंत्री होने की अपेक्षा करते हैं। वही लोग देश के पूर्व राष्ट्रपति माननीय प्रणव मुखर्जी जी के द्वारा एक स्वयंसेवी संगठन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आमंत्रण को स्वीकार किए जाने का पानी पी-पी कर विरोध करते हैं। जबकि भारत के संविधान के अनुसार देश का राष्ट्रपति किसी भी पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं करता। मतलब यह कि हम मोदी जी से तो देश का प्रधानमंत्री होने की अपेक्षा करते हैं लेकिन प्रणव मुखर्जी जी को देश का राष्ट्रपति होने के कारण बुरा भला कहते हैं। गजब का ढोंग व दोगलापन हममें कूट-कूट कर भरा है।

    राहुल गाँधी जी को मैं लोकतांत्रिक समझ वाला राजनेता मानता आया हूँ, इस मुद्दे पर उनके व्यवहार ने उनके प्रति मेरी मान्यता को पुष्ट ही किया है। उनको धन्यवाद। संघ द्वारा भारत के पूर्व राष्ट्रपति को आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद। माननीय प्रणव मुखर्जी जी द्वारा आमंत्रण को स्वीकार करने के लिए धन्यवाद। यह घटना एक लोकतांत्रिक घटना थी।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • APS बनाम IAS

    APS बनाम IAS

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    भारत में जैसे IAS (Indian Administrative Sevice), आस्ट्रेलिया में वैसे APS (Australian Public Sevice)। भारत में जैसे UPSC (Union Public Service Commission), आस्ट्रेलिया में वैसे APSC (Australian Public Service Commission)। आइए देखते समझते हैं कि IAS व APS के मूलभूत चरित्रों में क्या अंतर है। 

    आस्ट्रेलिया में APS

    आस्ट्रेलिया में जो योग्य है, जो वास्तव में देश के लिए योगदान करना चाहता है, वह APS बनता है। APS बनना योग्यता का मानदंड नहीं है। जो योग्य है वह APS बनता है।

    APS की सबसे बड़ी खासियतें यह हैं कि स्वतः प्रमोशन जैसी व्यवस्था नहीं। यदि कोई सामान्य स्नातक है और APS बना है तो वह अपनी योग्यता के आधार पर ही APS के स्तर पर रहेगा, स्वतः प्रमोशन पाते हुए देश का सचिव नहीं बन सकता या नीति निर्माताओं या निर्णय लेने जैसे स्तरों तक नहीं पहुंच सकता है। पहुंचेगा भी तो अपनी योग्यता प्रमाणित करते हुए।

    APS के किसी भी स्तर पर कोई भी कभी अपनी योग्यता प्रमाणित करके APS का वह स्तर ज्वाइन कर सकता है। आयु की कोई सीमा नहीं।

    मतलब यह कि यदि आप विशेषज्ञ हैं, योग्य हैं तो आप पचास साठ साल की आयु में भी अपनी योग्यता के आधार पर APS का स्तर ज्वाइन कर सकते हैं।

    आपने जीवन में कभी भी कोई सरकारी नौकरी न की हो, लेकिन यदि आप योग्य हैं, यदि आप विशेषज्ञ हैं तो आप देश के महत्वपूर्ण विभागों का सचिव बन सकते हैं। आप 21 साल की आयु में देश का सर्वोच्च सचिव बन सकते हैं, आप 80 साल की आयु में सचिव बन सकते हैं।

    यही कारण है कि आस्ट्रेलिया में कोई नौकरशाह किसी आम-आदमी का अपमान नहीं करता। क्योंकि क्या मालूम कि आज जो कुर्सी के उस पार बैठा है कल को उस नौकरशाह का बाप बनकर बैठ जाए। वैसे भी आस्ट्रेलिया में नौकरशाही का जो चरित्र है वह आम आदमी के लिए है। आम आदमी वास्तविक मालिक है देश का।

    आस्ट्रेलिया में किसी भी नौकरशाह को भले ही देश का सर्वोच्च नौकरशाह हो को आवास जैसी सुविधाएं नहीं मिलती हैं। आपका पड़ोसी भी देश का सर्वोच्च नौकरशाह हो सकता है। बिलकुल आपके ही जैसा आम आदमी। जिसके ऊपर वह सभी नियम कानून लागू होते हैं जो आपके ऊपर लागू होते हैं। उसको भी आपकी ही तरह बिजली पानी इत्यादि के बिल देने पड़ते हैं। वह भी आपकी तरह अपनी कार चलाते हुए ट्रैफिक के नियमों का पालन करता हुआ अपने आफिस पहुंचता है। उसके बच्चे भी आपके बच्चों की ही तरह बस स्टाप में बस का इंतजार करते हैं। कोई अतिरिक्त छूट, सुविधा या महिमामंडन नहीं।

    आस्ट्रेलिया में जो नौकरशाह जिस विभाग में है वह उस विभाग के संदर्भ में योग्यता व विशेषज्ञता रखता है। ऐसा नहीं है कि एक इतिहास का स्नातक वित्त या अंतर्राष्ट्रीय विकास या पानी या ऊर्जा या तकनीक या स्वास्थ्य या सुरक्षा की नीतियां बनाना शुरू देगा। ऐसा भी नहीं है कि एक BA पास आदमी किसी अधिक योग्य व विशेषज्ञ को ज्ञान देना शुरू कर देगा। ऐसी कल्पना तक नहीं की जा सकती है।

    यही कारण है कि आस्ट्रेलिया जैसे विकसित हैं और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देशों में आते हैं। क्योंकि वास्तव में योग्यता व विशेषज्ञता का सम्मान होता है, काम करने की छूट मिलती है, आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं। योग्यता व विशेषज्ञता का देशहित में प्रयोग होता है।

    आस्ट्रेलिया में APS संसद के प्रति जिम्मेदार होता है। ध्यान दीजिए संसद के प्रति न कि राष्ट्रपति या कैबिनेट या सरकार के प्रति। यही कारण है कि ऊंचे से ऊंचा नौकरशाह भी एक निर्दलीय सांसद तक से नीचे माना जाता है। भारत में तो उपजिलाधिकारी भी गैर-सत्तापक्ष वाले सांसद/विधायक से चाहें तो तहजीब से बात तक न करें, निर्दलीयों की तो बात ही छोड़ दीजिए।

    आस्ट्रेलिया में जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी इत्यादि जैसे सामंती व राजसी पद नहीं होते हैं। इस तरह के पद होते भी हैं तो वे स्थानीय सरकारों के अधीन होते हैं। भारत में अंग्रेजो की गुलामियत वाली प्रशासनिक व्यवस्था आजतक बदले हुए नामों के साथ लागू है। भारत में क्या कल्पना की जा सकती है कि जिलाधिकारी जिलापंचायत के अधीन हो। जिला पंचायत जिलाधिकारी की वैकेंसी निकाले, चयन परीक्षा करवाए, वेतन दे। जिलाधिकारी है तो स्थानीय सरकार के स्तर का सरकारी कर्मचारी ही।

    जिले का जिलाधिकारी होने का मतलब स्थानीय स्तर पर नौकरी करना, मतलब स्थानीय सरकार के लिए नौकरी करना न कि राज्य या केंद्र सरकार के लिए नौकरी करना। लेकिन भारत के तंत्र का ढांचा ऐसा है कि ये लोग राजा होते हैं बाकी लोग गुलाम, ऊपर से भारत के राष्ट्रपति के प्रतिनिध के रूप में नौकरी करते हैं। 

    भारत में IAS

    भारत में IAS होने के लिए स्नातक होना होता है। स्नातक होने के बाद परीक्षा में बैठना होता है। जो जितना अधिक रट लेता है वह IAS बन जाता है। भारत में समाज के लोग IAS को व जो स्वयं IAS है वह अपने आपको सर्वज्ञाता मानता है। ऐसा माना जाता है कि वह सबसे अधिक विद्वान व योग्य है तभी IAS बन पाया है।

    IAS होने की परीक्षा जो महज आवेदकों की संख्या छटनी करने का प्रतियोगी तरीका भर है, को योग्यता व विशेषज्ञता के रूप में महिमामंडित किया जाता है। स्थिति यह है कि बिना किसी विशेषज्ञता का एक सामान्य स्नातक भी IAS बन कर देश की नीतियां तय करने वाला निरंकुश नौकरशाह बन जाता है। नीति निर्माता होने के लिए वास्तविक योग्यता व विशेषज्ञता के लिए न तो दरवाजा रहता है न ही विकल्प। जो दिखावटी सलाहकार समितियां बनती भी हैं तो उनका कोई विशेष मतलब नहीं होता क्योंकि सबके ऊपर तो IAS रूपी नौकरशाह कुंडली मारकर बैठा रहता है।

    भारत में कुछ किताबें रटकर IAS बन सकते हैं। कुछ किताबें रटिए, संख्या छटनी प्रतियोगी-परीक्षा में जगह बनाइए फिर जीवन में आपको कुछ नहीं करना है सबकुछ स्वतः होगा। प्रमोशन स्वतः होते हैं। समय से प्रमोशन न हो तो कोर्ट जा सकते हैं, प्रमोशन न होने पर सरकार के खिलाफ मुकदमे दायर कर सकते हैं। प्रमोशन के लिए केवल समय काटना होता है। इन मुद्दों पर सरकार के खिलाफ मुकदमे करके हीरो बना जा सकता है, क्रांतिकारी के रूप में प्रतिष्ठा पाई जा सकती है। सरकार यदि किसी IAS को बर्खास्त करना चाहे या निलंबित करना चाहे तो सरकार को नाकों चने चबाने पड़ जाते हैं।

    स्नातक कीजिए, एक खास उम्र तक IAS बनिए। आजीवन देश की दशा व दिशा तय करने के लिए महानता व योग्यता अर्जित हो गई। अब कोई सवाल नहीं खड़ा हो सकता, किसी सुझाव की जरूरत नहीं।

    इतिहास से BA स्नातक IAS बनकर भारत का वित्त सचिव बन सकता है, स्वास्थ्य सचिव बन सकता है, नदी मंत्रालय का सचिव बन सकता है, इंजीनियरी विभाग का सचिव बन सकता है, विदेश मंत्रालय का पूरा ठेकेदार बन सकता है। इंजीनियरिंग से स्नातक/परास्नातक IAS बनकर स्वास्थ्य सचिव बन सकता है।

    कामर्स स्नातक या MBBS स्नातक या LLB की पढ़ाई किया हुआ IAS, इंजीनियरी से पीएचडी किए इंजीनियर को इंजीनियरी के ऊपर ज्ञान देगा। इंजीनियरी की पढ़ाई किया हुआ IAS, डाक्टर व वित्त व अन्य विशेषज्ञों को उनकी विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में ज्ञान देगा।

    एक BA या BSc की पढ़ाई किया हुआ IAS, जिलाधिकारी या उपजिलाधिकारी बनकर पूरे जिले या अपने हलके के इंजीनियर्स, डाक्टर्स, वित्त विशेषज्ञों, व्यापारियों, व प्रोफेसरों को भरपूर ज्ञान देता है। सब उसके जूतों तले रहते हैं। निर्णय वही लेता है। बाकियों को अपने द्वारा लिए गए निर्णयों के संदर्भ में IAS की सहमति लेनी होती है।

    यहां तक कि जिलाधिकारी, IAS, सुरक्षा विशेषज्ञ भी होता है, जिला पुलिस अधीक्षक, IPS, को ज्ञान देता है। पूरी नौकरशाही के ढांचे में टाप टु बाटम ऐसा ही है। सर्वज्ञाता होने व योग्य होने की इनकी सीमा असीमित है। फैशन डिज्ञाइन संस्थानों, तकनीकी संस्थानों के निदेशक बन जाते है।

    एक लाइन में यह समझिए कि घास के तिनके से लेकर अंतरिक्ष यान तक सभी कुछ के ज्ञाता व धुरंधर विशेषज्ञ होते हैं। ज्ञाता होने व योग्य होने का अहंकार, बाप रे बाप। ईश्वर भी पानी भरे। बिलकुल राजतंत्र वाला अंदाज। एक राजा और बाकी सब जी-हुजूरी करने वाले दरबारी।

    जिस-जिस IAS को बहुत संवेदनशील, लोकतांत्रिक व अपवाद इत्यादि माना जाता है। वह स्वयं को अपनी प्रजा का अभिभावक मान कर कुछ थोड़े बहुत काम कर देता है। इसके लिए भी उसको पुरस्कार वगैरह मिल जाते हैं, मनचाहे पद मिल जाते हैं। आइडिया इन्वेंटर मान लिया जाता है। योग्यता व महानता का अहंकार और जबरदस्त कुलांचे मारता है।

    जो IAS हैं, उन्हीं में से चुनाव करना है कि किसको किस पद पर कहां रखा जाए, किसको कहां सचिव बनाया जाए। जो वित्त सचिव है उसे वित्त का ककहरा पता है या नहीं, यह मायने नहीं रखता। बाइचांस भगवान भरोसे यदि कोई वित्त विशेषज्ञ निकल आए तो अलग बात है। यहां भी वित्त विशेषज्ञ का मतलब यह कि किसी ने वित्त या कामर्स इत्यादि जैसे विषयों से स्नातक कर रखा हो।

    यहां तक कि सांसद व विधायक निधियों तक के बारे में भी निर्णय लेता है। मतलब यह कि ईश्वर के बाद सबसे अधिक ज्ञाता लोग भारत का IAS. इस ढांचे की सबसे बड़ी विडम्बना यह है है कि भारत में जो भी IAS होता है वह दिखावटी नौटंकी चाहे जो करे, लेकिन वह खुद ही स्वयं को सर्वज्ञाता मानता है।

    भारत में पूरा प्रशासनिक ढांचा ही भीषण रूप से सामंती, अलोकतांत्रिक व गैरजिम्मेदाराना चरित्र का है। IAS बनने की प्रक्रिया भी ऐसी है कि वह लोगों के अंदर सामंती चरित्र, गैर-जिम्मेदारानपन, अहंकार व शोषण करने की मानसिकता विकसित करती है। बेहतर लोगों को IAS बनकर देश व समाज के लिए योगदान देने की संभावना नगण्य रहती है।

    भारत का IAS लोकतंत्र को कमजोर करता है, सामंती चरित्र का होता है, योग्यता व विशेषज्ञता से लेना-देना नहीं होता है। देश व देश के लोगों के प्रति कोई जिम्मेदारी का भाव कम से कम IAS का ढांचा तो नहीं ही विकसित करता है, हां यदि वह व्यक्ति जो IAS है वह अपने व्यक्तिगत मूल्यों के आधार पर ऐसा महसूस करे तो बिलकुल अलग बात है।

    चलते-चलते

    भारतीय तंत्र में मूलभूत रूप से गंभीर खामियां होने के कारण ही भारतीय तंत्र का चरित्र सामंती व अलोकतांत्रिक है तथा आम आदमी के प्रति उपेक्षा, उपहास व गैर-जवाबदेह वाली मानसिकता कूट-कूट कर भरी है।

    चकाचौंध की बजाय विकसित देशों से भारत को बहुत कुछ सीखने समझने की महती जरूरत है।

    भारत में बहुत चिंतक लोग अपने आपको क्रांतिकारी, समाजवादी व वामपंथी मानते हुए चीन-चीन या अमेरिका-अमेरिका चिल्लाते रहते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि व आस्ट्रेलिया व यूरोप के अनेक देशों का चरित्र बेहतर समाजवादी व लोकतांत्रिक है। चीन की तथाकथित साम्यवादी व्यवस्था से बेहतर व्यवस्था रखते हैं। भले ही नारे न लगाते हों।

    कोई देश व समाज व उसके लोग वास्तव में कितने समाजवादी व लोकतांत्रिक हैं, वह उस देश व समाज के आंतरिक व व्यवहारिक ढांचों व व्यवस्थाओं का सूक्ष्म अध्ययन करने पर ही मालूम पड़ता है। कथा कहानियों भाषणों बयानों या किसी टीवी एंकर के सतही लेखों या सतही टीवी कार्यक्रमों या सेमिनारों या दस्तावेजी लिखापढ़ी की नौटंकी/प्रायोजनों से नहीं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist; He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • नीलम बसंत नंदिनी, उनकी बच्चियां व घरेलू शिक्षा –Vivek Umrao Glendenning

    नीलम बसंत नंदिनी, उनकी बच्चियां व घरेलू शिक्षा –Vivek Umrao Glendenning

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    नीलम बसंत नंदिनी का फेसबुक में प्रोफाइल है। मध्यवर्गीय-समाज की ग्रहिणी हैं। शहरी जीवन जीती हैं। घर में रहकर बच्चियों की देखभाल करतीं हैं। दो बच्चियां हैं, बड़ी बच्ची की आयु दस वर्ष व छोटी बच्ची की आयु चार वर्ष। पति NTPC में इंजीनियर हैं, इसलिए NTPC की कालोनी में आवास मिला हुआ है।

    प्रयोगशील महिला हैं। फेसबुक में बिना फालतू की विद्वता झाड़े, सरलता से लिखती हैं। जागरूक महिला हैं, विवाह के पश्चात भी पति का सरनेम नहीं लगती हैं। दो बच्चियों की माता होकर संतुष्ट व खुश हैं। जागरूक होने के बावजूद पुरुष के प्रति द्वेषभाव से ग्रस्त होकर या पूर्वाग्रह से पोस्ट नहीं लिखतीं हैं। विभिन्न कोणों से सेल्फी लेते हुए, “कैसी लग रही हूँ” टाइप की फोटो लगाकर लाइक पाने का प्रयास नहीं करती हैं, न ही ऐसी फोटो डालती हैं जिससे स्वयं को तथाकथित रूप से महिला-जागरूक-क्रांतिकारी प्रमाणित कर सकें।

    करते हुए सीखने समझने की प्रक्रिया में गतिमान हैं। इस तरह गतिमान होने में गौरव महसूस करना मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति-गति है, इसको अहंकार की श्रेणी में रखना बेमानी है।

    नीलम बसंत नंदिनी अपनी बच्चियों को बचपन से ही पर्यावरण के प्रति क्रियात्मक-जागरूक बना रही हैं। ये अपनी बच्चियों को पानी बचाएं के साथ-साथ पानी जंगल व जीव चक्र से संबंधित अन्य बातें भी प्रयोग के रूप में बताती समझाती हैं।

    इनकी बच्चियों ने नदी, तालाब व जीवों का संबंध समझते हुए स्वयं घर की बागवानी में छोटा नाला व तालाब बनाया, असली। असली तालाब का तात्पर्य हमेशा दस-बीस एकड़ का तालाब ही नहीं होता। तालाब तालाब है, भले ही वह छोटा हो।

    बच्चियों ने तालाब बनाया, तालाब में पानी भरने के लिए नाला बनाया। तालाब में व तालाब के आसपास जीवों के खिलौने रखे और वाइल्ड-लाइफ का चक्र बना दिया। फोटो में जानवर पानी के आसपास आनंद लेते हुए देखे जा सकते हैं। तालाब में कछुआ भी है। इस तालाब का बागवानी में पौधो के लिए प्रयोग भी है।

    ऐसे ही छोटे-छोटे जीवंत खेलों के द्वारा समझदार माता-पिता अपने बच्चों से मित्रवत रिश्तों का आनंद उठाते हुए जीते है तथा खेल-खेल में ही बच्चों को वास्तविक रूप से पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों के प्रति जागरूक भी कर रहे होते हैं।

    यह बच्चियां बड़े होकर भले ही तालाब न बनाएं, लेकिन तालाबों को पाटकर मकान व संपत्तियां भी नहीं खड़े करेंगीं। पानी जंगल व पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होंगी।

    यही शिक्षा है, स्कूलों में शिक्षा का माध्यम ऐसा ही होना चाहिए।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक नेतृत्व :: स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता

    देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक नेतृत्व :: स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    यह लेख “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक यायावर” सामाजिक-नेतृत्व व सामाजिक-आविष्कारों की बात करता है।

    देश, समाज व मनुष्य

    मनुष्य के बिना परिवार, समाज व देश नहीं हो सकता; जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहाँ परिवार, समाज व देश होगा ही होगा। मनुष्य परिवार, समाज व देश से बड़ा है, क्योंकि वह निर्माता है। देश व समाज की सत्ता, जीवन-मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही निर्मित, निर्धारित व परिवर्तित करता है। यही सहज सामाजिक तथ्य है; शेष राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व के लिए  तोड़मरोड़ कर निहित-स्वार्थों के लिए थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं। 

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिए   देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है, जिसका निर्माता स्वयं मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़, गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है। देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचना है। इसलिए जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है।  परिवार, देश व समाज का निर्माण व विकास करना मनुष्य की जिम्मेदारी है।

    जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की पुस्तकों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा। यही वास्तविक व व्यापक परिवर्तन होगा। मानव निर्मित सत्ता तंत्रों को चलाने वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है। 

    नेतृत्व

    “मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के द्वारा व्यापक सामाजिक-परिवर्तन के लिए  सामाजिक-नेतृत्व प्रस्फुटित नहीं होता; सामाजिक-नेतृत्व राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम समाज की मौलिकता व गुणवत्ता से स्वतःस्फूर्त रूप में प्रस्फुटित होता है“

    राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भी सामाजिक-अवतार नहीं होता। जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्हीं तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जाने का साहस व दृष्टि हो ही नहीं सकती है। इसीलिए तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते हैं। ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।

    सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह कभी भी मानव समाज का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता। क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह गढ़ी गईं है, जिनमें सबसे नीचे के आधार सबसे चौड़े और सबसे ऊपर की चोटियाँ सबसे नुकीली व सबसे कम चौड़ी होती हैं।

    मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाते हुए, निरंतर दबाए रहते हुए ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिए मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, न ही व्यापक-समाधान की दृष्टि रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।

    भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिष्ठापित किए गए हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।

    विश्व में अन-आयुधिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलते हुए ही अस्तित्व में आए हैं।

    सामाजिक-नेतृत्व

    सामाजिक-परिवर्तन व निर्माण कर पाने में सक्षम नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण मौलिकता, गुणवत्ता, दूरदर्शिता, स्वतः स्फूर्ति के मिथकों के प्रयोजन बिना ही होता है। भारत जैसे बड़े देश व समाज में स्वतः स्फूर्त व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण न हो पाने के प्रमुख कारण जाति-व्यवस्था, ईश्वरीय अवतारों व इन अवतारों का धरती पर ईश्वरीय व्यवस्था के प्रयोजन के कारण अवतरित होने की अवधारणाएं, साहित्यिक काव्यों/ग्रंथों को संपूर्ण ज्ञान व ईश्वरीय मानने की अवधारणा, पोथियाँ, पौराणिक कथाएं व सामंतवादी मानसिकता आदि रहे हैं।

    — जाति

    जाति-व्यवस्था के कारण सामाजिक-नेतृत्व का मूल-आधार पुरुषार्थ, कर्म व क्षमता आदि जैसे तत्व नहीं हो पाये। ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य जाति के लोगों के पास ही सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक नेतृत्व के जन्मजात अधिकार रहे। इसीलिए नेतृत्व की दावेदारी समाज की मौलिकता व गुणवत्ता के बजाय जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था के कारण समाज के बहुत ही छोटे हिस्से में संकुचित रही।  जन्मजात नेतृत्व की दावेदारी करने वाले समाज के इस हिस्से की अधिकतर ऊर्जा जाति-व्यवस्था को ईश्वरीय प्रयोजन सिद्ध करते रहने के लिए कपोल कल्पित ईश्वरीय गाथाएं, मिथक व कपोल कल्पित ईश्वरीय अवतार प्रायोजित करने व गढ़ने में ही लगती रही। 

    सामाजिक-नेतृत्व के सतही व अवैज्ञानिक होने, ढोंग व मिथकों आदि के द्वारा प्रायोजित होते रहने के कारण मौलिक, गुणवान् व दृष्टिवान् सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं का भ्रूण भी नहीं पनप पाया।

    सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग की अवधारणा, जन्मजात जाति-व्यवस्था, धर्म का क्षय होने पर धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के द्वारा अवतार लेने की अवधारणा, मंत्रों व ईश्वरीय नाम के जाप द्वारा सुविधा/प्रतिष्ठा/समृद्धि आदि का मनचाहा वरदान या सिद्धि प्राप्त कर पाने की अवधारणा, सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य सत्य में देवतुल्य था; आदि आदि जैसी विभिन्न अवैज्ञानिक अवधारणाओं ने भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की भ्रूण-संभावना को ही नष्ट कर दिया और भ्रूण-संभावना का यह नष्टीकरण परंपरा में हजारों वर्षों तक व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक मानसिकता आदि के विभिन्न स्तरों में गहरे अनुकूलन को प्रायोजित व स्थापित करने के साथ होता रहा।

    ज्ञान व सामाजिक-नेतृत्व के लिए ब्राह्मण जाति में पैदा होकर पोथियाँ, पुराण, महाकाव्य, काव्य आदि रट कर उनको मुंह से बोलना व उनमें बताए हुए कर्मकांड आदि को करना ही पर्याप्त रहा। मिथकों के प्रायोजन; व प्रायोजित मिथकों पर शाब्दिक व साहित्यिक विशेषज्ञता आदि के आधार पर सामाजिक-नेतृत्व का स्तर व प्रतिष्ठा निर्धारित होती रही। ब्राह्मण वर्ग की अधिकतर ऊर्जा इन्ही सबमें लगती रही और ऐसा करने को ही संस्कृति, संस्कार, पुरुषार्थ, ज्ञान, योग्यता आदि का नाम दे दिया गया।

    भारत की सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी का सबसे प्रमुख कारण यही रहा कि क्षत्रिय वर्ग को दरबारी भाटों, चाटुकारों व मिथक-साहित्य विशेषज्ञों ने झूठी कहानियाँ व मिथक गढ़ कर ही ईश्वरत्व रूप में जन्मजात पुरुषार्थी, निर्भय, रक्षक, शासक, राजनैतिक दूरदर्शिता व दृष्टिकोण आदि से संपन्न प्रायोजित कर दिया। गढ़े हुए मिथकों की पुष्टि करने के लिए ब्राह्मण वर्ग ने अनेकों पौराणिक कथाएं परंपरा में सत्य कथाओं के रूप में प्रायोजित करके, राजनैतिक सत्ता से अपना संबंध स्थापित करने के लिए क्षत्रिय वर्ग के द्वारा राजनैतिक सत्ता के भोग को ईश्वरीय प्रावधान के दायित्व का निर्वहण प्रायोजित कर दिया।

    यदि पौराणिक कथाओं को संज्ञान में लिया जाए तो मानव समाज की समस्यायें समाधानित करने के लिए, मानव समाज को विकास की ओर गतिमान करने के लिए ईश्वर खुद अवतार के रूप में आवश्यकता पड़ने पर बारंबार सामाजिक-नेतृत्व करने आता रहा। इस प्रकार सामाजिक-नेतृत्व मनुष्य के वास्तविक पुरुषार्थ एवम् समझ की क्षमता से अर्जित न होकर ईश्वरीय योजनाओं के निर्वाहक या परिपूरक के रूप में प्रायोजित व स्थापित रहा। इन मिथकों से भारतीय समाज में अकर्मण्यता प्रतिष्ठित हुई और मौलिक-गुणवत्ता की निरंतर भ्रूणहत्या होती रही।

    समय के साथ अवतारों के बजाय अवतारों की गाथाएं गढ़ने वाले, अवतारों की चर्चा करने वाले, ग्रंथों/महाकाव्यों/काव्यों आदि को रटने वाले, धार्मिक अनुष्ठानों व कर्मकांडों आदि को करने वाले ही सामाजिक-नेतृत्व के रूप में प्रायोजित व स्थापित किए जाने लगे। ब्राह्मण व क्षत्रिय को सिर्फ जाति विशेष में पैदा होने के कारण ही ‘सामाजिक-नेतृत्व’ की मान्यता दी जाती रही। परिणामस्वरूप ‘सामाजिक-नेतृत्व’ भी जन्म के आधार पर प्रायोजित होता रहा।

    भारत में ‘सामाजिक नेतृत्व’ लोगों में ‘आभामंडल-सत्ता’ स्थापित करने का और विभिन्न सत्ताओं द्वारा प्रायोजित होने का ही रहा है, इसीलिये ‘सामाजिक नेतृत्व’ और ‘सत्ताओं’ का आपस में बहुत गहरा व विश्वसनीय रिश्ता रहा है। यही कारण रहा कि भारत में शताब्दियों के बाद आज तक भी भारतीय समाज में स्वत: स्फूर्त ‘सामाजिक नेतृत्व’ आकार नहीं ले पाया।

    चूंकि समाज में जाति-व्यवस्था के कारण स्वतः स्फूर्त, वास्तविक-गुणवान् व मौलिक नेतृत्व विकसित होने की परंपरा नहीं बनने दी गई इसीलिए समाज के लोग धूर्त, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी, कामचोर और अवसरवादी आदि होते चले गए, क्योंकि जाति-व्यवस्था के निरंतर स्थापना-प्रयोजन के लिए यही आधारभूत मूल्य व तत्व होते हैं।  जाति-व्यवस्था के कारण भारतीय समाज कभी देश व समाज के प्रति ईमानदार व प्रतिबद्ध नहीं हो पाया केवल व्यक्तिगत लिप्साओं, स्वार्थों, भोगों, विलासिताओं, बाजार के उपभोक्तवाद पर आधारित उपभोक्ता बने रहने की व्यक्तिगत आर्थिक सुरक्षा आदि स्वार्थ-केंद्रित महात्वाकांक्षाओं के लिए प्रयत्न करना ही जीवन के मायने मान लिया गया।

    भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की वास्तविकता समझने के लिए एक कहानी को ही समझना पर्याप्त है। महान् गुरू के रूप में स्थापित द्रोणाचार्य ने अद्वितीय प्रतिभाशाली किशोर एकलव्य के दाहिने हाथ का अगूँठा केवल इसलिए कटवा दिया क्योंकि एकलव्य आदिवासी था और द्रोणाचार्य अपने शिष्य, जो एक बहुत बड़े राज्य का राजकुमार था, को महान् धनुर्धारी के रूप में प्रायोजित करना चाहते थे। यह कहानी उस समाज की है जो गुरू-शिष्य परंपरा की संस्कृति की बात करता है और जिस समाज ने द्रोणाचार्य को महानतम गुरू का स्थान दे रखा है। द्रोणाचार्य बहुत कुशल धनुर्धारी हो सकते थे लेकिन उन्होंने सामाजिक गुरू होने के मूल्यों का ही पतन किया और भारतीय समाज को एकलव्य जैसे अद्वितीय धनुर्धारी से वंचित कर दिया। भारतीय समाज ने विभिन्न स्तरों व क्षेत्रों में अगणित एकलव्यों के अगूँठे काटे हैं। काश! यदि इन एकलव्यों के अगूँठे नहीं काटे गए होते, काश! विभिन्न स्तरों पर प्रायोजित लोग स्थापित नहीं किए गए होते तो आज भारत को प्राचीन-काल की गाथाएं गाकर खुद को महान् सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती, न ही भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहता और न ही आज पिछलग्गू होता।

    — स्त्री

    समाज का बहुत बड़ा हिस्सा शूद्र-वर्ण में रखा गया, जिसको जीवन के मौलिक अधिकार पशुओं जैसे तक नहीं थे। शूद्र-वर्ण के अतिरिक्त जो वर्ण थे, उन वर्णों की भी लगभग आधी जनसंख्या अर्थात् स्त्री को पशु और वस्तु की श्रेणी में रख दिया गया। इस प्रकार समाज का पाँच में से चार जैसा बहुत बड़ा हिस्सा परंपरा में अपनी मौलिकता की भ्रूण-हत्या व अघोषित दासता का बर्बर-शोषण ही झेलता रहा। बचा-खुचा एक-पाँचवा हिस्सा परंपरागत मूर्खतापूर्ण सीमा में ही तथाकथित सामाजिक-नेतृत्व देता रहा।

    प्रायोजित सामाजिक-नेतृत्व ने स्त्री, जो जीवंत व चेतनशील मनुष्य है, उसको वस्तु के रूप में प्रायोजित कर दिया। मनुष्य के रूप में स्त्री के अस्तित्व व चेतनशीलता का कोई वजूद ही नहीं रहने दिया गया। स्त्री को पुरुष की अघोषित संपत्ति बना दिया गया। स्त्री जिस पुरुष की संपत्ति है, उस पुरुष के अस्तित्व में ही अपने अस्तित्व को बिना सवाल विलीन करने व ऐसा करने में अपने जीवन का लक्ष्य, सफलता व गौरव मानने के लिए निरंतर अनुकूलित किया जाता रहा।

    जो संस्कृति स्त्री को देवी मानने का दावा करती है उसी के समाज में स्त्री को प्रेम करने से वंचित कर दिया गया, अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार नहीं दिए। यहाँ तक कि स्त्री को अपना पति तक चुनने का अधिकार नहीं रहा। जिस स्त्री को देवी कहा गया उसी को पर्दे में धकेल दिया गया, शिक्षा से वंचित रखा गया व संपत्ति में अधिकार नहीं दिए गए ताकि वह सदैव पुरुष की दासी बनी रहे। स्थिति की भयावहता की कल्पना इस बात से की जा सकती है कि आज भी प्रतिवर्ष लाखों स्त्रियों की हत्या माता के गर्भ में ही खुद उनके ही माता-पिता द्वारा कर दी जाती है। आज भी हजारों स्त्रियों की हत्या उनके ही माता-पिता व परिवार के द्वारा केवल इसलिए कर दी जाती है, क्योंकि स्त्री अपने माता-पिता व परिवार की इच्छा के विरुद्ध जाकर अपनी इच्छा से प्रेम-विवाह करना चाहती है। 

    स्त्री जिसे देवी कहा गया वही स्त्री प्रेम करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पर्दा न करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पुरुष की उपस्थिति में खुलकर खिलखिलाकर हँस ले तो वह चरित्रहीन व कुलटा।  स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया लेकिन स्त्री के द्वारा पुरुष के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व देखने को ही उसका देवी होना प्रायोजित कर दिया गया। स्त्री के द्वारा परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष और पुरुष के परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष, फिर भी स्त्री पुरुष की अर्धांगिनी। स्त्री के गृहस्थ कार्यों को श्रम की श्रेणी में नहीं रखा गया जबकि वह संतान की जननी व पालन पोषण करने वाली भी है। स्त्री की कर्मशीलता को पुरुष के कारण होना मान लिया गया परिणामस्वरूप स्त्री के द्वारा सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं के भ्रूण की भी संभावना की स्थिति समाप्त हो गई। यही कारण हैं कि बलात्कार होने पर या स्त्री के साथ दुर्व्यवहार होने पर, समाज स्त्री को ही दोषी ठहराता रहा है। चूंकि स्त्री को मनुष्य माना ही नहीं गया, इसीलिए स्त्री के पहनावे या बोलचाल या व्यवहार के तरीके को बलात्कार का कारण ठहराया जाता है। इसको कुछ इस रूप में देखा जाए जैसे कोई वस्तु यदि रात में घर के बाहर पड़ी है तो कोई भी उसे चुराकर ले जा सकता है, उसी प्रकार स्त्री यदि रात में घर से बाहर है तो कोई भी उसके साथ बलात्कार कर सकता है। कोई महंगी वस्तु यदि छिपाकर न रखी जाए तो उस पर चोरों की नजर पड़ी रहेगी और वे चुराने का प्रयास करेंगे, वैसे ही स्त्री यदि छोटे कपड़े पहने है तो पुरुष स्त्री का स्त्रीत्व चुराएगा। एक समाज जो स्त्री को देवी मानता है, वही समाज स्त्री के बारे में सब कुछ बहुत ही अधिक वीभत्सपूर्ण घिनौनेपन और असंवेदनशीलता से तय करता है, जैसे स्त्री निर्जीव-वस्तु हो।

    — शाब्दिक/कृत्रिम तार्किकता व प्रायोजित विद्वता बनाम कर्मकांड व संस्कृति 

    प्रकृति व ईश्वर को समझने का दावा करके प्रतिपल कर्मकांडों को रचने व महिमामंडित करने वाली संस्कृति वास्तव में केवल दर्शन की शाब्दिक व कृत्रिम तार्किकता की अव्यावहारिक विद्वत्ता ही होकर रह गई। यदि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था नहीं होती, स्त्री को मनुष्य माना गया होता और दर्शन को शाब्दिक तार्किकता व कृत्रिमता आदि से ऊपर उठकर समझने व जीने की चेष्टा की गई होती तो भारतीय समाज एक ढोंगी, कुंठित व पिछलग्गू समाज होने के बजाय विश्व के वास्तविक सर्वश्रेष्ठ समाजों में से होता और वास्तव में ही विश्व को विकास व समृद्धि के सार्थक मायने समझाते हुए समाधानित कर रहा होता। 

    भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व आज तक भी मौलिकता, गुणवत्ता व पुरुषार्थ से इतर अवसरवादिता, छद्म, ढोंग, मोहकता व आकर्षण आदि के प्रायोजन से देश, समाज व आने वाली पीढ़ियों की कीमत पर, पूरी निर्लज्जता और निरंकुशता के साथ प्रायोजित किये जाते हैं।

    सामाजिक-नेतृत्व को परंपरा में विभिन्न सत्ता केंद्रों द्वारा प्रायोजित व स्थापित करते रहने के कारण भारतीय समाज अपने लिए  ही क्रूरता की हद तक असंवेदनशील समाज के रूप में दृढ़ होता गया। बचपन से ही अपनी कमजोरियों को देखने, उनके कारणों को समझने और उनको दूर करने की चेष्टा करना सिखाए जाने के बजाय ढोंगो व सतही प्रायोजनो से दूसरों को निर्दयता व असंवेदनशीलता पूर्वक अपने से खराब साबित करके खुद को अच्छा एवम् कर्म व पुरुषार्थ साबित करने की तकनीक सिखाई जाती है। यह मानसिकता ही बचपन से ही जाने-अनजाने चाहे-अनचाहे समाज में भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता, क्रूरता व सामंतवादिता के बीज को पोषित करती रहती है। 

    हम यदि खुद के जीवन को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि हमारा अपना पूरा का पूरा जीवन ही झूठ और दिखावे का पुलिंदा है।  हमें बचपन से ही दिखावे की पुनरुक्ति के लिए इस तरह का अभ्यास करवाया जाता है कि हम खुद अपने आपको ही भूल जाते हैं और अपने ढोंग, खोखलेपन, निर्दयता, असंवेदनशीलता, अवैज्ञानिक-तर्कशीलता व अतथ्यात्मकता आदि को ही अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकता और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि व उद्देश्य मानने लगते हैं। हमें पता ही नहीं  चलता और हम सड़ने लगते हैं।  जब हमें अपने सड़ने की बदबू आती है, हम बदबू का कारण बाहर खोजते हैं।  हम बदबू का कारण बाहर इसलिए नहीं खोजते क्योंकि हमें बदबू का कारण वास्तव में खोजना होता है।  ढोंगो और प्रायोजन के आदी हम वास्तव में अपने से अधिक बदबूदार को खोजना चाहते हैं ताकि खुद को उसकी तुलना में खुशबूदार साबित करके खुद को बेहतर प्रायोजित कर खुद को महान् मान लें। यही कारण है कि हम दिन-प्रतिदिन और अधिक सड़ते जाते हैं लेकिन फिर भी दूसरों की तुलना में खुद को खुशबूदार मानते हैं। 

    — स्वयं के प्रति असंवेदनशीलता

    यह हमारी स्वयं के प्रति घोर निर्दयता व असंवेदनशीलता ही है कि हम वास्तविक खुशबू में जीने के प्रयास करने के बजाय अपनी सड़ाँध व बदबू को ही खुशबू के रूप में प्रायोजित करने में अपनी ऊर्जाएं लगाते हैं। हम पूरा जीवन नशे व बेहोशी में जीते हैं, और बेहोशी में जीवन जीने को हम जीवन की व्यावहारिकता कहते व साबित करते हैं; जबकि  वास्तव में यह हमारा अपने खुद के प्रति ही और अधिक असंवेदनशील होना ही है। 

    हम स्वयं को विकसित करने के लिये, स्वयं को बेहतर बनाने के लिए  कर्म, प्रयास या चेष्टा नहीं करना चाहते हैं। स्व-निर्माण की प्रसव पीड़ा नहीं झेलना चाहते हैं।  इसीलिए  हम अपने जीवन के लिए , परिवार के लिए , समाज के लिए  व देश के लिए  ऐसे सामाजिक-नेतृत्व प्रायोजित करते हैं; जो हमारे जैसे ही हों। सामाजिक-नेतृत्व छोड़िए हमने तो अपने ईश्वर भी अपने ही जैसे बना रखे हैं। 

    सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण वास्तविक कर्म से हुआ करता है। ढोंग व सतहीपन से युक्त विभिन्न स्तरों पर अनुकूलताओं के प्रयोजन से नहीं। भारत में पारंपरिक रूप से सामाजिक-नेतृत्व समाज की बेहतरी के लिए  किए गए पुरुषार्थ, कर्म, सक्रिय चिंतन, जीवंत कर्म-अनुभव आदि मूल्यों के आधार पर नहीं स्वीकृत किए गए हैं। परिणामस्वरूप भारतीय समाज ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक विकास व वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि में बहुत ही पीछे रह गया। शताब्दियों तक राजनैतिक गुलाम रहा और आज भी मानसिक गुलाम है।

    — स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व की आवश्यकता

    भारत सामाजिक रूप से बहुत अधिक विद्रूपताओं और विविधताओं का देश है। इसलिए  भारत का राष्ट्रीय सामाजिक-नेतृत्व वही कर सकता है जो भारत को भारत की विद्रूपता और विविधताओं के साथ स्वीकारे और फिर सबको साथ लेकर चलते हुए बढ़े।  सामाजिक नेतृत्व का सामाजिक सरोकारों से बहुत गहरा व स्पष्ट संबंध होता है, बिना सामाजिक सरोकारों व सामाजिक संबंधों को समझे कोई भी सामाजिक नेतृत्व नहीं हो सकता है।  भारतीय समाज को शताब्दियों के अनुकूलन से बाहर आकर अपनी वास्तविक स्थिति, गति को स्वीकारते हुए विभिन्न स्तरों पर वास्तविक परिवर्तकों को “सामाजिक-नेतृत्व” के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है।

    शाब्दिक व दार्शनिक तर्कशीलता के मानदंडों में अद्वितीय व विलक्षण संस्कृति वाला समाज व्यावहारिक धरातल की वास्तविकता में बहुत ही अधिक अमानवीयता व खोखलेपन को ही पोषित करता व जीता रहा। दर्शन को व्यवहारिक-जीवंतता के स्थान पर केवल शाब्दिक तर्कशीलता तक ही सीमित किया जाता रहा। वास्तव में भारतीय समाज की सबसे बड़ी ऋणात्मकताएं ढोंग, अमानवीयता व असंवेदनशीलता हैं और ये तत्व ही मूलभूत कारण हैं कि भारतीय समाज बहुत ही वीभत्सता के स्तर तक आंतरिक रूप से सड़ा हुआ है। फिर भी समाज के लोग जो खुद अपने ही जीवन में खोखले होते हैं, रटे-रटाए दर्शन की कृत्रिम शाब्दिक-तार्किकता से अपने को व अपनी संस्कृति को जबरन महान् सिद्ध करने में ही अपनी ऊर्जा लगाने में गौरव का अनुभव करते हैं। गीता को महान् बताने वाला समाज, कर्म को ही उपेक्षित रखता आया है।

    यदि भारत को वास्तव में आगे बढ़ना है तो पूरी कठोरता व इच्छाशक्ति के साथ बिना लाग-लपेट के सामाजिक-नेतृत्व के प्रायोजनों की परंपरा व अनुकूलता से दृढ़तापूर्वक बाहर निकलकर वास्तविक स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व के प्रस्फुटीकरण का बीजारोपण करना होगा। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं।

    यह लेख “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक यायावर” सामाजिक-नेतृत्व व सामाजिक-आविष्कारों की बात करता है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • समाजवादी पार्टी व बहुजन समाजवादी पार्टी गठबंधन बनाम लोकसभा-2019 व विधानसभा-2022

    समाजवादी पार्टी व बहुजन समाजवादी पार्टी गठबंधन बनाम लोकसभा-2019 व विधानसभा-2022

    Vivek “सामाजिक यायावर”
      संस्थापक व मुख्य-संपादक, ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
    मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय-जर्नलिस्ट

    उत्तरप्रदेश में संसदीय-उपचुनाव में बसपा द्वारा सपा प्रत्याशियों को समर्थन

    संसदीय उपचुनावों के संदर्भ में बसपा की अघोषित नीति रही है कि अपवाद घटनाओं को छोड़कर संसदीय उपचुनावों में अपना प्रत्याशी खड़ा नहीं करती रही है। इसलिए हाल में ही उत्तरप्रदेश के संसदीय उपचुनाव में बसपा द्वारा अपना प्रत्याशी न खड़ा करना विशेष घटना नहीं थी। चूंकि बसपा की नीति रही है कि संसदीय उपचुनावों में प्रत्याशी खड़ा नहीं करना है इसलिए उत्तरजीविता की अतिगंभीर विकट स्थिति में सपा प्रत्याशी को समर्थन दे देने को मैं सपा-बसपा के मध्य लंबी दूरी के गंभीर व गठबंधन की संभावनाओं को कम से कम अभी तो नहीं ही देख पा रहा हूँ। उत्तरजीविता की अतिगंभीर विकट स्थिति में बसपा द्वारा सपा प्रत्याशी को समर्थन दे देने को मैं गठबंधन हो जाना भी नहीं मानता। अभी की स्थितयों में मैं इसे लोकसभा उपचुनाव व राज्यसभा के चुनाव से जोड़कर तात्कालिक राजनैतिक लेनदेन के रूप में देख रहा हूँ।

    सपा-बसपा गठबंधन

    सपा-बसपा गठबंधन के रास्ते में मुझे कई गंभीर व्यवहारिक दिक्कतें दीखती हैं। सपा-बसपा के साथ खड़े होने को मैं इन दोनों पार्टियों की सामाजिक, सामाजिक-न्याय के संदर्भ में परस्परता व गंभीर प्रतिबद्धता, विश्वसनीयता व राजनैतिक दूरदर्शिता की बजाय उत्तरजीविता की अतिगंभीर विकट परिस्थिति की विवशता के कारण होने वाला जुड़ाव मानता हूँ। 

    ऐसा भी नहीं है कि इन दोनों पार्टियों ने 2014 के बाद या 2017 की फरवरी के बाद सामाजिक-न्याय के लिए साथ मिलकर चलने की योजना के तहत जमीन पर अपने कार्यकर्ताओं से संवाद या कार्यशालाओं का घोषित/अघोषित संयुक्त अभियान चलाया हो, जिसके कारण समय लगा और अब दोनों पार्टियां जुड़ रही हैं। चुनाव जीतने की कवायद से इतर समाज के लोगों के लिए सपा-बसपा गठबंधन का सामान्य कार्यक्रम एजेंडा तक नहीं है, जो भविष्य में आम चुनावों में सरकार न बनने की स्थिति की बावजूद करते रहा जाए।

    ऐसा भी नहीं है कि सपा-बसपा गठबंधन के कारण फेसबुक, व्हाट्सअप जैसे सोशल मीडिया में सपा-बसपा के कार्यकर्ताओं व समर्पित समर्थकों में वैचारिक परिपक्वता का विकास हुआ हो। दोनो ओर के ही लोग इसे सत्ता-प्राप्ति के लिए राजनैतिक चतुराई के रूप में देख रहे हैं। इसलिए उनके समर्थन व विरोध के केंद्र स्थानांतरित हो गए हैं। मतलब यह कि जैसे पहले सपा या बसपा का भी विरोध करना पड़ता था तो अब केवल कांग्रेस व भाजपा का विरोध करना है।

    यह वैसे ही है जैसे बिहार में भाजपा समर्थकों के लिए नितीश कुमार अच्छे थे व लालू यादव के समर्थकों के लिए नितीश कुमार बुरे थे। जैसे ही यह दो धुरंधर विरोधी जुड़े तो लालू समर्थक नितीश कुमार की प्रशंसा करने लगे व भाजपा समर्थक नितीश कुमार को बुरा कहने लगे। जब नितीश कुमार ने लालू यादव से अलग होकर सरकार बनाई तो नितीश लालू समर्थकों के लिए बुरे व भाजपा समर्थकों के लिए अच्छे हो गए।

    ऐसे ही आज सपा-बसपा में गठबंधन होने की संभावनाओं को देखते हुए बहुत लोगों को सामाजिक-न्याय व सोशल इंजीनियरिंग दिख रही है। यदि भविष्य में सपा व बसपा अलग हुए तो यही लोग एकदूसरे को बुरा कहने लगेंगे गरियाने लगेंगे।

    खैर सामाजिक-न्याय, सामाजिक-प्रतिबद्धता व राजनैतिक दूरदर्शिता जैसे गंभीर व सूक्ष्म विषयों को परे रख कर सपा-बसपा गठबंधन के संदर्भ में कुछ व्यवहारिक तथ्यों पर गौर कर लिया जाए।

    सपा-बसपा गठबंधन व लोकसभा-2019

    उत्साही कार्यकर्ता व समर्थक लोग गठबंधन को बनाए रखने के लिए मायावती को प्रधानमंत्री व अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की बात कर रहे हैं। मुझे यह पूरी कवायद मायावती के अहंकार व महात्वाकांक्षा को सहलाते हुए गठबंधन को स्थापित करने के लिए लगती है। लेकिन मुझे यह कवायद लंबे समय के लिए व्यवहारिक रूप से सफल दीखती नहीं है क्योंकि मायावती कोई नौसिखिया खिलाड़ी नहीं है जो उनको प्रधानमंत्री वाले लालीपाप से बहलाया जा सकता है।

    मूलभूत व्यवहारिक प्रश्न यह है कि मायावती प्रधानमंत्री बनेंगी कैसे? बसपा व सपा उत्तरप्रदेश के बाहर हैं नहीं। इन दोनों ही पार्टियों ने कभी दूरदर्शिता व गंभीरता के साथ उत्तरप्रदेश से बाहर ठोस रूप से पांव फैलाने का प्रयास किया ही नहीं।

    उत्तरप्रदेश के बाहर विधायकी की जो दो चार सीटें उत्तरप्रदेश में बसपा के सरकार में होने या सरकार बनाने की संभावनाओं के आभामंडल के कारण पहले कभी बसपा द्वारा जीतीं भी गईं थीं, समय के साथ वह सब भी एक तरह से खतम ही हो चुका है, हवा-हवाई भले ही कुछ-कुछ कहीं झाड़न-पोछन शेष हो।

    2019 के लोकसभा आमचुनावों में पहली समस्या सीटों के बटवारे व किस पार्टी को कौन-कौन सी सीटें मिलें इत्यादि मसलों की आएंगी। दोनों पार्टियों का अपना भिन्न वोटबैंक है, अपने-अपने समर्पित कार्यकर्ता हैं, अपने-अपने क्षत्रप हैं।

    अभी तक सपा बसपा पूरे राज्य में अपने लोगों को टिकट देतीं थीं। गठबंधन होने पर बहुत ऐसे लोगों को टिकट नहीं मिलेगा जिन्होंने अपनी-अपनी पार्टियों को अपना जीवन दिया होगा, अपने इलाके में पकड़ अच्छी है तथा पहले टिकट मिल चुके होंगे तथा बहुत ऐसे भी लोग होंगे जो पहले जीत भी चुके होंगे। ऐसे लोग गठबंधन के साथ दिल से कितना रह पाएंगे यह बड़ा मसला है। भाजपा इन लोगों को नहीं लुभाएगी इसकी क्या गारंटी है। मान लिया जाए कि ये लोग भाजपा के साथ नहीं भी जाएंगे तो गठबंधन के प्रत्याशी का कितना वास्तव मे साथ देंगे या दे पाएंगे यह भी बड़ा मसला है।

    मान लेते हैं कि सीटों का बटवारा हो गया, कौन किस सीट से लड़ेगा यह भी तय हो गया। मान लेते हैं कि किसी क्षत्रप या कार्यकर्ता या समर्थक ने गड़बड़ नहीं की, सब के सब आदर्श अनुशासित रहे।

    मान लेते हैं कि सपा बसपा के स्थानीय व क्षेत्रीय क्षत्रप टिकट न मिलने के बावजूद, भाजपा की लुभावनी रणनीतियों के बावजूद गठबंधन के प्रत्याशियों की जीत के लिए जान लड़ा देते हैं। तब भी ऐसा तो नहीं है कि भाजपा एक भी सीट नहीं जीतेगी। मान लेते हैं कि सबकुछ मानमाफिक होता चला गया तथा सपा बसपा के सितारे बहुत बुलंद रहे इसलिए दोनों मिलकर 60-70 सीटें जीत लेती हैं। यह भी मान लेते हैं कि सपा को उस समय भी मायावती को प्रधानमंत्री बनाने में कोई आपत्ति नहीं।

    अब सवाल यह है कि 60-70 सीटों से आज की राजनैतिक परिस्थितियों व मानसिकता में प्रधानमंत्री कैसे बना जा सकता है। मान लीजिए कि देश के दूसरे राज्यों के क्षेत्रीय दलों का भानुमती का कुनबा जोड़ जाड़ कर किसी तरह केंद्र में सरकार बन भी गई और सभी क्षेत्रीय दल मायावती को प्रधानमंत्री मान भी लिए। तब भी 30-35 सांसदो वाली मायावती कितने दिनों तक प्रधानमंत्री रह पाएंगी।

    लोकसभा चुनाव होंगे 2019 में और उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे 2022 में। क्या तीन साल तक 30-35 सांसदो वाली मायावती की केंद्र सरकार निर्बाध रूप से चलती रहेगी। मतलब यह कि भारत के नेता, कार्यकर्ता व लोगबाग रातोंरात परिपक्व हो जाएंगे।

    यह तो बात हुई तब की जबकि मायावती प्रधानमंत्री किसी मिरैकल से बन जाएं।

    अब भिन्न स्थिति की कल्पना करते हैं। मान लेते हैं कि सपा बसपा की सीटें 60-70 की बजाय 40-50 सीटें ही आ पाती हैं तो दूसरी क्षेत्रीय पार्टियां अपने नेता को प्रधानमंत्री क्यों न बनाना चाहेंगी। जब विचार कर ही रहे हैं तो दोनों मिलकर 20-30 सीटें ही जीत पाएंगी ऐसी भी कल्पना करके विचार करना चाहिए।

    सपा-बसपा गठबंधन व विधानसभा-2022

    विधानसभा के लिए दो परिस्थितयां हो सकती हैं। मायावती 2019 में प्रधानमंत्री बन जाती हैं लेकिन कुछ महीने बाद या साल भर बाद या दो साल बाद ऐसी स्थिति आती है कि वे प्रधानमंत्री नहीं रहतीं हैं। तब क्या वे 2022 में उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना चाहेंगीं?

    इस प्रश्न से भी बड़ा व बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि 2019 में मायावती प्रधानमंत्री नहीं बन पाती हैं तो क्या वे 2022 में उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहेंगी। मायावती कोई छोटी बच्ची तो हैं नहीं जो उनको 2024 में प्रधानमंत्री होने का लालीपाप देकर बहलाया जा सकता है।

    विधानसभा चुनावों में फिर सीटों के बटवारे का मसला आएगा। ऐसा भी तो होगा कि कार्यकर्ताओं को यह लगे कि सरकार तो बन ही रही है तो अपनी पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपनी पार्टी की सीटों की संख्या अधिक करने के चक्कर में गठबंधन होने के बावजूद सहयोगी पार्टी के प्रत्याशियों पर ध्यान न दें या हरवाने का षड़यंत्र रचें।

    भाजपा व संघ

    भाजपा के पास केंद्र की सरकार है। देश के बहुत राज्यों में राज्य-सरकारें हैं। मीडिया है। संसाधन है। रणनीतियां है। देश भर में जमीनी व अनुशासित कैडर है। लोगों से संवाद स्थापित करने का व्यवस्थित व मजबूत ढांचा है। नरेंद्र मोदी व अमित शाह की विश्वसनीय व चुनावी-रणनीतिकार जोड़ी है।

    भाजपा छोटी-छोटी पार्टियों को अपने साथ इसलिए जोड़ती है क्योंकि इन पार्टियों के कारण कुछ सीटों में कुछ हजार वोट भी मिल गए तो सीटें निकल जाती हैं। भाजपा किसी के साथ भी गठबंधन करे भाजपा का कैडर इतना अनुशासित है कि गठबंधन में किसी भी पार्टी के किसी भी व्यक्ति को टिकट मिले उसको जिताने में ताकत लगा देता है।

    उत्तरप्रदेश से बाहर ही देश भर में भाजपा की लगभग 200 सीटें हैं। भाजपा की रणनीतियों के कारण अनेक राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां दिन ब दिन कमजोर होती जा रहीं हैं।

    ऐसी स्थितियों में मायावती के प्रधानमंत्री बन पाने की संभावनाएं कितनी हो सकती हैं, कितने समय के लिए प्रधानमंत्री बन सकतीं हैं। इन बातों का प्रभाव उत्तरप्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव व सपा-बसपा गठबंधन में मूलभूत रूप से पड़ना है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.