सामाजिक न्याय :: जाति-व्यवस्था-सामाजिक-आरक्षण बनाम संवैधानिक-आरक्षण

पुस्तक "मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर" से

(सामाजिक यायावर 'विवेक उमराव' द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारहवें महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)


मित्र : आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं?

नोमेड : जी बिलकुल।


मित्र : क्यों?

नोमेड : क्योंकि संवैधानिक-आरक्षण, शोषक-वर्गों द्वारा शोषित-वर्ग के साथ सैकड़ों वर्षों तक लगातार प्रति क्षण की गई क्रूरता व बर्बरता का सक्रिय माफीनामा है। और साथ ही एकमात्र औजार है, जिससे जाति-व्यवस्था के पारंपरिक अन्याय को सामाजिक-न्याय में बदला जा सकता है।


मित्र : क्या आपकी रोजी-रोटी, व्यवसाय आदि में संवैधानिक आरक्षण का योगदान है?

नोमेड : बिलकुल नहीं, मैं ऐसा कोई व्यवसाय नहीं करता,  मैं ऐसी कोई नौकरी नहीं करता जिस तक पहुंचने के लिए  मुझे संवैधानिक आरक्षण मिला हो। मेरी क्रियाशीलता, मेरी गतिविधियों, मेरी सोच, मेरी समझ, मेरे व्यक्तित्व आदि में संवैधानिक आरक्षण का कोई योगदान नहीं रहा। मैंने बचपन से लेकर आज तक संवैधानिक आरक्षण की रोटी व सुविधा नहीं खाई। मेरे पिता की रोजी-रोटी, आर्थिक-आय आदि में उनको कभी संवैधानिक आरक्षण नहीं मिला। मेरी पत्नी को नहीं मिला। मेरी संतानों को नहीं मिलेगा।


मित्र : फिर भी आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं, क्यों?

नोमेड : क्योंकि मानवता, संवेदना, न्याय आदि तत्व समाज, देश, देश की भावी-पीढ़ियों के लिए  मानव-निर्मित राजनैतिक, आर्थिक व धार्मिक तंत्रों आदि को धनात्मक, कल्याणकारी, सृजनशील, ईमानदार व सामाजिक प्रतिबद्ध बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। ध्यान से देखा जाए तो शक्तिशालियों, विजेताओं और तंत्रों को बनाने व चलाने वालों ने शोषक वर्ग व शोषक वर्ग के सहयोगी वर्गों के हितों के लिए जाति-व्यवस्था के रूप में “सामाजिक आरक्षणों” का स्थायी प्रबंध कर दिया।


मित्र : सामाजिक आरक्षण किसको कह रहे हैं आप?

नोमेड :  सामाजिक आरक्षणों का तात्पर्य यह कि समाज की शक्तियों, सत्ताओं, संपत्तियों व संस्कृति आदि पर जन्मजात केवल जाति विशेष का होने के कारण ही अधिकार मिल जाना। हर स्तर पर जन्म के आधार पर सामाजिक आरक्षण रहे और शताब्दियों तक रहे, यदि सतयुग से कलियुग तक के युग-चक्र की अवधारणा को सत्य मान लिया जाए तो लाखों वर्षों से ये सामाजिक आरक्षण निर्बाध रूप से आज तक लागू हैं।


संपत्ति पर सामाजिक आरक्षण -

खेतों में काम करके उत्पादन करने वाला शूद्र पूरे साल प्रतिदिन बिना अवकाश के भरपूर बेगार परिश्रम करने के बावजूद, उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रखता था। यहां तक कि उसे अपना व अपने परिवार का पेट भरने, तन पर कपड़े ढकने व टुटही झोंपड़ी के लिए  भी शोषक जाति के लोगों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था। परिश्रम का अर्थ तिरस्कार व कर्म का अर्थ शोषण करना/बर्बरता/क्रूरता/कब्जाना/हड़पना/प्रपंच/छल/छद्म आदि। परिश्रम व कर्मशीलता के कोई मायने ही नहीं। 


शक्ति व सत्ता पर सामाजिक आरक्षण -

चूंकि उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था, इसलिए   समाज की वास्तविक शक्ति व सत्ता पर कोई अधिकार नहीं रहा और न ही हो पाया। शूद्रों ने अपने बहुत ही सीमित, बिना स्वतंत्रता वाले कुंठित समाज में भी किसी तरह से कोई आंतरिक व सापेक्षिक सत्ता बना ली हो जो उनके अपने ही बीच में श्रेष्ठता को प्रायोजित कर सके तो इतर बात है।


ज्ञान पर सामाजिक आरक्षण -

शूद्रों को ज्ञान का अधिकार नहीं, वेदों-उपनिषदों की ऋचाएं यदि किसी शूद्र के कानों ने सुन लीं तो सुनने वाले कानों को बहरा कर देना।  किसी शूद्र ने भूलवश यदि मुंह से वेदों उपनिषदों की ऋचाएं टूटेफूटे तरीके से भी बोल दीं तो जीभ काट देना आदि आदि। यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ना।


संस्कृति पर सामाजिक आरक्षण -

ग्रंथ आदि लिखकर अपने स्वार्थों के लिए  पूर्वनिर्धारित कर्मकांड से भरी परंपराएं बना दी गईं। समाज के द्वारा सहज स्फूर्त तरीके से कला, संस्कृति को विकसित पल्लवित नहीं होने दिया गया, कुछ लोगों ने ही सबकुछ तय कर दिया। इसे तय करने में शूद्रों के लिए कोई आधार नहीं छोड़ा गया।


मित्र : सामाजिक आरक्षणों से हुई क्षतियां कैसीं रहीं?

नोमेड :  सैकड़ों वर्षौ की जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज की लाखों प्रतिभाओं की प्रतिवर्ष भ्रूण हत्या की है।


मित्र :  प्रतिभाओं की भ्रूणहत्या, वह कैसे?

नोमेड :  जन्म के आधार पर ही आदमी की व्यक्तिगत योग्यता, व्यक्तिगत चरित्र व सामाजिक प्रतिष्ठा तय करने की बर्बर व क्रूर जाति-व्यवस्था के कारण लाखों करोड़ों संभावित प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या प्रतिवर्ष लगातार शताब्दियों तक कैसे होती रही, इस बात को समझने के लिए तथ्यों को खुले व साफ मन से समझने की आवश्यकता है।


मित्र :  जी

नोमेड : 

  • ब्राह्मण का पुत्र भले ही मूढ़-बुद्धि हो, उसे विद्वान, पवित्र व प्रतिष्ठित ही माना जाएगा। अपने पूरे जीवन में उसका काम सिर्फ और सिर्फ कुछ पोथियों को सीधा, उल्टा-पुल्टा या ऊटपटांग गलत तरीके से बांच देना है।  घोर से घोर मूढ़ को भी महानता व विद्वत्ता की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए केवल किसी ब्राह्मण के यहां जन्म लेना पर्याप्त।

  • इसी प्रकार घोर से घोर कायर को भी क्षत्रिय के यहां जन्म लेना मात्र ही उसके अद्वितीय बहादुर होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए  पर्याप्त।

  • वैश्य के पुत्र को व्यापार व प्रबंधन का ककहरा न आते हुए भी, व्यापार व प्रबंधन का पुरोधा होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता केवल उसका जन्म वैश्य जाति में होने मात्र से ही मान लिया गया।

  • शूद्र को जन्म से ही किसी लायक नहीं माना गया, उसको पशुओं से भी निकृष्ट माना गया।  जिस समाज में गाय को पूजा गया, सुअर को दैवीय अवतार माना गया।  उसी समाज में शूद्र को इतना निकृष्ट माना गया कि उसे अछूत कर दिया गया, शूद्र यदि ज्ञान को सुन भी ले तो ज्ञान अपवित्र मान लिया जाता था।  इसीलिए  शूद्र को ऊपर के तीन वर्णों के दास के रूप में जबरन स्थापित किया गया और इसको ईश्वरीय प्रयोजन साबित करके ईश्वरीय दंड-विधान आदि तय करके, जबरन थोपी गई सामाजिक-दासता को जन्म के आधार पर दैवीय-नियति के रूप में स्वीकारे जाने के लिए  समाज की मानसिकता को ही अनुकूलित कर दिया गया।

बात ज्ञान के ऊपर दावेदारी की हो, पौरुष के ऊपर दावेदारी की हो या व्यापार-प्रबंधन की दावेदारी की हो। भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था ने लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण-हत्या हर साल लगातार हजारों वर्षों तक की है और पूरी धूर्तता, कपट व सामाजिक/शारीरिक/मानसिक क्रूर-हिंसा के साथ की है।


मित्र :  जी

नोमेड :  सोचिये, यदि शोषक जातियों के बच्चों को पैदा होते ही जन्म के आधार पर बिना कुछ किए बैठे बिठाए ही महान, विद्वान, विशेषज्ञ व प्रतिष्ठित न माना जाता होता; तो उनको अपने पुरुषार्थ से विद्वता, विशेषज्ञता व प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए  समाज के वास्तविक विकास के लिए  अपनी ऊर्जा का प्रयोग करना पड़ता न कि शोषित जातियों का शोषण करते रहने के लिए नित्य नए कपटों व धूर्तताओं में लगाना पड़ता। शोषित जातियों के लोगों को पैदा होते ही वे तिरस्कृत व अपमानित होने के लिए  ही पैदा हुए हैं ऐसा स्वीकारते हुए शोषक जाति के लोगों की सेवा करने को ही जीवन-धर्म मानने को विवश किया गया।


शोषित जातियों के लोगों को अपनी प्रतिभा को दिखाने का अवसर मिला होता तो संभव है कि दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक भारतीय समाज ने दे दिए होते। यदि जातियाँ न होतीं तो हो सकता है कि किसी ब्राह्मण जाति में पैदा होने वाले बच्चे की चमड़े के काम के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो संभव है कि उसने पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। यदि क्षत्रिय जाति में पैदा होने वाले बच्चे की लुहार-गिरी के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो लौह-यंत्रों की पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। ऐसे ही सैकड़ों-हजारों उदाहरण सोचे जा सकते हैं और बहुत ही सहजता से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि जाति-व्यवस्था ने कैसे प्रति वर्ष लाखों प्रतिभाओं की लगातार सैकड़ों हजारों वर्षों तक पूरी बेशर्मी व घिनौनी सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ भ्रूण हत्याएं की।


भारत में जाति-व्यवस्था के कारण योग्यता व प्रतिभा को कभी सहेजा ही नहीं गया, ऊंची जातियों के बहुत ही सीमित दायरे में यदि कोई तुलनात्मक रूप से कुछ बेहतर निकल गया तो उसको हीरो के रूप में प्रायोजित कर दिया गया और यही तरीका आज तक भी लागू है।


इन सामाजिक आरक्षणों से अपूरणीय क्षतियां हुईं, पूरा भारतीय समाज सड़ गया। भारत में वैज्ञानिक आविष्कारों और भारत के लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास की संभावननाओं का पतन हुआ।  भारत सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी और फिर मानसिक गुलामी में फँस गया। 


मित्र :  संवैधानिक आरक्षण का विरोध कौन करते हैं, क्यों करते हैं।

नोमेड :  जाति-व्यवस्था के हजारों वर्षों के काल में जबकि शूद्रों को समाज में मनुष्य की तरह जीने के मौलिक अधिकार भी नहीं थे, सैकड़ों हजारों वर्षों तक जिन्होंने शूद्रों को कुचला है और उसी कुचलते जाने के परिणाम स्वरूप आज तक जो संसाधनों व विभिन्न सत्ताओं के भोग करने के मजे ले रहे हैं। हजारों साल तक पारंपरिक व सामाजिक भ्रष्टाचार को महिमामंडित करते हुए जिन्होंने उनकी मेहनत का शिद्दत के साथ बिना उत्तरदायित्व के खाया है। इस वर्ग के प्रति थोड़ी सी भी ईमानदारी और प्रेम उनके साथ साझा करने की मानवीयता न दिखा पाने की जड़ता व असंवेदनशीलता भी जाति-व्यवस्था से ही आई है।


संवैधानिक आरक्षण का विरोध केवल असंवेदनशील व स्वार्थ में अंधे लोग करते हैं।  जिनकी सामाजिक दूर दृष्टि नहीं और जिनके लिए  मानवीयता, न्याय व सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों के कोई मायने नहीं। योग्यता के नाम पर संवैधानिक आरक्षण का विरोध किया जाता है। जिसको योग्यता कहा जाता है वह तथाकथित योग्यता का मापदंड सरकारी नौकरी प्राप्त करने जैसी वाहियात और बेफिजूल की कसौटियों के आधार पर किया जाता है। शताब्दियों के सामाजिक आरक्षणों का भोग करते हुए तो योग्यता का कोई प्रमाण कथा कहानियों व प्रायोजनों से आगे नहीं बढ़ा और सरकारी नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण की बात आते ही, योग्यता का मुद्दा उठा दिया जाता है।


दरअसल शोषक जातियों ने आज तक कभी शूद्रों को अपने समकक्ष मनुष्यों के रूप में स्वीकारा ही नहीं, कभी भी समाज को जाति-व्यवस्था से ऊपर उठकर देखने की चेष्टा ही नहीं की। जाति-व्यवस्था का विरोध केवल सरकारी नौकरियों में शूद्रों के हिस्से को खतम करने के लिए और राजनैतिक सत्ता में उनकी बढ़ती भागीदारी से डर कर किया जाता है। जो लोग इस दावे या भ्रम में जीते हैं कि भारत में सामाजिक रूप से "जाति-व्यवस्था" खतम हो रहा है, तो वे लोग खुद के ही बनाए हुए झूठों में जीते हैं और "जाति-व्यवस्था" जैसी सामाजिक विभीषिका को स्व-केंद्रित स्वार्थों से परे नहीं देखना चाहते हैं।


ज्यों ज्यों शूद्र जातियाँ प्रशासनिक व राजनैतिक ताकत प्राप्त करतीं जा रहीं हैं, त्यों त्यों शोषक जातियों को समाज से "जाति-व्यवस्था" खतम होते दिख रहा है, इसलिए  "आरक्षण" व “जाति-व्यवस्था की राजनीति" का विरोध किया जाता है। दूर से देखने में भले ही सुंदर लगे कि यह विरोध "जाति-व्यवस्था" के विरोध में है। बहुत सुंदर तर्क भी दिए जाते हैं, किंतु यथार्थ में संवैधानिक आरक्षण के विरोध का आधार तो उनके अपने स्वार्थ ही हैं।


मित्र : जी

नोमेड :  सैकड़ों सालों तक शोषक जातियों ने अपना अधिकांश जीवन/मानसिक/सामाजिक ऊर्जा समाज के बहुसंख्य को अघोषित दास बनाए रखने में लगाया।  इससे पूरा समाज जड़ हो गया। शोषक जातियाँ भी और शोषित जातियाँ भीं। यदि मानवीयता व सामाजिकता के व्यापक संदर्भों में सूक्ष्मता से देखा जाए तो जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के स्तर तक पहुंचाया है। किंतु शोषक जातियों के लोग अपने विद्रूप अहंकारों और स्व-केंद्रित-स्वार्थ को जीवन का परम-लक्ष्य मानने के कारण, अब भी यह चिंतन करने को तैयार नहीं हैं कि भारतीय समाज भीषण रूप से जड़ हो चुका है, सड़ांध से भरपूर है। और इस सड़ांध के पराकाष्ठा तक पहुंचाने और समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, मूल्यों व भावों को जड़ करने व जड़ता में ही बनाए रखने में केवल और केवल जाति-व्यवस्था की परम्परा का ही हाथ रहा है।


शोषक जातियों को बिना वास्तविक पुरुषार्थ के ही उपलब्ध समस्त विलासिताओं को भोगने की बड़ी भयंकर लिप्सा हमेशा से रही है और आज भी है। और इसी लिप्सा-भोग प्राप्ति के लिए  किए जाने वाले विभिन्न प्रायोजनों को हम सामाजिक परिवर्तन, समाज निर्माण व देश का विकास आदि के लुभावने नामों से प्रायोजित करते आए हैं। यह लिप्सा ही सामाजिक आरक्षण अर्थात् जाति-व्यवस्था का मूलभूत कारण रही और आज भी हमारे समाज की जड़ता के मूलभूत कारकों में से है।


दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक मानने वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील मानने वाले लोगों में, जो शोषक जातियों के हैं, अपने स्वार्थ की लिप्सा व जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिए  घृणा का भाव रखते हैं, क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करने लगा है और शोषक जातियों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करने लगा है।


मित्र :  समाधान कैसे होगा।

नोमेड : समाधान तभी होगा जबकि जाति-व्यवस्था की विद्रूपता व गहरी जड़ों को ईमानदारी व बिना पूर्वाग्रह के सामाजिक उत्तरदायित्व पूर्वक न्यायपूर्ण भाव से समझने की चेष्टा की जाएगी। और ईमानदारी से समाधान की चेष्टा की जाएगी। बिना सामाजिक ईमानदारी के "जाति-व्यवस्था" का पत्ता भी नहीं हिलने वाला। शोषक जातियों की ओर से जब भी जाति-व्यवस्था के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- “ संवैधानिक-आरक्षण “ और “ जाति-व्यवस्था की राजनीति “।  दोनों ही मुद्दे शक्ति व सत्ता प्राप्त करने के अवयव हैं।


यदि शोषक जातियाँ सच में ही सामाजिक ईमानदार होतीं और जाति-व्यवस्था को खतम करने के लिए थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करतीं तो जाति-व्यवस्था कब की खतम हो गई होती।  शोषक जातियों को केवल अपने अंदर से जाति-व्यवस्था की भावना वास्तव में खतम करनी है। इसके लिए बिना ढोंग के जीवंत रूप में जाति-व्यवस्था की भावना को गहरे से खींचकर खतम करने की जरूरत है। जो ईमानदार व मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अपने अंदर गहरे जमी हुई घृणा व जाति-व्यवस्था की श्रेष्ठता के छुपे हुए अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालने से ही संभव है। जाति-व्यवस्था लोगों के मन में बहुत गहरे स्थापित है जो शाब्दिक भाषणों, परिभाषाओं, लिखावटों आदि से खतम नहीं होगी।


जाति-व्यवस्था का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ ईमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है। यह समाधान ही नए समाज, नए देश व नए सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर व वास्तविक होगें और बिना कपट व धूर्तता के होगें।

पुस्तक "मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर" से

(सामाजिक यायावर 'विवेक उमराव' द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)