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  • किसानों की जमीन पूंजीपतियों  द्वारा जबर्दस्ती छीनी जाती है या हम किसान को मजबूर कर देते है ऐसा करने पर

    किसानों की जमीन पूंजीपतियों द्वारा जबर्दस्ती छीनी जाती है या हम किसान को मजबूर कर देते है ऐसा करने पर

    Nishant Rana[divider style=’right’]

    आए दिन हम सुनते रहते है की कोर्पोरेट किसानों की जमीन हथियाती जा रही है इसके आगे भी यह सुनते है कि  सरकार जोर जबर्दस्ती पूंजीपतियों को किसान की जमीनों पर कब्जा दिलवा रही है। इसके लिए हम दूर दराज के क्षेत्र, जंगलों आदि के बारे में की-बोर्ड पर बैठे तुक्के मारते रहते है क्योकि पुलिस फौजों के फोटो गाहे बगाहे हमारे सामने को निकलते रहते है भले वह फोटों प्रायोजित होते हो या किसी अन्य प्रयोजन के लिए इस्तेमाल किए जाते हो। हमने तो सरकार पुलिस फ़ौज को कोसते हुए किसानों के समर्थन में लेख दे मारा है बस हो गया तथ्यों तक जाने में समय ऊर्जा भी खर्च होती है और कहानी भी हमारी समझ से अलहदा मिल सकती है तो आज की पत्रकारिता जो मिनट दर मिनट बदलते ट्रेंडिंग मुद्दों पर खड़ी है इन सब पर कौन सर खपाए।

    फिलहाल यह लेख न किसानों की जमीन पर कब्जा करते जा रहे कोर्पोरेट के समर्थन में है , न ही किसी पुलिस या फ़ौज के किसी उत्पीड़न के मामले को जस्टिफाई करने के लिए इसलिए विनती है कि किसी भी टिका टिप्पणी से पहले लेख पूरा पढ़ा जाए।

    किसान किस तरह खेती बाड़ी से दूर होते हुए अपने खेतों से भी दूर होता जा रहा है। इसके लिए बस्तर के किसी आदिवासी गाँव, राजस्थान, मध्य प्रदेश के दूर दराज के गाँवो तक पहुँचने की जरुरत नहीं है जहाँ “विकास” नामक सदी का सबसे बड़ा मानवीय और प्राकृतिक करप्शन अपने बिलकुल शुरुआती दौर में पैर जमा रहा है। विकास का मतलब अन्यत्र विश्व में कुछ भी होता हो लेकिन हमारे समाज में विकास का इससे इतर मतलब कम से कम मुझे तो नहीं ही दिखाई पड़ता है!

    यहाँ मैं बात करना चाहता हूँ उन गांवो के बदलाव की जो छोटे बड़े शहरों से बहुत दूर नहीं थे लेकिन शहरी प्रभाव से लगभग लगभग अछूते थे , देश की राजधानी दिल्ली के दो सौ किलोमीटर के दायरे में आज भी सैकड़ो गाँव ऐसे मिल जायेंगे जो शहरों से लगभग पूरी तरह कटे हुए है जहाँ शहरों से जोडती हुई सड़कें या तो दो एक साल पुरानी है या अभी तक बनी ही नहीं है। कितने ही गाँव दो छोटी छोटी नदियों के किनारे बसे हुए है जिनमें बरसात में पानी आ जाने के कारण बाहरी क्षेत्रों से सम्बन्ध बिलकुल कट जाता था , जहाँ अभी तक यातायात के साधन के नाम पर केवल रेलवे की दो चार पसेंजेर ट्रेनों का सहारा है। जो इन ग्रामीण क्षेत्रों पर बने हाल्ट पर मिनट दो मिनट के लिए रूकती है. आदमी तो आपने आने जाने का बंदोबस्त कर भी ले लेकिन कितनी औरते और बच्चे अपनी बीमारी और जरूरतों के लिए भी बीस किलोमीटर की दूरी आज भी तय करना बहुत ही टेढ़े कामों में से एक है । आज भी इन ग्रामीण क्षेत्रों में दो चार आदमी औरत ऐसे मिल जाते है जो कभी शहर नहीं गए या केवल मज़बूरी में गए हुए होते है।

    इन सब के बाद भी ये गाँव आत्म निर्भर थे,  शांति से जीवन व्यतीत करते थे , होड़, हबड़-तबड़ से दूर थे। जीवन यापन की बेसिक जरूरतों अन्न, सब्जी, दाल एवं अन्य खाद्यान्नो, कपड़ा, मकान आदि को पूरा करते हुए को भी धीमी गति से ही सही लेकिन मजबूत स्थिति की ओर बढ़ रहे थे। नदियों, तालाबों, पशुओं, पेड़ पौधे से निर्भरता और जरूरतों का जीता-जागता सम्बन्ध बना हुआ था। गाँव का आदमी आज भी जल्दी से इन सब को नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि प्रकृति का पोषण ही करता है। भारत के गाँवो की सबसे बड़ी ताकत यहीं रही है की उनकी निर्भरता बाजार पर न के बराबर रही है जबकि बाजार उन पर आज भी पूरी तरह निर्भर है। हम भारतीय गांवों के साथ जो सबसे बुरा कर सकते थे वह यहीं था की गांवों की आत्मनिर्भरता को ज्यादा से ज्यादा कमजोर किया जाए. जिसके लिए हम सब ने पिछले तीन दशक भरपूर प्रयास किया है। हमनें कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है की भारत के गाँव-किसान बाजार की मांग के हिसाब चलने लग जाए, बाजार का उन पर पूरी तरह नियन्त्रण हो जाए। इस बात की शुरुआत को इस तरह से समझ सकते है खेतों के पानी देने के लिए रहट का इस्तेमाल होता था, तालाबों में भरपूर पानी रहता था, जुताई के लिए हल बैलों का प्रयोग होता था, रासायनिक जहर की उसे कोई जानकारी नहीं थी। धरती अपनी शक्ति में स्वयं वृद्धि करे इसके लिए कुछ एक सालों में जमीन को बिना फसल लिए कुछ समय के लिए खाली छोड़ा जाता था।  इन सब के लिए किसान को बाजार की कितनी जरूरत पड़ने वाली थी या नहीं पड़ने वाली थी यह हम आसानी से देख सकते है। किसान का उत्पादन के लिए अलग से कुछ खर्चा था ही नहीं सब कुछ प्रकृति , पशुओ, गाँव में रहने वाले सभी व्यक्तियों का सामूहिकता सहजता से बढ़ते कदम थे जो न केवल उन्हें मजबूत कर रहे थे बल्कि पूरी धरा को एक कड़ी में जोड़ते हुए मजबूत कर रहे थे।

    एक नजर :- ग्रामीण किसान-महिला बेहद परिश्रमी, उत्पादक व Entrepreneur (व्यवसायी) होती है

     

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    हल-बैल बनाम ट्रैक्टर

    यह हम थे जिसने यह मानसिकता बनाई हल बैल चलाने वाले किसान को हीनता  या तरस खाने वाली की दृष्टि से देखा। जबकि हीनता से हमारी दृष्टि को देखा जाना चाहिए था। हम घंटो मोबाइल चला सकते है, टीवी देख सकते है , बे-सिर पैर की बहसों में घंटो ऊर्जा खर्च कर सकते है। हम यह  भी नहीं जानते की हमारी थाली में जो रोटी रखी है वह लूट कर खाई जा रही रोटी ही हो। लेकिन हम खेतीं को आधुनिक बनाने के व्याख्यान  दे मारेंगे। हल बैल किसान के घर की चीज है जो उसे सहज उपलब्ध रहती है, फसल, पशुओं के चक्र में आपसी जरूरते, रख रखाव जरूरत से ज्यादा पूरी होती रहती है जबकि ट्रैक्टर बाहरी चीज है जिसके लिए उसे बड़ी पूंजी लोन आदि जुटाने पड़ते है। इसके बाद उसके रख-रखाव चलाने के भारी खर्चे अलग से। किसान खर्चा उठा सकता है उसके लिए कोई बड़ी बात भी नहीं होती है। लेकिन जिस दलदल में हम फंसे थे हमने किसान को भी उसी दलदल में धकेल दिया। हल बैल की जुताई धरती को उत्तेजित नहीं करती है, धरती उर्वरक क्षमता को पोषित करते केंचुओं एवं अन्य कीड़ो मकोड़ों आदि को नहीं मारती है जबकि ट्रैक्टर की जुताई खेत की क्षमता को कम करती जाती है। चूँकि अब हल बैल से खेती करना शर्म की बात है किसान अपने सहज जीवन और जमीन का ही दुश्मन बन बैठा.

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    प्राकृतिक खाद बनाम रासायनिक खाद

    प्राकृतिक खाद भी किसान को सहजता से उपलब्ध है जो खेती किसानी फसलों को बिना किसी नुकसान के भरपूर पोषण देता है। लेकिन बाजार की मांग को पूरा करने में वह रासायनिक खादों का प्रयोग भी प्रचुर मात्रा में करने लगा। रासायनिक खाद जमीन की उर्वरक क्षमता को तेजी से बढाते है, एक के बाद एक तेजी से ज्यादा ज्यादा फसल लेनी है क्योकिं किसान तो पूंजी बनाने के लिए भी फसल पर ही निर्भर है। इस चक्कर में ऐसा समय भी दूर नहीं जब धरती किसानों का साथ छोड़ देती है  हमने गाँव-किसान को जहर की खेती करने मजबूर कर दिया है की वह अपना स्तर किसी भी तरीके चकाचौंध के ढोंग की तरफ धकेले वरना हेय दृष्टि से देखे जाने और पिछड़ा महसूस करने के लिए तैयार रहे।

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    रहट-तालाब-कुएं बनाम नलकूप-सब्मर्सिबल

    रहट

    नब्बे के दशक तक रहट-तालाब-कुएं गाँव खेती की लाइफ-लाइन हुआ करते थे। तालाब या कुओं से आप जबर्दश्ती पानी निकलते नहीं रह सकते। कुओं से पानी निकालने के लिए या तालाबों से पानी के लिए धरती के नीचे का जलस्तर या तो बहुत अच्छी अवस्था में होना चाहिए या फिर बारिश आदि के पानी को इकठ्ठा करने उसे साफ़ बनाए रखने के लिए, बर्बाद न करने के लिए सामूहिक सजगता अवश्य होनी चाहिए। किसानों द्वारा खेतों में प्रयोग किए जाने वाले नलकूपों से पानी तो खेती के लिए उतना ही निकाला जाता है जितना रहट आदि के माध्यम से निकाला जाता है। अंतर आया है तो गति का, निर्भरता का एवं उसके जल के मुख्य स्रोतों से दूर जाने का। अंतर केवल गति या श्रम की कमी का होता तब कोई दिक्कत नहीं थी  लेकिन भारतीय किसान रहट द्वारा पानी निकालने के लिए किसी बाह्य कारक पर निर्भर नहीं था। आज वह बिजली और महंगे तेल पर पूरी तरह निर्भर है, साथ के साथ जो सबसे बुरा हो सकता था वह यह था किसान और गाँवो का भी सबसे आखिर में ही सही लेकिन तालाबों और कुओं से सम्पर्क टूटता चला गया। इतना भी जरुरी नहीं समझा गया की लोगों को इतना तो जागरूक किया जाए कि कम से कम जानकारी में तो इतना पता हो की पृथ्वी के नीचे अथाह जल भंडार नहीं है। रही सही कसर आज घर घर में सब्मर्सिबल लगवा कर पूरी की जा रही है। यह सब क्या षड्यंत्र का हिस्सा नहीं है. जब प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट किए जाने का काम  इतने बड़े पैमाने पर हो सकता है तो किसान के लिए वाटर हार्वेस्टिंग जैसे प्रोग्राम भी बड़े स्तर पर स्थापित किए जा सकते थे, वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों की ओर बढा जा सकता था लेकिन जब सोच समझ ही रखा है की किसानों को आत्मनिर्भर बनाना पूंजीवाद पर चोट करेगा तो क्यों उसके लिए प्रयास किए जाए।

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    एक नजर :- किसान और अर्थव्यवस्था  

    चलते चलते

    यह हम थे जिसने मानसिकता बनाई की शहर में रहना ही आपको महान, बुद्धिमान बना देता है और गाँव में रहने वाला व्यक्ति मूर्ख होता है। यह हम थे जिसने गाँव किसान को लगातर हीन मानते हुए यह दिखाया की भोग करना, कुछ अधिकार प्राप्त हो जाए तो केवल अपने भोग करने के लिए उनका जितना हो सकता है दुरूपयोग करना और इन दुरुपयोगों में भी अपने आप को महान साबित किए रहना। यह हम थे जिन्होंने भोग, ढोंग और धूर्त्तता को आदर्श के तौर पर  स्थापित किया। हमने ही यह स्थापित किया कि महंगी डिग्री हासिल कर के कुछ उत्पाद बेच लेना , नौकरी कर लेना, मानसिक गुलाम हो जाना महानता है और जो खेत घर परिवार संभाले हुए है जो पूरी अर्थव्यवस्था में वास्तविक योगदान देते है वह सब हमसे कम समझ रखते है।

    मुद्रा में ही बात कर ले तो हम आज तक किसान के  दैनिक श्रम की कीमत नहीं तय कर पाए , हम किसान को यह अधिकार नहीं दे पाए की वह अपनी फसल की कीमत क्या रखेगा,  हम यह तय नहीं कर पाए यह किसान का अधिकार है की वह अपनी फसल को मर्जी जिस बाजार में बेचे, वहीँ किसान अपनी ही चीजे बाजार से कई गुना दामों पर खरीदने को मजबूर है। हमने विकल्प ही क्या छोड़ा है सिवा भूखे मरने या मुद्रा के बदले जमीन बदलने के  और हम बात करते है किसान को सिखाने की, उसे आधुनिक बनाने की ; कुछ बेसिक शर्म लिहाज तो हम में भी होना ही चाहिए।  किसान बाजार के खेलों में फंस कर जमीन बेचता है,  जिसे  बाजार की और धकेलने का काम हम आप लगातार अपने दैनिक जीवन में करते है। जमीन की लड़ाई तो रह ही नहीं जाती है लड़ाई तो फिर मुआवजों की होती है हम यह बात समझते ही नहीं है कि दुनिया का कोई भी मुआवजा उस जमीन के बराबर हो ही नहीं सकता। पूंजी अपने आप को फिर से बढ़ा लेती है, जमीन बेचने वाला किसान उस पूंजी का कितना भी सही इस्तेमाल कर ले लेकिन उतनी जमीन के उत्पादन की कीमत प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कही न कही कोई किसान ही चुकाता है। हमने हर उस बात को उच्च मापदंडो पर निर्धारित किया जो धूर्तता, ढोंग, परजीविता पर आधारित थी जिन पर किसी भी सभ्य समाज के मनुष्य को शर्म आनी चाहिए थी। जो शहर गांवों के रहमों-करम पर फले फूले हो, लूट खसोट को अपने जीवन का हिस्सा बना चुके हो वह एक भी व्यक्ति को वास्तव में कैसे आत्मनिर्भर बना सकते है, हाँ अगर आप  कम से कम मुद्रा पर अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों पर सरल सम्पन्न जीवन व्यतीत करते लोगों के बजाय धूर्तता के साथ बनाई गयी परजीवी व्यवस्था, किसी भी तरीके से इकठ्ठा की गई मुद्रा पर आधारित मापदंडो को जो गांवों की शक्ति पर भोग करती है को आत्मनिर्भरता, ईमानदारी, चेतना के विकास में सहायक तत्व, महानता बोलते हो तो अलग बात है।

    एक नजर :- बूचड़खाने

  • जागरूक युवा बनाम उदासीन युवा

    जागरूक युवा बनाम उदासीन युवा

    Sachin Raj Singh Chauhan[divider style=’right’]

    जब बच्चा जन्म लेता है तो कई उम्मीदें भी जन्म लेती है, कई सपने भी देखे जाते है और आगे चलकर जब बच्चा युवा होता है तो वह सारी जिम्मेदारियों को अपने विशाल कंधो पर धारण कर लेता है ठीक उसी तरह माँ भारती को भी अपने बच्चों से पूरी उम्मीदें है देखना यह है कि आप कितने ईमानदार है और अपने कर्तव्य के प्रति कितने सजग है |

    मन व्यथित होता है जब देखता हूँ कि आज के युवा जातिवाद, साम्प्रदायिकता, तथाकथित राष्ट्रवाद जैसे निरर्थक शब्दों के मायाजाल में अपना बहुमूल्य समय नष्ट ही नहीं अपितु लोककल्याण जैसी भावनाओं का समूल नष्ट कर रहे है | आने बाले दिनों में इसके बड़े घातक और दुष्परिणाम हमें झेलने पड़ेंगे |

    आज जब इस देश को अवतारवाद, रूढ़िवाद, जातिवाद और सम्प्रदायवाद को ख़त्म करने के लिए युवाओं की जरूरत है तब यही युवा दृष्टिहीन और विवेकहीन होकर देश में अपनी सत्ता और प्रभाव बरकरार रखने बाले ठेकेदारों के छलावे में आकर अपने अस्तित्व और जिम्मेदारिओं को ही भूल चुके है |

    [pullquote align=”normal”]आज देश की एकता, अखंडता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिकता को बचाने की सख्त जरूरत है हम सभी युवाओं को साथ आकर लोककल्याण, विकास, समृद्धि, जागरूकता, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के लिए एक बड़े संघर्ष की जरूरत है | आप अपने स्तर पर शुरू कर सकते है | यह विकल्प आपका है कि आप देश की अखंडता के साथ खड़े है या फिर तथाकथित राष्ट्रवाद के साथ | [/pullquote]

    सनद रहे राष्ट्रवादी वही है जो एक समृद्ध, खुशहाल और प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं और राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब लोक का निर्माण हो क्योंकि राष्ट्र लोक से बनता है न कि लोक राष्ट्र से और लोक का निर्माण तभी संभव है जब हम सभी लोग आपस में सौहार्द, विश्वास और बिना किसी भय के साथ रहें और एक दूसरे की संस्कृति का, मान और सम्मान का आदर और सुरक्षा करे |

  • यूँ बनता है एक आदमी

    यूँ बनता है एक आदमी

    Veeru Sonker[divider style=’right’]

    यूँ बनता है एक आदमी
    थोड़ा सा डर बटोरे हुए जो कहता है
    मैं नही डरता.

    चलने से पहले बहुत बार ठिठकता है
    और जेब मे पड़ी भाषा की गिन्नियां टटोलता है
    उसके बाद आदमी नही
    उसका जोड़-घटाव चलता है.

    जैसे नफरत चलती है जैसे सत्ता के पैर नाचते हैं
    जैसे लड़खड़ा जाती है एक उम्र
    बिना पिये ही.

    आदमी ही बताता है सबसे जोरदार नशा होता है समय के प्याले में
    वह जितनी बार तौला जाता है जितनी बार गिना जाता है
    मायूस होता है जितनी बार
    वह उतनी बार ही अपनी खाल छोड़ता है
    और एक नई खाल ओढ़ता है.

    वह स्त्री से बोलता है दुनिया की सुन लेता है
    और टिकाएं रहता है स्मृतियों के पैर
    बेमतलब के पूर्वजो के पास वह आता जाता है

    बहुत बीमार हो कर भी कहता है अपनी देह से
    मैं ठीक हूँ एकदम.

    इतना सब होने के बाद भी वह एक आदमी गिरता है
    एक लंगड़ी सभ्यता की गोद मे
    और कहता है
    मैं तुम्हारा सबसे जरूरी पुर्जा हूँ

    एक लड़की ढांपती है अपने सीने को
    और देखती हैं नजर कैसे बदल गयी
    एक आदमी में,

    एक औरत चुपचाप देखती है
    आहिस्ता-आहिस्ता पुत्र के भीतर से बाहर आते पिता/पति के चेहरे को.

    जगहों के सिमटने का मौसम कितना क्रूर होता है
    देखता है एक बूढ़ा पिता
    ढूंढता है अपने खेत मे बटती हुई जमीन के भीतर ठहरने की कोई जगह.

    उचक कर देखता हुआ बच्चा
    कंधे से उतरता है आहिस्ता
    एक कदम तेज़ चल कर निकलता है अपनी उम्र से बाहर
    हो जाता है एक आदमी.

    एक बच्चा चढ़ता है घोड़े पर
    और बन जाता है आदमी.

    एक बच्चा देखता है स्त्री को
    देखते देखते
    उसके हाथ से कट जाती है बचपन की पतंग
    वह दुख से रोता नही,
    वह सड़क पर दौड़ता है और लूट लेता है मौके से भरी एक पतंग

    ‘मौका’ उसे बदलता है एक आदमी में!

    बहुत बार मरता है एक जल्दबाज पिता
    और बन जाता है
    बारह साल का एक लड़का
    तेज़तर्रार आदमी.

    कॉलेज से बाहर धकेल देती है
    उच्च प्रतिभा-प्रतिशत के शेयरों सी उछलती एक मार्कशीट बहुत बार
    बहुत बार आदमी बनते ही दौड़ लगती है बाजार की ओर
    बाजार सिद्धस्त है
    वह अधबने कच्चे रह गए बच्चों को बदल देता है आदमी में.

    एक बच्चा गिरता है एक सुनसान सड़क पर
    आसपास कोई नही होता
    अचानक वहीँ चढ़ता है बड़े होने का बुखार पहली बार एक बच्चे पर.

    एक बच्चा बुखार को छोड़ता है
    बिस्तर में,
    घर की ऊबी बंद दीवारों के पार ले जाता है
    कौतूहल से जगमग अपनी आंखों को
    और झांकता है
    सभ्यता की उदास आंखों में

    छोड़ता है ढेर सारा भरोसा
    और कहता है मैं चलता हूँ अब!

    वह लौटता है बड़ा होकर
    मांगता है वापस
    उस सभ्यता से अपनी उम्र

    सभ्यता प्रेमिका की तरह तड़पती है
    सभ्यता बारिश की तरह गिरती है

    और

    बूढ़े पत्थरों को चाट कर कहती है
    उम्र का स्वाद लिया है तुमने
    तुम्हारे हाथों से अब कागज की नाव नही बन सकती
    जिस पर ढोते हुए मैं ला सकूँ
    बचपन बोने का बीज

    सभ्यता बड़ी बहन सा दे देती है जमा किया अपना सारा हिस्सा

    आदमी तब टूटता है
    और एक ऐड लेता है समझदारी से भरी हुई

    साथ-साथ चलते हुए दोनों समय के दरवाजे को ठोंकते हैं
    आदमी चुप रहता है सभ्यता बोलती है
    बात करती है और भरोसा देती है!

    दरवाजा खुलता है-
    और एक आदमी कविता से निकल कर
    औंधे मुंह गिरता है
    किसी कहानी में

    यूँ बनता है एक आदमी
    जैसे घुसता है व्याकरण, एक भाषा के भीतर
    आदमी घुसता है कहानी के कपड़े पहन कर
    एक बच्चे के भीतर

    और ला कर पटक देता है
    पकती हुई उम्र के खड़ी कगार वाले एक टीले पर
    बहुत बार उस टीले से उतरता है एक बच्चा
    और फुदक फुदक कर चलता है

    वह तारीखों के/देशों के/पेड़ो के/पूर्वजो की तस्वीर के
    और तमाम असमय घट रही घटनाओं के गाल चूम-चूम कर लाल कर देता है

    नदी, आकाश और मौसम का हाथ पकड़ कर
    चढ़ जाता है फिर उसी टीले पर

    आदमियत की अपनी उतारी हुई खाल को देखता है
    उसे फिर से ओढ़ता है

    थोड़ा रुआंसा होता है
    और कहता है

    मैं बचा लूंगा सब!

  • इवांका मसले से निकली बात : मोदीजी बनाम हमारी सैडिस्टिक-सोच

    इवांका मसले से निकली बात : मोदीजी बनाम हमारी सैडिस्टिक-सोच

    [thrive_headline_focus title=”Vivek Umrao Glendenning” orientation=”right”]

    मोदीजी व सेल्फी

    लगभग पांच वर्ष पहले हमारी मित्र सूची में एक मुस्लिम तथाकथित पत्रकार हुआ करते थे। बहुत लोग इनकी पोस्टें साझा करते रहते हैं, हमको भी इनकी पोस्टें लटक-लुटक कर मिलती रहतीं हैं जबकि इनकी पोस्टों को देखकर ही हमको इनकी सैडिस्टिक सोच से मितली आती है। इन महाशय की शान में कसीदे पढ़ने को गाहे बगाहे मिलते रहते हैं, लोग बाकायदा अपनी पोस्टों में पत्रकारिता के लिए रैंक देते हैं, वह बात अलग है कि पत्रकारिता वास्तव में क्या है इसका ककहरा तक न पता हो, लेकिन रैंक देने के लिए पिले पड़े रहेंगे।

    पत्रकारिता के नाम पर बहुत लोग इनके नाम की कसमें तक उठाते हैं। बीमार मानसिकता के लोगों का बीमार आदर्श। यह महोदय मोदीजी के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं। मोदीजी की सेल्फी प्रेम का उपहास उठाते रहते हैं। मोदीजी को गाली देना ही इनकी जागरूकता, सामाजिक प्रतिबद्धता व क्रांतिकारिता मानी जाती है। यही महोदय पांच वर्ष पहले अपनी एक पोस्ट में बड़े फक्र के साथ यह बता रहे थे कि कैसे उनको एक एसडीएम ने चाय पिलाई। इनके लिए एक एसडीएम के साथ चाय पीना जीवन की उपलब्धियों में से थी। पहले एसडीएम के साथ चाय पीने को बेंचेंगे, फिर डीएम के साथ, फिर कमिश्नर के साथ, फिर सचिव के साथ, फिर मुख्यमंत्री के साथ।

    मोदीजी के सेल्फी प्रेम का उपहास उड़ाने वालों का खुद का अपना स्तर क्या है, इसकी भी बात होनी चाहिए।

    यह कौन सी बात हुई कि आप किसी प्रधान के लिए पलकपावड़े बिछा दें। आपके घर में इलाके का ब्लाक स्तर का अधिकारी आ जाए या एसडीएम के साथ चाय पी लें या ऐसा ही कुछ-कुछ और हो जाे तो आप खुद को महान समझने लगें। इसको छोड़िए आपका बच्चा किसी महंगे स्कूल में पड़ने जाता हो तो आप खुद को तोप मानने लगें। यह भी छोड़िए आपका बच्चा अपने स्कूल की क्लास में अच्छे नंबर पा जाता है तो आप चौड़े से अंकतालिका की सेल्फी लेकर अपने लिए सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं। बच्चे की मेहनत पर अपना कब्जा जमाते हैं, पूरी निर्दयता व बेशर्मी के साथ। खुद तो जीवन में पहचान बना नहीं पाए लेकिन बच्चे की मेहनत से अपनी पहचान खोजते हैं। बच्चे की मेहनत से अपनी पहचान खोजने की बीमार मानसिकता के कारण बच्चे को कितना तनाव देते हैं, कितनी हिंसा करते हैं, उसका बचपन मार डालते हैं।

    हममें से हजारों लोग जनरल डिब्बों में भेड़ों की तरह नर्कीय यात्रा करते हुए मुंबई जाते हैं। आंधी, वर्षा, तूफान, गर्मी, सर्दी में भूखे प्यासे सिनेमा में रद्दी अभिनय करने वाले अभिनेताओं व अभिनित्रियों के घरों के सामने उनकी एक झलक पाने के लिए घंटों, दिनों, सप्ताहों, महीनों खड़े रहते हैं। अभिनेता या अभिनेत्री हाथ की उंगलियों को हल्की सी जुंबिश भी दे देता है तो हम अपना जीवन धन्य मान लेते हैं। 

    हमें अपनी इन टपोरी छिछली व बीमार मानसिकता वाली सेल्फियां नहीं दीखती हैं। लेकिन यदि मोदीजी जापान, चीन या अमेरिका के राजनेताओं के साथ सेल्फी ले लेते हैं तो हमें बड़ी परेशानी होती है। हमें अपना गिरेबां भी झांकना चाहिए।

    मोदीजी व लखटकिया सूट

    हम आदमी का मूल्यांकन उसके कपड़ों से करने की बीमार मानसिकता में जीते हैं। यदि किसी ने महंगा ब्रांडेड कपड़ा पहन रखा है, महंगा ब्रांडेड जूता पहन रखा है तो हम उसको बड़ा आदमी मानते हैं, उसको आदर देते हैं। यदि किसी ने सस्ते कपड़े व सस्ते चप्पल पहन रखे हैं तो उसे छोटा आदमी मानते हैं। तिरस्कृत करते हैं, दुत्कारते हैं। उसको चोर उचक्का उठाईगीर मान लेते हैं।

    महंगे कपड़े व जूते पहनने के लिए हम भ्रष्टाचार करते हैं, दलाली करते हैं, बेईमानी करते हैं, झूठ बोलते हैं, फरेब करते हैं, शोषण करते हैं, हिंसा करते हैं। यदि मोदीजी लखटकिया सूट पहनते हैं तो हमें परेशानी क्यों होती है। मोदीजी तो हमारी ही मानसिकता का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं।

    मोदीजी व डिग्री

    बहुत लोगों को मोदीजी के इतिहास ज्ञान व उनकी डिग्रियों के संदर्भ में बहुत तकलीफ रहती है। चाहे व दक्षिण भारत हो या उत्तरी भारत। उन्नीस बीस, ढका-मुंदा सभी जगहों पर शिक्षा के नाम पर जमकर मजाक होता है, फर्जीवाड़ा होता है। वह बात अलग है कि बदनाम केवल बिहार ही होता है। बिहार बदनाम इसलिए होता है क्योंकि वहां लालू प्रसाद यादव जैसे नेता सबकुछ खुलासे में करने लगते हैं, बिना लाग-लपेट के। लालू सचिन तेंदुलकर से कह देते हैं कि आइए आपको डिग्री हम अपने राज्य से दिलवा देते हैं। लालू यादव गांव से हैं, एडीकेट नहीं जानते हैं, हर बात को राजनैतिक हानि-लाभ से जोड़कर देखते हैं। प्लीज, थैंक्यू, एक्सक्यूज मी जीवन में शायद ही कभी किसी को कहे हों। राबड़ी जी को प्रेम में चुटकी लेते हुए बोल देते हों तो बात अलग है।

    जो जानकार हैं, जिनके सोर्स हैं, जिनके पास जानकारियां रहतीं हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि दिल्ली व मेट्रो शहरों के नामचीन स्कूलों जिनके बच्चे भारत टाप करते हैं, वे स्कूल वास्तव में कितनी गहराई व चतुराई से शिक्षा के फर्जीवाड़े के दलदल में घुसे हुए हैं। सारा फर्जीवाड़ा बहुत ही सूक्ष्म रूप में, बेहद व्यवस्थित रूप से, बहुत सुरक्षित नेक्सस के रूप में होता है। आप फर्जीवाड़े की एक चिंदी तक साबित नहीं कर सकते, जबकि पूरा तंत्र ही फर्जीवाड़े में जमाने से लिप्त है।

    लाखों छात्र हर साल नकल करते हैं, पेपर लीक करवाते हैं, अपनी जगह किसी और को बैठाल कर परीक्षा दिलवाते हैं। लाखों लोग हर साल गेसपेपर रट कर परीक्षाओं में अच्छे नंबर लेकर आते हैं। यूनिवर्सिटीज, डिग्री कालेज खुलेआम नकल करवाते हैं। छात्र बढ़िया नंबर पाते हैं। अभिभावकों को कोई तकलीफ नहीं। अभिभावक अच्छे नंबरों के लिए रुपिया खर्च करने को तैयार। इंटर पास करते ही प्राइवेट इंजीनियरी, मेडिकल, प्रबंधन व बीएड इत्यादि कालेजों में सीटें खरीदने को कमर कसे तैय़ार। जिसका जुगाड़ हुआ वह सरकारी संस्थानों में जुगाड़ लगाता है। जिनकी पहुंच बहुत ऊंची है वे आईआईटी व आईआईएम में भी चौड़े से प्रवेश पाते हैं।

    [pullquote align=”right”]भारत में एक भी नौकरशाह ऐसा नहीं होगा जो वास्तव में स्पष्ट व सूक्ष्म ईमानदार हो, संभवतः अपवाद भी नहीं। ईमानदारी केवल नेक्सस के बाहर के लोगों के सामने प्रस्तुत की जानी वाली वस्तु है। श्रेणी, स्तर, भूख का स्तर, तौर-तरीके, आकार-प्रकार इत्यादि के चरित्र, प्रकार इत्यादि भिन्न हो सकते हैं। [/pullquote] डिग्री मिलने के बाद लाखों रुपए खर्च करके नौकरियों के शिकार में जुट जाते हैं। नौकरियों के लिए पूरे सरकारी तंत्र को भ्रष्ट करने को कटिबद्ध। एक जमाना था जब सरकारी छापेखाने का चपरासी के भी घर का हर सदस्य IAS हो जाता था। IAS में अब भी झोल होते हैं लेकिन बेहद सुव्यवस्थित नेक्सस से। चिंदी भी साबित करना नामुमकिन। जैसे चेतना को केवल महसूस किया जा सकता है, साबित नहीं किया जा सकता है। वैसे ही इन नेक्सस को महसूस किया जा सकता है, साबित नहीं। भारतीय सरकारी ढांचों में नेक्सस ही चेतना है।

    बारहवीं व स्नातक के बाद शहरों में ककुरमुत्तों की तरह उगी हुई कोचिंगों को क्या कहेंगे? लाखों रुपए साल की फीस, छात्रों के रहने खाने के लिए इलाके के लोगों ने अपने घरों में छोटे-छोटे कमरे निकाल कर लाखों रुपए महीना का स्थाई कारोबार बना रखा है, बाकायदा कोचिंग वालों को कमीशन भी जाता है। व्यवस्थित बाजार। छोटे शहरों के लोग भी चाहते हैं कि उनके घर के आसपास कोई संस्थान खुल जाए ताकि वे भी छात्रों को किराए में कमरे देकर पैसा कमा सकें।

    फर्जी डिग्रियां, फर्जी जाति प्रमाणपत्र, फर्जी डोमेसाइल बनवा कर लोगों ने नौकरियां पाईं/पा रहे हैं। मोदीजी की डिग्री से ही परेशानी है। मोदीजी से इस व्यक्तिगत खुन्नस का कारण क्या? उन्होंने आपकी कौन सी भैंस खोल ली थी। किसको लेना देना है शिक्षा व शिक्षा स्तर से। सबका एक ही लक्ष्य, किसी तरह से पैसा कमाना। शिक्षा का लक्ष्य पैसा कमाना। शिक्षा देने का लक्ष्य पैसा कमाना, अय्याशी करना।

    मोदीजी व लड़की की जासूसी

    ऐसी खबरें सुनने में आतीं रहीं कि मोदीजी ने मुख्यमंत्री रहते हुए किसी लड़की को प्रेम किया, उसकी जासूसी करवाई। इन खबरों में सच्चाई कितनी है मुझे बिलकुल नहीं पता।  मैं इतना जानता हूँ कि अपवाद प्रतिशत छोड़कर अधिकतर नेताओं, नौकरशाहों व व्यापारियों के अपनी पत्नियों से अलग महिलाओं से यौन रिश्ते होते हैं। बहुतों की बाकायदा घोषित/अघोषित रखैंले हैं। जिसकी जितनी औकात व क्षमता है वह उतनी रखता है। रखैलों से बाकायदा संताने हैं। दूसरों से उनकी पत्नियों को छीन कर अपनी रखैलें बनाईं हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि भारत में अपवाद प्रतिशत छोड़कर अधिकतर युवा लड़की पटाते हैं। मारपीट करते हैं। लड़कियों का पीछा करते हैं। पूरे फिल्मी अंदाज में। छेड़खानी करते हैं।

    मोदीजी ने यदि किसी लड़की को प्रेम किया भी तो क्या परेशानी, इतनी हाय तौबा क्यों…बहुत ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने अपनी पहली पत्नियों को छोड़ा और नईं नईं पत्नियां बनाईं। न केवल नईं नईं पत्नियां बनाईं बल्कि उनसे हुई संतानों को राजनीति में आगे भी बढ़ाया।

    मोदीजी व इवांका

    दुनिया के विकसित देशों में यदि इवांका जाएं तो उनको कोई नहीं पूछेगा। जैसे सामान्य पर्यटक आते हैं वही स्तर रहेगा उनका। लेकिन हमारा समाज ऐसा नहीं है। हमारे समाज का ढांचा बिलकुल अलग है। हमारे यहां ज्ञानी की संतान ज्ञानी होती है (ब्राह्मण), बहादुर की संतान बहादुर होती है (क्षत्रिय), अर्थशास्त्री की संतान अर्थशास्त्री होती है (वैश्य) व गुलाम की संतान गुलाम होती है (शूद्र)। 

    हमारे यहां बच्चों के माता पिता क्या हैं इसके आधार पर उनका मूल्यांकन होता है। बच्चे की अपनी गुणवत्ता का कोई मायने नहीं होता है। मेरा ही उदाहरण ले लीजिए, मेरे माता पिता की नजरों में मैं हरामखोर हूँ तो मेरा पुत्र आदि भी उनकी नजरों में हरामखोर है।

    जब नितीश कुमार जी ने राजद से अलग होकर सरकार बनाई तो हमने रातोंरात लालू प्रसाद जी की संतानों को भारत के महान राजनेताओं के रूप में प्रतिष्ठित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नितीश कुमार द्वारा लागू की गई अनेक सामाजिक हित की नीतियां कूड़े के भाव में। लालू जी क्रांतिकारी नेता रहे तो हमने उनकी संतानों को भी बैठे बिठाए क्रांतिकारी नेताओं के रूप में स्थापित कर दिया। सिर्फ इसलिए क्योंकि वे लालू जी के पुत्र हैं। लालू जी की संतान होना ही पर्याप्त है। दो चार लाइन के कुछ सवाल पूछ लेना, एक दो छोटे-मोटे भाषण ही पर्याप्त से अधिक हैं, भारत के सबसे जागरूक, महान व प्रगतिशील सोच के राजनेता हो पाने के लिए।

    लालू जी ही क्यों पूरे भारत में अनेक पार्टियों के राजनेताओं की संतानें अपने माता-पिता की गद्दी संभालती मिल जाएंगीं। न संभाल पाएं गद्दी तब भी विधायक सांसद तो हो ही जाते हैं। पत्नियां हो जातीं हैं, बहुएं, बेटियां माताएं भी विधायक सांसद हो जातीं हैं। और हम लोग उनकी संतानों की शान में कसीदे पढ़ते हुए। बाकायदा तेल-पालिश करते हुए, बटरिंग करते हुए, उनके लिए जीने मरने की कसमें खाते हुए।

    भारत के पर्यटन इलाकों में हजारों युवा विदेशी महिला के साथ फोटो खिचाने को लालायित रहता है। अपने घर की महिलाओं के साथ गाली गलौच करेगा लेकिन विदेश महिला के सामने निहायत सभ्य होने का ढोंग करता है।

    मोदीजी ने दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी की गोरी-चिट्टी, लंबी-तगड़ी बेटी को यदि ठीक से खाना खिला दिया, ठीक से हाय हेलो कर दी। तो इसमें परेशानी क्यों…. इतनी भी खुन्नस किस बात की।

    मित्र की बेटी को अपनी बेटी की तरह प्रेम करना, स्वागत करना गुनाह कब से हो गया। यह तो भारत की पुरानी परंपरा है। यहां तो गांव की बेटी को अपनी बेटी मानने की परंपरा रही है।

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    चलते-चलते

    यह भी गजब है, बहुतों को गांधीजी से खुन्नस आपको मोदीजी से खुन्नस। फर्क क्या। चरित्र तो एक ही हुआ।

    मोदीजी को आपने चुना है। मोदीजी बंपर बहुमत से सरकार बनाकर आए हैं, आप यह नहीं कह सकते कि आपने नहीं बल्कि आपके पड़ोसी न चुना है। सच यही है कि मोदीजी को आपने केवल इसलिए चुना है क्योंकि मोदीजी में आपको अपना अक्श दिखाई दिया। आपको लगा कि अपने जैसा आदमी आएगा तो फुलटू मौज रहेगी, जीवन अय्याशी व लफ्फाजी से सराबोर रहेगा।

    फेसबुक, व्हाट्सअप व अन्य सोशल मीडिया में मोदी जी के खिलाफ अभियान चलता हैI लोग कापी पेस्ट फारवर्ड करते हुए खुद को किरांतिकारी, जागरूक व सामाजिक ईमानदार जिम्मेदार, प्रतिबद्ध मान लेते हैंI लेकिन हममें से कितने ऐसे हैं जो अपने भीतर के खोखलेपन व बेहद विकृत व बीमार सैडिज्म को देख पाते हैं, सैडिज्म से दूर हो पाने की बात तो कल्पनातीत है।

    सारा मामला खांचों का, कौन किस खांचे में है व सैडिस्टिक मानसिकता का। स्वयं के भीतर के सैडिज्म को देखने व स्वीकारने की हिम्मत होनी चाहिए। दरअसल जब तक आप स्वयं उसी चरित्र के होते हैं जिस चरित्र का विरोध करने का ढोंग कर रहे होते हैं तब तक आप वास्तव में विरोध करते हुए भी विरोध की बजाय पुष्टीकरण ही कर रहे होते हैं।

  • Video: आदि, किताबें व आदि का अपना पुस्तकालय

    Video: आदि, किताबें व आदि का अपना पुस्तकालय

    लगभग एक मिनट के इस वीडियो में  आपको आदि के चेहरे व व्यवहार के कई आयाम दिखाई देंगे। यह वीडियो आपको आनंद देगा यह मेरा विश्वास है। कैसे आदि अपनी पसंद की किताब लाने के लिए आपकी बताई किताब का नाम मटेर देते हैं। कैसे उनकी पसंद की किताब बताने पर खुशी मन से किताब लाने जाते हैं। आपकी बताई किताब लाने के बावजूद, आपसे वही किताब पढ़ने को कहते हैं जो किताब वह पढ़ना चाहते हैं।

    एक समय था जब आदि लगभग आठ महीने के थे, तब बिस्तर में ढेर लगी किताबों में से किताब का नाम बताने पर किताब निकाल कर देते थे। फिर समय आया जब वे दूसरे कमरे में से नाम बताने पर किताब लाकर देने लगे। अब समय आ गया है जब आदि अपनी पसंद की किताब लाकर देने लगे हैं। आपकी जिद पर पसंदीदा किताब ला तो देते हैं लेकिन किताब कौन सी पढ़नी है, यह आदि ही तय करते हैं।

  • महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस पर ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता और एक स्वाभाविक प्रवाह को देखने की आवश्यकता –Sanjay Jothe

    महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस पर ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता और एक स्वाभाविक प्रवाह को देखने की आवश्यकता –Sanjay Jothe

    संजय जोठे


    Mahatma Jyotiba Phule and Dr. B. R. Ambedkar

    महात्मा ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है. आज जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं उनमे ये आवश्यकता और अधिक मुखर और बहुरंगी बन पडी है. दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक “क्रोनोलाजिकल” प्रवृत्ति है, समय के क्रम में उसमे एक से दूसरे पायदान तक विक्सित होने का एक पैटर्न है और एक सोपान से दूसरे सोपान में प्रवेश करने के अपने कारण हैं. ये कारण सावधानी से समझे और समझाये जा सकते हैं.

    अधिक विस्तार में न जाकर ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के उठाये कदमों को एकसाथ रखकर देखें. दोनों में एक जैसी त्वरा और स्पष्टता है. समय और परिस्थिति के अनुकूल दलित समाज के मनोविज्ञान को पढ़ने, गढ़ने और एक सामूहिक शुभ की दिशा में उसे प्रवृत्त करने की दोनों में मजबूत तैयारी दिखती है. और चूंकि कालक्रम में उनकी स्थितियां और उनसे अपेक्षाएं भिन्न है, इसलिए एक ही ध्येय की प्राप्ति के लिए गए उनके कदमों में समानता होते हुए भी कुछ विशिष्ट अंतर भी नजर आते हैं.

    ज्योतिबा के समय में जब कि शिक्षा दलितों के लिए एक दुर्लभ आकाशकुसुम था, और शोषण के हथियार के रूप में निरक्षरता और अंधविश्वास जैसे “भोले-भाले” कारणों को ही मुख्य कारण माना जा सकता था– ऐसे वातावरण में शिक्षा और कुरीती निवारण –इन दो उपायों पर पूरी ऊर्जा लगा देना आसान था. न केवल आसान था बल्कि यही संभव भी था. और यही ज्योतिबा ने अपने जीवन में किया भी. क्रान्ति-दृष्टाओं की नैदानिक दूरदृष्टि और चिकित्सा कौशल की सफलता का निर्धारण भी समय और परिस्थितियाँ ही करती हैं.

    इस विवशता से इतिहास का कोई क्रांतिकारी या महापुरुष कभी नहीं बच सका है. ज्योतिबा और उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी आम्बेडकर के कर्तृत्व में जो भेद हैं उन्हें भी इस विवशता के आलोक में देखना उपयोगी है. इसलिए नही कि एक बार बन चुके इतिहास में अतीत से भविष्य की ओर चुने गये मार्ग को हम इस भाँती पहचान सकेंगे, बल्कि इसलिए भी कि अभी के जाग्रत वर्तमान से भविष्य की ओर जाने वाले मार्ग के लिए पाथेय भी हमें इसी से मिलेगा.

    ज्योतिबा के समय की “चुनौती” और आंबेडकर के समय के “अवसर” को तत्कालीन दलित समाज की उभर रही चेतना और समसामयिक जगत में उभर रहे अवसरों और चुनौतियों की युति से जोड़कर देखना होगा. जहां ज्योतिबा एक पगडंडी बनाते हैं उसी को आम्बेडकर एक राजमार्ग में बदलकर न केवल यात्रा की दशा बदलते हैं बल्कि गंतव्य की दिशा भी बदल देते हैं. नए लक्ष्य के परिभाषण के लिए आम्बेडकर न केवल मार्ग और लक्ष्य की पुनर्रचना करते हैं बल्कि अतीत में खो गए अन्य मार्गों और लक्ष्यों का भी पुनरुद्धार करते चलते हैं. फूले में जो शुरुआती लहर है वो आम्बेडकर में प्रौढ़ सुनामी बनकर सामने आती है, और एक नैतिक आग्रह और सुधार से आरम्भ हुआ सिलसिला, किसी खो गए सुनहरे अतीत को भविष्य में प्रक्षेपित करने लगता है.

    आगे यही प्रक्षेपण अतीत में छीन लिए गए “अधिकार” को फिर से पाने की सामूहिक प्यास में बदल जाता है.

    इस यात्रा में पहला हिस्सा जो शिक्षा, साक्षरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्माने जैसे नितांत निजी गुणों के परिष्कार में ले जाता था, वहीं दूसरा हिस्सा अधिकार, समानता और आत्मसम्मान जैसे कहीं अधिक व्यापक, इतिहास सिद्ध और वैश्विक विचारों के समर्थन में कहीं अधिक निर्णायक जन-संगठन में ले जाता है. इतना ही नहीं बल्कि इसके साधन और परिणाम स्वरूप राजनीतिक उपायों की खोज, निर्माण और पालन भी आरम्भ हो जाता है.

    यह नया विकास स्वतन्त्रता पश्चात की राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति में बहुतेरी नयी प्रवृत्तियों को जन्म देता है. जो समाज हजारों साल से निचली जातियों को अछूत समझता आया था उसकी राजनीतिक रणनीति में जाति का समीकरण सर्वाधिक पवित्र साध्य बन गया. ये ज्योतिबा और आम्बेडकर का किया हुआ चमत्कार है, जिसकी भारत जैसे रुढ़िवादी समाज ने कभी कल्पना भी न की थी. यहाँ न केवल एक रेखीय क्रम में अधिकारों की मांग बढ़ती जाती है बल्कि उन्हें अपने दम पर हासिल करने की क्षमता भी बढ़ती जाती है.

    इसके साथ साथ इतिहास और धार्मिक ग्रंथों के अँधेरे और सडांध-भरे तलघरों में घुसकर शोषण और दमन की यांत्रिकी को बेनकाब करने का विज्ञान भी विकसित होता जाता है.ये बहुआयामी प्रवृत्तियाँ जहां एक साथ एक ही समय में इतनी दिशाओं से आक्रमण करती हैं कि शोषक और रुढ़िवादी वर्ग इससे हताश होकर “आत्मरक्षण” की आक्रामक मुद्रा में आ जाता है.एक विस्मृत और शोषित अतीत की राख से उभरकर भविष्य के लिए सम्मान और समानता का दावा करती हुयी ये दलित चेतना इस प्रष्ठभूमि में लगातार आगे बढ़ती जाती है.

  • मेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे की कहानी

    मेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे की कहानी

    Vivek Umrao Glendenning

    प्रस्तावना परिचय

    प्रस्तावना परिचय से आगे:
    इसी काल में शुरू होती है पूर्वी उत्तर प्रदेश के पिछड़े इलाके के गांव के रमाशंकर पाण्डे की। उन रमाशंकर पाण्डे की, जिन्होंने मुझे तब सहारा दिया जब मुझे चारों तरफ से लातें पड़ रहीं थीं। रमाशंकर पाण्डे एक पिछड़े गांव के सामान्य किसान परिवार से हैं। इनके कई भाई हैं। जयशंकर पाण्डे इनके सबसे बड़े भाई, मेरे सामाजिक मित्र रहे। मेरे व रमाशंकर पाण्डे के बीच संबंधो का रास्ता यही जयशंकर पाण्डे थे। रमाशंकर पाण्डे उन दिनों बनारस के सर्वसेवासंघ में रहा करते थे। दो कमरे, एक रसोई व एक शौचालय।

    मैंने आईआईटी कानपुर के भौतिकी के प्रोफेसर एच सी वर्मा जी से बात की, उनको परिस्थितियों व माता-पिता द्वारा बेदखली से अवगत कराया। उनका कहना हुआ कि मैं भारत के जिस शहर में जाना चाहूं, जैसी भी कोचिंग करना चाहूँ या मैं किसी गांव जाकर वहां कुछ करना चाहूँ तो वे मेरा पूरा खर्च कुछ वर्षों तक बिना शर्त वहन करने को तैयार हैं। मेरे लिए यह बहुत बड़ा संबल था। मैंने सोचा कि यदि जीवन मरण का प्रश्न खड़ा होगा तो यह विकल्प है ही। किंतु उस समय मैंने इस विकल्प को स्वीकार करने से मना कर दिया, भविष्य के गर्भ के लिए विकल्प को संभावनाओं के साथ छोड़ दिया।

    दो सौ रुपए, एक पिठ्ठू बैग, कुछ किताबें, दो जोड़ी कपड़े व कुछ दस्तावेज। कुल जमा यही गृहस्थी थी जिसे लेकर मैं जयशंकर पाण्डे के यहां सर्वसेवासंघ पहुंचा। दो सौ रुपयों में से काफी रुपए कानपुर से वाराणसी पहुंचने में खर्च हो चुके थे। यूं समझिए कि मेरे पास पैसे नहीं थे।

    जयशंकर पाण्डे वहां रहते नहीं थे। रमाशंकर पाण्डे रहते थे। रमाशंकर के पास भी पैसे नहीं होते थे। रमाशंकर संस्कृत से स्नातक की पढ़ाई पढ़ रहे थे। उनको भी घर से खर्च बहुत कम मिलता था। मैं व रमाशंकर दाल चावल, कभी कभी दाल नमक प्याज खाकर कई महीने रहे। मैंने कई मित्रों से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की लेकिन सभी कन्नी काट गए। स्थिति यह थी कि प्रोफेसर एच सी वर्मा जी के पास जाने तक के किराए के लिए पैसे नहीं थे। जीवन को मुख्यधारा की रूटीन हिसाब से इतर अपनी शर्तों में जीने के लिए भारत में बहुत संघर्षों, उपेक्षाओं, प्रताडंनाओं व तिरस्कारों को झेलना पड़ता है।

    उन्हीं दिनों दिल्ली की गांधी निधि, गांधी शांति प्रतिष्ठान, अवार्ड व कनाडा की यूनिवर्सिटी संयुक्त सेमिनार आयोजित करने वाली थी। जागृति राही दीदी व उनके पति संजय सिंह भाई के सहयोग व सुझाव पर मैं दिल्ली पहुंचा जहां मेरी मुलाकात व मित्रता अनुपम मिश्र जी से हुई। दिल्ली पहुंचने पर भी मेरे पास लगभग पचास रुपए व पिठ्ठू बैग वाली गृहस्थी थी। ट्रेन का किराया व टैक्सी का किराया जागृति राही दीदी द्वारा दिया गया था।

    जब क्लेयर से मेरा विवाह हुआ तब मैंने क्लेयर को बताया कि रमाशंकर पाण्डे मेरे जीवन की रक्षा करने वाले लोगों में से एक हैं। मैंने व मेरी पत्नी ने रमाशंकर से पूछा कि वह क्या करना चाहते हैं। रमाशंकर ने दिल्ली आने की इच्छा जाहिर की। रमाशंकर कई वर्षों तक हमारे घर में हमारे सगे छोटे भाई की तरह कई सालों तक रहे। रमाशंकर ने अंग्रेजी स्पीकिंग कोर्स, जिम इत्यादि जो भी सीखना व करना चाहा उसके लिए पूरी सुविधाएं दी गईं जैसे कि अपने घर के बच्चों को दी जातीं हैं।

    वहीं रमाशंकर आज देश भर में बाडी बिल्डिंग में नाम व शोहरत कमा रहे हैं। सामान्य किसान परिवारों का लाखों युवा दिल्ली आकर रोजी रोटी का जुगाड़ करना चहता है, सपने देखता है। रमाशंकर चाहते तो दिल्ली में ही अच्छा खासा जीवन यापन कर सकते थे। लेकिन रमाशंकर वापस अपने गांव लौटे। बिना पूंजी के शुरूआत की, और धीरे-धीरे इलाके का सबसे बेहतर जिम स्थापित किया। 

    रमाशंकर का जिम केवल कसरत नहीं कराता है, वरन् स्वस्थ व सक्रिय रहने की जीवन शैली की बात करता है। खानपान के तौर तरीके बताता है। रमाशंकर ने अपनी मेहनत के दम पर पूरे जिले व पड़ोसी जिलों में अपनी सम्मानपूर्ण पहचान बनाई है। सरकारी अधिकारी व उनके परिवार भी खानपान व स्वास्थ्य के तौर तरौके सीखने समझने आते रहते हैं।

    रमाशंकर पाण्डे राज्य व राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में धमाल मचाते रहते हैं। Mr NCR, Mr North India to Time, Delhi Classic Shree, Mr UP, Mr Delhi जैसी प्रतियोगिताओं में खिताब जीत चुके हैं। ऐसी ही एक प्रतियोगिता में एक अच्छी मोटरसाइकिल भी उपहार में मिली।

    इतने खिताबों को जीत चुकने तथा फिटनेस व हेल्थ सेंटर से अचछा खासा पैसा कमाने के बावजूद, रमाशंकर अपने खेतों में काम करते हैं। मजदूरी करते हैं। मेेेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे ऐसे ही बने रहें, नाम व शोहरत कमाते रहें।

    Ramashankar Pandey

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  • दलाई लामा बनाम तिब्बत –Sanjay Jothe

    दलाई लामा बनाम तिब्बत –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe


    Dalai Lama

    दलाई लामा जैसे लोग अपने देश और संस्कृति को बर्बाद करके विकसित और सभ्य देशों को सभ्यता और धर्म सिखाते हैं तो बड़ा मजा आता है. ये बिलकुल भारतीय बाबाओं जैसी लीला है. अपने खुद के घर में सडांध और बीमारियाँ फ़ैली है और दूसरों के साफ़ सुथरे घर में जाकर सुगंध, स्वच्छता और सौन्दर्य पर भाषण देते हैं.

    इनका अपना ज्ञान पिछली कई सदियों से तिब्बत को लगातार खोखला करता गया. भयानक अंधविश्वास, शोषण और अशिक्षा ने वहां के आम जन को जानवरों जैसी जिल्लत में बनाये रखा. महिलाओं और गरीबों सहित बच्चों के अधिकारों को कुचला गया.

    चीन का आक्रमण बहुत बाद में हो रहा है. चीन के आने के पहले ही वहां पुनर्जन्म पर आधारित दलाई लामा नाम की संस्था ने इतना शोषण किया है जिसका कोई हिसाब नहीं. एक पूरा देश और संस्कृति धीरे धीरे बर्बाद की गयी है इन महाशय के द्वारा. ये कहते हैं ये पहले वाले लामा जी के पुनर्जन्म हैं. अगर इनकी बात मान भी लें तो ये और बड़े अपराधी सिद्ध होते हैं.

    ये पहले दुसरे या दसवें बारहवें के पुनर्जन्म हैं, इसका अर्थ ये हुआ कि तिब्बत के समाज और संस्कृति को गर्त में पहुंचाने के लिए उन्होंने एक व्यक्ति या एक संस्था के रूप में हर पीढी में खुद ही जरुरी निर्णय लिए हैं.

    इसका क्या मतलब हुआ?

    यही मतलब हुआ कि आज तिब्बत जो कुछ है वह इन्हीं महाशय की देन है. कोई राष्ट्र या समाज जब इतना लचर और दकियानूसी हो जाए तो अडोस पड़ोस के देश उसपर चढ़ाई कर सकते हैं. चीन ने यही किया. चीन दलाई लामा द्वारा बनाई परिस्थितियों का अपने हित में शोषण कर रहा है.

    दलाई लामा से आज तक सही प्रश्न नहीं पूछे गए हैं. उनसे पूछा जाना चाहिए कि तिब्बत की संस्कृति और समाज को नष्ट होने से बचाने के लिए अतीत में क्या किया जा सकता था? फिर उनके चेहरे का रंग देखिये. उनसे ध्यान समाधी, सुख दुःख स्वर्ग नरक या अध्यात्म के चलताऊ सवाल करने से कुछ नहीं होता. ऐसे सवालों का जवाब देना सभी को आता है. उन जवाबों से न आज तक कुछ हुआ है न आगे कुछ होगा.

    अब ये सज्जन अपने समाज और संस्कृति की होली जलाकर दुनिया भर में ज्ञान बाँट रहे हैं. ये अच्छा मजाक है. अमेरिकी राजनीति को अगर चीन के खिलाफ एक मोहरे की जरूरत न हो तो ये इन महाशय की महानता अभी तुरंत खो जायेगी.

    कम से कम भारतीय ओबीसी, दलितों और स्त्रीयों को इन महाशय से बचकर रहना चाहिए. ये जब भी मिलें इनसे अध्यात्म के नहीं बल्कि तिब्बत के समाज के योजनाबद्ध विनाश के संबंध में सवाल पूछिए. तब देखिये इनका सारा चमत्कार धरा रह जाएगा.

     

  • क्या हम वाक़ई स्त्री मर्यादा की संस्कृति की रक्षा करने वाले राष्ट्र हैं?

    क्या हम वाक़ई स्त्री मर्यादा की संस्कृति की रक्षा करने वाले राष्ट्र हैं?

     

    [thrive_headline_focus title=”त्रिभुवन” orientation=”right”]

    फ़तेहसागर की पाल पर वह सुबह-सुबह कहने लगा : देश भर में “पद्मावती” फिल्म को देखेे बिना ही भारी विरोध हो रहा है। यह भी समझ नहीं आता कि रत्नसिंह की पत्नी का नाम पद्मिनी था तो पद्मावती का विरोध क्यों हो रहा है? नाम ही बदल गया तो विरोध का आधार ही क्या रह जाता है? आख़िर आप अख़बारों में लिखते ही हैं कि “बदला हुआ नाम!”

    कहते हैं, 1303 में अलाउद्दीन ख़िलजी ने पद्मिनी को हासिल करने की कोशिश की थी। उसने चित्तौड़ के दुर्ग पर हमला किया था। महीनों किले की घेराबंदी किए रखी। समझ नहीं आता कि कोई शासक इतना सनकी हो सकता है कि वह किसी दूसरे की पत्नी को हासिल करने के लिए इतना कुछ क्यों करेगा? ऐसा होगा तो वह पागल ही हो जाएगा।

    उसका तर्क था : दरअसल यह घटना 714 साल पुरानी है। अलाउद्दीन छू भी न ले, इसलिए रानी पद्मिनी ने जौहर कर लिया था। उस समय तो कोई इतिहास भी नहीं लिखता था। किसी के पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं था। आप कल्पना कीजिए, आज जिस समय हिन्दुस्तान में एक नेता किसी दूसरे के बारे में कहता है कि मशीन में आलू इधर से डालो तो उधर से सोने का लड्‌डू निकलेगा, उसे ही तोड़मेरोड़ कर पेश किया जा सकता है और 90 प्रतिशत से अधिक सुशिक्षितों के दिमाग़ में एक बेबुनियाद झूठ बिठा दिया जाता है तो उस काल में तो लाेगों ने क्या ही किया होगा।

    उसने कहा : और जो देश 714 साल पहले की एक रानी के एक काल्पनिक नृत्य के एक काल्पनिक दृश्य पर इतना आंदाेलित है, वही देश चीन की सान्या सिटी में देश की एक छोरी मानुषी छिल्लर के मिस वर्ल्ड बनने पर बधाइयां दे रहा है। ग़ज़ब देश है। और प्रसन्नता से फूलकर कुप्पा हुआ जा रहा है। विचित्र लोग हैं। लेकिन साथ ही यह पद्मावती मामले में भंसाली को कोसते हुए अपने-अपने सेलफोन्स के वाट्सऐप पर मानुषी छिल्लर की आने वाली गरमागरम तसवीरों और विडियो क्लिपिंग्स पर इतना लहालोट होते हैं कि उसके स्त्री मर्यादा के पाखंड पर हंसी आ जाती है।

    उसने मेरी आंखों में आंखें डालकर कहा : मुझे नहीं मालूम कि मिस वर्ल्ड का ख़िताब किसी लड़की के सिर पर इस तरह की अश्लील शारीरिक मुद्राएं दिखाने के बाद सिर पर आकर टिकता है। संजय लीला भंसाली तो फिर भी कुछ हदों में रहते हैं, लेकिन ब्रिटेन में छोटे पर्दे पर सेक्स बेचने वाला एरिक मॉरले तो रीता फारिया से लेकर मानुषी छिल्लर तक छह वर्जिन तरुणियों को सेक्स का तड़का लगाकर सौंदर्य के पुजारी बने बैठे कार्पोरेटिया पैजेंट्स को नहला चुका है। लेकिन यह सब हमें अच्छा लगता है। बहुत बधाई वाला मंगल काम। जैसे ही किसी तरुण के विश्व सुंदरी बनने की ख़बर आती है, चारों तरफ से बधाइयां बरसने लगती हैं। यहां हमारी सनातन संस्कृति वात्स्यायन के मूड और माइंड में आ बसती है।

    उसने फ़ोन का वाट्स ऐप चेक किया और कहने लगा : मैं देखता हूं, हमारे यहां कुछ लोग सारा दिन मुस्लिमों के खिलाफ वाट्स ऐप चलाते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि दुनिया की एक चौथाई यानी लगभग 23 प्रतिशत आबादी मुसलिम होने के बावजूद उनकी शायद ही कोई छोरी ऐसे किसी नग्न कार्यक्रम में शामिल होती हो। आैर एक हमारा देश है कि सारा दिन मर्यादा-मर्यादा करते हुए अपनी संस्कृति का ढोल पीट पीटकर थकथकाकर चूर हो सो जाता है। और अगली सुबह पता चलता है कि अपनी मर्यादा तो चीन में जाकर अपनी सेक्सुअल ब्यूटी का परचम कार्पोरेट पैजेंट्स के दरबार में फहरा आई है। और हम अचानक पिछला गाना भूलकर उसके गीत गाने लगते हैं।

    वह बोला : काल्पनिक पद्मावती के नृत्य पर जिनकी भृकुटियां तनी हुई हैं, उन्हें होश है कि नहीं!!! स्त्री गरिमा स्त्री गरिमा ही होती है। वह चाहे पद्मावती की हो या फूलनदेवी की।

    उसका कहना था : आखिर क्या कारण है कि हम पद्मिनी भी हमीं चाहते हैं और सनी लियोन को भी हमीं हिट करते हैं? हम किसी सामान्य दलित महिला पर इतना अत्याचार करते हैं कि वह फूलन देवी बन जाती है और हम आए दिन इतने अमानुषिक होते हैं कि हमारे देश में महिलाओं से बलात्कार के मुकदमे सारी हदें तोड़ जाते हैं। हम स्त्रियों की मर्यादा के इतने रक्षक हैं कि दहेज, भ्रूण हत्या आैर घरेलू हिंसा के लिए विशेष कानून बनाए जाते हैं, क्योंकि सामान्य कानूनों से हल ही नहीं निकलता।

    वह मुझे बहुत नाराज़ लग रहा था। कहने लगा : हम सुबह-शाम चीन-चीन-चीन चिल्लाते हैं! मत खरीदो चीन का सामान। बहिष्कार चीनी सामान। और पता लगा कि हमारी मर्यादाओं की नथ उतरवाई तो एरिक मॉर्ले का प्रेत चीन में ही करता है और हम प्रसन्न होते हैं कि हमें 17 साल बाद यह मौक़ा मिला है!

    अंतत: वह दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गया और बोला : मैं विनम्रता से जानना चाहता हूं कि आज मेरे भारत का असली सच क्या है? पद्मिनी के गौरव पर मर मिटने वाला या चीन में मर्यादा की नथ उतरवाई करवाने वाला?

    हम जा कहां रहे हैं? -बुदबुदाते हुए वह चला गया!

    मैं अवाक् था।

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    Credits: Tribhuvan’s facebook.

  • ओशो रजनीश और उनकी ब्राह्मणी तकनीकें –Sanjay Jothe

    ओशो रजनीश और उनकी ब्राह्मणी तकनीकें –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    “….पश्चिमी दार्शनिकों और विचारकों ने भारतीय दर्शन पर एक गंभीर टिप्पणी की है कि भारतीय दर्शन या विचार में विचार के स्तर पर हर विरोधी बात का एकीकरण या संश्लेषण हो जाता है लेकिन सामाजिक या व्यक्तिगत जीवन में एकीकरण एकदम असंभव है…”

    एक बार ओशो रजनीश से किसी ने बुद्ध के बारे में प्रश्न किया. बात अनत्ता अर्थात अनात्मा की हो रही थी, रजनीश ने सनातनी ब्राह्मणी चाल चलते हुए उत्तर दिया कि अनात्मा और आत्मा एक ही है जैसे कि पूर्ण (ब्रह्म) और शून्य एक ही है. सुनने वाले जो कि अक्सर भक्त टाइप के लोग होते हैं वे इस उत्तर से बड़े प्रभावित होते हैं और इस दिव्य “संश्लेषण” से चमत्कृत हो जाते हैं. ठीक इसी तरह अरबिंदो घोष भी “सुप्रामेंटल” या अतिमानस की धारणा देते हैं और पूर्व और पश्चिम को मिलाकर एक करने की बात करते हैं. उनके भक्त भी उनकी इन बातों से बड़े प्रभावित होते हैं.

    रजनीश जैसे बाबाओं से ये पूछा जा सकता है कि अगर आत्मा अनात्मा एक ही हैं तो बुद्ध को अनात्मा शब्द के इस्तेमाल की क्या जरूरत आन पड़ी थी? क्या बुद्ध ने स्वयं आत्मा और अनात्मा को एक ही कहा है? इसका उत्तर ये ब्राह्मणवादी धूर्त नहीं दे सकते. असल में ये किसी भी प्रश्न का उत्तर सीधे सीधे दे ही नहीं सकते. ये हमेशा दूसरों के कंधे पर बन्दुक रखके सामान्य जन की तर्कबुद्धि का शिकार करते हैं. इसी तरह आत्मा परमात्मा तक को एक ही सिद्ध करते हैं, फिर पदार्थ और परमात्मा को भी एक ही सिद्ध करते हैं. इनके इस एकीकरण के प्रोजेक्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो एक ही सिद्ध न किया जा सके. लेकिन हकीकत में जमीन पर ये धूर्त कुछ भी एक नहीं होने देते.

    पश्चिमी दार्शनिकों और विचारकों ने भारतीय दर्शन पर एक गंभीर टिप्पणी की है कि भारतीय दर्शन या विचार में विचार के स्तर पर हर विरोधी बात का एकीकरण या संश्लेषण हो जाता है लेकिन सामाजिक या व्यक्तिगत जीवन में एकीकरण एकदम असंभव है. इस सनातनी एकीकरण के गीत गाने वील महान दार्शनिक शंकराचार्य भी अद्वैत के गीत गाते फिरते थे लेकिन स्त्री, सेवक, कामगार और शूद्रों को छूने में घबराते थे. इनके मन में गहराई से झांकें तो पता चलता है कि ये लोग एकीकरण या अद्वैत की बात ही इसलिए निकालते हैं कि ये अपने भेदभाव भरे धर्म को भेदभाव के आरोप से मुक्त कर सकें.

    इनसे कोई पूछे कि महाराज आपकी धर्म व्यवस्था में स्त्री को शिक्षा का या सम्मान का अधिकार क्यों नहीं है तो ये तपाक से उत्तर देते हैं कि कण कण में ब्रह्म समाया है उसी का नूर फैला है अतिमानस का प्रकाश फैला है फिर स्त्री पुरुष का भेद कैसा? ऐसी हवा हवाई बात सुनकर हमारे लोग शांत और संतुष्ट भी हो जाते हैं. ये भी एक गजब का चमत्कार है.

    असल में ओशो रजनीश भारतीय ब्राह्मणवादी षडयंत्र का सबसे कामयाब उदाहरण हैं. उनकी जीवनयात्रा और उनके नाम बदलने से लेकर सैद्धांतिक बदलाव करने की रणनीतियों का ठीक से अध्ययन करें तो आप पायेंगे कि वे किस तरह सिद्धांतों और शास्त्रों से खेल रहे हैं और प्रगतिशील या विचारवान होने के परदे के पीछे हर धर्म हर संप्रदाय के अंधविश्वास को बढाते हुए उन्हें ब्राह्मणवाद की जहरीली त्रिमूर्ति – आत्मा, परमात्मा और पुनर्जन्म में घसीट रहे हैं.

    उनके किसी भी शिष्य से पूछ लीजिये, वे बुद्ध की अनात्मा की बात करते हुए भी अंतिम रूप से अपने खुद के सात सौ साल पुराने तिब्बती अवतार की बात करते हैं और भारत तिब्बत सहित अन्य देशों के अन्धविश्वासी संप्रदायों को फिर से अतीत के खूंटे से बाँध देते हैं. उनके शिष्य समुदाय में भी जो लोग हैं वे उनकी किताबों के अलावा कुछ पढ़ते नहीं हैं इसलिए समस्या और बढ़ जाती है.

    ये असल में ब्राह्मणवादी पाखण्ड के काम करने का ऐतिहासिक तरीका है जिसका साकार रूप आप ओशो रजनीश और उनके बाद चल रहे उनके शिष्यों के आश्रम में देख सकते हैं. ब्राह्मणवाद का एक केंद्रीय चरित्र ये है कि वो खुद बाँझ होता है वो कुछ भी नया पैदा नहीं कर सकता. वो हर दो सौ पांच सौ साल में दूसरों के पैदा किये हुए ज्ञान को अपनी भाषा में अनुवाद करता है और आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के जहरीले दलदल में डुबाकर उसे नया नाम दे देता है.

    ये इन्होने बुद्ध, महावीर और कबीर के साथ किया है. महान गोरखनाथ को भी इन्होने ऐसे ही नष्ट किया है. फिर ये नए दर्शन को ब्रह्मा विष्णु महेश के किसी पौराणिक अवतार से जोड़ देते हैं और सारा श्रेय ले उड़ते हैं. साथ में इनके लट्ठबाज भक्त पुराने दार्शनिकों के ग्रन्थ उनके मत और परंपराओं को आग लगते रहते हैं. बाद में जब पुराने दार्शनिकों के ग्रन्थ और परम्पराएं जमीन से समाप्त हो जाती हैं तो इन ब्राह्मणवादी धूर्तों की पौराणिक गप्पों को फैलाने वाला तंत्र सक्रिय हो जाता है. ये इनकी आजमाई हुई तकनीक है.

    इसीलिये इनके पास इतिहास नहीं है. जो दूसरों के घर में चोरी करते हैं वे अपनी चोरी का इतिहास कभी नहीं लिखते. इतिहास के नाम पर पुराण की गप्प लिखी जाती है, उसे वे कुछ इस तरह लिखते हैं कि असल में दार्शनिक सिद्धांत और विचार जिन्होंने पैदा किये उनका कोई उल्लेख न हो, उनके वास्तविक इतिहास उनके जन्म मरण की तिथि और उनके जीवन के बारे में कोई सबूत न रह जाए. इसीलिये भारत में कबीर तक के बारे में पक्की जानकारी नहीं है की उनका जन्म कब हुआ और उनकी मृत्यु कब हुई या उनके माता पिता या स्वयं उनका धर्म क्या था. अब कबीर कोई बहुत पुराने व्यक्ति नहीं हैं. पश्चिम में यूरोप में उनके पास साफ़ साफ़ इतिहास है, उनके महापुरुष विचारक या राजा सामंत आदि से जुदा इतिहास तिथियाँ इत्यादि उनके पास हैं.

    लेकिन भारत अभी भी पुराण में फंसा हुआ है. अभी हाल ही में गुजरे शिर्डी के साईंबाबा के बारे में भी ब्राह्मणवादी धूर्तों ने यही खेल रचा है. साईंबाबा की तस्वीर और ढंग देखकर एकदम समझ में आता है कि वे मुस्लिम थे, लेकिन उनका प्रभाव ऐसा था कि उनका इतिहास और उनकी वल्दियत मिटा दी गयी. जो खेल कबीर के साथ हुआ वही साईंबाबा के साथ हो रहा है. ये है ब्राह्मणवाद का तरीका, दूसरों की मेहनत को हजम करके अपने खाते में दिखाना इनका पुश्तैनी धंधा है.

    ये धंधा ओशो रजनीश ने खूब चलाया है. खुद उनके लेक्चर्स में वे बार बार कहते हैं कि उन्होंने लाखों किताबें पढ़ीं हैं. ये सही भी है. लेकिन इस विराट अध्ययन का इस्तेमाल वे किस तरह कर रहे हैं? ये बात बहुत महत्वपूर्ण है. इस अध्ययन का इस्तेमाल वे असल में अलग अलग संप्रदायों के अंधविश्वासों का शोषण करने के लिए कर रहे हैं. इसी अध्ययन के द्वारा वे पश्चिम में जन्मे महान दार्शनिकों विचारकों को जान समझ रहे हैं और उन्हें इधर-उधर से काटकर आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के रेडीमेड ताबूत में ठूंस रहे हैं.

    एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ. रजनीश जब साठ के दशक के अंत में वामपंथी विचारों से भरे वक्तव्य दे रहे थे तब उन्होने देखा कि इस तरह उनका बड़ा प्रभाव नहीं होने वाला है. तब उन्होंने भारत की सनातन अंधविश्वास भरी बुद्धि का उपयोग करने का निर्णय लिया और लोगों को संन्यास और ध्यान आदि सिखाने लगे.

    ये तरीका सफल रहा. इसके बारे में उनके खुद के वक्तव्यों से सबूत मिलते हैं. उन्होंने खुद कहा है कि वे एकबार लेनिन के सहयोगी मानावेंद्र्नाथ रॉय से मिले थे और रॉय को उन्होंने सलाह दी थी कि “जब तक आप बाबाओं जैसा वेश धारण न करें इस मुल्क में आपको कोई नहीं सुनेगा”. अब आप सोचिये जो आदमी मंवेंद्र्नाथ रॉय जैसे महान विचारक और दिग्गज साम्यवादी को ये सलाह दे सकता है वो खुद इसका पालन क्यों नहीं कर सकता?

    ओशो ने आगे यही किया है. अब बाद में ये सज्जन स्वयं को भगवान् घोषित करते हैं और ध्यान समाधि की शिक्षा देने लगते हैं. उस जमाने में पश्चिम में फ्रायड और जुंग के साइको एनालिसिस की धूम मची थी और नवधनाड्य अमेरिकी मध्यमवर्ग के बच्चे चरस गांजे और फ्री सेक्स के पीछे पागल हुए दुनिया भर में घूम रहे थे. ओशो ने इस बात को ठीक से पकड़ा. उसी समय महान मनोवैज्ञानिक विल्हेम रेख ने ह्युमन पोटेंशियल मूवमेंट शुरू किया था जो केथार्सिस या रेचन के आधार पर दमित भावनाओं के निकास द्वारा मनोचिकित्सा करता था.

    इस मूवमेंट में सेक्स और कुंठा सहित बचपन के व्यक्तिगत दमन और सामूहिक दमन के सहज मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा चिकित्सा की जाती थी. इस मूवमेंट के द्वारा कई तरह के थेरेपी ग्रुप और एनकाउन्टर ग्रुपों की रचना की. इन सभी बातों को ओशो रजनीश ने सीधे सीधे उठा लिया, ठीक उसी तरह जैसे अरबिंदो घोष ने नीत्शे और डार्विन को उठा कर अतिमानस बना डाला था, या विवेकानंद ने भगिनी निवेदिता के मार्गदर्शन में केथोलिक मिशन को उठाकर रामकृष्ण मिशन बना डाला था.

    ओशो रजनीश ने जब ये खेल शुरू किया तब पश्चिमी हिप्पियों का हुजूम भारत आने लगा. ह्युमन पोटेंशियल मूवमेंट को सक्रिय ध्यान और तंत्र की खोल में ट्रांसलेट करके ये बाबाजी ऐसा दिखाने लगे कि ये उनकी कोई महान खोज है. गांजे चरस और फ्री सेक्स को खोजते हुए ये हिप्पी यहाँ जम गए और भारतीय भक्त इस बात से बड़े प्रसन्न हुए कि हमारे बाबाजी को फिरंगी गोरे लोग कितना मानते हैं. अब चारों तरफ धूम मच गयी. इस कंट्रास्ट को मेनेज करना कठिन था लेकिन असंभव नहीं. ऐसी ब्राह्मणवादी धूर्तता का सारा प्रयोग रजनीश ने अपने बचपन में भी खूब किया है. उनकी आत्मकथा इन बातों से भरी पड़ी है कि वे कैसे भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाते थे और अपना काम निकाल लेते थे.

    उनके भक्त उनकी इन “लीलाओं”के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते हैं, लेकिन इनमे छुपी अनैतिकता को देखना नहीं चाहते.

    पश्चिमी हिप्पियों और सन्यासियों सहित भारत के अंधविश्वासियों को एक साथ एक ही आश्रम में संतुष्ट रखना ही वो असली बिंदु है जिससे रजनीश के विरोधाभासी वक्तव्य निकलते हैं. अपने सामने बैठी इस अजीब सी भीड़ को जब वे प्रवचन देते थे तब उन्हें एक संतुलन बनाना होता था. किसी बात में एकदम अंधविश्वास की तारीफ़ करेंगे और अगली बात में उस अंधविश्वास को एकदम उड़ा देंगे. इस तरह सामने की भीड़ में बैठे सभी तरह के लोग संतुष्ट होकर उनसे चिपके रहते और चंदा देते रहते.

    इस बात को गौर से देखिये. सडक किनारे एक पेड़ के नीचे बैठे किसी तोताछाप ज्योतिष या बाबा से कभी बात कीजिये, वो भी यही तकनीक इस्तेमाल करता है. आपको कुछ कहेगा और आपके बाद के ग्राहक को कुछ और कहेगा. अगर आप दोनों साथ मिलकर उससे वही बात पूछें तो वो एकदम रहस्यवाद में उतर जाएगा और वेद वेदान्त की जलेबी बनाने लगेगा. ठीक यही ओशो रजनीश जीवन भर कर रहे हैं. वे बुद्ध के अनात्मा या पुनर्जन्म के नकार के सिद्धांत को भी सही बताते हैं और अपने सात सौ साल पुराने जन्म का वर्णन भी करते हैं. और उनके अंधे भक्त इन दोनों बातों पर ताली बजा बजाकर कीर्तन करते हैं. इससे बड़ा मजाक न दुनिया में कभी हुआ है न आगे होगा.

    ब्राह्मणवाद और ओशो रजनीश जैसे धूर्त गुरु इसी तरह भारत को हर मोड़ पर पाखंड के दलदल में वापस घसीटते रहते हैं. ये भारत का असली दुर्भाग्य है. आज भारत का समाज जिन समस्याओं से जूझ रहा है वो शुद्धतम ब्राह्मणवाद द्वारा पैदा की गयी समस्याएं हैं. इसे गौर से पहिचान लीजिये और ओशो रजनीश जैसे धूर्तों को बेनकाब कीजिये. बुद्ध और कबीर को मिटाने वाले इनके षड्यंत्रों से बचकर रहिये. कम से कम भारत के गरीबों दलितों शूद्रों और स्त्रीयों को इन बाबाओं से बचकर रहना चाहिए. 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।