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  • सामाजिक न्याय :: जाति-व्यवस्था-सामाजिक-आरक्षण बनाम संवैधानिक-आरक्षण

    सामाजिक न्याय :: जाति-व्यवस्था-सामाजिक-आरक्षण बनाम संवैधानिक-आरक्षण

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से

    (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारहवें महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)


    मित्र : आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं?

    नोमेड : जी बिलकुल।


    मित्र : क्यों?

    नोमेड : क्योंकि संवैधानिक-आरक्षण, शोषक-वर्गों द्वारा शोषित-वर्ग के साथ सैकड़ों वर्षों तक लगातार प्रति क्षण की गई क्रूरता व बर्बरता का सक्रिय माफीनामा है। और साथ ही एकमात्र औजार है, जिससे जाति-व्यवस्था के पारंपरिक अन्याय को सामाजिक-न्याय में बदला जा सकता है।


    मित्र : क्या आपकी रोजी-रोटी, व्यवसाय आदि में संवैधानिक आरक्षण का योगदान है?

    नोमेड : बिलकुल नहीं, मैं ऐसा कोई व्यवसाय नहीं करता,  मैं ऐसी कोई नौकरी नहीं करता जिस तक पहुंचने के लिए  मुझे संवैधानिक आरक्षण मिला हो। मेरी क्रियाशीलता, मेरी गतिविधियों, मेरी सोच, मेरी समझ, मेरे व्यक्तित्व आदि में संवैधानिक आरक्षण का कोई योगदान नहीं रहा। मैंने बचपन से लेकर आज तक संवैधानिक आरक्षण की रोटी व सुविधा नहीं खाई। मेरे पिता की रोजी-रोटी, आर्थिक-आय आदि में उनको कभी संवैधानिक आरक्षण नहीं मिला। मेरी पत्नी को नहीं मिला। मेरी संतानों को नहीं मिलेगा।


    मित्र : फिर भी आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं, क्यों?

    नोमेड : क्योंकि मानवता, संवेदना, न्याय आदि तत्व समाज, देश, देश की भावी-पीढ़ियों के लिए  मानव-निर्मित राजनैतिक, आर्थिक व धार्मिक तंत्रों आदि को धनात्मक, कल्याणकारी, सृजनशील, ईमानदार व सामाजिक प्रतिबद्ध बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। ध्यान से देखा जाए तो शक्तिशालियों, विजेताओं और तंत्रों को बनाने व चलाने वालों ने शोषक वर्ग व शोषक वर्ग के सहयोगी वर्गों के हितों के लिए जाति-व्यवस्था के रूप में “सामाजिक आरक्षणों” का स्थायी प्रबंध कर दिया।


    मित्र : सामाजिक आरक्षण किसको कह रहे हैं आप?

    नोमेड :  सामाजिक आरक्षणों का तात्पर्य यह कि समाज की शक्तियों, सत्ताओं, संपत्तियों व संस्कृति आदि पर जन्मजात केवल जाति विशेष का होने के कारण ही अधिकार मिल जाना। हर स्तर पर जन्म के आधार पर सामाजिक आरक्षण रहे और शताब्दियों तक रहे, यदि सतयुग से कलियुग तक के युग-चक्र की अवधारणा को सत्य मान लिया जाए तो लाखों वर्षों से ये सामाजिक आरक्षण निर्बाध रूप से आज तक लागू हैं।


    संपत्ति पर सामाजिक आरक्षण –

    खेतों में काम करके उत्पादन करने वाला शूद्र पूरे साल प्रतिदिन बिना अवकाश के भरपूर बेगार परिश्रम करने के बावजूद, उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रखता था। यहां तक कि उसे अपना व अपने परिवार का पेट भरने, तन पर कपड़े ढकने व टुटही झोंपड़ी के लिए  भी शोषक जाति के लोगों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था। परिश्रम का अर्थ तिरस्कार व कर्म का अर्थ शोषण करना/बर्बरता/क्रूरता/कब्जाना/हड़पना/प्रपंच/छल/छद्म आदि। परिश्रम व कर्मशीलता के कोई मायने ही नहीं। 


    शक्ति व सत्ता पर सामाजिक आरक्षण –

    चूंकि उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था, इसलिए   समाज की वास्तविक शक्ति व सत्ता पर कोई अधिकार नहीं रहा और न ही हो पाया। शूद्रों ने अपने बहुत ही सीमित, बिना स्वतंत्रता वाले कुंठित समाज में भी किसी तरह से कोई आंतरिक व सापेक्षिक सत्ता बना ली हो जो उनके अपने ही बीच में श्रेष्ठता को प्रायोजित कर सके तो इतर बात है।


    ज्ञान पर सामाजिक आरक्षण –

    शूद्रों को ज्ञान का अधिकार नहीं, वेदों-उपनिषदों की ऋचाएं यदि किसी शूद्र के कानों ने सुन लीं तो सुनने वाले कानों को बहरा कर देना।  किसी शूद्र ने भूलवश यदि मुंह से वेदों उपनिषदों की ऋचाएं टूटेफूटे तरीके से भी बोल दीं तो जीभ काट देना आदि आदि। यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ना।


    संस्कृति पर सामाजिक आरक्षण –

    ग्रंथ आदि लिखकर अपने स्वार्थों के लिए  पूर्वनिर्धारित कर्मकांड से भरी परंपराएं बना दी गईं। समाज के द्वारा सहज स्फूर्त तरीके से कला, संस्कृति को विकसित पल्लवित नहीं होने दिया गया, कुछ लोगों ने ही सबकुछ तय कर दिया। इसे तय करने में शूद्रों के लिए कोई आधार नहीं छोड़ा गया।


    मित्र : सामाजिक आरक्षणों से हुई क्षतियां कैसीं रहीं?

    नोमेड :  सैकड़ों वर्षौ की जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज की लाखों प्रतिभाओं की प्रतिवर्ष भ्रूण हत्या की है।


    मित्र :  प्रतिभाओं की भ्रूणहत्या, वह कैसे?

    नोमेड :  जन्म के आधार पर ही आदमी की व्यक्तिगत योग्यता, व्यक्तिगत चरित्र व सामाजिक प्रतिष्ठा तय करने की बर्बर व क्रूर जाति-व्यवस्था के कारण लाखों करोड़ों संभावित प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या प्रतिवर्ष लगातार शताब्दियों तक कैसे होती रही, इस बात को समझने के लिए तथ्यों को खुले व साफ मन से समझने की आवश्यकता है।


    मित्र :  जी

    नोमेड : 

    • ब्राह्मण का पुत्र भले ही मूढ़-बुद्धि हो, उसे विद्वान, पवित्र व प्रतिष्ठित ही माना जाएगा। अपने पूरे जीवन में उसका काम सिर्फ और सिर्फ कुछ पोथियों को सीधा, उल्टा-पुल्टा या ऊटपटांग गलत तरीके से बांच देना है।  घोर से घोर मूढ़ को भी महानता व विद्वत्ता की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए केवल किसी ब्राह्मण के यहां जन्म लेना पर्याप्त।

    • इसी प्रकार घोर से घोर कायर को भी क्षत्रिय के यहां जन्म लेना मात्र ही उसके अद्वितीय बहादुर होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए  पर्याप्त।

    • वैश्य के पुत्र को व्यापार व प्रबंधन का ककहरा न आते हुए भी, व्यापार व प्रबंधन का पुरोधा होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता केवल उसका जन्म वैश्य जाति में होने मात्र से ही मान लिया गया।

    • शूद्र को जन्म से ही किसी लायक नहीं माना गया, उसको पशुओं से भी निकृष्ट माना गया।  जिस समाज में गाय को पूजा गया, सुअर को दैवीय अवतार माना गया।  उसी समाज में शूद्र को इतना निकृष्ट माना गया कि उसे अछूत कर दिया गया, शूद्र यदि ज्ञान को सुन भी ले तो ज्ञान अपवित्र मान लिया जाता था।  इसीलिए  शूद्र को ऊपर के तीन वर्णों के दास के रूप में जबरन स्थापित किया गया और इसको ईश्वरीय प्रयोजन साबित करके ईश्वरीय दंड-विधान आदि तय करके, जबरन थोपी गई सामाजिक-दासता को जन्म के आधार पर दैवीय-नियति के रूप में स्वीकारे जाने के लिए  समाज की मानसिकता को ही अनुकूलित कर दिया गया।

    बात ज्ञान के ऊपर दावेदारी की हो, पौरुष के ऊपर दावेदारी की हो या व्यापार-प्रबंधन की दावेदारी की हो। भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था ने लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण-हत्या हर साल लगातार हजारों वर्षों तक की है और पूरी धूर्तता, कपट व सामाजिक/शारीरिक/मानसिक क्रूर-हिंसा के साथ की है।


    मित्र :  जी

    नोमेड :  सोचिये, यदि शोषक जातियों के बच्चों को पैदा होते ही जन्म के आधार पर बिना कुछ किए बैठे बिठाए ही महान, विद्वान, विशेषज्ञ व प्रतिष्ठित न माना जाता होता; तो उनको अपने पुरुषार्थ से विद्वता, विशेषज्ञता व प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए  समाज के वास्तविक विकास के लिए  अपनी ऊर्जा का प्रयोग करना पड़ता न कि शोषित जातियों का शोषण करते रहने के लिए नित्य नए कपटों व धूर्तताओं में लगाना पड़ता। शोषित जातियों के लोगों को पैदा होते ही वे तिरस्कृत व अपमानित होने के लिए  ही पैदा हुए हैं ऐसा स्वीकारते हुए शोषक जाति के लोगों की सेवा करने को ही जीवन-धर्म मानने को विवश किया गया।


    शोषित जातियों के लोगों को अपनी प्रतिभा को दिखाने का अवसर मिला होता तो संभव है कि दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक भारतीय समाज ने दे दिए होते। यदि जातियाँ न होतीं तो हो सकता है कि किसी ब्राह्मण जाति में पैदा होने वाले बच्चे की चमड़े के काम के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो संभव है कि उसने पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। यदि क्षत्रिय जाति में पैदा होने वाले बच्चे की लुहार-गिरी के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो लौह-यंत्रों की पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। ऐसे ही सैकड़ों-हजारों उदाहरण सोचे जा सकते हैं और बहुत ही सहजता से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि जाति-व्यवस्था ने कैसे प्रति वर्ष लाखों प्रतिभाओं की लगातार सैकड़ों हजारों वर्षों तक पूरी बेशर्मी व घिनौनी सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ भ्रूण हत्याएं की।


    भारत में जाति-व्यवस्था के कारण योग्यता व प्रतिभा को कभी सहेजा ही नहीं गया, ऊंची जातियों के बहुत ही सीमित दायरे में यदि कोई तुलनात्मक रूप से कुछ बेहतर निकल गया तो उसको हीरो के रूप में प्रायोजित कर दिया गया और यही तरीका आज तक भी लागू है।


    इन सामाजिक आरक्षणों से अपूरणीय क्षतियां हुईं, पूरा भारतीय समाज सड़ गया। भारत में वैज्ञानिक आविष्कारों और भारत के लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास की संभावननाओं का पतन हुआ।  भारत सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी और फिर मानसिक गुलामी में फँस गया। 


    मित्र :  संवैधानिक आरक्षण का विरोध कौन करते हैं, क्यों करते हैं।

    नोमेड :  जाति-व्यवस्था के हजारों वर्षों के काल में जबकि शूद्रों को समाज में मनुष्य की तरह जीने के मौलिक अधिकार भी नहीं थे, सैकड़ों हजारों वर्षों तक जिन्होंने शूद्रों को कुचला है और उसी कुचलते जाने के परिणाम स्वरूप आज तक जो संसाधनों व विभिन्न सत्ताओं के भोग करने के मजे ले रहे हैं। हजारों साल तक पारंपरिक व सामाजिक भ्रष्टाचार को महिमामंडित करते हुए जिन्होंने उनकी मेहनत का शिद्दत के साथ बिना उत्तरदायित्व के खाया है। इस वर्ग के प्रति थोड़ी सी भी ईमानदारी और प्रेम उनके साथ साझा करने की मानवीयता न दिखा पाने की जड़ता व असंवेदनशीलता भी जाति-व्यवस्था से ही आई है।


    संवैधानिक आरक्षण का विरोध केवल असंवेदनशील व स्वार्थ में अंधे लोग करते हैं।  जिनकी सामाजिक दूर दृष्टि नहीं और जिनके लिए  मानवीयता, न्याय व सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों के कोई मायने नहीं। योग्यता के नाम पर संवैधानिक आरक्षण का विरोध किया जाता है। जिसको योग्यता कहा जाता है वह तथाकथित योग्यता का मापदंड सरकारी नौकरी प्राप्त करने जैसी वाहियात और बेफिजूल की कसौटियों के आधार पर किया जाता है। शताब्दियों के सामाजिक आरक्षणों का भोग करते हुए तो योग्यता का कोई प्रमाण कथा कहानियों व प्रायोजनों से आगे नहीं बढ़ा और सरकारी नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण की बात आते ही, योग्यता का मुद्दा उठा दिया जाता है।


    दरअसल शोषक जातियों ने आज तक कभी शूद्रों को अपने समकक्ष मनुष्यों के रूप में स्वीकारा ही नहीं, कभी भी समाज को जाति-व्यवस्था से ऊपर उठकर देखने की चेष्टा ही नहीं की। जाति-व्यवस्था का विरोध केवल सरकारी नौकरियों में शूद्रों के हिस्से को खतम करने के लिए और राजनैतिक सत्ता में उनकी बढ़ती भागीदारी से डर कर किया जाता है। जो लोग इस दावे या भ्रम में जीते हैं कि भारत में सामाजिक रूप से “जाति-व्यवस्था” खतम हो रहा है, तो वे लोग खुद के ही बनाए हुए झूठों में जीते हैं और “जाति-व्यवस्था” जैसी सामाजिक विभीषिका को स्व-केंद्रित स्वार्थों से परे नहीं देखना चाहते हैं।


    ज्यों ज्यों शूद्र जातियाँ प्रशासनिक व राजनैतिक ताकत प्राप्त करतीं जा रहीं हैं, त्यों त्यों शोषक जातियों को समाज से “जाति-व्यवस्था” खतम होते दिख रहा है, इसलिए  “आरक्षण” व “जाति-व्यवस्था की राजनीति” का विरोध किया जाता है। दूर से देखने में भले ही सुंदर लगे कि यह विरोध “जाति-व्यवस्था” के विरोध में है। बहुत सुंदर तर्क भी दिए जाते हैं, किंतु यथार्थ में संवैधानिक आरक्षण के विरोध का आधार तो उनके अपने स्वार्थ ही हैं।


    मित्र : जी

    नोमेड :  सैकड़ों सालों तक शोषक जातियों ने अपना अधिकांश जीवन/मानसिक/सामाजिक ऊर्जा समाज के बहुसंख्य को अघोषित दास बनाए रखने में लगाया।  इससे पूरा समाज जड़ हो गया। शोषक जातियाँ भी और शोषित जातियाँ भीं। यदि मानवीयता व सामाजिकता के व्यापक संदर्भों में सूक्ष्मता से देखा जाए तो जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के स्तर तक पहुंचाया है। किंतु शोषक जातियों के लोग अपने विद्रूप अहंकारों और स्व-केंद्रित-स्वार्थ को जीवन का परम-लक्ष्य मानने के कारण, अब भी यह चिंतन करने को तैयार नहीं हैं कि भारतीय समाज भीषण रूप से जड़ हो चुका है, सड़ांध से भरपूर है। और इस सड़ांध के पराकाष्ठा तक पहुंचाने और समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, मूल्यों व भावों को जड़ करने व जड़ता में ही बनाए रखने में केवल और केवल जाति-व्यवस्था की परम्परा का ही हाथ रहा है।


    शोषक जातियों को बिना वास्तविक पुरुषार्थ के ही उपलब्ध समस्त विलासिताओं को भोगने की बड़ी भयंकर लिप्सा हमेशा से रही है और आज भी है। और इसी लिप्सा-भोग प्राप्ति के लिए  किए जाने वाले विभिन्न प्रायोजनों को हम सामाजिक परिवर्तन, समाज निर्माण व देश का विकास आदि के लुभावने नामों से प्रायोजित करते आए हैं। यह लिप्सा ही सामाजिक आरक्षण अर्थात् जाति-व्यवस्था का मूलभूत कारण रही और आज भी हमारे समाज की जड़ता के मूलभूत कारकों में से है।


    दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक मानने वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील मानने वाले लोगों में, जो शोषक जातियों के हैं, अपने स्वार्थ की लिप्सा व जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिए  घृणा का भाव रखते हैं, क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करने लगा है और शोषक जातियों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करने लगा है।


    मित्र :  समाधान कैसे होगा।

    नोमेड : समाधान तभी होगा जबकि जाति-व्यवस्था की विद्रूपता व गहरी जड़ों को ईमानदारी व बिना पूर्वाग्रह के सामाजिक उत्तरदायित्व पूर्वक न्यायपूर्ण भाव से समझने की चेष्टा की जाएगी। और ईमानदारी से समाधान की चेष्टा की जाएगी। बिना सामाजिक ईमानदारी के “जाति-व्यवस्था” का पत्ता भी नहीं हिलने वाला। शोषक जातियों की ओर से जब भी जाति-व्यवस्था के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- “ संवैधानिक-आरक्षण “ और “ जाति-व्यवस्था की राजनीति “।  दोनों ही मुद्दे शक्ति व सत्ता प्राप्त करने के अवयव हैं।


    यदि शोषक जातियाँ सच में ही सामाजिक ईमानदार होतीं और जाति-व्यवस्था को खतम करने के लिए थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करतीं तो जाति-व्यवस्था कब की खतम हो गई होती।  शोषक जातियों को केवल अपने अंदर से जाति-व्यवस्था की भावना वास्तव में खतम करनी है। इसके लिए बिना ढोंग के जीवंत रूप में जाति-व्यवस्था की भावना को गहरे से खींचकर खतम करने की जरूरत है। जो ईमानदार व मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अपने अंदर गहरे जमी हुई घृणा व जाति-व्यवस्था की श्रेष्ठता के छुपे हुए अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालने से ही संभव है। जाति-व्यवस्था लोगों के मन में बहुत गहरे स्थापित है जो शाब्दिक भाषणों, परिभाषाओं, लिखावटों आदि से खतम नहीं होगी।


    जाति-व्यवस्था का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ ईमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है। यह समाधान ही नए समाज, नए देश व नए सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर व वास्तविक होगें और बिना कपट व धूर्तता के होगें।

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से

    (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)

     

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • मोहम्मद रफ़ी साहब की जयंती 24 दिसम्बर पर विशेष : तुम मुझे यूं भुला न पाओगे  –Firdaus Khan

    मोहम्मद रफ़ी साहब की जयंती 24 दिसम्बर पर विशेष : तुम मुझे यूं भुला न पाओगे –Firdaus Khan

    Firdaus Khan

    बहुमुखी संगीत प्रतिभा के धनी मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को पंजाब के अमृतसर ज़िले के गांव मजीठा में हुआ। संगीत प्रेमियों के लिए यह गांव किसी तीर्थ से कम नहीं है। मोहम्मद रफ़ी के चाहने वाले दुनिया भर में हैं। भले ही मोहम्मद रफ़ी साहब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ रहती दुनिया तक क़ायम रहेगी। साची प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विनोद विप्लव की किताब मोहम्मद रफ़ी की सुर यात्रा मेरी आवाज़ सुनो मोहम्मद रफ़ी साहब के जीवन और उनके गीतों पर केंद्रित है। लेखक का कहना है कि मोहम्मद रफ़ी के विविध आयामी गायन एवं व्यक्तित्व को किसी पुस्तक में समेटना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है, फिर भी अगर संगीत प्रेमियों को इस पुस्तक को पढ़कर मोहम्मद रफ़ी के बारे में जानने की प्यास थोड़ी-सी भी बुझ जाए तो मैं अपनी मेहनत सफल समझूंगा। इस लिहाज़ से यह एक बेहतरीन किताब कही जा सकती है। 

    मोहम्मद ऱफी के पिता का नाम हाजी अली मोहम्मद और माता का नाम अल्लारखी था। उनके पिता ख़ानसामा थे। रफ़ी के बड़े भाई मोहम्मद दीन की हजामत की दुकान थी, जहां उनके बचपन का काफ़ी वक़्त गुज़रा। वह जब क़रीब सात साल के थे, तभी उनके बड़े भाई ने इकतारा बजाते और गीत गाते चल रहे एक फ़क़ीर के पीछे-पीछे उन्हें गाते देखा। यह बात जब उनके पिता तक पहुंची तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी। कहा जाता है कि उस फ़क़ीर ने रफ़ी को आशीर्वाद दिया था कि वह आगे चलकर ख़ूब नाम कमाएगा। एक दिन दुकान पर आए कुछ लोगों ने ऱफी को फ़क़ीर के गीत को गाते सुना। वह उस गीत को इस क़दर सधे हुए सुर में गा रहे थे कि वे लोग हैरान रह गए। ऱफी के बड़े भाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। 1935 में उनके पिता रोज़गार के सिलसिले में लाहौर आ गए। यहां उनके भाई ने उन्हें गायक उस्ताद उस्मान ख़ान अब्दुल वहीद ख़ान की शार्गिदी में सौंप दिया। बाद में रफ़ी ने पंडित जीवन लाल और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों से भी संगीत सीखा। 

    Mohammad Rafi

    मोहम्मद रफ़ी उस वक़्त के मशहूर गायक और अभिनेता कुंदन लाल सहगल के दीवाने से और उनके जैसा ही बनना चाहते थे। वह छोटे-मोटे जलसों में सहगल के गीत गाते थे। क़रीब 15 साल की उम्र में उनकी मुलाक़ात सहगल से हुई। हुआ यूं कि एक दिन लाहौर के एक समारोह में सहगल गाने वाले थे। रफ़ी भी अपने भाई के साथ वहां पहुंच गए। संयोग से माइक ख़राब हो गया और लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। व्यवस्थापक परेशान थे कि लोगों को कैसे ख़ामोश कराया जाए। उसी वक़्त रफ़ी के बड़े भाई व्यवस्थापक के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि माइक ठीक होने तक रफ़ी को गाने का मौक़ा दिया जाए। मजबूरन व्यवस्थापक मान गए।

    रफ़ी ने गाना शुरू किया, लोग शांत हो गए। इतने में सहगल भी वहां पहुंच गए। उन्होंने रफ़ी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन तुम्हारी आवाज़ दूर-दूर तक फैलेगी। बाद में रफ़ी को संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी के मार्गदर्शन में लाहौर रेडियो में गाने का मौक़ा मिला। उन्हें कामयाबी मिली और वह लाहौर फ़िल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगे। उस दौरान उनकी रिश्ते में बड़ी बहन लगने वाली बशीरन से उनकी शादी हो गई। उस वक़्त के मशहूर संगीतकार श्याम सुंदर और फ़िल्म निर्माता अभिनेता नासिर ख़ान से रफ़ी की मुलाक़ात हुई। उन्होंने उनके गाने सुने और उन्हें बंबई आने का न्यौता दिया। ऱफी के पिता संगीत को इस्लाम विरोधी मानते थे, इसलिए बड़ी मुश्किल से वह संगीत को पेशा बनाने पर राज़ी हुए। रफ़ी अपने भाई के साथ बंबई पहुंचे। अपने वादे के मुताबिक़ श्याम सुंदर ने रफ़ी को पंजाबी फ़िल्म गुलबलोच में ज़ीनत के साथ गाने का मौक़ा दिया। यह 1944 की बात है।

    इस तरह रफ़ी ने गुलबलोच के सोनियेनी, हीरिएनी तेरी याद ने बहुत सताया गीत के ज़रिये पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखा। रफ़ी ने नौशाद साहब से भी मुलाक़ात की। नौशाद ने फ़िल्म शाहजहां के एक गीत में उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया। रफ़ी को सिर्फ़ दो पंक्तियां गानी थीं-मेरे सपनों की रानी, रूही, रूही रूही। इसके बाद नौशाद ने 1946 में उनसे फ़िल्म अनमोल घड़ी का गीत तेरा खिलौना टूटा बालक, तेरा खिलौना टूटा रिकॉर्ड कराया। फिर 1947 में फ़िरोज़ निज़ामी ने रफ़ी को फ़िल्म जुगनूं का युगल गीत नूरजहां के साथ गाने का मौक़ा दिया। बोल थे- यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है। यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। इसके बाद नौशाद ने रफ़ी से फ़िल्म मेला का एक गीत ये ज़िंदगी के मेले गवाया। इस फ़िल्म के बाक़ी गीत मुकेश से गवाये गए, लेकिन रफ़ी का गीत अमर हो गया। यह गीत हिंदी सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है।

    इस बीच रफ़ी संगीतकारों की पहली जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के संपर्क में आए। इस जोड़ी ने अपनी शुरुआती फ़िल्मों प्यार की जीत, बड़ी बहन और मीना बाज़ार में रफ़ी की आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया। इसके बाद तो नौशाद को भी फ़िल्म दिल्लगी में नायक की भूमिका निभा रहे श्याम कुमार के लिए रफ़ी की आवाज़ का ही इस्तेमाल करना पड़ा। इसके बाद फ़िल्म चांदनी रात में भी उन्होंने रफ़ी को मौक़ा दिया। बैजू बावरा संगीत इतिहास की सिरमौर फ़िल्म मानी जाती है। इस फ़िल्म ने रफ़ी को कामयाबी के आसमान तक पहुंचा दिया। इस फ़िल्म में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां साहब और डी वी पलुस्कर ने भी गीत गाये थे। फ़िल्म के पोस्टरों में भी इन्हीं गायकों के नाम प्रचारित किए गए, लेकिन जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो मोहम्मद रफ़ी के गाये गीत तू गंगा की मौज और ओ दुनिया के रखवाले हर तरफ़ गूंजने लगे। रफ़ी ने अपने समकालीन गायकों तलत महमूद, मुकेश और सहगल के रहते अपने लिए जगह बनाई।

    रफ़ी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तक़रीबन 26 हज़ार गाने गाये, लेकिन उनके तक़रीबन पांच हज़ार गानों के प्रमाण मिलते हैं, जिनमें ग़ैर फ़िल्मी गीत भी शामिल हैं। देश विभाजन के बाद जब नूरजहां, फ़िरोज़ निज़ामी और निसार वाज्मी जैसी कई हस्तियां पाकिस्तान चली गईं, लेकिन वह हिंदुस्तान में ही रहे। इतना ही नहीं, उन्होंने सभी गायकों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा देशप्रेम के गीत गाये। रफ़ी ने जनवरी, 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के एक माह बाद गांधी जी को श्रद्धांजलि देने के लिए हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में राजेंद्र कृष्ण रचित सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी गीत गाया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे।

    भारत-पाक युद्ध के वक़्त भी रफ़ी ने जोशीले गीत गाये। यह सब पाकिस्तानी सरकार को पसंद नहीं था। शायद इसलिए दुनिया भर में अपने कार्यक्रम करने वाले रफ़ी पाकिस्तान में शो पेश नहीं कर पाए। ऱफी किसी भी तरह के गीत गाने की योग्यता रखते थे। संगीतकार जानते थे कि आवाज़ को तीसरे सप्तक तक उठाने का काम केवल ऱफी ही कर सकते थे। मोहम्मद रफ़ी ने संगीत के उस शिखर को हासिल किया, जहां तक कोई दूसरा गायक नहीं पहुंच पाया। उनकी आवाज़ के आयामों की कोई सीमा नहीं थी। मद्धिम अष्टम स्वर वाले गीत हों या बुलंद आवाज़ वाले याहू शैली के गीत, वह हर तरह के गीत गाने में माहिर थे। उन्होंने भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली, दशभक्ति गीत, दर्दभरे तराने, जोशीले गीत, हर उम्र, हर वर्ग और हर रुचि के लोगों को अपनी आवाज़ के जादू में बांधा। उनकी असीमित गायन क्षमता का आलम यह था कि उन्होंने रागिनी, बाग़ी, शहज़ादा और शरारत जैसी फ़िल्मों में अभिनेता-गायक किशोर कुमार पर फ़िल्माये गीत गाये। 

    वह 1955 से 1965 के दौरान अपने करियर के शिखर पर थे। यह वह व़क्त था, जिसे हिंदी फ़िल्म संगीत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। उनकी आवाज़ के जादू को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। उनकी आवाज़ में सुरों को महसूस किया जा सकता है। उन्होंने अपने 35 साल के फ़िल्म संगीत के करियर में नौशाद, सचिन देव बर्मन, सी रामचंद्र, रोशन, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ पी नैयर, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, सलिल चौधरी, रवींद्र जैन, इक़बाल क़ुरैशी, हुस्नलाल, श्याम सुंदर, फ़िरोज़ निज़ामी, हंसलाल, भगतराम, आदि नारायण राव, हंसराज बहल, ग़ुलाम हैदर, बाबुल, जी एस कोहली, वसंत देसाई, एस एन त्रिपाठी, सज्जाद हुसैन, सरदार मलिक, पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रखा, ए आर क़ुरैशी, लच्छीराम, दत्ताराम, एन दत्ता, सी अर्जुन, रामलाल, सपन जगमोहन, श्याम जी-घनश्यामजी, गणेश, सोनिक-ओमी, शंभू सेन, पांडुरंग दीक्षित, वनराज भाटिया, जुगलकिशोर-तलक, उषा खन्ना, बप्पी लाह़िडी, राम-लक्ष्मण, रवि, राहुल देव बर्मन और अनु मलिक जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर संगीत का जादू बिखेरा। 

    रफ़ी साहब ने 31 जुलाई, 1980 को आख़िरी सांस ली। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। जिस रोज़ उन्हें जुहू के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, उस दिन बारिश भी बहुत हो रही थी। उनके चाहने वालों ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी। लग रहा था मानो रफ़ी साहब कह रहे हों-

    हां, तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
    जब कभी भी सुनोगे गीते मेरे
    संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…

    About Author

    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • चाकलेट प्रेमियों के लिए: Yummsss (यम्म्‌स्स्स) हाथ से बनाई अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की चाकलेट, भोपाल, मध्यप्रदेश

    चाकलेट प्रेमियों के लिए: Yummsss (यम्म्‌स्स्स) हाथ से बनाई अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की चाकलेट, भोपाल, मध्यप्रदेश

    Vivek Umrao Glendenning

    मैं भारत में अपने मित्रों से कहा करता हूँ कि यदि भारत में हाथ से बनी अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की चाकलेट का स्वाद लेना है वह भी तर्कसंगत कीमत पर तो आपको Yummsss की चाकलेट खानी चाहिए। जैसा कि नाम में ही दिखता है Yummy का Yumm मतलब बहुत ही स्वादिष्ट, फिर sss मतलब बिना मुंह से कुछ बोले केवल स्वाद का आनंद लीजिए, पूरा नाम हुआ Yummsss.

    हुआ यूं कि अपने मित्र सचिन खरे व उनकी जीवन संगिनी ने सोचा कि क्यों न भारत में भी उचित कीमत पर हाथ से बनी असली चाकलेट लोगों को उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने चाकलेट के बारे में अध्ययन करना शुरू किया। महीनों तक इंटरनेट में घंटों-घंटों चाकलेट से संबंधित जानकारियों व उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन करते। कई देशों के लोगों से संपर्क करना शुरू किया ताकि इंटरनेट के बाहर की भी जानकारी उपलब्ध हो पाए।

    खरे दंपत्ति को अहसास हुआ कि भारत में चाकलेट के नाम पर सुगर (शक्कर/चीनी) खिलाई, पिलाई जाती है। चाकलेट के असली स्वाद से बहुत लोग परिचित ही नहीं है। असली चाकलेट स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है, जबकि भारत में बेची जानी वाली अधिकतर चाकलेट शरीर के लिए नुकसानदायक होती है। 

    Yummsss की शुरूअात:

    कम-ज्यादा लगभग डेढ़ साल पहले खरे दंपत्ति ने भोपाल में Yummsss के बैनर तले हाथ से बनी चाकलेट बनानी शुरू की। असली व बेहतरीन स्वाद के लिए यह लोग बेल्जियम से भी चाकलेट मंगाते हैं, फिर बेल्जियम चाकलेट से अपने घर में चाकलेटों के विभिन्न संस्करण तैयार करते हैं। मानव शरीर के लिए कौन सा तत्व बेहतर है, इसका अध्ययन करते हुए, विभिन्न प्रकार के स्वाद-संस्करण तैयार करते हैं। स्वाद-संस्करणों की विभिन्नता के लिए रसायनों का प्रयोग करने की बजाय प्राकृतिक रूप से उपलब्ध फल, मेवा, ड्राई-फ्रूट्स, फूल, पत्ती, रस इत्यादि का प्रयोग करते हैं। डार्क चाकलेट भी उपलब्ध कराते हैं।

    Yummsss बनाम बाजार व कीमत:

    खरे दंपत्ति चाहता तो भोपाल के किसी पॉश इलाके में चाकलेट की दुकान खोल सकता था। दुकान के किराए, दो चार पांच लोगों को दुकान की रखवाली करने के लिए रखते। इस प्रकार के ऊंचे आवर्ती खर्चों के कारण चाकलेट की कीमतें ऊंची रखनी पड़तीं। लागत निकालने के लिए चाकलेट का पुराना स्टाक प्रयोग करना पड़ता। खराब हो चुकी चाकलेट को बहुत अच्छा बताते हुए बेचना पड़ता। चाकलेट की कीमतें कम से कम रख पाएं, चाकलेट के स्वाद व गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ करने के लिए विवश न होना पड़े इसलिए इन्होंने चाकलेट की कोई दुकान नहीं खोली।

    इनका मुख्य उद्देश्य चाकलेट को उसके असली स्वाद व लाभदायक गुणों के साथ उपलब्ध कराना था। दंपत्ति ने विचार किया और निर्णय लिया कि जब तक बेहद आवश्यकता नहीं पड़ती है तब तक चाकलेट को घर में ही बनाया जाएगा व बिना किसी दुकान के आनलाइन बेचा जाएगा। घर में चाकलेट बनाते हैं, आनलाइन बेचते हैं। इनकी अपनी वेबसाइट है, जिस पर जाकर पूरे भारत से चाकलेट का आर्डर दिया जा सकता है। 

    Yummsss व सामाजिक जिम्मेदारी:

    खरे दंपत्ति चाकलेट से होने वाली आय का दस प्रतिशत से अधिक सामाजिक कार्यों में सहयोग करते हैं। समय-समय पर विकलांग, मूक, बधिर, अंधे व मानसिक रूप से अक्षम बच्चों के लिए स्वादिष्ट चाकलेट खिलाने का कार्यक्रम भी आयोजित करते रहते हैं।

    चलते-चलते:

    यदि मुझे भारत में किसी को मिठाई खिलानी होती है तो मैं यहीं सिडनी, आस्ट्रेलिया में बैठे-बैठे Yummsss की वेबसाइट में जाकर चाकलेटों का आनलाइन आर्डर कर देता हूँ। यदि आप चाहें तो आप अपने, अपने बच्चों, रिश्तेदारों, मित्रों व उनके बच्चों के जन्मदिनों में Yummsss की चाकलेट खिलाकर, उपहार देकर बच्चों को बेहतर चाकलेट उपलब्ध करा सकते हैं।

    शादी के पहले लड़के-लड़कियों की देखा-दूखी में भी Yummsss की चाकलेट खिलाकर दाम्पत्य जीवन की संभावनाओं की शुरूआत असली स्वाद से कर सकते हैं।

    आप में से जो लोग अफोर्ड कर सकते हों वे प्रतिदिन अपना दिन हाथ से बनी असली चाकलेट के स्वाद से शुरू कर सकते हैं।

    यदि आप Yummsss की चाकलेट खा चुके हैं या खाने वाले हैं तो स्वाद कैसा रहा, यह बताना न भूलिएगा।

  • भारतीय राजनीति का मायालोक

    भारतीय राजनीति का मायालोक

    Sanjiv Kumar Sharma

    [content_container max_width=’500′ align=’center’]स्वीकारोक्ति (डिस्क्लेमर)

    लेखक को राजनीति का कोई जमीनी ज्ञान नहीं है, जो भी राजनैतिक समझ विकसित की है वह कमरे में बैठ कर किताबें पढ़ते, सूचना तकनीकी का इस्तेमाल करते और विचारते हुए की है|[/content_container]

    भारत की जनता मायालोक, जादू और तिलिस्म में हमेशा से दिलचस्पी रखती है| एक चमत्कारिक अंगूठी से सारी मुसीबतें दूर हो जाती हैं, एक सुपर फ़ूड एकदम स्वस्थ कर देता है और हठ योग की एक मुद्रा कैंसर ठीक कर देती है| घर को स्वच्छ व पवित्र करने के लिए भी कोई खास प्रयास करने की जरूरत नहीं है, बस किसी ख़ास नदी के पानी की पानी की कुछ बूँदें छिड़क दीजिए या उस घर में बैठ कर लीलावती-कलावती की ‘कथा’ सुन लीजिए, आपका घर फटाफट साफ़-सुथरा और पवित्र हो जाएगा| इसी मानसिकता के साथ यहाँ की जनता मतदान में भाग लेती है, किसी को वोट देती है और लोकतंत्र के इस कर्मकांड (रिचुअल) को करके अपने घर में बैठ कर जादू शुरू होने का इंतेजार करती है|

    मनों में कूट-कूट कर भरा जातिवाद, सामंतवादी (फ्यूडल) सोच, बिना किसी जवाबदेही (एकाउंटेबिलिटी) के ताकतवर नौकरशाही और उसके साथ राजनीतिज्ञों के करतब; इस सब के बीच लोकतंत्र इस तरह फंस गया है कि समझ नहीं आता कैसे निकालें! बेंगलुरु, दिल्ली वगैरह के जाम में फंसी बस तो फिर भी से तो देर सबेर निकल ही जाती है लेकिन ये जाम तो ऐसा हो गया कि छह दशकों में भी छंटने का नाम नहीं ले रहा| ऊपर से मजा ये कि भ्रष्टाचार, दुराचार का सारा इल्जाम अपनी पसंद-नापसंद के मुताबिक किसी खास राजनैतिक दल या पार्टी को देकर हम बरी हो जाते हैं|

    इसी जादू-तमाशे के बीच गुजरात चुनाव के परिणाम लोग ऐसे देख रहें है जैसे लोकसभा के चुनावों का परिणाम हो| भारत के एक और महत्वपूर्ण राज्य हिमाचल में चुनाव थे लेकिन जनता और मीडिया सब भूल कर गुजरात के चुनावों में इस तरह खोयी थी जैसे गुजरात के चुनावों पर भारत का भविष्य टिका हो और किसी विशेष पार्टी या दल के हारने-जीतने से सब कुछ तय होने वाला हो|

    यदि बहुत ज्यादा धूम-धड़ाका पैदा नहीं किया जाता और जरा नरमी और शांति से चुनावों में उतरा जाता तो भाजपा का छोटे अंतर से चुनाव जीतना भी मायने रखता है| 2002 से लेकर अभी तक, लगभग पन्द्रह सालों से लगातार सत्ता में रहने के बावजूद अभी भी वे सत्ता में बने रहते हैं और अगर हम चुनावी व्यवस्था में विश्वास रखते हैं तो यह उपलब्धि तो है ही| लेकिन शायद नम्रता के अभाव और बडबोलेपन के कारण छोटी जीत भी हार की तरह लगती है|

    भाजपा की जीत के बाद इस चुनाव में सबसे बड़ी उपलब्धि है कि हार्दिक पटेल, जिग्नेश, राहुल गाँधी जैसे नेताओं का सामने आना| इनमें से कौन लम्बी रेस का घोड़ा है, कौन भारतीय राजनीति के आसमान में चमकेगा कौन भुला दिया जाएगा यह कहना कठिन है लेकिन यदि भारत की जनता थोड़ी परिपक्वता दिखाए तो शायद कुछ नम्र नेता सामने आ सकते हैं और हमें कुछ शालीन राजनीति देखने को मिल सकती है|

    लेकिन असल समस्या कुछ और है| मनोरंजन की तलाश हमें कभी धर्म की गलियों में भटकाती है तो कभी सिनेमा और पोर्न के बीच में झुलाती है और यही तलाश जब राजनीति में भी मनोरंजन तलाशने लगती है तो फिर राजनैतिक सर्कस की शुरुआत होती है| एक ही किस्म के मनोरंजन से जब ऊब हो जाती है और फिर किसी नए मनोरंजन के तलाश में निकल पड़ती है| जब वर्तमान राजनीति और उसके नेताओं से जनता ऊबने लगेगी तो फिर किसी नए नेता की तलाश होगी और फिर से इतिहास को दोहराया जाएगा|

    किसी को एक चमत्कारिक नेता की तरह पेश किया जाएगा, जो गद्दी पर बैठेगा और पलक झपकते ही सभी समस्याएं उड़न छू हो जाएंगी| नारे गढ़े जाएंगे – फलानां! ढिकाना! फलानां आएगा, देश को बढ़ाएगा! देश का नेता कैसा हो, ढिकाना जैसा हो! और ऐसे ही असंख्य नारे भीड़ द्वारा दोहराएंगे जाएंगे| भांडों की जमात आगे आ जाएगी और सबको बताएगी कि बस सांस रोक बैठ जाइए देश बदलने वाला है, सूरत स्विट्ज़रलैंड हो जाएगा और दिल्ली नोर्वे! गंगा तो ऐसे बहेगी जैसे शिव की जटाओं से निकलते समय थी और रेल ऐसे चलेंगी कि जापान पता करने आएगा कि इतनी जल्दी भारत हमसे आगे कैसे निकल गया|

    प्रवक्ताओं की नयी फ़ौज तैयार की जाएगी, जिनके शब्दों में तलवार की धार होगी और तर्कों में डायनामाइट जैसी दम होगी, कैमरा चालू होते ही वे विरोधियों के छक्के छुड़ा देंगे और जमीन पर कुछ काम हो या न हो लेकिन चैनल के सामने सब कुछ चाक-चोबंद दिखाई देगा| सरकार सब जानती होगी कि देश का भला कैसे होगा, देश का विकास कैसे होगा, देश का पर्यावरण कैसे बचेगा, उसे किसी से पूछने, किसी से सलाह लेने, किसी से चर्चा करने की जरूरत नहीं होगी| वह खुद ही सब चीजें तय कर लेगी और खुद ही उनको लागू भी कर देगी|

    विपक्षी दल ईवीएम पर आरोप लगाएंगे और सरकार कहेगी कि ईवीएम अभेद्य है! धरती में छेद करके दूसरी और निकला जा सकता है, चन्द्रमा को रस्सी से बाँध कर नीचे खींचा जा सकता है लेकिन ईवीएम में कोई गड़बड़ी नहीं की जा सकती| यह पवित्र है और सभी सात्विक गुणों से भरपूर है, इसका पतन असम्भव है|

    [content_container max_width=’500′ align=’center’]

    कुछ और नए नियम लाए जाएंगे, कुछ क़ानून रचे जाएंगे जिसमे जनता को अपनी जबरदस्त भागीदारी करनी होगी, कभी अपने पैसों के लिए भागना होगा तो कभी नए टैक्स के लिए मारा-मारी करनी होगी| ऐसा करने से जनता की सेहत खूब अच्छी होगी, उसकी देशभक्ति का भी लगे हाथों टेस्ट हो जाएगा लेकिन नौकरशाह और सरकारी अमला, बड़े कॉर्पोरेट और धन कुबेर ज्यों का त्यों अपना काम उतनी ही मेहनत, लगन और ईमानदारी से करते रहेंगे जैसे पहले करते थे और अभी भी करते हैं|

    नियमों का उल्लंघन करने पर सडकों के किनारे लगे कुछ और ठेले तोड़ दिए जाएंगे, बैंक में चोरी होने पर कुछ और गार्ड थानों में धुन दिए जाएंगे, कुछ और रेशमा, माला हारमोन का इंजेक्शन लगवाने को तैयार हो जाएंगी ताकि ग्राहक बच्ची के शरीर में औरत का मजा ले सकें, सड़कों से कुछ और लड़के उठा लिए जाएंगे ताकि कुछ लोग सेक्स के नए स्वाद को चख सकें, मामूली बीमारियों से कुछ लोग और दम तोड़ देंगे| ये महा यज्ञ है चलता रहेगा, जो बेसहारा है, जिसके पास न पैसे की शक्ति है न सत्ता कि उसे इस यज्ञ में आहुति बनना होगा ताकि लोकतंत्र का ये महायज्ञ चलता रहे|

    कुछ पुराने बाबा कुछ नए बाबाओं के साथ आपस में मिल कर ज्ञान बांटते रहेंगे और लोगों को तमाम तरह का भ्रष्टाचार और दुराचार करने के बाद अपराध बोध से बचने के नुस्खे सिखाते रहेंगे| तरह-तरह के मोटिवेशनल स्पीकर आते रहेंगे और हमारे भीतर के भिखारी को गुदगुदाते रहेंगे, सफलता कैसे हासिल करें, सफल बनो, जीतो दुनिया को, जो चाहो वही पाओ…|

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    क्या हम वाकई नहीं चाहते कि यह लोकतंत्र थोड़ी बहुत सांस ले? इसकी पक्षाघात (पैरालिसिस) से पीड़ित नस-नाड़ियों में कुछ जीवन का संचार हो? कब वो दिन आएगा जब सूखता जल, मरती नदी, जहरीली हवा, विषाक्त (टॉक्सिक) भोजन, दिमाग कुंद करती शिक्षा, भयंकर ट्रैफिक, तबाह होती हरियाली, कूड़ों के ढेर हमें बेचैन करेंगे और हम मतदान या वोटिंग का कर्मकांड करके जादू के इंतेजार में घर पर नहीं बैठ जाएंगे बल्कि अधिकारियों को खटखटाएंगे, नेताओं को हिलाएंगे, भाग-दौड़ करेंगे, कोशिश करेंगे और साबित करेगे कि हम मुर्दा और भांड नहीं हैं|

  • अभिनव प्रयास : उत्तरप्रदेश के झाँसी जिले के ब्लाक बामौर के एक वर्षीय बच्चे के चेहरे की सर्जरी

    आज हम एक ऐसे परिदृश्य को दर्शाना चाहते हें जो प्रकृति द्वारा संरचित चित्रण के मूल रूप को परिवर्तित करता है। यह ग्राम धनोरा के असहाय निर्धन परिवार में जन्मे 1 बर्षीय बालक की कहानी है जिसका जन्म रात्रि के ऐसे नक्षत्र में हुआ जो उस पूरे परिवार की दिशा और दशा को विगाड़ देता है। 

    दोनों वक्त के भरण पोषण के लिए एक वक्त का खाना पैदा करने वाले व किसी दिन आधा पेट भरकर सो जाने वाले व्यक्ति दुर्गा प्रसाद अपने बेटे हिमांशु को लेकर बहुत उत्साहित थे और जब हिमांशू ने जन्म लिया तो उसके माता पिता उसको देख कर आश्चर्यचकित रह गए और मन ही मन भगवान से कहने लगे की किस जन्म का पाप किया था। आने जाने वालों की बधाई में भी एक उपहास, कभी कटाक्ष कभी भय सा दिख रहा था क्योंकि हिमांशु का होठ जन्म से कटा होने के कारण उसकी शक्ल विकृत दिखाई दे रही थी कोई इसको कुछ कह रहा था कोई कुछ, लेकिन था तो दुर्गाप्रसाद और उसकी पत्नी का अंश ही। सो बस मन मसोस कर रह गए।

    बच्चा दो माह का हो गया और माता पिता उसको देख देखकर और भविष्य की सोचकर बहुत परेशान थे फिर एक दिन RBSK की टीम धनोरा आगनवाड़ी स्वास्थ्य परीक्षण करने पहुची टीम की डॉ स्वाति श्रीवास्तव और संगीता बच्चों का परीक्षण कर रहे थे टीम के दूसरे सदस्य डॉ गोविन्द श्रीवास्तव आगनवाड़ी और आशा से बात कर के पूछ रहे ऐसे कोई बच्चा जो जन्म जात बीमारी से ग्रसित हो, काफी समझाने के बाद आगनवाड़ी ने बताया एक बच्चा है ऐसी बीमारी का जो जन्म से कटे होंठ का है। बुलवाये जाने पर आगनवाड़ी दुर्गाप्रसाद को बुलाकर लाई और उसके साथ गांव के कई लोग आ गए।

    टीम ने हिमांशू के कटे होठ की सर्जरी के बारे में बताना शुरू किया तो कई लोग हाँ कह रहे थे की सरकार की योजना तो ठीक है तो कई लोग वहीँ उसको गुमराह कर रहे थे कि वो ठीक है अपने आप सही हो जायगा टीम सभी की जिज्ञासा शांत करने की कोशिश कर रही थी वहीँ दुर्गाप्रसाद विचलित हो रहा था एक तरफ बच्चे का भविष्य दिख रहा था दूसरी तरफ वह अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में सोच रहा था बहुत सोचकर दुर्गाप्रसाद बोला हमारे बच्चे को कोई परेशानी तो नही होगी मैं बहुत गरीब आदमी हूँ टीम उसको पूरी सांत्वना और प्रक्रिया बताकर वापस आ गयी।

    वापस आकर डॉ गोविन्द ने फोन पर जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री ऋषिराज और DEIC डॉ रामबाबू को बच्चे के विषय में जानकारी दी, डॉ गोविन्द पूर्ण विश्वास में थे क्योंकि जनपदीय प्रबंधन ऐसे कुछ केस और सर्जरी के लिए प्रयास रत थे और भागदौड़ में लगे थे। डॉ रामबाबू ने चिकित्सक से वार्ता कर निर्धारित तिथि पर बच्चे को चेकअप के लिए मेडिकल कॉलेज लाने के लिए कहा। बामौर से मेडिकल कॉलेज की दूरी लगभग 100 km देखते हुए जिला कार्यक्रम प्रबंधक द्वारा RBSK वाहन से ही दुर्गाप्रसाद को लाने की सलाह दी गयी क्योंकि चेकअप आदि में समय को देखते हुए कहीं दुर्गाप्रसाद निराश न हो जाये।

    तय दिन पर सुबह 7 बजे ही दुर्गाप्रसाद बामौर स्वास्थ्य केंद्र पर आ गया था। मेडिकल कॉलेज झाँसी में डॉ को दिखाया और बार्ड में भर्ती करने को बोला हिमांशू को वार्ड में भर्ती कराया फिर अगले दिन उसकी जाँच टीम की सदस्यों डॉ स्वाति और डॉ नेहा दुबे ने भागदौड़ करके पूरी करवा दी। जाँच में बच्चे का हिमिग्लोबिन कम होने के कारण कुछ दिन के लिए रोक दिया डॉ ने सलाह दी हीमोग्लोबिन सामान्य आने पर ही आप्रेशन किया जगया कुछ दवा लेकर दुर्गाप्रसाद अपने बच्चे हिमांशू को लेकर वापस गाँव आ गया।

    इस बीच टीम फोन पर ही फालोअप कर रही थी धीरे धीरे दुर्गाप्रसाद भी निराश होता जा रहा था उसको लग रहा था उसका काम कागज़ों तक ही सिमट कर रह गया। स्थिति को समझते हुए डॉ गोविन्द श्रीवास्तव सीधे फिर धनोरा गाँव पंहुचे तो बच्चे की माँ बोली आप ने साहब कहा था की उसका आप्रेशन हो जायगा लेकिन सिर्फ इतने दिन बस जांच करवाकर कुछ नहीं हुआ हम मेहनत मजदूरी वाले लोग रोज रोज कब तक चक्कर लगाते फिरे? फिर समझाया गया कि बच्चे में खून की कमी को देखते हुए अभी ऑपरेशन संभव नहीं है कुछ महीनो में सामान्य आने पर आपरेशन कर दिया जायगा बच्चे को अपने पास से ताकत की सीरप और अच्छी खिलाई पिलाई करने की सलाह देते हुए फिर से समझा बुझा कर डॉ गोविन्द वापस आ गए।

    फिर कुछ महीने बाद बच्चे बामौर अस्पताल बुलाया और उसका हीमोग्लोबिन जांच बामौर अस्पताल में ही करा लिया अब उसका हीमोग्लोबिन सामान्य था जिसकी सूचना डॉ रामबाबू को दी गयी। इतने लंबे समय को देखते हुए स्माइल ट्रेन लखनऊ में बात की गयी सहमति मिलते ही अगले ही दिन डॉ गोविन्द श्रीवास्तव को कानपूर स्माइल ट्रेन में उसका ओप्रेशन कराने को कहा गया लेकिन परिस्थिति विकट हो चुकी थी दुर्गाप्रसाद गाँव वालो के कटाक्ष सुन सुन कर पक चुका था जो उसको रोज ताने दे रहे थे क्यों हुआ कुछ सरकारी काम?

    टीम ने जैसे ही दुर्गाप्रसाद से चलने की बात कही वो बोला नही साहब एक बार गये थे खून कम था अबकी बार फिर डॉ मना कर दिया तो गांव वाले बहुत मज़ाक उड़ाएंगे। टीम के समझाने पर अंत में कानपूर स्माइल ट्रेन जाने को राजी हुआ।कानपुर स्माइल ट्रेन में डॉ को दिखाया और उसको भर्ती कराया और उसकी जाँच कराई सब सामान्य थी अगले दिन उसका ओप्रेशन था आखिरकार हिमांशु को ऑपरेशन के लिए OT में भेजा गया और कुछ घंटे बाद हिमांशू बार्ड में आ गया उसको देख कर उसकी माँ की आँखो में आँसू आ गए और दुर्गाप्रसाद के तो बोल ही नही निकल रहे थे वो तो बस पट्टी खोलकर अपने बच्चे का चेहरा जल्दी से जल्दी देखना चाह रहा था।

    जब दुर्गाप्रसाद अपने बच्चे हिमांशू को लेकर गाँव धनोरा पहुच गया गांव के लोग हिमांशू को सब देखने आ गए। दुर्गाप्रसाद अपने बच्चे को लेकर बहुत खुश था सरकार की योजना और टीम की पहल की सराहना हो रही थी। अब कुछ महीने बीत जाने अब हिमांशू पहले जैसा नही रहा अब वो सामान्य बच्चों की तरह उसका होंठ हो चुका है हिमांशू की माँ कहती हैं साहब आप न होते हम तो अपने बच्चे का कुछ नही करवा पाते आप की वजह से हमारा बच्चा बाकी बच्चों की तरह दिखने लगा है। हमारी टीम काफी खुश है हमें अच्छा लग रहा है गाँव के लोगो ने सरकार द्वारा चल रही योजनाओ की सराहना कर रहे हैं।

    हम अपने को गर्वान्वित महसूस करते हैं हम ऐसे एक अभिनव प्रयास के अंग है जो बच्चों के जीवन में खुशियाँ देता है और उनके माँ बाप के चेहरे पर मुस्कान!

    About Author:

    डॉ गोविन्द श्रीवास्तव 
    फिजियोथिरेपिस्ट RBSK
    ब्लाक बामौर, झांसी

  • यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो

    यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो

    Vivek Umrao Glendenning

    भारत के लोगों व राजनीतिक दलों के लिए दो बातें क्रिस्टल क्लियर साफ हैं। या तो आप सच में मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है या आप नहीं मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है। ईवीएम में छेड़खानी की जा सकती है या नहीं, यह चर्चा का वास्तविक मुद्दा बिलकुल भी नहीं हो सकता है क्योंकि दुनिया की कोई भी मशीन परफेक्ट नहीं। मुद्दा सिर्फ यह हो सकता है कि आप ईवीएम में छेड़खानी की जाती है, ऐसा मानते हैं या नहीं मानते हैं।

    यदि आप ईवीएम में छेड़खानी नहीं मानते हैं:

    यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी नहीं की जाती है तो चुनाव प्रक्रिया होते समय व चुनाव परिणाम आने के बाद ईवीएम को दोष देना बिलकुल भी उचित नहीं। चुनाव प्रक्रिया के समय व चुनाव परिणाम आने के बाद ईवीएम ईवीएम चिल्लाना बिलकुल ही गलत है।

    यदि आप ईवीएम में छेड़खानी मानते हैं:

    लेकिन यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो सारे कामकाज छोड़कर केवल और केवल ईवीएम के विरोध में बहुआयामी व्यापक अभियान तब तक चलाया जाना चाहिए जब तक ईवीएम का प्रयोग पूरी तरह से हमेशा के लिए बंद न हो जाए।

    ईवीएम का विरोध करने के लिए फेसबुक व व्हाट्सअप इत्यादि में फर्जी क्रांतिकारी बनने, फर्जी क्रांतिकारिता का ढोंग करने, गाली बकने, लाइक करने, शेयर करने, कमेंट करने से कुछ भी नहीं होने वाला। आपको अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आना होगा, आपको वास्तविक धरातल पर आना होगा, आपको वास्तविक लोगों के बीच वास्तविकता में जाकर वास्तव में खतरे उठाते हुए संघर्ष करना होगा।

    यदि आपको शून्य दशमलव शून्य एक (0.01) प्रतिशत भी लगता है कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो आपको सारे कामकाज रोक कर सबसे पहले ईवीएम के प्रयोग के खिलाफ अनवरत अनथक अभियान चलाना चाहिए।

    जो जो राजनैतिक दल व मतदातागण वास्तव में ईवीएम के प्रयोग के विरोध के प्रति गंभीर हैं तो आपको बिना किसी नानुकुर व किंतु परंतु के प्रारंभिक चरण में निम्न कार्यक्रम तत्काल प्रभाव से करने ही चाहिए –

    • जिन जिन राज्यों में आपकी सरकारें हैं, वहां से स्तीफा दीजिए।
    • राजनैतिक दलों के सभी सासंदों व विधायकों को पूरे देश में एक साथ त्यागपत्र देना चाहिए, बिना किसी ढोंग या नौटंकी के।
    • ईवीएम के प्रयोग बंद होने तक किसी भी चुनाव में भागीदारी बिलकुल बंद कर देनी चाहिए।
    • चुनाव होने के समय स्थानीय स्तर व व्यापक स्तर पर असहयोग आंदोलन व जेल भरो आंदोलन चलाए जाने चाहिए, बिना किसी ढोंग या नौटंकी के।
    • ईवीएम के मुद्दे के अतिरिक्त किसी भी चुनावी मुद्दे पर कोई मीडिया चर्चा नहीं, मीडिया में चुनाव से संबंधित अन्य किसी मुद्दे पर चर्चा का पूरी तरह से बहिष्कार।
    • जिन मतदाताओं का मानना है कि ईवीएम में छेड़खानी होती है उनको भी चुनाव प्रक्रिया में असहयोग आंदोलन करना चाहिए।
    • जब तक ईवीएम का प्रयोग पूरी तरह से बंद न हो जाए तबतक किसी भी मनोविज्ञान व रणनीति के जाल से अप्रभावित रहना चाहिए।

    यदि आप बहानेबाजी करने की बजाय सच में ही यह मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो केवल यही लोकतांत्रिक व समाधान का रास्ता है, ईवीएम के प्रयोग को बंद करवाने का।

    रास्ता मुश्किल है, गंभीर त्याग व संघर्ष भी मांगता है, लेकिन यदि इच्छाशक्ति से चले तो विजय सुनिश्चित है। रास्ता मुश्किल है लेकिन बहुत जल्द समाधान मिलेगा। कोई और रास्ता भी नहीं। सोशल नेटवर्किंग साइट पर क्रांति की नौटंकी तो बिलकुल ही बेबुनियाद व दिशाहीन रास्ता है। 

  • पश्चिमी दार्शनिक और भारतीय पोंगा पंडित, एक नजर में –Sanjay Jothe

    पश्चिमी दार्शनिक और भारतीय पोंगा पंडित, एक नजर में –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    मानव इतिहास की महान विदुषी एरियल ड्यूरेंट जब अपने पति विल ड्यूरेंट के साथ मिलकर विश्व इतिहास और सभ्यता सहित दर्शन के विकास का अत्यंत विस्तृत लेखा जोखा लिख रही थीं, उसी दौर में बर्ट्रेंड रसल भी दर्शन का इतिहास लिख रहे थे. फ्रायड मनोविज्ञान के रहस्य खोल रहे थे, फ्रेडरिक नीत्शे मूल्यों को और ईश्वर को चुनौती दे रहे थे, लुडविन वित्गिस्तीन पूरे तर्कशास्त्र को ही नया रूप दे रहे थे, डार्विन इसी समय में क्रमविकास की खोज करते हुए इंसान की उत्पत्ति और विकास की पूरी समझ ही बदल डाल रहे थे, हीगल के प्रवाह में मार्क्स और एंगेल्स पूरे इतिहास और मानव समाज के काम करने के ढंग को एकदम वैज्ञानिक दृष्टि से समझा रहे थे. आइन्स्टीन, मेक्स प्लांक, नील्स बोर और श्रोडीन्जर अपनी अजूबी प्रतिभा से क्लासिकल न्यूटोनियन फिजिक्स और यूक्लिडीयन जियोमेट्री सहित भौतिकशास्त्र की पूरी समझ को एक नए स्तर पर ले जा रहे थे.

    उस समय भारतीय चिन्तक क्या कर रहे थे?

    उन्नीसवी सदी के आरंभ से बीसवीं सदी के अंत तक भारतीय पंडित पश्चिमी विद्वानों से शर्मिन्दा होते हुए या तो अन्टार्कटिका में अपने पूर्वजों की खोज कर रहे थे या फिर फर्जी राष्ट्रवाद के लिए गणेश-उत्सव का कर्मकांड रच रहे थे. बंगाल के कुछ चिंतक इसाइयत की कापी करके नियो-वेदांत की और मिशनरी स्टाइल समाज सेवा की रचना कर रहे थे, अपने ब्रिटिश आर्य बंधुओं के “आर्य-आक्रमण” को अपने लिए वरदान मानते हुए भरत मिलाप सिद्ध कर रहे थे और पश्चिमी स्त्री की स्वतन्त्रता से शर्माते हुए सती प्रथा से पिंड छुडाने के लिए पहला सभ्य प्रयास कर रहे थे. इसी दौर के दुसरे संस्कारी पंडित जन भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्री फुले पर गोबर और पत्थर फेंक रहे थे, ज्योतिबा फूले के बालिका स्कूल और विधवा आश्रम को बंद कराने के लिए सब तरह के षड्यंत्र कर रहे थे, अंबेडकर को पढने लिखने से रोकने की सनातनी चाल चल रहे थे, कुछ चिन्तक-योगी नीत्शे और डार्विन की खिचड़ी बनाकर अतिमानस और पूर्ण-योग की रचना कर रहे थे.

    आजादी के बाद हमारे महानुभाव फिलहाल क्या कर रहे हैं?

    एक महर्षि बीस मिनट के ध्यान से हवा में उड़ने की तकनीक सिखा रहे थे. एक योगानन्द जी क्रियायोग के बीस बरस के अभ्यास से बीस करोड़ सालों का क्रमविकास सिद्ध करने का दावा कर रहे थे. एक महात्मा जी बकरी के दूध और उपवास का महात्म्य समझा रहे हैं. कुछ महान दार्शनिक अपने ही शिष्य की थीसिस चुराकर शिक्षक दिवस पर लड्डू बाँटने का इन्तेजाम कर रहे थे.एक रजिस्टर्ड भगवान पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों जैसे फ्रायड जुंग और विल्हेम रेख की जूठन की भेल पूरी बनाकर बुद्ध और कबीर के मुंह में वेदान्त ठूंस रहे थे. इस षड्यंत्र से वे जोरबा-द-बुद्धा की रचना करके अभी अभी गए हैं. हाल ही में एक बाबाजी हरी लाल चटनी और रसगुल्ले खिलाकर किरपा बरसा रहे हैं. एक अन्य महाराज जमुना का उद्धार कर ही चुके हैं और एक गुरूजी देश भर की नदियों को बचाने के लिए सडकों की ख़ाक छानकर फिलहाल सुस्ता रहे हैं, जल्द ही किसी नए अभियान पे निकलेंगे. वहीं एक अन्य बाबाजी दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर में प्राणायाम का विश्वरिकार्ड बनाकर च्यवनप्राश बाँट रहे हैं, व्यवस्था परिवर्तन और क्रान्ति से शुरुआत करके आजकल दन्तकान्ति, केशकान्ति बेच रहे हैं.

    नतीजा सामने है.पश्चिम में वे नई सभ्यता और नैतिकता सहित ज्ञान विज्ञान साहित्य, कला दर्शन, फेशन, फिल्मों, कपडे लत्ते, चिकित्सा, भोजन, भाषा, संस्कृति और हर जरुरी चीज का विकास और निर्यात कर रहे हैं और हम सबकुछ आयात करते हुए, खरीदते हुए जहालत के रिकार्ड तोड़ते हुए गोबर के ढेर में धंसते जा रहे हैं.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • अभिनव प्रयास, झांसी : जब हम जीत कर भी हार गए और 11 वर्ष की बच्ची छाया को बचा नहीं पाए

    अभिनव प्रयास, झांसी : जब हम जीत कर भी हार गए और 11 वर्ष की बच्ची छाया को बचा नहीं पाए

    उ.प्र. राज्य के जनपद झाँसी के एक ग्राम के प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाली छात्रा स्व. कु. छाया की करुणामय दास्तान।

    सरकारी स्कूल के बाहर एक बरगद के पेड़ के नीचे बने बड़े से चौक पर खुद को मई की तपती धूप से बचाते हुए एक कोने में घुटनों को पेट की तरफ़ मोडे हुए गठरी बनी एक हाड़ माँस की काया लम्बी लम्बी साँसें लेते हुए जाने एक टक आसमान की तरफ़ क्या निहार रही थी। इसी समय स्कूल की तरफ़ आती हुयी एक चार पहिया गाड़ी को देखकर बाहर खेल रहे बच्चे शोर मचाने लगे जिससे घबराकर चौक पे लेती वो लड़की वहाँ से लड़खड़ाती हुई धीरे धीरे आगे कहीँ चली गयी। गाड़ी से राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की टीम ने उतर कर स्कूल के आसपास के वातावरण का जायेजा लिया और फ़िर आसपास खेल रहे बच्चो को स्कूल चलने के लिये बोले। टीम द्वारा आज स्कूल में तय तिथि परबच्चो का स्वास्थ्य परीक्षण होना है ।

    एक एक करके सभी बच्चो का लम्बाई वजन/सामान्य जाँच/आँखो एवं दाँतों की जाँच डा० ऋषि राज एवं डा० ब्रिषालि यादव द्वारा की जा रही थी। टीम के अन्य सदस्य डा० हैदर एवं टीना शर्मा द्वारा बच्चो एवं स्कूल स्टाफ को स्वास्थ्य एवं स्वच्छता से सम्बन्धित जानकारी दी जा रही थी। इसी बीच वहाँ मौजूद शिक्षिका श्रीमती सुमन ने एक बच्ची की बीमारी के बारे में बताया जो अपनी बीमारी के कारण स्कूल नहीँ आ रही थी। टीम ने तुरंत उस बच्ची को और उसके अभिभावकों को स्कूल बुलवाया।

    यह वही बच्ची थी जो कुछ देर पहले गठरी बनी पेड़ की छाया में लेटी थी। उसके साथ उसकी दादी आयी थी। खामोश खड़ी हुई बच्ची ने उसका नाम पूछे जाने पर एक बार अपनी दादी की तरफ़ देखते हुए घबराते हुए अपना नाम छाया बताया।

    डा. ब्रिषालि द्वारा उसको प्यार से बहला कर उसकी जाँच करने पर पता चला की छाया तो खून की कमी के साथ साथ साँस लेने में दिक्कत है और वह बहुत कुपोषित अवस्था में है। दो कदम भी चलना उसके लिये दूभर है। 11 साल की बच्ची छाया को तत्काल मेडिकल कालेज संदर्भित किये जाने की बात पर उसकी दादी ने मायूसी जतायी और जाने से मना कर दिया।

    टीम द्वारा कारण पूछे जाने पर दादी ने बताया के छाया की माँ नहीँ है। बाप मज़दूरी पर जाता है। एक बहन है बड़ी तो वह नानी के घर पर रहती है। इसलिये छाया को अगर भर्ती करायेंगे तो कौन उसकी देखभाल करेगा। टीम द्वारा और स्कूल के शिक्षिका द्वारा समझाये जाने पर छाया की दादी अगले दिन छाया को मेडिकल लाने को राजी हो गयी।

    टीम द्वारा गाँव के लोगो से पूछ ताछ के दौरान पता चला कि छाया के पैदा होने के छः माह बाद ही उसकी माँ ने फाँसी लगा के आत्महत्या कर ली थी। कोई कहता है दो बेटियों को जन्म देने के कारण लोगो के ताने सुनते सुनते तंग आ गयी थी तो कुछ का कहना था के छाया के पिता के ऊपर कर्ज़ बहुत था और वह शराब भी बहुत पीता था जिसके चलते आये दिन बकायेदार दरवाजे पे आकर गाली गलौज करते थे और वोह खुद शराब के नशे में सारा गुस्सा छाया की माँ पर उतार देता था। मज़दूरी से ना ही तो घर का कुछ हला भला हो रहा था ना ही बच्चीया ढंग से पल पा रही थी। इन्ही सब बातों से तंग आकर छाया की माँ ने फाँसी लगा ली थी।

    अगले दिन छाया मेडिकल कालेज अपनी दादी के साथ आयी जहाँ आर बी एस के टीम से डा० ब्रिषालि और डा० हैदर ने उनको एमर्जेन्सी में भर्ती कराया। छाया की जांचों की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।  हीमोग्लोबीन मात्र 3% होने के कारण छाया को तुरंत खून चढ़ना था किन्तु छाया के साथ सिर्फ़ उसकी दादी थी जो अधिक उम्र के कारण रक्तदान नहीँ कर सकती थी। छाया और उसकी दादी टकटकी लगाये एक दूसरे को देखते तो कभी हसरत भरी निगाहों से दोनों डाक्टरों की तरफ़ देखते।

    ईश्वर के इशारे को समझते हुये आर बी एस के टीम के डा० हैदर ने तुरंत एक यूनिट रक्तदान करने का फैसला किया और उसी दिन छाया को एक यूनिट रक्त उपलब्ध हो गया। अगले दिन छाया की हालत में सुधार था मगर आज भी उसे और खून की ज़रूरत थी। इस बार फ़िर ईश्वर के इशारे को समझते हुए आर बी एस के टीम के श्री शिव कुमार पटेल ने एक यूनिट रक्तदान किया और इस तरह छाया को दो यूनिट रक्त चढ़ाया गया। तीसरे दिन छाया की हालत सुधरने पर उसे एमर्जेन्सी से वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया।

    बेहतरीन चिकित्सा सेवा के चलते 6 दिन बाद छाया अब काफी बेहतर मेहसूस कर रही थी। वह अब बिना थके चल रही थी और उसकी साँस भी सामान्य थी। हीमोग्लोबीन भी आश्चर्जनक रूप से 6 दिन में 8% हो गया था। छाया की दादी और छाया आर बी एस के टीम को धन्यवाद दे रहे थे और आर बी एस के टीम ईश्वर का धन्यवाद दे रही थी कि ईश्वर ने उन्हे इस पुनीत कार्य के लिये चुना।

    छाया ठीक होकर अपने घर चली गयी। डाक्टरों ने उसे आराम करने और अच्छी तरह से खाने पीने की सलाह देकर पंद्रह दिन बाद आने को बोला। पंद्रह दिन गुज़र जाने के बाद भी जब छाया नहीँ आयी तो आर बी एस के टीम के श्री पटेल उसके गाँव गये और उसका हाल चाल लिया। छाया के पिता और दादी सब बहुत खुश थे। गाँव वाले भी सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना की भूरि भूरि प्रशंसा कर रहे थे। गाँव वालो के इस आदर सत्कार से टीम का सीना गर्व चौड़ा हो गया और मन ही मन गर्व भी महसूस हो रहा था।

    कुछ दिन गुज़र गये मगर छाया दुबारा दिखाने नहीँ आयी। टीम द्वारा जब उसके पिता को फोन करके उसकी खैरियत पूछी गयी तो उधर से जो जवाब मिला उसे सुनकर सारी टीम के लोग स्तब्ध रह गये। छाया के पिता ने बताया के छाया इस दुनिया से चल बसी है वह अपनी माँ की गोद में चली गयी।

    समस्त टीम सदस्यों के लिये यह एक अफ़सोस का वक्त तो था मगर सब अंदर ही अंदर सोच रहे थे के आखिर चूक कहाँ हो गयी? छाया के जैसी जाने कितनी जिंदगियां ऐसे ही जानलेवा बीमारियों की भेंट चढ़ जाती है। भारत सरकार के इस स्वास्थ्य मिशन को हम सभी राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्येक्रम के टीम सदस्यों को साकार बनाना है ताकि फ़िर किसी की छाया ना छिन सके।

    हमारी पीड़ा:

    सुनने लिखने और पढ़ने में छोटी सी कहानी लेकिन कई सवाल कटाक्ष हम सभी पर….

    • क्या ज़िम्मेदार केवल स्वास्थ्य विभाग है बाकि पंचायतराज, और कुपोषण को समर्पित ICDS, बेसिक शिक्षा कोई नहीं??
    • एक बच्ची खून की कमी से ग्रसित थी क्या कर रहे थे बाकि विभाग के प्रतिनिधि??
    • क्या ज़िम्मेदारी सिर्फ विभागों की है वहां रह रहे अड़ोसी पडोसी किसी को नहीं दिखा जो वाह वाही करने आ गए और जब बच्ची मौत के मुंह में थी किसी को नहीं सूझा कम से कम उस टीम को ही फोन कर देते जो उसको मौत के मुंह से खींच कर लायी थी।
    • उसके बाप की तो क्या कहेँ शायद बिटिया तो बोझ होती है लेकिन दादी तुम भी तो स्त्री थी तुम क्यों न बोली और इंतज़ार किया उस बेबस निरीह बच्ची के मारने हाँ क़त्ल का , उस बच्ची के क़त्ल में तुम भी भागीदार हो और उन लोगो की भावनाओं के क़त्ल की भी जो अपने काम से बढ़कर उस बच्ची के लिए भागे जिनकी वो कुछ नहीं लगती थी।
    • वो मीडिया जो अगर उस बच्ची को कुछ अस्पताल में हुआ होता तो चीख चीख कर ढिंढोरा पीट रहा होता कि डॉक्टर की लापरवाही से मौत हुई, तुम्हारी नज़रे क्यों नहीं जाती उस सड़ती मरती मानवीयता पर जहाँ इतने बड़े गाँव में कोई प्रधान और पंचायत सदस्य बोलेरो और स्कार्पियो के आगे प्रधान लिखे घूमते है उन पर प्रश्नचिन्ह क्यों नहीं??

    सवाल बहुत हैं और बहुतों पर हैं हम दुःखी हैं लेकिन निराश बिलकुल नहीं, हमारा मिशन, हमारा अभिनव प्रयास इनके लिए ही है।

    हे प्रभु हमको इतनी शक्ति देना, सामर्थ्य देना, प्रेरणा देना,भाव देना कि हम अपने मार्ग पर अडिग रहे, सतत चलते रहें

    डा० शुजाअत हैदर जाफरी
    फिजियोथिरैपिस्ट
    आरबीएसके, झाँसी

  • भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद –Sanjay Jothe

    भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत का दार्शनिक और नैतिक पतन आश्चर्यचकित करता है. भारतीय दर्शन के आदिपुरुषों को देखें तो लगता है कि उन्होंने ठीक वहीं से शुरुआत की थी जहां आधुनिक पश्चिमी दर्शन ने अपनी यात्रा समाप्त की है. हालाँकि इसे पश्चिमी दर्शन की समाप्ति नहीं बल्कि अभी तक का शिखर कहना ज्यादा ठीक होगा.  कपिल कणाद और पतंजली भी एक नास्तिक दर्शन की भाषा में आरंभ करते हैं, महावीर की परम्परा भी इश्वर को नकारती है.इन सबसे आगे निकलते हुए बुद्ध न सिर्फ इश्वर या ब्रह्म को बल्कि स्वयं आत्मा को भी निरस्त कर देते हैं. एक गहरे नास्तिक या निरीश्वरवादी वातावरण में भारत सैकड़ों साल तक प्रगति करता है. लेकिन वेदान्त के उभार के बाद भारत का जो पतन शुरू होता है तो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है.

    पश्चिम में आधुनिक समय में खासकर पुनर्जागरण के बाद जो दर्शन मजबूत हुए या शिखर पर पहुंचे हैं और जिन्होंने विज्ञान, तकनीक, लोकतंत्र आदी को संभव बनाया है वे भी ईश्वर और आत्मा को नकारते हैं. कपिल, कणाद और बुद्ध की तरह वे भी एक सृष्टिकर्ता और सृष्टि के कांसेप्ट को नकारते हैं और प्रकृति या सब्सटेंस को ही महत्व देते हैं. इसके बाद चेतना, रीजन और ”विल” को अपनी खोजों और विश्लेषण का आधार बनाते हैं.

    ये मजेदार बात है. भारत के प्राचीन दार्शनिकों ने जहां से शुरू किया था वहां आज का पश्चिमी दर्शन पहुँच रहा है. लेकिन भारत में उस तरह का विज्ञान और सभ्यता या नैतिकता नहीं पैदा हो सकी जो आज पश्चिम ने पैदा की है. ये एक भयानक और चकरा देने वाली सच्चाई है.

    इसका एक ही कारण नजर आता है. प्राचीन भारतीय दार्शनिको की स्थापनाओं को सामाजिक और राजनीतिक आधार नहीं मिल पाया. उनकी शिक्षाओं को institutionalise नहीं किया जा सका, किसी संस्थागत ढाँचे में (सामाजिक या राजनीतिक) में नहीं बांधा जा सका. कुछ प्रयास हुए भी अशोक या चन्द्रगुप्त के काल में लेकिन वे भी ब्राह्मणी षड्यंत्रों की बलि चढ़ गये.  कपिल, कणाद महावीर या बुद्ध से आ रहा एक ख़ास किस्म का भौतिकवाद और इस भौतिकवाद पर खड़ी नैतिकता भारतीय समाज और राजनीति का केंद्र नहीं बन पायी. बाद के आस्तिक दर्शनों और वेदान्त ने इश्वर-आत्मा-पुनर्जन्म की दलदल में दर्शन और समाज दोनों को घसीटकर बर्बाद कर दिया.

    कपिल कणाद के बाद बुद्ध और महावीर की परम्पराओं में भी भीतर से ही परलोकवाद और वैराग्यवाद उभरता है और अपने ही स्त्रोत को जहरीला करके ब्राह्मणवादी पाखंड के आगे घुटने टेक देता है. फिर सुधार की रही सही संभावना भी खत्म हो जाती है. इसीलिये आश्चर्य की बात नहीं कि ओशो रजनीश जैसे धूर्त बाबा अपने परलोक और पुनर्जन्मवादी षड्यंत्र को बुनते हुए बुद्ध और महावीर सहित कबीर को भी अपनी चर्चाओं में बड़ा उंचा मुकाम देते हैं. इन्हें अपनी प्रेरणाओं का स्त्रोत बताते हुए इनके मुंह में फिर से वेद वेदान्त का जहर ठूंसते जाते हैं और सिद्ध करते जाते हैं कि बुद्ध महावीर कपिल कणाद कबीर आदि सब इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को मानते थे.

    गौर से देखें तो पश्चिमी देशों में प्राचीन शास्त्रों और प्राचीन दर्शन के साथ ऐसी गहरी चालबाजी करने की कोई परंपरा नहीं है. वहां हर दार्शनिक अपनी नयी बात लेकर आता है. दयानन्द,अरबिंदो या विवेकानन्द या राधाकृष्णन, गांधी या महाधूर्त ओशो की तरह वे वेद-वेदान्त से समर्थन नहीं मांगते बल्कि पश्चिमी दार्शनिक अपने से पुराने दार्शनिकों को कड़ी टक्कर देते हुए आगे बढ़ते हैं. भारत के ओशो रजनीश और अरबिंदो घोष जैसे पोंगा पंडित इसी काम में लगे रहते हैं कि उनका दर्शन किसी तरह वेद वेदान्त या अन्य प्राचीन शास्त्रों से अनिवार्य रूप से जुड़ जाए. 

    इस एक विवशता के कारण उनका जोर स्वयं दर्शन या समाज को बदलने पर नहीं होता बल्कि समाज के मनोविज्ञान और उपलब्ध या ज्ञात इतिहास को मनचाहे ढंग से बदलने पर होता है. यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. इसी कारण भारतीय दार्शनिक कितनी भी ऊँची उड़ान भर लें, वे प्राचीन ग्रंथों से अपने लिए समर्थन मांगने की विवशता के कारण समाज की रोजमर्रा की नैतिकता और जीवन की व्यवस्था को बदलने की कोई बात नहीं करते, वहां वे बहुत सावधान रहते हैं.

    उधर पश्चिम में कोई भी दर्शन हो वो तुरंत समाज और जीवन का हिस्सा बन जाता है. आधुनिक काल में जन्मा भौतिकवादी दर्शन वहां समाज, शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य आदि में तुरंत ट्रांसलेट होता है और इस दर्शन को सुरक्षित गर्भ देकर विकसित होने के लिए सामाजिक राजनीतिक वातावरण बनाता है. डार्विन, फ्रायड और मार्क्स के आते ही पश्चिमी दुनिया बदल जाती है, उनके सोचने का ढंग उनकी जीवनशैली, उनकी राजनीति, व्यापार सब बदल जाता है. इधर भारत में कोई भी आ जाए, कुछ नहीं बदलता, एक सनातन पाषाण सी स्थिति है औंधे घड़े पे कितना भी पानी डालो, भरता ही नहीं. भारत में दर्शन सिर्फ खोपड़ी में या शास्त्रों में रहता है. वो समाज की रोजमर्रा की जीवन शैली को बदलने में बिलकुल असमर्थ रहता है. 

    भारत में दार्शनिक उड़ान एक भांग के नशे जैसी स्थिति है, उस नशे की उड़ान में कल्पनालोक में या शास्त्रार्थ के दौरान आप जमीन आसमान एक कर सकते हैं लेकिन सामाजिक नियम और सामाजिक नैतिकता में रत्ती भर का बदलाव नहीं आने दिया जाता, यहाँ पंडितों के रोजगार को सुरक्षित रखने के लिए कर्मकांडीय नैतिकता का जो जाल बुना गया है वो असल में दार्शनिक नैतिकता के उभार की संभावना की ह्त्या करने के लिए ही बुना गया है. इसीलिये भारत में दर्शन या विचार के क्षेत्र में भी कोई बदलाव हो जाए, लेकिन समाज में मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं होता.

    ये बदलाव रोकने के लिए ही भारत में शिक्षा, विवाह, राजनीति, व्यापार आदि को एक लोहे के ढाँचे में बांधा गया है. यही लोहे का ढांचा वर्ण, आश्रम और जाति के नाम से जाना जाता है. पश्चिम में ये ढांचा नहीं था, ये लोहे की दीवारें नहीं थीं. इसलिए वहां के भौतिकवादी दार्शनिकों ने पांच सौ साल में वो कर दिखाया जो भारत में हजारों साल तक नहीं हुआ. जिस तरह से परलोकवादी बाबाओं का बुखार छाया हुआ है उसे देखकर लगता है कि आगे भी होने की कोई उम्मीद नहीं है. 

    भारतीय समाज के कर्मकांड और इनसे जुडी परलोकवादी धारणाएं जब तक चलती रहेंगी भारत में सभ्यता और नैतिकता की संभावना ऐसे ही क्षीण होती रहेंगी.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • भारत के विकसित, समृद्ध व वास्तविक विश्वगुरू होने की कुंजी भारत की ग्रामीण कृषक महिला है

    भारत के विकसित, समृद्ध व वास्तविक विश्वगुरू होने की कुंजी भारत की ग्रामीण कृषक महिला है

    Vivek Umrao Glendenning

    हम MBA की पढ़ाई करके, इंजीनियरी की पढ़ाई करके, व्यापार करते हुए भले ही व्यापार में हम किसी दुकान में बैठकर चूरन की पुड़िया ही बेचते हों, अर्थशास्त्र पढ़ते या पढ़ाते हुए इत्यादि इत्यादि करते हुए व्यापार, आय, लाभ हानि, श्रम, उत्पादन, सर्विस सेक्टर, लागत इत्यादि की बहुत चर्चाएं करते हैं, गुणा गणित करते हैं।

    बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करते हुए लागत की गणना करते समय बारीक से बारीक चीज यहां तक कि किसी से बात करने, मीटिंग करने इत्यादि की भी गणना करते हुए  आय, लाभ, हानि व लागत इत्यादि का आंकलन करते हैं।

    इस लेख में मैं बहुत ही सरल गणित से आपको भारतीय समाज की सबसे अधिक उपेक्षित मानी जाने वाली ईकाई ग्रामीण कृषक महिला के बारे में बताता हूँ, वह भी जीवंत उदाहरण के साथ। वह ग्रामीण महिला जो काम करती है, लेकिन उपेक्षित है, कुशल प्रबंधक है लेकिन दोयम स्तर की मानी जाती है, योग्यता के साथ उत्पादन करती है लेकिन मूर्ख मानी जाती है, देश की इकानोमी की रीढ़ (बैकबोन) है लेकिन GDP में उसकी गणना तक नहीं होती।

    जो लोग शहरों में रहते हैं यहां तक कि महिलाएं भी, वे स्वयं को ग्रामीण महिलाओं की तुलना में श्रेष्ठ मानने, ग्रामीण कृषक महिलाओं को गवांर कहते हुए स्वयं से निम्नतर व दोयम स्तर का मानने की मानसिकता में जीते हैं। जिन महिलाओं के पति सरकारी नौकरी या ऊंचे वेतनमानों वाली प्राइवेट नौकरी में हैं, वे महिलाएं तो ग्रामीण कृषक महिलाओं को बिलकुल ही दोयम स्तर का मानने की मानसिकता में जीती हैं। जो महिलाएं नौकरी करतीं हैं भले ही दो चार पांच हजार रुपए की ही नौकरी क्यों न हो, ग्रामीण कृषक महिलाओं के प्रति उनकी मानसिकता के तो कहने ही क्या।

    यहां उन ग्रामीण महिलाओं की बात नहीं हो रही है, जो खाना बनाने, घर के दो चार कमरों में झाड़ू मारने, चार पांच कपड़े धोने में ही पूरा दिन गुजार देतीं हैं, हाय-तौबा ऊपर से। यहां उन ग्रामीण महिलाओं की बात हो रही है जो खाना बनाने, झाड़ू मारने, कपड़े धोने जैसे कामों को काम ही नहीं मानती हैं, इन कामों को चुटकी बजाते कर लेती हैं। इनकी दृष्टि में काम का मतलब उत्पादन से जुड़े हुए काम। श्रेणी अलग करने के लिए इस प्रकार की महिला को ग्रामीण कृषक महिला कह रहा हूँ।

    मैं उत्तर प्रदेश के दो भिन्न इलाकों की जिन दो ग्रामीण कृषक महिलाओं की चर्चा उदाहरण के लिए इस लेख में करने जा रहा हूँ। वे दोनों मध्यवर्गीय किसान परिवार से हैं। उनके पति भी किसान हैं, नौकरी नहीं, व्यापार नहीं। कृषि के अतिरिक्त आय का स्रोत नहीं। एक महिला पश्चिमी उत्तर प्रदेश से है व एक महिला मध्य उत्तर प्रदेश से है। हर जिले में आपको इन जैसी सैकड़ों हजारों ग्रामीण कृषक महिलाएं मिल जाएंगी। खेती की जमीन, जानवरों की संख्या व अन्य कारकों के कारण उत्पादन व आय में अंतर हो सकता है। ईमानदारी से गुनिए कि भारत की वास्तविक इकोनोमी  की वास्तविक रीढ़ (बैकबोन) कहां है, कहीं ऐसा तो नहीं कि सबसे उपेक्षित, सबसे तिरस्कृत, सबसे दोयम मानी जानी वाली ईकाई ही वास्तविक बैकबोन है।

    “धर्मवती” पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक ग्रामीण कृषक महिला (आय 60,000 रुपए महीना से अधिक):

    Dharmvati

    यह धर्मवती हैं, उम्र लगभग 52 साल है। गांव में रहतीं हैं। कभी कभार रिश्तेदारों से मिलने या कोई रिश्तेदार बीमार हुआ तो उसको देखने, उसकी सेवा करने इत्यादि के लिए शहर भले ही आ जाएं। पांचवीं तक पढ़ाई की है। घर में टीवी नहीं, फ्रिज नहीं, कार नहीं, एसी नहीं।

    यहां केवल उस आय की चर्चा हो रही है जो शुद्ध रूप से धर्मवती जी की मेहनत का परिणाम है।

    धर्मवती गाय भैंस पालती हैं, उनकी सेवा टहल अपने बच्चों की तरह करती हैं, उनके नखरे झेलतीं हैं। दूध, दही, घी, अचार, सिरका, छाछ व सब्जी का उत्पादन करतीं हैं। खेती के उत्पादन को नहीं जोड़ रहा हूँ क्योंकि उसमें घर के पुरुषों का भी सक्रिय सहयोग रहता है। जानवरों के खानपान की लागत को धर्मवती के खेती उत्पादन में श्रम के योगदान से पूरा किया जा सकता है, धर्मवती भी खेती में सक्रिय सहयोग करतीं हैं। इसलिए जानवरों के भोजन की लागत को आय में से नहीं घटा रहा हूँ।

    यहां उस घी या दही की बात नहीं हो रही है जिसमें बाजार से दूध खरीद कर गर्म करके मलाई रखकर गर्म करके फुर्सत में घी बना लिया गया। यहां बात पूरे उद्योग की हो रही है। जानवर की सेवा टहल से लेकर दूध का उत्पादन फिर दूध को घर में पारंपरिक विधियों से प्रोसेस करके घी, मक्खन, छाछ इत्यादि के रूप में उत्पादित करना।

    दूध, दही, छाछ, घी, मक्खन, सब्जी, सिरका, अचार इत्यादि का जितना भी उत्पादन बाजार में बेचने या घरेलू खपत के लिए धर्मवती अपनी मेहनत व कौशल से करतीं हैं। वह सालाना लगभग 750,000 (साढ़े सात लाख) रुपए है। यदि खेती से होने वाली कुल आय में धर्मवती के श्रम योगदान की गणना को भी संज्ञा में लिया जाए तो यह आय और अधिक बढ़ जाएगी। लेकिन चूंकि बात केवल धर्मवती की आय की हो रही है। तो मैं केवल उस आय की बात कर रहा हूँ जो धर्मवती की मेहनत व कौशल के कारण होती है।

    750,000 (साढ़े सात लाख) रुपए सालाना मतलब 60,000 (साठ हजार) रुपए महीने से भी अधिक जबकि खेती से होने वाली आय इसमें नहीं जुड़ी है। सरकारी प्राथमिक शिक्षक, सरकारी कर्मचारियों व ऊंची कंपनियों में नौकरी करने वाले प्रोफेशनल्स के वेतन से भी अधिक अर्थात 60,000 रुपए महीने से अधिक की आय करने वाली धर्मवती का अपना खर्च औसत लगभग 800 से 900 रुपए महीना है, जिसमें उनके कपड़े, जूते, चप्पल, लिपिस्टिक, क्रीम, बिंदी इत्यादि खर्च सम्मिलित हैं।

    “मनोरमा” मध्य उत्तरप्रदेश की एक ग्रामीण कृषक महिला (आय 60,000 रुपए महीना से अधिक):

    मनोरमा उम्र लगभग 40 वर्ष। गांव में रहतीं हैं। अपने छोटे भाई बहनों की परवरिश में मदद करतीं रहीं, उनके विवाह संपन्न कराए। सुबह चार बजे जगतीं हैं, रात में लगभग दस बजे सोती हैं। दिन में शायद ही कभी आराम करतीं हों। बारहवीं तक पढ़ाई की है।

    बारहवीं तक पढ़े होने के बावजूद बहुत जागरूक महिला हैं। गांव में बिजली होने के बावजूद घर में बिजली नहीं ली, सोलर पैनल से पूरे घर का काम चलता रहा। घर में टीवी, कूलर, फ्रिज, मोटरसाइकिल, कार, एसी नहीं। अभी पिछले साल घर में बिजली लगवाई, फ्रिज लिया। केवल दो लड़कियां हैं, लड़के के लिए कभी मंशा नहीं रही, दो लड़कियों के साथ बेहद खुश।

    [pullquote align=”normal”]दोनों लड़कियों को खूब मजे से रखतीं हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई का पूरा ध्यान। दोनों बच्चियां पढ़ने में बहुत अच्छी हैं। रोज गांव से साइकिल चलाकर दूसरे गांव में स्थापित स्कूल में पढ़ने के लिए भेजती रहीं। गांव के स्कूल में पढ़ने के बावजूद बड़ी लड़की ने दसवीं व बारहवीं की उत्तरप्रदेश बोर्ड परीक्षा में 85% से अधिक नंबर प्राप्त किए। दसवीं या बारहवीं में से किसी एक बोर्ड परीक्षा में शायद 90% के आसपास नंबर थे। आजकल आईआईटी इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही है। छोटी लड़की ने भी उत्तरप्रदेश बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में 85% से अधिक नंबर प्राप्त किए हैं। छोटी लड़की की इच्छा डाक्टरी पढ़ने की है। बड़ी लड़की को भारत सरकार से मेधावी छात्रों के लिए प्रोत्साहन वैज्ञानिकी पुरस्कार व छात्रवृत्ति भी मिल चुके हैं।  [/pullquote]

    बहुत लोग बच्चों से पढाई करने के नाम पर घरेलू काम नहीं करवाते हैं। मनोरमा की दोनों बच्चियां घरेलू व कृषि के कामों में सक्रिय भागीदारी करतीं आई हैं, अपने कपड़े वह भी हैंडपंप से पानी निकाल कर हाथ से धोतीं आईं हैं। इन सब कामकाजों को करते रहने के बावजूद पढ़ने में भी बहुत मेधावी रही हैं। खेती से होने वाली आय का पूरा हिसाब किताब इनकी दोनों बच्चियां ही बचपन से करतीं व रखती आईं हैं। लाखों रुपए का सालाना हिसाब किताब देखने के बावजूद आजतक कभी भी एक रुपए का झोल नहीं। माता-पिता व बच्चियां सभी आपस में विश्वास के साथ जीवन जीते हैं।

    मनोरमा की दोनों पुत्रियां खेतों में काम करते हुए

    चूंकि घर में बंदूक थी इसलिए इन दोनों बच्चियों ने सात-आठ साल की उम्र से ही बंदूक चलाना सीख लिया था। दोनों लड़कियां शालीन हैं, अपने काम से मतलब रखतीं हैं लेकिन स्वाभिमानी व आत्मविश्वास की धनी हैं। यदि किसी ने उटपटांग की बात की तो शालीनता के साथ उसकी समझ में आने वाली भाषा में जवाब हाजिर। गांव में बाकायदा छोटे बच्चों व बच्चियों की वानर सेना बना रखी है। कोई भी स्कूल आने जाने वाले बच्चों बच्चियों को परेशान नहीं कर सकता है। टेंपो टैक्सी बस वाले बच्चा समझ कर अधिक किराया नहीं वसूल सलते हैं। वानर सेना हड़कंप मचाती है। रोज शाम को वानर सेना गीत व नृत्य का कार्यक्रम करती है। शाम के पहले पढ़ाई होती है, रात में पढ़ाई होती है, सुबह जल्दी जगकर पढ़ाई होती है। सबकुछ स्वेच्छा से, कोई दंड नहीं, कोई दवाब नहीं, सहजता व सरलता के साथ।

    मनोरमा गाय भैंस पालती हैं। उनके घर की खेती इनके ही दम पर चलती है। केवल दूध, दही, घी, सब्जी इत्यादि के उत्पादन से ही घरेलू खपत व बाजार विक्रय की 70,000 रुपए से अधिक मासिक आय हो जाती है। इनका अपना व्यक्तिगत खर्च कपड़े, चप्पल, क्रीम, पाउडर इत्यादि का औसत 500 रुपए महीना है।   

    मनोरमा जानवरों के भोजन का इंतजाम करते हुए
    मनोरमा खेतों में काम करते हुए

    चलते-चलते:

    जब भी आपको अपने मन में यह लगे कि ग्रामीण कृषक महिला दोयम है, मूर्ख है, गवांर है, अजागरूक है या आपके किसी मित्र या जानने वाले की मानसिकता हो। आप अपने आसपास उपस्थित ऐसे हजारों उदाहरणों को देखकर अपने भीतर के अहंकार व विकृत मानसिकता को नियंत्रित कर सकते हैं। 

    भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भारत की ग्रामीण कृषक महिला है, न कि बड़े-बड़े कारपोरेट। भारत की सरकारों, समाज व लोगों को ग्रामीण कृषक महिला के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। उनके हित में नीतियां बनाकर क्रियान्वयित करना चाहिए, सबसे प्रमुख प्राथमिकता के साथ।

    भारत की ग्रामीण कृषक महिला बहुत बेहतर प्रबंधक, उद्यमी, कुशल व योग्य है। जरूरत केवल उसे सफल इंट्रेप्रेन्योर के रूप में स्वीकारने, सम्मानित करने व नीति निर्देशक के रूप में स्वीकारने की है।