• Home  / 
  • सामाजिक यायावर
  •  /  ग्रामीण किसान-महिला बेहद परिश्रमी, उत्पादक व Entrepreneur (व्यवसायी) होती है

ग्रामीण किसान-महिला बेहद परिश्रमी, उत्पादक व Entrepreneur (व्यवसायी) होती है

Vivek Umrao Glendenning
“SAMAJIK YAYAVAR/ Social Wayfarer”

[themify_hr color=”red”]

बेहद परिश्रमी :

पूरे वर्ष सर्दी, गर्मी, बरसात कोई भी मौसम हो सुबह लगभग चार बजे उठना। गाय भैंस बकरी की देखभाल करना। देखभाल करने की प्रक्रिया में जानवरों को यहां से वहां बांधना ताकि रात भर में एक ही जगह खड़े या बैठे होने से शरीर की जड़ता टूटे ताकि दूध का संचार ठीक से हो पाए। भूसे को बड़ी-बड़ी टोकरियों में लादकर नांद तक पहुंचाना व जानवरों को देना या चारा मशीन को हाथ से चलाकर चारा काटकर जानवरों को देना।

कुएं या हैंडपंप से ढेरों बाल्टी पानी खींच कर जानवरों के बैठने व रहने की जगह को साफ करना। अमूमन हैंडपंप बहुत कड़े होते हैं, दिन भर बहुत अधिक इस्तेमाल होता रहने से लुब्रीकेशन जल्द खत्म हो जाने के कारण तथा भूजल स्तर के उतार चढ़ाव के कारण हो जाता है।

हाथों से जानवरों के थनों से दूध निकालना। देखने में यह प्रक्रिया भले ही आसान लगती हो लेकिन कभी दूध निकाल कर देखिए, मालूम पड़ेगा कि उंगलियों, हथेली व पंजो की कितनी तकनीक व मेहनत लगती है।

घर के प्रयोग के लिए दूध निकाल कर, शेष दूध को गांव में डेयरी कलेक्शन केंद्र में जाकर दूध देने जाना। यह दूरी घर से काफी दूर भी हो सकती है, बाल्टी व दूध का वजन लाद कर दूरी तय करके डेयरी में दूध देने जाना।

बच्चों के लिए नास्ता बनाना, स्कूल ले जाने के लिए भोजन बनाना, उनको स्कूल के लिए तैयार करना। घरवालों के लिए भोजन बनाना। बच्चों ने कुछ विशेष फरमाइश कर दी तो वह भी बनाना।

भोजन बनाने का मतलब सौ-पचास-दो सौ रोटियां, चावल, दाल, सब्जी इत्यादि। यह सब चूल्हे में बनाना, धुआं झेलते हुए। फिर ढेर सारे बर्तनों को धोना।घर की अंदर बाहर बैठकी इत्यादि सभी स्थानों में सफाई करना। कभी कभार गोबर लीपना। कंडे पाथना। रसोई के इस्तेमाल के लिए कुएं या हैंडपंप से पानी भरना। परिवार के ढेरों कपड़े हाथ से धोना।

दिन में कई बार समय-समय पर जानवरों की सेवा-टहल करना। उनको पानी पिलाना, यहां से वहां बांधना। चारा देना। शाम को फिर दूध निकालना। फिर से डेयरी में दूध देने जाना।

खेतों पर जाना व खेतों पर काम करना। जानवरों के लिए चारा खेतों से काटना, लादना व ढोकर घर तक लाना। खेतों से घर की दूरी कई किलोमीटर भी हो सकती है।

बच्चों के स्कूल से लौटने पर उनसे बातें भी करती है। उनको फिर से खिलाती है। खुद भले ही पढ़ी लिखी न हो लेकिन बच्चों को पढ़ने लिखने के लिए कहती है, इंतजाम करती है।

ग्रामीण परिवेश में रिश्तों के बहुत मायने होते हैं। रिश्तेदारों से उनके रिश्ते के अनुसार जिम्मेदारी का निर्वाह व देखभाल भी करती है।

रोजमर्रा के प्रयोग के लिए सब्जियों का उत्पादन भी कर लेती है। दूध का खोया बनाकर मिठाई का उत्पादन भी घर में घर लेती है।

उत्पादक :

ग्रामीण किसान-महिला उत्पादन करती है, उत्पादन का प्रारंभिक प्रसंस्करण भी करती है। यदि दाल, अचार, पापड़ इत्यादि की बात की जाए तो संपूर्ण प्रसंस्करण भी करती है। यदि गन्ना की खेती करती है तो प्रसंस्करण करके गुड़ बना लेती है, सिरका भी बना लेती है। दूध का प्रसंस्करण करके छाछ, मक्कन व घी का उत्पादन करती है। आलू चिप्स का उत्पादन करती है।

कृषि से जुड़ा अनेक काम करना जैसे खेतों की निराई गुड़ाई सिचाई, बीज डालना, खर पतवार हटाना, कीटनाशक डालना, खाद डालना, गोबर की खाद बनाना, फसल काटना, फसल ढोना, उत्पादन का भंडारण तथा भंडार का प्रबंधन।

बाजार में बेचने के लिए खेतों में उगाई जाने वाली सब्जियों की बात न भी की जाए, केवल घरेलू प्रयोग के लिए उगाई गई सब्जियों की ही बात की जाए तो भी प्रति वर्ष दसियों हजार रुपए की सब्जी का उत्पादन ग्रामीण किसान-महिला बैठे-ठाले ही कर लेती है।

डेयरी में बेचे जाने वाले दूध की बात न भी की जाए, केवल घरेलू प्रयोग के लिए दूध उत्पादन की ही बात की जाए तो भी प्रतिवर्ष दसियों हजार रुपए के दूध का उत्पादन ग्रामीण किसान-महिला कर लेती है।

घरेलू प्रयोग के लिए छाछ, मक्खन व घी का प्रसंस्करण पद्धति से उत्पादन करती है। इन्हीं वस्तुओं का सालाना उत्पादन बीसियों हजार रुपए होता है।

Entrepreneur (व्यवसायी) :

ग्रामीण महिला-किसान जिन वस्तुओं का उत्पादन व प्रसंस्करण घरेलू व पारिवारिक प्रयोग के लिए करती है, जैसे आलू चिप्स, पापड़, अचार, आम-पापड़, दूध, खोया, मक्खन, छाछ, घी, सब्जी इत्यादि।केवल इन वस्तुओं इन जैसी अन्य वस्तुओं की ही यदि बाजार भाव से गणना की जाए तो यह कई लाख रुपए प्रति वर्ष का हिसाब-किताब बैठेगा।

यदि खेती में उसके योगदान की गणना भी कर ली जाए बाजार भाव पर तो उसकी वार्षिक आय सरकारी प्राथमिक टीचर की तुलना पर पहुंच जाएगी।यहां ध्यान देने की बात यह है कि मैं उत्पादन व प्रसंस्करण की आय की बात कर रहा हूं। मैं घरेलू कार्यों में दी जाने वाली सेवाओं की बात नहीं कर रहा हूं। मैं खाना बनाने, देखभाल करने, कपड़े धोने, घर में झाड़ू पोछा लगाने जैसी सेवाओं की बाजार भाव की गणना करने की बात नहीं कर रहा हूं।

[themify_quote]

मैं ग्रामीण किसान-महिला की उत्पादकता व इकोनोमी में सीधे योगदान की बात कर रहा हूं।

दूध का उत्पादन (दूध खरीदना नहीं), उत्पादित किए दूध का प्रसंस्करण करके छाछ, मक्खन, घी, खोया इत्यादि बनाना।
सब्जी उगाना (सब्जी बाजार से खरीद कर पकाना नहीं)।
आलू उगाकर उसका चिप्स व पापड़ बनाना (आलू खरीद कर चिप्स बनाना नहीं)।

ग्रामीण किसान-महिला उत्पादन में बाजार रिस्क लेती है। उत्पादन का भंडारण-प्रबंधन करती है। बहुत कुछ करती है, बहुत ही अधिक स्किल्ड होती है।

[/themify_quote]

अब सवाल यह है कि जो ग्रामीण किसान-महिला इतनी स्किल्ड है, इतनी परिश्रमी है, इतनी आय करती है, देश की इकोनॉमी व JDP में जबरदस्त व सीधा योगदान करती है। उसकी हमारे समाज में व हमारे मन के अंदर वास्तविक प्रतिष्ठा क्या है?

प्रतिष्ठा का स्तर तो यह है कि जो महिलाएं शहरों या कस्बों में रहती हैं जिनके पति दस-बीस हजार महीना कमा लेते हैं, वे भी ग्रामीण किसान-महिला को निकृष्ट मानती है उपहास उड़ाती है। जबकि शहरी महिला का वास्तविक उत्पादन, इकोनॉमी व GDP में योगदान नहीं होता है। रिस्क क्या है नहीं जानती। दो-तीन कमरों के घर में झाड़ू पोछा करने को, मशीन से कपड़े धोने को, कुछ रोटियां पकाने खाना बनाने को बहुत बड़ा काम मानती है। अपने इन कामों की तुलना नौकरों के वेतन से करती है।

दरअसल यह चरित्र जानबूझकर जिया जाने वाला भयंकर व बेईमान विरोधाभास है। 

चलते – चलते :

यदि हवाई नारेबाजी तथा वस्तुनिष्ठता-हीन-तर्क वाले शाब्दिक तामझाम वाले दर्शन को तर्कसंगत (रेशनल) न माना जाए तो दरअसल भारतीय समाज में परंपरा में ही हजारों वर्षों से परिश्रम को उपेक्षित, तिरस्कृत व अछूत माना गया है। यही कंडीशनिंग हमें गांव, ग्रामीण व किसान को मूर्ख, निठल्ला, उपेक्षित, निरीह, तिरस्कृत व असभ्य मानने की मूर्खतापूर्ण मानसिकता में रखे रहती है।

इस मानसिकता की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगया जा सकता है कि भारत का शहरी समुदाय, गांव व ग्रामीणों को गाली मानता है तभी “गवांर” शब्द गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है।

किसान पुरुष को निठल्ला माना जाता है, किसान महिला को अजागरूक माना जाता है, किसानों की संतानों का मजाक उड़ाया जाता है, उनको दोयम स्तर का माना जाता है।

भारतीय राष्ट्रीय मीडिया लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा मेट्रो व बड़े शहरों की बात करते हुए प्रयोग करता है, शेष लगभग दो प्रतिशत में पूरा भारत, इस बचे हुए दो प्रतिशत के भी अधिकतर प्रतिशत में छोटे शहर ही रहते हैं।

गांव व ग्रामीण का मानों कोई अस्तित्व ही नहीं, कीड़े-मकोड़े हैं। ग्रामीण को भी इंसान समझा जाए, वे भी प्रतिष्ठित हों, उनका आर्गनाइज्ड (organised) शोषण व तिरस्कार बंद हो, बहुत बड़ी प्राथमिकता है।

दरअसल भारतीय समाज में स्किल व श्रम को हमेशा उपेक्षित किया गया है। स्किल व श्रम को कभी ठीक से न समझा गया, न ही परिभाषित किया गया।ग्रामीन किसान-महिला जो बहुत स्किल्ड है, उत्पादक है, Entrepreneur है, उसको जागरूक करने के लिए कुछ-कुछ हजार रुपल्ली वेतन पाने वाले NGO वेतनभोगी कर्मचारी रखे जाते हैं, आशा जैसी सरकारी कर्मचारी रखी जाती हैं, प्राइमरी स्कूल की शिक्षिकाएं रखी जाती हैं।

इतना तो कामन सेंस होना ही चाहिए कि ककहरा व गिनती रटाना अधिक स्किल का काम है या ग्रामीण किसान-महिला के उत्पादन व प्रसंस्करण के काम। ककहरा, गिनती रटाने वाले प्राइमरी स्कूल टीचर का, एक NGO कर्मचारी का, आशा का देश की इकोनॉमी व GDP में वास्तविक उत्पादन योगदान है ही नहीं। फिर भी इनका अहंकार आसमान पर रहता है।

ग्रामीण किसान-महिला जो इन सबसे बहुत अधिक स्किल्ड है, देश की इकोनॉमी व GDP में बहुत योगदान करती है, को निकृष्ट माना जाता है, इससे सीखने की बजाय, सिखाने जाया जाता है। ग्रामीण महिला-किसान को जागरूक बनाने के लिए अभियान चलते हैं, सेमिनार होते हैं। स्किल्ड बनाने के लिए योजनाएं बनती हैं। स्किल डेवेलपमेंट कार्यक्रम चलते हैं।दरअसल जब तक हम, हमारा समाज व हमारे देश का तंत्र इन सब चूतियापों से ऊपर उठकर श्रम व स्किल को ठीक से परिभाषित नहीं करेगा तब तक हमारा समाज व देश बेहूदगी, फूहड़ता व संघटित शोषण से बाहर नहीं निकल पाएगा।

हमें स्किल, श्रम व इकोनॉमी को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है न कि तर्क-असंगतता, मूर्खता व शोषण के तामझाम व प्रपंचो को विस्तारित करते रहने की।

About the author

--

1comment

Leave a comment: