इवांका मसले से निकली बात : मोदीजी बनाम हमारी सैडिस्टिक-सोच

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मोदीजी व सेल्फी

लगभग पांच वर्ष पहले हमारी मित्र सूची में एक मुस्लिम तथाकथित पत्रकार हुआ करते थे। बहुत लोग इनकी पोस्टें साझा करते रहते हैं, हमको भी इनकी पोस्टें लटक-लुटक कर मिलती रहतीं हैं जबकि इनकी पोस्टों को देखकर ही हमको इनकी सैडिस्टिक सोच से मितली आती है। इन महाशय की शान में कसीदे पढ़ने को गाहे बगाहे मिलते रहते हैं, लोग बाकायदा अपनी पोस्टों में पत्रकारिता के लिए रैंक देते हैं, वह बात अलग है कि पत्रकारिता वास्तव में क्या है इसका ककहरा तक न पता हो, लेकिन रैंक देने के लिए पिले पड़े रहेंगे।

पत्रकारिता के नाम पर बहुत लोग इनके नाम की कसमें तक उठाते हैं। बीमार मानसिकता के लोगों का बीमार आदर्श। यह महोदय मोदीजी के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं। मोदीजी की सेल्फी प्रेम का उपहास उठाते रहते हैं। मोदीजी को गाली देना ही इनकी जागरूकता, सामाजिक प्रतिबद्धता व क्रांतिकारिता मानी जाती है। यही महोदय पांच वर्ष पहले अपनी एक पोस्ट में बड़े फक्र के साथ यह बता रहे थे कि कैसे उनको एक एसडीएम ने चाय पिलाई। इनके लिए एक एसडीएम के साथ चाय पीना जीवन की उपलब्धियों में से थी। पहले एसडीएम के साथ चाय पीने को बेंचेंगे, फिर डीएम के साथ, फिर कमिश्नर के साथ, फिर सचिव के साथ, फिर मुख्यमंत्री के साथ।

मोदीजी के सेल्फी प्रेम का उपहास उड़ाने वालों का खुद का अपना स्तर क्या है, इसकी भी बात होनी चाहिए।

यह कौन सी बात हुई कि आप किसी प्रधान के लिए पलकपावड़े बिछा दें। आपके घर में इलाके का ब्लाक स्तर का अधिकारी आ जाए या एसडीएम के साथ चाय पी लें या ऐसा ही कुछ-कुछ और हो जाे तो आप खुद को महान समझने लगें। इसको छोड़िए आपका बच्चा किसी महंगे स्कूल में पड़ने जाता हो तो आप खुद को तोप मानने लगें। यह भी छोड़िए आपका बच्चा अपने स्कूल की क्लास में अच्छे नंबर पा जाता है तो आप चौड़े से अंकतालिका की सेल्फी लेकर अपने लिए सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं। बच्चे की मेहनत पर अपना कब्जा जमाते हैं, पूरी निर्दयता व बेशर्मी के साथ। खुद तो जीवन में पहचान बना नहीं पाए लेकिन बच्चे की मेहनत से अपनी पहचान खोजते हैं। बच्चे की मेहनत से अपनी पहचान खोजने की बीमार मानसिकता के कारण बच्चे को कितना तनाव देते हैं, कितनी हिंसा करते हैं, उसका बचपन मार डालते हैं।

हममें से हजारों लोग जनरल डिब्बों में भेड़ों की तरह नर्कीय यात्रा करते हुए मुंबई जाते हैं। आंधी, वर्षा, तूफान, गर्मी, सर्दी में भूखे प्यासे सिनेमा में रद्दी अभिनय करने वाले अभिनेताओं व अभिनित्रियों के घरों के सामने उनकी एक झलक पाने के लिए घंटों, दिनों, सप्ताहों, महीनों खड़े रहते हैं। अभिनेता या अभिनेत्री हाथ की उंगलियों को हल्की सी जुंबिश भी दे देता है तो हम अपना जीवन धन्य मान लेते हैं। 

हमें अपनी इन टपोरी छिछली व बीमार मानसिकता वाली सेल्फियां नहीं दीखती हैं। लेकिन यदि मोदीजी जापान, चीन या अमेरिका के राजनेताओं के साथ सेल्फी ले लेते हैं तो हमें बड़ी परेशानी होती है। हमें अपना गिरेबां भी झांकना चाहिए।

मोदीजी व लखटकिया सूट

हम आदमी का मूल्यांकन उसके कपड़ों से करने की बीमार मानसिकता में जीते हैं। यदि किसी ने महंगा ब्रांडेड कपड़ा पहन रखा है, महंगा ब्रांडेड जूता पहन रखा है तो हम उसको बड़ा आदमी मानते हैं, उसको आदर देते हैं। यदि किसी ने सस्ते कपड़े व सस्ते चप्पल पहन रखे हैं तो उसे छोटा आदमी मानते हैं। तिरस्कृत करते हैं, दुत्कारते हैं। उसको चोर उचक्का उठाईगीर मान लेते हैं।

महंगे कपड़े व जूते पहनने के लिए हम भ्रष्टाचार करते हैं, दलाली करते हैं, बेईमानी करते हैं, झूठ बोलते हैं, फरेब करते हैं, शोषण करते हैं, हिंसा करते हैं। यदि मोदीजी लखटकिया सूट पहनते हैं तो हमें परेशानी क्यों होती है। मोदीजी तो हमारी ही मानसिकता का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं।

मोदीजी व डिग्री

बहुत लोगों को मोदीजी के इतिहास ज्ञान व उनकी डिग्रियों के संदर्भ में बहुत तकलीफ रहती है। चाहे व दक्षिण भारत हो या उत्तरी भारत। उन्नीस बीस, ढका-मुंदा सभी जगहों पर शिक्षा के नाम पर जमकर मजाक होता है, फर्जीवाड़ा होता है। वह बात अलग है कि बदनाम केवल बिहार ही होता है। बिहार बदनाम इसलिए होता है क्योंकि वहां लालू प्रसाद यादव जैसे नेता सबकुछ खुलासे में करने लगते हैं, बिना लाग-लपेट के। लालू सचिन तेंदुलकर से कह देते हैं कि आइए आपको डिग्री हम अपने राज्य से दिलवा देते हैं। लालू यादव गांव से हैं, एडीकेट नहीं जानते हैं, हर बात को राजनैतिक हानि-लाभ से जोड़कर देखते हैं। प्लीज, थैंक्यू, एक्सक्यूज मी जीवन में शायद ही कभी किसी को कहे हों। राबड़ी जी को प्रेम में चुटकी लेते हुए बोल देते हों तो बात अलग है।

जो जानकार हैं, जिनके सोर्स हैं, जिनके पास जानकारियां रहतीं हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि दिल्ली व मेट्रो शहरों के नामचीन स्कूलों जिनके बच्चे भारत टाप करते हैं, वे स्कूल वास्तव में कितनी गहराई व चतुराई से शिक्षा के फर्जीवाड़े के दलदल में घुसे हुए हैं। सारा फर्जीवाड़ा बहुत ही सूक्ष्म रूप में, बेहद व्यवस्थित रूप से, बहुत सुरक्षित नेक्सस के रूप में होता है। आप फर्जीवाड़े की एक चिंदी तक साबित नहीं कर सकते, जबकि पूरा तंत्र ही फर्जीवाड़े में जमाने से लिप्त है।

लाखों छात्र हर साल नकल करते हैं, पेपर लीक करवाते हैं, अपनी जगह किसी और को बैठाल कर परीक्षा दिलवाते हैं। लाखों लोग हर साल गेसपेपर रट कर परीक्षाओं में अच्छे नंबर लेकर आते हैं। यूनिवर्सिटीज, डिग्री कालेज खुलेआम नकल करवाते हैं। छात्र बढ़िया नंबर पाते हैं। अभिभावकों को कोई तकलीफ नहीं। अभिभावक अच्छे नंबरों के लिए रुपिया खर्च करने को तैयार। इंटर पास करते ही प्राइवेट इंजीनियरी, मेडिकल, प्रबंधन व बीएड इत्यादि कालेजों में सीटें खरीदने को कमर कसे तैय़ार। जिसका जुगाड़ हुआ वह सरकारी संस्थानों में जुगाड़ लगाता है। जिनकी पहुंच बहुत ऊंची है वे आईआईटी व आईआईएम में भी चौड़े से प्रवेश पाते हैं।

[pullquote align=”right”]भारत में एक भी नौकरशाह ऐसा नहीं होगा जो वास्तव में स्पष्ट व सूक्ष्म ईमानदार हो, संभवतः अपवाद भी नहीं। ईमानदारी केवल नेक्सस के बाहर के लोगों के सामने प्रस्तुत की जानी वाली वस्तु है। श्रेणी, स्तर, भूख का स्तर, तौर-तरीके, आकार-प्रकार इत्यादि के चरित्र, प्रकार इत्यादि भिन्न हो सकते हैं। [/pullquote] डिग्री मिलने के बाद लाखों रुपए खर्च करके नौकरियों के शिकार में जुट जाते हैं। नौकरियों के लिए पूरे सरकारी तंत्र को भ्रष्ट करने को कटिबद्ध। एक जमाना था जब सरकारी छापेखाने का चपरासी के भी घर का हर सदस्य IAS हो जाता था। IAS में अब भी झोल होते हैं लेकिन बेहद सुव्यवस्थित नेक्सस से। चिंदी भी साबित करना नामुमकिन। जैसे चेतना को केवल महसूस किया जा सकता है, साबित नहीं किया जा सकता है। वैसे ही इन नेक्सस को महसूस किया जा सकता है, साबित नहीं। भारतीय सरकारी ढांचों में नेक्सस ही चेतना है।

बारहवीं व स्नातक के बाद शहरों में ककुरमुत्तों की तरह उगी हुई कोचिंगों को क्या कहेंगे? लाखों रुपए साल की फीस, छात्रों के रहने खाने के लिए इलाके के लोगों ने अपने घरों में छोटे-छोटे कमरे निकाल कर लाखों रुपए महीना का स्थाई कारोबार बना रखा है, बाकायदा कोचिंग वालों को कमीशन भी जाता है। व्यवस्थित बाजार। छोटे शहरों के लोग भी चाहते हैं कि उनके घर के आसपास कोई संस्थान खुल जाए ताकि वे भी छात्रों को किराए में कमरे देकर पैसा कमा सकें।

फर्जी डिग्रियां, फर्जी जाति प्रमाणपत्र, फर्जी डोमेसाइल बनवा कर लोगों ने नौकरियां पाईं/पा रहे हैं। मोदीजी की डिग्री से ही परेशानी है। मोदीजी से इस व्यक्तिगत खुन्नस का कारण क्या? उन्होंने आपकी कौन सी भैंस खोल ली थी। किसको लेना देना है शिक्षा व शिक्षा स्तर से। सबका एक ही लक्ष्य, किसी तरह से पैसा कमाना। शिक्षा का लक्ष्य पैसा कमाना। शिक्षा देने का लक्ष्य पैसा कमाना, अय्याशी करना।

मोदीजी व लड़की की जासूसी

ऐसी खबरें सुनने में आतीं रहीं कि मोदीजी ने मुख्यमंत्री रहते हुए किसी लड़की को प्रेम किया, उसकी जासूसी करवाई। इन खबरों में सच्चाई कितनी है मुझे बिलकुल नहीं पता।  मैं इतना जानता हूँ कि अपवाद प्रतिशत छोड़कर अधिकतर नेताओं, नौकरशाहों व व्यापारियों के अपनी पत्नियों से अलग महिलाओं से यौन रिश्ते होते हैं। बहुतों की बाकायदा घोषित/अघोषित रखैंले हैं। जिसकी जितनी औकात व क्षमता है वह उतनी रखता है। रखैलों से बाकायदा संताने हैं। दूसरों से उनकी पत्नियों को छीन कर अपनी रखैलें बनाईं हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि भारत में अपवाद प्रतिशत छोड़कर अधिकतर युवा लड़की पटाते हैं। मारपीट करते हैं। लड़कियों का पीछा करते हैं। पूरे फिल्मी अंदाज में। छेड़खानी करते हैं।

मोदीजी ने यदि किसी लड़की को प्रेम किया भी तो क्या परेशानी, इतनी हाय तौबा क्यों…बहुत ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने अपनी पहली पत्नियों को छोड़ा और नईं नईं पत्नियां बनाईं। न केवल नईं नईं पत्नियां बनाईं बल्कि उनसे हुई संतानों को राजनीति में आगे भी बढ़ाया।

मोदीजी व इवांका

दुनिया के विकसित देशों में यदि इवांका जाएं तो उनको कोई नहीं पूछेगा। जैसे सामान्य पर्यटक आते हैं वही स्तर रहेगा उनका। लेकिन हमारा समाज ऐसा नहीं है। हमारे समाज का ढांचा बिलकुल अलग है। हमारे यहां ज्ञानी की संतान ज्ञानी होती है (ब्राह्मण), बहादुर की संतान बहादुर होती है (क्षत्रिय), अर्थशास्त्री की संतान अर्थशास्त्री होती है (वैश्य) व गुलाम की संतान गुलाम होती है (शूद्र)। 

हमारे यहां बच्चों के माता पिता क्या हैं इसके आधार पर उनका मूल्यांकन होता है। बच्चे की अपनी गुणवत्ता का कोई मायने नहीं होता है। मेरा ही उदाहरण ले लीजिए, मेरे माता पिता की नजरों में मैं हरामखोर हूँ तो मेरा पुत्र आदि भी उनकी नजरों में हरामखोर है।

जब नितीश कुमार जी ने राजद से अलग होकर सरकार बनाई तो हमने रातोंरात लालू प्रसाद जी की संतानों को भारत के महान राजनेताओं के रूप में प्रतिष्ठित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नितीश कुमार द्वारा लागू की गई अनेक सामाजिक हित की नीतियां कूड़े के भाव में। लालू जी क्रांतिकारी नेता रहे तो हमने उनकी संतानों को भी बैठे बिठाए क्रांतिकारी नेताओं के रूप में स्थापित कर दिया। सिर्फ इसलिए क्योंकि वे लालू जी के पुत्र हैं। लालू जी की संतान होना ही पर्याप्त है। दो चार लाइन के कुछ सवाल पूछ लेना, एक दो छोटे-मोटे भाषण ही पर्याप्त से अधिक हैं, भारत के सबसे जागरूक, महान व प्रगतिशील सोच के राजनेता हो पाने के लिए।

लालू जी ही क्यों पूरे भारत में अनेक पार्टियों के राजनेताओं की संतानें अपने माता-पिता की गद्दी संभालती मिल जाएंगीं। न संभाल पाएं गद्दी तब भी विधायक सांसद तो हो ही जाते हैं। पत्नियां हो जातीं हैं, बहुएं, बेटियां माताएं भी विधायक सांसद हो जातीं हैं। और हम लोग उनकी संतानों की शान में कसीदे पढ़ते हुए। बाकायदा तेल-पालिश करते हुए, बटरिंग करते हुए, उनके लिए जीने मरने की कसमें खाते हुए।

भारत के पर्यटन इलाकों में हजारों युवा विदेशी महिला के साथ फोटो खिचाने को लालायित रहता है। अपने घर की महिलाओं के साथ गाली गलौच करेगा लेकिन विदेश महिला के सामने निहायत सभ्य होने का ढोंग करता है।

मोदीजी ने दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी की गोरी-चिट्टी, लंबी-तगड़ी बेटी को यदि ठीक से खाना खिला दिया, ठीक से हाय हेलो कर दी। तो इसमें परेशानी क्यों…. इतनी भी खुन्नस किस बात की।

मित्र की बेटी को अपनी बेटी की तरह प्रेम करना, स्वागत करना गुनाह कब से हो गया। यह तो भारत की पुरानी परंपरा है। यहां तो गांव की बेटी को अपनी बेटी मानने की परंपरा रही है।

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चलते-चलते

यह भी गजब है, बहुतों को गांधीजी से खुन्नस आपको मोदीजी से खुन्नस। फर्क क्या। चरित्र तो एक ही हुआ।

मोदीजी को आपने चुना है। मोदीजी बंपर बहुमत से सरकार बनाकर आए हैं, आप यह नहीं कह सकते कि आपने नहीं बल्कि आपके पड़ोसी न चुना है। सच यही है कि मोदीजी को आपने केवल इसलिए चुना है क्योंकि मोदीजी में आपको अपना अक्श दिखाई दिया। आपको लगा कि अपने जैसा आदमी आएगा तो फुलटू मौज रहेगी, जीवन अय्याशी व लफ्फाजी से सराबोर रहेगा।

फेसबुक, व्हाट्सअप व अन्य सोशल मीडिया में मोदी जी के खिलाफ अभियान चलता हैI लोग कापी पेस्ट फारवर्ड करते हुए खुद को किरांतिकारी, जागरूक व सामाजिक ईमानदार जिम्मेदार, प्रतिबद्ध मान लेते हैंI लेकिन हममें से कितने ऐसे हैं जो अपने भीतर के खोखलेपन व बेहद विकृत व बीमार सैडिज्म को देख पाते हैं, सैडिज्म से दूर हो पाने की बात तो कल्पनातीत है।

सारा मामला खांचों का, कौन किस खांचे में है व सैडिस्टिक मानसिकता का। स्वयं के भीतर के सैडिज्म को देखने व स्वीकारने की हिम्मत होनी चाहिए। दरअसल जब तक आप स्वयं उसी चरित्र के होते हैं जिस चरित्र का विरोध करने का ढोंग कर रहे होते हैं तब तक आप वास्तव में विरोध करते हुए भी विरोध की बजाय पुष्टीकरण ही कर रहे होते हैं।