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  • खानपान, किवदंतियां, खानपान का मनोविज्ञान व हमारा शरीर

    खानपान, किवदंतियां, खानपान का मनोविज्ञान व हमारा शरीर

    दुनिया की कोई जलवायु हो, मानव शरीर के लिए जो आवश्यक तत्व हैं वे समान ही रहते हैं। प्रकृति ने जलवायु के आधार पर अनाज, फल इत्यादि बनाए हैं आदमी को नहीं बनाया। दुनिया का आदमी समान है। तभी आदमी किसी भी महाद्वीप, उपमहाद्वीप, देश, राज्य, जिला, गांव में जाकर रह सकता है। खाने पीने की आदतों व मान्यताओं के कारण एडजस्ट करने में परेशानियां भले ही आ जाएं, प्रकृति की ओर से ऐसा कोई अंतर नहीं है।

    आदमी धरती में यहां वहां भटकता रहा। जहां-जहां उसने अपना आशियाना बनाया वहां-वहां जो सहजता से उपलब्ध रहा उसके अनुरूप उसने अपनी आदतें बना लीं। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ नियम बना लिए। पुराने समय के नियम किवदंतियों व श्रुतियों के ऊपर आधारित थे, वैज्ञानिक दृष्टिकोण व शोधों पर नहीं। भारत में तो किवदंतियां, श्रुतियां व पोथियां आज भी विज्ञान पर पूरी तरह से हावी हैं।

    विज्ञान के विकास के साथ दुनिया के बहुत क्षेत्रों के लोगों ने अपनी परंपराएं बदल लीं, बहुत क्षेत्रों के लोगों ने पुराने तरीकों के खानपान को चिपकाए रखा, कुछ क्षेत्रों के लोगों ने परंपरा, संस्कृति इत्यादि के नाम पर अहंकार के साथ हानिकारक खानपान के तरीकों को जबरदस्ती चिपकाए रखा। अगली पीढ़ियां खामियाजा भुगत रहीं हैं। यह तो समाज व समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, कंडीशनिंग व दृष्टिकोण की बात है।

    शरीर यह नहीं समझता कि प्रोटीन, वसा, अम्ल, क्षार, विटामिन इत्यादि मांस से आया है या दाल से या अंडे से या बादाम से या दूध से या किसी और वस्तु से। शरीर को सिर्फ तत्वों से मतलब है, हम उन तत्वों को उपलब्ध कराने का माध्यम कुछ भी चुनें।

    माता पिता का शरीर कैसा था, क्या अच्छाईयां खराबियां थीं। माता ने गर्भावस्था में क्या खाया पिया। दुग्धपान के समय माता ने क्या खाया पिया। बच्चे को बचपन में कैसा आहार दिया गया। इन बातों पर भी मनुष्य के शरीर का चरित्र निर्धारित होता है। एक ही प्रकार की जलवायु में पूरा जीवन गुजारने वाले लोगों के शरीरों में विभिन्न अनाज, फल व सब्जी का भिन्न असर होता है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि शरीर को कैसे ढाला गया है।

    किवदंतियां भी मनोविज्ञानिक असर डालती हैं:

    बहुत बच्चे पूरा जीवन यह मानकर जीते हैं कि भूत होते हैं, उनको बाकायदा भूत दिखने का अहसास भी होता है। क्योंकि उनके मन में यह बिठा दिया गया है कि भूत होता है इसलिए उनका मस्तिष्क उनके शरीर व मन की चरित्र उसी प्रकार गढ़ लेता है।

    यही खाने के लिए भी लागू होता है। मैं बहुत लोगों को जानता हूँ जो कुछ भी इतर खा लेंगे तो उनको बीमारी सी महसूस होने लगती है। उनके दिमाग में लोगों की कहानियों, किवदंतियों इत्यादि ने बिठा दिया होता है कि यह खाने से ऐसा होता है, वह खाने से वैसा होता है।

    दुनिया के अधिकतर देशों के लोग, दुनिया की कुल जनसंख्या का 85% से भी अधिक का मुख्य भोजन चावल ही है, चाहे जिस भी जलवायु के हों, चावल ही खाते हैं। लेकिन भारत में बड़ी जनसंख्या वाले कई राज्य ऐसे हैं जहां बुखार आने पर, खासी, जुकाम होने पर वैद्य, हकीम, डाक्टर इत्यादि सबसे पहले चावल बंद करते हैं। जो कंडीशनिंग गहरे घुसी है वह निकाले नहीं निकलती है।

    दुनिया की 85% से अधिक जनसंख्या चावल खाती है, रोटी नहीं खाती। दुनिया को छोड़िए, भारत को ही लीजिए बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलांगाना व केरल जैसों राज्यों के लोग क्या करें। चावल न खाएं तो भूखे रहें। लेकिन भारत में ऐसे बहुत लोग हैं जिनके मन में यह बैठा हुआ है कि चावल नुकसान करता है, रात में नहीं खाना चाहिए, पता नहीं क्या-क्या। चूंकि मन में बैठा हुआ है इसलिए चावल देखते ही मन के माध्यम से शरीर में प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है, चावल खाने के बाद बीमार महसूस करने लगता है। ऐसा ही अन्य खाद्य पदार्थों से जुड़ी किवदंतियों से ग्रस्त मन के विकार के कारण होता है।

    मेरा रहन-सहन:

    मैं शाकाहारी हूँ, आप मुझे किसी भी जलवायु में शाकाहार में जो भी खाने योग्य उत्पाद हैं, कुछ भी खाने को दीजिए, मैं सबकुछ खाता हूँ, मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरा शरीर सामान्य रूप से काम करता रहता है। मैं बहुत ही कम बीमार पड़ता हूँ। मैंने व मेरी पत्नी ने दिल्ली में रहते हुए बिना दवाओं के डेगूं तक ठीक कर लिया था। मैं कई-कई वर्ष एक भी दवा नहीं खाता। जबकि शरीर की ऐसी तैसी भी खूब करता हूँ। कभी कभी 36-36 घंटे या 48-48 घंटे सोता ही नहीं हूँ, लगातार काम करता हूँ। कभी-कभी 24-24 घंटे गाड़ी चलाई है वह भी भीड़भाड़ वाले इलाकों में रात दिन दोपहर। शरीर बिलकुल ठीक से काम करता है। कभी बहुत ही अधिक मुलायम गद्दे कभी पथरीली जमीन, कहीं भी सोने को मिल जाए सो लेता हूं। कभी-कभी दिन-दिन भर पैदल चलना तो कभी सप्ताहों एक ही घर में रहना। कभी-कभी खड़े-खड़े ही सो लिया, कभी-कभी बैठे-बैठे ही सो लिया। चर्चा करते हुए बीच में दो-चार मिनट की नींद मार ली और फिर आगे के दस-बारह घंटों के लिए तैयार।

    मतलब यह कि शरीर ऐसा ढला हुआ है कि कभी भी किसी भी परिस्थिति के लिए हर पल तैयार। अभी तक तो ऐसा ही चल रहा है। अब आगे भविष्य में कुछ गड़बड़ हो तो नहीं कह सकता हूँ। आगे गड़बड़ की संभावनाओं को कम करने के लिए। शरीर के लिए आवश्यक तत्वों का अध्ययन करने में भी लगा हूं, ताकि तत्वों की डिफीशियंसी से शाकाहारी उत्पादों के सेवन से बचा जा सके।

    जब से आस्ट्रेलिया आया हूँ तबसे किस सब्जी में कौन सा तत्व होता है, किस फल में कौन सा तत्व होता है, किस मेवे में कौन सा तत्व होता है। इस सबका अध्ययन करता हूँ। फिर उसी हिसाब से शरीर को पोषक तत्व उपलब्ध कराता हूं। अपना तो प्रयास यही है कि शरीर लंबे समय तक सक्रिय बना रहे। चूंकि यहां इस प्रकार की सब्जियां, साग, फल व मेवे इत्यादि सहजता से उपलब्ध हैं, इसलिए शरीर की भी देखभाल करने के प्रयास में भी हूं।

    जब तक माता पिता के संरक्षण में रहता रहा तब तक हमेशा कमजोर रहा, बहुत कमजोर। क्योंकि मेरी माता किवदंतियों पर चलती हैं। नींबू नहीं खाना, टमाटर नहीं खाना, अचार नहीं खाना, मिर्च नहीं खाना। केवल लौकी, तरोई, कद्दू, पालक पानी व नमक में उबाल कर खा लीजिए। शरीर को इसके अलावा किसी तत्व की जरूरत नहीं। हमेशा बीमार रहा, दिन में पंद्रह से बीस तीस बार पेचिस जाने वाली स्थिति महीने में कम से कम पंद्रह दिन तो रहती ही थी। नारफ्लाक्स-टीजेड का एक दस टेबलेट वाला पत्ता मेरी जेब/पर्स/झोले में हमेशा पड़ा ही रहता था।

    जबसे माता पिता के संरक्षण में रहना छोड़ा तबसे शाकाहार में विभिन्न तत्वों वाले उत्पाद खाने शुरू किए। कभी कोई बीमारी नहीं हुई, उल्टे शरीर और दुरुस्त होता चला गया। जेब या पर्स में छोड़िए घर में दवा नहीं मिलेगी। नारफ्लाक्स-टीजेड तो भूल ही चुका हूँ कि क्या चीज होती है।

    सामाजिक कार्यों को करते हुए हजारों गावों में गया। हजारों गांवों में पानी पिया, खाना खाया, सोया। कभी बीमार नहीं हुआ। कभी थकावट महसूस नहीं की। आप मेरे जमीनी साथियों से पूछ सकते हैं, मेरी जीवन शैली के बारे में।

    कहा जाता है कि ठंठा गरम एक साथ नहीं पीना चाहिए। मुझे आप पहले ठंठा फिर गरम, पहले गर्म फिर ठंठा कैसे भी दीजिए कोई फर्क नहीं पड़ता। सर्दियों में फ्रिज का पानी गटकता हूँ, बर्फ चूसता हूँ। दो-दो दिन का फ्रिज में रखा खाना, फ्रिज से निकाल कर बिना गर्म किए ठंठा ही खाता हूँ, कोई फर्क नहीं। कहा जाता है कि मूली रात में नहीं खानी चाहिए, बहुत नुकसान करती है। मैं रात में खूब मूली खाता हूँ, कभी कोई परेशानी नहीं।

    चलते-चलते:

    मुझे आप किसी भी जलवायु वाले इलाके में कुछ भी शाकाहार खाने को दे दीजिए सब पचा जाता है। मेरा तो अभी तक का पूरा जीवन ही गुजरा है यात्राएं, यात्राएं और यात्राएं करते हुए, विभिन्न जलवायुओं के इलाकों में रहते हुए। मैने आजतक कभी भी किसी भी गांव में खाना परोसने वाले से यह नहीं कहा कि मैं यह नहीं खाता या मुझे फलानी चीज नुकसान करती है। मैं शाकाहार में जो भी खाने योग्य वस्तु परोस दिया गया है, वह मैं खा लेता हूँ। हां खाना परोसने वाले व खाना खिलाने वाले का भाव जरूर जानना समझना चाहता हूँ। यदि कोई भार समझ कर खाना खिलाता है, परोसता है तो मैं उसके यहां खाना कम खाता हूँ या संभव हुआ तो कोई बहाना बना कर खाना खाने से मना कर देता हूँ, भूखे रहना पसंद करता हूँ। मेरा मानना है कि भोजन भले ही बिलकुल साधारण हो लेकिन प्रेम से बनाया व खिलाया जाना चाहिए।


  • क्या इस माहौल के लिए सिर्फ़ संघवादी मानसिकता से जुड़े लोग ही दोषी हैं?

    क्या इस माहौल के लिए सिर्फ़ संघवादी मानसिकता से जुड़े लोग ही दोषी हैं?

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    इन दिनों जो माहौल चल रहा है, उसे लेकर देश का एक बड़ा वर्ग आरएसएस और उससे जुड़े लोगों को दोषी मानता है। यह स्वर छुपा हुआ नहीं है। यह बहुत मुखर स्वर है और ख़ासकर वामपंथी झुकाव वाले प्रगतिशील खेमे के बुद्धजीवियों में। लेकिन क्या सिर्फ़ संघवादी मानसिकता के लोग ही इस वातावरण के लिए दोषी हैं?

    मैं इतिहास का एक सामान्य सा विद्यार्थी हूं। मैं जब इतिहास पढ़ता हूं तो देखता हूं कि गांधी-नेहरू-पटेल-सुभाष और बहुतेरे बुद्धिजीवी भविष्यवाणी करते हैं कि अंगरेज़ भारत से दफ़ा हो जाए तो हम अमन-चैन से रहेंगे और सांप्रदायिकता सदा के लिए विदा हो जाएगी। ब्रिटिश उपनिवेशवाद की उंगली थामकर सांप्रदायिकता भी भारत की धरती को छोड़ देगी। जातिवाद से तो हम निबट ही लेंगे। यह तो कोई समस्या ही नहीं।

    सच बात तो ये है कि अगर किसी खेत में खरपतवार बुरी तरह उग आया हो तो उसके लिए आप खरपतवार को कभी दोष नहीं दे सकते। अगर कोई ऐसा करेगा तो लोग उसे मूर्ख ही कहेंगे। खेत किसान के पास है और फ़सल को नष्ट करके अगर खरपतवार लहलहाने लगा है तो किसान दोषी है। वह इतने दिन तक कर क्या रहा था! देश में अगर सांप्रदायिक माहौल बना और यह विष बेल परवान चढ़ी तो अब तक मुख्यधारा की सबसे बड़ी और सत्तासीन पार्टी कांग्रेस और ताकतवर दल के रूप में रहे कम्युनिस्ट और समाजवादी कर क्या रहे थे? उन्होंने ऐसा माहौल बनने ही क्यों दिया? अगर आप सत्ता में हों और आप की मति नहीं मारी गई हो तो आप समाज और देश को ठीक से आगे ले जाने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या ऐसा किया गया?

    इतिहास के सफ़ेद पन्नों पर काले अक्षर नाच-नाच कर कह रहे हैं कि 1947 से पहले कांग्रेस ने दो बड़ी रणनीतिक भूलें की थीं। गांधी-नेहरू और पटेल इसके लिए जिम्मेदार थे। इन सबने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली स्वीकार की थी।

    [content_container max_width=’500′ align=’center’]आज कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और समाजवादी दल और इनकी मानसिकता से जुड़े पत्रकार-लेखक और विचारक वंदेमातरम्, रामराज्य, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म और सनातन धर्म के प्रतीकों का नाम भर सुनकर नौ-नौ ताल उछलते हैं। लेकिन मैं बड़ी विनम्रता से जानना चाहता हूं कि वंदेमातरम्, रामराज्य, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म और सनातन धर्म के प्रतीकों को देश की राजनीतिक संस्कृति में सबसे पहले लाया कौन था? सत्यमेव जयते क्या आरएसएस लेकर अाया था? सुप्रीम कोर्ट का आदर्शन वाक्य यतोधर्मस्ततो जय: कौन लेकर आया था? उस समय विधि मंत्री तो महान् क्रांतिकारी सुधारक और संविधानवेत्ता डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। हिन्दू प्रतीक चिह्नों को भारतीय जीवन दर्शन बनाने वाले लोग तो खुद कांग्रेस के थे और दोष मंढ़ा जा रहा है अकेले आरएसएस पर। अरे भाई, आरएसएस ने तो ये चीज़ें कांग्रेस के कबाड़ खाने से निकालकर अपने खाली आलों में सजाई हैं, क्योंकि उनके पास अपना कुछ था नहीं। वे भारत को परम वैभव पर पहुचाने तो चाहते थे, लेकिन राह नहीं थी। राह कांग्रेस के पास भी नहीं थी। लेकिन वे हिन्दू धर्म के पुरातत्व युग में जाकर गीता की कसम खाने से लेकर न जाने कितनी चीज़ें उठाकर लाए। [/content_container]

    कांग्रेस एक तरफ तो सनातन संस्कृति से जुड़े लोगों को अपना वोट बैंक बनाने के लिए इन प्रतीकों को गढ़ रही थी और दूसरी तरफ़ मुस्लिम अल्पसंख्यकवाद के प्रेत को पाल-पोस रही थी। अब आप दो-दो प्रेतों की सेवा करें और आप 70 साल तक बचे रहें तो और आपको क्या चाहिए? अरे आपको तो बहुत पहले नष्ट हो जाना चाहिए था।

    अभी आरक्षण पर लोग बहुत हो हल्ला-करते हैं, लेकिन सच तो ये है कि ब्रिटिश सरकार भारत में मुसलमानों की तरह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के लिए भी अलग निर्वाचन प्रणाली ला रही थी। लेकिन गांधीजी ने हिन्दू समाज की एकता के नाम पर ब्रिटिश योजना के खिलाफ अनशन किया और उन जातियों को आरक्षण का वादा करके लड़ाई जीत ली। आरएसएस आज इसी विचार को लेकर तो प्रचंड हो रहा है। तो यह मूल विचार है किसका? आरएसएस का कि कांग्रेस का? कि गांधीवादियों का?

    हमारा देश आज़ाद हुआ तो कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को अपनाने की बात तो की, लेकिन उसके मूल में हिन्दुत्ववादी पुरुत्थानवाद के बीज ही थे। अब यह बीज वटवृक्ष बना है तो ज़मीन किसी और ने छीन ली है। आज़ादी के बाद स्वतंत्रता दिवस के सरकारी समारोहों में शंखनाद क्या आरएसएस लेकर आया था? हिन्दू पूजा पद्धति से जुड़े मंत्र क्या हिन्दू महासभा पढ़ रही थी? भारत का नाम भारत कांग्रेस के लोगों ने रखा था तो क्या इसे संघ के लोगाें ने सुझाया था? भारत शब्द महाभारत से लिया गया था। क्या यह भारत माता से लिया गया शब्द नहीं था? और क्या यह कांग्रेस के नेताओं के मस्तिष्क की उपज नहीं था? https://bloodbornecertification.com/ generic provigil cost अगर यह उस दिन सही था तो आज भारत माता सांप्रदायिक कैसे हो गया और अगर आज सांप्रदायिक है तो उस दिन कांग्रेस कैसे धर्मनिरपेक्ष थी?

    मुंडकोपनिषद से लिया गया राष्ट्रीय घोष “सत्यमेव जयते” क्या नागपुर से कांग्रेस मुख्यालय को या संविधानसभा के प्रमुख को भेजा गया था? हिन्दू परंपरा का पवित्र पक्षी मोर देश का राष्ट्रीय पक्षी कैसे बना? भाजपा का प्रेम तो ऊंट और गधे के प्रति पिछले कुछ समय में दिखाई दिया है, जो कि पूरी तरह मुसलिम संस्कृति से जुड़े पशु हैं। हिन्दू परंपरा तो ऊंट और गधे का विकराल उपहास ही करती है।

    गाे-रक्षा का मुद्दा तो भाजपा पिछले कुछ वर्ष से लेकर आई है, लेकिन संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में इसे क्या आरएसएस ने शामिल करवाया था? यह काम कांग्रेस के नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू आदि ने ही किया था। गोवध पर पाबंदी लगाना भारतीय संविधान के उद्देश्यों में एक बताया गया है। इसमें बहुत सारे नीतिनिर्देशक तत्व हैं, लेकिन एक गाय ही बाकी उद्देश्यों को भूखी मरती चर गई।

    जैन एक अलग धर्म था। सिख एक अलग पंथ था। लेकिन इन्हें हिन्दू धर्म का ही अंग बताने वाला संविधान किसने रचा था? क्या संघ ने? संघ तो उसमें पावर में था ही नहीं। यह सब कांग्रेस और उसके छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नेता ही तो कर रहे थे।

    मुझे लगता है, कांग्रेसजनों, समाजवादियों, वामपंथियों, लोहियावादियों आदि आदि का यह कहना कि देश में सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा और संघ परिवार के लोग ही माहौल बिगाड़ रहे हैं, तर्कसंगत नहीं है। दरअसल धर्मांधता और सांप्रदायिकता वाले इस राजनीतिक खेल के नियम बनाए तो किसी और ने पहले अपने फायदे के लिए था, लेकिन समय आने पर इसे किसी और ने हथिया लिया। यह ऐसा ही है कि आप अपनी सियासी कमज़र्फ़ी के चलते पहले तो बंदूकों दूसरी की तरफ़ तान दें, लेकिन जैसे ही किसी दूसरे के हाथ में यह चीज़ आ जाए तो यह ग़लत हो जाए। यही मूलभूत चूक है।

    इतिहास की ग़लतियों को अगर आप आज खुले तौर पर स्वीकार नहीं करेंगे तो वही होगा, जो हो रहा है। कोई भी देश अतीत के मूल्यों को हृदय में तो धारण कर सकता है, लेकिन उन्हें पहन-ओढ़कर एक आधुनिक भावबोध वाला राष्ट़्र नहीं बनाया जा सकता।

    आज हमारे देश को हमारे महान नेताओं ने जिस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, वहां उनकी राजनीति सत्ता प्राप्ति तक सीमित है और देश और देश के लोग जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनमें से किसी एक का भी हल उनके पास नहीं है। वे एक दूसरे को ग़ाली देने, देशद्रोही और नाकाम घोषित करने के प्रपंच को कामयाब बनाकर चुनाव जीतने तक का वास्ता रखते हैं।

    इस देश का इंटेलिजेंटसिया इन नेताओं से भी अधिक धूर्त और मक्कार है। वह सत्ता के गलियारों का मज़ा जहां और जितनी आसानी से ले सकता है, वह उसके साथ रहता है। उसे इस देश के वास्तविक सरोकारों से कोई लेना देना नहीं हैं। उसके शौक महंगी शराबें, लग्जरी कारें और लैविश लाइफस्टाइल है। आम भारत किस गांव में, किसी गली पर, किस कोने में, किसी आदिवासी अंधेरे में सुबक रहा है, उसे कुछ पता नहीं है। वह अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी गर्व से अपना बाप कह सकता है और गर्व से किसी को भी देशद्रोही ठहरा सकता है।

    भारत के नए हालात बता रहे हैं कि हम एक सुइसाइड स्क्वैड के शिकंजे में हैं और हमें एक नागरिक के तौर पर सदा सजग और चैतन्य रहने की आवश्यकता है। जो आदमी सत्ता के लालच में खु़द ज़हरीली दिल्ली को अपनाने चला है, वह आपके लिए कोई शस्य श्यामला धरती का टुकड़ा ढूंढ़कर लाएगा, अगर आप ऐसा भ्रम पाले हैं तो इस पृथिवी पर आपसे मूर्ख कोई नहीं है।

    हमें अपने देश के हितों को देखना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति, किसी दल, किसी संगठन, किसी विचारधारा, किसी धर्म विशेष या किसी रंग विशेष के हितों और एजेंडे को। इनका शिकार होने का मतलब है आप देश के हितों को नहीं समझ पा रहे हैं। देश का हित इसमें है कि आप सदा सैनिक की तरह चौकन्ने रहें। ग़लत को ग़लत और सही को सही कहें।

    उपनिषद में कहा गया है कि विष को सोने के घड़े में ही रखा जाता है। इसलिए आप विष को भी समझें और घड़े को भी ठीक से देख लें। आज एक नहीं, कई घड़े हैं और उनमें भांति-भांति और इंटरनेशनल ब्रैंड के विष भरे हुए हैं। वे इतने सम्मोहक हैं कि हम स्वयं ही विषपान को उत्कंठित हो जाते हैं और अपने आपको रोक ही नहीं पाते।

    आप समझ गए न : सोने के घड़े में ज़हर!

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    Credits: Tribhuvan’s facebook

  • जन्मजात हृदय रोग से ग्रसित अत्यंत निर्धन एवं मज़दूर परिवार की 6 वर्षीय बच्ची रोहिणी का जीवन बचाने का अभिनव प्रयास –डा० शुजाअत हैदर जाफरी

    जन्मजात हृदय रोग से ग्रसित अत्यंत निर्धन एवं मज़दूर परिवार की 6 वर्षीय बच्ची रोहिणी का जीवन बचाने का अभिनव प्रयास –डा० शुजाअत हैदर जाफरी

    डा. शुजाअत हैदर जाफरी

    उ.प्र. राज्य के जनपद झाँसी के ब्लॉक बड़ागाँव की आर बी एस के टीम द्वारा ग्राम लकारा के आंगनवाड़ी केन्द्र में स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान चिन्हित जन्मजात हृदय रोग से ग्रसित अत्यंत निर्धन एवं मज़दूर परिवार की 6 वर्षीय बच्ची रोहिणी की सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई शल्य चिकित्सा और शल्य चिकित्सा सम्पन्न होने तक और उसके बाद की आशा, निराशा और हर्ष की लहेर का शाब्दिक वर्णन ग्रसित परिवार के मुखिया की ज़बानी ।

    चंद्रशेखर अहिरवार जो की अपने 13 सदस्यों के परिवार का मुखिया है जो की अपने और अपने पूरे परिवार का भरण पोषण 6 बीघा ऊसर ज़मीन और दैनिक मज़दूर के रूप में मिलने वाली दैनिक मज़दूरी 300 से करता है। परिवार में उसके अलावा उसके बुजुर्ग माता पिता दो भाई उनकी पत्निया और उनके दो बच्चे तथा स्वयं की पत्नी और तीन बच्चे है। संयुक्त परिवार हँसी खुशी एक साथ सुख दुख का भागी है और सब एकदूसरे का हर काम में हाथ बंटाते है। चंद्रशेखर मज़दूरी करता है और उसके दोनों भाई खेती करते है।

    चंद्रशेखर की शादी के बाद परिवार में लक्ष्मी के रूप में सलोनी ने जन्म लिया और परिवार खुशी के महौल में डूब गया । समय का चक्र घूमता रहा। पुत्र की चाहत में एक बार फ़िर चंद्रशेखर की पत्नी ने रोहिणी को जन्म दिया । परिवार के सभी सदस्य पुत्र की कामना कर रहे थे सो रोहिणी के आ जाने पर सबको ज्यादा खुशी नहीँ हुई । अभी एक सप्ताह ही बीता था के रोहिणी के लगातार रोते रहने और साँस तेज़ तेज़ लेने के कारण गाँव के ही कुछ लोगों ने रोहिणी को डाक्टर को दिखाने की सलाह दी।

    डाक्टर को दिखाने पर पता चला के रोहिणी तो जन्मजात ह्र्दय रोग से ग्रसित है और उसके दिल में छेद है तथा धमनियों में सिकुड़न है। चन्द्रशेखर और उसकी पत्नी को जब यह पता चला तो मानो उनके पैर के नीचे से ज़मीन ही खिसक गयी हो । दोनों पति पत्नी ने निर्णय लिया के रोहिणी को झाँसी के मेडिकल कालेज में दिखायेंगे । अगले ही दिन दोनों रोहिणी को लेकर झाँसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कालेज एवं हॉस्पिटल लेकर गये और ह्रदय रोग विभाग में दिखाया जहाँ डाक्टर ने उसको देखकर इको की जाँच कराने का बोला । जाँच में वही समस्या सामने आयी जो क्लिनिक के डाक्टर ने होने का अंदेशा बताया था। अब स्पष्ट हो चुका था के रोहिणी के दिल में छेद है और उसका इलाज ऑपरेशन ही है । डाक्टर ने बताया के ऑपरेशन में दो से तीन लाख का खर्च आयेगा और उसके बाद भी रोहिणी के शत प्रतिशत स्वस्थ होने की कोई गारण्टी नहीँ है। मायूस माता पिता उस समय दवा लेकर घर को वापस आ गये।

    Rohini

    मज़दूर चंद्रशेखर दिन रात मेहनत करके जो कमाता था वोह घर के लिये ही नहीँ पूरा पड़ता था ऐसे में रोहिणी की इस जानलेवा बीमारी ने परिवार का चैन और सुकून ही छीन लिया था। रोहिणी की माँ को तो बस एक ही चिंता लगी रहती थी की उसकी बच्ची बचेगी भी या नहीँ और अगर बच भी गयी तो उसका जीवन समान्य होगा या नहीँ, उसके भविष्य की चिन्ता में दिन रात घुल रही थी।  तेज़ धूप में काम करने के बाद साँझ ढले जब चंद्रशेखर घर को आता है तो दिन भर की थकी हारी उसकी पत्नी उसको खाना देती है । परिवार में अन्य लोग समय समय पर दोनों को सांत्वना देते रहते। समय गुज़रते देर नहीँ लगती , रोहिणी अब धीरे धीरे बड़ी हो रही थी उसका इलाज भी लगातार चल रहा था। हर महीने हज़ार बारह सौ रुपये रोहिणी की दवा और जाँच में खर्च हो रहे थे किन्तु आशा की कोई भी किरण नज़र नहीँ आ रही थी।

    एक दिन जब चंद्रशेखर रोहिणी को लेकर मेडिकल कालेज झाँसी गया तो डाक्टर जो की उसके लगातार वहाँ इलाज कराने के कारण उसको पहचान गया था। उसने चंद्रशेखर को सलाह दी के जयपुर में वोह अपनी बेटी का ऑपरेशन करा सकता है जहा उसको यह सुविधा निःशुल्क रहेगी।  निराशा में आशा की एक किरण ने कई दिलों में जान डाल दी । माता पिता की खुशी का ठिकाना नहीँ था के उनकी बच्ची अब ठीक हो सकती है ।

    किन्तु यह क्या? गाँव के बड़े बुजुर्गो ने तो उल्टी ही राय दे डाली के जयपुर एक अनजान शहर है वहाँ तुम अजनबी होगे और वहाँ कैसे रहोगे । सब ऐसे ही कहते है इतना बड़ा ऑपरेशन कोई निःशुल्क कैसे कर सकता है। और इस प्रकार जागरूकता के आभाव में रोहिणी का आगे का इलाज फ़िर से दवा और जाँच पर ही सीमित होकर रह गया था। 

    समय बहुत तेजी से पंख लगाकर उड़ रहा था । रोहिणी अब पाँच साल की हो चुकी थी और पाँच साल में रोहिणी के इलाज पर चार से पाँच लाख रुपय खर्च हो चुके थे किन्तु स्तिथि ज्यों की त्यों बनी थी । ऑपरेशन के खर्च से ज़्यदा दवा और जाँच में खर्च हो चुका था मगर एकमुश्त पैसा ना होने की वजह से रोहिणी का ऑपरेशन नहीँ हो पा रहा था ।

    माता पिता अपनी बड़ी बेटी सलोनी और गाँव के अन्य बच्चो को जब खेलता हुआ देखते और रोहिणी को एक जगह बैठा हुआ देखते थे तो उनकी आँखो में आँसू आ जाते थे के वोह अपने आँखो के तारे के लिये इतने पैसे भी नहीँ जुटा पा रहे के उसे एक नयी ज़िन्दगी दे सके । 
    सबकुछ ईश्वर के हाथ में छोड़ कर दोनों माता पिता किसी चमत्कार के इन्तेज़ार में मन्नत और मुराद माँगने लगे। 

    एक दिन उनके गाँव में आंगनवाड़ी केन्द्र पर राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की समर्पित मोबाइल हेल्थ टीम बच्चो का स्वास्थ्य परीक्षण करने पहुँची जहा चंद्रशेखर और उसकी पत्नी भी रोहिणी को लेकर दिखाने आये। टीम के लीडर डा. अजय गुप्ता द्वारा तथा डा . स्वप्ना श्रीवास्तव द्वारा दोनों को इस प्रकार की बीमारी से ग्रसित बच्चो को मिलने वाली सरकारी सहायता के बारे में अवगत कराया गया और बच्ची रोहिणी का ऑपरेशन कराने की सलाह दी।

    डा. अजय गुप्ता ने जन्मजात रोग से ग्रसित बच्चे की जानकारी जिला स्तर पर तैनात डीईआईसी मेनेजर डा. रामबाबू को दी जिन्होने जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री ऋषिराज से इस विषय में चर्चा की । एक रूपरेखा तैयार कर चिन्हित बच्चों के साथ जनपद से एक टीम जिसमे डॉ रामबाबू और डॉ हैदर के साथ लखनऊ के केजी एम यू अस्पताल में रोहिणी के निःशुल्क शल्य चिकित्सा के लिए ऐसे ही 3 बच्चों के साथ भेजा गया। 

    आर बी एस के टीम बड़ागाँव के लगातार प्रयासों द्वारा रोहिणी की शुरुआती जांचे झाँसी के मेडिकल कालेज में कई चरणों में पूरी हुई जहा डाक्टर ऋषि राज , डाक्टर ब्र्षालि , श्रीमती टीना शर्मा एवं श्रीमती स्मिता एवं श्री शिव कुमार पटेल द्वारा रोहिणी को सम्बन्धित विभाग में लाया जाता रहा और नियमित जांचे करवाई गयी। तत्पश्चात रोहिणी को शल्य चिकित्सा हेतु लखनऊ संदर्भित किया गया।

    लखनऊ पहुँचने पर के जी एम यू के लारी कार्डियोलोजी के सी टी वी एस विभाग के डा . विकास ने विभागाध्यक्ष डा . शिखर टंडन के आदेश पर रोहिणी को भर्ती कर लिया। 18 दिन भर्ती रहने के बाद शल्य चिकित्सा हेतु रक्त की आवश्यकता पड़ी और 5 यूनिट रक्त एक अनजान शहर में उपलब्ध कराना चंद्रशेखर के लिये एक बड़ा यक्ष प्रश्न था। 

    डा. शुजाअत हैदर द्वारा जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री ऋषिराज को फोन के माध्यम से रक्त की आवश्यकता के विषय में बताया गया, आनन फानन में राज्य स्तर जिला स्तर पर फोन लगाये गए किन्तु कहीं कोई उम्मीद न दिखाई देने से डोनर ग्रुप से सीधे बात का सोचा गया जिला कार्यक्रम प्रबंधक द्वारा होप ब्लड ग्रुप व्हाट्सएप्प ग्रुप में जीशान भाई से बात की गयी जिनके माध्यम से लखनऊ में ई राजीव गोयल जी से बात की गयी डॉ हैदर द्वारा भी ब्लड डोनेशन ग्रुप्स से बातचीत की गयी। शाम होते होते 5 यूनिट ब्लड का इंतज़ाम रक्त दूतों द्वारा करा दिया गया था जिसमें से एक यूनिट रक्त स्वयं चंद्रशेखर ने दिया। 

    इस प्रकार रोहिणी की सफ़ल हृदय शल्य चिकित्सा सम्पन्न हुई और आज रोहिणी अन्य सामान्य बच्चो की तरह जीवन बिता रही है । कहते हैं “हिम्मत मर्दां मदद ए खुदा” यह झाँसी टीम को हर पल महसूस हुआ जहाँ भी रुकावटे आई ऐसा महसूस हुआ ऊपर वाला खुद आकर मार्गदर्शन और मदद के लिए खड़ा है।

    भारत सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना से रोहिणी के जीवन में तो आशा की किरण जगी ही साथ ही साथ माता पिता के दिलों पर बच्ची के सही इलाज ना करा पाने का जो भार था वह ख़त्म हो गया । और हम आर बी एस के वाले ऐसे बच्चों को चिन्हित करने के बावजूद मन मसोस कर रह जाते थे कि 3 साल से हम सिर्फ आश्वासन दे पा रहे थे वो बोझ भी सर से हल्का हुआ।

    आज हम आर बी एस के बड़ागाँव गर्व महसूस करते है के ईश्वर ने हमें दुनिया के उन श्रेष्ठ लोगों में से चुना है जिनसे ईश्वर अपना काम लेता है।
    धन्यवाद ईश्वर।

    Dr Shujaat Haider Jafari with the family of baby Rohini

    डा. शुजाअत हैदर जाफरी
    फिजियोथिरैपिस्ट
    आरबीएसके बड़ागाँव झाँसी

  • सीखने की कला के बिना स्कूली शिक्षा के दुष्परिणाम

    सीखने की कला के बिना स्कूली शिक्षा के दुष्परिणाम

    Sachin Raj Singh Chauhan[divider style=’right’]

    विश्व विकास रिपोर्ट 2018 के अनुसार स्कूलिंग विदाउट लर्निंग ने न केवल विकास के अवसरों को बर्बाद कर दिया है बल्कि वैश्विक स्तर पर बच्चों के प्रति घोर अन्याय किया है। इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलने लगे है। अकेले ग्रामीण भारत में विद्यालयों के तीसरी कक्षा के 75 प्रतिशत छात्रों को दो अंको के घटाव नही आते। 12 देशों की सूची में मलावी के बाद भारत दुसरे रैंक पर है जहां कक्षा 2 के बच्चों को संक्षिप्त पाठ का एक शब्द पढ़ने में भी समस्या होती है। इस रिपोर्ट में लर्निंग क्राइसिस पर जोर देते हुए चेताया गया है कि इसी कारण निम्न और मध्यम आय बाले देशो के युवाओं को निम्न मजदूरी पर काम करना पड़ता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था जितनी अधिक लर्निंग बेस्ड होगी हम उतना ही बेहतर जीवन की तरफ अग्रसर होंगे।

    विडम्बना है कि जिस देश में 38 प्रतिशत बच्चें सही पोषण के अभाव में जीने को विवश है,19 करोड़ कुपोषित लोग है (यू न के एक रिपोर्ट के अनुसार) और जहां बुनयादी जरूरते भी पूरी न होती हो वहां हम कहते है कि विकास हो रहा है, देश एक बड़ी आर्थिक ताकत हो गया है, दुनिया नत-मस्तक होती है और वगैरा-वगैरा सारा बेमानी प्रतीत होता है। विकास का मतलब या तो समझ नही आता है इनको या फिर समझना नही चाहते। आज देश उस मोड़ पर आ गया है जहां परिवार के दो सदस्य करोड़ों रुपये कमाते है , संसाधनों का दोहन करते है और जिंदगी को पूरी शान-शौकत से गुजारते है जब कि इसके इतर परिवार के बाकी सभी सदस्य दर- दर की ठोकरे खाते है, उनकी वुनयादी जरूरते भी पूरी नही ही पाती। अकेले दिल्ली – एनसीआर में कई लाख लोग पिछले 1 साल में वेरोजगार हुए है जिसके चलते कई परिवारों की जिंदगी तवाह हो गयी। मुझे ये समझ नही आता कि राफ़ेल डील, 1.10 लाख करोड़ का बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट अभी जरूरी था या फिर करोड़ो लोगों की बुनयादी जरूरते पूरी करना।

  • धरती और इंसान

    धरती और इंसान

    Nishant Rana[divider style=’right’]

    जला देना हर एक उस पेड़ को
    जो तुम्हारे कहने से मनचाहा फल न दे।

    भाप बना कर उड़ा देना हर वो नदी
    जो तुम्हारे कहने पर दिशा न बदले।

    भून देना हर एक उस पंछी को , पशु को 
    जो तुम्हारे तलुए न चाटे,
    जो दुम हिला के हाजिर न हो तुम्हारी
    एक आवाज पर।

    जहर घोल देना उस हर हवा में जो तुम कहो
    पूरब और पच्छिम को चलें।

    कतरा कतरा कर देना किताब के
    हर उस पन्ने का
    जो हर्फ़ दर हर्फ़ वो न कहती हो
    जो तुम सुनना चाहों।

    तलवार, कट्टे , लाठी, छुरी
    सब हथियारों से लैस होकर चलते रहो।
    और मारते रहो हर एक उस आदमी को
    जो जरा सा भी असहमत हो तुमसे।

    तब तक मत रुकना जब तक धरती से
    आखिरी आदमी खत्म न हो जाए,
    हवस मिट न जाए अपनी हर बात
    सही साबित करने की।

    धरती को जरूरत भी नहीं इंसानों की।

     

  • Video: आदि का स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलना व उल्टा चढ़ना

    Video: आदि का स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलना व उल्टा चढ़ना

    लगभग साढ़े सात महीने की आयु में पहली बार दो कदम अपने आप चले। आठवें महीने में दोनों हाथों की मेरी उंगलियां पकड़ कर चलने लगे। दसवें महीने में सिर्फ एक उंगली पकड़ कर चलने लगे। एक-एक दिन में कई-कई किलोमीटर चल जाते। 


    आदि बिना किसी ट्रेनिंग के एक झटके में सीढ़ियां चढ़ना शुरू किए, एक झटके में ही एक दिन सीढ़ियां उतरना भी शुरू किए। यूं लगता है आदि अपने मन के अंदर आब्जर्व करते हुए सीखते रहते हैं, आब्जर्व करते हुए एक दिन जब उनको विश्वास हो जाता है कि वे ऐसा कर सकते हैं तब वे एक झटके में कर जाते हैं या कर डालने का प्रयास करते हैं।


    आदि कुछ दिन बाद साढ़े पंद्रह महीने के होगें। अब आदि पार्क में आदि स्लाइडर में फिसलने के लिए लोहे की ऊंचे-स्टेप वाली सीढ़ियां अपने आप चढ़ते हैं, फिर स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलते हैं। फिर स्लाइडर में फिसलन की ओर से ऊपर चढ़ने का प्रयास करते हैं। थकने पर पानी पीने जाते हैं। 


    इन सभी गतिविधियों को इस वीडियो में देखा जा सकता है। 

  • Video: जोखिम उठाने वाला “आदि”

    Video: जोखिम उठाने वाला “आदि”

    आदि को ज्यों ही यह अनुमान लग जाता है कि वह ऐसा कर सकते हैं, तब वे बिना डरे वैसा कर गुजरने की इच्छाशक्ति रखते हैं। पार्क में खेलने आते समय उन्होंने कई बार देखा कि सात-आठ वर्ष के बच्चे लकड़ी के इन लाग्स के ऊपर संतुलन बनाते हुए चलते हैं। आदि की इच्छा रहती रही कि वे भी ऐसा करें लेकिन समझ गए कि अभी वे ऐसा नहीं कर सकते हैं। बहुत दिनों से मन ही मन में गुणा-गणित लगा रहे होंगे, चुपचाप आब्जर्व कर रहे होंगे, अपनी शारीरिक क्षमता को नाप-तौल रहे होंगे। दो दिन पहले उनको लगा कि वे ऐसा कर सकते हैं इसलिए जोखिम लिया जा सकता है। वीडियो को देखकर स्वयं ही आनंद लीजिए, आदि की एक नई गतिविधि का, जोखिम लेने के साहस का।

     

  • राहुल गाँधी बनाम उन पर लगाए जाने वाला वंशवाद का इल्ज़ाम !

    राहुल गाँधी बनाम उन पर लगाए जाने वाला वंशवाद का इल्ज़ाम !

    Razia S. Ruhi[divider style=’right’]

    डॉक्टर का बेटा एक अच्छा डॉक्टर बन सकता है, इंजीनियर का बेटा एक काबिल इंजीनियर बन सकता है, चिरौंजी लाल का बेटा उसकी किराने की दुकान संभाल सकता है, ऋषि कपूर का बेटा रॉक स्टार बन सकता है, और इस सब में कहीं किसी का वंशवाद आड़े नहीं आता बल्कि इन क्षेत्रों में तरक्की ये अपने हुनर की बदौलत करते हैं। सवाल यह उठाए जा सकते है हमने परम्परा में जो व्यवस्था बना रखी है उसमें कितने लोगों को अपना पहला मौका या हुनर चमकाने का समय ही नहीं मिलता.  लेकिन इस तर्क से भी जिस व्यक्ति को मौका मिला है वह गलत नहीं हो जाता है.

    इन सब के बाद भी अकेले राहुल गांधी पर वंशवाद का इल्ज़ाम क्यों?

    राहुल के ऊपर कोई हत्या बलात्कार या गुंडा एक्ट का मुकदमा नही है, राहुल ने न लड़की छेड़ी है, न किसी लड़की की जासूसी करवाई है,  राहुल बाकी के कई नेताओं की तरह बेहूदी असभ्य भाषा भी नहीं बोलते.. राहुल बाकी के कई नेताओं की तरह साम्प्रदायिक नफ़रत के बीज बो कर वोट नहीं मांगते.. जबकि इन सब तरीको से राजनीति में चमकना आज के भारत में सबसे आसान काम बना हुआ है, राहुल का इस बात के लिए तो स्वागत होना ही चाहिए की वह राजनीति के सकारात्मक पहलू को स्वीकार न किए जाने के बावजूद एक ऐसे पौधे के रूप में संघर्ष करके उभरा है जो बेहतर आज की बात करता है.  इन सब पर भी राहुल गांधी भले ही सर्वोत्तम विकल्प न हों लेकिन जब तक राहुल ऐसी कोई गलती नहीं करते तब तक वो इन बाकी के कई नेताओं से कहीं बेहतर विकल्प जरूर हैं।

    मुझे उनके वंशवाद से कोई समस्या नहीं है, मुझे उनकी उनकी निजी जिंदगी में झाँकने का कोई हक़ नहीं है… मुझे सिर्फ़ उनके सार्वजनिक व्यवहार और राजनीतिक नज़रिए से मतलब है, उनका आंकलन इसी आधार पर होगा।। आप राहुल गांधी के अंधविरोधी हो सकते हैं, और अंधविरोधियों को विरोध और आलोचना का बहाना चाहिये बस.. तो वंशवाद एक अच्छा बहाना है। हो सकता है राहुल गाँधी मौका मिले तो एक अच्छे प्रधानमंत्री भी साबित हो । जो तमीज़, अदब, सभ्य ब्यवहार और सुशीलता दिखती है उनमें उससे इतना तो तय है कि उनके भीतर तुग़लक़ नहीं जागेगा। जो पार्टी और ज्ञानी पॉलिसी मेकर्स कहेंगे उनके अनुसार फैसला लेंगे । होने को तो आनंद शर्मा, मनीष तिवारी, ग़ुलाम नबी आज़ाद ज्यादा अनुभवी और विद्ववान राजनीतिज्ञ हैं, और भी कई हैं। पर राहुल गाँधी के नाम पर ही कांग्रेस फ़िलहाल जी सकती है, और शायद यही डर ही कारण भी है विरोधी पार्टियों द्वारा उनके अंधविरोध का.. हो सकता है सोनिया गाँधी की तरह ही राहुल भी किसी और को प्रधानमंत्री बनने को बोल सकते हैं, कम से कम लोलुपता तो नहीं दिखाई देती उनमें..  अंतर्राष्ट्रीय और कूटनीतिक हलकों में ब्लू ब्लड कांसेप्ट अभी भी जम कर चलता है। वह एक्सेप्टेबिलिटी भी इंडिया के फेवर में ही होगी.. लेकिन मेरा कहना है कि कांग्रेस का अध्यक्ष चुनने का हक़ कांग्रेस के सदस्यों को ही है, वो चाहें तो राहुल गांधी को चुनौती दे सकते हैं, जनता को यदि राहुल अपने नेता के तौर पर पसंद न हों तो वो उन्हें आम चुनाव में हरा सकती है, लेकिन यदि तमाम आपराधिक मुकदमों के बावजूद राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जा सकते है बाकी लोगों को हाशिये पर धकेला जा सकता है, बाहर निकाला जा सकता है तब यह नैतिक अधिकार नहीं ही बनता है कि वे राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर चुने जाने की आलोचना करें.. जिम्मेदार पद पर रहते हुए तमाम अलोकतांत्रिक कारनामों को अपना मौन समर्थन देने वाले नेता/लोग जब वंशवाद पर ट्वीट करते हैं तो बड़े हास्यास्पद लगते हैं।

     

     

  • Video: पढ़ाकू आदि

    Video: पढ़ाकू आदि

    ज्यों ज्यों आदि बढ़े होते जा रहे हैं उनकी रुचि किताबों में बढ़ती जा रही है। अपना काफी समय किताबों के साथ गुजारते हैं, वह भी आपके बिना अपने हिसाब से। आदि अब हर समय आपके साथ रहना नहीं चाहते हैं, आपको आपकी जगह छोड़कर अपने पसंदीदा कोनों में जाकर अपनी किताबों के साथ समय गुजारना भी पसंद करते हैं। कभी कभार आदि लगभग आधा घंटा या अधिक समय भी अकेले अपनी किताबों के साथ अपने हिसाब से गुजारते हैं। अपनी पसंद की किताबें निकाल कर उनके पन्ने उलटते हुए पढ़ते रहते हैं। लगभग 6 मिनट का यह वीडियो आपको रुचिकर भी लग सकता है या बोरियत वाला भी। 

  • आदि व टोस्ट – अपना काम खुद करने का गर्व

    आदि व टोस्ट – अपना काम खुद करने का गर्व

    आदि की टोस्ट खाने की इच्छा थी। आदि के लिए टोस्ट का छोटा सा डिब्बा किचन बेंच पर रखा रहता है। जब उनको खाने की इच्छा हो वह मांग सकते हैं या खुद अपने सीढ़ीदार स्टूल पर चढ़कर हाथ बढ़ा कर ले सकते हैं। शायद आदि की टोस्ट खाने की इच्छा रही होगी, इसीलिए आदि पहले सीढ़ीदार स्टूल पर चढ़े, हाथ बढ़ाया लेकिन टोस्ट-डिब्बा उनकी पहुंच से दूर था। अब आदि के सामने दो विकल्प थे, आदि मुझे आवाज लगाते या किसी तरह डिब्बे तक पहुंचने का जुगाड़ स्वयं करते। आदि ने दूसरे विकल्प को चुनते हुए प्रयास करने का निर्णय लिया।

    आदि स्टूल से किसी तरह नीचे उतरे (कभी कभार जुगाड़ जमाकर उतर लेते हैं नहीं तो हमको आवाज लगाते हैं, उनको अच्छा लगता है जब हम उनको हवा में उड़ाते हुए उनके सीढ़ीदार स्टूल से नीचे उतारते हैं)।

    स्टूल से अपने आप नीचे उतर कर, अपनी छोटी सी डायनिंग कुर्सी पर चढ़े, कुर्सी से अपनी डायनिंग मेज पर चढ़े, अब टोस्ट-डिब्बे की ओर अपना हाथ बढ़ाया, यहां से टोस्ट-डिब्बे तक पहुंच गए। यदि न भी पहुंच पाते तो हमें तो आवाज लगाकर डिब्बा मांग ही लेते। लेकिन अपना काम खुद करने की खुशी आदि के लिए अलग ही रही।

    हमारी ओर देख कर खूब जोर की आवाज लगाई और बहुत अधिक खुशी व गर्व के साथ हमको अपना टोस्ट डिब्बा दिखाए। आदि को अपने काम खुद करने व हमारे कामों में सहयोग करने में बेहद खुशी होती है। कामों को अपनी उपलब्धि के तौर पर लेते हुए खुशी भी महसूसते हैं।

    आदि
    (उम्र 15 महीने 10 दिन)