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  • ‘शौच और शौचालय की नजर से भारतीय संस्कृति के “शीर्षासन माडल” का विश्लेषण’ –Sanjay Jothe

    ‘शौच और शौचालय की नजर से भारतीय संस्कृति के “शीर्षासन माडल” का विश्लेषण’ –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    “..यहाँ जिन लोगों को ब्रह्मपुरुष के मस्तिष्क ने जन्म दिया उनका मस्तिष्क कोइ काम नहीं करता, भुजाओं से जन्मे लोगों की भुजाओं में लकवा लगा है,उन्होंने हजारों साल की गुलामी भोगी, पेट से जन्मे वणिकों ने अपना पेट भरते भरते पूरे भारत के पेट पे ही लात मार दी और गरीबी का विश्वरिकार्ड बना डाला,पैरों से जन्मे शूद्रों के पैर पत्थर से बाँध दिए वे अपनी जगह से हिल भी नहीं सकते.ये भारतीय संस्कृति का ‘शीर्षासन माडल’ है..”

    आज विश्व शौचालय दिवस है. संयुक्त राष्ट्र संघ ने आधुनिक समय की नैतिकता को मूल्य देते हुए विश्व में सभी इंसानों को साफ़ स्वच्छ और ‘फंक्शनल’ शौचालय देने की बात को महत्व दिया है. एक आकलन के अनुसार विश्व की ढाई अरब से अधिक आबादी को शौच और स्वच्छता संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. इस वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा पुण्यभूमि भारत की आबादी का है. जिस भूमि पर शौचालय न हों वह पुण्यभूमि होने का गर्व कर सकती है, ये भारत की नैतिकता का एक छोटा सा उदाहरण है.

    शौचालय दिवस के बहाने भारत के सभ्यता बोध और नैतिकता बोध को ठीक से टटोला जा सकता है. शौचालयों का न होना, होने पर भी इस्तेमाल न होना और शौचालय बनाने वालों से लेकर शौचालय की सफाई करने वालों को अमानवीय यातनाएं और तिरुस्कृत जीवन के लिए बाध्य करना – ये बिंदु भारतीय समाज और सभ्यता मूल के चरित्र को दर्शाते हैं. हालाँकि दुनिया के अन्य देशों में भी सफाई कर्मियों को अस्वच्छ और असभ्य माना गया है लेकिन उन्हें एक खांचे या वर्ग या जाति के एयर टाईट कम्पार्टमेंट में बाधे रखकर अभिशप्त नहीं किया गया है.

    मेगसेसे पुरस्कार प्राप्त महान समाजसुधारक बेजवाडा विल्सन ने एक बढ़िया बात कही है, भारत में जो लोग गन्दगी मिटाते हैं वे नीच माने जाते हैं और जो लोग गन्दगी फैलाते हैं वे महान माने जाते हैं .असल में ये वक्तव्य भारत की नैतिकता को एकदम से उसके नग्नतम रूप में उजागर करता है. भारत की नैतिकता और सभ्यता असल में सर के बल खड़ी है. भारतीय लोग किसी तरह का योगासन करते हों या न करते हों इतना तय है कि भारत की सभ्यता और नैतिकता हमेशा से शीर्षासन में खड़ी है. यहाँ जिन लोगों को ब्रह्मपुरुष के मस्तिष्क ने जन्म दिया उनका मस्तिष्क कोइ काम नहीं करता, भुजाओं से जन्मे लोगों की भुजाओं में लकवा लगा है, उन्होंने हजारों साल की गुलामी भोगी, पेट से जन्मे वणिकों ने अपना पेट भरते भरते पूरे भारत के पेट पे लात मार दी और गरीबी का विश्वरिकार्ड बना डाला, पैरों से जन्मे शूद्रों के पैर एकदम पत्थर से बाँध दिए गए वे अपनी जगह से हिल भी नहीं सकते. ये भारतीय संस्कृति का ‘शीर्षासन माडल’ है.

    भारतीय संस्कृति के इस ‘शीर्षासन माडल’ को ठीक से समझिये. जाति व्यवस्था का दंश सीधे सीधे समझना मुश्किल है इसे स्वच्छता के मुद्दे से या ग्रामीण या शहरी जीवन की आवश्यकताओं के नजरिये से आसानी से समझा जा सकता है. असल में जाति या वर्ण कोई मूलभूत समस्याएं नहीं हैं ये किन्ही दुसरी समस्या का परिणाम है इसीलिए जाति या वर्ण को सीधे सीधे नहीं मिटाया जा सकता.

    भारत में विभिन्न जातियों को श्रमिक समूहों के रूप में देखिये. आजकल नजर आने वाली हर जाति का एक विशेष काम रहा है. उस काम विशेष से वह ग्राम या नगर की गतिशील अर्थव्यवस्था में अपना विशिष्ठ योगदान देती आई है. कुम्हार मिटटी के बर्तन बनाता है और समाज को जीवन जीने की सुविधा बनाता है, चमार चमड़े के सामान बनाकर जीवन को अलग ढंग से सुविधा देता है, सुतार या कारपेंटर लकड़ी के सामान बनाकर एक अन्य दिशा से जीवन को समृद्ध कर रहा है, जुलाहा सबके लिए कपडे बना रहा है, एक चंडाल या डोम सफाई करके इन सबको और पूरे नगर या गाँव को बिमारियों और प्रदुषण से बचा रहा है. किसान सबके लिए अन्न उपजा रहा है, ग्वाला या अहीर पशुधन को सहेजकर सबके लिए दूध घी बना रहा है. अब ऐसी सैकड़ों जातियां हैं जो श्रम का विशिष्ठ प्रकार अपनाए हुए गाँव की अर्थव्यवस्था और जमीन पर वास्तविक जिंदगी को सहारा दे रहे हैं.ये इन जातियों या श्रम आधारित समूहों का रचनात्मक योगदान है जिससे जीवन और सभ्यता आगे बढती है.

    लेकिन मजेदार बात ये कि इतना महत्वपूर्ण काम करने वालों को एकदम अछूत और दीन हीन बनाकर रखा गया है. और जो जातियां कोई सार्थक योगदान नहीं करतीं वे स्वयं को सबसे ऊपर बनाये रखती आयी हैं. एक ब्राह्मण का या पुरोहित का समाज और सभ्यता की जमीनी यात्रा में क्या योगदान है? वो क्या पैदा करता है? एक क्षत्रिय समाज को क्या दे रहा है ? वो क्या पैदा करता है? एक वैश्य कम से कम जीवन उपयोगी उत्पादों को ट्रांसपोर्ट करके कुछ हद तक उत्पादन की प्रक्रिया को आगे बधा रहा है, इसीलिये उसे भी बहुत अर्थों में नीच ही माना गया है.

    आप कल्पना कीजिये ये कैसी संस्कृति और सभ्यता है. जीवन और समाज के लिए उत्पादन की प्रक्रिया में सबसे ज्यादा रचनात्मक योगदान देने वाले लोग नीच हैं और किसी तरह का सार्थक उत्पादन न करने वाले लोग महान हैं. वे सिर्फ दूसरों का उत्पादन खा खाकर गन्दगी फैलाते हैं. उस गन्दगी को साफ़ करके उन्हें दुबारा जीवन देने वाले श्रमिकों को ये ही तथाकथित महान लोग फिर से दुत्कारते हैं और उन्हें अंतिम दर्जे का अछूत बना डालते हैं. ये कैसी नैतिकता है? ये कैसा न्याय है?

    श्रमशील जातियों या समूहों के श्रम और उत्पादन पर ही ये समाज टिका हुआ है. उनमे आपस में कोई रचनात्मक सहयोग और एकीकरण न होने लगे इसलिए अलग अलग जातियों के खांचों का निर्माण करके उन्हें जातियों के भीतर विवाह के लिए मजबूर किया गया, अंतरजातीय और अंतर्वर्ण विवाह पर रोक लगा दी गयी ताकि उनकी एकता हर पीढ़ी में टूटकर बिखरती रहे और सामाजिक गतिशीलता और परस्पर निर्भरता और सहयोग की कल्पना ही नष्ट हो जाए. ये न केवल समाज को विभाजित बनाये रखने का षड्यंत्र है बल्कि श्रम के विभिन्न रूपों और उत्पादन के तरीकों में आपसी संश्लेषण और सुधार की प्रक्रिया को भी रोक देने का षड्यंत्र है. इसीलिये भारत के श्रमिक बेहतर तकनीक और विज्ञान पैदा नहीं कर सके.

    बेहतर तकनीक और विज्ञान तब जन्म लेता है जब श्रम और कार्य के विभिन्न रूपों का संश्लेषण या मिलन होता है. एक चमार अपना चमड़ा पकाने के लिए मौसम, तापमान, नमी, लवण, क्षार, समय, बल, दबाव, नाप, तौल आदि का वैज्ञानिक हिसाब रखता है. एक कुम्हार या किसान भी मौसम नमी धूप आर्द्रता, समय आदि का वैज्ञानिक हिसाब रखता है. अगर इन दोनों तीनों में रचनात्मक सहयोग होने लगे तो ये अपने अपने ज्ञान के मिलन से निश्चित ही कोई युनिवर्सल ज्ञान बनाने का प्रयास करेंगे, कुछ नियम और सिद्धांत खोज निकालेंगे.

    यही ढंग विज्ञान को जन्म देता है. यूरोप में यही किया गया है. यूरोप के सभ्य समाज में अलग अलग विशेषज्ञता के लोग साथ में मिलकर काम कर सकते थे वे एकदूसरे से सीखते सिखाते हुए कम समय में बेहतर नतीजे लाते हुए समाज में सम्मान और धन हासिल करने के लिए तेजी से तकनीक और विज्ञान की खोज में जुट गए और तीन सौ सालों में उन्होंने वो विज्ञान पैदा कर दिया जिसकी कल्पना भारत जैसे असभ्य अनैतिक समाज हजारों साल से भी नहीं कर पा रहे हैं.

    एक ब्राह्मण या क्षत्रिय के श्रम या उत्पादन को देखिये. वे क्या उत्पादन कर रहे हैं? समाज जिन उपादानों से या तरीकों से विक्सित होता है या सभ्य होता है उनमे इनका क्या योगदान है? ब्राह्मणों को पठन पाठन का अधिकार या जिम्मेदारी जो दी गयी है उसके लिए इन्होने क्या किया है? नब्बे से लेकर पंचानबे प्रतिशत आबादी को और अपनी ही औरतों को शिक्षा से वंचित कर दिया. इन्होने खुद जिस जिम्मेदारी को उठाने का दावा किया उसी काम को या शिक्षा को ही इन्होने योजनापूर्वक बर्बाद कर डाला.

    क्षत्रियों ने समाज की रक्षा की जिम्मेदारी ली और सामंत और शोषक बनकर इस देश की उत्पादक जातियों की रक्षा नहीं बल्कि उन्ही का क़त्ल करना शुरू किया और जिनसे रक्षा करनी थी या जिनसे युद्ध करना था उनसे हारते रहे. वणिक जातियां एकदम बीच में हैं वे उत्पादन न करते हुए भी उत्पादन की प्रक्रिया से जुडी रहीं, वितरण और विपणन के माध्यम से उन्होंने बहुत कुछ योगदान किया है लेकिन उन्हें उनके सार्थक योगदान के कारण ही नीच घोषित किया गया है. भारत के कई राज्यों में वणिक, कायस्थ इत्यादि वर्ण संकर माने गए हैं वर्ण संकर एक तरह की गाली है जो वर्ण-व्यभिचार से उत्पन्न संतानों को दी जाती है.

    एक गाँव की गतिशील अर्थव्यवस्था में जिन लोगों का जितना सार्थक योगदान है उतना ही वे नीच हैं. ये भारत का संस्कृति बोध है. इसे ठीक से देखा जाये तो ऐसा लगता है किसी ने भारत के भाग्य के साथ कोई बेहूदा मजाक किया है.

    विश्व शौचालय दिवस पर ये बात गौर करने योग्य है. भारत में सफाई और स्वच्छता एक व्यक्तिगत शुचिता का मूल्य या विषय नहीं है. ये जातिगत और वर्णगत शुचिता का और आन बान शान का मुद्दा है. अगर कोई व्यक्ति अपना ही पखाना साफ़ कर रहा हो तो उसे अड़ोस पड़ोस के ‘सभ्य सवर्ण हिन्दू’ टेढ़ी नजर से देखकर उसका मजाक उड़ाते हैं. अगर कोई समझदार आदमी अपने आसपास नाली साफ़ करने लगे तो लोग उसका मजाक उड़ाते हैं. लेकिन ये ही सज्जन अगर सड़क पे खड़े होकर मूत्र विसर्जन करने लगें तो किसी को विशेष आपत्ति नहीं होती. पोलीथिन के घर का कचरा बांधकर गली मोहल्ले में फेंकते रहना भारत में सामान्य और स्वीकृत व्यवहार है. लेकिन कोई पढ़ा लिखा आदमी या औरत अगर उस कचरे को इकट्ठा करके उसका निस्तारण करने की कोशिश करे तो उसका मजाक उड़ाया जायेगा. ये भारत के आम माध्यम वर्ग की नैतिकता है.

    ये नैतिकता कहाँ से आयी है? निश्चित रूप से ये धर्मग्रंथों से आई है. भारत के धर्मशास्त्रों में देखिये. स्मृति ग्रंथों (धार्मिक कानूनों) में देखिये. मनु महाराज ने साफ़ लिखा है कि मनुष्य (असल में ब्राह्मण) इंसानी बस्ती से दूर खुले में जाकर शौच करे और तीन बार (कुछ ग्रंथों में अधिक भी है) सुखी भूमि से प्रक्षालन करे फिर जल से करे. उसके बाद किन्ही उपायों या मन्त्रों या पवित्र धागे से जुडी कुछ क्रियाओं से उस ‘पाप’ से मुक्त हो. एक ही स्थान पर एक से अधिक लोग शौच नहीं कर सकते. एक ही स्थान पर निकट संबंधी स्नान या पखाना विसर्जन नहीं कर सकते.

    इसे गौर से देखिये. असल में ये नगरीकरण के खिलाफ जाने वाली बाते हैं. नगर में नगरीय जीवन जीने के लिए स्नानागार और शौचालय जरुरी हैं. एक हे स्नानागार या शौचालय में पिता-पुत्री और माँ-बेटे को जाना होगा. अगर और बड़ी सामूहिकता की कल्पना करें जैसे कि कोई कार्यालय या होटल या सिनेमाघर हो तो उसमे तो अपरिचितों के साथ भी वाही शौचालय साझा करना पड़ेगा. तब आप क्या करेंगे? ऐसे में यदि आपकी खोपड़ी में मनु महाराज घुसे हुए हैं तो आप नगरीय जीवन का स्वागत कैसे करेंगे? आप नगर का प्रबंधन कैसे करेंगे? और एक और मजेदार बात देखिये, भारत के शासन प्रशासन सहित न्यायपालिका से लेकर नगर पालिका तक सवर्ण द्विज ब्राह्मण या क्षत्रिय ही सारे निर्णय ले रहे हैं.

    जिनकी मानसिकता और संस्कार असल में उत्पादन, वितरण और नगरीय जीवन के खिलाफ हैं वे गाँव, खेती, नगर पालिका, व्यापर, शासन प्रशासन, शिक्षा आदि का प्रबंधन कर रहे हैं.

    इसी कारण वे भारतीय विभागों कार्यालयों में कोई नया इनोवेशन नहीं कर पाते. शासन प्रशासन तकनीक विज्ञान शिक्षा कानून कपड़ा लत्ता यहाँ तक कि फिल्म और मनोरंजन भी सब यूरोप से कापी पेट्स हो रहा है. कारण क्या है? कारण ये है कि जिनका मूल संस्कार और पारिवारिक वातावरण उत्पादन, सभ्यता और इंसानी नैतिकता के खिलाफ है वे ही सारा प्रबंधन कर रहे हैं. जिस आदमी को श्रम से नफरत करने का वातावरण मिला हो वो क्या श्रमिकों के प्रति संवेदनशील और जिज्ञासु होगा?

    ब्रिटेन का उदाहरण लीजिये, विलियम स्मिथ एक कारीगर का बेटा है उसने कारीगरी और उत्पादन सहित वितरण और व्यापार को गौर से देखा समझा. यूरोप के सभ्य समाज में उसने अलग अलग श्रम समूहों की अंतर्क्रियाओं और परस्पर निर्भरताओं सहित सामाजिक गतिशीलता का गहरा अध्ययन करते हुए पूंजीवाद का मोडल दिया. बाद में इस व्यवस्था में शोषण पैदा हुआ तो दुसरे विचारकों और दार्शनिकों ने इन्ही श्रमजीवी समूहों की हित चिन्तना करते हुए समाजवाद, लोकतंत्र और साम्यवाद इत्यादि के सिद्धांत दिए. ज्यादातर बेहतरीन दार्शनिक और विचारक और वैज्ञानिक यूरोप में श्रमजीवी समूहों से आ रहे हैं. अज की भाषा में कहें तो मध्यम वर्ग से आ रहे हैं. ये वो तबका है जो उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया में बचपन से किसी न किसी रूप में शामिल होता है और समाज और सभ्यता की जमीनी प्रक्रिया में हिस्सा लेकर पहले खुद सभ्य बनता है और बाद में सभ्यता को विक्सित करने में योगदान देता है.

    इसके विपरीत भारत में क्या हो रहा है? हजारों साल से जो लोग जन्म के आधार पर दूसरों को नीच और अछूत समझते हैं वे इस समाज के लिए दर्शन, धर्म और नीति के ग्रन्थ लिख रहे हैं. वे लोग जिनमे इतनी भी न्यूनतम इंसानी नैतिकता नहीं है कि एक किसान या कुम्हार या वाल्मीकि या चमार या अपनी खुद की स्त्री को इंसान समझकर उसके श्रम का सम्मान कर सके वे लोग समाज के संचालन के सूत्र अपने हाथ में रख रहे हैं. ऐसा समाज अगर औंधे मुंह न गिर जाए तो अस्चर्या कैसा? ऐसा समाज गुलाम गरीब अन्धविश्वासी और बीमार न हो जाए तो आश्चर्य कैसा?

    तो दोस्तों, स्वच्छता, शौच और शौचालय का मुद्दा एक खिड़की या एक की-होल की तरह है. उसके जरिये भीतर झांकर देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि भारत स्वच्छ न होने को ही अपनी संस्कृति समझता है. अनुत्पादक, बंजर, बाँझ, कूढ़-मगज और अन्धविश्वासी बने रहना यहाँ महानता की निशानी है. उत्पादन करना श्रम करना सृजन करना (यहाँ तक कि रजस्वला होना या बच्चा पैदा करना भी) यहाँ अशुद्धि और नीचता की निशानी है. ये भारत के मन के सोचने का ढंग है इसे ठीक से पहचान लीजिये. अब अगर भारत को सभ्य और समर्थ बनाना है तो उत्पादक और श्रमिक जातियों समूहों को उनके श्रम और योगदान के अनुरूप सम्मान और अवसर देना जरुरी है. 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • नौ का पहाड़ा

    नौ का पहाड़ा

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    वह बच्चा पतली सी न टूटने वाली डंडी की मार से जमीन पर नीचे पड़ा था।

    मम्मी, जो स्कूल में जा कर उस बच्चे की मैम हो जाती थी, ने नौ का पहाड़ा घर से याद करने को कहा था। नौ का पहाड़ा उसके लिए अभी खेल है वह नौ का पहाड़ा दोहराए जा रहा है नौ ई कना नौ, नौ दूनी अट्ठारह, नौ तिया सत्ताईस… मम्मी देखो मेरे को तो एक दम याद हो गया, सुनो नौ ई कना नौ, नौ दूनी अट्ठारह नौ तिया सत्ताईस, नौ चौक छत्तीस… नौ दहाई नब्बे। मैंने तो अभी ही सुना दिया तुम कुछ कहोगी तो नहीं मैं भूल गया तो!

    – नहीं!

    “पहाड़ा दिया था सुनने को चलो तुम सुनाओ।” सबको ताजा कर दे ऐसी मुस्कान लिए बच्चा पहाड़ा सुनाना शुरू करता है नौ ई कना नौ, नौ दूनी अट्ठारह, नौ तिया सत्ताईस, नौ चौक…. नौ चौक…. मैम जी मैंने घर पर तो सुनाया था, मैंने याद किया था।

    डंडी उठती है और उस बच्चे पर जमीन पर चीखते-चिल्लाते पड़े होने पर भी पड़ती रहती है।

    वह बच्चा पतली सी न टूटने वाली डंडी की मार से जमीन पर नीचे पड़ा था, शारीरिक चोट उसके लिए नई नहीं थी लेकिन ठगे जाने, विश्वास टूटे जाने को महसूस करने का उसका यह पहला अनुभव था।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    Devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 


  • प्रदूषण, नैतिकता और नैतिक प्रदूषण –Sanjay Jothe

    प्रदूषण, नैतिकता और नैतिक प्रदूषण –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    “नगरीय जीवन जीने के लिए एक न्यूनतम नैतिकता बोध की और सभ्यता बोध की आवश्यकता होती है जो भारत की संस्कृति में नहीं है”

    एक बार मैंने लिखा था कि भारत में गरीबी या विकास की समस्या असल में व्यवस्था की नहीं बल्कि धर्म और नैतिकता की समस्या है, ये विकास की रणनीति या व्यवस्था का मुद्दा बिलकुल नहीं है. बहुत लोगों को बुरा लगा था उस समय. इस बात को प्रदुषण के उदाहरण से फिर समझिये.

    एक आदिवासी दलित बहुल इलाके में कुछ साल मैंने वाटर और लैंड मेनेजमेंट का काम किया, ग्राम पंचायतों पटवारियों, गाँव के दबंगों और एकदम गरीब दलितों और आदिवासियों को एकसाथ लेकर पानी बचाओ जमीन सुधारों की चुनौती से रोज जूझना होता था. उस समय पता चला कि भारतीय गाँवों में लोगों में अपनी ही जमीन, सडक, पहाड़, नदी, आदि को बचाने के लिए एक जैसा उत्साह नहीं है.

    इसके कारण पर विचार करते हुए एक गजब की बात तब उजागर हुई थी कि भारतीय समाज में एक ही सडक एक तालाब एक पहाड़, मैदान या यहाँ तक कि एक पेड़ पर भी सभी लोगों का एक जैसा अधिकार नहीं होता. नदी, पोखर, झरने या तालाब के साफ़ हिस्से पर और कुओं पर पहला अधिकार ब्राह्मणों ठाकुरों बनियों का है, फिर ग्रामीण इलाकों के खुले मैदानों, सडकों, सार्वजनिक स्थलों का भी यही हाल है. ऐसे में दलितों आदिवासियों की बड़ी आबादी को जब तालाब या नाला सुधारने के लिए इकट्ठा किया जाता है तो उनमे कोई उत्साह नहीं होता. कारण ये कि उस तालाब या कुवें पर उनका अधिकार नहीं है, ये तालाब या कुवां ठीक भी हो जाए तो उन्हें उसका लाभ मिलेगा ये बहुत निश्चित नहीं है. दुसरा कारण कि ये गरीब लोग हैं जिनके पास जमीन नहीं हैं. इसलिए पानी बचाकर खेती करने का कोई उत्साह इनमे हो भी नहीं सकता.

    याद कीजिये, अंबेडकर को चवदार तालाब सत्याग्रह क्यों करना पडा था. वो केस स्टडी भारत के धर्म और संस्कृति द्वारा मानव जीवन और उसके प्रकृति से सम्बन्धों के बारे में किये गए सभी दावों की पोल खोल देती है. “सर्वे भवन्तु सुखिनः” “वसुधैव कुटुंब” और “पुत्रोहम प्रथ्विव्याम” इत्यादि कम से कम भारतीय संस्कृति के लिए सबसे बड़े झूठ हैं. यहाँ समाज जीवन और प्रकृति पर हर व्यक्ति का एकसमान अधिकार नहीं है. यहाँ वर्ण और जाति से सबकुछ तय होता है. ये जीवन जीने का एक असभ्य और बर्बर तरीका है जिसकी पोल आधुनिक शहरी जीवन में खुलने लगी है.

    जो संस्कृति ब्रह्मा के शरीर के चार हिस्सों से अलग अलग ढंग से पैदा हुई है उसने राजधानी से लेकर गाँवों जंगलों तक में किस तरह का पदानुक्रम बना रखा है ये देखिये. एक गली मुहल्ले तक में प्राकृतिक या कुदरती संसाधन की मालकियत भी एकसमान नहीं है. ऐसे में उसे बचाने के लिए इकट्ठा होने का या सामूहिक प्रयास करने का सवाल ही कहाँ उठता है. प्राकृतिक संसाधनो को बचाने के लिए सामुदायिक प्रयास की आवश्यकता दुनिया भर में स्थापित हो चुकी है लेकिन भारत में एक साझे लक्ष्य से सहानुभूति रखने वाला समुदाय मिलना बड़ा कठिन है. ऐसे में असभ्य भारतीय समाज अपने खुद के बच्चों के भविष्य के लिए भी इकट्ठा नहीं हो पा रहा है अपनी व्यवस्था और सरकार पर दबाव नहीं बना पा रहा है.

    आज दिल्ली में जो जहर फैला है उसका क्या कारण हो सकता है?

    ये असल में एक नैतिक प्रदूषण की हालत है. एक ऐसे समाज में जहां एकसाथ बैठना खाना पाप हो, एकदूसरे से संबंधित होने के लिए आपको जाति और सरनेम पता करने की जरूरत पड़ती हो वो समाज एक साझे सामूहिक भविष्य की कल्पना कैसे कर सकता है? हर आदमी का सडक तालाब पेड़ बगीचे पर अलग अलग किस्म का हक या लगाव है. जब प्राकृतिक संसाधन नष्ट होता है तो सबको इकट्ठा एक जैसा नुक्सान का दुःख नहीं होता. जिस अनुपात में आप उससे संबंधित थे उसी अनुपात में दुःख होता है. ये भारतीय संस्कृति की गजब की विशेषता है.

    अगर पाषाण कालीन या वैदिक या मध्ययुगीन अवस्था में जी रहे होते तो ये अनैतिकता और ये असभ्य जीवन शैली आसानी से चल सकती थी. लेकिन आज के आधुनिक समाज में नैतिकता से शून्य हो चुकी जीवन शैली नहीं चलने वाली. नगरीय जीवन जीने के लिए एक न्यूनतम नैतिकता बोध की और सभ्यता बोध की आवश्यकता होती है जो भारत की संस्कृति में नहीं है. अब वायु, पानी, जमीन जंगल इत्यादि को जब तक सामूहिक सम्पत्ति न समझा जाएगा तब तक भारत जैसे असभ्य समाज आधुनिक जीवन के योग्य नहीं बन पायेंगे.

    दिल्ली या चंडीगढ़ की हवा को ठीक करने के उपाय नहीं किये जा रहे हैं. कारण वही है. सबको लगता है कि अपना घर साफ़ कर लिया अपनी गली में बगीचा लगा लिया और हो गया समाधान. जैसे गाँव के ब्राह्मण ठाकुर ये सोचते हैं कि तालाब का अपना हिस्सा साफ़ रहे तो हम साफ़ पानी पी सकते हैं. या अपने मुहल्ले का कुआ साफ़ हो गया तो सब ठीक हो गया. आजकल एक और आदत फ़ैल रही है. शहर की सामूहिक जीवन की चिंता किये बिला अपना आसन बिछाकर प्राणायाम कर लीजिये और हो गया समाधान. ये प्राणायाम और योग की मानसिकता भी एकदम खंडित और स्वार्थी जीवनशैली को जन्म देती है.

    एक घर के कोने में बैठकर प्राणायाम कर लेने से मान लिया जाता है कि आपका काम हो गया. लेकिन शहर और समाज को एक बड़े इकोसिस्टम की तरह देखने का नजरिया इससे नहीं आने वाला है.

    जीवन और जगत को खंडित करके देखने की ‘वैदिक बुद्धिमत्ता’ असल में अब मूर्खता साबित हो रही है. वैदिक बुद्धिमत्ता सब तरह की परिस्थितियों को खंड खंड करके देखती है. जैसे ब्रह्मा को चार खंडों में बांटकर उसने चार वर्ण बना दिए. वे एकोलोजी या इकोसिस्टम का सिद्धांत समझ ही नहीं सकते. गाँव के ब्राह्मण ठाकुर ये नहीं समझना चाहते कि गाँव का भूमिगत जल अगर प्रदूषित है तो एक कुंवे को साफ़ करने का कोई अर्थ नहीं है. ठीक इसी तरह दिल्ली चड़ीगढ़ के प्रभावशाली लोग हैं जो इकोसिस्टम को नहीं समझते, वे एपने घर में एयर कंडीशन और प्यूरीफायर लगाकर सुरक्षित नहीं हो सकते.

    भारत के गाँवों से लेकर शहरों तो वही की वही समस्या है. क्योंकि इनका धर्म और संस्कृति एक ही है.

    ये किसी भी शहर या गाँव में चले जाएँ ये समग्रता की भाषा में सोच ही नहीं सकते. ये खंड खंड पाखंड के आदि हो चुके हैं. एक साझे सामूहिक जीवन का विरोध करते हुए इन्होने जो धर्म और संस्कृति पैदा की है वो अब इनके शरीर और मन के जीवन को भी खंडित कर देना चाह रही है. अब इनसे कहना चाहिए कि आपके फेफड़े और ह्रदय (छाती) अगर प्रदुषण से मर रहे हैं तो चिंता मत कीजिये ये क्षत्रिय हिस्सा है जो मर रहा है, अभी भी आपके शरीर का मस्तिष्क अर्थात ब्राह्मण हिस्सा सही सलामत है. ऐसे तर्क अभी तक आये क्यों नहीं ये भी आश्चर्य की बात है.

    भारत के धर्म और संस्कृति ने जैसा समाज बनाया है उसमे व्यवस्था, कानून आदि को जिम्मेदार ठहराने से पहले हमें इस देश की नैतिकता को ठीक से पकड़ना होगा. जो समाज जीवन और प्रकृति ही नहीं परमात्मा तक पर अलग अलग ढंग से अधिकार और सामित्व देता हो वहां सामूहिक साझे भविष्य के लिए पूरी कौम को इकट्ठा करना असंभव है. यही भारत की गुलामी और हार की सबसे बड़ी वजह रही है. बहर्तीय समाज किसी भी अच्छे प्रयास में यहाँ तक कि आत्मरक्षा के लिए भी इकट्ठा नहीं हो सका है.

    ऐसे में प्रदूषण जैसी पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी को सुलझाने का भारतीय असभ्य समाज का जो तरीका है उसपर गौर कीजियेगा. ये सोच और तरीका गहराई से देखिये, इस तरीके में भारतीय संस्कृति की मूल समस्या – अनैतिकता और अमानवीयता – साफ़ नजर आती है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • भारतीय नौकरशाही का वीआईपी कल्चर : न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन 

    भारतीय नौकरशाही का वीआईपी कल्चर : न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन 

    डा० नीलम महेंद्र

    वीआईपी कल्चर खत्म करने के उद्देश्य से जब प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मई 2017 में वाहनों पर से लालबत्ती हटाने सम्बन्धी आदेश जारी किया गया तो सभी ने उनके इस कदम का स्वागत किया था लेकिन एक प्रश्न रह रह कर देश के हर नागरिक के मन में उठ रहा था, कि क्या हमारे देश के नेताओं और सरकारी विभागों में एक लाल बत्ती ही है जो उन्हें ‘अतिविशिष्ठ’ होने का दर्जा  या एहसास देती है?
    हाल ही में रेल मंत्री श्री पीयूष गोयल ने अपने अभूतपूर्व फैसले से 36 साल पुराने प्रोटोकॉल को खत्म करके रेलवे में मौजूद वीआईपी कल्चर पर गहरा प्रहार किया। 1981 के  इस सर्कुलर को अपने नए आदेश में तत्काल प्रभाव से जब उन्होंने रद्द किया तो लोगों का अंदेशा सही साबित हुआ कि इस वीआईपी कल्चर की जड़ें बहुत गहरी हैं और इस दिशा में अभी काफी काम शेष है।

    मंत्रालय के नए आदेशों के अनुसार  किसी भी अधिकारी को अब कभी गुलदस्ता और उपहार भेंट नहीं दिए जाएंगे। इसके साथ ही रेल मंत्री पीयूष गोयल ने वरिष्ठ अधिकारियों से एक्सेक्यूटिव श्रेणी के बजाय स्लीपर और एसी थ्री टायर श्रेणी के डब्बों में यात्रा करने को कहा है।रेलवे में मौजूद वीआईपी कल्चर यहीं पर खत्म हो जाता तो भी ठीक था लेकिन इस अतिविशिष्ट संस्कृति की जड़ें तो और भी गहरी थीं। सरकारी वेतन प्राप्त रेलवे की नौकरी पर लगे कर्मचारी रेलवे ट्रैक के बजाय बड़े बड़े अधिकारियों के बंगलों पर अपनी ड्यूटी दे रहे थे।

    लेकिन अब रेल मंत्री के ताजा आदेश से सभी आला अधिकारियों को अपने घरों में घरेलू कर्मचारियों के रूप में लगे रेलवे के समस्त स्टाफ को मुक्त करना होगा। जानकारी के अनुसार वरिष्ठ अधिकारियों के घर पर करीब 30 हजार ट्रैक मैन काम करते हैं, उन्हें अब रेलवे के काम पर वापस लौटने के लिए कहा गया है। पिछले एक माह में तकरीबन 6 से 7 हजार कर्मचारी काम पर लौट आए हैं और शीघ्र ही शेष सभी के भी ट्रैक पर अपने काम पर लौट आने की उम्मीद है।

    क्या अभी भी हमें लगता है कि रेलवे में स्टाफ की कमी है ?
    क्या हम अभी भी ट्रैक मेन्टेनेन्स के अभाव में होने वाले रेल हादसों की वजह जानना चाहते हैं?
    एक आम आदमी और उसकी सुरक्षा के प्रति कितने उत्तरदायी हैं ये अधिकारी इसका उत्तर जानना चाहते हैं?

    इस प्रकार की वीआईपी संस्कृति या फिर कुसंस्कृति केवल एक ही सरकारी विभाग तक सीमित हो ऐसा भी नहीं है।
    देश के एक प्रसिद्ध अखबार के अनुसार मप्र के एक लैंड रिकॉर्ड कमिश्नर के बंगले पर 35 से ज्यादा सरकारी कर्मचारी उनका घरेलू काम करने में लगे थे जबकि इनका काम आरआई के साथ सीमांकन में मदद करना होता है। कोई आश्चर्य नहीं कि उस राज्य में सीमांकन का काफी काम लम्बित है।

    क्या इन अधिकारियों का यह आचरण ‘सरकारी काम में बाधा’ की श्रेणी में नहीं आता?

    भारत की नौकरशाही को ब्रिटिश शासन के समय में स्थापित किया गया था जो उस वक्त विश्व की सबसे विशाल एवं सशक्त नौकरशाही थी। स्वतंत्र भारत की नौकरशाही का उद्देश्य देश की प्रगति,जनकल्याण,सामाजिक सुरक्षा,कानून व्यवस्था का पालन एवं सरकारी नीतियों का लाभ आमजन तक पहुँचाना था। लेकिन सत्तर अस्सी के दशक तक आते आते भारतीय नौकरशाही दुनिया की  ‘भ्रष्टतम’ में गिनी जाने लगी। अब भ्रष्टाचार,पक्षपात,,अहंकार जैसे लक्षण नौकरशाही के आवश्यक गुण बनते गए।

    न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन।

    जो कानून, मानक विधियां और जो शक्तियां इन्हें कार्यों के सफल निष्पादन के लिए दी गई थीं, अब उनका उपयोग ‘लालफीताशाही ‘ अर्थात फाइलों को रोकने के लिए, काम में विलम्ब करने के लिए किया जाने लगा। नेताओं के साथ इनके गठजोड़ ने इन्हें  “वीआईपी” बना दिया।

    और आज की सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि जो लोग देश में नौकरियों की कमी का रोना रो रहे हैं वे सरकारी नौकरियों की कमी को रो रहे हैं क्योंकि प्रइवेट सेक्टर में तो कभी भी नौकरियों की कमी नहीं रही,लेकिन इन्हें वो नौकरी नहीं चाहिए जिसमें काम करने पर तनख्वाह मिले इन्हें तो वो नौकरी चाहिए जिसमें हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ही चोखा। कोई आश्चर्य नहीं कि  हमारे समाज के नैतिक मूल्य इतने गिर गए हैं आज लोग अपने बच्चों को नौकरशाह बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं,देश की सेवा अथवा उसकी प्रगति में अपना योगदान देने के लिए नहीं बल्कि अच्छी खासी तनख्वाह के अलावा मिलने वाली मुफ्त सरकारी  सुविधाओं के बावजूद किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही न होने के कारण।

    आखिर पहले पांचवां वेतन आयोग फिर छठा वेतन आयोग और अब सातवाँ वेतन आयोग, इन सभी में सुनिश्चित किया गया कि इनके वेतन और सुविधाएं इस प्रकार की हों कि इनके ईमानदारी से काम करने में कोई रुकावट न हो लेकिन क्या इनकी जवाबदेही भी निश्चित की गई?

    पहले लाल बत्ती हटाना और अब रेल मंत्री का यह कदम स्वागत योग्य है किन्तु तब तक अधूरा है जब तक हर सरकारी पद पर बैठे  नेता या फिर अधिकारी की जवाबदेही तय नहीं की जाती।

    इन सभी को टारगेट के रूप में काम दिए जाएं जिनमें समय सीमा का निर्धारण कठोरता हो।

    तय समय सीमा में कार्य पूरा करने वाले अधिकारी को तरक्की मिले तो समय सीमा में काम न कर पाने वाले अधिकारी को डिमोशन।
    कुछ ऐसे नियम इनके लिए भी तय किए जाएं ताकि

    जबतक वे उन नियमों का पालन नहीं करेंगे तबतक उन्हें कोई अधिकार भी न दिए जाएं।

    जिस प्रकार देश के व्यापारी से सरकार हर साल असेसमेन्ट लेती है और अपने व्यापार में वो पारदर्शिता अपनाए इसकी अपेक्षा ही नहीं करती बल्कि कानूनों से सुनिश्चित भी करती है, नेताओं को भी हर पांच साल में जनता के दरबार में जाकर परीक्षा देनी पड़ती है, उसी प्रकार हर सरकारी कर्मचारी की सम्पत्ति का भी सालाना एसेसमेन्ट किया जाए, उनके द्वारा किए जाने वाले मासिक खर्च का उनकी मासिक आय के आधार पर आंकलन किया जाए, उनके बच्चों के देसी या विदेशी स्कूलों की फीस, उनके ब्रांडेड कपड़े और फाइव स्टार कल्चर, महंगी गाड़ियों को कौन स्पान्सर कर रहा है इसकी जांच हर साल कराई जाए। कुछ पारदर्शिता की अपेक्षा सरकारी अधिकारियों से भी की जाए तो शायद वीआईपी संस्कृति का जड़ सहित नाश हो पाए।

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  • सभ्यता अगर ताजमहल है तो औरंगजे़ब भी ठीक वही सोचता था, जो योगी आदित्यनाथ साेचते हैं

    सभ्यता अगर ताजमहल है तो औरंगजे़ब भी ठीक वही सोचता था, जो योगी आदित्यनाथ साेचते हैं

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    आप या मैं जिस समय अपने देश, अपने धर्म, अपने राष्ट्र और अपनी दुनिया के अतीत में झांकते हैं और उसके अंधेरे से ही प्रेम करते हैं तो यह उम्मीद करना बेकार है कि आप या मैं वर्तमान के वातायन से झरती आलोक रश्मियों को अपनी मुटि्ठयों में भरना चाहेंगे। यह आपकी या मेरी मानसिकता है। लेकिन सचमुच ऐसा हो रहा है और यह भयानक बात है। यह सचमुच डर जाने जैसी बात है। मेरे लिए भी। आपके लिए भी।

    आप अपने अतीत में जाकर किसी बौधायन, किसी नागार्जुन, किसी आर्यभट, किसी वाग्भट, किसी ब्रह्मगुप्त, किसी सुश्रुत, किसी चरक, किसी भास्कराचार्य, किसी वराहमिहिर या किसी कौमारभृत्य जीवक की राह पर चलेंगे तो वर्तमान में आपके समस्त अंधेरे छंट जाएंगे। मेरे भी। लेकिन अगर आप अपने अतीत और वर्तमान का मूल्यांकन किसी आतंकवादी सभ्यता और किसी भयावनी विचारधारा से करके अपने भविष्य के सपने का ब्लूप्रिंट तैयार करेंगे तो इस पर दु:स्वप्न का महल खड़ा होगा और उस वीभत्स निर्माण से घृणा और जुगुप्सा की गंदी बास आएगी। मुझे भी। आपको भी।

    भारतीय दर्शन में उस अवस्था को मानसिक विचलन और पश्चिमी दर्शन में इसे केटेगरी ऑव मिस्टेक कहता है, जब हम अच्छे और बुरे, सफेद और काले, पानी और आग, आकाश और धरती और चांदनी और तपती धूप का भेद ही खोने लगते हैं। हमें न श्रेणियों का ज्ञान रहता है और न ही मर्यादाओं की बोध।

    मैं भारत-पाकिस्तान सीमा के पास एक बहुत ही छोटे से गांव का रहने वाला हूं। मेरे गांव में स्कूल भी नहीं था। एक परिवारों के अलावा किसी में कोई साक्षर तक न था। मेरा अपना परिवार भी पशुपालक परिवार था। पिता घोड़े पालने का शौक रखते थे और मां घोड़े तो घोड़े, उन्हें दूध पिलाने के लिए भैंसे तक रखती थी। मेरी शिक्षा भी कोई बहुत अच्छी नहीं हुई। अब भी मेरे दिमाग में अज्ञान कूट-कूट कर भरा है। लेकिन जब देखता हूं कि उच्च शिक्षित परिवारों से आए और सुसंस्कृत परंपरा में पले-बढ़े लोग और मुझसे कहीं अकल्पनीय श्रेष्ठ संस्थाओं में शिक्षित हुए युवक और प्रौढ़ कैसी-कैसी बातें करते हैं और कैसी-कैसी सोच रखते हैं तो मन वितृष्णा से भर उठता है। बहुत बार सोचता हूं कि कोई ऐसा सोच भी कैसे सकता है, जिसे वे बड़े गर्व से कहते और लिखते हैं। यह देख आैर सोचकर मैं बेहद उद्वेलित हो जाता हूं।

    कभी कोई सरकारी फार्म भरना ही नहीं आया और अखबार बांटने का काम ढूंढ़ने के चक्कर में दुर्घटनावश पत्रकारिता की चपेट में आने से आज तक सड़क पर चलने वाले और जमीन पर पैदल चलने वालों तक के कड़वाहट भरे अनुभवों से आए दिन मुठभेड़ होती रहती है तो यह मुझ मूढ़़ के दिमाग में भी एक चरखा सा चला देती है।

    दुर्भाग्य से कुछ पढ़ने-पढ़ाने की भी असभ्यता पड़ गई और किसी तरह के विचार की दासता या किसी विचार का भक्त या अनुयायी बनने के प्रति भी विमोह सा रहा है। इतना जरूर है कि दिमाग की सब खिड़कियां खुली रहें और विचार की जो भी ताज़ा हवा आए तो वह हमारे दिलोदिमाग को भी जरा भिगो दे।

    राजनीति, धर्म, संस्कृति और विज्ञान के इतिहास को पढ़ते हुए मुझे अपने देश के अतीत में बहुत रोशनी और बहुत सा अंधेरा मिलता है। कितने ही दीपस्तंभ और आलोक निर्झर भारतीय इतिहास में हैं। कितने ही विकराल अंधेरे और अन्याय अट्‌टहास कर रहे हैं। किसी सभ्यता का निर्माण किसी असभ्यता के बिना नहीं होता। आप सभ्य तभी कहला सकते हैं, जब आपके सामने कोई बड़ा असभ्य हो। आप तभी रौशन होंगे, जब कोई अंधेरे से पुता खड़ा होगा। ऐसे समझ ही नहीं आता। लेकिन अगर आप किसी और के धूल-धक्कड़ से परेशान हैं तो इसका मतलब यह कतई नहीं होता कि आप कीचड़ में लोटने लगें। कोई अगर पागल होकर अपने भाई-बंधुओं के नरसंहार का महाभारत रच रहा है तो आप क्यों उससे प्रभावित होते हैं। अाप अपनी शुचिता की पंचवटी में किसी रामायण की रचना कीजिए।

    इतिहास इतिहास होता है। न तो वह वर्तमान हो सकता और न ही भविष्य। इतिहास काला हो सकता है और आप भविष्य को सफेद बना सकते हैं। इतिहास बहुत चितकबरा हो सकता है और आप भविष्य को बहुत काला कर सकते हैं। लेकिन काल के साथ आपने दिक् या स्पेस का ध्यान न रखा तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी। इतिहास में जितनी ऐतिहासिक गड़बड़ियां हुई हैं, वे काल और दिक् यानी स्पेस का बोध ठीक से न रख पाने के कारण ही हुई हैं। इतिहास में मतभेदों ने कई बार भयानक युद्धों का रूप भी लिया है। आप स्वयं सोचिए, एक ही परिवार के सदस्य कौरव और पांडव अगर अपने मतभेदों को आपस में बैठकर आपसी चर्चा और बहस से सुलझा लेते तो क्या महाभारत होता? कौरव और पांडव वास्तव में बहुत बुद्धिमान और दूरदर्शी परिवार के सदस्य थे और उन्होंने दुनिया में सबसे पहले युद्धविहीन सत्ता हस्तांतरण का तरीका ईजाद किया था। इसे जुए का नाम देकर बदनाम कर दिया गया, लेकिन यह एक बौद्धिक खेल था और आप एक खेल खेलकर अगर सत्ता का हस्तांतरण करते हैं तो यह वाकई उस युग में एक अकल्पनीय बात रही होगी।

    अभी जो लोग इतिहास के सच से डर रहे हैं, वे दरअसल अपने भीतर की कायरता से डरे हुए लोग हैं। आपके भीतर अगर कोई ग्रंथि किसी रोग से ग्रस्त है तो आपको उसकी सही जांच और परख आनी ही चाहिए। क्रिकेट में आप आए दिन जीतते या हारते हैं। लेकिन हारते हैं तो निराशा जरूर होती है, लेकिन आप तब या तो अपनी टीम के खिलाड़ियों को नया प्रशिक्षण देते हैं और उनकी गलतियों को दूर करते हैं या फिर टीम में नए चेहरों को जगह देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि आप हार को स्वीकार ही न करें। अगर आप ऐसा व्यवहार करते हैं तो यह ऐसा लगता है, मानो आप किसी बहुत छोटी क्लास के बच्चे हैं।

    यह मामला सीधे तौर पर इस बात से जुड़ा है कि आप मुसलिम काल को अंधकार युग मानते हैं। लेकिन मेरा खयाल है, वह संक्रांति काल था, जो जरा लंबा चला। अंधकार युग तो वह था जब हमारी कमज़ोरियों का फायदा उठाकर विदेशी आक्रमणकारी सफल हुए। हार जाने के बाद कोई अंधकार नहीं होता। वहां तो रोशनी का सूर्य पल रहा होता है, लेकिन जब हम हारते हैं तो हार, पराजय या पराभव की घटना से पहले अंधेरा रहा होता है, जो अपनी शक्ति का पूरा बोध नहीं होने देता और इनसान अपने पागलपन में हार बैठता है। लेकिन यह हार कोई हार नहीं है। हारा हुआ दौर और निराशा का दौर वह समय है जब आप अतीत के किसी कालखंड में झांकने जाकर उसे सुधारने की कोशिश करते हैं। यह संभव नहीं है। यह बचपना है। ऐसा ही जैसे बच्चा अपनी कॉपी में चांद बनाकर कल्पना करता है कि चांद उसके पास आ गया। वह खिलखिलाता है। वह प्रसन्न होता है। आप इस प्रसन्न बच्चे जैसे प्रसन्न हैं।

    अभी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताजमहल को अपने राज्य की पर्यटन सूची में नहीं रखा है। ताजमहल का निर्माण शाहजहां ने करवाया था और शाहजहां का बेटा औरंगज़ेब पसंद नहीं करता था कि उसका पिता यह ताजमहल बनवाए। उसने बहुत विरोध किया। आैरंगजेब जिस समय 14 साल का था तो ताजमहल उसकी मां की स्मृति में उसके पिता ने बनवाना शुरू किया था और यह खत्म तब हुआ जब औरंगज़ेब 35 साल का हो गया था। औरंगज़ेब एक धार्मिक कट्टर लेकिन ईमानदार आदमी था। जैसा कि अपनी धार्मिक कट़्टरता के लिए कुख्यात लोग अक्सर ईमानदार हुआ करते हैं। औरंगजेब देख रहा था कि उसकी जवानी बीतती जा रही है और उसके सनकी पिता की आदत के कारण सरकारी धन संपदा ताजमहल में लगने से रीतती जा रही है। शाहजहां ने सरकारी खजाने से तीन करोड़ 20 लाख रुपए उस समय लगा दिए थे। औरंगजे़ब को बहुत गुस्सा आया और जब उसका बस चला तो उसने ताज़महल पर पूरा धन अपव्यय करने के कारण अपने सनकी ओर फजूलखर्च पिता को सत्ताच्युत कर कैद में डाल दिया। लेकिन पिछले पौने चार साै साल में किसी भी शासक की आत्मा में औरंगज़ेब की आत्मा नहीं जगी, उसने सिर्फ़ योगी आदित्यनाथ सिंह के हृदय को ही अपने लिए सही ठिकाना पाया।

    लेकिन यह बहुत ही असहिष्णुता भरा कदम है कि आप इतिहास से पीठ फेरबकर बैठ जाएं। किसी शासनकाल विशेष की अच्छी चीजों को बुरा बताएं और किसी शासनकाल की खराब चीजों को अच्छा प्रस्तुत करें। यह अपने वर्तमान के बोध और भविष्य के निर्माण का सवाल भी है। क्या आप काल्पनिक ईंटों पर महल बना सकते हैं? लेकिन खराब खंगर ईंटों पर तो बहुत सुंदर और मजबूत महल खड़ा हो सकता है। आप भारतीय संगीत का इतिहास खंगालिए। आप भारतीय चित्रकला को देखिए। आप भारतीय कला और साहित्य को बांचिए। आप भारतीय दर्शन और इतिहास का अवलोकन कीजिए। क्या कृष्ण की प्रशंसा में किसी हिन्दू ने रसखान से अधिक सुंदर और सम्मोहक सवैए लिखे हैं? क्या आपके घर रखी रामायण किसी मुस्लिम के हाथों कुरआन के लिए तैयार की गई रहल के बिना किसी और चीज़ पर ठीक से रखी जा सकती है? क्या बाबर के साथ कोई मुसलिम फाैज आई थी? नहीं।

    आप विद्वानों, कलाकारों, चित्रकारों, मूर्तिकारों, शिल्पकारों और स्थापत्यकलावानों को हिन्दू या मुसलमान मत मानिए। उनका धर्म तो कला है। संगीत है। कोई मुसलमान अगर संगीतज्ञ या चित्रकार हो यह जरूरी नहीं, लेकिन किसी संगीतज्ञ का ऐसा होना जरूरी है। ऐसा ही हिन्दू के साथ है। ऐसा ही सिख के साथ और जैन या बौद्ध के साथ। यह मुसलमान या हिन्दू की उपलब्धि नहीं, यह समृद्ध भारतीयता है। आज हम दोनों तरफ और पूरी दुनिया में धर्म (कहना तो चाहिए अधर्म) के नाम पर जो लड़ाकापन देख रहे हैं, उसमें कलाएं विकसित करने का माद्दा ही नहीं है। उसमें विध्वंस का दम तो है, सृजन की प्रतिभा नहीं है। सृजन विध्वंसक मानसिकता नहीं कर सकती। सृजन सृजनशील ही कर सकता है। धर्म सच में तो मनुष्य को किसी रासायनिक यौगिक की तरह संवेदनशील और करुणा से आप्लावित करता है। वह विध्वंसक नहीं बनाता। वह पर्वत, पहाड़, नदी, जल, नभ, वायु और अग्नि की पवित्रता की बात करता है। अगर किसी धर्म में सुसांस्कृतिक संवेदनाएं और करुणा नहीं है तो वह सभ्यता नहीं कहलाता। वह असभ्य ही बना रहता है।

    अगर आप चारों वेदों को देखें, छहों शास्त्रों को पढ़ें और उपनिषदों का अध्ययन करें, जो कि भारतीय सभ्यता की पुख्ता आधारशिलाएं हैं, तो आप पाएंगे कि वहां झूठ और अज्ञान को सबसे बड़ा खतरा बताया गया है और हर स्तर पर प्रयास किया गया है कि मनुष्य अविद्या का शिकार न हो। उपनिषदों का ज्ञान विलक्षण है। वह तर्क नहीं, निश्छलता उपजाता है। वह पवित्रता लाता है। आप ब्रह्मगुप्त या शंकराचार्य के दर्शन को पढ़ेंगे तो उनका अदभुत ज्ञान कट्‌टरतावादियों को असभ्य ही ठहराता है। भास, शूद्रक और कालिदास का साहित्यिक वैभव किसी से छुपा है क्या? अगर किसी ने इनमें से एक को भी ठीक से हृदयंगम किया हो तो वह किसी अन्य धर्मावलंबी के प्रति असहिष्णु और प्रतिहिंसक हो ही नहीं सकता।

    क्या कोई सोच सकता है कि बीज गणित की अगुवाई करने वाला भारत घृणा के गणित का अभ्यास करेगा? युुक्लिद से भी पहले पाइथोगोरस थियोरम और शुल्वसूत्र का सृजन करने वाले बौधायन ने या कात्यायन ने क्या कभी सोचा होगा कि ज्यामिति की पहली आधारशिला रखने वाले भारत में संकीर्णता की त्रिज्या तान दी जाएगी?

    क्या चरक और सुश्रुत ने कभी कल्पना की होगी कि भारतीय आयुर्वेद को पश्चिमी दबाव में दफन करने वाले समस्त फैसले उनके नाम लेने वाले लोग ही करेंगे और प्रवाल पिष्टि सहित कितने ही समुद्रीय तत्वों पर रोग लगा देंगे?

    क्या ढाई हजार साल पहले कौमारभृत्य जीवक को स्वप्न् में भी यह खयाल आया होगा कि जिस धरती पर उन्हें एक भी पौधा अनुपयोगी नहीं मिला, उस देश में एक दिन सरकारें वनस्पतियों को तहस-नहस करने की परियोजनाओं को विकास का नाम देंगी? यह वही जीवक थे, जो कहते थे कि साधु अगर व्यापार करता है तो वह पूरे राष्ट्र को नरकगामी बनाता है।

    यह वही जीवक थे, जिन्होंने तक्षशिला के योजन भर में कई दिन तक गुरु के आदेश से ऐसे पौधे की तलाश की, जो किसी ओषधि में काम न आता हो और अंतत: विफल साबित हुए।

    यह वही जीवक था, जिसने सम्राट बिंबिसार के गुदाद्वार के पास नासूर का इलाज किया था और उन्हें रानियों के उपहास से मुक्ति दिलाई थी। यह वही जीवक था, जिसने बिंबिसार के इलाज की घोषणा की तो एक ब्राह्मण मित्र ने उसकी बांह पकड़ कर कहा कि क्या वह एक निकृष्ट नास्तिक बौद्ध का इलाज करेगा तो पलटकर जीवक बोले : इस विश्व में कौन नास्तिक? सभी तो ईश्वर की संतान हैं और ईश्वर की किसी संतान को जो विधर्मी समझता है, वह स्वयं निकृष्ट और विधर्मी है! ब्राह्मणों के इसी कट्‌टर आचरण के कारण जीवक बाद में बौद्ध हो गए।

    क्या कभी पाई का सबसे एक्युरेट मान बताने वाले आर्यभट ने कभी सोचा होगा कि उनके देश में लोग विवेकवाद के बाद कट्टरतावाद की भेंट चढ़ जाएंगे और ज्योतिर्विज्ञान की पूजा करने के बजाय ज्योतिष के अंधकार में डूब जाएंगे? क्या दुनिया को खगोलविद्या का ककहरा सिखाने वाले भारत के किसी ऋषि ने कल्पना की होगी कि यहां के लोग अपरिग्रह को त्यागकर धन और वैभव के बजबजाते अमानुषिक ढेर लगाएंगे और शासक उनकी उंगलियों पर नाचेंगे?

    शतरंज जैसे खेल का आविष्कारक भारत कभी इस खेल को भूल जाएगा और एक विदेशी खेल के लिए मर मिटेगा और उस खेल के खिलाड़ियों को भगवान घोषित कर देगा? काम शिक्षा का अाविष्कारक और कामसूत्र का प्रणेता भारत एक दिन काम शब्द से ही घृणा करने लगेगा और कामुकता के बजबजाते कीड़ों को साधुता का बाना पहना देगा!

    क्या कभी भारतीय मनीषियों ने यह कल्पना की होगी कि मूर्ख, हुड़दंगी, अंधभक्त और धर्म के नाम पर कट्‌टरता फैलाने वाले इतने ताकतवर हो जाएंगे कि वे सनातन धर्म की बुराइयों पर वार करने वाले दयानंद सरस्वती से पूछेंगे कि क्यों तूने इस्लाम पर तो सिर्फ चार पन्ने लिखे और हिन्दू धर्म पर पूरा सत्यार्थप्रकाश ठोक मारा और काशी में पाखंड खंडिनी भी गाड़ दी! क्यों न तुझे दूध में शीशा पिघलाकर दे दिया जाए?

    क्या हिंट्स फॉर सेल्फ कल्चर जैसा ग्रंथ लिखने वाले क्रांतिकारी लाला हरदयाल ने कभी सपने में भी सोचा होगा कि उनके महान देश के महान वैभव को खत्म करने पर आमादा और बौद्धिक रूप से कंगाल लोग दुनिया की इस श्रेष्ठतम धरती को बेहूदा विचारों और जंगलीपन से भर आप्लावित कर देने के लिए एक दिन गली-गली डिंडिंम घोष करेंगे? और अगर उनसे किसी ने तर्क करने का प्रयास किया तो वे उसे देशद्रोही कहकर गाली देंगे?

    कोई चाहे कुछ करे, लेकिन चरैवेति-चरैवेति का घोष करने वाले इस देश में विवेकशीलता और परिवर्तनशीलता सदैव जीवित और जीवंत रहेगी। जैसा कि दयानंद सरस्वती ने कहा था : मनुष्य स्थावर वृक्ष नहीं, वह जंगम प्राणी है। चलना मनुष्य का धर्म है। जिसने इस धर्म को छोड़ दिया, वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है। समस्त देवता और राक्षस इसी धरती पर हैं। जो चलना छोड़ देते हैं, घृणाओं में जलते हैं। जो चलते रहते हैं, करुणा के सागर बने रहते हैं। मुनष्यता वहीं निवास करती है।

    Credits: Facebook posts of Tribhuvan

  • अजीब सी लड़कियां

    अजीब सी लड़कियां

    Mukesh Kumar Sinha[divider style=’full’]

    वो अजीब लड़की
    सिगरेट पीते हुए साँसे तेज अन्दर लेती थी
    चिहुँक कर आँखे बाहर आने लगती हैं पर खुद को संभालते हुए,
    खूब सारा धुंआ
    गोल छल्ले में बना कर उड़ा देती है !

    ठुमक कर कहती है
    देखो कैसे मैंने उसे उड़ा दिया धुंए में, बेचारा
    न मेरा रहा, न जिंदगी रही उसकी !

    फिर, नजरें बचा कर भीगती आँखों से कह देती
    उफ़, हिचकी आयी न,
    अन्दर तक चला गया धुंआ !
    अजीब ही है वो अजीब लड़की !

    वही अजीब लड़की, गियरवाली साइकिल को चलाते हुए
    फर्राटेदार उडाती है, और ठोक देती है
    मर्सिडीज का बोनट
    मुस्काते हुए कहती है सहेली से
    गलती से आँख भींचते हुए मैंने आगे देखा
    तो मुझे लगा, वही बैठा है उसमें !

    तभी तो जान से मारने का मन हुआ उसको
    सायकिल से मर्सिडीज का क़त्ल !
    अजीब लड़कियां ऐसे ही तो मारती हैं किसीको !
    है न !

    प्यार में पागल हो कर
    फिर मरने के बदले मारने का तरीका बताती हैं
    अजीब सी लड़कियां ….. !
    जिंदगी जीना जानती हैं
    शायद ये अजीब सी लड़कियां !

    अपने पहले ब्रेकअप के बाद
    दुसरे वाले बॉयफ्रेंड के उँगलियों को
    अपने मध्यमा और तर्जनी में दबाये
    खिलखिलाते हुए
    उसके मर्दानेपन को ढूंढते हुए कह उठती है
    यार उस जैसा नहीं तू !

    खूब सक्सेस का झंडा गाडती हैं,
    सीरियसनेस ऐसा कि भुल जाती है
    मम्मा पापा तक को
    पर अकेलेपन में चुपके से बिलख कर रोती हैं
    और अगर कोई सामने दिख जाए
    तो उसके आँखों में आँखे डाल
    कह उठती हैं, देखना तो कुछ चला गया है आँखों में
    ऐसी तो होती है ये अजीब सी लड़कियां !

    अजीब सी जिंदगी के
    अजीब अजीब पन्नों को
    अजब गजब पलों में रंगते हुए
    बेशक लगती हैं अलग ये अजीब सी लड़कियां
    पर धडकते धडकनों के साथ
    सीने पर रख कर अपना सर
    आँखे मूंदे, बेहद अपनी सी लगती हैं ये अजीब सी लड़कियां !!

  • धर्म रक्षा के नाम पर धार्मिक भीरूपन और मानसिक संकीर्णताएं

    धर्म रक्षा के नाम पर धार्मिक भीरूपन और मानसिक संकीर्णताएं

    Apoorva Pratap Singh

    [divider style=’full’]

    जब मैं पैदा हुई थी उससे कुछ समय पहले बाबरी तोड़ी गयी थी । राम एक नारा बन चुके थे । फिर भी घर के वातवरण के कारण मैं एक लंबे समय तक इस बात गर्व करती रही कि मेरे पास हजारों भगवान हैं फिर पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में अपने आप आया कि राम इन सबके बॉस हैं । यकीनन माहौल से आया, 5-7 साल की उम्र से मुझे समझ आ गया कि मेरी पार्टी बीजेपी है ।
    यह इसलिए बता रही हूँ कि घर में स्वस्थ माहौल होते हुए भी मस्तिष्क पर धर्माधारित राजनीति का कितना प्रभाव पड़ता है !

    अब आगे चलते हैं,
    मैंने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें मैंने कहा कि राम के लिए पज़ेसिव होने की ज़रूरत नहीं है ! कई आरोप लगे मेरे ऊपर, किसी मूर्ख ने कहा कि “मैं लड़की नहीं होती तो वो मुझको मेरी ही भाषा में समझाते” वामपंथी से ले के शातिर तक कहा गया !

    मैंने कहा कि हिन्दू धर्म जैसा कुछ भी नहीं बस यह हमको एक नाम देने की अवधारणा के अंतर्गत किया गया, ज्ञानियों को बहुत आपत्ति हुई ! अब यह पोस्ट इसलिए नहीं लिख रही हूं कि सफाई देनी है इसलिए लिख रही हूँ कि आप कुछ और नहीं सोच पा रहे हैं !

    सबसे पहली बात यह कि हमारी कई लोकसंस्कृतियाँ हैं, जिनमें कोई किसी को मानता है तो कोई किसी को । जब आप शादी के समय अपने घरों में दीवार पर कपड़े से ढक के देवता बनाते हैं तो वो आपके पित्रों होते हैं । जो सबके अलग हैं । यही से हमारी शुरुआत होती है कि हमारे सबसे बड़े शुभ काम हमारे पूर्वजों के बिना अधूरे हैं । यही हमारा बेस था । हम मूलत चमत्कार में विश्वास न करने वाले लोग हैं । हम अपने घर तक के अलग अलग देव रखने वाले लोग!

    हास्यास्पद है कि इसे हिंदुओं को ईश्वरविहीन करने कि साजिश बोल दिये लोग, मतलब बोलने से पहले सोचते भी है कि नहीं कि बस बोल देते हैं !
    आप चमत्कार को ही ईश्वर मानने लगे हैं क्या ? माफ कीजिये आप खुद के पतन को आमन्त्रित
    कर रहे हैं ।

    हम इसीलिए अलग लोग हैं कि हमारी कोई किताब हमको नहीं सिखाती कि क्या करने से हिन्दू है और क्या कर देंगे तो नहीं रहेंगे । हिन्दू सिर्फ एक टर्मिनोलोजी है जो हमको बांधने को इस्तेमाल हुई । हम श्रुतियों द्वारा परंपरा निभाने वाले लोग हैं । हम नास्तिकता को जगह देने वाले लोग ! हम अपने ही भिन्न दर्शनों में वाद स्थापित कर भेद बताने वाले लोग ! क्या बन गए हैं ? भगवा गमछादधारी भीरु !
    जब शिव के कंपटीशन में ब्रह्मा और विष्णु उतारे गए वहीं से बहुत कुछ बदल गया ।

    हम राजा को भगवान मानने वाले लोग !
    शैव यानि काशी और वैष्णव यानि अवध ! इनके जो भी राजा हुए उन्हें हमने साकार ईश्वर बना लिया ।

    बाद में राजारविवर्मा ने अपनी कल्पना शक्ति अनुसार चित्र बनाए ।

    हमें स्वतन्त्रता संग्राम में एकजुट करने के लिए तिलक ने गणेश पूजा पंडाल की शुरुआत की जिससे धर्म के आधार पर सही, लोग एक जगह एकजुट हों । तिलक के उस मंतव्य का परिस्थिति अनुसार जो कारण रहे वही आज हिन्दू कट्टरता के कारक की तरह गलत इस्तेमाल हो रहे हैं ।

    राम का जिस चालाकी से राजनीतिकरण कर दिया गया और जनता खुश हो गयी वो दुखद है । आप तर्क देंगे कि हमें धर्म बचाने को एकनिष्ठ आस्था की आवश्यकता है और राम उस के ध्व्जवाहक । अगर एक ध्वज नहीं हुआ तो कोई भी मुसलमान-ईसाई बना दिया जाएगा ।

    लेकिन धर्म है कहाँ आपका ? आस्था क्या होती है ? मूल क्या था आपका और आज आप क्या कर रहे हैं ? आप सत्यनारायन कथा के प्रचार मात्र को अपनी आस्था बनाए बैठे हैं ! उस कथा में कथा कहाँ है ? आप तो खुद ही अपनी मूल संस्कृति को क्षीण कर रहे हैं उसके बाद बक़ौल आपके आप संस्कृति भी बचाने की कोशिश करते हैं !!

    आस्था के नाम पर मुहम्मद साहब गधे पर बैठ चाँद के टुकड़े कर देते हैं और यीशु जिंदा हो उठते हैं । उपनिषदों, अध्यात्म पर विश्वास करने वाले हम, अब ऐसी ही कई आस्थाएं पाले बैठे हैं ।

    आपकी आस्था हर बार घायल हो जाती है जब भारत के किसी कोने में आपके मान्यता प्राप्त ईश्वर से उलट किसी को पूजा जाता है । जब बंगलोर में हिन्दी को साइन बोर्ड से हटाने की मांग आपको देश की संप्रभुता पर खतरा लगती है । मेरा प्रश्न इतना है कि पूरे देश की संप्रभुता आपके अनुसार क्यों तय होनी चाहिये ! जवाब बड़ा आसान है आपकी आस्था !!!

    आस्था व्यक्तिगत हो तभी तक ठीक है लेकिन जब इस आस्था का इस्तेमाल संस्कृति के विरुद्ध ही हो तब ? यहाँ की लोक संस्कृतियों को आपकी ही आस्था कुचलने लगे इतनी चालाकी से कि खुद हलाल होने वाले को ही समझ न आए तब ?

    मेरी आस्था इंसान को कुत्ता मानती हो और उसको पट्टे में बंद कर के रखना चाहे तो ? किसी की आस्था अनुसार सारा हिसाब महरला में अल्लाह करेंगे तो यहाँ अदालत बनाने का औचित्य ही क्या है ?

    आप कहते हैं कि कोई भी एक भगवान न हुआ तो कोई भी कलमा पढ़ा के अल्लाह हु अकबर बुलवा के गोलियां चलवा देगा ! अब इसका उत्तर आपका ही प्रिय शब्द आस्था देगा ! क्या ऐसा ही कहीं लिखा हुआ है कि जब कोई एक ईश्वर को माने तभी वो बचेगा ? क्या यह आप नकल नहीं कर रहे ?

    मेरे लिए आस्था जो सशंकित, भयभीत हो वो आस्था नही है । आपकी आस्था इतनी डरी हुई क्यूँ है ? क्या हम आज एक स्वतंत्र चेतना वाला समाज जिसकी शुरुआत हमारे संस्कृति पुरोधाओं ने की थी, उससे भटक नहीं गए । अगर आस्था इतनी बड़ी चीज़ है जो भटकने नहीं देती तो यह आस्था ‘स्वचेतना’ पर क्यूँ नहीं रखनी चाहिए ! स्वचेतना केवल नास्तिक हो जाना नही होता यह आस्तिकों में भी भरपूर होती है ।

    जब आप कहते हैं कि षडयंत्र के तहत हमको इंफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स से भरा गया तो अब आप क्या कर रहे हैं सिवाय एक भयभीत समाज बनाने के । आपका पुनरुत्थान इतना सिमटा संकीर्ण क्यों है !

    जब मैं कहती हूँ कि उपनिषद हर बात पर सवाल करते हैं तो आपको यह क्यों लगता है कि आपका ईश्वर और आस्था खतरे में है और मैं आपको मूर्ख कह रही हूँ !! जबकि मैंने तो कुछ कहा ही नहीं, आप इतने डरे हुए क्यू हैं !
    आप खुद समझ लीजिये कि आप अपनी जड़ से दूर निकल आए हैं !

    हम पर आक्रमण हुए, हम हारते रहे फिर भी हम बचे हुए हैं । आपके अनुसार हमारी धार्मिकता के कारण, पर जहां तक मैं देख पाती हूँ वहाँ तक हमारी आध्यात्मिक चेतना ने हमें बचाए रखा ।

    उस चेतना का ह्रास आपकी यह पज़ेसिवनेस कर रही है, जो आपके ईश्वर के राजनीतिकरण से निकली है ! अनुयायी ही धर्म के संहारक होते हैं और भक्त ही ईश्वर के हत्यारे, आप इन्हीं में से कुछ है !

    संस्कृति विशाल है धर्म मात्र उसका एक बिन्दु ! लेकिन आप उस बिन्दु को इतना बड़ा कर चुके हैं कि आप अपनी पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को खुद ही वैचारिक रूप से पंगु बना रहे हैं, पश्चिम की नकल उसका ही एक हिस्सा !
    आप स्वतंत्र है किसी को भी ईश्वर मानो, हमारी संस्कृति किसी को अल्लाह तक नहीं रोकती ! किन्तु आपकी आस्था कब फेसबुक पर किसी को गरिया दे इसलिए उसकी नाक में पगहैया बांध के रखिए !

    सबसे अंतिम बात जब सुप्रीम कोर्ट अपने तमाम फैसलों में हिन्दू को धर्म नहीं शैली कहती है तो आपको कोई दिक्कत नहीं । जैसे हाल में एक फैसले में कहा था कि धर्म का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में नहीं हो सकता लेकिन हिन्दू इसमें अपवाद है क्योंकि वो धर्म नहीं शैली है !! तब आपने हल्ला क्यों नहीं काटा कि यह हमको धर्म मानने से इंकार क्यों कर रहे हैं, हमारी आस्था से खेल रहे हैं !!! हमारी स्वनाम्धन्य हिन्दू पार्टी क्यों नहीं कहती कि हमारे ईश्वर खतरे में है अब !!

    अंतिम बात यह कि मैंने किसी को मूर्ख नहीं कहा, भटका हुआ अब जा के कह रही हूँ कि आप इतने भटक गए हैं कि आपको सब कुछ खुद के खिलाफ साजिश दिखने लगी है। जबकि साज़िश आपकी खुद की रचाई हुई है।

  • चन्द्र सिंह गढ़वाली :: स्वाधीनता आन्दोलन में सांप्रदायिक सौहार्द की मिशाल पैदा करने वाला का एक नायक

    चन्द्र सिंह गढ़वाली :: स्वाधीनता आन्दोलन में सांप्रदायिक सौहार्द की मिशाल पैदा करने वाला का एक नायक

    विद्या भूषण रावत

    अक्टूबर १ को पेशावर काण्ड के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की पुण्य तिथि थी लेकिन सतही तौर पर याद करने के अलावा उनके बारे में बहुत कुछ जानकारी न तो उपलब्ध है और न ही उनके जीते जी उन्हें सत्ताधारी इज्जत दे पाए क्योंकि चन्द्र सिंह हमेशा ही सत्ताधारियो से टकराए. वह आर्य समाजी थे और  गाँधी से भी बहुत प्रभावित थे लेकिन उनके विचार और एक्शन में वह इन दोनों ही विचारो से बहुत आगे थे . चन्द्र सिंह का जन्म १८९१ में गढ़वाल में हुआ था और २१ वर्ष के आयु में वह फौज में भर्ती हो गए. पहाड़ो में उन्होंने अथाह गरीबी देखी और इसी कारण अधिकांश युवा फौज में भर्ती होते थे . चन्द्र सिंह गढ़वाली ने द्वितीय विश्वयुध में ब्रिटिश सेना के की और से भाग लिया. चन्द्र सिंह गढ़वाली की कहानी आज के सांप्रदायिक दौर में एक मिशाल है जिसे बार बार पढना और सुनाया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की खुशियों को संप्रदायिक सौहार्द की खातिर कर दिया . आज जब हमारी सेनाओं और पुलिस प्रशाशन का सम्प्रदयिककरण हो रहा है तब देश के सैनिक, प्रशासक और पत्रकार भी ये पढ़े के क्यों इस देश की एकता और मजबूती के लिए चन्द्र सिंह की कहानी पढना जरुरी है और ये भी के पेशावर का विद्रोह केवल एक झटके में किया गया सैन्य विद्रोह नहीं था अपितु इसके पीछे चन्द्र सिंह की राजनैतिक समझ थी जो यह मानती थी के अंग्रेजी राज भारत में हिन्दू मुस्लिम विभाजन कर हमेशा के लिए शाशन करना चाहता था .

    दुःख इस बात का है के इतिहासकारों और नेताओं ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के साथ अन्याय किया . उनके इतने बड़े विद्रोह को जिसके फल्वरूप गढ़वाल रायफल के जाबांज देशभक्त सिपाहियों ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और अपने हथियार डाल दिए ताकि एक और जलियांवाला न हो/ चन्द्र सिंह गढ़वाली की वीरता को न तो चारण इतिहासकारों ने स्थान दिया न ही सत्ताधारियो ने क्योंकि उनके विचार बहुत क्रन्तिकारी थे. इस सन्दर्भ में हमें भारतीय साहित्य के पुरोधा राहुल संकृत्यायन का ऋणी होना पड़ेगा जिन्होंने १९५५ में चन्द्र सिंह गढ़वाली की आत्मकथा लिखी जो किताबमहल प्रकाशन ने छपी. महत्वपूर्ण बात यह के इस पुस्तक में जिस बारीकी से राहुल जी ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के जीवन के बारे में बात की है वो बहुत महत्वपूर्ण है खासकर इस सन्दर्भ में जब तथाकथित इतिहासकारों की नज़र से इतिहास गायब हो तो हमें ओरल हिस्ट्री का सहारा लेना पड़ेगा .

    मैंने बचपन में चन्द्र सिंह गढ़वाली के बारे में सुना था क्योंकि वो मेरे ननिहाल के पास के थे . लेकिन मुझे उनकी महत्ता या महानता का अंदाज केवल तब हुआ जब मैंने राहुल जी द्वारा लिखित उनकी जीवनी पढ़ी और यही से मेरा ये गहन सोच है के घुम्म्क्कड़ लोग अगर चाहे तो न केवल बहुत बड़े साहित्य की रचना कर सकते हैं अपितु इतिहास को भी खोज निकालेंगे जिन्हें भारत के सन्दर्भ में ब्राह्मणवादी साहित्यकारों और नेताओं ने छुपाया है.

    क्या यह शर्मनाक नहीं के गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे नेताओं ने जीवन पर्यंत चन्द्र सिंह गढ़वाली को न तो सम्मान दिया और न ही उन्हें उनके योगदान के लिए कोई आधिकारिक मदद. आज़ादी के बाद भी कुछ सालो तक उनको अपराधी ही माना जाता रहा .  चन्द्र सिंह आर्य समाज से प्रभावित थे और गाँधी जी की सभाओं में भी जाते थे लेकिन वो सेना में होने के बावजूद भी लोकतान्त्रिक थे.

    चन्द्र सिंह गढ़वाली की ऐतिहासिक भूमिका के लिए हमें ये समझना पड़ेगा के पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम में पठानों के इलाके में खान अब्दुल गफ्फार खान जिन्हें बादशाह खान के नाम से भी जाना जाता है, कांग्रेस और गाँधी जी के साथ मिलकर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे . पठानों ने इस अवसर पर कांग्रेस का साथ दिया था और ये बात सब जगह पता चल चुकी थी के अंग्रेज पठानों के इस विद्रोह को कुचल देना चाहते थे और उसके लिए उन्हें ऐसी बहादुर सैन्य टुकड़ी चाहिए थी जो बिलकुल उस इलाके न हो ताकि  सैनिक बिना किसी चिंता के बेशर्मी से विद्रोह को कुचल सके. ये निति तो अंग्रेजो के बाद भी सभी सरकारे करते हैं के किसी भी स्थान पर जन विद्रोह को दबाने के लिए वहा से दूर के सैनिको को बुलाया जाता है ताकि उनका कोई सहानुभूति स्थानीय लोगो के साथ न हो  और वो निर्दयिता से अपना काम करें . गढ़वालियो को पहाड़ से पेशावर या एबोटाबाद भेजने के पीछे अंग्रेजो की यही रणनीति थी के वे पठान विद्रोह को बेरहमी से कुचल देंगे लेकिन चन्द्र सिंह की जाति धर्म से ऊपर उठकर जन असंतोष को राजनितिक समझ आज के दौर में और भी प्रासंगिक है .

    १९३० में पेशावर की उस घटना का चिंत्रण जो राहुल जी की पुस्तक में विस्तार पूर्वक है :

    “२३ अप्रेल १९३० को कंपनी के ओहदेदारों और सिपाहियों को हुक्म हुआ : ‘ पांच मिनट के अन्दर फालिन हो जाए’. राइफ़ले, दूसरे सामान, और फौजी मोटरे सामने तैयार रखी गयी थी. रसौइयो को एक घंटे के अन्दर रोटी पका देने का हुकुम दिया गया था . ७ बजे से ८ बजे तक यह काम होते रहे. ‘ सुबह कप्तान रिकेट ने आदेश दिया : गढ़वाली बटालियन एडवांस’. गढ़वाली बटालियन आगे बढ़ो.

    राष्ट्रीय झंडे के चारो और वीर पठान खड़े थे . मंच पर खड़े होकर एक सिख नेता ने कभी पश्तो में और कभी उर्दू में जोशीला व्याख्यान देना शुरू किया . लोगो से आवाज आती..नारे तकबीर : अल्लाह हो अकबर, महात्मा गाँधी की जय.

    कप्तान रिकेट ने कहाँ , ‘ तुम लोग गोली से मारे जाओगे , नहीं तो गोली से मारे जाओगे. पठान जनता टस से मस नहीं हुई . गोली से खेलना वह नहीं भूली थी. अब कप्तान रिकेट ने हुक्म दिया : गढ़वाली तीन राउंड फायर. चन्द्र सिंह रिकेट के बाएं खड़े थे . उन्होंने जोर से बोला : गढ़वाली सीज फायर. गढ़वाली गोली मत चलाओ . हुकुम को सुनते ही गढ़वालियो ने अपनी अपनी राइफ़ले जमीन पर कड़ी कर दी . इसे कहने के आवश्यकता नहीं के गढ़वालियो ने देश के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखला दी . एक गढ़वाली सैनिक उदे सिंह ने अपनी बन्दूक को एक पठान के हाथ में देकर कहा : लो भाई, अब आप लोग हमको गोली मार दे .

    जिस वक़्त पलटन १ और २ के सभी सिपाहियों ने अपने अपनी राइफ़ले जमीन पर रख दी, उसी समय नंबर ३ पलटन के कमांडर लुथी सिंह को यह सब नहीं देखा गया और उसने आगे बढ़कर फायर करने का हुकुम दिया और स्वयं से गोली भी चलाई. लेकिन पलटन ३ के लोग भी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए . कप्तान रिकेट ने लाल लाल आंखे करके चन्द्र सिंह की और देख कर कहा : क्यों, यह क्या बात है ? चन्द्र सिंह ने कहा : ये सारे लोग निहत्थे हैं . निहत्थो पर गोली कैसे चलाये

    इसके बाद वहा अंग्रेजो ने अपनी प्लाटून को भेजा जिसने लोगो पर फायरिंग कर दी जिसमे कई लोग मारे गए. सब जगह अफरा तफरी हो गयी और कप्तान रिकेट की भी मौत हो गयी . चन्द्र सिंह और उनके साथियो ने भी खुद को किसी तरह से बचाया क्योंकि अव्यवस्था में तो किसी को पता नहीं होता के कौन दोस्त हे ओर कौन दुश्मन.

    ( चन्द्र सिंह गढ़वाली : राहुल संकृत्यायन की पुस्तक से )

    पेशावर में अफरातफरी मच गयी . किसी तरह से सभी विद्रोही सिपाही बच कर अपनी बैरकों में आये और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया . चन्द्र सिंह को एबटाबाद जेल में भेजा गया. वह लगभग १४ वर्षो तक जेल में रहे . पूरे विद्रोह की खास बात यह थी के ये देश के पुर्णतः विचारिक था, देशभक्ति से ओतप्रोत था और अपने ही देश के निहत्थे नागरिको पर गोली चलाने को गलत मानता था. चन्द्र सिंह और उनके साथियो के लिए पेशावर जैसे जगह बिलकुल नयी थे, न ही उनके पास भागने के कोई रस्ते थे क्योंकि सभी पहाड़ो से आये थे इसलिए न तो भाषा और न ही खान पान उनके पसंद. वे सभी फौज के सिपाही थे और उस वक़्त अधिकांश लोग जो पढ़ लिख नहीं पाते थे फौज में ही जाते थे . लेकिन इन सबके बावजूद वे सांप्रदायिक सौहार्द के लिए इतनी बड़ी मिशाल पैदा करेंगे इसको समझना चाहिए. इससे भी अधिक ये चिंता के हमे ‘निहत्थो’ पर गोली नहीं चलानी है . आज के फौज और पुलिस के अधिकारियों और निति निर्माताओं के लिए ये बहुत बड़ा सबक है जो मुसलमानों को दुश्मन समझते हैं . जब पहाड़ो से आये लोग जहाँ मुस्लिम उपस्थिति न के बराबर थी और जहाँ ब्रिटिश भी नहीं पहुँच पाए वो लोग सेना में जाकर समय मिलने पर अपने देश के लोगो पे गोली चलाने से इनकार कर दे और वो भी उस स्थान पर जो कही से भी उनका नहीं था, न ही उनके समर्थन में प्रदर्शन करने वाले लोग वहा होते, ये बात इतिहास में बहुत कम मिलेगी लेकिन चालाक इतिहासकारों ने इस बात को हाशिये पे डाला.

    आज़ादी के बाद चन्द्र सिंह भटकते रहे . सभी साथी जिन्हें कालापानी की सजा हुयी वे न्याय की आश में रहे लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला.  चन्द्र सिंह रिहाई के बाद सामाजिक राजनैतिक जीवन में सक्रिय हो गए लेकिन वह कभी चुनाव नहीं जीत पाए . कांग्रेस उनकी चाहत नहीं थी और कम्युनिस्ट पार्टी के टिकेट पर वो चुनाव लडे परन्तु जनता का भरोषा नहीं जीत पाए आखिर जनता उन्हें चाहे क्यों ? उनके क्रन्तिकारी विचारो को अगर सुनेंगे तो पता चलेगा के जातिवादी जनता क्यों उन्हें चाहेगी ? उत्तराखंड में दलितों के प्रश्न पर उन्होंने जो कहा वो समझने वाला है और शायद जातिवादी पार्टियों और नेताओं को वो रास नहीं आया .

    सह्श्रब्दियो से जिस जाति व्यवस्था ने हमारे देश की चौथाई मानवता को इस हीन् अवस्था में पहुँचाया, वह तब तक उन्हें उठने नहीं देगी जब तक उस व्यवस्था में भीतर आग नहीं लगा दी जाती और यह आग शिक्षा और बेहतर शिक्षा व्यवस्था से ही लगाईं जा सकती है .

     

    उत्तराखंड के अन्दर दलितों के अधिकारों के विषय में चन्द्र सिंह गढ़वाली के विचार

    जमींदारी प्रथा ख़त्म कर बंजर और जंगलो के जमीन उनको देनी चाहिए

    नौकरियो में अनुपात के मुताबिक उनको जगह मिले

    उनकी पढाई के लिए शिक्षा निशुल्क हो

    अस्सेम्बलियो और कौंसिलो में उनके लिए अनुपात के मुताबिक सीटे दी जाए

    उद्योगों में उन्हें प्रथम स्थान मिले

    (राहुल जी की पुस्तक वीर चन्द्र सिंह गड्वाली) से साभार.

    अब आप समझ सकते हैं इतने क्रन्तिकारी व्यक्ति को उत्तराखंड की ‘देवभूमि’ में दलितों के अधिकार की बात करेगा तो पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त या उसके बाद के सवर्ण नेता क्यों सम्मान करेंगे ? चन्द्र सिंह गढ़वाली जिन्दगी भर आर्थिक बदहाली में रहे . उनका ये दर्द हमेशा था के पेशावर काण्ड के क्रांतिकारियों को उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार ने कभी सम्मान नहीं दिया .

    २० सितम्बर १९५४ को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक पत्र भेजा जिसमे उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति का विवरण दिया था . उनकी झोपड़ी वर्षा से टूट चुकी थी और आमदनी के नाम पर उन्हें १६ रुपैये पेंशन मिलती थी. उनके ऊपर १४००० रुपैये का कर्ज था. खाने पीने के बर्तन भी नहीं थे . उन्होंने सरकार से अपनी मदद की अपील की . लगभग एक वर्ष बाद २५ जुलाई १९५५ को प्रदेश सरकार ने एक पत्र भेजकर ‘ख़ुशी’ जाहिर की के उन्हें आजीवन १४ रुपैये महीने पेंशन मिला करेगी.

    ( राहुल संकृत्यायन की पुस्तक से वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली से )

    शर्म की बात  यह के ६५ वर्ष की उम्र में देश के लिए इतनी कुर्बानियों के बाद भी और व्यक्तिगत तौर पर पत्र लिखने पर भी सरकार ने उन्हें १४ रुपैये लायक ही समझा ये दर्शाता है के भारत में स्वाधीनता के बाद गैर गांधीवादी विद्रोह के नायको के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया गया .अक्टूबर १, १९७९ में उनका निधन हो गया . आज अस्मिताओ के इस युग में चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम लेकर उनको स्मारकों में सीमित करने का प्रयास है लेकिन उनके विचारों से तो सामंतवादी जातिवादी सांप्रदायिक नेताओं और पार्टियों को कोई लाभ नहीं होने वाला क्योंकि उनके विचारो और पेशावर कांड में उनकी ऐतिहासिक भूमिका के लिए वो आज भी याद किये जाने चाहिए . साप्रदायिक सौहार्द की मजबूती के लिए पेशावर के उनके विद्रोह को आज भी याद करना जरुरी है .

     

  • संतुलन

    संतुलन

    Hayat Singh


    यह क्षोभ, विमोह, हताशा और निराशा
    दिन-महीने या साल विशेष से नहीं, बल्कि
    कई दशकों से पल रही
    असन्तुष्टियों का उबाल थी
    यह बात ज्ञात भी सभी को थी, लेकिन अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार
    कोई साइकिल में सवार था
    कोई हाथी में
    कोई नुक्कड़ के खोखे पर
    लड़ा रहा था पंजा

    राष्टीय से अंतर्राष्टीय की होड़ में
    गाँव-गुठार को भूल गए
    मार्क्स-लेनिन की रट के चलते
    गाँधी-अम्बेडकर से दूरी बना लिए

    गीता,कुरान और बाइबिल
    चलना था तीनों को साथ लेकर
    उलझे रह गए
    किसी एक विशेष में

    ध्यान रहे
    सनद के लिए लिखी जा रही
    आखिरी पंक्तियों के लिए
    लिखी गयी हैं भूमिका में ऊपर की पंक्तियाँ

    पत्तियों का रंग हरा ही रहने दो
    फूलों को गुलाबी रहने दो
    सब कुछ गेरुआ हो जाने पर
    संतुलन बिगड़ जाएगा प्रकृति का।
    सावधान!
    सावधान!
    सावधान!
    सावधानी हटेगी तो
    फिर से दुर्घटना घटेगी।

  • जीवन मझदार

    जीवन मझदार

    एक भी नाव नहीं है मेरे पास
    लकड़ी की या कागज़ की
    और तुम कहते हो
    कि दो नावों पर सवार हूँ मैं

    देख ही रहे हो
    ३२ साल से एक नदी को
    पार नहीं कर पा रहा हूँ
    बीच धार में चिल्ला रहा हूँ
    मुझे बचा लो
    कोई आता भी नहीं बचाने अब किसी को

    कितनी नावों में कितनी बार
    बैठने की हसरत लिए
    मर नहीं जाऊंगा एक दिन

    वैसे अच्छा ही हुआ कोई नाव नहीं है
    क्या पता उसमे एक छेद होता
    और डूब जाता मैं
    या नाव ही उलट जाती .

    अब बहुत अँधेरा है पहले से अधिक
    बहुत तेज़ आंधी
    खून खून चारों तरफ दीवारों पर

    सच कहता हूँ
    अब दम घुटने लगा है
    आपस में ही उलझ गए हम
    एक दूसरे को दुश्मन मान बैठे हैं
    अब तो लगता है
    यह नाव भी अब नाव कहाँ है
    जब बुलेट ट्रेन चलने की बात हो रही है
    मुल्क में

    एक भी नाव नहीं है
    एक भी सायकिल नहीं
    नंगे पाव् ही चलना है
    रेत में
    फिर क्या कहना
    कि पाँव जल रहे हैं मेरे
    कृपया मेरे इस त्याग को दर्ज कर लिया जाये इतिहास में