बूचड़खाने –

25-30  साल पहले तक तो किसानों के लिए पशु-पालन कोई मुश्किल काम न था , पशुओं के लिए बड़े चारागाह छोड़े जाते थे, उसी में तालाब भी खुदवाएं जाते थे। पशु चरते, तालाब कीचड़ आदि में आराम फरमाते। दुधारू पशु समय पर अपने खूंटे तक भी पहुँचना समझते थे। किसान ने बाजारों से दूरी बनाई हुई थी। आपसी ताल मेल और निर्भरता इतनी बेहतर थी की मशीनरी आदि की जरुरत भी महसूस न होती थी।  खाने के लिए पैदा किया , पैदा कर के खाया यही क्रम चलता रहता था, पैदा भी जरूरत से बहुत ज्यादा नहीं किया जाता था।

मुद्रा के बिना  लोगों का काम आराम से चलता रहता था , इन सब में खुद के लिए भी खूब समय बच जाता था लेकिन जिस समाज में बाज़ार  मेहनतकश और उत्पादक वर्ग के शोषण करने के लिए तैयार किया गया हो तो वह वर्ग इसकी चपेट में कैसे न आता। आपको शिक्षा, कपडे, भोजन , चिकित्सा , सुविधाएं आदि सब बाजार से खरीदना है। अगर यही सब आधुनिकता है तो किसान वर्ग क्यों न होड़ करता, आधुनिकता में वह क्यों न फँसता !

आज की तारीख में घास के मैदान नहीं है, तालाब नाममात्र के बचे है। पशुपालन एक आदमी के दिन रात का काम है उन्हें पानी पिलाना होता है, चारे की व्यवस्था करनी होती है, दूध समय पर दुहना होता है आप किसी भी काम में नागा नहीं कर सकते। खल चौकर की व्यवस्था भी बाहर से ही करनी है। किसानों को खेती से पैसे हाथों हाथ नहीं मिलते उसके लिए फसल पकने व उसके बिकने तक का इंतजार करना होता है। दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए वह दुधारू पशुओं पर निर्भर है जिनका दूध बेच कर उसे आय होती रहती है। पशुओं का और उसके परिवार के छोटे मोटे खर्च निकलते रहते है। मोटा मोटा इतना समझ लीजिए आज की तारीख में अगर आप 30-40 हजार की नौकरी करते है, शहर में रहते है आप एक गाय या भैंस जो दुधारू भी हो के रहने-खाने का खर्च नहीं उठा सकते।

किसान भी जो पशु पुराने हो जाते है, दूध नहीं दे पाते , बीमार हो जाते है उन्हें निकालते रहना होता है। पशुओं की संख्या भी बढ़ती है जगह के हिसाब से उनकी संख्या भी मेंटेन करके रखनी होती है। कई बार अचानक किसी पारिवारिक जरूरत के लिए पशु बेचने होते है।

अब आप बताइये एक किसान बूढ़े बीमार पशुओं का क्या करेगा, पैसे के बिना नए पशु कहाँ से खरीदेगा। ऐसा तो है नहीं की आप वापिस पुराने तौर तरीकों पर लौटने के लिए किसानों की मदद कर रहे हो। आपकी कोरी धार्मिक भावुकता, चूतियापे में तो पशुओ के रेट गिर जाते है, उन्हें ग्राहक नहीं मिलते लेकिन पहले से ही आधुनिक होने की छटपटाहट , बाजार से ताल मेल करने के सहर्ष में जुटे किसानों की इन क़दमों  से जो कमर टूटती है, मानसिक उत्पीड़न होता है वह क्या करे !

Tagged . Bookmark the permalink.