Author: संपादक मंडल

  • डा० उदित राज की आरक्षण मुद्दे पर बातचीत

    डा० उदित राज की आरक्षण मुद्दे पर बातचीत

    Dr Udit Raj

    डा० उदित राज की आरक्षण मुद्दे पर यह बातचीत दिसंबर 2009 की है। आप आरक्षित अनारक्षित किसी भी वर्ग के हों, मेरा सुझाव यह है कि आप अपनी पसंद नापसंद से ऊपर उठकर इस बातचीत को सुनें। आरक्षण के संदर्भ में आपकी सोच संभवतः परिवर्तित हो या नई समझ-दिशा मिले।
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    सामाजिक यायावर

  • शाकाहार मांसाहार बनाम ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत

    शाकाहार मांसाहार बनाम ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत

    ब्राह्मणवाद का विरोध हो, दलित समर्थन हो या भारत की माओवादी क्रांतिकारिता हो। शाकाहार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विरोध उभयनिष्ठ तत्व है। बहुत ऐसी घटनाएं हैं जिनमें शाकाहारी लोगों को माओवादियों द्वारा मांस खाने के लिए बाध्य किया गया या धोखे से मांस खिलाया गया। मैं नहीं जानता कि मानसिकता की शुरुआत कब व कैसे हुई, लेकिन शाकाहार को बहुतेरे दलित चिंतक ब्राह्मणवाद से जोड़कर देखते हैं तथा मांसाहार को ब्राह्मणवाद के विरोध के रूप में देखते हैं। इस धींगामुस्ती के लिए तर्क खोज कर लाते हैं, अच्छी खासी ऊर्जा का अपव्यय करते हैं। समाज में वैसे ही लोगों की मान्यताओं के कारण बहुत सारी खाइयां हैं। मांसाहार शाकाहार वाली खाई भी पैदा कर दी जाती है। आइए मांसाहार शाकाहार से संबंधित कुछ तथ्यों को देखते समझते हैं।

    आधुनिक भारतीय परिवेश में गरीब लोगों के लिए शाकाहार सरल, सुलभ व सस्ता है:

    • वे लोग जो जंगलों में रहते हैं:

      भारत में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो जंगलों में रहते हैं। जो लोग जंगलों में रहते हैं उनको भी पशु उपलब्ध नहीं हैं। जो समाज जंगलों में रहते हैं उनके लिए भी पशुओं की उपलब्धता कम होने के कारणों में पशुओं की प्रजातियों का विलुप्त होना, पशुओं की संख्या कम होते जाना व जंगलात के कानून हैं। जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोगों को जंगल में रहने के बावजूद पौष्टिक भोजन मिल पाना संभव नहीं रहा। पेड़ों की छालें, पत्तियां व पौधों को पानी में उबालकर खाते पीते रहे। चावल का विभिन्न प्रकार से प्रयोग प्रमुख खाद्य रहा।

    • वे लोग जो जंगलों में नहीं रहते हैं (मुख्यधारा के लोग):

      मांसाहार के लिए पशु चाहिए या जलचर चाहिए। पशुओं के लिए चारगाह व पानी स्रोत चाहिए। जलचरों के लिए तो पानी स्रोत चाहिए ही चाहिए। एक समय था जब गांवों में तालाब होते थे, छोटी-छोटी सरिताएं होतीं थीं। मछली अपने आप उत्पादित होती थी। कोई भी गया तालाब में घुसा, मछली निकाल लाया और पका कर खा लिया। अनेक प्रकार के छोटे-मोटे पशु सहजता से उपलब्ध रहते थे। कुछ नहीं तो खेतों में चूहे तो मिल ही जाते थे। अब तो रासायनिक खादों व कीटनाशकों के प्रयोग के कारण व इनके प्रयोग से जमीन कड़ी हो जाने के कारण खेतों में चूहों व अन्य जानवरों की उपलब्धता बहुत तेजी से घटी है।

      पहले लोग जानवरों से खेती करते थे। जानवरों की मृत्यु होती रहती थी जिनका प्रयोग अछूत माने जाने वाले लोगों को करने के दे दिया जाता था। किसी गांव की अछुत बस्ती में जाते ही सुअर दिखने शुरू हो जाते थे, अछूत लोग खूब सुअर पालते थे, जो नालियों में लोटते रहते थे, कुछ नहीं तो गंदगी खा करके ही मस्त रहते थे, कुलमिलाकर सुअर अपने खाने का जुगाड़ खुद ही कर लिया करता था। भैंस, सुअर इत्यादि जैसे जानवर अछूतों के भोजन का अभिन्न अंग थे।

      अब बहुत कुछ बदल चुका है। स्थितियां परिस्थितियां व मानसिकताएं बदलीं हैं। कितने दलित लोग ऐसे हैं जो नालियों में लोटने वाले सुअर को खाना चाहते हैं। लोग अब जानवरों के मरने का इंतजार नहीं करते हैं, जिस जानवर का भी दूध कम हुआ उमर बढ़ी उसको स्लाटर हाउस में बेच कर पैसे कमा लिए। बछड़ों को तो बैल बनने ही नहीं दिया जाता, क्योंकि खेती में बैलों का प्रयोग किया ही नहीं जाता, बछड़ों को तब तक घर में रखा जाता है जब तक उसको पैदा करने वाली गाय का दूध निकालने के लिए बछड़े की जरूरत रहती है। यह जरूरत खतम होते ही बछड़े को स्लाटर हाउसों को बेच दिया जाता है।

      यदि गांवों के तालाबों में अछूतों का प्रवेश निषेध रहा तो आसपास की किसी छोटी बड़ी नदी में चले गए जलचरों का जुगाड़ कर लिया। अब या नदियां सूख गई हैं या इतनी अधिक प्रदूषित हो चुकी हैं कि जलचरों की संख्या नगण्य हो चुकी है। तालाब बचे नहीं, नदियां बचीं नहीं, बचे भी हैं तो उनमें मछलियों का उत्पादन व्यवसायिक हो चुका है।

    यह एक कटु सत्य है कि दलितों के लिए मांस के जो स्रोत पहले सहजता से उपलब्ध थे वे अब उपलब्ध नहीं हैं। अपवाद इलाकों की बात अलग है। यहां अपवादों की बात हो भी नहीं रही।

    गरीबों के लिए आधुनिक भारत में मांसाहार उत्पादन बनाम शाकाहर उत्पादन:

    मांसाहार उत्पादन शाकाहार उत्पादन की तुलना में अधिक खर्चीला है। जिनके पास दाल चावल उगाने की जमीन नहीं वे पशुओं के उत्पादन के लिए जानवरों के लिए चारागाह कहां से लाएंगें। दूसरी बात यह कि मुख्यधारा वाले इलाकों में अब चारागाह बचे ही कहां हैं। तालाब बचे नहीं तो पशुओं को पानी कहां से मिलेगा। पशु तो हैंडपंप से पानी निकाल पी नहीं सकते हैं। अब पशुओं का उत्पादन करना पड़ता है, स्वतः पशुओं का उत्पादन स्वतः होने वाली सामाजिक जीवन शैली अब नहीं रही। वर्ष भर में मांस के लिए एक परिवार को जितने पशु चाहिए, उनके लिए जितने बड़े चारगाह की जरूरत होगी उससे बहुत कम जमीन में वर्ष भर की जरूरत का अनाज उगाया जा सकता है। मांसाहार की तुलना में शाकाहार उत्पादन में बहुत कम पानी की आवशयकता होती है।

    मान लीजिए कि यदि मुर्गी भी पाली जाए तो मुर्गी दाना खाती है। यदि मुर्गी को दालें व अनाज देने लायक क्षमता है तो स्वयं भी तो उस अनाज का प्रयोग किया जा सकता है। यह तो केवल मांसाहार करने के लिए गरीबी में भी अतिरिक्त निवेश करना हुआ। शाकाहार ही तो सरल सुलभ हुआ।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मांसाहार वाले भी रोटी, चावल इत्यादि खाते हैं। ऐसा तो है नहीं कि केवल मांस खाकर ही जीवित रहते हैं। रोटी चावल इत्यादि अनाजों का इंतजाम तो कहीं न कहीं से किसी न किसी जुगाड़ से करते ही हैं।

    गरीब से गरीब आदमी भी अपनी झोपड़ी में लौकी, तरोई, कद्दू इत्यादि उगा सकता है। सिर्फ एक पौधा ही पूरे परिवार को पूरे मौसम सप्लाई कर सकता है। घर में प्रयोग किए जाने वाले पानी में से ही पौधों को दो चार लोटा पानी दिया जा सकता है। जरूरी तत्वों वाली सब्जियों का उत्पादन झोपड़ी में ही किया जा सकता है वह भी बिना अतिरिक्त खर्च के। अब रही बात रोटी व चावल की तो मांसाहार करते समय रोटी चावल का जुगाड़ जहां से करता है, वहीं से करे।

    मेरा सिर्फ यह कहना है कि आधुनिक परिवेश में भारत में गरीब आदमी के लिए मांसाहार की तुलना में शाकाहार सरल व सुलभ विकल्प है। 

    शाकाहार बनाम मांसाहार:

    दुनिया में ऐसे बहुत देश हैं, ऐसे क्षेत्र हैं जहां शाकाहार से मनुष्य को भोजन उपलब्ध करा पाना संभव नहीं। यूरोप में ऐसे अनेक देश हैं जहां वर्ष में महीनों ऐसी स्थिति रहती है कि शाकाहार का उत्पादन संभव नहीं। ऐसे बहुत देश व क्षेत्र हैं जहां जमीन कम पानी अधिक है। दुनिया में ऐसे कई देश हैं जहां कृषि के लिए उपजाऊ जमीन नहीं। यदि सार्वभौमिकता के साथ विचार किया जाए तो दुनिया में केवल शाकाहार पर निर्भरता संभव नहीं। भिन्न-भिन्न भोगोलिक परिस्थितयों के आधार पर वहां के लोगों ने खानपान, रहनसहन व आचार विचार की परंपराएं बनाईं व स्थापित की। यही सांस्कृतिक विभिन्नता है।

    • क्या केवल मांसाहार संभव है:

      अपवाद क्षेत्रों व अपवाद लोगों को यदि छोड़ दिया जाए तो केवल मांसाहार संभव नहीं। दुनिया में ऐसे अपवाद लोग ही हैं जो पूरा जीवन केवल और केवल मांस खाकर रहते हों। जो लोग मांस खाते हैं वे लोग भी बहुत मात्रा में पास्ता खाते हैं, तोफू खाते हैं, दालें खाते हैं, दूध की बनी वस्तुएं खाते हैं, चीज खाते हैं, मक्खन खाते हैं, सब्जियां खाते हैं, ब्रेड खाते हैं, फल खाते हैं, मेवे खाते हैं, अन्य शाकाहारी वस्तुएं खाते हैं। ऐसे लोग विरले ही होंगे जो मांस व मछली के अतिरिक्त किसी प्रकार का शाकाहारी भोजन न करते हों।

    • क्या केवल शाकाहर संभव है:

      बिलकुल संभव है। हममें आपमें से बहुत लोग ऐसे हैं जिन्होंने जीवन में कभी मांसाहार न किया होगा। दरअसल मानव के क्रमिक विकास की प्रक्रिया में मानव बनने तक की प्रक्रिया में मानव बनने तक सभी पूर्वज शाकाहारी ही रहे थे। मानव भी शाकाहारी था, लेकिन मौसम परिवर्तन व भौगोलिक परिस्थितयों के कारण केवल शाकाहार पर निर्भर रह पाना संभव नहीं था इसलिए मनुष्य ने शाकाहार के साथ-साथ मांसाहार का प्रयोग भी करना शुरू किया। मानव शरीर शाकाहार के लिए अधिक उपयुक्त है।

    चलते-चलते:

    मैं शाकाहारी हूँ इसके बावजूद मैं मांसाहार को गलत नहीं मानता। आप मेरी थाली में मांस रखकर मेरे साथ एक ही थाली में भोजन कर सकते हैं। यदि आपके मांस का शोरबा बहता हुआ मेरी दाल या सब्जी में मिल जाता है तब भी मुझे आपके साथ एक ही थाली में भोजन करने में समस्या नहीं। मेरे लिए शाकाहार या मांसाहार  किसी व्यक्ति, धर्म, समुदाय, समाज, सभ्यता या देश का मूल्यांकन करने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। शाकाहार मांसाहार के आधार पर मूल्यांकन करने को मैं निहायत ही वाहियात बात मानता हूँ।

    यह लेख मांसाहार का विरोध करने के लिए नहीं है क्योंकि यह एक तथ्य है कि दुनिया के सभी मनुष्यों का पेट शाकाहार व मांसाहार से ही हो सकता है। हजारों वर्षों पहले मनुष्य ने शाकाहारी होने के बावजूद मांसाहार करना सीखा तब भी सर्वाइव करना ही कारण था।

    यह लेख ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत करने के विरुद्ध तथ्यात्मक आलेख है। यह लेख यह भी बताता है कि आधुनिक भारत में गरीबों के लिए शाकाहारी होना मांसाहारी होने की तुलना में अधिक सरल व सुलभ है।

  • बंदर को पूर्वज मानते ही जाति व्यवस्था, संस्कृति का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिक-श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाती है

    बंदर को पूर्वज मानते ही जाति व्यवस्था, संस्कृति का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिक-श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाती है

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मंत्री जी का बयान तथा समाज का वैज्ञानिक दृष्टिकोण:

    मेरा अनुमान है कि मंत्री जी का भाव दूसरा था, मंत्री जी को यह लगता है कि मनुष्य सीधे आसमान से टपका था। मंत्री जी का बंदर को मनुष्य का पूर्वज मानने से विरोध इसलिए है क्योंकि यदि बंदर को मनुष्य का पूर्वज मान लिया जाएगा तो ईश्वर की काल्पनिक अवधारणाओं, पौराणिक कथाओं व पुराणों का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिकता पूरी तरह से खतरे में पड़ जाएगी। ब्राह्मण मुंह से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य कही और से व शूद्र पैरों से पैदा हुआ मानने वाली जाति व्यवस्था का आधार छिन्न भिन्न हो जाएगा।

    स्वर्ग नर्क की अवधारणा खतरे में पड़ जाएगी। स्वर्ग नर्क, देवी देवताओं, देवराज इत्यादि की आधार पर गढ़ी गईं सैकड़ों हजारों कहानियों व सांस्कृतिक तामझाम के आमूलचूल अस्तित्व पर खतरा आ जाएगा। पुष्पक विमान, सूक्ष्म शल्य चिकित्सा व अन्य वैज्ञानिक दावों का वजूद पूरी तरह से ही खतम हो जाएगा।

    किसी कागज में चार लकीरें खींच कर, ग्रहों का एक घर से दूसरे घर में जाना। ग्रहों के इस प्रकार एक घर से दूसरे घर में आने-जाने का किसी मानव के जीवन के उतार चढ़ाव यहां तक कि वह किससे शादी करेगा, कब सेक्स करेगा, कब खाना खाएगा, कब मूत्र-त्याग करेगा, कब शौच क्रिया करेगा, शौच क्रिया करते समय किस-किस पशु-पक्षी से मुलाकात होगी, किस दिन किस समय क्या खाएगा, इत्यादि-इत्यादि की गणना तक कर ली जाती है। सैकड़ों-हजारों वर्षों से चली आ रही इन सब फर्जी वैज्ञानिकता, विशेषज्ञता, शुचिता व ईश्वरीय संबंधों इत्यादि के फर्जीवाड़े के तामझाम पर सवाल उठना शुरू हो जाता है।

    मैं यह नहीं मानता कि मंत्री जी ने इस प्रकार का बयान किसी धूर्तता पूर्ण सोची समझी साजिश के कारण दिया। मेरा मानना है कि सैकड़ों-हजारों वर्षों से यह सब हमारे आपके दिलोदिमाग में बहुत गहरे पैठ गया है। हम कितना भी विज्ञान पढ़ लें। वैसे भी हम विज्ञान नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं। जिसे हम पढ़ना कहते हैं उस पढ़ने का मतलब होता है रट लेना। रट कर परीक्षा की उत्तर पुस्तिका में उल्टी करके लिख देना।

    लोग IIT के पढ़े होंगे, कम्प्यूटर प्रयोग करते होंगे, स्मार्ट फोन प्रयोग करते होंगे। जल, जंगल, जमीन, आसमान, पशु-पक्षियों, रसायनों व अंतरिक्ष विज्ञान को समझने का दावा करते होंगे। खुद समझने का दावा न भी कर पाते हों तो भी दूसरों के किए गए दावों से खुश होते हैं।

    अपने बच्चों के लिए छोटी उम्र से ही IIT में भेजने की योजना बनाते हैं। छोटी कक्षाओं से ही बच्चों के मन-मस्तिष्क में भर देते हैं कि IIT पहुंचना है। यहां मैं IIT का नाम केवल इसलिए ले रहा हूं क्योंकि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में न होने के बावजूद भारत में सबसे बेहतर संस्थान माने जाते हैं। पटाक से नौकरी लगती है। चूंकि अंधों में काने राजा हैं ही तो ऊंची सरकारी नौकरियां भी पटाक से लगतीं हैं।

    आप इन पढ़े लिखे लोगों की जीवन शैली देखिए। इनके घरों में छोटे-मोटे मंदिर तक मिलेंगे। पूजा पाठ करेंगे व बच्चों से करवाएंगे। वह भी इसलिए क्योंकि बच्चे को अच्छे नंबर मिलें, बच्चे को परीक्षाओं में सफलता मिले, बच्चे को मनचाही नौकरी मिले।

    ऐसा ही बहुत कुछ और भी।

    एक तरफ तो विज्ञान की किताबें रटा रहे हैं ताकि नौकरी मिले, ऐशो-आराम वाली तरक्की मिले। दूसरी तरफ बच्चे के दिलोदिमाग में कूट-कूट कर भर रहे हैं कि देवी-देवता होते हैं जो सबकुछ निर्धारित करते हैं। किसी खास तरीके से कुछ कर्मकांड करने से जीवन में यह सफलता मिलती है, वह मिलता है। बच्चा भले ही IIT या IISc से विज्ञान या तकनीक में PhD कर ले। लेकिन उसकी मानसिकता तो वही रहेगी जैसी बचपन से वह अपने इर्द-गिर्द देखता आया है।

    यही कारण है अपवादों को छोड़कर अपने समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लोग होना बहुत मुश्किल होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना अलग बात है, वैज्ञानिक पदों, विज्ञान के शिक्षकों, विज्ञान या तकनीक के विषयों की प्रोफेसरी इत्यादि की नौकरियां करना बिलकुल अलग बात है। जिस समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव हो, उस समाज के मंत्री जी ने जो बयान दिया है। वह इस कारण भी हो सकता है कि मंत्री जी को सच में ही ऐसा लगता हो। यह जरूरी नहीं कि मंत्री जी के बयान के पीछे कोई सोची-समझी धूर्तता ही हो।

    यह कल्पना करने में क्या जाता है कि हम पुष्पक विमान बनाते थे, हम सूक्ष्म शल्य-चिकित्सा करते थे, हम वानर-मनुष्य के पसीने से मछली को मुंहे से गर्भवती कराकर वानर-मनुष्य पैदा करवाते थे। हम पहले विज्ञान में बहुत ही आगे थे, फिर कुछ ऐसा हुआ कि सबकुछ अचानक तहस-नहस हो गया, केवल इन वैज्ञानिक उपलब्धियों की बात करने वाले ग्रंथ किसी तरह बचे रह गए, जिससे हमको मालूम पड़ता है कि हम कितने विकसित व महान थे। हमारे काल्पनिक ऋषि मनीषी बहुत महान थे, पूरी सृष्टि व ब्रह्मांण की चिंदी-चिंदी समझ रखी थी। सबकुछ वैदिक-संस्कृत जैसी गूढ़ भाषा के गूढ़ मंत्रों में दिया गया है। दुनिया का सारा ज्ञान इन मत्रों में समाया है, सभी मंत्रों में गूढ़ व सूक्ष्म विज्ञान छुपा है, बस समझने वाली बात है।

    लीजिए कर लीजिए जो बन पड़े। वैज्ञानिकता गई तेल लेने। स्वंभू विज्ञान, स्वयंभू वैज्ञानिकता, स्वयंभू वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

    मेरी बात कि बंदर मनुष्य के पूर्वज नहीं थे:

    मैं लंबे समय तक यही मानता रहा कि बंदर ही मनुष्य के पूर्वज हैं। जीव विज्ञान की किताबों में यही पढ़ाया गया था। इधर कुछ वर्षों में कुछ गंभीर व विश्वविख्यात वैज्ञानिकों की कुछ पुस्तकें हाथ लगीं। मालूम पड़ा कि क्रमिक विकास की प्रक्रिया में बंदर मनुष्य के पूर्वज नहीं थे वरन् बंदर व मनुष्य के पूर्वज एक ही थे। मालूम पड़ा कि एप, चिम्पाजी व बंदर में अंतर होता है। मालूम पड़ा कि एप मनुष्य के पूर्वज थे। मालूम पड़ा कि चिम्पाजी मनुष्य के पूर्वज थे। बंदर मनुष्य के पूर्वज न होकर सहोदर थे, समान पूर्वजों से निकली एक दूसरी शाखा।

    हमारे समाज की शिक्षा-प्रणाली ऐसी है कि हमें गंभीर स्वाध्याय करने की जरूरत नहीं रहती। हमारा लक्ष्य केवल परीक्षाओं में नंबर पाना होता है। आपको विज्ञान, गणित या किसी अन्य विषय की समझ हो, आप बहुत अधिक अध्ययन करते हों यह भी संभव है कि आपको अपने विद्यालय में विषय के शिक्षकों से अधिक आता हो लेकिन यदि आप परीक्षा में नंबर नहीं ला पाते हैं। यदि आप नौकरी नहीं पा पाते हैं तो आपको कुछ नहीं आता। परीक्षा में नंबर व नौकरी ही आपकी योग्यता के मानदंड हैं।

    अपने समाज में अधिकतर लोग ऐसे होते हैं जिन्होंने कभी भी गंभीर व विस्तृत स्वाध्याय नहीं किया होता है। विषय वस्तु को गहराई व वस्तुनिष्ठता से समझने जानने के गंभीर प्रयास की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपनी या अपनी मानसिकता को पसंद आने वाला या मुफीद बैठने वाला कुछ पढ़ पुढ़ लेते हैं, फिर उसी को आधार बना कर अपनी तार्किक क्षमता व स्तर के घालमेल करते हुए अपने भीतर एक अनुकूलता तैयार कर लेते हैं, फिर उसी अनुकूलता से देखते समझते व दिखाते समझाते हैं। ऐसा करते-करते अनुकूलता की पैठ इतनी हो जाती है कि इन लोगों को यह लगने लगता है कि ये सबकुछ समझते हैं। दुनिया की सारी थियरीज, सारे सिद्धांत, सारी अवधारणाएं सभी कुछ समझे हुए हैं या समझने की क्षमता रखते हैं। रटना, मान लेना, पहले से ही रटे हुए व माने हुए को तर्क से साबित करना तथा माने हुए को अधिक पुख्ता करना …. इसी प्रकार के तथाकथित विद्वानों व ज्ञानियों की समझ, ज्ञान, विद्वता, चिंतन, विचाशीलता इत्यादि का कुल यही जमा खाता होता है।

    चूंकि ऐसे लोगों की विद्वता, ज्ञान, समझ इत्यादि सभी कुछ शब्दों के रटाव व मानने तथा रटे हुए शब्दों व मानने के तार्किक झोलझाल तक सीमित रहता है; इसलिए इन लोगों की जीवन शैली, जीवन के प्रति सोच, जीवन के प्रति मानसिकता आदि में बेहद खोखलापन व विरोधाभास रहता है। लेकिन तार्किक झोलझाल वाली विद्वता, ज्ञान व समझ का अहंकार इतना अधिक होता है कि विरोधाभास व खोखलापन दिखाई भी नहीं देता है।

    ऐसे लोग मानसिक, वैचारिक व भावनात्मक रूप से विकृत व कुंठित होते हैं क्योंकि इनका जीवन की सार्थकता, समाज व समाधान से कोई ईमानदार व प्रतिबद्ध लेना देना नहीं होता। उल्टे ये लोग इन सब तत्वों को मूर्खता मानते हैं। काश ये लोग तार्किक क्षमता का बेहतर प्रयोग कर पाते। लेकिन शायद इनकी तार्किक क्षमता भी सूक्ष्मता के स्तर की नहीं ही होती है, अन्यथा सूक्ष्मता देख पाने, स्वीकार कर पाने व उसको जी पाने की क्षमता भी होती।

    इतना ही नहीं बल्कि दुनिया के लोग जो अध्ययन करते हैं, आविष्कार करते हैं, मौलिक शोध करते हैं, एक एक बिंदु की सूक्ष्मता को समझने के लिए सालों लगाते हैं, यहां तक कि अपना जीवन तक लगाते हैं, कुछ लोग तो अपने ऊपर ही जीवंत प्रयोग तक करके देखते हैं, बार बार असफल होने के बावजूद लगे रहते हैं …. इत्यादि लोग अयोग्य होते हैं, नासमझ होते हैं मूर्ख होते हैं। ये नासमझ व मूर्ख लोग बिना मतलब निरंतर इतनी मेहनत करते हैं, धैर्य रखकर समझने का प्रयास करते हैं। इतनी मेहनत व धैर्य इत्यादि की बजाय यदि ये लोग भी अपनी पसंद/नापसंद के आधार पर तर्क/वितर्क/कुतर्क के साथ इस अनुच्छेद के ऊपर वाले बाक्स में तीन अनुच्छेदों में बताए गए विद्वानों व ज्ञानियों की तरह कुछ पढ़ पुढ़ लेते, कुछ रट रटा लेते तो दुनिया की सारी थियरीज, सारे सिद्धांत, सारी अवधारणाएं सबकुछ अपने आप ही समझ कर विद्वान व ज्ञानी हो जाते।  

    चलते-चलते:

    भारत के एक मंत्री जी ने संभवतः एक बयान दिया कि मनुष्यों के पूर्वज बंदर नहीं थे। मैंने भी कई पोस्टें लिखीं जिनमें कहा कि बंदर मनुष्य का पूर्वज नहीं था। मेरी बात व मंत्री जी की बयान के पीछे के भावों व कारणों में बहुत अधिक अंतर है।

    वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संभावना का हनन, खाचों को प्राथमिकता देने के कारण ही होता है। यह खांचा भले ही ब्राह्मणवाद हो या ब्राह्मणवाद का विरोध या किसी राजनैतिक दल या विचार का समर्थन या विरोध। सामाजिक समाधान व वास्तविक शिक्षा बेहद गूढ़, सूक्ष्म व दृष्टि वाली बात होती है।  

     

  • मोदी जी की पकोड़ों वाली बात का समर्थन करता हूँ : लेकिन बिना गंभीरता, दृढ़ता व दूरदर्शिता के केवल बयान देने भर से कुछ नहीं होने वाला

    मोदी जी की पकोड़ों वाली बात का समर्थन करता हूँ : लेकिन बिना गंभीरता, दृढ़ता व दूरदर्शिता के केवल बयान देने भर से कुछ नहीं होने वाला

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    सुनने में आया है कि मोदी जी ने लोगों को पकोड़े बनाकर बेचने या इस जैसे ही रोजगारों की ओर रुचि लेने का सुझाव दिया है, प्रोत्साहित किया है। या ऐसा ही कुछ। बड़ा हंगामा पड़ा हुआ है फेसबुक, व्हाट्सअप व अन्य सोशल मीडिया पर। इस बयान की खिल्लियां उड़ाई जा रहीं हैं। लोगबाग अपने-अपने राजनैतिक खांचों के आधार पर बयान के समर्थन विरोध में जुटे पड़े हैं।

    Narendra Modi


    मेरा मानना है कि मोदी जी की पकोड़ों वाली बात सूक्ष्मदृष्टि वाली बात है। भारतीय समाज के लिए लाभकारी बात है। लेकिन केवल बयान देने भर से काम नहीं चलेगा। देश के प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी को कुछ दूरदर्शी व ठोस निर्णय भी लेने होगें। इन निर्णयों के लिए मोदी जी को उसी इच्छाशक्ति व लोगों की चीख-चिल्लाहट पर बिलकुल ध्यान न देने जैसी दृढ़ता का पालन करना होगा जैसे कि उन्होंने नोटबंदी में दिखाया था। नोटबंदी से तो खैर कोई लाभ नहीं था, लेकिन पकोड़े बात के विस्तार से बेशक भारतीय समाज को बहुत लाभ होगा। लेकिन पहली व अंतिम शर्त यह है कि मोदी जी ऐसा कर पाएं, तब।

    नौकरी:

    सरकारी नौकरी या प्राइवेट नौकरी कभी भी किसी समाज के लिए समाधान दे ही नहीं सकती है। यह संभव ही नहीं कि सभी को सरकारी नौकरी दी जा सके। सभी को निजी संस्थान नौकरी दे सकें। स्वावलंबन व स्वावलंबन से जुड़े व्यापार व बाजार किसी समाज के आर्थिक विकास की मूलभूत शर्त हैं।

    भारत में शिक्षा, योग्यता, मेधाविता व प्रतिभा के मानदंड केवल स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में चलनी वाली पुस्तकों को रटने तक ही पूरी तरह प्रतिष्ठित कर दिए गए हैं। ऐसा शुरू से ही रहा है, पहले पोथियां रटीं जातीं थीं, जो ब्राह्मण पुरोहित गुरु जितनी पोथियां रट कर शब्दशः दोहरा ले, वह उतना ही अधिक महान योग्य व प्रतिष्ठित।

    यह सारी शिक्षा, योग्यता, मेधाविता व प्रतिभा इत्यादि का अंतिम लक्ष्य सरकारी या गैरसरकारी नौकरी पाना ही रहा। किसी भी देश समाज में हो, सरकारी नौकरियां हमेशा ही लोगों की संख्या से बहुत कम होती हैं। फिर भारत जैसे देशों में तो केवल नौकरियां देने के लिए ही जरूरत बिलकुल भी न होने के बावजूद अनेक विभागों व अनेक पदों का सृजन किया गया। शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य सरकारी नौकरी पाना रहा।

    पीवी नरसिंहाराव जी ने बाजार खोला तो गैरसरकारी नौकरियां भी पैदा हुईं। समय के साथ परिवर्तन हुए, गैरसरकारी नौकरियों में ऊंचे वेतन मिलने लगे। जो लोग सरकारी नौकरी न प्राप्त कर पाते वे ऊंचे वेतन वाली गैरसरकारी नौकरियों की ओर जाने लगे।

    लेकिन सरकारी नौकरियों के प्रति भयंकर आकर्षण आजतक व्याप्त है। सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण खतम होते ही नौकरियों के प्रति आकर्षण स्वतः खतम होने लगेगा। तब ऐसा समय आएगा जब मोदी जी की पकोड़ों वाली बात की गहराई लोगों को समझ में आ पाएगी। तब तक यह बात भी एक जुमला ही बनकर रह जाएगी।

    सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण के मुख्य कारण हैं। सरकारी कर्मचारियों व नौकरशाहों को भारतीय समाज का मालिक होना, सार्वजनिक संपत्तियों यहां तक कि आम लोगों के जीवन पर इन लोगों का निरंकुश अधिकार होना। जब तक ऐसा रहेगा, तब तक न दहेज बंद होगा, न हिंसा, न भ्रष्टाचार, न गैरजिम्मेदारानापन (मोदी जी चाहें तो हर महीने नोटबंदी लागू करते रहें)। 

    लोगों की सोच बदलनी होगी कि नौकरी करने वाला महान नहीं होता। अभी यह माना जाता है कि जिसने कोई परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी पा ली है वह योग्य है, प्रतिभावान है, मेधावी है। जबकि नौकरी मिलने का मानदंड या तो कुछ किताबों को रटना होता है या भ्रष्टाचार।

    कोई पकोड़े क्यों बेचे:

    कोई पकोड़े बेचकर भले ही करोड़पति हो जाए लेकिन एक अदना सा सरकारी अधिकारी उसको सड़कछाप कुत्ते की तरह नचा सकता है। पकोड़े बेचना वाला वर्षों तक प्रतिदिन रातदिन मेहनत करके अपने व्यापार को स्थापित करेगा, एक मुकाम तक पहुंचाएगा। वहीं एक सरकारी अधिकारी जो कुछ किताबें रटकर नौकरी पाया होता है वह जब चाहे तब व्यापारी को सड़कछाप कुत्ते की तरह नचा सकता है, जब मन हो तब नचा सकता है, जब तक मन हो तब तक नचा सकता है।

    आदमी मेहनत भी करे, रिस्क भी ले, जीवन भी खपाए और कुत्ता भी बनना पड़े। कुत्ता न बनना हो तो भ्रष्टाचार के नेक्सस का अंग बने। इतनी माथापच्ची से बेहतर कि सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करते हुए सकून के साथ जीवन गुजारा जाए।

    जाति-व्यवस्था का दंश:

    हजारों वर्षों से जाति व्यवस्था के कारण समाज की अधिसंख्य जनसंख्या को सार्वजनिक संपत्तियों पर अधिकार नहीं रहे। कागज में भारत के लोकतांत्रिक होने के बावजूद, वास्तव में भारत का सरकारी तंत्र लोकतांत्रिक न होकर सामंती है। सरकारी कर्मचारियों व नौकरशाही को निरंकुश सामंती अधिकार हैं। अधिकारी स्वयं को सेवक न मानकर, अभिभावक मानने के दंभ में जीते हैं। सामंती सोच का स्तर यह है जो स्वयं को अभिभावक मानता है उसको बहुत अच्छा व जिम्मेदार नौकरशाह माना जाता है, बाकायदा पुरस्कार मिलते हैं। 

    मोदी जी क्या करें:

    सरकारी नौकरियों में काम नहीं लेकिन भारीभरकम वेतन व सुविधाएं। विभागों व पदों के आधार पर भ्रष्टाचार का महासागर बहता रहता है, जवाबदेही बिलकुल नहीं। कोई क्यों पकोड़े तले…. ।

    पहले योग्यता, प्रतिभा, मेधाविता, परिश्रम इत्यादि के प्रति मिथक दूर कीजिए, कंडीशनिंग दूर कीजिए, वाहियात व बेबुनियाद प्रतिष्ठापनाएं हटाइए। सरकारी कर्मचारियों व नौकरशाहों के अनियंत्रित अधिकार बहुत कम कीजिए, अधिकारों का चरित्र लोकतांत्रिक कीजिए, आम आदमी के प्रति पूरी तरह से जवाबदेह बनाइए। सरकारी तंत्र के पूरे ढांचे को लोकतांत्रिक बनाइए व आम लोगों के प्रति जिम्मेदार व सम्मानपूर्ण बनाइए। इसके बाद ही पकोड़ों वाली बात का वास्तव में कोई सार्थक मायने होगा। लोग स्वयं ही पकोड़े तलने लगेंगे।

    बात सिर्फ मोदी जी की दृढ़ता व ईच्छाशक्ति की है।


     

  • स्त्री के प्रति हमारा नजरिया और शुचिता का आडंबर

    स्त्री के प्रति हमारा नजरिया और शुचिता का आडंबर

    Vivek “सामाजिक यायावर” 
    मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक से

    स्त्री को माहवारी झेलना पड़ता है, स्त्री गर्भवती होती है, स्त्री अपने गर्भ में बच्चे को नौ महीने पालती है और एक दिन स्त्री बच्चे को अपने यौनांग से धरती पर अवतरित कराती है। जीवन देने की क्षमता के कारण स्त्री के आंतरिक शरीर की बनावट पुरुष से भिन्न होती है। इसलिए पुरुष व स्त्री दोनो को ही स्त्री शरीर के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, यह संवेदनशीलता स्त्री शरीर के प्रति समुचित जानकारी के बिना नहीं आ सकती है।

    देश की अधिकतर महिलाएं किसी न किसी स्त्री रोग से पीड़ित रहती है और अपने ही परिवार में संकोचवश, लज्जावश कुछ कह नहीं पाती हैं क्योंकि परंपरा में उनको यह बताया गया है कि स्त्री व स्त्री के गुप्तांग इतने दूषित होते हैं कि उन अंगों का नाम लेना भी टुच्चापन है। बिचारी महिला आजीवन शारीरिक कष्ट केवल इस कारण भोगती है क्योंकि स्त्री गुप्तांगों का नाम लेना ओछापन, अभद्रता व कुसंस्कार है। पुरुष को स्त्री अंगों की जानकारी नहीं होती और उसे बताया जाता है कि स्त्री दूषित है, स्त्री अंग दूषित हैं इसलिए वह स्त्री के प्रति संवेदनशील भी नहीं हो पाता।

    यकीन मानिए यदि हम यौनांगों को दूषित मानने की बजाय शरीर का महत्वपूर्ण अंग मानना शुरु कर दें, तो हमें गुप्तरोगों के हाशमी दवाखानों, गुप्तरोगों के जैन क्लीनिकों, सुहागरात की रात में सैकड़ों रुपए की कीमत का पलंगतोड़-पान खाने व दूध का गिलास पीने आदि की जरूरत नहीं रहेगी।

    संस्कृति, संस्कार, संभ्रांतता व भद्रता आदि के कारण के यौनांगों का नाम लेने को दूषित मानने की परंपरा के कारण बच्चे से लेकर वृद्ध तक अपनी शारीरिक परेशानियों को खुल कर व्यक्त न करने वाले हम लोगों के सामाजिक मूल्यों को जीने के दावों की, तो हम जानते हैं कि – हमने अपवाद छोड़ हर गाली स्त्री अंगों व स्त्री के रिश्तेदारों तक ही सीमित कर रखी है। हम दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बनने का दैवीय सौभाग्य प्राप्त करने जा रहे हैं। हम दलित महिलाओं को नंगा करके बीच चौराहे घुमा देते हैं, भले ही महिला के यौनांग का नाम अपने मुंह से न लेते हों। हम छोटी-छोटी बच्चियों का बलात्कार करके उनके नंगे शरीर के चीथड़े चौराहों में छोड़ देते हैं ताकि हम लोग फोटो लेकर सोशल साइट्स में साझा कर सकें और महिला शोषण पर अपने क्रांतिकारी विचार रख सकें।

    हमारे समाज में सामाजिक शुचिता को जीना बड़ा आसान है। शुचिता के लिए कर्मशील होना जरूरी नहीं, शब्दों के आडंबर को जीना जरूरी है। अपने रिश्तेदारों या परिवार की किसी बच्ची का यौन शोषण करने वाला भी शाब्दिक ढकोसलेबाजी करके खुद को आजीवन शुचिता का ठेकेदार साबित करता रह सकता है जबकि एक दिल का साफ आदमी केवल इस कारण चरित्रहीन घोषित किया जा सकता है क्योंकि वह लोगों के सामने स्थानीय भाषा में स्त्री गुप्तागों का नाम ले लेता है।

    हमारे देश में शुचिता का ढोंग इस कदर जिया जाता है कि स्त्री अंगों का नाम लेना भी गुनाह माना जाता है जबकि ऐसे हजारों सच्चे किस्से हैं जिनमें पिता अपनी पुत्री से बलात्कार करता है, भाई अपनी बहन से बलात्कार करता है, न केवल बलात्कार करते हैं बल्कि स्थायी रूप से उनको अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। भारत में लड़कियों की कुल जनसंख्या की आधी से बहुत अधिक संख्या, किसी न किसी प्रकार का यौन-शोषण झेलती है और अधिकतर अपने परिवार के सदस्यों या निकट रिश्तेदारों से ही झेलती है। लेकिन कभी अपना विरोध नहीं दर्ज करा पाती है। बहुत सारे ऐसे ढोंगी लोग होगें जिन्होने किसी न किसी न बच्ची का किसी न किसी प्रकार से यौन शोषण किया होगा, लेकिन समाज के सामने शुचिता के ठेकेदार व लंबरदार बने घूमते हैं।

    क्या हमें संस्कृति व संस्कारों के दिखावों व ढोंगों को बंद नहीं कर देना चाहिए? हमें अपने वास्तविक चरित्र, सोच व मानसिकता के यथार्थ को स्वीकार करते हुए स्वयं में बदलाव का प्रयास करते हुए स्त्री के प्रति हमें वास्तव में संवेदनशील होने का प्रयास नहीं करना चाहिए। समाज की नैतिकता या संस्कृति की समृद्धि शाब्दिक ढोंगों से नहीं होती लोगों के कर्म व वास्तविक चरित्र से होती है।

  • भारतीय जाति-व्यवस्था ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने वाली सामाजिक-दासत्व व्यवस्था है

    भारतीय जाति-व्यवस्था ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने वाली सामाजिक-दासत्व व्यवस्था है

    Vivek “सामाजिक यायावर” 

    भारतीय जाति-व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था न होकर, श्रम को तिरस्कृत मानने वाली सामाजिक दासत्व को स्थापित करने वाली व्यवस्था थी। दरअसल जाति-व्यवस्था कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था हो ही नहीं सकती थी। वास्तव में जाति-व्यवस्था समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व श्रमशीलता को तिरस्कृत करने की मानसिकता का आधारभूत पोषक तत्व है। भारतीय जाति-व्यवस्था के नियम, विधियां व मान्यतायें आदि ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने के आधार पर स्थापित थे, और आज भी कमोवेश वैसे ही है। शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों को उपेक्षित व तिरस्कृत जातियों में रखा गया, उनके सामाजिक संपत्तियों पर अधिकार नगण्य थे, व्यक्तिगत संपत्ति रखने के, शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बनने के सहज, सरल व समान अधिकार नहीं थे। समाज की मुख्यधारा में उनका कोई स्थान नहीं था। वे शारीरिक श्रम करने वाले, मुख्य सामाजिक व्यवस्था से अलग तिरस्कृत सामाजिक-दास व्यवस्था में रहने के लिए  विवश सामाजिक-गुलाम थे।

    मानव समाज का विकास और सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं आदि का उन्मूलन व समाधान आदि  बिना वैज्ञानिक दृष्टि आधार के नहीं प्राप्त किया जा सकता है।  किसी सामाजिक व्यवस्था की मूल अवधारणा की प्रामाणिकता को उसके विभिन्न तत्वों के आधार पर ही विश्लेषित किया जा सकता है। अवधारणा की प्रामाणिकता को जबरन साबित करने के लिए  सुविधानुसार मनचाहे तत्वों व तथ्यों को ही प्रमाणिक मान लेने से वास्तविक तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं हो पाता है। शोषक वर्ग द्वारा प्रायोजित व लिखित ग्रंथों में जो लिखा है उसको ही प्रमाणित मानने के स्थान पर यदि व्यावहारिकता व तर्कों के आधार पर यह स्वीकारते हुए कि मानव व मानव समाज समय के साथ सीखता है और परिपक्वता की ओर गति करता है, तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखने लगता है कि जाति-व्यवस्था ईश्वरीय व प्राकृतिक व्यवस्था न होकर, मनुष्य-निर्मित बहुत ही सोची समझी, चतुराई व कपट के साथ स्थापित सामाजिक दासत्व की कपटी व्यवस्था थी।

    जाति-व्यवस्था के मूलभूत-कारकों को समझने के लिए , हमें जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल्यांकन करना पड़ेगा। जाति-व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था मानने का मतलब है कि बहुत सारे ऊलजुलूल, अव्यावहारिक व मनगढ़ंत तथ्यों को, भलीभांति जानते हुए कि वे नितांत ही अपुष्ट व निराधार तथ्य हैं, स्वीकारना पड़ेगा।

    वर्तमान पीढ़ी ही भविष्य की पीढ़ियों की समझ का आधार होती है। हम जो बीज आज बोते हैं, जिन व्यवस्थाओं का निर्माण करते हैं, उनके आधार पर भविष्य की पीढ़ियां अपने जीवन में सामाजिक-अनुकूलन स्वीकारती हैं। इसलिए   जाति-व्यवस्था रूपी सामाजिक-दासत्व की व्यवस्था के स्थापना काल में ऐसे नियम व विधियाँ बनाइ गईं; ऐसा साहित्य व इतिहास आदि लिखा व प्रायोजित किया गया कि सामाजिक-दासत्व की यह व्यवस्था शोषक वर्ग द्वारा स्थापित व्यवस्था के स्थान पर ईश्वरीय प्रावधान व मनुष्य के पूर्व-जन्मों के कर्मों की नियति-व्यवस्था प्रमाणित हो।

    धूर्ततापूर्ण चतुराई के साथ प्रायोजित व स्थापित सामाजिक-दासत्व व्यवस्था को समय के साथ पूर्व में रही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था मान लिया गया। चूंकि समाज के बहुसंख्यक ‘अवर्णों’ के पास संपत्ति, शिक्षा, ज्ञान व आत्मसम्मान के अधिकार नहीं थे, और बहुसंख्यक अवर्णों के परिश्रम के उत्पाद पर अल्पसंख्यक सवर्णों का अधिकार होता था, लालच व स्वार्थ के कारण सवर्णों ने जाति-व्यवस्था को और मजबूत ही किया और कालांतर में यह व्यवस्था पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित दैवीय प्रयोजन व व्यवस्था के रूप में स्वीकृत व प्रमाणित मान ली गई।

    जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में कमी का आना

    जाति-व्यवस्था की वीभत्सता व घिनौनापन महापुरुष बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर, महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी, अंग्रेजों आदि के कारण कुछ औंस कम हुई। फिर भारत की राजनैतिक आजादी के बाद समाज के सबसे दबे-कुचले शोषित वर्ग के लिए  शिक्षा व सरकारी नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण के कारण, कुछ आर्थिक व राजनैतिक शक्ति मिलने से स्थितियां पहले से बेहतर हुईं। जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में जो कुछ अंतर अभी आ रहे हैं, उसके तीन प्रमुख कारण हैं। जिनके परिणामस्वरूप, शोषक समाज को शोषित वर्ग के साथ अपने व्यवहारों में दिखावटी तौर पर ही सही लेकिन कुछ अंतर, न चाहते हुए भी करने के लिए  विवश होना पड़ा।

    एक- संवैधानिक आरक्षण के कारण शोषित समाज के लोगों की बढ़ती आर्थिक व राजनैतिक शक्ति। 

    दो- शिक्षा व ज्ञान के अवसरों के कारण बढ़ती जागरूकता।

    तीन- विकसित देशों में रहकर उच्चशिक्षा ग्रहण करने वाले सवर्णों में से ऐसे ईमानदार मानवीय व सामाजिक सोच के लोग जिनकी समझ में आ गया कि जाति-व्यवस्था दैवीय प्रावधान न होकर सामाजिक दासत्व की व्यवस्था है – का भारत के शोषित समाज के उत्थान के लिए  काम करने का प्रयत्न करना। भले ही ऐसे लोगों का प्रतिशत नगण्य हो।

    इन तीन कारकों के कारण शोषित समाज की शक्ति व दावेदारी मुख्य रूप से बढ़ी और जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में कुछ कमी आई।


    यह लेख मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर पुस्तक से लिया गया है।


  • पौराणिक मनगढ़ंत दैवीय कथाएं व वैदिक-काल की तथाकथित महानता बनाम मनुष्य की कर्मशीलता

    पौराणिक मनगढ़ंत दैवीय कथाएं व वैदिक-काल की तथाकथित महानता बनाम मनुष्य की कर्मशीलता

    हर सभ्यता व धर्म की अपनी पौराणिक कथायें होती हैं, जो काल्पनिक होती हैं। सभ्यता के लोग काल्पनिक कहानियों को सच मानकर अपनी सभ्यता की गति अवरुद्ध कर देते हैं कभी-कभी तो गति का यह ठहराव उन लोगों को हिंसक तक बना बना देता है। किसी भी सभ्यता या धर्म की अधिकतर पौराणिक कथायें, उस सभ्यता के लोगों के मानसिक अनुगमन व भावनात्मक आस्था के अनुकूलन की स्थापना के लिए ही लिखी जाती हैं। यही कारण है कि पौराणिक कथायें, कथाओं में सत्य तथ्यों के अस्तित्व का भ्रामक अनुभव कराती हुई, मनुष्य सभ्यता के विकास का दावा करते हुए उसको अपनी अनुकूलता की घेरेबंदी में मजबूती से बंद रखती हैं। वैदिक काल के समय के दावेदार साहित्य, महाग्रंथों, महाकव्यों आदि में उद्धत कथाओं को यदि संज्ञान में लिया जाए तो वैदिक काल में मानव समाज एक आदर्श समाज था, जीवन मंगलमय था, व्यवस्था कल्याणकारी थी, सब कुछ संतुलित व व्यवस्थित था। धर्म, विज्ञान, तकनीक व मानव का विकास अपने चरम पर था। 

    हवन-यज्ञ आदि समय समय पर होते रहने, हर घर में पूजापाठ होते रहने, मनुष्य के धार्मिक कर्मकांडों में रत रहने आदि  के कारण, मनुष्य का ईश्वरीय सत्ता व तंत्र से बेहतर संबंध थे। संबंधों की मधुरता का स्तर यह था कि आवाहन करने पर देवलोक व ब्रह्मलोक से देवगण और ईश्वर के प्रतिनिधि लोग मानवों से मिलने, उनके मुद्दों को समझने और ईश्वर की कल्याणकारी योजनाओं की स्थिति-गति जानने समझने के लिए आते रहते थे।

    ऐसा माना जाता है कि वैदिक काल में हम आज के पाश्चात्य विज्ञान की तुलना में हजारों लाखों साल आगे का उन्नत विज्ञान रखते थे। हमें यह तक पता था कि ब्रह्मा जी का एक दिन लगभग 4 अरब वर्ष का होता है और रात भी लगभग 4 अरब वर्ष की होती थी और ब्रह्मा जी का पूरा दिन (मतलब कुल लगभग 8 अरब साल) गुजरने पर “प्रलय” होती है। हमने हर बात की गणना कर रखी थी और हमारा दावा है कि सब कुछ वैज्ञानिकी था और सच्चे तथ्यों पर आधारित था।

    अपनी सभ्यता की श्रेष्ठता को प्रमाणित करने के लिए इन दावों को करते हुये, हम एक तथ्य भूल जाते हैं कि लगभग हमारा पौराणिक साहित्य, महाग्रंथ, महाकाव्य आदि की लगभग प्रत्येक घटना दैवीय व ईश्वरीय इच्छा, संबंध व सहयोग पर निर्भर थी। छोटी से छोटी बात अर्थात् निंद्रा के लिए बिस्तर किस धातु का बना हो, किस दिशा में हो, पैर व सिर किस दिशा में हो से लेकर परमाणु आयुध व पुष्पक विमान आदि आदि तक प्रत्येक बात के लिए हमें दैवीय व ईश्वरीय निर्देश का पालन करना पड़ता था, हम पूरी तरह से ईश्वरीय व दैवीय सहायताओं पर ही निर्भर थे। आइए इस बात का विश्लेषण करते हुए समझने की चेष्टा की जाए।

    मान लीजिए किसी राजा को राक्षसों से अपने राज्य की रक्षा के लिए , अपने राज्य में शांति स्थापित करने के लिए  अत्याधुनिक आयुध चाहिये, तो उसको अपने राज्य में वैज्ञानिक संस्थानोंं, तकनीकी संस्थानोंं आदि की स्थापना करने की आवश्यकता नहीं है। राजा को या राजपरिवार के किसी व्यक्ति को जंगल में, पर्वत में, पानी में या कहीं और जाकर चुपचाप उस आयुध को धारण करने वाले देवता के नाम का जाप कई वर्ष तक करना है और देवता को प्रसन्न करके आयुध प्राप्त कर लेना है। पुष्पक विमान चाहिएतो उसको रखने वाले देवता के नाम का जाप रूपी तप कर लिया और पुष्पक विमान प्राप्त कर लिया। मनुष्य को जिस भी गुण, वस्तु, सुविधा आदि की इच्छा हुई तो उसको धारण करने वाले देवी या देवता जेसे कि बुद्धि नहीं है तो बुद्धि की देवी, धन नहीं है तो धन की देवी, यौवन नहीं है तो यौवन के देवता आदि को उपयुक्त धार्मिक कर्मकांड से प्रसन्न कर लीजिए और अपनी इच्छानुसार गुण, वस्तु व सुविधा आदि बना बनाया प्राप्त कर लीजिए। तात्पर्य यह कि हर चिल्लर बात के लिए भी दैवीय व ईश्वरीय सहायता उपलब्ध थी, बस धारण करने वाले देवता का नाम, पता और उसको प्रसन्न करने का कर्मकांड करना आता हो, मंत्र आता हो।

    कोई आदमी बीमार है उसे आक्सीजन चाहिए तो प्रतापी चिकित्सक महोदय ने मंत्र का जाप किया और “पवन” देवता आक्सीजन लेकर दरवाजे पर उपस्थित। आक्सीजन के निर्माण की प्रक्रिया जानने समझने की कोई आवश्यकता नहीं, आक्सीजन के लिए किसी यंत्र की कोई आवश्यकता नहीं। मनुष्य व देवताओं के मध्य संबंधों की प्रामाणिकता की वजह से पवन देवता मंत्रों व कर्मकांडों द्वारा आवाहन किएजाने पर आक्सीजन लेकर रोगी मनुष्य की सहायता के लिए  प्रस्तुत। 

    वर्षा नहीं हो रही है तो वर्षा के देवता का आवाहन कीजिए अपनी समस्या उनके समक्ष रखिए, देवता को प्रसन्न करने के लिए  यथोचित कर्मकांड कीजिए और देवता वर्षा करा देगा। दैवीय व्यवस्थाओं के कारण चूंकि वर्ष के कुछ महीनों के अतिरिक्त वर्षा का प्रबंध करना देवता के लिए  भी संभव नहीं तो नदियों को धारण करने वाले ईश्वरीय प्रतिनिधि के नाम का जाप करके प्रसन्न करके नदियों को देवलोक से धरती पर उतार कर लाया जा सकता था। वर्षा संग्रहण, जल संग्रहण आदि तकनीक को जानने, समझने व विकसित करने की आवश्यकता नहीं है।

    किसी महिला का पति नपुंसक है कोई बात नहीं। महिला मनचाहे देवता के आवाहन के लिए  मंत्र जाप व कर्मकांड  करती थी, और देवता उस महिला के साथ यौनसंबंध स्थापित करके संतान उत्पत्ति में भी सहयोग करने के लिए उपलब्ध।

    नदियां, पर्वत, समुद्र आदि परिवार वाले होते थे, उनके पति/पत्नी/पुत्र/पुत्री/भाई/बहन आदि होते थे और कभी कभार तो इनके पारिवारिक सदस्यों के विवाह व यौन संबंध मनुष्यों के साथ होते थे। मनुष्यों व पशुओं, मनुष्यों व पक्षियों, मनुष्यों व जलचरों आदि के मध्य यौनक्रिया हो सकती थी और संताने भी होती थी।

    यदि पौराणिक गाथाओं को सच भी मान लिया जाएतो इस तथाकथित उच्च-पराकाष्ठा वाली अति-उन्नति के पीछे का आधार मनुष्य की अपनी कर्मशीलता नहीं वरन् दैवीय व ईश्वरीय सहायता व प्रयोजन थे। मनुष्य हर छोटी-छोटी बात के लिए देवताओं व ईश्वर की सहायता पर निर्भर थे। लोग कुछ नहीं करते थे, लोग कुछ नहीं बनाते थे, कुछ निर्मित नहीं करते थे। लोग तो देवताओं व ईश्वरीय सहायता से बना बनाया प्राप्त करते थे।

    इतना सब कुछ मिलने के बदले में मनुष्य को हर क्षण ईश्वर भक्ति में लिप्त रहना पड़ता था। हर क्षण भक्ति में रहना पड़ता था। ईश्वर के विभिन्न नामों का जाप, प्रसन्न करने की विभिन्न विधियां, हवन-यज्ञ व बलि आदि का कर्मकांड निरंतर करते रहना पड़ता था। हर क्षण इस बात के लिए  सतर्कता रखनी पड़ती थी कि किसी छोटी सी त्रुटि से देवता क्रोधित न हो जायें।

    कर्मकांडों में किंचित भी मात्र त्रुटि न हो, इसलिए  कर्मकांडों के विशेषज्ञ रखे गए होगें। जिन्हे “ब्रह्म” के मामलों की विशेषज्ञता रखने के कारण “ब्राह्मण” कहा गया होगा। सांसारिक कामों के चक्कर में “ब्राह्मणों” को अपनी थोड़ी सी भी ऊर्जा का अपव्यय न करना पड़े, इसलिए  वे जिसके भी दरवाजे पहुंच जाते थे और जो भी बोल देते थे वह यजमान को करना ही होता था। और ऐसा न करने पर यजमान के लिए  दंड व प्रताड़ना का प्रावधान था। बहुत बार तो विशेषज्ञ लोग क्रोधित होकर देवताओं से यजमान को दंडित करवाते थे, जिसे उस समय की तकनीकी भाषा में “श्राप” देना कहा गया होगा। 

    ब्राह्मण को भी पारलौलिक सत्ता से संवाद व संपर्क में बने रहने के लिए हमेशा पवित्र रहना पड़ता था। इसलिए   दिन में कई बार नहाना, स्वच्छ वस्त्र पहनना, बदबूदार चीजों जैसे लहसुन व प्याज आदि नहीं खाना, अपनी टट्टी नहीं साफ करना इसलिए  उनकी टट्टी साफ करने वालों की अलग जमात बनाई गई और यह निर्धारित किया गया कि इस जमात के लोगों को चलते समय अपने पदचिन्हों को भी साफ करते हुए चलना पड़ेगा ताकि ब्राह्मण उन पदचिन्हों पर अपना पैर रखकर अपवित्र न हो जाए।

    माथे पर चंदन का लंबा तिलक ताकि मन में सुगंध व शीतलता व्याप्त रहे, जिससे देवताओं से संवाद करते समय व्यवहार में शीतलता रहे। सिर में लंबी चोटी रखना ताकि देवगणों व ईश्वरीय व्यवस्था से अदृश्य तरंगों द्वारा सीधा संपर्क व संवाद बना रहे। इन ब्राह्मणों ने देवताओं के साथ संपर्क व संवाद के अनुभवों के आधार पर ग्रंथ व पुराण लिखे। जिनमें विस्तार से वर्णन किया गया कि किस मामले का देवता कौन है, और किस देवता को किस समय और किन तरीको से कितनी देर के लिए किस काम के लिए आवाहित किया जा सकता है। ग्रंथ व पुराण पढ़िएऔर मनचाहे देवता को वर्णित कर्मकांड से आवाहित कीजिएऔर अपनी इच्छा पूर्ति कीजिए।

    मानव जीवन का हर एक क्षण देवताओं की दृष्टि, गणना व लेखे-जोखे में होता था। शादी हो, बच्चा पैदा हो, बच्चे का नामकरण हो, युवा-युवती पहली बार यौन-क्रीडा करने जा रहे हों, पति-पत्नी संतान प्राप्ति के लिए यौन-क्रिया करने जा रहे हों आदि आदि अर्थात् हर एक क्षण का लेखा जोखा देवगणों के पास।   जीवन की हर क्रिया के लिए देवताओं का आवाहान, ताकि कुछ ऊंचनीच मतलब मनचाहा न होने पर देवताओं के समक्ष दावे किए जा सके। आदि आदि हजारों उदाहरण हैं, जो पौराणिक कथाओं में मिलते हैं, जिनसे उस समय की मानव-सभ्यता कितनी उन्नत थी यह मानना होता है।

    यदि यह मान लिया जाए कि वैदिक काल आदर्श व अति-पराकाष्ठा तक उन्नत था। तो भी इसका श्रेय मनुष्य की कर्मशीलता को न जाकर देवताओं व ईश्वरों की कर्मशीलता व उनके अंदर मनुष्यों के प्रति अथाह प्रेम को जाता है। मनुष्य तो केवल उनको खुश करने के लिए पूजा पाठ करता था, कर्मकांड करता था। यह भी मानना पड़ेगा कि उस समय के देवगण और ईश्वर भी बहुत विनम्र और कर्मशील होते थे, मनुष्य जीवन की हर क्रिया के समय आवाहित किएजाने पर आने को तैयार। हर एक मनुष्य का जन्म-जन्मांतर का संपूर्ण सूक्ष्म विस्तृत लेखाजोखा रखते थे और जरूरत पड़ने पर प्रस्तुत करते थे, ताकि व्यवस्था में त्रुटि न हो।

    यदि वैदिक काल की अवधारणाओं को सत्य माना जाए तो यह भी स्वीकारना पड़ेगा कि इतनी बेहतरीन दैवीय आदर्श व्यवस्था; दैवीय व ईश्वरीय सहायताओं, सुविधाओं व सहयोगों वाले देवों व मनुष्यों के मध्य प्रमाणित व विश्वसनीय संबंध टूटे और पूरी तरह से हमेशा के लिए  टूटे। देवलोक में मनुष्यों की विश्वसनीयता पूरी तरह से इस प्रकार से समाप्त हुई कि देवों व मनुष्यों के संबंधों के पुनर्जीवित हो पाने की किसी संभावना के भ्रूण तक को नष्ट कर दिया गया।

    चूंकि मनुष्य ने दैवीय संपर्क व संवाद के लिए  विशेषाधिकार व विशेष सुविधाओं से संपन्न विशेषज्ञ लोग रख रखे हुए थे, इसके बावजूद मनुष्य व देवों के इतने प्रगाढ़ व विश्वसनीय संबंध पूरी तरह से टूट गए। तो इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि इन विशेषज्ञों ने एक से बढ़कर एक भयंकर अपराध लगातार किए। जिसके कारण देवगण मनुष्यों पर क्रोधित होते चले गए और मनुष्यों के संबंध हमेशा के लिए  टूट गए। और इन विशेषज्ञों ने अपने द्वारा किए गए भयंकार अपराधों के बारे में मानवीय समाज को जानकारी नहीं दी और पतन के कारणों को ईमानदारी से न स्वीकारते हुये, सारा दोष युग-काल परिवर्तन को दे दिया और युग-काल परिवर्तन को ईश्वरीय प्रावधान बता दिया।

    चूंकि ईश्वर व देवगण नाराज हो चुके थे तो उन्होंने मनुष्यों को उनके अपने ही कर्म के आधार पर छोड़ दिया। लेकिन चूंकि हम लोगों को केवल मंत्र जाप करके कुछ कर्मकांड करके बिना वास्तविक पुरुषार्थ भोगने की लत लग गयी थी, इसलिए  हम आज तक मंत्र जाप व कर्मकांडों को किएजा रहे हैं इस लालच में कि शायद कभी कुछ मामला फिट हो और जैकपाट लग जाए और विशेषज्ञ लोग अपने को मिलने वाली विशेषाधिकारों व विशेष सुविधाओं को भोगते रहने के लालच व स्वार्थ में, यह सत्य स्वीकारने को तैयार नहीं कि वे भी दूसरे मनुष्यों की तरह ही साधारण मनुष्य हैं। क्योंकि सत्य स्वीकारते ही उनको अपने द्वारा किए गए उन भयंकर अपराधों को भी स्वीकारना पड़ेगा जिनके कारण देवों व मनुष्यों के अत्यधिक प्रगाढ़ संबंध पूरी तरह से टूट गए।

    ऐसे अवैज्ञानिक व अतार्किक तथ्यों पर आधारित वैदिक काल की अवधारणा को सत्य मान भी लिया जाए और यह भी स्वीकार कर लिया जाए कि उस काल में बहुत ही गजब व उन्नत व्यवस्था थी। लेकिन इसमें वैज्ञानिकता कहीं नहीं है और न ही इस प्रक्रिया में समाज के मनुष्य की दृष्टि का कोई वैज्ञानिक विकास ही होता है। उल्टे अवैज्ञानिकता व अतार्कितता ही पोषित होती है।

    यदि वैदिक काल में सच में ही हमारा समाज अति-उन्नत होता तो भले ही हमारे समाज में सब कुछ भी होता लेकिन हमारे समाज में वर्णव्यवस्था कभी नहीं होती। क्योंकि ऐसा समाज जो समाज के सबसे बड़े हिस्से को जन्म लेते ही मानसिक व ज्ञान के विकास से अवरुद्ध कर देता हो, जिस समाज में मानवीय-संसाधन की कोई अहमियत नहीं हो। और जो है उसी को संपूर्ण माना जाता हो, वह समाज कभी भी वैज्ञानिक दृष्टि का समाज नहीं हो सकता है। जिस समाज में पोथियां रटने को ज्ञान माना जाता हो, पोथियों को रटकर बोल देना विद्वत्ता मानी जाती हो, जिस समाज के मानवों की अधिकांश जीवनी ऊर्जा विभिन्न कर्मकांडों को करने में ही व्यय हो जाती हो, वह समाज कैसा भी हो लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि का बिलकुल भी नहीं हो सकता है।

    विज्ञान करते हुएसीखने व समझने की निरंतर गतिशील प्रक्रिया है, न कि तथाकथित संपूर्णता के साथ ठहरे हुए ज्ञान को रटने की प्रक्रिया।

    वैदिक काल की अवधारणा को स्वीकारते ही, हम मनुष्य की कर्मशीलता को उपेक्षित व तिरस्कृत कर देते है। बिना वास्तविक पुरुषार्थ के भोग करने के हमारे चरित्र के कारण हममें कृतज्ञता का मूल्य पोषित नहीं हो पाया, इसीलिए  हम अपने जीवन की अधिकांश सुख व सुविधाएं भोगते तो पाश्चात्य देशों के ज्ञान व विज्ञान के कारण ही हैं, लेकिन उनके प्रति कृतज्ञता का भाव न रखकर उल्टे अपने भूतकाल की श्रेष्ठता की कुंठा व अहंकार को जबरन प्रमाणित बताते हुए रात दिन पाश्चात्य देशों व उनके लोगों को पानी पी-पीकर कोसते हैं, गरियाते हैं और अपने कुंठित व क्षुद्र अहंकार को तुष्ट करते हैं।

    निर्णय तो हमें ही लेना है कि हम कर्मशील बनकर अपना समाज व देश बेहतर बनायेंगें या सिर्फ भोगने की लत को ही जीते रहेंगें और कुतर्की बकवास करते रहेंगें।

    ईश्वर भी कर्मशीलता को प्यार करता है, कर्मकांड व मक्खनबाजी को नहीं। यह मानव-सभ्यताओं का बेबाक व ईमानदार अध्ययन करने से साफ साफ मालूम देता है।

  • इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता – कपिल चौधरी : किसान के बेटे ने इंजीनियरिंग के बाद इंट्रप्रेन्योरशिप को चुना

    इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता – कपिल चौधरी : किसान के बेटे ने इंजीनियरिंग के बाद इंट्रप्रेन्योरशिप को चुना

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता। काम शुरू करने के पहले बहुत योजनाएं बनानी पड़तीं हैं, बहुत सारी तैयारियां करनी पड़तीं हैं, रिस्क लेने पड़ते हैं। भारतीय समाज में इन सबके अतिरिक्त सबसे बड़ा काम जो करना पड़ता है जिसमें पुरखे याद आ जाते हैं वह यह कि माता-पिता व परिवार को तैयार कैसे करें कि योग्यता होने के बावजूद सरकारी या ऊंचेवेतनमान की गैरसरकारी नौकरी करने की बजाय अपना व्यवसाय करेंगे। वह भी तब जबकि उस व्यवसाय को परिवार में कभी किसी ने न किया हो। बहुत लोगों को तो पूरे जीवन अपने माता-पिता का विरोध व गालियां सिर्फ इसलिए खानीं पड़तीं हैं क्योंकि उन लोगों ने अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहा। वे लोग सौभाग्यशाली होते हैं जिनके माता-पिता थोड़ी सी बहसबाजी के बाद ही सही लेकिन बात सुनने समझने को तैयार हो जाते हैं।

    काम शुरू होने के बाद भी जीवन भर लगातार नवीन योजनाओं के साथ काम करना पड़ता है, जीवन भर प्रतिस्पर्धा में बने रहना पड़ता है, प्रतिस्पर्धाओं में बने रहते हुए सफल भी होना पड़ता है। व्यवसाय आर्थिक विकास का मूलभूत व सबसे महत्वपूर्ण चक्र होता है। उन लोगों के लिए तो बहुत ही मुश्किल होता है जिनको अपने माता पिता से व्यवसाय बना-बनाया नहीं मिलता है। अपना व्यवसाय करना ही आपकी मेधाविता, क्षमता व प्रयोगशीलता का वास्तविक मानदंड होता है।

    Kapil Chaudhary

    कपिल चौधरी:
    कपिल चौधरी मुरादाबाद के एक सामान्य गांव के किसान के पुत्र हैं। कपिल चौधरी की शुरुआती पढ़ाई लिखाई गांवों के विद्यालयों में हुई। माता-पिता की इच्छा थी कि कपिल इंजीनियरिंग करें, उसके बाद कोई अच्छी सी सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करें, विवाह करें फिर बच्चे पैदा करते हुए सकून से अपना जीवन यापन करें। 

    लेकिन कपिल चौधरी व उनके मित्र कपिल वर्मा अपने जीवन के रास्ते व शैली खुद चुनना चाहते थे। इन लोगों को लगा कि नौकरी करने से बेहतर है अपना स्वयं का व्यवसाय करना। इंजीनियरी की पढ़ाई करते हुए ही योजनाएं बनाने लगे। योजनाओं को जमीन पर कैसे उतारा जाए इसके लिए तैयारियां करने लगे। इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाई भी करते, पढ़ाई करने के अतिरिक्त जिस समय अन्य छात्र लोग मौजमस्ती करते तब ये दोनों युवा अपनी योजनाओं की तैयारी के लिए मार्केटिंग रिसर्च व अन्य गतिविधियों के लिए भागदौड़ करते। घर से मिलने वाली पाकेटमनी का प्रयोग इन सब कामों में करते।

    Kapil Verma and Kapil Chaudhary in Mr Caps Cafe

    कपिल के माता-पिता किसान। किसी किसान से उनका पुत्र जो इंजीनियरिंग कर रहा हो, वह यह कहे कि वह नौकरी नहीं करना चाहता है बल्कि अपना स्वयं का व्यवसाय करना चाहता है। अपवाद छोड़ दीजिए तो किसान हत्थे से उखड़ कर ही बात करेगा। कपिल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पढ़ते हुए लगभग दो वर्षों तक धीरे-धीरे अपने माता-पिता के मन को तैयार किया ताकि वे कपिल के निर्णय को स्वीकार कर पाएं।

    पिछले वर्ष 2017 के नवंबर महीने में कपिल चौधरी ने अपने मित्र कपिल वर्मा के साथ मिल कर Mr Caps काफी कैफे की स्थापना की। मेरठ के बाद मुरादाबाद, उसके बाद भारत के अन्य शहरों में भी श्रंखला खोलने की योजना बनाए हुए हैं।

    Mr Caps Cafe

    कपिल चौधरी का कहना है कि इंजीनियरी की पढ़ाई के बाद जितना रुपया छात्र माता-पिता से लेकर सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं या जुगाड़ में खर्च करके नौकरियां पाते हैं या उच्च शिक्षा में खर्च करते हैं। उसकी तुलना में बहुत कम आर्थिक सहयोग माता-पिता से लिया है वह भी लोन के रूप में।

    गांवों के बहुत लोग ऐसे होते हैं जो अपने मित्रों व रिश्तेदारों का प्रयोग करके अखबारों में अपने उन बच्चों का नाम व फोटो छपवाकर अपने भीतर के कुंठित अहंकार को तुष्ट करते हैं, जो किसी सरकारी नौकरी को पा गए होते हैं। मेरी दृष्टि में विकसित समाज व देश के लिए कपिल चौधरी जैसे स्वावलंबी, रोजगार देने वाले व  अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदारी करने वाले युवा आदर्श होने चाहिए न कि सरकारी नौकरी करने वाले।

    सरकारी नौकरी बनाम इंट्रेप्रिन्योरशिप:
    हममें से बहुत लोग लंबी-लंबी बातें करते हैं। इंट्रेप्रेन्योरशिप की बात करते हैं, सेमिनार्स में भाषण देते हैं। पुरस्कार जीतते है। लेकिन जब अपने घर की बात आती है तो हमारी पहली प्राथमिकता यही रहती है कि हमारी संतान या हमारे परिवार वाले ऊंची सरकारी नौकरी में जाएं या ऊंचे वेतनमान वाली गैरसरकारी नौकरी करें। ऊंची सरकारी नौकरी करने का उद्देश्य समाज के लिए कुछ करने का उद्देश्य नहीं होता। समाज के लिए कुछ करने के लिए न तो सरकारी नौकरी और न ही पैसा ही मूलभूत तत्व होते हैं।

    अपवादों में भी अपवाद को छोड़कर सरकारी नौकरी करने के पीछे के कई बड़े व मूलभूत आकर्षण होते हैं (ढोंग चाहे जो कहा व किया जाए) –

    • जवाबदेही का न होना
    • मेहनत कम होना
    • भ्रष्टाचार का होना
    • दहेज का मिलना
    • सामंतवादी मानसिकता का होना

    सरकारी नौकरियों के इन्हीं आकर्षणों के कारण स्थिति यहां तक है कि इंजीनियरिंग, एमसीए, एमबीए इत्यादि प्रोफेशनल डिग्रीधारी युवा बीटीसी, बीएड करके सरकारी स्कूलों में अध्यापक बनने का भी काम करते हैं। जीवन में संघर्ष व मेहनत से पलायनवादी इन युवाओं के जीवन का अंतिम लक्ष्य महज एक अदद सरकारी नौकरी पाना होता है। सरकारी नौकरी व जेब में पैसा आने के बाद क्रांतिकारिता, विचारशीलता, चिंतनशीलता व सामाजिक सोच तो अपने आप आ ही जाती है। इनको अधिलाभांश के रूप में लीजिए।

    यदि इन आकर्षणों व अधिलाभांशों को हटा दिया जाए तो कोई भी व किसी भी स्तर की सरकारी नौकरी समकक्ष स्तर के स्व-व्यवसाय की तुलना में कहीं नहीं ठहरती है। लेकिन भारत जैसे अलोकतांत्रिक व सामंती चरित्र के समाज व लोगों वाले देशों में दो-चार या दस-बीस या सौ-पचास किताबें रटकर परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी पाने का सबसे प्रमुख व वास्तविक उद्देश्य समाज व लोगों के संसाधनों के ऐश्वर्य व शक्ति का अनियंत्रित भोग करना होता है।

    चलते-चलते:
    कपिल चौधरी से मेरा लगाव इसलिए है क्योंकि मुरादाबाद के जिस गांव में मैंने शिक्षा के नवीन प्रयोग किए थे, कपिल उस समय मेरे छात्र थे और छठवीं कक्षा में पढ़ते थे, मुझे आजतक नहीं भूले हैं। कपिल का मानना है कि उनके जीवन में सोच बदलने में मेरा भी योगदान रहा है। 

    आप जब भी मेरठ जाएं या आपका कोई मित्र, जानपहचान या रिश्तेदार मेरठ में रहता हो या मेरठ आना-जाना होता हो। आप कपिल चौधरी को एक अवसर अवश्य दें। मेरठ से गुजरने वाले व्यस्त हाईवे में ही उनका अत्याधुनिक व खूबसूरत कैफे है। नीचे दी हुई फोटो में पता व संपर्क दिया हुआ है। फोटो पर क्लिक करने से फोटो बड़ी होकर दिखेगी।

  • लहसुन व जुकीनी के सिरका वाले अचार बनाने की घरेलू विधि

    लहसुन व जुकीनी के सिरका वाले अचार बनाने की घरेलू विधि

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    आज हमने सेब से बने सिरका में लहसुन व जुकीनी के अचार रख दिए। यहां सिडनी में भारतीय दुकानों से खरीदे गए तेल से बनाए गए अचारों के जारों को धो कर, सुखाकर अपने द्वारा बनाए गए सिरका के अचारों में प्रयोग कर लिया। थोड़ा देशी पुट भी हो गया। लहसुन का अचार बहुत आसान है, जुकीनी वाले में कुछ झाम करना पड़ता है। जुकीनी की खोज अमेरिका महाद्वीप में हुई थी। वैज्ञानिकी श्रेणियों के रूप में यह एक फल है लेकिन सब्जियों की तरह प्रयोग किया जाता है। तरोई/तोरी व जुकीनी में अंतर होता है। तरोई को लुफ्फा या चाइनीज ओकरा के नाम से जाना जाता है।

    बाएं- लहसुन, दाएं-जुकीनी

    लहसुन का सिरका वाला अचार:

    लहसुन को छील लें, एक लहसुन की कली को या तो दो टुकड़ों में लंबाई में काट लीजिए या यदि कली छोटी हो तो समूची रहने दीजिए।

    यदि एक कप लहसुन है तो एक तिहाई कप सिरका व दो तिहाई कप पानी में सरसों (थोडा सा कूट लीजिए), नमक, मिर्च पाउडर, शक्कर, सौंफ, मेथी, काली मिर्च इत्यादि अपने स्वादानुसार मिलाकर उबलने तक गर्म कीजिए, गर्म करते समय चम्मच से चलाते भी रहिए ताकि नमक व शक्कर अच्छी तरह से मिल जाए। (लहसुन को इसमें नहीं डालेंगे)

    एक दूसरे पात्र में इतना पानी डालकर उबलने तक गर्म कीजिए कि एक कप लहसुन पूरी तरह डूब जाए। जब पानी उबलने तक गर्म हो जाए तो गैस बंद करके पात्र में लहसुन डाल दीजिए, कुछ मिनट तक लहसुन उसमें पड़ा रहने दीजिए। पानी से लहसुन को निकाल कर कुछ मिनट तक सुखा लीजिए।

    लहसुन को कांच के एक जार में डाल दीजिए, लहसुन डालने के बाद सिरका पानी व मसालों का जो मिक्सचर बनाए थे, उसको डाल दीजिए। जार का मुंह मजबूती से बंद कर दीजिए। जार को कुछ मिनट उल्टा करके रख दीजिए। फिर जार को सीधा करके ठंडा होने तक रख दीजिए। ठंडा होने पर फ्रिज में कुछ दिनों के लिए रख दीजिए।

    जुकीनी का सिरका वाला अचार:

    जुकीनी को छीलकर या बिना छीले जैसे आपकी इच्छा हो, चौड़ाई की ओर से पतले-पतले छल्लों के रूप में काट लीजिए। एक तसले में जुकीनी के छल्लों को रख दें, उन पर नमक छिड़क दें, उछाल-उछाल कर हिलाएं ताकि सभी छल्लों पर नमक पहुंच जाए। अब इसको ढककर लगभग एक घंटे के लिए रख दीजिए।

    एक घंटे बाद आप देखेंगे कि जुकीनी ने नमक के कारण पानी छोड़ा है। जुकीनी के छोड़े हुए पानी को फेंक सकते हैं या यदि आप पीना चाहें तो पी भी सकते हैं (नमक के कारण नमकीन बहुत होगा)। जुकीनी के छल्लों पर जो पानी होगा उसको भी कागज वाले टिशू पेपर से या पेपर टावल से या किसी अन्य विधि से सुखा लें।

    पानी व सिरका के घोल की मात्रा इतना होनी चाहिए कि घोल में जब जुकीनी डाली जाए तब अच्छी तरह डूब जाए, घोल कुछ ऊपर तक भी रहे। पानी व सिरके का अनुपात एक तिहाई सिरका व दो तिहाई पानी होना चाहिए।

    पानी व सिरके के घोल में सरसों (कूटकर), नमक, शक्कर, मिर्च, हींग, हल्दी इत्यादि डालकर उबलने तक गर्म करें, थोड़ी देर उबलनें दें (एक या दो मिनट), चम्मच से चलाते रहें। ठंडा होने दीजिए।

    जुकीनी के छल्लों और इस को अच्छी तरह मिला कर जार में डाल दीजिए। जार को मजबूती से बंद करके कुछ देर तक उल्टा रख दीजिए। फिर कुछ दिनों के लिए फ्रिज में रख दीजिए।

    खाइए व खिलाइए।

  • अति दुर्लभ 233 वर्ष पुराने “बौल्टन व वाट इंजन” के फोटो : दुनिया का सबसे पुराना रोटेटिव सिस्टम इंजन

    अति दुर्लभ 233 वर्ष पुराने “बौल्टन व वाट इंजन” के फोटो : दुनिया का सबसे पुराना रोटेटिव सिस्टम इंजन

    Vivek Umrao Glendenning “सामाजिक यायावर”

    “बौल्टन व वाट इंजन” दुनिया का सबसे पुराना रोटेटिव सिस्टम इंजन है। इस इंजन को स्कॉटलैंड के इंजीनियर जेम्स वाट ने डिजाइन किया था, जिसे उनके व्यापारी सहयोगी मैथ्यू बौल्टन के सहयोग से बनाया गया था। इसीलिए इस इंजन का नाम “बौल्टन व वाट इंजन” रखा गया। “बौल्टन व वाट इंजन” दुनिया के पहले सफल इंजन थे जो ऊर्जा पैदा करते थे तथा जिनका कामर्शियली प्रयोग किया गया। ये इंजन हवा, पानी या मानवश्रम से नहीं चलते थे। 

    लेख में जिस अति-दुर्लभ “बौल्टन व वाट इंजन” के चित्र हैं वह इंजन पहली बार लंदन की एक फैक्ट्री में 1785 में प्रयोग किया जाना शुरू किया गया। इस इंजन ने लंदन की फैक्ट्री में लगभग 102 वर्ष तक काम किया। इसके पश्चात यह इंजन यादगार के रूप में आस्ट्रेलिया भेज दिया गया। आगे चलकर सन् 1988 में यह इंजन सिडनी के पावरहाउस संग्रहालय में स्थापित किया गया।

    सिडनी पावरहाउस संग्रहालय विश्व के बेहतरीन विज्ञान व तकनीक संग्रहालयों में आता है। इस संग्रहालय को ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया के संस्थापक व मुख्य संपादक विवेक उमराव “सामाजिक यायावर” की पत्नी के पिता, जो विश्व में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध आर्किटेक्ट्स के रूप में जाने जाते हैं, ने डिजाइन किया था।

    (फोटो को बड़े आकार में देखने के लिए फोटो पर क्लिक कीजिए)

    Vivek’s life-partner and his son with Boulton and Watt Engine 1775