Author: संपादक मंडल

  • सूचना का अधिकार अौर भारतीय सामाजिक क्षेत्र का NGO कारपोरेट

    सामाजिक यायावर

    (यह लेख उन लोगों के लिये है जो कि सूचना के अधिकार तथा ब्युरोक्रेटिक एकाउंटेबिलिटी के लिये गंभीर हैं।   यदि अाप इस श्रेणी में अाते हैं तो इसे पढ़े अन्यथा इसे कतई ही ना पढ़ें अौर मुझे क्षमा करने की कृपा करें।)

    मेरा निवेदन है कि विभिन्न व्यक्तिगत अौर संस्थागत अाग्रहों को परे रख कर इस लेख को समझने का तथा परिष्कृत करने का प्रयास किया जाये, ताकि अभी भी जो सम्भावनायें शेष हैं उनको सहेज कर इस कानून को मजबूत किया जाये।

    यह लेख उत्तरी भारत के बड़ी जनसंख्या वाले हिन्दी भाषी प्रदेशों के ऊपर अाधारित है।  RTI  का कानून एक अवसर था जिससे कि भारत की अाम जनता के हाथ में कुछ ठोस ताकत पहुंच सकती थी फिर धीरे-धीरे कालान्तर में एक बड़ा वास्तविक जनान्दोलन सरकारों की अाम जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में खड़ा किया जा सकता था।

    कारण जो भी रहा हो किंतु कांग्रेस की सरकार ने सूचना का अधिकार कानून लागू किया।  यदि कानून को ध्यान से देखा जाये तो यही लगता है कि कानून को दिखावटी रूप में नहीं बनाया गया।  यह कानून भारतीय संविधान के उन चंद कानूनों मे से एक था जिनसे भारत में लोकतंत्र के मूल्यों की संभावना बनती दिखती थी।

    भारत में राजनीति दलों अौर अफसरशाही ने कभी खुद को अाम जानता के प्रति जिम्मेदार नही माना  उल्टे जनता को अपना गुलाम मानते अा रहे हैं।    इसलिये कांग्रेस पार्टी इस कानून के लिये धन्यवाद की पात्र है।

    यह कानून अाम अादमी के लिये उसकी अपनी जरुरतों के लिये बना था।  मुझे अाज तक समझ नही अाया कि इस कानून को भारत की वास्तविक अाजादी के रुप में क्यों देखा जाने लगा?   यह एक ऐसा कानून है जो कि अाम अादमी की प्रताड़ना कुछ कम कर सकने में मदद कर सकता है, इससे अधिक अपेक्षा इस कानून से नहीं की जा सकती है।   अाम अादमी को सरकारी कार्यालायों में जाकर धक्के खाने की, अपमान झेलने की तथा बार-बार चक्कर लगाने जैसी प्रताड़नाअों से कुछ अाराम इस कानून से मिल सकता है।

    यह कानून कोई बहुत बड़ा या बहुत मजबूत कानून नही है जो कि व्यवस्था को ही बदल डालने की हिम्मत रखता हो।   व्यवस्था तो तब बदलती है जब अाम समाज उठ खड़ा होता है बदलाव के लिये वह भी स्वतः स्फूर्ति के साथ।

    सिर्फ कानून बनाने से सामाजिक परिवर्तन नहीं हुअा करते क्योकि जो सत्ता कानून बनाती है वही सत्ता अपने हितों के लिये कानून को बदल भी सकती है।

    चूंकि भारत के सामाजिक क्षेत्र में वास्तविक जनशक्ति रखने वाले लोग नहीं हैं इसलिये दिन प्रतिदिन अफसरशाही व सत्ता तंत्र अौर अधिक गैर जवाबदेह तथा बेलगाम होते जा रहे हैं।

    मैं उन अगंभीर अौर सतही लोगों की बात नहीं कर रहा जो कि फंड/ ग्रांट्स के दम पर धरना प्रदर्शन करने के लिये कुछ लोगों की भीड़ जमा करके मीडिया में बने रहने या सामाजिक ग्लैमर का भोग करने के लिये किसी ना किसी मुद्दे की खोज में लगे रहते हैं अौर हल्ला गुल्ला करते रहते हैं अौर खुद को जनशक्ति के रूप में प्रदर्शित करने के भ्रम को बनाये रखने में लगे रहते हैं।

    तो यदि इन लोगों के द्वारा बनाये भ्रम से अलग होकर देखा जाये तो एक अति भयावह बात साफ मालूम देती है कि भारत में वास्तविक जमीनी अौर दूरदर्शी स्वतः स्फूर्त जनान्दोलनों का अभाव है जो कि पूरी व्यवस्था को बदलने के लिये उत्पन्न हुये हों।

    अाजादी के बाद से साल दर साल भारतीय अाम अादमी अौर अाम समाज अौर कमजोर ही हुअा है अौर भारतीय व्यवस्था तंत्र अौर अधिक अमानवीय, असामाजिक तथा गैर जवाबदेह ही होता जा रहा है।   ऐसी कमजोर हालत में  RTI जैसे कानून को जिस गंभीरता अौर दूरदर्शिता से संभालते अौर मजबूत करते जाने की अहम जरूरत थी,  जिससे कि समय के साथ साथ धीरे धीरे इसी कानून से अौर भी बड़े तरीके विकसित करके सत्ता तंत्रों को अाम समाज के प्रति जिम्मेदार बनने को विवश करके लोकतंत्र अौर स्वतंत्रता के मूल्यों को संविधान के पन्नों में छापते रहने की बजाय यथार्थ जमीनी धरातल में जीवंत उतार कर ले अाया जाता।

    यदि अफसरशाही सूचना का अधिकार कानून को हतोत्साहित करती है तो यह कोई बड़ी बात नही क्योकि अाजादी के बाद से ही अफसरशाही ने जरुरत से अधिक अधिकार पाये अौर खुद को अाम जनता का मालिक माना अौर जनता को गुलाम, तो यदि अाज अाम जनता उनसे कुछ पूछे तो यह बात अफसरशाही को कैसे बर्दाश्त होगी।

    यदि नेता व अफसर लोग इस कानून को नुकसान पहुंचाते हैं या हतोत्साहित करते हैं तो यह कोई अचरज वाली बात नहीं क्योकि अाम जनता को मजबूत ना होने देना अौर खुद को अाम जनता का मालिक बनाये रखने के लिये हथकंडे अपनाना तो इन लोगों के मूल चरित्र में है।

    हमको तो यह देखना है कि हमारे बीच से  कोई क्षति तो नही हो रही है इस कानून को।   चार वर्ष का समय पर्याप्त समयावधि होती है,   इसलिये यह मूल्यांकन करने की जरुरत है कि पिछले चार सालों में इस कानून के नाम पर क्या हुअा !!    RTI जो कि एक सहज प्रक्रिया होनी चाहिये थी, धीरे-धीरे कठिन प्रक्रिया होती जा रही है।  क्यों होती जा रही हैं, अाईये कुछ इन कारणों को भी समझने का प्रयास करें। ——

    भारत में कुछ ऐसे बड़े सामाजिक लोग हैं  जिन्होनें RTI के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये प्रति वर्ष पाये हैं अौर अभी भी पा रहे हैं साथ ही मीडिया के ग्लैमर का मजा लगातार लेते अा रहे हैं, विदेश घूम फिर रहे हैं।  कुल जमा योग यह कि इन लोगों ने हर प्रकार का सहयोग प्राप्त किया।  तो इन लोगों से इतनी सामाजिक इमानदारी की अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वे लोग अपने भीतर झांक के देखें कि वास्तव में उन्होनें RTI को मजबूत किया है या कमजोर।

    वास्तव में सूचना के अधिकार कानून को पूरा खिलने के पहले ही इन प्रतिष्ठित सामाजिक लोगों ने बेजान बना दिया है, ये वही लोग हैं जिन्होने अपने अापको भारत के सामाजिक क्षेत्र में मसीहाअों के रूप में स्थापित कर रखा है।   ये लोग कितना भी हल्ला मचायें अौर सरकार को गलियायें किन्तु इस सच को झुठलाया नहीं जाया सकता कि भारत सरकार ने RTI का कानून लागू करने की इच्छा शक्ति दिखायी थी।

    समय के साथ RTI कानून की दुर्गति से यह अंदाजा तो लग ही गया है कि करोड़ों रुपये हर साल का फंड पाने वाले अौर ऐनकेन प्रकारेण मीडिया की सुर्खियों में बने रहने वाले इन सामाजिक  मसीहाअों की वास्तविक समझ कितनी है। मैं अमूमन इन लोगों को भारतीय सामाजिक क्षेत्र का कारपोरेट कहता हूं।

    RTI के विकास के नाम पर तो इनमें से कुछ ने तो अपनी संस्थाअों को बाकायदा प्रोफेशनल कंपनियों की तरह चला रखा है, करोड़ों रुपये का प्रपोजल बनाते हैं RTI में काम करने के लिये,  वेतनभोगी कर्मचारी रखते हैं जो कि RTI लगाते हैं अौर तंख्वाह पाते हैं, इन वेतनभोगी लोगों के बाकायदा स्थानांतरण होते हैं।

    इन लोगों से अाप पूछें RTI के बारे में तो इतनी रिपोर्टें अापको बता देंगें कि अापको ऐसा प्रतीत होने लगता है कि जहां भी ये लोग काम कर रहे हैं वहां पर सब कुछ RTI मय हो गया है अौर स्वराज की स्थापना हो गयी है।    यह लोग अापको बतायेंगें कि कैसे इन लोगों ने RTI लगाकर अौर दबाव बनाकर गरीबी की रेखा के नीचे वाले कार्ड बनवा दिये, कैसे पासपोर्ट बनवा दिया, कैसे भ्रष्टाचार बिलकुल खतम करवा दिया, इसी तरह के अौर भी बातें अापको बतायेगें।

    इन लोगों को 3000-15000 रुपया महीना या अौर भी अधिक तन्ख्वाह मिलती है RTI के काम के लिये,  पेपर, लिफाफा तथा डाक टिकट का खर्चा बिल दिखाने पर अलग से मिलता है।

    भारत की बहुसंख्य जनता के अधिकतर काम  100 से 500 रुपये की घूस रूपी सुविधाशुल्क देने से बन जातें हैं,  एक पासपोर्ट 1000 से 3000 रुपये की घूस से बन जाता है।    यदि विभिन्न प्रकार के कामों की अौसत घूस  300  रुपये भी मान ली जाये। तो प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या 3000 महीना पाने वाला हर महीना 10 काम करवा देता है RTI लगा कर या 15000 पाने वाला हर महीना 50 काम करवा देता है?

    यदि मान लिया जाये कि करवा भी देते हैं तब भी बात वही हुयी कि  काम करवाने में सुविधा-खर्चा उतना ही अाया अौर सुविधा खर्च अपरोक्ष रुप से देना ही पड़ा, क्योकि बाकी खर्चे जैसे पेपर, पेन, लिफाफा, डाकटिकट इत्यादि किस्म के मामूली खर्चे या तो अावेदक झेलता है या बिल लगाने पर अलग से पेमेँट होता है RTI के काम के लिये नियुक्त वेतनभोगी व्यक्ति को।

    प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि हर महीने इतने गरीब अावेदक क्या सच में ही लाइन लगा कर इन लोगों के पास अाते हैं?  RTI के कानून के अाधार पर एक महीना से दो महीना तक विभिन्न चरणों में लगता है उत्तर पाने में, समस्या का हल कब होगा या नहीं होगा या कैसे होगा यह बात निश्चित नहीं, जबकि घूस देने से तो काम होने की गारंटी रहती है।

    प्रश्न यह भी खड़ा होता है क्या RTI का कानून NGOs में रोजगार पैदा करने के लिये बनाया गया था या अाम अादमी को मजबूत करने के लिये बनाया गया था?     

    लाखों-करोड़ों रुपये का फंड मिलता रहे इसलिये समय समय पर कोई भी छोटा या बड़ा मुद्दा बना कर धरना प्रदर्शन करना या सेमिनार जैसा कुछ कर देना या प्रेस कान्फेरेन्स कर देना जैसा कुछ करके दिखाते रहते हैं जिससे कि यह लगता रहे कि RTI कानून को मजबूत करने के लिये संघर्ष जारी है, अब चूंकि वेतनभोगी लोगों को वेतन इन्ही बड़े सामाजिक लोगों के ही जुगाड़ों से मिलता है इसलिये कोई अाये या ना अाये किंतु वेतनभोगी लोग अौर भविष्य में वेतनभोगी बनने की लालसा वाले लोग तो जरूर ही पहुंच जाते हैं।

    इस तरह के तरीकों से बड़े फंड का जुगाड़ भले ही बनता हो, कुछ पुरस्कारों का जुगाड़ बन जाता हो, मीडिया के ग्लैमर का भी अानंद लिया जा सकता हो, किंतु जमीनी यथार्थ में तो अाम अादमी अौर सुचना का अधिकार दोनों ही अौर कमजोर होते जाते हैं।

    उत्तर प्रदेश के एक बड़े सामाजिक सेलेब्रिटी  जिनको कि RTI के कामों का बड़ा पुरोधा माना जाता है अौर इनको अमेरिका के भारतीय मूल के लोगों से करोड़ों रुपये का फंड RTI के कामों के लिये दिया जा रहा है। यह महोदय RTI के लिये इतने प्रतिष्ठित हैं कि जिसके उपर हाथ रख देते हैं उसको RTI का विशेषज्ञ मान लिया जाता है, जिसको कह देते हैं उसको खराब अौर भ्रष्ट मान लिया जाता है।

    इन्ही सेलेब्रिटी महोदय के कुछ मुख्य कार्यकर्ता लोगों ने ग्राम स्तर के तथा ब्लाक स्तर के जन प्रतिनिधियों से इस बात पर पैसे लेने शुरु किये कि ये लोग उन लोगों पर RTI नही लगायेगें।    इन सामाजिक सेलीब्रिटी महोदय ने खुद की सूडो इमानदारी व सूडो पारदर्शिता दिखाते हुये खुद अपने ही कार्यकर्ताअों के उपर खुद ही लेख लिख कर पाकसाफ साबित करने का प्रयास किया, लेख भी कुछ इस प्रकार की शैली से लिखे गये कि लेख पढ़ने से ऐसा लगता है कि जैसे इन सेलेब्रिटी महोदय का कार्यकर्ताअों से कोई संबंध नही है बल्कि इनकी खोजी पत्रकारिता की देन है।

    इन्ही सेलिब्रिटी महोदय ने अपने एक चहेते कार्यकर्ता को एक बड़े जिले में RTI के काम करने वाले के रूप में कैसे स्थापित किया इसको भी देखा जाये,  इन महोदय नें उस जिले में खूब प्रेस कान्फरेन्सेस की ंअौर अपने चहेते को मीडिया में स्थापित किया, एक छोटे से धरने को विदेश के एक अखबार में अपनें संपर्कों का प्रयोग करवाते हुये छपवाया, ताकि क्षेत्रीय प्रशासन अौर अाम अादमी को लगे कि इनके चहेते जी बहुत बड़े अादमी हैं इसलिये यदि वह RTI लगायें तो डरा जाये अौर RTI का जवाब दिया जाये।

    कुछ लोगों को RTI के कामों के लिये वेतनभोगी कर्मचारी भी बनाया गया, जिनका कि प्रयोग धरना प्रदर्शन अौर प्रेस कान्फेरेन्सेस अादि करने में किया जाता है।

    हो सकता हो इस प्रकार की चोचले बाजियों से फंड का जुगाड़ या खुद को महापुरुष सिद्ध करके पुरस्कारों की लॅाबिंग का जुगाड़ बनता हो, किंतु अाम अादमी अौर अाम समाज को मजबूत नही हो पाता।  क्योकि अाम अादमी के पास कोई तंख्वाह नही होती, कोई सेलेब्रिटी पीछे नहीं होता, कोई रिश्तेदार विदेश नहीं में रहता जिससे कि छोटी बात को बहुत बड़ी बात बना कर किसी विदेशी अखबार में छपवाया जा सके।  

    यही कारण है कि इतने विश्वास, इतने संसाधन, धन तथा मानवीय संसाधनों का प्रयोग करने के बावजूद ये लोग RTI को अाम अादमी के लिये मजबूत क्यों नही कर पाये।

    इन्हीं महोदय के एक अौर कार्यकर्ता हैं जिनका कि लगभग दो साल पहले सन् 2007 में मुझसे अाक्रामक रूप में कहा था कि उन्होनें RTI लगाकर लगाकर अपनें जिले को अादर्श-जिला बना दिया है।    उनका दावा था कि अब उनके जिले में स्वराज अा चुका है अौर यह उनकी मेहनत अौर RTI लगानें के कारण हुअा है।

    NGO प्रायोजित कथित-यथार्थों के लिये जमीनी यथार्थ महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि इनके द्वारा प्राप्त किये जाने वाले लाखों करोड़ों रुपये सालाना  के फंड का जस्टीफिकेशन अधिक महत्वपूर्ण होता है, प्रायोजन महत्वपूर्ण होता है।

    इन सब बातों से RTI कमजोर हुअा है अौर ऐसे बहुत लोग बहुत हतोत्साहित हुये हैं जिन्होनें RTI को पैसे कमाने या मीडिया के ग्लैमर का मजा लेने या फंड का जुगाड़ नहीं माना बल्कि एक अाम अादमी की हैसियत से RTI को मजबूत करने का प्रयास करनें की भावना के साथ अपनें दम भर प्रयास करनें की प्रतिबद्धता में जीते रहे।

    NGO जगत के बड़े प्रोफेशनल लोगों तथा इनके वेतनभोगी लोगों के कारण RTI कानून कैसे कमजोर होता जा रहा है, अाईये इस पर चर्चा किया जाये।   —

    इन लोगों के कारण सूचना का अधिकार एक बड़ा हव्वा बन गया है, अाम अादमी सोचने लगा है कि सूचना का अधिकार लगाने के लिये धरना करना, प्रदर्शन करना, प्रेस कान्फेरेन्स करना या किसी बड़े अादमी का बैकअप होना बहुत जरूरी है।

    जिन लोगों को तन्ख्वाहें मिलती हैं तथा मीडिया का ग्लैमर का भोग लगाने को मिलता हो, वे लोग यह क्यों चाहेगे कि सूचना का अधिकार कानून अाम अादमी के लिये सहज उपलब्ध हो जाये।   चूंकि पिछले चार सालों में अधिकतर अावेदन इन जैसे वेतनभोगी व सामाजिक प्रोफेशनल लोगों के द्वारा ही दिये गये हैं इसलिये यह मानकर कि सभी लोग RTI के विशेषज्ञ हो चुके हैं, फार्म भरने जैसे नियम बनाकर या अावेदन फीस बढ़ाने का काम सरकारी विभागों द्रारा किया जा रहा है। 

    भारत की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग ऐसा है जो कि लिखना पढ़ना नही जानता है तो फार्म भरने की बात सुनकर ही कांपने लगते हैं, फार्म भरने की प्रक्रिया होने से अधिकारियों को बैठे बिठाये अावेदन को निरस्त करने का अधिकार मिल जाता है क्योकि फार्म सही तरीके से नही भरा गया।

    कुछ राज्य सरकारें सूचना के अधिकार को कमजोर करना चाहती हैं तो फिर हो हल्ला मचाया जाता है, किंतु क्या कभी इन अति प्रतिष्ठित सामाजिक सेलेब्रिटियों द्वारा खुद का अोढ़ी हुयी सूडो ईमानदारी से ऊपर ऊठ कर मूल्यांकन किया जाता है कि इस कानून को कमजोर करने में उनका अपना खुद का कितना हाथ है?

    लेख के अंत में एक गंभीर घटना का उल्लेख करना चाहता हूं।

    तकरीबन 3 साल पहले सन् 2006 में मुझे IIT Bombay में कुछ अधिक पढ़े लिखे लोगों ने इस बात पर RTI पर शैलेष गांधी जी के सेमिनार में घुसने से रोक दिया था क्योकि मेरा यह कहना था कि सूचना का अधिकार एक सहयोगी अौर अपूर्ण कानून है, बाद में इस शर्त में घुसने दिया था कि यदि शैलेष जी कहेंगे तो भी मैं कुछ नहीं बोलुंगा बाकी लोगों को सक्रिय भागीदारी करनी थी किंतु मुझे केवल सुनना था।

    शैलेष जी ने अपनी बात की शुरुअात ही इस बात से की थी कि भारत के लोगों को अाजादी के समय स्वराज नहीं मिला था किंतु इस कानून के अाने से हमें स्वराज मिल गया है अौर हम सभी को स्वराज का अानंद लेना चाहिये।   मैं पूरे सेमिनार में कुछ नहीं बोला था किंतु मैं उनकी स्वराज वाली बात से सहमत नहीं था।

    अाज वही शैलेष जी जो कि RTI कानून को स्वराज का अाना कहते थे, अाज खुद सूचना अायोग के सर्वोच्च पदों में से अासीन है, तो अाज मैं उनसे पूछना चाहुंगा कि क्या सच में ही RTI कानून बनने से अाम समाज स्वराज का भोग कर रहा है?   यदि शैलेष जी कहेंगें कि अाम अादमी स्वराज का अानंद ले रहा है, तो मैं यह समझूंगा कि उनको भारतीय अाम अादमी कि जमीनी हकीकत की ठोस जानकारी नहीं है, हो सकता है कि शैलेष जी को स्वराज मिल चुका हो किंतु असली भारत तो अभी भी असली अाजादी की बाट जोह रहा है जो कि दिन प्रतिदिन अौर भी दूर होती जा रही है।

    भारत की जनसंख्या के बहुत बड़े भाग ने Internet के प्रयोग की बात तो दूर कभी Computer नहीं देखा है।  जो बहुत छोटा भाग Internet का प्रयोग भी करता है उसका भी बहुत ही छोटा भाग ऐसा है जो कि Internet में क्रान्तिकारिता की बात करता है, इनमें से भी अधिकतर लोग वे हैं जो कि ऊंचे वेतन देने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी करते हैं। तो इस अानलाईन क्रान्तिकारिता में कितनी ठोस व यथार्थ दम हो सकता है असली भारत के सामाजिक परिवर्तन के लिये इसका अांकलन सहजता से किया जा सकता है।

    इस बिंदु को समाप्त करने के पहले यह भी बताना चाहता हूं कि मुझे कोई ताज्जुब नही हुअा था कि सूचना के अधिकार के सेमिनार में एक अादमी को बोलने से मना किया गया था, किंतु यह अनुमान जरुर ही हो गया था कि भारतीय समाज का ऊंची डिग्री धारी अौर MNC में नौकरी करने वाला युवा वर्ग यही सोचता है कि समाज को समझना व सामाजिक परिवर्तन से बहुत अधिक कठिन है किताबी सवालों को हल करके डिग्री पाना अौर अधिक पैसे की नौकरी करना।

    यही सोच इस वर्ग के अंदर अहंकार अौर भ्रम पैदा करती है कि वे ही सबसे बेहतर समझते हैं अौर उनके पैसों के दम पर ही सामाजिक बदलाव संभव है।

    इस वर्ग के कुछ लोग घर बैठे क्रान्तिकारी बनने के लिये भले ही Internet में Online Groups में कुछ लिखा पढ़ी करना शुरु कर दिये कि यह कानून बहुत अच्छा है वास्तविक अाजादी दिलाने वाला है वगैरह वगैरह, किंतु इनमें से कितने लोगों ने खुद कितनी गंभीरता से RTI का प्रयोग किया है जबकि इस कानून का प्रयोग घर बैठे कोई भी कर सकता है,  यह बहुत ही अावश्यक प्रश्न है।

    बहुत लोग कहीं से Forward हुयी मेल पाकर उसी को फिर अागे Forward करने को ही बहुत बड़ी क्रान्तिकारिता के रूप में लेते हैं या अाजकल अानलाईन पिटीशन्स रूपी क्रान्तिकारी होने अौर सक्रिय जागरूक होने का नया फैशन चला है तो उसमें अपना नाम लिख कर लोग खुद को क्रान्तिकारी या सक्रिय होने का शौक पूरा कर लेते हैं अौर अंदर के अहंकार को पोषित कर लेते हैं।

    अब ई-मेल्स कब तक अौर कितनी बार फारवर्ड की जा सकती हैं, कितनी वेबसाइट्स में अानलाईन पिटीशन बनाये जा सकते हैं?  तो इस प्रकार की क्रान्तिकारिता जो कि कुछ समय तक RTI के कानून के लिये हुयी अौर समय के साथ धीरे-धीरे खतम भी हो गयी।

    अब कुछ नये मुद्दे अा गये हैं अानलाईन क्रान्तिकारिता के बाजार में, कुछ समय बाद कुछ अौर नये मुद्दे अायेंगें, लोग क्रान्तिकारी बनते रहेंगे अौर भारत की अधिकतर अाबादी शोषण अौर गुलामी भोगती रहेगी।  यही नियति बन चुकी है अब भारत के अाम अादमी अौर अाम समाज की।  जय़ हिंद।

  • बड़का किस्म के सेलिब्रेटी समाज सेवी लोगों/ मैगसेसे पाने के कुछ बेहतरीन नुस्खे/ टोटके

    बड़का किस्म के सेलिब्रेटी समाज सेवी लोगों/ मैगसेसे पाने के कुछ बेहतरीन नुस्खे/ टोटके

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग 

    (भारतीय समाज की सामाजिक क्षेत्र की हकीकतों पर कटाक्ष-व्यंग्य)

    प्रबुद्ध पाठकों इस लेख में कोई कमी बेसी हो तो जरूर बताईयेगा, मैं भी प्रयास करूंगा कि इस लेख को और परिष्कृत कर पाऊँ ताकि यह व्यंग्य लेख सत्य घटनाओं के आधार पर लिखा होने के बावजूद किसी को सीधी चोट नहीं पहुचाता हुआ नही लगे।

    हजारों लाखों नौजवान साथियों से अनुरोध हैं कि यदि आप सच में भारतीय आम समाज के प्रति ईमानदार हैं तो इन बड़े बड़े टोटका गुरुओं कों अपना आदर्श नहीं मानें, आपनी आँखें खोलें और अपने अंदर की आत्मा की आवाज को सुने और समाज में काम करते रहें।  भारत में पचासों मैगसेसे वाले हो चुके हैं, हर साल और भी विदेशी पुरस्कार लोगों को मिलते रहते हैं, इनमें से अधिकतर ऐसे ही टोटका गुरु हैं।  यदि ये टोटका गुरु लोग सच मे ही भारत के लोगों के प्रति इमानदार होते तो आज भारत की दशा ही कुछ और होती।  भारत की ऐसी तैसी करने में नेताओं और ब्योरोक्रेट्स के साथ साथ इन टोटका गुरुओं का भी कोई कम हाथ नहीं।  ये टोटका गुरु लोग कभी अपने आप को नहीं बदलेंगें, टोटका गुरु होना भी एक उच्चस्तरीय स्थापित अभिजात्यीय रोजगार है जो कि ग्लोबाल ईकोनोमी की देन है और एक बड़ा मजबूत व्यवस्थित तंत्र है।  इसलिये टोटका गुरुओं से वास्तविक सामाजिक ईमानदारी व प्रतिबद्धता की अपेक्षा करना आखें होते हुये भी अंधे बनने जैसा ही है।   साथियों आप अपने ऊपर विश्वास करना सीखिये और इन टोटका गुरुओं को अपना आदर्श मानना छोड़ें,  ये लोग भारतीय सामाजिक क्षेत्र की वे जोंकें हैं जो हमारा आपका ही खून चूस-चूस कर खुद को बिना कुछ किये ही बड़ा बनाते हैं।

    विशेष-
    यह लेख सत्य पात्रों पर आधारित है, किंतु पात्रों के नाम बदले जा रहे हैं।  जिन महापुरुष की कहानी दी जा रही है वह बहुत आदरणीय हैं और हम सभी के टोटका गुरू हैं, सोनिया गांधी जी ने भी कुछ नुस्खे इन्हीं टोटका गुरु से ही सीखे हैं, लेख पढ़िये मालुम पड़ेगा।  टोटका गुरु बहुत ही बड़े वाले असली किसम के महापुरुष हैं।  जो कि विनम्रता की प्रतिमूर्ति हैं और साथ ही साथ बहुत ही बड़का वाले कर्मठ हैं और दलितों के मसीहा  हैं, इन्ही गुरु जी के प्रताप से आज घूमंतू पिटारा यह नुस्खे पेश कर पा रहा है।

    टोटका गुरु के टोटके/ नुस्खे-

    टोटका गुरू जी यदि आप मेरे सौभाग्य से यह पिटारा पढ़ रहे हैं तो मुझे उम्मीद है कि आप मुझे मन ही मन आशीर्वाद दे रहे होगें क्योंकि आपकी टोटका कला का लाभ हजारों लाखों लोग उठायेगें और आपको दुवायें मिलेंगी।

    यह सारे नुस्के और टोटके अपने टोटका गुरू के खुद के आजमाये हुये हैं।  बहुतों को इनसे फायदा मिला है, कुछ लोगों कों मैगसेसे अवार्ड मिला है, इनमें से कुछ तो नोबल के जुगाड़ में लगे हैं, घूमंतू पिटारे को पूरी उम्मीद है कि इनमें से टोटका गुरु को तो नोबल जरूर मिलेगा ही मिलेगा।  बहुत से लोग कई साल से टोटका कर रहे हैं।  ये लोग हार नहीं मानें उम्मीद की जाती है कि भविष्य में ग्लोबल ईकॅानोमी बड़ने के साथ साथ ऐसी व्यवस्था भी बनेगी कि सभी टोटका करने वालों की जेब में दो चार मैगसेसे या इस किसम के अवार्ड पड़ें रहेंगें जिससे अखबार में छपते समय या विदेश जाने के समय या फंड पाने के समय या फंड के लिये किसी को रेको देते समय या खुद को इमानदार या किसी को बेईमान सिद्ध करते समय या बड़ी किसम की मीटिंगों में जाते रहने के लिये या हवाई यात्राओं को करते रहने जैसे अति महत्वपूर्ण अवसरों में जरूरत पड़ने पर तुरंत जेब से निकाल कर दिखाये जा सकने रुपी भोकाल टाईट करने का सुभीता भी रहेगा।

    आपका अमेरिका से पढ़ा हुआ होना बहुत जरूरी है वरना लोग आपको त्यागी, ईमानदार, प्रगतिशील और बौद्धिक नही मानेंगें, और फिर बड़े व विदेशी पुरस्कारों की सेटिंग तो अमेरिका में आपके साथी कितना आपके बारे में ढोल मजीरा बजा पाते हैं इन सब बातों पर ही निर्भर करता है।  अब अपने टोटका गुरु को ही लीजिये, इन्होनें आज तक कोई भी काम जमीन में नहीं किया है फिर भी जमीनी नेता होने के सबूत  के तौर पर मिला मैगसेसे अवार्ड जेब में पड़ा रहता है।   यह टोटका बिलकुल भारत की अदालतों की तरह है मसलन आप बीच चौराहे में किसी की हत्या कर दीजिये भले ही आपको हत्या करते हुये हजारों लोगों ने देखा हो किंतु यदि आपके पास ऊँचे जुगाड़ हैं अौर सेटिंग करके आपने अदालत में सबूत दे दिया कि आपने हत्या नहीं की तो फिर अाम आदमी की गवाही का कोई मतलब नहीं होता,  बिलकुल उसी  तरह आपके जेब में आपके जमीनी नेता और ईमानदार होने का एक ऐसा सबूत पड़ा होना बहुत जरूरी है जो कि आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर हो ताकि जरूरत पड़ने पर आप उस सबूत को पटाक से दिखा सकें जबकि आम आदमी क्या दिखायेगा, लीजिये आप बाजी मार गये।

    सबूत के फेवर में टोटका गुरु एक बहुत बड़ी किसम वाली बात और कहते हैं, उनका कहना है कि आपके पास सबूत है यह बड़ी बात है, आप काम क्या करते हैं या नहीं करते हैं इस बात का कोई मतलब नहीं।  टोटका गुरू अपने इस टोटके के फेवर मेँ बहुत ही लाजवाब तर्क पेश करते हैं, उनका कहना है कि यदि दो लोग हैं, एक काम करता है जबकि दूसरे के पास काम करने का सबूत है तो अब दुनिया भर के वे बड़का लोग जो कि आपके जमीनी होने का, आपके ईमानदार होने का, आपके कर्मठ होने का बड़का किसम का उच्चस्तरीय सबूत देते हैं, उनके पास इतना टाईम और संसाधन कहां हैं कि वे करोंड़ों-अरबों लोगों के पास जायें और जांचें कि कौन क्या कर रहा है असलियत में।  इसलिये जरूरी यह है कि सबूत जेब में आ जाये,  तो सारा दिमाग, सारा तिकड़म, सारी ऊर्जा केवल और केवल उन नुस्खों और टोटकों में लगानी चाहिये जिनसे सबूत मिल सके।   सबूत होता है काम्पैक्ट, जेब में डाल लिया जिससे जरूरत पड़ने पर जेब से निकाल कर तुरंत दिखाया जा सकता है।   अब काम को कैसे लेके घूंमा जा सकता है, जितना अधिक गहरा जमीनी काम होगा उतना ही दिखाने में दिक्कत दिखायें तो दिखायें कैसे,  इसलिये काम्पैक्ट होने और बनाने की तकनीक को भी खास नुस्खों के रूप में आजमाना बेहतर रहता है और असल में यही असली किसम वाली प्रगतिशीलता है,  बाकी सारी प्रगतिशीलतायें कथित किसम वाली प्रगतिशीलतायें होतीं हैं।

    टोटका गुरु के जीवंत उदाहरण से प्रेरणायें ली जा सकें, नुस्खे लिये जा सकें, असली किसम वाली ईमानदारी/प्रतिबद्धता/प्रगतिशीलता सीखी व समझी जा सके इसलिये जरूरी है कि इनके बारे में अौर भी जाना जाये।

    तकरीबन 20 साल पहले टोटका गुरु ने एक बहुत ही छोटे से दलितों के गांव (गांव क्या कहियेगा, इसको एक छोटा पुरवा कहिये) में अपने रिश्तेदारों से जुगाड़ लगा के अपनी ही जाति के लोगों मतलब ब्राम्हण लोगों से कुछ जमीन ली थी।    हुया यूँ कि अपने टोटका गुरु का ब्राम्हण होना बहुत लाभकारी हुआ,  क्योकि एक मात्र ब्राम्हण ही तो है जो कि केवल किसी दलित को छू ले या दलित को अपने बराबर में बैठा ले या दलित के घर में खाना खा ले या दलित से हाथ मिला ले तो बड़का क्रान्तिकारी हो जाता है।    टोटका गुरु भी इन्हीं नुस्खों से बड़का क्रान्तिकारी के रूप में लिये जाने लगे।  मेधा पाटकर जी से गहरे पारिवारिक संबंध होना भी बहुत काम आता है,  आप कहीं एक पाखानाघर बनवाईये और मेधा जी को बुला लीजिये उद्घाटन के लिये, कुछ पत्रकारों कों बुला लीजिये थोड़ा टीम टाम खड़ा कर लीजिये, मेधा जी भी खुश पत्रकारों को देखकर इधर आपका टोटका फिट हो गया बहुत बड़े किसम के काम करने का पक्का सबूत, इन्हीं सबूतों को जमा करते जाईये और फिर किसी विदेशी टाईप के बड़े सबूत के लिये आवेदन करिये या करवा दीजिये और लाईन में लग जाईये।

    एक बात जरुर ध्यान रखें कि किसी को बतायें नहीं कि आपने किसी विदेशी अवार्ड के लिये पक्का जुगाड़ लगा रखा है, अवार्ड मिलने पर कुछ ऐसी बेहतरीन नौटंकी कीजिये कि भोले भाले लोगों को लगे कि दुनिया भर में छानबीन करने के बाद खूब खोजने के बाद आप जैसे महापुरुष का चुनाव किया गया है। विश्वास कीजिये यह नुस्खा काम आता है, टोटका गुरु के जीवन में तो यह नुस्खा बहुत ही काम आया है।   यदि आपको मैगसेसे जैसे किसम का कोई अवार्ड मिल जाये तो अपने साथियों से मैगसेसे अवार्ड को एशिया का नोबल अवार्ड इस किसम की कोई भोकालबाजी करवाते रहिये तो भोलेभाले लोग आपको परमानेन्ट देवता मानते रहेंगें।    अब यदि मैगसेसे अवार्ड यदि सच में ही एशिया का नोबल होता तो फिर सभी को पता ही होता कि यह एशिया का नोबल अवार्ड है जैसे कि नोबल के बारे में सबको पता रहता है कि यह नोबल अवार्ड है।  लेकिन यदि यह एशिया का नोबल ना भी हो तो भी चूंकि आपको आगे नोबल अवार्ड के लिये टोटकें करनें हैं तो अपने खास साथियों से एशिया का नोबल जरूर कहलवातें रहें, इस नुस्खे से फायदा यह होता है कि नोबल के लिये आपकी दावेदारी मजबूत होती है भोले भाले लोगों को भी यह महसूस होता है कि चूंकि आपको छोटका वाला नोबल मिल चुका है तो अब बड़का वाला आज नहीं तो कल मिल ही जायेगा।  तो लोग आपके पीछे लगे रहते हैं कि जब आपको बड़ी चासनी मिलेगी तो उनको भी कुछ बचा खुचा मिलेगा ही मिलेगा।  तो इस प्रकार के लोगों की भीड़ को भी आप अपने बड़का जमीनी नेता होने के सबूत के तौर पर पेश कर सकते हैं,  आपने “इसकी टोपी उसके सर” वाली प्रसिद्ध हिन्दी फीचर फिल्म तो देखी ही होगी।   यदि दुर्भाग्यवश नहीं देखी है तो जरूर देख लेंवें क्योकि अपने टोटका गुरु ने बहुत बार देखी है।

    टोटका गुरु को कई साल पहले एक पैरा ऊपर वाले नुस्खे को करते रहने से मैगसेसे अवार्ड मिल गया था।   किसम किसम के नुस्खों के असर के कारण टोटका गुरु को इस दलित-गांव और दलित सशक्तीकरण के नाम पर पचासों लाख रुपये तो मैगसेसे के पहले ही मिल चुके थे, जबकि पता नहीं क्यों बिचारे इस दलित गांव और इसके गांव वालों की हालतें 20 साल से दिन ब दिन पहले से और बदतर ही होती जा रही हैं।  यहां टोटका गुरु का काम्पैक्ट नुस्खा कितना काम आता है, क्योंकि असलियत देखने कौन आता है, असलियत देखने की जरूरत ही नही पड़ती क्योकि टोटका गुरु की जेब में बहुत सारे बड़का किसम वाले सबूत जो पड़े हुये हैं, जहां जो सबूत फिट हो सकता है टोटका गुरु फटाक से जेब से निकाल कर तुरंत फिट कर देते हैं।   अब सोचिये कि ये नुस्खे कितने बेहतरीन हैं। बताया तो कि खुद टोटका गुरु के अपने खुद के जीवन में अपनाये हुये टोटके हैं।

    टोटका गुरू एक फंडिग एजेंसी के जन्मदाता भी है तो अब जो दाता है उसको को दूसरे का मूंल्यांकन करने का अधिकार तुरंत बैठे बिठाये मिल जाता है सो अपने टोटका गुरु इसी चलताऊ नुस्खे का इस्तेमाल करते हुये सामाजिक क्षेत्र में उतरने के पहले ही दिन से दूसरों का ही मूल्यांकन करते आ रहे हैं कि कौन बेईमान है, कौन ईमानदार है, कौन काम करता है या कौन काम नहीं करता है।  अब चूंकि टोटका गुरु पैसा फंड करते हैं तो अब कौन माई का लाल था जो कि टोटका गुरु से पूछे कि टोटका गुरु खुद कौन सा काम करते हैं।   चूंकि टोटका गुरु फंड भी देते हैं इसलिये भारत की बेरोजगारी में 10-50 लोगों की भीड़ फंड की चूसनी दिखा कर जमा करना कौन सी बड़ी बात इसलिये  इन्होने एक नया नुस्खा निकाला कि जब मन आ जाये धरना करो, उपवास करो और यह सब करने में किराये की भीड़ तो उन लोगों से ही आ जायेगी जिनको कि ये फंड देते हैं या फंड की चूसनी दिखाते हैं।  अब यदि साल में 10-20 बार सिर्फ 10-20 आदमी की भीड़ जमा करने से हर एक को लाखों रुपये का फंड हर साल मिल जाये तो फिर किसको दिक्कत है कहीं भी भीड़ ले कर पहुंच जाने में फिर किराया भाड़ा कौन सा अपनी जेब से लगना है।  किराया-भाड़ा तथा और खर्चे के मामलों के लिये टोटका गुरु के अलग विशेष नुस्खे हैं जिनकों कि आप सरल भाषा में अकाऊंट ऐडजेस्टमेंट के रुप में जान सकते हैं।

    यहां थोड़ा सा हिंट लीजिये कि क्यूं टोटका गुरु नें अपनी संस्था को चलाने वाले लोग सिर्फ और सिर्फ अपने ही देखे भाले अपनी ही जाति के अपने ही रिश्तेदार लोग बना रखे हैं।   यह भी एक लाजवाब नुस्खा है कि मसीहा बनो दलितों के, अवार्ड चापो दलितों के लिये काम को दिखा कर,  लाखों करोंड़ों का फंड चापो दलितों के नाम पर किंतु पैसे का सारा मामला रखो अपनी ही खास जाति के अपने ही रिश्तेदार लोगों के हाथों।    कोई इस बात को मुद्दा नही बनाये इसलिये दिखावटी लोकतंत्र का ढकोसला भी संस्था के अंदर करते रहना भी एक लाजवाब टोटका है।   तो यही सब दिखा दिखा के और मीडिया मैनेज करके, टोटका गुरु ने खुद को बिना जमीन में कुछ किये ही खुद को दुनिया भर में बड़का जमीनी नेता सिद्ध करवा दिया।    इनकी खुद की ईमानदारी पर कभी कोई प्रश्न उठाने की हिम्मत ना कर सके इसलिये समय समय पर दूसरों को बेईमान कहना तथा अपनी जेब में पड़े सबूतों को भी निकाल निकाल के दिखाते रहना भी इनके नुस्खे हैं।

    टोटका गुरू तो जानते ही नही थे कि मैगसेसे के बाद भारत में किसी को कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती इसलिये इनको भी खुद धरने प्रदर्शन करने की जरुरत नही है इसलिये मैगसेसे मिलने के बाद भी कुछ समय तक तो खुद ही धरना प्रदर्शन किया करते रहे।  फिर धीरे धीरे जब समझ में आया कि धरना करने की खुद कोई जरूरत नहीं है, क्योकि धरना प्रदर्शन का टोटका तो टोटकागुरु मीडिया का ध्यानाकर्षण करने के लिये करते थे और अब तो मीडिया खुद ही खोजते हुये आता है क्योकि टोटका गुरु की जेब में मैगसेसे जो पड़ा है।   मीडिया में इनका  भोकाल बना रहे इसलिये हर साल किसी ना किसी बहाने से अमेरिका घूम आते हैं इनके घूमने का खर्चा भी अपने प्रबुद्ध अप्रवासी भारतीय लोग उठाते हैं और खुद को गौरवांवित भी महसूसते हैं।    है ना अपने लाजवाब टोटका गुरु का लाजवाब टोटका।

    बढ़ती उम्र के साथ साथ टोटका गुरु ब्रह्मज्ञानी भी होते जा रहे हैं, अब टोटका गुरु भारत की छोड़िये दुनिया की कोई भी बड़ी समस्या हो उसके लिये दो चार ठो प्रेस कान्फेरेन्स करके समाधान का कोई नुस्खा दे देते हैं और प्रेस वार्ता करते ही समाधान हो जाता हैं।  यदि एक बार में समाधान नही मिलता तो कुछ महीने बाद फिर दो चार ठो प्रेस कान्फेरेन्स कर देते हैं।  अब चूंकि ये हैं एक फंडिग एजेन्सी के जन्मदाता तो बहुत बेरोजगार लोग इनको मक्खन लगाते रहते हैं जिसने बड़िया प्रेस कान्फरेन्स कर दी या इनके लिये 100-50 की भीड़ जमा दी  तो  उसके लिये अमेरिका दो चार ठो ई-मेल मार कर पहले तो बड़का क्रान्तिकारी बताते हैं फिर कुछ तन्ख्वाह मंगा लेते हैं।  अलग अलग कामों के लिये इनके पास अलग अलग किस्म के चेले हैं, जिसके उपर गुस्सा हो गये उसको बेईमान बता दिया या यह बता दिया कि फलाने अब कुछ कम कमिटेड हैं, तो तुरंत तन्ख्वाह बंद।

    टोटका गुरु बिचारे समाज के लिये इतने अधिक कमिटेड हैं कि इनको कही भी कोई समस्या सुनने को मिल जाये जिसमें कि दो चार ठो प्रेस कान्फेरेन्स का जुगाड़ का टोटका बनता हो तुरंत पहूंच जाते हैं।   टोटका गुरु नार्थ ईस्ट की समस्या का समाधान करने के लिये वहां दो चार प्रेस कान्फेरेन्स कर चुके हैं हो सकता हो कि दो चार NGO को फंड भी दे रहे हों ताकि प्रेस कान्फेरेऩस करते रहने का स्थायी जुगाड़ बन जाये।   बिहार में 2008 में बहुत भीषढ़ बाढ़ आयी थी, टोटका गुरु लगभग 3 महीने बाद बाढ़ देखने गये थे और कुछ घंटे रुके थे और अपने वेतनभोगी लोगों से कुछ गपशप और हसीठठ्ठा टाईप की बातचीतें किये थे और फिर अपने घर लौट गये थे, घर लौटते ही बहुत लंबी रिपोर्ट लिखी थी और एक सच्ची रिपोर्ट कहते हुये अमेरिका के अप्रवासी भारतीयों को भेजी थी।   तो टोटका गुरु इतने बड़े वाले ब्रह्मज्ञानी होते जा रहे हैं कि कुछ घंटे में गपशप मारकर ही सारी बातें समझ जाते हैं और समाधान भी पेश कर देते हैं, जबकि इन्हीं बातों कों समझने के लिये हमारे आप जैसे लोगों को महीनों खपाने पड़ते हैं और बहुत सारी दिक्कतें झेलते हुये बहुत जगह जाना पड़ता है और बहुत लोगों से मिलना जुलना पड़ता है।  टोटका गुरु के किसम का मतलब बड़का किसम का ब्रह्मज्ञानी होने का यह भी एक काम्पैक्ट किसम का फायदा है।

    बहुत सालों से टोटका गुरु केवल मीटिंग करते रहते हैं या मीटिंग में भाग लेते हैं, इनकी मीटिग को मीटिग भी ना कहा जाये बल्कि प्रेस कान्फेरेन्स करने के लिये मीटिंग कहा जाये तो नुस्खा बेहतर तरीके से समझ में आयेगा।    भारत में ही नही अमेरिका वगैरह देशों में भी मीटिंग कर आते हैं।  मीटिगों में इतना व्यस्त की महीना में कई कई बार तो हवाई यात्रायें करनी पड़ती हैं।   ना ना ये कोई बिजनेसपरसन नही हैं यह  तो खुद को बहुत बड़का वाला जमीनी कार्यकर्ता कहते हैं केवल कहते ही नहीं हैं इनके पास देश विदेश के बहुत सारे प्रूफ भी हैं जो इनको जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता सिद्ध करते हैं।

    नोबल अवार्ड पाने की जुगत में लगे टोटका गुरु ने एक नया नुस्का निकाला है, जितने भी मुद्दे भारत में हैं जिसमे प्रेस कान्फेरेन्स का टोटका बनता हो, उन सभी में ये पहुंचने का प्रयास करते हैं, केवल कुछ काम्पैक्ट किसम की बेहद जरूरी चीजें अपनी जेब में डाल लेते हैं, मसलन मैगसेसे, फंड का जुगाड़, अमेरिका के ईमानदार किसम के असली किसम के प्रगतिशील भारतीय पत्रकारों का जुगाड़ और पहुच जाते हैं, अब चूकि बहुत सारे समाधान करने होते है तो तुरंत एक प्रेस कान्फेरेन्स करते हैं और समाधान करके अगले ही दिन या उसी दिन किसी और मुद्दे में किसी दूसरी प्रेस कान्फेरेन्स में समाधान देने के लिये निकल जाते हैं।   हमको तो पूरा उम्मीद है कि इनके लिये एक विशेष नोबल निकाला जायेगा जिसका नाम होगा  “प्रेस कान्फेरेन्स करके समाधान करने की विशिष्ट तकनीक”  क्षेत्र का नोबल।

    टोटका गुरु तो बीसियों सालों से दलितों के बहुत बड़े मसीहा के रूप में खुद को एक से बड़कर एक नुस्खों के दम पर प्रायोजित किये हुयें हैं,। जब कहीं कोई मुद्दा नहीं मिलता है प्रेस कान्फेरेन्स करने को तो अपनी जेब में इसी प्रकार की जरूरी ईमरजेन्सी में प्रयोग करने के लिये पड़े दलितों से जुड़े किसी मुद्दे में दो चार ठो लेख लिख मारते हैं और लेख लिखते समय मैगसेसे भी जेब से झलका देते हैं।   यह भी सब खुद को दलित मसीहा साबित करने का टोटका हैं, जो कि टोटका गुरु जमाने से सफलतापूर्वक आजमाते आ रहे हैं।

    टोटका गुरु का कहना है कि यदि आप कुछ ऐसा नुस्खा आजमायें कि लोगों को लगे कि आप बहुत कुछ बड़ा छोड़ रहे हैं जबकि वास्तव में आप कुछ भी ना छोड़ रहे हों,  तो टोटकों का असर जल्दी होता है।  अपने टोटका गुरु इस कला के बहुत बड़े खिलाड़ी हैं।   टोटका गुरु का कहना है कि लोग आपको महापुरुष मानते रहें और कभी आपके द्वारा खेले जा रहे खेलों की ओर ध्यान ना ले जा पावें, इसलिये समय समय पर कुछ ऐसा दिखाते रहना बहुत जरूरी है कि आप कुछ बहुत बड़ा त्याग कर रहे हैं जबकि वास्तव में आप कुछ भी ना छोड़ रहे हों।

    लोग कहते हैं कि सोनिया गांधी जी ने कोई पद ना लिये हुये भी सत्ता का मुख्य केंद्र बने रहने का नया नुस्खा ईजाद किया है।  यह सरासर अपने टोटका गुरु का भीषण अपमान है, सुनते हैं कि टोटका गुरु इस मुद्दे पर कापी राईट का कोई बड़ा बवाल मचाने वाले हैं जिसमें कि उनको पूरा भरोसा है कि जैसे उनकी हर बात को ब्रह्मा जी की बात मानकर उनके अप्रवासी मित्र लोग ढोल मजीरा बजाते रहते हैं और नोबल दिलवानें के जुगाड़ में कई सालों से रात दिन लगे हुये हैं, वे लोग इस मुद्दे को भी एचीवमेंट के रूप में नोबल के जुगाड़ में जरूर पेश करेंगें।   टोटका गुरु ने अपने खास अमरीकी साथियों से कह रखा है कि वे लोग जब भी टोटका गुरु के बारें में कोई बात करें तो ऐसे करें जिससे लोगों को यह लगे कि ये लोग टोटका गुरु से कोई खास जुड़ाव नहीं रखते हैं।     सच तो यह है कि  सोनिया जी ने कुछ बेहतरीन नुस्खे अपने टोटका गुरु से ही सीखे है।   टोटका गुरु ने अपनी संस्था कागजी लिखापढ़ी में छोड़ी हो लेकिन ये तो टोटका गुरु के ही टोटकों का जुगाड़ तंत्र है कि संस्था के अंदर एक पत्ता भी टोटका गुरु की मर्जी के बिना नहीं हिलता।  सोनिया जी का नुस्खा तो फेल हो सकता है क्योकि उन्होनें तो किसी गैर पर विश्वास किया है।

    टोटका गुरु ने भले ही अपनी संस्था दलितों के विकास के लिये बनाई हो किंतु संस्था को चलाने के लिये टोटका गुरु ने केवल और केवल अपनी खास जाति और अपने ही रिश्तेदारों पर ही भरोसा किया हैं, अब जहां लाखों करोड़ों रुपये का मामला हो, सामाजिक सत्ता के ग्लैमर को भोगने का मामला हो तो किसी दलित पर कैसे विश्वास किया जाता है, इस प्रकार के अभिजात्यीय विश्वास तो सिर्फ और सिर्फ अपनी ब्राह्मण जाति और अपने रिश्तेदारों मे ही किया जाना चाहिये ऐसा अपने टोटका गुरु का मानना है, और यह टोटका उन्होनें बीसियों सालों से लागू कर रखा है, भले ही उन्होने दलित उत्थान के नाम पर मैगसेसे अवार्ड किसी जुगाड़ से हड़प लिया हो किंतु उनकी अपनी संस्था में कोई दलित उत्थान टोटका गुरु ने नहीं होने दिया है, क्योकि यदि संस्था में दलित उत्थान हो गया तो उनका अपना उत्थान रुक जायेगा।

    टोटका गुरु लगातार इन्ही नुस्खों से खुद को भारतीय समाज में स्थापित किये हुये हैं और सामाजिक क्षेत्र के ग्लैमर का आनंद लिये जा रहे हैं।  किसी की हिम्मत नहीं कि उनको छेड़े या उनसे कुछ पूंछे, क्योंकि उनके पास हर बात के लिये एक टोटका है  और प्रेस कान्फेरेन्स का करने के बहाने खोजने के जुगाड़ हैं।   वह एक निहायत चतुर खिलाड़ी हैं।    ये तो सिर्फ एक टोटका गुरु की पूरी कहानी के कुछ हिस्से मात्र हैं।  इन्ही एक टोटका गुरु की बहुत लंबी कहानी है और  भारत में इन जैसे बहुत टोटका गुरु मौजूद हैं।


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  • घूमंतू का पिटारा Nomad’s Hermitage जो बोलता है तो बोलता है”

    सामाजिक यायावर


    घूमंतू यह नही कह सकता कि यह उसका सौभाग्य था या दुर्भाग्य था।  किंतु उसको भूतकाल में कई ऐसे बहुत बड़े किसम वाले सामाजिक लोगों, उनके द्वारा संचालित संस्थाअों अौर उनके सबसे निचले दर्जे के कार्यकर्ताअों के साथ काम करने का बहुत मौका मिला है।   क्या कहा अापने कि ये लोग बड़े कैसे हैं?   बड़ी उम्दा किस्म की बात पूंछी अापने  तो ये बड़े इसलिये माने जाते हैं क्योंकि इन लोगों के छींकने की, जुकाम होने पर कितनी नाक बही या अाज पाखाना एक बार में ठीक से नही उतरा  तो दो या तीन बार जाना पड़ा  ईत्यादि प्रकार की बेहतरीन किस्म की खबरें बड़े अक्षरों में मीडिया में अाती हैं। ये लोग बड़े लोग इसलिये भी होते हैं क्योंकि मीडिया को चलाने वाले लोग उनके अपने रिश्तेदार हैं या उनके साथ अभिजात्यीय संस्थानों के पढ़े हुये साथी लोग हैं जो कि भारतीय अाम समाज के संसाधनों में अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहते हैं या जिनको विदेशों से अनाप शनाप फंड अाता है या जिनके पास इस प्रकार के अार्थिक अौर अभिजात्यीय वर्ग के लोगों के साथ संबंध रूपी मानवीय संसाधन हैं कि वे विभिन्न प्रकार के विदेशी अौर देशी पुरस्कारों को पाने की सेटिंग बैठा सकें या किसी विदेशी संस्थान के पढ़े हैं।

    ये बड़े लोग अधिकांश ऊर्जा अौर उपलब्ध सामाजिक संसाधन अौर सामाजिक विश्वास का प्रयोग मीडिया प्रबंधन में लगाते हैं इससे बहुत बड़ा फायदा यह होता है कि समाज को इनके वास्तविक कामों के मूल्यांकन की जरूरत महसूस नही होती क्योकि मीडिया के द्वारा समाज को यह महसूस कराया जाता है कि ये लोग खूब काम कर रहे हैं।   ये लोग हमारे अंदर की विदेशी गुलाम मानसिकता को भी भुनाने के बड़े एक्सपर्ट हैं, अब विदेश के लोग अौर संस्थायें भारत के दूर दराज के क्षेत्रों में तो जा नही सकते हैं इसलिये वे लोग भी इन्ही लोगों की सूचनाअों अौर इनके मीडिया प्रबंधन के द्वारा संचालित की जा रही सूचनाअों पर ही निर्भर होते हैं।

    इनमें से कुछ लोग तो अब इस प्रकार के खेल खेल कर इतने अधिक उस्ताद हो चुके हैं कि ये लोग अपने प्रति समाज की अास्था बनाये रखने के लिये झूठी कहानियां बनाने, सतही मुद्दों कों अति गम्भीर मुद्दे बनाने, जमीनी सामाजिक कार्यकर्ताअों का मनोबल तोड़ने अौर उन पर घटिया मनगड़ंत अारोप लगाने जैसी घटिया हरकतों को भी करते रहने से जरा भी नहीं हिचकिचाते हैं।   ये लोग सुर्खियों में बने रहने के लिये कुछ ना कुछ प्रायोजित करते हैं।   तो घूमंतू ने सोचा कि क्यों ना इन्हीं में से कुछेक उस्तादों की उस्तादियों पर बोलने वाले पिटारे में कुछ लिख मारा जाये।

  • गाँधी होना कितना अासान ?

    सामाजिक यायावर

    यह लेख उन लोगों के लिये बहुत ही लाभदायक है जो कि गाँधी होना चाहते है, सिर्फ चाहते ही नही हैं, गाँधी होने का प्रमाणपत्र भी चाहते हैं अौर प्रमाणपत्र से प्राप्त होने वाली विभिन्न सुविधाअों का, वाहवाही का भोग भी करना चाहते हैं।  चौंकिये मत ऐसे बहुत दुकानदार हैं भारत में जो गाँधी होने का प्रमाणपत्र देते हैं अौर उनके प्रमाणपत्रों के अाधार पर ही भारत का मीडिया, विदेशी मीडिया अौर अप्रवासी भारतीय लोगों के महान होने, सामाजिक प्रतिबद्ध होने या ना होने का मूल्यांकन करते हैं।  चूँकि ये दुकानदार लोग पूरी तरह व्यवसायिक हैं अंग्रेजी में इन्हे प्रोफेशनल कहा जा सकता है।  जैसे कि भारत मे हर गली कूचे में खुलने वाले इंजीनियरिंग कॅालेज के मालिक लोग इन कॅालेजों मे पढ़ने वाले छात्रों मे से कुछ की नौकारियों का जुगाड़ करते हैं ताकि इन कॅालेजों मे अाने वाले छात्रों में इन कॅालेजों के प्रति अास्था बनी रहे उसी तरह गाँधी होने का प्रमाणपत्र देने वाले प्रोफेशनल्स अपने कस्टमर लोगों के लिये मीडिया कवरेज, प्रायोजित अान्दोलनों, विदेशों से अाने वाला फंड तथा विभिन्न प्रकार के पुरस्कारों का भी पूरा इन्तजाम करते हैं।

    जैसे कि व्यवसायिक कॅालेजों के छात्रों के कोइ रिश्तेदार यदि किसी बड़ी कंपनी में अच्छी पोस्ट मे हुये तो भले ही कैसी भी योग्यता हो केवल डिग्री होने के अाधार पर अच्छी कंपनी में अच्छी नौकरी लग जाती है, जुगाड़ मे अासानी होती है।  बिलकुल इसी तरह यदि अापके या अापकी पत्नी के रिश्तेदारों में किसी ने कभी किसी ऐसी संस्था में काम करने के बदले वेतन पाया हो जो कि गांधी के नाम पर चलती हो या गांधीवादी होने का प्रमाणपत्र रखती हो तो अापको गांधी होने का या गांधीवादी होने का प्रमाणपत्र मिलने अौर बेहतर सुविधायें प्राप्त करने मे अासानी होती है, यदि अाप भाग्य से ब्राम्हण जाति के हों तो समझिये कि अापकी दशों उंगलियां घी में अौर सिर कढ़ाहे में अाप खुद ही एक दुकानदार बन जाइये।  दुकानदार बनने के लिये बड़े अौर स्थापित दुकानदारों से संबद्धता लेनी होती है जो कि उन लोगों के प्रायोजित अान्दोलनों मे भाग लेने से या उनके लिये कुछ कस्टमरों का इन्तजाम कर देने से अासानी से मिल जाती है।  यदि अाप ब्राम्हण हैं अापके या अापकी पत्नी के कोई ऐसे रिश्तेदार हैं भी हैं जिन्होने कभी कुछ क्षणों के लिये गांधी जी के किसी अाश्रम मे जाकर कुछ देर बैठ लिया हो या कुछ चने चबा लिये हों या पानी पी लिया हो या दूर से ही गांधी जी की अावाज सुनने को पा लिये हों तब तो अापने अभी तक अपनी क्षमता पहचानी ही नही है अाप को तो गांधीवादियों का नेतृत्व संभालना चाहिये क्योकि जो योग्यतायें खुद गांधी जी को अपनी खुद की नैसर्गिक संतानों मे नही दिखी थीं वह योग्यतायें अापमें हैं अापको जरुरत है तो बस एक स्थापित दुकानदार से गांधी या गांधीवादी होने के प्रमाणपत्र की।

    अब चूंकि दुनिया में बहुत बदलाव हो रहे है दुनिया के बाजार विकास के नाम पर अार्थिक विकास के नाम पर, अार्थिक स्वातंत्र्य के नाम पर संभ्रान्त वर्ग की विलासिता वाली चीजों को अाम लोगों की पहुच तक ला रहें हैं तो गांधीवाद के क्षेत्र में भी कुछ प्रगतिशील दुकानदार गांधी-बाजार का वैश्वीकरण करने के लिये अागे अा रहें हैं, इनमे से अधिकतर लोग हैं तो ब्राम्हण जाति के लोग किन्तु अमेरिका में बहुत सालों तक रहकर प्रगतिशीलता को जाने समझे, लोकतंत्र को समझे, जनान्दोलनों का असली मर्म समझे, अमेरिका में बैठ के वहाँ की अति उन्नत तकनीक की बनी अाम समाज को जानने समझने वाली विशेष किस्म की दूरबीनों से भारत के असली समाज को जाने अौर समझे हैं।  तो ऐसे लोगों ने पहले तो खुद तो पुराने दुकानदारों से खुद के गांधी होने के प्रमाण लिये फिर थोड़ा जुगाड़ तगाड़ कर के अपनी खुद की दुकानें जमा ली, ये नये प्रगतिशील किस्म के दुकानदार पुराने दुकानदारों से बेहतर हैं क्योकि ये लोग जाति के अाधार पर प्रमाणपत्र नहीं देते बल्कि प्रायोजित अान्दलोनों की जरुरतों के अाधार पर, या फंड के जुगाड़ के अाधार पर या मीडिया में सुर्खियां लाने मे कौन कितना सहयोगी हो सकता है इन सब की गणित के अाधार पर देतें हैं।  कुछ न्यूनतम अहर्तायें अति अावश्यक है वे यह हैं कि अापके पास धन की, संसाधनों की कमी नही होनी चाहिये यदि अाप करोड़ों का फंड लाते रहे हों तो अापकी योग्यता अौर भी बढ़ जाती है अौर अापके अन्दर सामाजिक प्रतिबद्धता, अन्दर की असली वाली ईमानदारी नही होनी चाहिये।  यही योग्यतायें अागे चल कर अापको कोई विदेशी पुरस्कार भी दिलवा सकतीं हैं जिनकी बड़ी मांग रहती है भारत में अौर भारतीय मीडिया इन पुरस्कारों में खूब हवा भी भरे रहता है।

    जैसे कि कॅालेजों में लोग लाईन लगा के डिग्री लेने जाते हैं, कुछ सुनिश्चित किताबें होती हैं उनको रटते रहिये अौर डिग्रियां लेते जाईये अौर योग्य बनते जाईये।  जैसे कि अाजकल चल रही विभिन्न प्रकार की अाध्यात्मिक किस्म वाली दुकानों मे जाईये कुछ दिनों वाले शिविर कीजिये तो अाप समझदार हो जायेगें यदि अाध्यात्मिक शिक्षक होना चाहते हैं तो लगातार इन शिविरों को करते जाईये अौर शब्दों को रट कर वैसे ही दोहराते जाने की कला सीख लीजिये, लीजिये अब अाप अाम बेवकू्फ किस्म के नही रहे अाप समझदार हो चुकें हैं अौर अाध्यात्मिक शिक्षक होने का चोला पहन लीजिये, अापको बने बनाये चेले मिल जायेंगें अौर 5 हजार से 15-20 हजार रुपये हर महीने उपर से तन्खवाह ऊपर से मिलेगी (अाजकल के यही रेट चल रहे हैं, वेतनमान का कम या अधिक होना अापकी विदेशी भाषाअों मे पकड़ तथा कम्प्यूटर के ज्ञान पर निर्भर करता है)।  बिलकुल इसी प्रकार से अाप कुर्ता पायजामा पहन लीजिये, लुंगी पहनें तो अौर बढ़िया, गांधी जी टाईप धोती पहन लें तो सबसे बढ़िया, कुछ सुनिश्चित किस्म की शब्दावली का प्रयोग सदैव करते रहें जिसमे कि ग्राम स्वराज, स्वावलंबन, अहिंसा, लोकतंत्र इत्यादि किस्म की शब्दावली अौर इस लेख में बताये गये किस्म के लोगों से प्रमाणपत्र जरूर ले लें नही तो सारा किया धरा बेकार।

    क्या कहा अापने कि अापकी पहुंच नही इन बड़े लोगों तक, अापके पास संसाधन नहीं; अाप चिन्ता ना करें अाप इनकी पत्नियों अौर बच्चों के पास जाकर कुछ दिन रहें अौर घरेलू कामकाज करें, बच्चों को नहलायें धुलायें, परिवार के कपड़े धोयें, घर की साफ सफाई करें अौर इन लोगों के घरों मे रहते हुये भी अपने लिये खाना या तो खुद बनायें या खुद इन्तजाम करें। क्या कहा यह भी अापके बस का नहीं तो फिर इन लोगों के दृश्य/अदृश्य प्रबंधकों के पास जायें, अौर उन लोगों को मक्खन लगायें या सेटिंग बैठायें; नहीं समझे अाप, प्रबंधक का मायने वे लोग जो धन का सारा अावागमन देखतें हैं लेखा जोखा दुरुस्त रखते हैं, यदि अापने अपनी चतुराई से इन लोगों का भी मन मोह लिया तो कम से कम छोटा टाईप के गांधी अाप हो ही जायेंगें। अाप क्या इतनी बड़ी दुकानों को चलाने वालों को हलके मे लेते हैं, पहले ही बताया गया कि कहीं चूक नहीं पूरे के पूरे प्रोफेशनलन हैं ये लोग, छोटे मोटे लोगों को तो ये लोग फूंक मार कर उड़ा देते हैं अौर उड़ने वाले को पता भी नहीं चलता, अाप चिन्ता ना करें इन लोगों के पास वेतनभोगी लोगों की पूरी फौज है जो इन लोगों के एक ईशारे मे दुनिया के किसी भी कोने मे धरना प्रदर्शन व मीडिया बाजी के लिये पूरी तैयार रहती है, जरूरत पड़ने पर अमरीका वगैराह देशों से पत्रकार लोग भी अा जाते हैं जो कि इन लोगों के ही द्वारा स्थापित लोग हैं इसलिये वे लोग गम्भीर सामाजिक मुद्दों मे कभी नही अाते किन्तु इन लोगो के छोटे से छोटे से मुद्दों को भी अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बताने के लिये दौड़े चले अाते हैं।

    इसलिये अाप बिलकुल भी चिन्ता ना करें ये दुकानदार देखे भाले हैं, साख वाले हैं अौर हल्ला मचाना भी जानते हैं, अौर पूरे साल नये नये प्रायोजित अान्दोलनों की संभावनायें खोजने मे लगे रहते हैं, यदि संभावनायें नही मिल पाती तो जोर जबरदस्ती से भी अान्दोलनों को प्रायोजित करना जानते हैं।  इनको लाखों करोड़ो सिर्फ इन्ही बातों के लिये अाते हैं कि ये लोग अौर अधिक बलात्कार कर सकें अाम समाज की अास्थाअों के साथ उनके विश्वासों के साथ।  इन दुकानदारों का एक बहुत मजबूत तंत्र है जो कि अदृश्य रूप मे बहुत गहरे जुड़ा हुअा है अौर एक दूसरे के वेस्टेड इन्टेरेस्ट्स की केवल चिन्ता करता है।

    क्या बोले अाप, कि इन लोगों के जमीनी भी काम भी हैं क्या?  नही धरती की असलियत मे तो इनके काम जमीन मे नही किन्तु ये लोग जमीनी कामों के प्रमाण खूब रखते हैं।  अापस मे ही प्रमाणों के अादान प्रदान करते हैं।  अाम लोगो के बीच एक भ्रम बनाये रखने के लिये नये नये ढोंग रचते हैं, जरूरत पड़ने पर पुरस्कारों का भी व्यापार कर लेते हैं।  फिर से याद दिलाता हूं कि पूरे प्रोफेशनल हैं, अापको इनके तंत्रों मेम चूकें बहुत कम मिलेगीं तभी तो अाम समाज की हालत बद से बदतर होती जा रही है। अाम समाज की हालत तो यह है कि विश्वास करे तो किस पर।  बेचारा भारतीय अाम समाज।

    यदि ये हल्ला मचाने वाले समाज के ठेकेदार लोग सच मे ही समाज के प्रति ईमानदार होते, सच मे ही जमीन मे काम करने वाले लोग होते तो क्या गाँधी जैसे महापुरुष के नाम के साथ बलात्कार इतनी अासानी से करते जाते, जो खुद गांधी के व्यक्तित्व की गहराई की प्रारम्भिक वर्णमाला नही जानते वे लोग दूसरों को गांधी होने या ना होने का प्रमाणपत्र बांटते हैं।  यदि इतनी ही शर्म होती इन दुकानदारों मे तो अाज भारत के असली समाज की स्थिति ही कुछ अौर होती।

    सोचा कि हमको तो बाजारों की भाषायें अाती नहीं, तो क्यों ना दुकानदारों मे ही कुछ लिख मारा जाये, कम से कम अपनी खुद की अक्षमता की भड़ास निकल जायेगी।

  • रेत के कण — Vivek Umrao Glendenning

    रेत के कण — Vivek Umrao Glendenning

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    भाव, विश्वास, सहानुभूति, निश्छल प्रेम
    नहीं मिला होता जिन्हें जीवन भर,
    प्रताड़नाएं, कूटनीति, असहयोग, असत्य
    कपट, घुटन, घृणा छल प्रपंच आदि
    खिलाए गए हों जिन्हें जीवन भर।

    सम्पत्ति, पूंजी, पहचान, धरोहर
    आदि की
    भिन्न होती हैं परिभाषाएं उनके लिए,
    अभिव्यक्ति, मानवता, चेतना, विकास
    आदि
    जीवन लक्ष्य होते हैं उनके लिए।

    प्रारम्भ ही से नितान्त अकेले ऐसे लोग
    थपेड़ों में चलते रहते हैं
    गिरकर उठते हुए बिना बैशाखी।

    जीवन की पूंजी, धरोहर, यादगार
    बन जाती है इनके लिए
    कोई मनुष्य जब थपेड़ों भरे मार्ग में
    नितान्त अकेले जीवन में इनके,
    चाहता है भरना खाली स्थान भावों का
    उसी तरह,
    जिस तरह समुद्र को चाहा था
    भरना,
    रेत के कुछ कणों से गिलहरी ने।

    मानता हूं मूर्त अस्तित्व क्षणिक
    होता है,
    रेत के इन नन्हें कणों का
    पूरी जीवन यात्रा में,
    किंतु अमूर्त अस्तित्व होता है
    व्यापक
    रेत के इन नन्हें कणों का।

    मूर्त अस्तित्व होता है
    बुलबुले की तरह,
    समूर्त भाव पूरी ताजगी के साथ
    ऊर्जावान रहते हैं आजीवन।

    इन कणों के अमूर्त भाव क्षणिक
    नहीं होते
    शारीरिक व सांसारिक प्रेम की तरह,
    वरन आध्यात्मिक प्रेम की भांति
    जीते हैं भौतिक जीवन के बाद भी।

    रेत के कणों से नहीं भरता समुद्र
    खाली ही रहता पूरा का पूरा
    फिर भी
    वास्तविक सम्पत्ति, पूंजी व धरोहर
    होते हैं यही कुछ कण।

    भाव, विश्वास, सहानुभूति निश्छल प्रेम
    नहीं मिला होता जीवन भर।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.