Author: संपादक मंडल

  • विज्ञान के टॉपर बच्चे और बारिश के लिए हवन करता देश –Sanjay Jothe

    विज्ञान के टॉपर बच्चे और बारिश के लिए हवन करता देश –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    पिछले साल की बात है, एक मित्र के घर बारहवीं क्लास में टॉप किये एक बच्चे से बात हो रही थी. वो अपना कुत्ता लेकर उसके साथ खेल रहा था, अचानक उसका पैर एक किताब पर लगा और उसने “किताब के पैर छुए” कान भी पकड़े. खेलते हुए उसका पैर कुत्ते को भी लगा, उसने फिर कुत्ते के प्रति भी क्षमा व्यक्त की, मैंने पूछा कि ये क्यों? उसने कहा कि ये कुत्ता नहीं भेरू महाराज है. मैंने एक टीवी सीरियल में देखा था, एक देवता की तस्वीर में भी मैंने कुत्ते देखें हैं.

    मैंने उसकी किताब को गौर से देखा उसकी किताब पर नेम चिट में एक हवा में उड़ने वाले देवता की तस्वीर के बगल से उसका नाम लिखा हुआ था.

    मैंने पूछा ये किस तरह का जीव है? उसने कहा ये जीव नहीं भगवान् है जो हवा में उड़ सकते हैं.

    मैंने इस बात को इग्नोर करके उससे गुरुत्वाकर्षण के बारे में पूछा. उसने गुरुत्वाकर्षण का पूरा नियम एक सांस में बोलकर सुना दिया, फिर मैंने उससे पलायन वेग (एस्केप वेलोसिटी) और प्लेनेटरी मोशन पर कुछ पूछा उसने तुरंत दुसरी सांस में इनसे संबंधित सिद्धांत सुना दिए.

    ये सुनाते हुए वह बहुत प्रसन्न था, मैंने फिर पूछा कि एक राकेट को उड़ने और जमीन के गुरुत्व क्षेत्र से बाहर जाने में कितना समय और ऊर्जा लगती है? क्या यह ऊर्जा एक इंसान या जानवर में हो सकती है? उसने कहा नहीं इतनी ऊर्जा एक बड़ी मशीन में ही हो सकती है जैसे कि हवाई जहाज या राकेट.

    मैंने उससे फिर पूछा कि ये उड़ने वाले देवता कैसे उड़ते होंगे? उसे ये प्रश्न सुनकर बिलकुल आश्चर्य नहीं हुआ. उसने बड़ी सहजता से उत्तर दिया कि वे भगवान हैं और भगवान कुछ भी कर सकते हैं.

    मैंने फिर आखिर में पूछा कि क्या भगवान प्रकृति के नियम से भी बड़ा होता है? उसने कहा मुझे ये सब नहीं पता लेकिन भगवान जो चाहे वो कर सकते हैं.

    अभी देश भर में परीक्षा में टॉप कर रहे बच्चों की खबरें आ रही हैं और हर शहर में जश्न हो रहा है. जिन बच्चों ने टॉप किया है निश्चित ही वे बधाई के पात्र हैं. उन्होंने वास्तव में कड़ी मेहनत की है और जैसी भी शिक्षा उन्हें दी गयी उसमे वे ज्यादा अंक लाकर सफल हुए.

    लेकिन इन बच्चों की सफलता का वास्तविक मूल्य क्या है? क्या ये वास्तव में अच्छे इंसान और अच्छे नागरिक बन पाते हैं? क्या इनकी शिक्षा – जो अधिकाँश अवसर पर विज्ञान विषयों के साथ होती है – इन्हें वैज्ञानिक चित्त और सोचने समझने की ताकत देती है?

    ये टॉपर बच्चे अक्सर ही रट्टू तोते होते हैं जिन्हें मौलिक चिंतन और विचार नहीं बल्कि विश्वास सिखाये जाते हैं, ये पश्चिमी बॉसेस के लिए अच्छे बाबू, टेक्नीशियनऔर मैनेजर साबित होते हैं ये खुद कुछ मौलिक नही कर पाते।

    परीक्षा परिणामों का यह जश्न मैं 20 सालों से देख रहा हूँ, और दावे से कह सकता हूँ कि इन टॉपर्स में से अधिकांश बच्चों को IIT, JEE, AIIMS इत्यादि की स्पेशल कोचिंग वाले भयानक दबाव वाले रट्टू और प्रतियोगी वातावरण में तैयार किया जाता है।

    ये बच्चे किसी ख़ास परीक्षा में पास होने के लिए तैयार किये जाते हैं, इनमे ज्ञान के प्रति, सीखने और समझने के प्रति कितना लगाव है ये एक अन्य तथ्य है जिसका कोई सीधा संबंध इन बच्चों की उपलब्धियों से नहीं है. ऐसे अधिकांश बच्चे धर्मभीरु, विचार की क्षमता से हींन, आलोचनात्मक चिंतन से अनजान और समाज, सँस्कृति और धर्म के ज्ञान से शून्य होते हैं।

    अधिकतर इन्हें प्रतियोगिता परीक्षाओं की स्पेशल कोचिंग में उच्चतर विज्ञान और गणित इत्यादि घोट घोटकर पिलाये जाते हैं और घर लौटते ही इन्हें मिथकशास्त्र और महाकाव्यों की तोता मैना की कहानियां पिलाई जाती हैं।

    न केवल ये मिथकों और महाकाव्यों में श्रद्धा रखते हैं बल्कि स्कूल कालेज या परिक्षा के लिए जाते समय प्रसाद चढाकर या मन्नत मांगकर भी जाते हैं. ये बच्चे एक तरफ ग्रेविटी, एस्केप वेलोसिटी इत्यादि रटते हैं और दुसरीं तरफ आसमान में पहाड़ लेकर उड़ जाने वाले देवताओं की पूजा भी करते हैं।

    ये एक भयानक किस्म का सामूहिक स्कीजोफेनिया है जिसमे एक ही तथ्य के प्रति कई विरोधाभासी जानकारियाँ और विश्वास लेकर बच्चे जी रहे हैं, वे ज्ञान के किसी भी आयाम में कुछ मौलिक नहीं खोज पाते. वे सिर्फ पहले से ही खोज ली गयी चीजों के अच्छे प्रबंधक या तकनीशियन या बाबू हो सकते हैं लेकिन विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन इत्यादि में कुछ नया नहीं दे पाते हैं.

    इन बच्चों का एक ही लक्ष्य होता है कि किस तरह से कोई परिक्षा पास करके जीवन भर के लिए कोई बड़ी डिग्री हासिल कर ली जाए और एक बड़ी कमाई तय कर ली जाए. इसके आगे पीछे जो कुछ है उससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता. अधिकाँश बच्चों में आरंभ में इस तरह की जिज्ञासा होती है लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारे परिवारों के अंधविश्वास पूजा पाठ और कर्मकांड इन जिज्ञासाओं को मार डालते हैं.

    आप कल्पना कीजिये जिस परिवार में पहाड़ लेकर उड़ जाने वाले देवता की पूजा होती है उस घर का कोई बच्चा गुरुत्वाकर्षण के वर्तमान सिद्धांत में कोई कमी निकालकर उसे कभी चुनौती दे सकेगा? जो बच्चा मन्त्र की शक्ति से विराट रूप धर लिए किसी अवतार की पूजा करता आया है क्या वह जेनेटिक्स या जीव विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के कमियाँ खोजकर कुछ नया और मौलिक प्रपोज कर सकता है?

    निश्चित ही ऐसे बच्चे इस दिशा में अधिक सफल नहीं हो सकते. यह संभव भी नहीं है. जो मन आलोचनात्मक चिंतन कर सकता है वह परीलोक की कहानी को जीवन भर धोकर उसकी पूजा नहीं कर सकता. ये दो विपरीत बातें हैं.

    इसीलिये भारत के करोड़ों करोड़ बच्चे, जो किसी न किसी परिक्षा में पास होकर या टॉप करके निकलते रहे हैं उन्होंने ही मिलकर उस भारत को बनाया है जिसमे मंत्री नेता और अधिकारी लोग बारिश लाने के लिए हवन कर रहे हैं.

    उन्ही बच्चो ने ये भारत बनाया है जिसमे आज सीमाओं की रक्षा के लिए राष्ट्र रक्षा महायज्ञ हो रहा है और डिफेंस की टेक्नोलोजी फ्रांस और इजराइल से खरीदी जा रही है. उन्ही बच्चों के बावजूद आज वह भारत सामने है जिसमे गाय के नाम पर या लव जिहाद के नाम पर सरेआम लिंचिंग हो रही है.

    टॉपर बच्चो के जश्न के बीच इन बातो पर एक बार जरुर गौर कीजियेगा.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • सामाजिक न्याय और कम्युनिज़म एक-दूसरे के विलोम नहीं –Jayant Jigyasu

    सामाजिक न्याय और कम्युनिज़म एक-दूसरे के विलोम नहीं –Jayant Jigyasu

    Jayant Jigyasu

    राजनीति विज्ञान के कौन-कौन धुरंधर हैं जो राजद के साथ कम्युनिस्ट पार्टी का गठबंधन भी चाहते हैं, मगर मेरे मुंह से फूले-अंबेडकर-पेरियार- सावित्री-फ़ातिमा-लोहिया-लिमये-कर्पूरी-जगदेव-बीएनमंडल-लालू-शरद, आदि का नाम सुनकर उनके कानों में शीशे पिघलने जैसा अहसास होता है, मेरा कुछ लिखा देखकर उनकी आंखों को चुभता है। बिहार में वे छात्र राजद और एनएसयुआई के साथ पटना युनिवर्सिटी छोड़ कर बाक़ी सभी युनिवर्सिटी में चुनाव भी लड़ते हैं, मगर कुछ मंडन मिश्र और विदुषी भारती टाइप के लोग लालू-शरद को रातदिन कोसने से बाज भी नहीं आते।

    दोहरापन मेरे चरित्र में नहीं, बल्कि उन ज्ञानियों-ध्यानियों के डीएनए में है जो रात के अंधेरे में मामले डील करते हैं, मेरे जैसे लोग दिन के उजाले में सियासत करते हैं। जो बोलते हैं, डंके की चोट पर करते हैं। मैं न तो संस्कृति के नाम पर किसी की चरणवंदना करने में यक़ीन करता हूँ, न शर्त रखकर राजनीति करता हूँ। न किसी कंफ्यूजन में हूँ, न किसी ‘कंफ्यूज्ड’ पार्टी में। जहाँ जिस संगठन में हूँ, पूरी समझदारी से, पूरी ईमानदारी से।

    जिसको यह लगता है कि सामाजिक न्याय और कम्युनिज़म एक-दूसरे के विलोम हैं, उनकी समझदारी में कोई बड़ी भारी गड़बड़ी है। मेरे आगे किसी का पेंचपांच न चला है, न चलता है, न चलेगा। लुच्चई, गुंडई, चुगलई और थेथरई में एक्सपर्टिज़ हो सकती है तुम्हारी, पर करेज, कंविक्शन और इंटेग्रिटी कहां से ले आओगे?

    मैंने दो साल पहले ही कहा था कि जिस दिन सीताराम येचुरी लालू प्रसाद से, डी राजा राहुल गांधी से और डीपी त्रिपाठी शरद यादव से बतियाना-मिलना छोड़ देंगे, उस दिन मुझे कोई कहे। और, तब भी सियासत में किसी से संवाद और मुलाक़ात का सिलसिला हम तो नहीं ख़त्म करने वाले। कम्युनिज़म कब से इतना संकुचित और कुंठित हो गया? जिसे कम्युनिज़म का क भी नहीं पता, वो भी जहाँ-तहां लेक्चर देने लगता है। ज़माना ही जम्हूरों और जुमलेबाज़ों का है।

    कोई बहुत ज़्यादा दिन नहीं हुए, यही कोई डेढ़ दशक पहले सीताराम येचुरी लालू प्रसाद के साथ चुनाव प्रचार में मेरे गृहविधानसभा अलौली आए थे और अमेरिकी साज़िश व पूंजीवादी ख़तरे की ओर वहाँ की जनता का ध्यान आकृष्ट कर रहे थे। ढाई दशक पहले सूर्यनारायण सिंह के लिए लोकसभा चुनाव में और सत्यनारायण सिंह के लिए विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद वोट मांग रहे थे। जब वोट चाहिए, तो लालू प्रसाद-शरद यादव बहुत ठीक, जब अपनी जीत सुनिश्चित करनी हो तो गठबंधन की वकालत करो, लेकिन जब लालू प्रसाद बीमार पड़ें तो जयन्त उनके स्वस्थ होने की सद्कामना न व्यक्त करे। मगर, ज्ञानी-ध्यानी लोग अपना टिकट श्योर कराने के लिए उनकी परिक्रमा कर आए, जयन्त इसी दोहरी राजनीति और दोगली नीति की आरंभ से मुख़ालफ़त करता रहा है और आगे भी वह अपने उसूल पर अटल रहेगा।

    मैं क्या बोलता हूँ, यही तो बोलता हूँ कि लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने 6 (5+1) विश्वविद्यालय खोले जितने आज़ादी के बाद के उनके पहले के सारे मुख्यमंत्रियों ने मिलकर भी नहीं खोले। इसमें क्या तथ्यात्मक ग़लती है, ग़लत बोल रहा हूँ तो कोई चुनौती देके दिखाए या दुरुस्त करे। अगर यह कहता हूँ कि लालू प्रसाद के साथ मीडिया चयनित प्रश्नाकुलता दिखाती है, तो इसमें क्या ग़लत है, कोई साबित करे। जब यह कहता हूँ कि यह न्यायपालिका का फ़ैसला नहीं, ब्रह्मपालिका का फ़रमान है, तो उसमें मेरे अछरकटूआ व विशुद्ध दलाली पर आश्रित ‘कम्युनिस्ट’ मित्रों को बुरा क्यों लगता है! मत भूलिए, कि जनसमर्थन नहीं बल्कि जनप्रबंधन व मीडियाप्रबंधन की सियासत की उम्र लंबी नहीं होती। एक जातिविशेष का होने के चलते बिन कहे, बिन मांगे जो लाभ कुछ लोगों को मिल जा रहा है और वो बिन नंगे हुए सफ़ेदपोश बने घूमते फिर रहे हैं; उस पर किसी के लब क्यूं नहीं हिलते। कुछ लोग मर्यादा में रहें, तो अच्छा रहेगा।

    क्या यह सच नहीं है कि इसी युनिवर्सिटी के दो प्रेज़िडेंट कांग्रेस और एनसीपी में हैं? क्या यह झूठ है कि एक तीसरे प्रेज़िडेंट एक नेशनल पार्टी के प्रेज़िडेंट की स्पीच लिखते हैं? और, एक प्रेज़िडेंट कब, कहां, किस-किस से छुप-छुप के मिलने और वरदहस्त प्राप्त करने चले जाते हैं शुतुरमुर्गी चाल के साथ; यह किसी से छुपा है क्या!

    हम जिस किसी से मिलते हैं, रोशनी में मिलते हैं, दुनिया के सामने मिलते हैं, छात्र हित, शिक्षक हित, कर्मचारी हित, शोधहित, शिक्षा हित, विश्वविद्यालय हित और मानवता हित में मिलते हैं। मुझे किसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं, और ऐरूगैरू-नत्थूखैरू से क्या! लेकिन, मेरे पास न तो सुब्ह-शाम ठकुरसुहाती करने का वक़्त है, न हाजरी लगाने का स्वभाव, न किसी का भाषण लिखने के दुर्दिन आए हैं। टीटीएम और फ्लैटरी करके न कभी कुछ चाहा है न किसी की कृपादृष्टि से यहाँ तक आया हूँ। जहाँ हूँ, वहाँ संघर्ष, प्रतिभा, जुनून और जज़्बे के चलते हूँ, किसी के रहमोकरम पर नहीं। न तो किसी ने खैरात में कुछ सौंपा है, न किसी ने मुझ पर कोई अहसान किया है। मैं निजी जीवन, समाज, संगठन या सियासत में जिस जगह खड़ा हूँ, वहाँ किसी का कृपापात्र बनकर नहीं हूँ। लेकिन, ऐसे कई कूपमंडूक, व्यभिचारी-दुराचारी-अत्याचारी लोग हैं इसी समाज में, जिन पर चंद लोगों की नज़रे-इनायत न हो तो वुजूद मिट जाए। जिनके निजी और सार्वजनिक जीवन में दोहरे आचरण, झूठ-फरेब और मनुवादी मानसिकता की कार्यसंस्कृति की कोई इंतहा ही नहीं।

    दीवारो-दर को सारे ही घर को बुरा लगा
    पत्ता हरा हुआ तो शजर को बुरा लगा। (नवाज़)

    Jayant Jigyasu

    Studied in,

    Indian Institute of Mass Communications, IIMC, Delhi

    JNU, Delhi

    St. Stephen’s College, Delhi

  • रण्डी साली : गाली या प्रेरणा

    Pradyumna Yadav

    पहली बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह करीब 8 साल की थी. घर में किसी ने गाली दी थी. शायद बड़ी या छोटी दादी में से कोई थी. घर का माहौल ऐसा था कि वहां गाली खाना और गाली देना आम बात थी. तब उसे रंडी का मतलब नहीं पता था. वो लड़कों के साथ लड़कों की तरह दिनभर उछलकूद करती थी. शायद ये बात दादी को ठीक नहीं लगी थी. इसीलिए उसे रंडी कहा गया.

    दूसरी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह 14 साल की थी. उस समय वह लड़कियों की तरह रहना और लड़की होना सीख रही थी. वक्ष बहुत उभरे तो नहीं थे लेकिन इतने थे कि कपड़ो में उनका आकार दिखने लगा था. उस दिन वह पहली बार स्कूल में टाइट कपड़े पहनकर गयी थी. उसकी चाल ढाल बिल्कुल वही थी जिसे अब छोड़ने और बदलने की सीख दी जाने लगी थी. बड़ी क्लास के लड़कों को यह ठीक नहीं लगा. उनमें से किसी एक की दबी जुबान उस दिन खुल गयी – ‘रंडी है साली’.

    तीसरी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह 18 साल की थी. मुहल्ले के कुछ लड़कों ने उसे मुहल्ले के बाहर के दो दोस्तों के साथ बात करते हुए देख लिया था. उनकी नज़रों में ऐसी हिकारत थी कि वह भीतर तक सहम गयी थी. ‘ रंडी निकल गयी है ये. एक नहीं दो के साथ लगी पड़ी है. अपने मुहल्ले का नाम खराब कर दिया साली ने. ‘ उस दिन रंडी शब्द उसके कानों में देर तक गूंजता रहा.

    चौथी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह घर से लड़ झगड़ कर पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए यूनिवर्सिटी में दाखिले की जिद करने लगी. उस समय वह 23 की थी. उस दिन उसने ऐसी जिद पकड़ी कि वह घर के बाहर ही धरने पर बैठ गयी. पूरा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया. उसकी जिद जायज थी. इंट्रेस इक्जाम में उसे सातवीं रैंक मिली थी. उसने बड़ी मुश्किल से चोरी छिपे एंट्रेंस इक्जाम दिया था.

    उसकी जिद थी कि वह पढ़ेगी. उसे अभी शादी नहीं करनी. अगर किसी ने दबाव बनाया तो वह घर की चौखट पर ही जान दे देगी. मुहल्ले के शिक्षित बुजुर्गों के हस्तक्षेप के बाद घरवालों को झुकना पड़ा. लेकिन सभी बुजुर्ग ऐसे नहीं थे. उस दिन कईयों में आपसी खुसुरफुसुर हुई जो न चाहते हुए भी उसके कानों तक पहुंच गई – ‘रंडी है फलाने की लड़की. जाने कितनों लड़को से मिलती है. कई बार तो मैंने सामने से जाकर देख लिया है. लेकिन मजाल की वहां से हटे. लाज शर्म कुछ है ही नहीं. उल्टा मुझे ही घूर के देखती है. इसको बाहर इसलिए जाना है ताकि वहां खुलकर मुंह काला कर सके.’

    पांचवी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह अपने प्रेमी के साथ शहर में घूमते हुए देखी गयी. उम्र थी 25. वह बेधड़क अपने प्रेमी का हाथ अपने हाथों में लिए घूमती थी. उस दिन बाइक से गुजरते हुए एक लड़के ने चीखकर कहा था – ‘एक बार हमें भी छूने दे रंडी. हम क्या इससे बुरे हैं.’

    छठी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह डिप्टी एसपी पद के लिए चयनित हुई. उम्र थी 27 साल. पार्टी के लिए वह दोस्तो के साथ रेस्टोरेंट गयी थी. वहां उसे फिर वही शब्द सुनने को मिला. ‘अरे देख. ये रंडिया तो अधिकारी बन गयी. गज़ब भौकाल है साली का. हमी स्साला चुतिया बैठे हैं ‘

    पिछले पांच बार उस लड़की ने रंडी शब्द सुनने के बाद क्या किया , उसने नहीं बताया था. लेकिन इस बार क्या हुआ, वो सब कुछ उसने बेहद गर्व के साथ बताया.

    वह अपनी सीट से उठी और लड़के का कॉलर पकड़ के चार तमाचे जड़ दिए. उसने लड़के को ऐसा धक्का दिया कि वह अपनी सीट समेत ज़मीन पर लुढ़क गया. लड़के के दोस्त उसका आक्रामक रवैया देखकर चंपत हो गए. उस दिन लड़की ने उस लड़के को बहुत देर तक गालियां दी. उस पर लात घूंसे बरसाती रही. शायद 27 साल की उम्र तक उसने जो भी सहा था सब उस दिन ही फूट पड़ा. आखिर में पुलिस के आने के बाद ही लड़की ने उस लड़के को छोड़ा.

    उस दिन उसे गुस्से के साथ पछतावा और गर्व भी था. मैंने पहली बार किसी इंसान में एक साथ इतनी भावनाएं देखी थी. उसमें 27 साल की उम्र तक जो भी झेला गया था , सबका गुस्सा भरा हुआ था. उसे यह पछतावा भी था कि वह 27 साल की उम्र में पहली बार रंडी कहने पर किसी का विरोध कर पाई. इतना समय लग गया उसे. उसे इस बात का गर्व भी था कि पहली बार उसने विरोध किया. ऐसा विरोध कि आसपास सब दंग रह गए.

    उस दिन के बाद उसे किसी बेहद सामान्य या किसी बड़ी बात के चलते कितनी बार रंडी बोला गया उसे याद नहीं था. उसने रंडी बोले जाने की वजह से कितनों की खबर ली ये भी उसे याद नहीं था.

    अब जब वो अपनी बीती जिंदगी कि ये सारी बातें बताती है तो उसे रंडी गाली नहीं बल्कि प्रेरणा लगती है. वह कहती है कि मैं नाहक ही गुस्सा हो जाया करती थी. रंडी कोई गाली नहीं है. रंडी मेरे लिए प्रेरणा है. मुझे जितनी बार रंडी बोला गया उतनी बार मेरा रंडी के प्रति सम्मान बढ़ता गया.

    मैं आज जो भी हूँ वह महिलाओं के खिलाफ , समाज के तयशुदा मानकों को तोड़कर हूं. मैंने जब भी ऐसा कुछ किया मुझे रंडी कहा गया. मुझे आज कोई रंडी कहे तो गर्व होगा. मैं खुद को चरित्रवान और सभ्य-सुशील महिला की बजाय रंडी कहलवाना पसंद करूंगी. रंडी सिर्फ शब्द नहीं है. रंडी उस व्यवस्था से विद्रोह है जिससे निकलकर मैंने अपनी जिंदगी जीने के तौर तरीके खुद तय किये हैं.

    Pradyumna Yadav


  • गालियां अचानक इतनी मुकद्दस क्यों हो गई हैं बख़्तरबंद स्टूडियो से रणभेरी बजाने वालों के लिए? –Tribhuvan

    गालियां अचानक इतनी मुकद्दस क्यों हो गई हैं बख़्तरबंद स्टूडियो से रणभेरी बजाने वालों के लिए? –Tribhuvan

    Tribhuvan

    मैंने सुना और पढ़ा है कि इस धरती पर संस्कृति का सूत्रपात उस व्यक्ति ने किया, जिसने सबसे पहली गाली दी।

    लेकिन लगता है, गालियां अचानक और भी मुक़द्दस हो गई हैं। निहायत ही अक़ीदत से एक नेशनल टीवी चैनल इस पर इस तरह पढ़ी जा रही हैं कि पूरी व्यवस्था इस देश में एक ही बंदे के ख़िलाफ़ हो गई है। मैंने पत्रकारिता में आज तक यह नहीं देखा कि किसी व्यक्ति ने अपने ऊपर फेंकी जा रही गालियों को इस तरह किसी ने ख़बर बनाया हो। ऐसा एक बार अरुण शौरी साहब ने अवश्य किया था, जब चौधरी देवीलाल ने उन्हें फ़ोन पर बहन.. कहा था और शौरी साहब ने उसे इंडियन एक्सप्रेस ने वैसा का वैसा फ़्रंट पेज पर छापा भी था।

    लेकिन क्या आजकल चल रही इस ख़बर और उस रुदन में कोई अंतर है, जो पिछले दिनों गुजरात चुनाव में सुनाई दिया था? जिसमें कई बार बहुत गुस्सैल और कई बार बहुत रोतली भाषा में कहा गया कि देखो मेरे देशवासियो, मुझे इन लोगों ने नीच कहा। मनूं नीच कह्यो! नीच कहा, वह तो समझ में आता है कि एक ऐसा शख्स था, जिसे नोटिस लिया जाना चाहिए, क्योंकि वह केंद्र में मंत्री रहा है। यह भी समझ में आता है कि देश का उपप्रधानमंत्री जब किसी के साथ लूज़ टॉक करे तो वह ख़बर बनती है।

    और यहां जब सब लोग जानते हैं कि केंद्र सरकार के मंत्रियों के ट्विटर और फ़ेसबुक एकाउंट कुछ खास कि़स्म के लोग चलाते हैं। क्या किसी मंत्री या प्रधानमंत्री के पास वाक़ई इतना टाइम है कि वह इतने ट्वीट पढ़े या उनका जवाब दे? यह सब जानते हैं कि यह सब काम मंत्रियों के इर्दगिर्द के लोग करते हैं। और आजकल इन चीज़ों की बाढ़ आई हुई है।

    अगर गालियां किसी व्यक्ति के इर्दगिर्द रोशनी या अंधेरे की दीवार खड़ी हो जाने का प्रमाण हैं तो मेरे ख़याल से इस आधार पर न तो कोई नरेंद्र मोदी को छू सकता आैर न ही राहुल गांधी को। गालियां खाने में तो राहुल गांधी हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारी ही पड़ेंगे। ये ही क्यों, मीडिया की कई हस्तियां जितनी गालियां खाती हैं, उनका कोई हिसाब ही नहीं है। आप कई सुनाम पत्रकारों के ट्वीटर हैंडल देखेंगे तो परिचय में मिलेगा : प्रेस्टीट्यूट, पाकिस्तानी, देशद्रोही, आईएसआई एजेंट, पेड मीडिया आदि आदि। आप पत्रकार हैं और कुछ लिखेंगे तो लोग ऐसी प्रतिक्रियाएं भी देंगे। ऐसा कौन पत्रकार है, जो निर्भीकता से लिखता है और उसे गालियां नहीं पड़ती हों। आए दिन ऐसा लोगों के साथ होता है। आपको अगर गालियों से इतना ही भय लगता है तो आप ऐसे पेशे में हैं ही क्यों? और ऐसी स्टोरी करते ही क्यों है? अगर करते हैं तो दिलीप मंडल की तरह गालियों का आनंद लेना भी सीखें और उन्हें सार्वजनिक भी करते रहें। या फिर मेरी तरह डिलीट करके आनंद लेते रहें।

    गाली दरअसल निराशा और हताशा की भाषा है और पराजित लोग इनका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अगर गाली पर आप परेशान होने लगे तो संभव है कि निराशा आपके भीतर भी गहरा रही है। गालियां बताती हैं कि गोली देने वाले के माता-पिता, उसके घर का आंगन, उसके गांव या शहर की संस्कृति और संस्कार कैसे हैं। मां-बहन करने वाले ऐसे कायर लोगों की ज़मात हमें अपने इर्दगिर्द कितना मिलती है। ये किस दल में नहीं हैं? किसी विचारधारा में नहीं है? या फिर किस धर्म में नहीं हैं? या कि किस देश में नहीं हैं? अब सब लोग मारवाड़ से तो हैं नहीं कि बोलेंगे, ऐंकर शाब थारे हिर माथे म्हारे जूतो बिराजै, जे थे म्हारे मोदी शाब ने फेर कीं कैयो तो! लेकिन ऐसी गाली पर आपको भी क्या मज़ा आएगा!

    सोशल मीडिया ने एक बड़ा बदलाव किया है। हम अपनी हर बात सोशल मीडिया के माध्म से हर व्यक्ति तक पहुंचाना चाहते हैं, लेकिन उसकी बात लेना नहीं चाहते। यह कैसे संभव है?

    हमारे सब बंद रोशनदान, खिड़कियां और दरवाज़े खुल गए हैं और गलियों का सारा कचरा घरों में उड़कर आ रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू तो कब से गालियां खा रहे हैं। क्या महात्मा गांधी को गालियां नहीं पड़ रही हैं? सोशल मीडिया का तब तो काेेई अस्तित्व ही न था। इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक महिला नेताओं को क्या नहीं गरियाया जाता? क्या वसुंधरा राजे, स्मृति ईरानी या अन्य महिलाएं उससे बच जाती हैं? क्या अमर्त्य सेन को गालियां नहीं दी गईं?

    ऐसा कौन है, जिसे गाली नहीं दी जा रही है? आप मोदी की तारीफ़ कर दें, तत्काल आपको गालियां शुरू हो जाएंगी। जो व्यक्ति स्वयं गालियों से इतना परेशान हो रहा है, क्या वह स्वयं अपने प्रतिद्वंद्वी साथियों को गोदी मीडिया नहीं कहता? यह क्या है? क्या किसी हमपेशा पत्रकार को गोदी मीडिया कहना गाली नहीं है? आपको तो जो गालियां दे रहे हैं, वे सबके सब चवन्ने हैं, लेकिन आप तो चवन्ने नहीं, एक प्रतिष्ठित मीडिया के बहुत ही ज़हीन शहीन और ऐसे पत्रकार हैं, जो साहसिक पत्रकारिता के आयाम छूने की कोशिशें बहुत बार करते हैं, लेकिन नहीं कर पाते, क्योंकि आप आत्ममुग्धता का शिकार बन जाते हैं।

    प्रश्न है कि क्या वर्चुअल संसार की गालियों और धमकियों को वह दर्जा मिलना चाहिए, जो वास्तव में गालियां और धमकियां होती हैं? अाप एक बार इस देश के सुदूर इलाकों में जाइए और देखिए कि माफ़िया, एसपी, थानेदार, सरपंच, विधायक या किसी क्षेत्रीय क्षत्रप के ख़िलाफ़ लिखना और वहीं रहना कितना जोख़िम का काम है? ये लोग ट्रेक्टर या जीप के पीछे बांधकर घसीटते हैं और तब कोई नेशनल चैनल एक शब्द भी नहीं बोलता।

    जिन पत्रकारों को गालियां और धमकियां मिलती हैं, वे बख्तरबंद दफ्तरों से बख्तरबंद कारों और बख्तरबंद घरों में न तो रहते हैं और न चलते हैं। वे इस देश की सड़कों पर इस देश की गलियों में आम लोगों के बीच रहते हैं। वे मार खाते हैं। वे गोलियां खाते हैं। वे नौकरियों से निकाल दिए जाते हैं। उन पर कार, जीप या ट्रक चढ़ा दिए जाते हैं। लेकिन उनके लिए कहीं कोई ऐसा नहीं होता जो वर्चुअल गालियों और धमकियों को तो इतना गंभीरता से लें और असली धमकियों और गोलियों की चर्चा भी नहीं करें।

    पत्रकारिता न तो विरोध की राजनीतिक भाषा है और न ही धर्म सुधार आंदोलन का हिस्सा। यह निहायत ही अक़ीदत से किया जाने वाला काम है। वह स्वयं तो सारा दिन आलीशान बख़्तरबंद स्टूडियो से देश भर के अख़बारों में कथित छोटे और लोकल पत्रकारों की दसियों बार की गई खबरों को नए सिरे से लच्छेदार भाषा की पैकेजिंग में परोसकर अपने आपकी पगड़ी पर मोरपंख लगा लेते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि उनके अपने ही साथी उसी दिल्ली में लू के थपेड़े खाते हुए चिड़ियाघर के पिंजरों से बंद बंगलों में बैठे नेताओं की बाइट या न्यूज बटोरने के लिए लू और शीतलहर में किसी तपस्वी से एक पांव पर खड़े पत्रकारिता करते हैं आैर अपने धर्म को निभाते हैं। न कोई आत्ममुग्धता और न किसी की गाली और गोली से परवाह। और जो बख्तरबंद महल की पत्रकारिता करता है वह जय हिन्द!

    जैसे दिल्ली के वीवीआईपी बख्तरबंद नेता, वैसे ही दिल्ली के ये वीवीआईपी बख्तरबंद पत्रकार! नींव की ईंटों को कौन याद करता है, जब कंगूरों के शोर से देश में अनुगूंज पैदा करने की कोशिशें होने लगें।

    Credits: Tribhuvan’s Facebook

  • हत्या-बलात् का स्वर्ण युग  –Kumar Vikram

    हत्या-बलात् का स्वर्ण युग –Kumar Vikram

    Kumar Vikram

    ऐसा नहीं है कि उस स्वर्ण युग में
    पल प्रति पल सुबह-शाम दिन प्रति दिन
    हत्याएँ व बलात्कार ही होते रहते थे
    कई कई दिन यूँ ही बिना किसी घटना के भी निकल जाते थे  

    पर इस युग की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती
    कोर्ट कचहरी घरों में टीवी अख़बारों में
    सड़क शासन प्रशासन लेखकों कवियों
    आकाश पताल में
    अच्छी हत्या व ब्लात् कैसे हो

    इसपर निरंतर बहस
    तर्क वितर्क लेख प्रतिलेख
    का संगीत हमारे सामने बजता रहना था
    नैतिकता और वाक् पटुता के नए आयाम बनाती हुई
    बिलकुल एक नई संस्कृति 

    जिससे कोर्ट पूछता है
    ‘इस हत्या को कैसे अंजाम दिया जाएगा?’
    और पूरी गंभीरता से उत्तर दिया जाता था

    ‘हमारे पास कई उपाय हैं
    ट्रक से कुचल कर या फिर गोलियाँ बरसाकर
    या फिर चाय में ज़हर देकर
    बस कुछ मोहलत मिल जाए
    बलात् के हमारे अपने मोडुल्य हैं
    पड़ोसियों के घरों से खींचकर लाई जाएँगी
    सात आठ नौ दस जितनी की भी ज़रूरत हो
    बस कुछ मोहलत मिल जाए’

    और सब को हत्या और बलात् के
    मुकर्रर दिन का रहता है इंतज़ार  
    पर ऐसा कुछ होता नहीं है
    बल्कि ऐसा ही आभास होता है 

    क्योंकि हत्या-बलात् के उस स्वर्ण युग की
    सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी
    कि सब अच्छी हत्या-बलात् कैसे हो
    इसपर ही चिंतन-मनन हो

    Kumar Vikram

  • सेलेब्रिटी एक्टिविज़्म : फेमिनिज़्म का सेफ्टी वाल्व –Apoorva Pratap Singh

    Apoorva Pratap Singh

    एक साक्षात्कार में स्वरा भास्कर से पूछा गया कि कास्टिंग काउच होता है या नहीं ? वो ढीठ की तरह मुस्कुराते हुए बात को घुमाती रही पर उत्तर नहीं दिया पूछने वाले ने कहा कि सिर्फ यस या नो में उत्तर दे दीजिए पर स्वरा भास्कर जो लम्बी चिट्ठी पत्री या सो कॉल्ड एक्टिविज़्म आउट्रेज करने का समय निकाल लेती हैं उनसे हां या ना, वो भी न हुआ बोलीं कि मेरी फिल्म के बारे में बात कीजिये !!! भंसाली को चिट्ठी लिखना जल में रह कर मगर से बैर नहीं होता लेकिन कास्टिंग काउच पर कुछ कहना यकीनन उनके इंडस्ट्री में निजी हितों को प्रभावित करता !!

    स्वरा हिपोक्रेट हैं यह पिछले दो साल से सबको पता है इस तथ्य से जिसको दिक्कत हो उस पर सिर्फ तरस खा सकते हैं । 

    ट्रेलर में एक जगह सोनम बॉयफ्रेंड से कह रही है कि “जाके अपनी माँ से ही शादी कर ले, मदर लवर” !!! ये साफ़ साफ़ गालियों का यूफेमिज़्म हैं !! माँ से शादी करने का अर्थ क्या होता है ? 
    करीना कपूर एक जगह ‘मिस पुरी’ से मिसेज़ मल्होत्रा बनने को ले कर घबराई हुईं है जो कि खुद ही करीना कपूर ‘खान’ बनी बैठी हैं ! इवन इन लोगों की इंटर रिलिजियस शादियों में भी बच्चे का नाम पति के धर्म से ही होता है जैसे कि ‘तैमूर’ या खुद ‘सैफ’ ही !!

    स्वरा जो 3 महीने पहले योनि मात्र महसूस कर रही थीं अब चूत शब्द गाली की तरह इस्तेमाल कर रहीं हैं !! कंगना जो रजत शर्मा के शो में सलमान की बजरंगी भाईजान ठुकराने के दावे ठोंक रहीं, उन्होंने सलमान की ही ‘रेडी’ में दो मिनट का ही रोल किया था !!

    कंगना ने जब अपनी निजी खुन्नस निकाली थी जिसे यहां लोग क्रांतिकारी और फेमिनिज़्म बता रहे थे तब मैंने अपना पॉइंट उनके एंटी रखा तब कहीं किसी ने मुझे या मेरी जैसी लड़कियों (जो प्रो कंगना नहीं थी) को कहा कि यह औरतें मर्दवादी हैं, आदमियों की जी हुजूरी करती हैं, शातिर हैं वगैरह !!

    तो मुझे यह कहना है कि आप लोग इतनी ढिठाई लाते कहां से हैं और आपको किसी को भी झंडाबरदार बनाने की इतनी जल्दी क्यों है ?? आपको आपके पॉइंट या जिसे आप फेमिनिज़्म कहते हैं उस पर/का किसी स्वरा या कंगना को ठप्पा लगवाने की ज़रूरत ही क्या है ? आप को इतना इंफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स क्यों है ? आप को अपने में आत्म विश्वास क्यों नहीं है ? आप के पास खुद का कोई एंगल क्यों नहीं होता ? आप गुटों में ‘सोचना’ इतना क्यों भाता है ?

    समझती हूं कि पोस्ट लिखना ख़ब्त है आपकी और कोई भी सतही मुद्दा जिस पर पोस्ट लिख कर कुछ ऑर्गेज़्म टाइप का मज़ा आ जाता है उस पे आप लिख देते हैं पर इतनी भड़भड़ाहट क्यों हैं तमगे देने की !!! 

    शेहला राशिद मत बनिये, वो लिवइन पर du में रैली निकालते हैं जैसे कि यही औरतों की सबसे बड़ी दिक्कत है, इस पर काम हो गया तो औरतें पिटना बन्द हो जाएंगी, उनकी वेजेज़ बराबर हो जाएंगी, वो साक्षर हो जाएंगी वगैरह !!
    इस तरह की रैलियां और यह सेलेब्रिटी टाइप एक्टिविस्ट केवल सेफ्टी वाल्व होते हैं जो असल मुद्दे तक पहुंचने नहीं देते न ही इनके लिए इनका कोई मोल है !! पर यहां फेसबुकिये किरान्तिकारियों की आरती उतारनी चाहिए !!

    मैं शायद आपसे भी बड़ी मूर्ख हूं क्या पता आपसे भी बड़ी शातिर हूं !! मैं जो भी हूं लेकिन काम की बात यह है कि आप एक नम्बर के मूर्ख हैं या शातिर !!

    मुझे स्वरा और कंगनाओं से कोई मतलब नहीं हैं ! लेकिन यहां के जो मसखरे हैं, (स्वरा की भाषा में कहें तो चूतियों से कह सकती हूं लेकिन अभी नहीं कहूँगी)उनसे दो बातें कभी कभी ज़रूरी हो जाती हैं और मैं इन की अपने जैसे लोगों पर लगाये आरोपों को बिलकुल पर्सनली लेती हूं !! आप लोगों को डिमोटिवेट करना इसलिए जरूरी समझती हूं क्योंकि अगर नहीं किया तो आपसे अलग राय रखने वालों का तो आप जनाज़ा निकाल देंगे !

    Apoorva Pratap Singh


    Apoorva Pratap Singh

  • झूठ झूठ झूठ –Ramesh Chand Sharma

    झूठ झूठ झूठ –Ramesh Chand Sharma

    Ramesh Chand Sharma

    झूठ झूठ झूठ,
    झूठ पर फिर झूठ, 
    कितनी झूठ, कैसी झूठ, 
    रंग बदलती मेरी झूठ,
    जितनी चाहो उतनी झूठ, 
    झूठ पर नहीं दूंगा छूट,
    बनी झूठ, बनाई झूठ, 
    झूठी झूठ सच्ची झूठ, 
    लौटके वापिस आई झूठ,
    मुफ्त में दे रहा झूठ,
    जितनी लूटे, लूट ले झूठ,
    झूठ ले लो झूठ, 
    बेच रहा मैं खुली झूठ,
    कच्ची झूठ पक्की झूठ,
    ये है पकी पकाई झूठ, 
    बासी झूठ ताजी झूठ, 
    तली तलाई सूखी झूठ, 
    खट्टी मिठी चरपरी झूठ,
    जूते चप्पल खाई झूठ, 
    मेरी अपनी बनाई झूठ, 
    तोड मरोड बनाई झूठ,
    गाली डण्डे खाई झूठ, 
    फिर भी समझ नहीं आई झूठ, 
    अभी नई बना दूं झूठ,
    खरी खोटी छोटी झूठ, 
    पतली मोटी लम्बी झूठ, 
    जैसी चाहो वैसी झूठ, 
    नई और बना दूं झूठ,
    समझी समझाई यह है झूठ, 
    तेरे समझ न आई झूठ,
    तू रहेगा हरदम ठूंठ, 
    ले लो झूठ ले लो झूठ,
    यह नफरत फैलाती झूठ,
    बडे बडे को धूल चटाती झूठ,
    छोटे को बडा बनाती झूठ,
    नामर्द को मर्द बनाती झूठ,
    यह वोट दिलाती झूठ,
    किसी को नेता बनाती झूठ,
    नोटों को कागज बनाती झूठ,
    अपने को दूर हटाती झूठ, 
    भ्रष्टाचारी को गले लगाती झूठ,
    गुण्डों को पास बुलाती झूठ,
    स्वार्थी को गले लगाती झूठ,
    पैट्रोल के दाम बढाती झूठ,
    मंहगाई गले लगाती झूठ, 
    मंहगे को सस्ता बताती झूठ,
    खूब विदेश घुमाती झूठ,
    लूटेरों को विदेश भगाती झूठ,
    बडे बडे भवन बनाती झूठ,
    लोगों का खून पी जाती झूठ,
    कभी नहीं शरमाती झूठ,
    झूठों को गले लगाती झूठ,
    सत्ता के लिए सबसे हाथ मिलाती झूठ,
    सबको मूर्ख बनाती झूठ,
    कहीं नजर नहीं आती झूठ,
    सब जगह पहुंच जाती झूठ,
    अपने को धर्म बताती झूठ,
    कहीं धर्म स्थल गिराती झूठ,
    कहीं धर्म स्थल बनवाएगी झूठ,
    यहां झूठ, वहां झूठ,
    सब जगह पहुंच जाना चाहती झूठ,
    दंगा फसाद फैलाती झूठ,
    उन्मादी लोग बनाती झूठ,
    लोगों के गले कटाती झूठ,
    रोजगार विहीन बनाती झूठ,
    सच को झूठ बनाती झूठ,
    कभी संसद में भी घुस जाती झूठ,
    अपने को पाक साफ बताती झूठ,
    विपक्ष से घबराती झूठ,
    जोर जोर से चिल्लाती झूठ,
    कभी घडियाली आंसू बहाती झूठ,
    आश्वासन खूब देती झूठ,
    कुर्सी के चिपकी है झूठ,
    अपने को गरीब बताती झूठ,
    लाखों का सूट पहनती झूठ,
    पल पल रंग बदलती झूठ,
    मंहगे कपडे सिलाती झूठ,
    अपना पीछा कब छोडेंगी झूठ,
    संगठित होकर तेजी से रूठ,
    तभी पीछा छोडेंगी झूठ।

    Ramesh Chand Sharma

  • अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट मिशन को समर्पित व्यक्तित्व : डॉ धरम कीर्ति –by Vidya Bhushan Rawat

    अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट मिशन को समर्पित व्यक्तित्व : डॉ धरम कीर्ति –by Vidya Bhushan Rawat

    Vidya Bhushan Rawat

    अगले माह वह अपना अस्सी वा जन्मदिवस मना रहे होते लेकिन प्रकति के नियमो के आगे हम सभी मजबूर है. बाबा साहेब आंबेडकर के विचारो को समर्पित और बौध साहित्य के विद्वान डॉ धर्म कीर्ति का कल रात को नयी दिल्ली के एक अस्पताल में  देहांत हो गया. वह पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. उनकी प्रमुख पुस्तकों में कुछ इस प्रकार से हैं: महान बौद्ध दार्शनिक, बुद्ध का समाज शास्त्र, बुद्ध का निति शास्त्र, बुद्ध कालीन वर्णव्यवस्था और जाति, महान मनोचिकिस्तक बुद्ध, जाति विध्वंसक भगवान बुद्ध, मै नास्तिक क्यों, बौध धर्म हिन्दू धर्म की शाखा नहीं, गाँधी और गांधीवाद की दार्शनिक समीक्षा, मानवाधिकारों के पुरौधा डॉ बी आर आंबेडकर, महान बुद्धिवादी दार्शनिक डॉ अम्बेडकर आदि. विभिन्न बौध विद्वानों और दार्शनिको पर तो उन्होंने तमाम पुस्तके लिखी. बाबा साहेब के शिक्षा और वैचारिक क्रांति को उन्होंने अपने जीवन में जैसे उतार ही दिया था इसलिए तमाम बौध साहित्य न केवल पढ़ डाला अपितु उसमे महारत भी हासिल की.

    आगरा की ऐतिहासिक धरती में पैदा हुए डॉ धर्मकीर्ति के परिवार के लोग आर्य समाज से प्रभावित थे और बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा बौध धर्म में आने की कॉल को सबसे पहले स्वीकारने वाले लोगो में थे. १९५६ में जब बाबा साहेब आंबेडकर आगरा के प्रसिद्ध रामलीला मैदान में आये तो उन्होंने लोगो को बुद्ध धर्म ग्रहण करने की बात कही थे. उसी समय बाबा साहेब आंबेडकर ने डॉ धर्मकीर्ति के घर के पास एक बुद्ध विहार का उद्घाटन भी किया. उस समय तक गाँव में एक शिव मंदिर था लेकिन आर्य समाज का असर होने से बहुत से गाँव-वासी वैसे भी मूर्ति पूजा नहीं करते थे इसलिए जब बाबा साहेब ने बौध धम्म दीक्षा की बात कही तो लोग तैयार हो गए लेकिन कुछ एक लोग इसके विरोध में थे लेकिन अंत में गाँव में लोगो ने शिव मंदिर को हटा बुद्ध विहार की स्थापना की ताकि बाबा साहेब के आह्वाहान का सही अर्थो में स्वागत हो सके.

    डॉ धर्म कीर्ति ने बाबा साहेब की ऐतहासिक रैली में भाग लिया और उनके जीवन में सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के विचारो का अत्यधिक प्रभाव पड़ा. पिछले वर्ष दिसंबर में मैंने उनका एक बेहद बड़ा साक्षात्कार लिया तो उन्होंने अपने जीवन के अनछुए पहलुओ के बारे में विस्तार से जानकारी दी.वह बताते है के जब बाबा साहेब ने प्रबुद्ध भारत की बात कही तो ये केवल दलितों के लिए ही नहीं थी वह चाहते थे के सवर्ण हिन्दू से भी कह रहे थे के यदि वे मानवता की सेवा और कल्याण चाहते है तो बुद्ध धम्म में आकर अपने में बदलाव लाये. बुध विहार में जहा पूरे मार्ग में बाबा साहेब के स्वागत में गुलाब के पंखुड़िया बिछी हुई थी, बाबा साहेब ने कहा के हिन्दुओ की तरह बुद्ध की पूजा मत करो. धम्म में मार्ग में मत आओ यदि आप बुद्ध को ढंग से समझे नहीं हो .यदि आप बुद्ध के मार्ग पर नहीं चल सकते तो विश्व्-व्यापी परिवर्तन नहीं ला पाओगे.

    आगरा के इसी रामलीला मैदान में बाबा साहेब की आँखों में आंसू छलके थे जब उन्होंने कहा था समाज के  पढ़े लिखे लोगो ने उनकी उम्मीद के अनुसार काम नहीं किया. डॉ धर्मकीर्ति बताते है के हां ये बात सही है के बाबा साहेब ने ये बात कही के मेरे समाज के पढ़े लिखे लोगो ने मुझे धोखा दिया क्योंकि वे सत्ता के साथ समझौता करते थे और सफल होने के बाद समाज से नहीं जुड़े. सफलता के बाद व्यक्ति हमारे संघर्षो को नहीं पहचानता इसलिए आत्मगौरव कभी भी अहंकार में बदल सकता है. बाबा साहेब आत्मसम्मान चाहते थे लेकिन उसके अहंकार में बदल जाने के खतरे के बारे में लोगो को हमेशा आगाह करते रहते थे.

    वे कहते है: ‘मै शिक्षा विभाग में एडिशनल डायरेक्टर पद से रिटायर हुआ. मेरा बेटा एक बड़ा एक आर्टिस्ट है. मेरी बेटी ने शोध किया और वो एक सम्मानित पद पर है. यदि मै गाँव में होता तो केवल खेती कर रहा होता. आज मै जो कुछ हूँ बाबा साहेब के कारण हूँ. लेकिन इसी हकीकत को स्वीकार करने में लोग हिचकते है’.

    Dr Dharmkirti

    ‘मैंने तीन विषयो में पी एच डी की, एक विषय में डी लिट् किया और एक में डी लिट् फिर से कर रहा हूँ, कोई विश्विद्यालयो और शोध संस्थानों में में लेक्चर दिए है. करीब ९० से अधिक पुस्तके लिखी है. क्योंकि मेरे मन में ये बात घर कर गयी के मुझे बाबा साहेब के मार्ग पर चलना है, ज्ञान का मार्ग. इसलिए मै हमेशा ऐसी कोशिश करता रहा’.

    जब मैंने उनसे पूछा के तीन पी एच डी करने के पीछे क्या कारण था तो उन्होंने इससे सम्बंधित मज़ेदार वाकिया बताया . वह कहते है : “ मैंने आगरा विश्वविद्यालय से अपनी पहली पी एच डी की थी. एक दिन मै दिल्ली विश्विद्यालय के बुद्धिस्ट डिपार्टमेंट में बैठा था. एक मित्र ने पूछा तो मैंने बताया के मैंने आगरा विश्वविद्यालय से पी एच डी की है तो उन्होंने मजाक में मेरी बात को लिया और कहा के अगर असल पी एच डी करनी है तो यहाँ से करके दिखाओ. अब उन दिनों दिल्ली में पी एच डी करने के लिए पहले एम् फिल करनी होती थी जो मैंने नहीं की थी इसलिए मैंने एम् फिल का फार्म भरा और उसे पूरा किया. अगले वर्ष मैंने पी एच डी के लिए एनरोल किया और उसे एक वर्ष के अन्दर ही करके दे दिया. थीसिस लिखना मेरे लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी इसलिए आसानी से लिख दी. कुछ वर्षो बाद किसी सज्जन ने मुझे ताना मारा के मेरा विषय तो दर्शन है लेकिन उसमे कोई शोध नहीं है तो मैंने मेरठ विश्विद्यालय से उसे भी कर लिया.

    1963  से डॉ धर्म कीर्ति ने आगरा के प्रसिद्ध बलवंत सिंह राजपूत कालेज में दर्शन शास्त्र विभाग में पढ़ाना शुरू किया जो के उस दौर में बहुत बड़ी बात थी. मैंने उनसे पुछा के क्या कभी उन्हें कालेज में जातिवाद नजर आया तो उन्होंने बताया के नहीं. हाँ एक घटना का जिक्र करके उन्होंने बताया के ‘कालेज के ऑफिस के सामने पानी पीने का एक घड़ा रखा रहता था जिससे सभी अध्यापक लोग पानी पीते थे लेकिन कालेज के क्लर्क ने मुझे वहा पानी पीने से साफ़ मना कर दिया. मैंने इसकी शिकायत वह के प्रचानाचार्य डाक्टर आर के सिंह से की जिन्होंने उस क्लर्क को बहुत बुरी तरह से झाड लगाईं के उसके बाद से वह प्रश्न ही ख़त्म हो गया’.

    प्रारंभिक दौर के अम्बेडकरवादी विचारो से परिपक्व और कार्य प्रणाली में व्यवहारिक थे. वे किसी भी किस्म के पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं थे. मैंने भगवान् दास जी, एल आर बाली आदि के साक्षत्कार भी किये और सभी से पता चला के उनका झुकाव बे सभी शुरूआती दौर में आर्य समाजी थे और अपने अन्दर प्रगतिशील विचारो के लिए बहुत हद तक आर्य समाज को भी जिम्मेवार बताते है. उसके अलावा सभी अपना झुकाव वामपंथ की और मानते थे हालाँकि सभी ने भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों में जातिगत भेदभाव के विषय में व्यापक तौर पर लिखा और उसकी आलोचना भी की.

    आगरा में राहुल संकृत्यायन जी का भी आना जाना लगा रहता था. डॉ धर्म कीर्ति जी बताते हैं के उनके राहुल जी के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे. वो कहते है राहुल जी ने एक बार कहा के जिसे मूर्ख बनना हो तो संस्कृत पढ़ सकता है. मैंने तो वो उम्र पार कर ली जब लोगो को मुर्ख बनाया जा सकता है. उनका कहना था का लिपि का कोई मूल्य नहीं होता. मुख्य महत्त्व तो उसमे मौजूद विचारों का है. सारे वेद , उपनिषद, पुराण, स्मृतिया संस्कृत में हैं इसलिए कोई मनुष्य इन्हें पढ़ेगा तो विचारों को पढने के लिए ही जाएगा लिपि नहीं और जो इन्हें पढ़ेगा वो तो पागल हो जाएगा.”

    राहुल जी के बारे में एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हुए वह कहते हैं : राहुल जी आगरा में किसी ऋषिकेश चतुर्वेदी के घर पे आया जाया करते थे और वहीँ से वह हमारे बुद्ध विहार में आते थे. एक दिन ऋषिकेश जी ने उनसे पूछ लिया के कहा जा रहे हो तो उन्होंने बताया के मैं बुद्ध विहार जा रहा हूँ तो चतुर्वेदी जी ने शायद कोई जातिसूचक टिपण्णी कर दी . राहुल जी से रहा नहीं गया बोले ‘ पांच हज़ार साल से तुम उनको मारते आये हो, अपमानित किये हो तो कुछ नहीं और आज यदि वो तुमको गाली भी दे दे, या तुम्हारी गर्दन भी काट दे तो भी ये बहुत कम होगा. उसके बाद वह हमेशा ही हमारे बुद्ध विहार में ही ठहरे’.

    डाक्टर धर्म कीर्ति ने मुझे भदंत आनंद कौत्यल्यायन के साथ भी अपने संस्मरण सुनाये. ऐसा लगता था के वह अम्बेडकरी आन्दोलन के महतवपूर्ण इतिहास को अपने में समेंटे हुए थे इसलिए मेरे लिए यह जरुरी था के सबको दस्तावेजीकरण कर सकू.

    डॉ धर्मकीर्ति को बौध दार्शिनिक धर्मकीर्ति ने बहुत प्रभावित किया और इसी कारण उन्होंने अपना नाम धर्म कीर्ति रखा. दरअसल उनके बचपन का नाम कालीचरण था. इस विषय में चर्चा करते हुए वह बताते हैं :

    “मेरा नाम कालीचरण था. मेरे पिता जी आर्य समाजी थे. पंडित काली चरण शास्त्री नामक एक आर्य समाजी विद्वान थे जो संस्कृत, फ़ारसी और अरबी के विद्वान थे. मेरे पिता भी मुझे उन जैसा बनाना चाहते थे इसलिए मेरा नाम कालीचरण रख दिया. जब मैंने एम् ए और पी एच डी कर ली तो बी पी मौर्या ने मुझे सलाह दी के मैं अपना नाम बदल दूं. वो कहते थे के तुमने तो १९५६ में ही बुद्धिस्ट हो गए लेकिन नाम अभी भी वही चल रहा है इसलिए तुम्हे इसे बदलना चाहिए. मुझे भी ये नाम पसंद नहीं था. सवाल यह था का नया नाम क्या हो ? धर्म कीर्ति छटवी शताब्दी में नालंदा में एक बौध दार्शनिक थे. वह मूलतः केरला के रहने वाले ब्राह्मण थे जिन्होंने बुद्ध धर्म में आकर अपना नाम धर्मकीर्ति रखा. मैंने भी उनसे प्रभवित होकर अपना नाम आधिकारिक तौर पर १९९६ में धर्म कीर्ति रख दिया.”

    मैंने पूछा आचार्य धर्मकीर्ति ने उनको कैसे प्रभावित किया तो डॉ धर्म कीर्ति उनका एक प्रमुख बात बताते है: यदि कोई वेदों को प्रमाण मानता है, और फिर उनके आधार पर ये मानता है के ईश्वर ने पृथ्वी की रचना की है, स्नान करके धर्म की पूर्ती होती है, कोई जातिवाद को मानते हुए छुआछूत करता है के ये ईश्वर की देन है, और पाप को नष्ट करने के लिए शरीर को कोई कष्ट देता है, तो इन लोगो की प्रज्ञा नष्ट हो गयी है. ये पांच चिन्ह मूर्खो की पहचान है.

    डॉ धर्मकीर्ति का बौध धर्म और दर्शन पर गहन अध्ययन था. उनके विचारों पर राहुल संकृत्यायन और भदंत आनंद कौत्स्य्लायान का भी असर दिखाई देता है. वह मानते थे के बौध धर्म को भी ब्राह्मणों ने घेर लिया और ऐसी बातो को इसमें डालने की कोशिश की जो बुद्ध ने कभी कही ही नहीं.

    मजेदार बात यह के डॉ धर्म कीर्ति ने भूदान आन्दोलन में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी की. मैंने उनसे पुछा आखिर विनोबा के अध्यात्म को उन्होंने कैसे स्वीकार कर लिया जब वह अम्बेडकरवादी आन्दोलन से जुड़े हुए हैं तो उनका जवाब साफ़ था. वह बोले के मैं विनोबा के साथ उनके अध्यात्म के कारण नहीं अपितु भूदान आन्दोलन के कारण जुडा. मुझे लगा के हमारे लोगो को जमीन की जरुरत है और ऐसे में यदि कोई व्यक्ति आन्दोलन कर रहा हो जिससे हमारे समाज को लाभ होता हो तो क्या बुराई है. और इस आन्दोलन के चलते उन्होंने बहुत से लोगो को भूमि आवंटन करवाने में सहयोग किया.

    डॉ धर्मकीर्ति ने जीवन पर्यंत अपने सिद्धांतो से समझौता नहीं किया. वह बी पी मौर्या के बहुत करीब थे लेकिन जब मौर्या ने भाजपा का दामन थामा तो उन्होंने साथ देने से इनकार कर दिया. भाजपा के लोगो ने उन्हें अपने पास बुलाने के बहुत प्रयास किये. वह कहते है के दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री श्री साहेब सिंह वर्मा ने उन्हें अपने यहाँ चाय पर बुलाया और उन्हें भाजपा में शामिल होने के दावत दी और राज्य सभा की सद्स्त्यता, या किसी कमीशन का पदभार या किसी राज्य का राज्यपाल आदि का प्रलोभन देने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया.

    Dr Dharmkirti and Vidya Bhushan Rawat

    डाक्टर धर्मकीर्ति के पास विचारों और अनुभव का खजाना था. उनके जाने से अम्बेडकरी मिशन को बहुत अधिक हानि हुई है क्योंकि इस उम्र में भी उनमे मैंने पूरी ऊर्जा पाई. वह लगातार अध्ययन कर रहे थे और लिख भी रहे थे , इसलिए अचानक से उनका चले  जाना बहुत दुखदायी है. ऐसे समय में जब देश में दलितों के उपर हमले हैं और मनुवादी ताकते भिन्न भिन्न तरीको से सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है और दलितों और अन्य प्रगतिशील मानववादी ताकतों पर हमला कर रही है, डॉ धर्मकीर्ति के ओजस्वी बाते उनको ताकत और उर्जा प्रदान करती. मुझे ख़ुशी है के मैं उनसे मिल पाया और लम्बी बात हो सकी.

    Vidya Bhushan Rawat

  • नीलम बसंत नंदिनी, उनकी बच्चियां व घरेलू शिक्षा –Vivek Umrao Glendenning

    नीलम बसंत नंदिनी, उनकी बच्चियां व घरेलू शिक्षा –Vivek Umrao Glendenning

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    नीलम बसंत नंदिनी का फेसबुक में प्रोफाइल है। मध्यवर्गीय-समाज की ग्रहिणी हैं। शहरी जीवन जीती हैं। घर में रहकर बच्चियों की देखभाल करतीं हैं। दो बच्चियां हैं, बड़ी बच्ची की आयु दस वर्ष व छोटी बच्ची की आयु चार वर्ष। पति NTPC में इंजीनियर हैं, इसलिए NTPC की कालोनी में आवास मिला हुआ है।

    प्रयोगशील महिला हैं। फेसबुक में बिना फालतू की विद्वता झाड़े, सरलता से लिखती हैं। जागरूक महिला हैं, विवाह के पश्चात भी पति का सरनेम नहीं लगती हैं। दो बच्चियों की माता होकर संतुष्ट व खुश हैं। जागरूक होने के बावजूद पुरुष के प्रति द्वेषभाव से ग्रस्त होकर या पूर्वाग्रह से पोस्ट नहीं लिखतीं हैं। विभिन्न कोणों से सेल्फी लेते हुए, “कैसी लग रही हूँ” टाइप की फोटो लगाकर लाइक पाने का प्रयास नहीं करती हैं, न ही ऐसी फोटो डालती हैं जिससे स्वयं को तथाकथित रूप से महिला-जागरूक-क्रांतिकारी प्रमाणित कर सकें।

    करते हुए सीखने समझने की प्रक्रिया में गतिमान हैं। इस तरह गतिमान होने में गौरव महसूस करना मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति-गति है, इसको अहंकार की श्रेणी में रखना बेमानी है।

    नीलम बसंत नंदिनी अपनी बच्चियों को बचपन से ही पर्यावरण के प्रति क्रियात्मक-जागरूक बना रही हैं। ये अपनी बच्चियों को पानी बचाएं के साथ-साथ पानी जंगल व जीव चक्र से संबंधित अन्य बातें भी प्रयोग के रूप में बताती समझाती हैं।

    इनकी बच्चियों ने नदी, तालाब व जीवों का संबंध समझते हुए स्वयं घर की बागवानी में छोटा नाला व तालाब बनाया, असली। असली तालाब का तात्पर्य हमेशा दस-बीस एकड़ का तालाब ही नहीं होता। तालाब तालाब है, भले ही वह छोटा हो।

    बच्चियों ने तालाब बनाया, तालाब में पानी भरने के लिए नाला बनाया। तालाब में व तालाब के आसपास जीवों के खिलौने रखे और वाइल्ड-लाइफ का चक्र बना दिया। फोटो में जानवर पानी के आसपास आनंद लेते हुए देखे जा सकते हैं। तालाब में कछुआ भी है। इस तालाब का बागवानी में पौधो के लिए प्रयोग भी है।

    ऐसे ही छोटे-छोटे जीवंत खेलों के द्वारा समझदार माता-पिता अपने बच्चों से मित्रवत रिश्तों का आनंद उठाते हुए जीते है तथा खेल-खेल में ही बच्चों को वास्तविक रूप से पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों के प्रति जागरूक भी कर रहे होते हैं।

    यह बच्चियां बड़े होकर भले ही तालाब न बनाएं, लेकिन तालाबों को पाटकर मकान व संपत्तियां भी नहीं खड़े करेंगीं। पानी जंगल व पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होंगी।

    यही शिक्षा है, स्कूलों में शिक्षा का माध्यम ऐसा ही होना चाहिए।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • बदली –Hukam Singh Rajput

    बदली –Hukam Singh Rajput

    Hukam Singh Rajput

    अपना रंग जमाती बदली,
    सबको नाच नचाती है बदली!
    नित्य कहा से आती बदली,
    नित्य कहा पर जाती है बदली!

    अपना रंग बदल देती बदली,
    सफेद से लाल काली हो जाती है बदली
    आकाश से हट जाती बदली,
    आकाश पर छा जाती है बदली!

    धीरे-धीरे चलती बदली,
    दौड़ खूब लगाती है बदली!
    सीधी कभी ना चलती बदली,
    गोल गोल घूमजाती है बदली!

    पर्वत पर छा जाती बदली,
    अपना रंग दिखाती है बदली!
    चंदा सूरज छुपा देती बदली,
    कभी खुद छुप जाती है बदली!

    हवा को पलट देती बदली,
    हवा संग चल देती है बदली!
    पतली हो जाती बदली,
    मोटी बन जाती है बदली!

    ओष को रोक देती बदली,
    ओले खूब गिराती है बदली!
    तुषार गिरा देती बदली,
    जल खूब बरसाती है बदली!

    गरज गरज कर चलती बदली,
    बिजली खूब चमकाती है बदली!
    इन्द्र-धनुष बना देती बदली,
    मयूर को नाच नचाती है बदली!

    धारवा छोड देती बदली,
    पपीहै को पानी पिलाती हैबदली!
    बेजान झरनो को जिवीत करती बदली,
    धरती पर स्वर्ग बना देती है बदली!

    गरजती तो बास ऊगाती,
    चमकती है तो
    आम के फूल जलाती है बदली!
    ठंड खूब पहुंचाती बदली,
    गरमी भी पहुँचाती है बदली!

    सिमट-सिमट कर सिमट जाती बदली,
    छोटी से बड़ी हो जाती है बदली!
    घट-घट कर घट जाती बदली,
    आकाश से हट जाती है बदली!

    कहा से पानी लाती बदली,
    कौन जाने जल कैसे बरसाती है बदली!
    बून्द-बून्द कर बून्द गिराती बदली,
    मूसलाधार जल बरसाती है बदली!

    सागर से गुजर जाती बदली,
    खारे पानी को मीठा बनाती है बदली
    हरियाली कर देती बदली,
    हरे रंग को हरती है बदली!

    सागर की पनिहारी बदली,
    गगन की पटरानी है बदली!
    अलग-अलग दल मे रहती बदली,
    बरसनै पर एक हो जाती है बदली!
    कहे राजपूत जग को पालती बदली
    जग की जीवन जननी है बदली !!

    Hukam Singh Rajput