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शाकाहार मांसाहार बनाम ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत

ब्राह्मणवाद का विरोध हो, दलित समर्थन हो या भारत की माओवादी क्रांतिकारिता हो। शाकाहार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विरोध उभयनिष्ठ तत्व है। बहुत ऐसी घटनाएं हैं जिनमें शाकाहारी लोगों को माओवादियों द्वारा मांस खाने के लिए बाध्य किया गया या धोखे से मांस खिलाया गया। मैं नहीं जानता कि मानसिकता की शुरुआत कब व कैसे हुई, लेकिन शाकाहार को बहुतेरे दलित चिंतक ब्राह्मणवाद से जोड़कर देखते हैं तथा मांसाहार को ब्राह्मणवाद के विरोध के रूप में देखते हैं। इस धींगामुस्ती के लिए तर्क खोज कर लाते हैं, अच्छी खासी ऊर्जा का अपव्यय करते हैं। समाज में वैसे ही लोगों की मान्यताओं के कारण बहुत सारी खाइयां हैं। मांसाहार शाकाहार वाली खाई भी पैदा कर दी जाती है। आइए मांसाहार शाकाहार से संबंधित कुछ तथ्यों को देखते समझते हैं।

आधुनिक भारतीय परिवेश में गरीब लोगों के लिए शाकाहार सरल, सुलभ व सस्ता है:

  • वे लोग जो जंगलों में रहते हैं:

    भारत में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो जंगलों में रहते हैं। जो लोग जंगलों में रहते हैं उनको भी पशु उपलब्ध नहीं हैं। जो समाज जंगलों में रहते हैं उनके लिए भी पशुओं की उपलब्धता कम होने के कारणों में पशुओं की प्रजातियों का विलुप्त होना, पशुओं की संख्या कम होते जाना व जंगलात के कानून हैं। जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोगों को जंगल में रहने के बावजूद पौष्टिक भोजन मिल पाना संभव नहीं रहा। पेड़ों की छालें, पत्तियां व पौधों को पानी में उबालकर खाते पीते रहे। चावल का विभिन्न प्रकार से प्रयोग प्रमुख खाद्य रहा।

  • वे लोग जो जंगलों में नहीं रहते हैं (मुख्यधारा के लोग):

    मांसाहार के लिए पशु चाहिए या जलचर चाहिए। पशुओं के लिए चारगाह व पानी स्रोत चाहिए। जलचरों के लिए तो पानी स्रोत चाहिए ही चाहिए। एक समय था जब गांवों में तालाब होते थे, छोटी-छोटी सरिताएं होतीं थीं। मछली अपने आप उत्पादित होती थी। कोई भी गया तालाब में घुसा, मछली निकाल लाया और पका कर खा लिया। अनेक प्रकार के छोटे-मोटे पशु सहजता से उपलब्ध रहते थे। कुछ नहीं तो खेतों में चूहे तो मिल ही जाते थे। अब तो रासायनिक खादों व कीटनाशकों के प्रयोग के कारण व इनके प्रयोग से जमीन कड़ी हो जाने के कारण खेतों में चूहों व अन्य जानवरों की उपलब्धता बहुत तेजी से घटी है।

    पहले लोग जानवरों से खेती करते थे। जानवरों की मृत्यु होती रहती थी जिनका प्रयोग अछूत माने जाने वाले लोगों को करने के दे दिया जाता था। किसी गांव की अछुत बस्ती में जाते ही सुअर दिखने शुरू हो जाते थे, अछूत लोग खूब सुअर पालते थे, जो नालियों में लोटते रहते थे, कुछ नहीं तो गंदगी खा करके ही मस्त रहते थे, कुलमिलाकर सुअर अपने खाने का जुगाड़ खुद ही कर लिया करता था। भैंस, सुअर इत्यादि जैसे जानवर अछूतों के भोजन का अभिन्न अंग थे।

    अब बहुत कुछ बदल चुका है। स्थितियां परिस्थितियां व मानसिकताएं बदलीं हैं। कितने दलित लोग ऐसे हैं जो नालियों में लोटने वाले सुअर को खाना चाहते हैं। लोग अब जानवरों के मरने का इंतजार नहीं करते हैं, जिस जानवर का भी दूध कम हुआ उमर बढ़ी उसको स्लाटर हाउस में बेच कर पैसे कमा लिए। बछड़ों को तो बैल बनने ही नहीं दिया जाता, क्योंकि खेती में बैलों का प्रयोग किया ही नहीं जाता, बछड़ों को तब तक घर में रखा जाता है जब तक उसको पैदा करने वाली गाय का दूध निकालने के लिए बछड़े की जरूरत रहती है। यह जरूरत खतम होते ही बछड़े को स्लाटर हाउसों को बेच दिया जाता है।

    यदि गांवों के तालाबों में अछूतों का प्रवेश निषेध रहा तो आसपास की किसी छोटी बड़ी नदी में चले गए जलचरों का जुगाड़ कर लिया। अब या नदियां सूख गई हैं या इतनी अधिक प्रदूषित हो चुकी हैं कि जलचरों की संख्या नगण्य हो चुकी है। तालाब बचे नहीं, नदियां बचीं नहीं, बचे भी हैं तो उनमें मछलियों का उत्पादन व्यवसायिक हो चुका है।

यह एक कटु सत्य है कि दलितों के लिए मांस के जो स्रोत पहले सहजता से उपलब्ध थे वे अब उपलब्ध नहीं हैं। अपवाद इलाकों की बात अलग है। यहां अपवादों की बात हो भी नहीं रही।

गरीबों के लिए आधुनिक भारत में मांसाहार उत्पादन बनाम शाकाहर उत्पादन:

मांसाहार उत्पादन शाकाहार उत्पादन की तुलना में अधिक खर्चीला है। जिनके पास दाल चावल उगाने की जमीन नहीं वे पशुओं के उत्पादन के लिए जानवरों के लिए चारागाह कहां से लाएंगें। दूसरी बात यह कि मुख्यधारा वाले इलाकों में अब चारागाह बचे ही कहां हैं। तालाब बचे नहीं तो पशुओं को पानी कहां से मिलेगा। पशु तो हैंडपंप से पानी निकाल पी नहीं सकते हैं। अब पशुओं का उत्पादन करना पड़ता है, स्वतः पशुओं का उत्पादन स्वतः होने वाली सामाजिक जीवन शैली अब नहीं रही। वर्ष भर में मांस के लिए एक परिवार को जितने पशु चाहिए, उनके लिए जितने बड़े चारगाह की जरूरत होगी उससे बहुत कम जमीन में वर्ष भर की जरूरत का अनाज उगाया जा सकता है। मांसाहार की तुलना में शाकाहार उत्पादन में बहुत कम पानी की आवशयकता होती है।

मान लीजिए कि यदि मुर्गी भी पाली जाए तो मुर्गी दाना खाती है। यदि मुर्गी को दालें व अनाज देने लायक क्षमता है तो स्वयं भी तो उस अनाज का प्रयोग किया जा सकता है। यह तो केवल मांसाहार करने के लिए गरीबी में भी अतिरिक्त निवेश करना हुआ। शाकाहार ही तो सरल सुलभ हुआ।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मांसाहार वाले भी रोटी, चावल इत्यादि खाते हैं। ऐसा तो है नहीं कि केवल मांस खाकर ही जीवित रहते हैं। रोटी चावल इत्यादि अनाजों का इंतजाम तो कहीं न कहीं से किसी न किसी जुगाड़ से करते ही हैं।

गरीब से गरीब आदमी भी अपनी झोपड़ी में लौकी, तरोई, कद्दू इत्यादि उगा सकता है। सिर्फ एक पौधा ही पूरे परिवार को पूरे मौसम सप्लाई कर सकता है। घर में प्रयोग किए जाने वाले पानी में से ही पौधों को दो चार लोटा पानी दिया जा सकता है। जरूरी तत्वों वाली सब्जियों का उत्पादन झोपड़ी में ही किया जा सकता है वह भी बिना अतिरिक्त खर्च के। अब रही बात रोटी व चावल की तो मांसाहार करते समय रोटी चावल का जुगाड़ जहां से करता है, वहीं से करे।

मेरा सिर्फ यह कहना है कि आधुनिक परिवेश में भारत में गरीब आदमी के लिए मांसाहार की तुलना में शाकाहार सरल व सुलभ विकल्प है। 

शाकाहार बनाम मांसाहार:

दुनिया में ऐसे बहुत देश हैं, ऐसे क्षेत्र हैं जहां शाकाहार से मनुष्य को भोजन उपलब्ध करा पाना संभव नहीं। यूरोप में ऐसे अनेक देश हैं जहां वर्ष में महीनों ऐसी स्थिति रहती है कि शाकाहार का उत्पादन संभव नहीं। ऐसे बहुत देश व क्षेत्र हैं जहां जमीन कम पानी अधिक है। दुनिया में ऐसे कई देश हैं जहां कृषि के लिए उपजाऊ जमीन नहीं। यदि सार्वभौमिकता के साथ विचार किया जाए तो दुनिया में केवल शाकाहार पर निर्भरता संभव नहीं। भिन्न-भिन्न भोगोलिक परिस्थितयों के आधार पर वहां के लोगों ने खानपान, रहनसहन व आचार विचार की परंपराएं बनाईं व स्थापित की। यही सांस्कृतिक विभिन्नता है।

  • क्या केवल मांसाहार संभव है:

    अपवाद क्षेत्रों व अपवाद लोगों को यदि छोड़ दिया जाए तो केवल मांसाहार संभव नहीं। दुनिया में ऐसे अपवाद लोग ही हैं जो पूरा जीवन केवल और केवल मांस खाकर रहते हों। जो लोग मांस खाते हैं वे लोग भी बहुत मात्रा में पास्ता खाते हैं, तोफू खाते हैं, दालें खाते हैं, दूध की बनी वस्तुएं खाते हैं, चीज खाते हैं, मक्खन खाते हैं, सब्जियां खाते हैं, ब्रेड खाते हैं, फल खाते हैं, मेवे खाते हैं, अन्य शाकाहारी वस्तुएं खाते हैं। ऐसे लोग विरले ही होंगे जो मांस व मछली के अतिरिक्त किसी प्रकार का शाकाहारी भोजन न करते हों।

  • क्या केवल शाकाहर संभव है:

    बिलकुल संभव है। हममें आपमें से बहुत लोग ऐसे हैं जिन्होंने जीवन में कभी मांसाहार न किया होगा। दरअसल मानव के क्रमिक विकास की प्रक्रिया में मानव बनने तक की प्रक्रिया में मानव बनने तक सभी पूर्वज शाकाहारी ही रहे थे। मानव भी शाकाहारी था, लेकिन मौसम परिवर्तन व भौगोलिक परिस्थितयों के कारण केवल शाकाहार पर निर्भर रह पाना संभव नहीं था इसलिए मनुष्य ने शाकाहार के साथ-साथ मांसाहार का प्रयोग भी करना शुरू किया। मानव शरीर शाकाहार के लिए अधिक उपयुक्त है।

चलते-चलते:

मैं शाकाहारी हूँ इसके बावजूद मैं मांसाहार को गलत नहीं मानता। आप मेरी थाली में मांस रखकर मेरे साथ एक ही थाली में भोजन कर सकते हैं। यदि आपके मांस का शोरबा बहता हुआ मेरी दाल या सब्जी में मिल जाता है तब भी मुझे आपके साथ एक ही थाली में भोजन करने में समस्या नहीं। मेरे लिए शाकाहार या मांसाहार  किसी व्यक्ति, धर्म, समुदाय, समाज, सभ्यता या देश का मूल्यांकन करने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। शाकाहार मांसाहार के आधार पर मूल्यांकन करने को मैं निहायत ही वाहियात बात मानता हूँ।

यह लेख मांसाहार का विरोध करने के लिए नहीं है क्योंकि यह एक तथ्य है कि दुनिया के सभी मनुष्यों का पेट शाकाहार व मांसाहार से ही हो सकता है। हजारों वर्षों पहले मनुष्य ने शाकाहारी होने के बावजूद मांसाहार करना सीखा तब भी सर्वाइव करना ही कारण था।

यह लेख ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत करने के विरुद्ध तथ्यात्मक आलेख है। यह लेख यह भी बताता है कि आधुनिक भारत में गरीबों के लिए शाकाहारी होना मांसाहारी होने की तुलना में अधिक सरल व सुलभ है।

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