Author: संपादक मंडल

  • रक्षाबंधन — Er Brij Umrao

    रक्षाबंधन — Er Brij Umrao

    Er Brij Umrao

    भाई बहन का प्यार,
    यह राखी का त्योहार।
    बहना दूर से चलकर आई,
    कम न हो अपना प्यार।।

    प्रेम प्यार सुचिता का संगम,
    न हो मलाल मन में जड़ जंगम।
    भ्रात प्रेम की धारा बहती,
    मन में न साल न कोई गम।।

    नहीं कामना कुछ पाने की,
    भैया तू निश्चिंत रहे।
    प्रेम दिवस पर मिल तेरे से,
    हर पलछिन आनंद रहे।।

    स्नेह प्रेम की यह गंगा,
    अविरल बहती रहे सदा।
    मिल जाना जब सुमिरन आये,
    यहां-वहां यूं यदा कदा।।

    स्नेह प्यार का यह सागर,
    लहरों से संस्कारित हो।
    ज्यों दरार पटती वर्षा से,
    आत्म प्रेम आधारित हो।।

    धन वैभव नेपथ्य की बातें,
    सुमधुर सागर उमड़ रहा।
    ज्यों नदिया दरिया से मिलती,
    नभ में बादल घुमड़ रहा।।

    अश्क बह रहे गालों पर,
    आंखों में शैलाब उठा।
    खुशियों की धारा बह निकली,
    दोनों को ही जुदा जुदा।।

    शक की कहीं भी जगह न हो,
    आशंका भागे दूर दूर।
    प्रीति की डोर बंधे ऐसी,
    तन मन हो जाये मजबूर।।

    आशा विश्वास प्रेम श्रद्धा,
    इर्द गिर्द पहरा देती।
    स्नेह प्रेम की धार बहे,
    तन मन को नहला देती।।

    Er Brij Umrao

  • संस्कार — Er Brij Umrao

    संस्कार — Er Brij Umrao

    Er Brij Umrao

    जन्म प्रक्रिया से शूदक हो,
    संस्कार से होता पावन।
    प्रेम प्यार स्नेह समर्पण,
    अन्तर्मन होता उत्प्लावन।।

    संस्कार से सेवित शिशु की,
    अपनी छटा निराली।
    तीक्ष्ण बुद्धि कौशल की मूरत,
    पुण्य पल्लवित डाली।।

    तीन ऋणों को साथ ले चले,
    देव पित्र अरु गुरु का कर्ज।
    सेवा में तीनों के तत्पर,
    सदा निभाता अपना फर्ज।।

    पुष्पित पोषण स्वस्थ संरक्षण,
    शिशु को करे प्रभावित।
    आदर्श संस्कृति से पोषित,
    प्रेम रस रहे प्रवाहित।।

    उन्नत पोषित पौधा हो,
    विराट वृक्ष बन जाता।
    पर्यावरण संरक्षा करता,
    जग की सेवा करता।।

    काम, क्रोध और लोभ,
    मोह, ईर्ष्या का संगम।
    सोंच को कर देते दूषित,
    मन भी हो जाता जड़ जंगम।।

    जीवन के झंझावातों से,
    हरदम होता है दो चार।
    वैदिक संस्कृति संस्कार को,
    नमन करे वह बारंबार।।

    आदर्श राह का राही बन,
    सर्वोच्च शिखर तक जाता।
    मात पिता गुरु का संरक्षण,
    सच्ची राह बताता।।

    सुमधुर, सुन्दर सदा सुहावन,
    पोषित पुरुषार्थ तुम्हारा ।
    अग्रिम पंक्ति में तुम चलते,
    पीछे घूमें जग सारा।।

    Er Brij Umrao

  • आजादी — Hukum Singh Rajput

    आजादी — Hukum Singh Rajput

    Hukum Singh Rajput

    भागीग्यो उ अंगरेज जणीने धरती गेणे राखी थी!
    चांदी सोनो घणो लुटायो फिर भी खन्दी बाकी थी!!

    शहीदों के बलिदान से या धरती अपणी वयीगी रे!
    आजादी की रक्षा करलो या जवान वयीगी रे!!

    मंगल पांडे का बलिदान था बलिदान झांसी की राणी का!
    लाखों ने दिया था बलिदान उनकी याद बाकी रयीगी रे!! आजाद

    पूरब में सुबास चन्द्र था पश्चिम में बापू प्यारा!
    भगत सिंह का काम था था सबसे न्यारा!!
    जलियांवाला बाग में खून की नन्ही बयीगी रे!!! आजादी

    बड़ा बड़ा बलिदानी था बलिदान उनका नारा था!
    गांधी नेहरु आगे थे पीछे पीछे भारत सारा था!!

    बंगाल मे दनदन गोली चली थी आंदोलन गुजरात में!
    अंगरेज सारा चली गया एक ही रात में!!
    चांदनी ने पहले देखी आजादी अने धूप पाछे रयीगी रे !! आजादी

    जाते जाते फिरंगी फूट का बीज बोइगी रे!
    सावधान रीजो देश वासियों शहीदों की बाणी कयीगी रे!!
    थाने हुकम समझावे सबकी समझमें अइगी रे!! आजादी

    Hukum Singh Rajput

    Water & Agriculture Scientist
    Dewas, Madhya Pradesh

    Hukum Singh Rajput, is a farmer, poet, inventor and innovative community scientist. The farmer played a key role in transforming the economies of hundreds of villages.

  • जनता को मूर्ख बनाते हैं — Ramesh Chand Sharma

    जनता को मूर्ख बनाते हैं — Ramesh Chand Sharma

    Ramesh Chand Sharma

    सावधान जनता समझ रही है
    स्वदेशी के गीत गाते थे,
    स्वदेशी नाम से ललचाते थे,
    स्वदेशी आन्दोलन चलाते थे,
    सड़कों पर नजर आते थे,
    अफवाह, झूठ खूब फैलाते है,
    अब क्या कर रहे हो भाई।।

    बिना बुलाए आते थे,
    झूठा संवाद चलाते थे,
    झूठी कसमें खाते थे,
    नारे खूब लगाते थे,
    सत्ता के लिए छटपटाते थे,
    सत्ता कैसे भी पाते है।।

    जनता को मूर्ख बनाते है,
    ढोंग खूब रचाते है,
    वादे नहीं निभाते है,
    जुमले उन्हें बताते है,
    अपने को भगत कहलाते है,
    अब चेहरा सामने आया है।।

    सत्ता जब से हाथ आई,
    स्वदेशी की खत्म लडाई,
    भूले कसमें थी जो खाई,
    औढली अब नई रजाई,
    रंगीन सियार की कहानी याद आई,
    अब सत्ता का मजा उड़ाते है।।

    जान गए सब भाई बहना,
    पहनें बैठे सत्ता का गहना,
    मौज मस्ती में सीखा जीना,
    अब स्वदेशी की बात नहीं कहना,
    जनता को है अब दुःख सहना,
    इनके हाथ लगी मोटी मलाई है।।

    ढूढ़ लिया अब नया काम,
    पडौसी का काम तमाम,
    छात्रों पर बंदूकें तान,
    अर्बन नक्सली बदनाम,
    हाथ लगा दंड भेद साम दाम,
    नफरत, हिंसा फैलाते है।।

    हाथ लगे अब नए भेद,
    काट रहे आम जनता के खेत,
    गंगा मैया की बेच रहे रेत,
    सन्यासियों के दिए गले रेत,
    काम एक नहीं करते नेक,
    भ्रम भयंकर फैलाते है।।

    अपने ही लोगों को बांटे,
    दुनिया के करें सैर सपाटे,
    मजदूर किसान का गला काटे,
    जनता खाए मुंह पर चांटे,
    धनपतियों के पैर चाटे,
    अपने भर रहे गोदाम।।

    खत्म हो गई क्या मंहगाई,
    रुपए की क्या दशा बनाई,
    जीएसटी नोटबंदी एफडीआई,
    जेबें भर कर करी कमाई,
    लोग कह रहे राम दुहाई,
    इनको जरा नहीं शर्म आई,
    ऐसा राम राज्य लाये है।।

    एक योगी बन गया लाला,
    एक बने प्रदेश के आला,
    गौ माता ढूढे ग्वाला,
    मांस निर्यात में बना देश आला,
    दबके कर रहे धंधा काला,
    खूब डकारी काली कमाई है।।

    भय भेद भूख नफरत बढ़ाई,
    भूल गए अपनी लडाई,
    अमेरिका से सवारी बुलाई,
    कोरोना की बारी आई,
    दूसरों के सिर मंढी बुराई,
    शिक्षा ऐसी पाई है।।

    आँखों में पड़ गए जाले,
    जनता के मुंह में छाले,
    दुश्मन हमने कैसे पाले,
    जीने के पड़ गए लाले,
    इनसे देश संभले ना संभाले,
    घोप दिए छाती में भाले,
    सत्यानाश किया भारी है।।

    कम्पनी बेचीं, कारखाने बेचे,
    रेल बेचीं प्लेटफार्म बेचे,
    कोयले की खान बेची,
    अपनी शान आन बेची,
    फायदे वाली दुकान बेची,
    अब आगे किसकी बारी,
    अक्ल गई इनकी मारी,
    बचने की खुद करो तैयारीII

    Ramesh Chand Sharma

  • शाम ए गम की कसम, आज  ग़मगीन है हम.. : दिलीप कुमार को श्रद्धांजलि — Vidya Bhushan Rawat

    शाम ए गम की कसम, आज ग़मगीन है हम.. : दिलीप कुमार को श्रद्धांजलि — Vidya Bhushan Rawat

    Vidya Bhushan Rawat

    1922-12-11 to 2021-07-07

    दिलीप कुमार हिनुद्स्तानी सिनेमा का सबसे बड़ा नाम जिसे देख कर हम बड़े हुए और सिनेमा के रुपहले परदे पर जो नायको का नायक था. दिलीप कुमार उस युग का प्रतीक भी है जिसकी नीव आज़ादी के आन्दोलन के दौरान पडी और जिसे अपनी वैचारिक निष्ठा से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सींचा. किसी भी देश काल का सिनेमा उस देश की समकालीन राजनैतिक परिद्रश्य से प्रभावित होता है. भारत के लिए ये एक बड़ी बात थी के देश का नेतृत्व एक ऐसे व्यक्ति के हाथो में था जो वैज्ञानिक चिंतन, मानववाद, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक था. वो दौर था जब हिन्दुस्तानी सिनेमा हमारे रास्ट्रीय मूल्यों से प्रेरणा लेकर लोगो के दिलो में अपनी जगह बना रहा था. ये वो दौर है जब दिलीप कुमार के साथ राज कपूर और देव आनंद ने सिनेमा के रुपहले परदे पर देश को एकता और सकारात्मकता का सन्देश देना शुरू किया. शैलेन्द्र, साहिर और मजरूह ने अपनी लेखनी से एक से बढ़ कर एक गीत लिख डाले जो साहित्य और कविता के किसाब से भी उत्कृष्ट दर्जे का माना जा सकता है. ये वो दौर था जब तलत महमूद, मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, हेमंत कुमार, गीता दत्त, नूरजहां, लता मंगेशकर, मन्ना डे, आशा भोंसले और किशोरकुमार की कर्णप्रिय आवाज ने लोगो को अपना दीवाना बना दिया था. नौशाद, शंकर जयकिशन, गुलाम मोहम्मद, सी रामचंद्र, सचिन देव बर्मन, ओ पी नैय्यर, मदन मोहन आदि के संगीत ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी धूम मचा दी थी.

    धर्म के नाम पर पाकिस्तान बनने के बावजूद भी भारतीय राजनैतिक नेतृत्व ने भारत में पनप रही घृणा का मुकाबला वैचारिक तौर पर ही किया और इस दौर में सिनेमा ने प्रधानमंत्री नेहरु के उस धर्मनिरपेक्ष विचार को आत्मसात कर लिया इसलिए रोमांस में बदलाव की झलक दिखाई देती है. बम्बई सिनेमा की नगरी थी और आज इसे बॉलीवुड कहते है और कुछ लोग इसे ‘हिंदी’ सिनेमा भी कहते है लेकिन जिनलोगो ने इस सिनेमा की नीव का पत्थर रखा और इसे आज घर घर तक पहुंचाया, इसकी सबसे बेहतरीन क्लासिकल फिल्मे दी उनमे से अधिकाँश की मातृभाषा हिंदी नहीं थी. दिलीप कुमार ११ दिसंबर १९२२, देवानंद, २६ सितम्बर १९२३ और राज कपूर १४ दिसंबर १९२४ की पैदाइश है और सभी की पैत्रिक गांव आज के पाकिस्तान में है. दिलीप कुमार और राज कपूर की दोस्ती सिनेमा में व्यक्तिगत रिश्तो की महत्ता का सबसे बड़ा उदाहरण है. आम तौर पर राज कपूर और दिलीप कुमार को उस दौर का प्रतिद्वंदी माना जाता था. एक रोमांस का बादशाह था तो दूसरा दर्द का. देवानंद की छवि इन दोनों से भिन्न थी क्योंकि उन्होंने अपनी छवि को शहरी ही बना के रखा. इन तीनो महान कलाकारों की प्रथम भाषा भी हिंदी नहीं थी. दिलीप कुमार और राज कपूर के परिवार पेशावर के प्रख्यात किस्सा खिवानी बाजार के निवासी थे जहा पर २३ अप्रेल १९३० को देश के जाबांज वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली और गढ़वाल राइफल्स के ७२ जवानो ने खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में खुदाई खिद्म्गर आन्दोलन के लोगो पर गोली चलने के ब्रिटिश हुकूमत के आदेश को मानने से इंकार कर दिया. उसी पेशावर की क्रांतिकारी धरती से कपूर परिवार ओर खान परिवार बम्बई आ चुका था. राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर थिएटर में काम करते थे और दिलीप कुमार के पिटा फलो का ब्यापार करते थे. राज कपूर और दिलीप कुमार दोनों बम्बई के खालसा कालेज के छात्र रहे और दोनों की दोस्ती बेहद मजबूत थी.

    १९४४ में युसूफ खान को प्रक्यात नायिका देविका रानी ने जब ज्वार भाटा फिल्म के लिए ब्रेक दिया तो उन्हें दो नाम सुझाए गए : एक नाम था जहाँगीर और दूसरा था दिलीप कुमार. युसूफ खान को दिलीप कुमार नाम ज्यादा पसंद आया और उन्होंने सिनेमा के लिए इसे अपना लिया. धीरे धीरे उनकी शक्शियत ऐसे बनी के सारी दुनिया उन्हें दिलीप कुमार के नाम से ही जाने लगी. लेकिन कई बार लोग इन बातो की बारीकी नहीं समझते और अपनी अपनी सुविधाओं के हिसाब से लोगो का मूल्याङ्कन करते है. बहुत से लोग ये कहते है उस दौर में किसी भी फिल्म स्टार की सफलता के लिए ‘हिन्दू’ नाम होना जरुरी था इसलिए बहुत से मुस्लिम कलाकारों ने हिन्दू नाम अपनाया और इनमे दिलीप कुमार, मधुबाला और मीना कुमारी का नाम बहुत जोर शोर से लिया जाता है. लोग उदहारण देके कहते है आज सलमान खान, शाहरुख और आमीर को अपना नाम बदलने की जरुरत नहीं है लेकिन ये सब मात्र भ्रान्तिया और कपोल कल्पनाये है. आखिर नर्गिस, वहीदा रहमान, नौशाद, मोहम्मद रफ़ी, खुर्शीद, सुरैय्या, नूरजहा, महबूब खान, कमाल अमरोही, साहिर लुधियानवी आदि को अपना नाम बदलने की जरुरत पड़ती. दिलीप साहेब ने इन बातो को पहले ही खारिज कर दिया था.

    दिलीप कुमार को देखना मतलब कला को देखना था. उनकी डायलोग डिलीवरी, उनके हाव भाव , शब्दों का उच्चारण सभी कमाल का था. इसलिए उनके यदि कला का साहित्यकार कहा जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. क्योंकि सिनेमा जिस स्वर्णिम दौर में वह थे उसमे सभी ने अपनी कलात्मक स्वायतत्ता को बचा के रखा और नतीजा हुआ के देश को बेहतरीन सिनेमा मिला. जब राज कपूर ने आवारा, श्री चारसौ बीस, आह, आग, जिस देश में गंगा बहती है बनाई तो दिलीप साहेब ने आन, मेला, नयादौर, मधुमति, तराना, आजाद, यहूदी, लीडर, गोपी, बैराग, आदि फिल्मे दी. कोई भी फिल्म अज भी उतनी ही जवा है जितनी उस दौर में थी. जहा रात की तन्हाई में तलत महमूद की मखमली आवाज में दिलीप कुमार को ‘ए मेरे दिल कही और चल हो या शाम ए गम की कसम आज ग़मगीन है हम, सीने में सुलगते है अरमान, आँखों में उदासी छाई है, ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहा कोई न हो, गाते सुनते है तो लगता है वो हमारे दिल की बात कह रहे है. एक दौर था उन्हें ‘ट्रेजेडी किंग’ का टाइटल दे दिया गया और उनकी फिल्मो को देखकर बाहर आते समय लोगो की आँखों में आंसू और सिसकिया ही होती थी. इस प्रकार के गंभीर रोल करते करते उन्होंने अपने को नए सांचे में भी ढाला और वो था नेहरूवियन भारत का सपना. नया दौर( १९५७) ने उनके और हम सबको एक नयी दिशा दे दी. वो उम्मीद की किरण जो आज भी ज़िंदा है. साहिर ने कलम का कमाल किया तो ओई पी नैयर ने अपने संगीत से ऐसा समा बंधा के आज भी नया दौर और उसके गीत हम सबके के दिलो की धड़कन हैं और फिल्म का विषय तो ऐसा के ‘निजीकरण’ ओर मशीनीकरण के खतरों को सबसे बेहतरीन तरीके से यही फिल्म समझा सकती है. जिन्होंने दिलीप साहब का ‘दर्द’ देखा, नया दौर में एक बिलकुल नया रूप देखा. आज भी शादी विवाह में जो गीत सबसे ज्यादा बजता है वो है ‘ ये देश है वीर जवानो का, अलबेलो का मस्तानो का’…. मै समझता हूँ के कोई भी देशभक्ति गीत इतना पोपुलर नहीं हुआ के वो शादियों में सबसे ज्यादा बजे. इस फ़िल्म में दिलीप कुमार वैजयंतीमाला पर फिल्माया ‘ मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार’ और ‘उड़े जब जब जुल्फे तेरी’ आज भी किसी भी नए गाने से ज्यादा रोमांटिक और जवान है. आज जिस प्रकार से हमारे अधिकारों पर अतिक्रमण है उसके विरुद्ध कैसे संघर्ष करे और जीते ये ‘साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिल कर बोझ उठाना’ से समझा जा सकता. एक फ्रेम में दिलीप कुमार और वैजयन्तीमाला को देखना बेहद सुखद अनुभूति है.

    नया दौर के बाद आई ‘मधुमति’ ने भी अपने झंडे गाड़े. सलिल चौधरी के कर्णप्रिय संगीत और मुकेश की बेहद खूबसूरत आवाज ने दिलीप कुमार वैजयन्तीमाला की जोड़ी को फिर सिरमाथे लिया. ‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं’ या दिल तड़प तड़प के कह रहा है आ भी जा, आजा रे परदेशी, मै तो कब से खडी इस पार ने इस फिल्म की ख़ूबसूरती को चार चाँद लगा दिए थे.

    दरअसल वो दौर हिन्दुस्तानी सिनेमा का स्वर्णिम युग ऐसे ही नहीं बन गया था. हर एक लीड स्टार की पूरी एक टीम थी जिसके साथ मिलकर पूरी फिल्म को ‘बुना’ जाता था. हर एक किरदार महत्वपूर्ण होता था और फिल्म में कहानीकार, गीतकार और संगीतकार की बेहद अहम् भूमिका होती थी. राजकपूर शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन, लता मंगेशकर, ख्वाजा अहमद अब्बास, मुकेश एक बड़ी टीम थी और राज कपूर अभी भी अपने इन ‘संगी साथियो’ के बिना कोई भी बात नहीं रखते थे. हालांकि दिलीप कुमार इस मामले में अपने मित्र राजकपूर की तरह नहीं थे और उन्होंने अपने को केवल अभिनय तक सीमित रखा था लेकिन उनकी फिल्मो में नौशाद, मोहम्मद रफ़ी, शकील बदायुनी, साहिर लुधियानवी भी लगभग मज़बूत हिससा थे लेकिन दिलीप साहेब के लिए केवल रफ़ी साहब ने खूबसूरत गाने दिए ऐसा नहीं है. वर्षो तक तलत महमूद ने उनकी ट्रेजेडी किंग की छवि को मज़बूत किया तो मुखेस ने फ्निल्म यहूदी में ‘ ये मेरा दीवानापन है या, मेला में गाये जा गीत मिलन के, तू अपनी लगन के, सजन घर जाना है गाकर उसे और मज़बूत किया. रफ़ी साहेब की आवाज तो ऐसा लगता है दिलीप साहेब के लिए बनी थी. ‘आज पुरानी राहो से कोई मुझे आवाज न दे’.. पूरी फिल्म देखकर और दिलीप कुमार को परदे पर गाता देखकर आपका कलेजा मुंह पर आ जाता है. मुझे नहीं लगता के इतना इंटेंस सीन करने के क्षमता अभी किसी में दिखाई देती है.

    पहले सिनेमा एक पैकेज था जिसमे सबके रोल थे और इसलिए कभी स्टोरी तो कभी संगीत फिल्मो को हिट बना देते थे और सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं में पूरी तरह से ढल जाते थे. एक एक फिल्मे बनाने में सालो लगते थे लेकिन जो अंतिम प्रोडक्ट आता था वो अविश्मर्नीयं होता था. मुग़ले आज़म में दिलीप साहेब की भूमिका लाजवाब थी लेकिन क्या अकबर के रोल में पृथ्वीराज कपूर कही कम नज़र आये. मधुबाला ने ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और मुहोब्बत की झूठी कहानी पे रोये में जो अभिनय किया वो बेहतरीन था. नौशाद के संगीत, लता मंगेशकर की बेहद हृदयस्पर्शी आवाज ने इस फिल्म को एक सम्पूर्ण फिल्म बनाया. निर्माता के आसिफ ने पैसो की चिंता किये बिना बड़े बड़े सेट तैयार किये और पूरी फिल्म को बनने में तीन वर्ष के करीब लगे. आज किसी के पास इतना समय नहीं है के इतना समय लगाए. नौशाद ने एक बार बताया के प्यार किया तो डरना क्या गाने को कंपोज़ करने में उन्हें पूरी रात लग गयी. आज एक गायक एक दिन में कई गाने का देते है. किसी भी पुरानी क्लासिकल फिल्म को देख लीजिये तो आपको पूरा टीम वर्क दिखाई देता है और हर एक किरदार की अपनी अहमियत है.

    आज ‘क्षेत्रीय’ सिनेमा का दौर भी है. उत्तर प्रदेश बिहार की अवधी- भोजपुरी फिल्मो की खूब कमाई हो रही है, गाने भी अश्लील और भोंडे आ रहे है लेकिन भारत के दो महान कलाकारों के जो सबसे अच्छे दोस्त भी थे, की दो फिल्मे हर एक कला प्रेमी को देखनी चाहिए तो पता चलेगा के वैसे फिल्मे और गीत क्यों नहीं लिखे जाते. दिलीप कुमार वैजयंतीमाला की गंगा जमुना १९६१ में आई और राज कपूर वहीदा रहमान की फिल्म तीसरी कसम १९६६ में आई. दोनों फिल्म में उत्तर प्रदेश-बिहार के ग्रामीण पृष्ठभूमि बेहद संजीदा तरीके से दिखाई गयी है. मोहम्मद रफ़ी के ‘नैन लड़ जाई है, मनवा माँ कसक होइबे करी पर दिलीप कुमार का डांस आपको बिलकुल पूर्वांचल की उस दुनिया में ले चलता है जहा मिठास है, मेहनत है और प्यार भी है. दूसरी और मुकेश के गाये गीत ‘सजनवा बैरी हो गए हमार, चिठिया हो तो हर कोई बांचे, करम न बांचे कोई, पर राज कपूर जिस प्रकार से गा रहे है वो हमें बिहार के उन इलाको में ले चलते है जो हम फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियों में पढ़ते है. हालांकि तीसरी कसम रेणु की कहानी पर आधारित शैलेन्द्र की फिल्म थी जिसे जनता न पसंद नहीं किया हालांकि आलोचकों की पसंद बनी रही और आज भी एक क्लासिक फिल्म मानी जाती है. सवाल ये है के ऐसी फिल्मो के लिए आपको न केवल दिलीप कुमार या राज कपूर चाहिए अपितु रेणु, शैलेन्द्र, रफ़ी, मुकेश, नौशाद , शंकर जय किशन जैसे दिल से काम करने वाले लोग भी चाहिए.

    दिलीप कुमार आज के दौर में उस स्वर्णिम युग से हमारा साक्षात्कार कराने वाले अंतिम अभिनेता है. उनके प्यारे दोस्त राज कपूर २ जून १९८८ को और देव आनंद ३ सितम्बर २०११ को दिवंगत हो चुके है. शैलेन्द्र, साहिर, नौशाद, शंकर जयकिशन भी नहीं है. दिलीप साहब उस काल की महानतम तिकड़ी के अंतिम लिंक थे.

    आज दिलीप साहेब की मौत के बाद भारतीय मीडिया के पास वैसे लोग नहीं थे जो उनकी उप्लाभ्दियो और विचारधारा पर ईमानदारी से चर्चा कर सके. मीडिया ने उनके जाने की खबर से ज्यादा ताबज्जोह मोदी के मंत्री परिषद् के फेर बदल को दिया. इससे बड़ी शर्मनाक बात क्या हो सकती है जब आप एक ऐसे अदाकार की मौत पर भी चार ढंग के आलोचकों या कलाकारो को लेकर बात नहीं कर सकते. मुझे इसमें भी साजिश नज़र आती है और वो ये के दिलीप कुमार पर चर्चा के बहाने पर आपको हमारी गंगा जमुनी संस्कृति पर चर्चा करनी पड़ेगी. उनको फिल्मो और संगीत पर बात करेंगे तो के आसिफ, महबूब खान, नौशाद, साहिर, शकील बदायुनी और मोहम्मद रफ़ी का जिक्र भी आयेगा. उनकी विचारधारा को पढेंगे तो नेहरु को याद करना पडेगा और समाजवाद का जिक्र करना पडेगा. दिलीप कुमार भारतीया सामाजिक परिवेश को समझते थे इसलिए डाक्टर आंबेडकर को भी जानते थे. महाराष्ट्र के भीतर उन्होंने ओ बी सी यानी पसमांदा मुसलमानों के सवाल पर बड़ी बड़े सभाओं में हिस्सा लिया और सरकार से उनके लिए आरक्षण व्यवस्था की मांग की. दिलीप कुमार पर चर्चा के बहाने पर उर्दू और मुस्लिम समुदाय का भारतीया सिनेमा में योगदान पर चर्चा करनी पड़ती जो राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटने वालो के लिए पचाना मुश्किल था. जो अपने धर्म और संस्कृति की बात करते हैं उन्हें भी ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’, सुख के सब साथी दुःख में ना कोय’ , आना है तो आरह में कुछ देर नहीं है या राम चन्द्र कह गए सिया से ‘ में दिलीप कुमार ने किस प्रकार का सधा हुआ अभिनय किया है के कोई उनके नज़दीक में नहीं फटक सकता.

    दिलीप कुमार का अभिनय और व्यक्तित्व हमें ये बात भी याद दिलाएगा के कला तभी खिलती है जब वह समाज की सड़ी गली परम्पराओं को चुनौती दे सके, जब वह विचार में देश काल की सीमाओं को पार करे और जब उसका लक्ष्य बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय हो. दिलीप कुमार के अपने समकालीन कलाकारों और उनकी वैचारिक निष्ठाओ को छोड़ दे बाद के दौर में वैचारिक निष्ठा का वो दौर ख़त्म हो गया फिर भी गुरुदत्त, संजीव कुमार, बलराज साहनी , नर्गिस दत्त, सुनील दत्त, मीना कुमारी, नूतन, वहीदा रहमान जैसे कलाकार अपनी कला और सामजिक संदेशो के चलते हमेशा ज़िंदा रहेंगे. दिलीप कुमार को ईमानदारी से याद करने का मतलब होगा आधुनिक भारत के धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी पृष्ठभूमि को भी याद करना जिसकी नीव डाक्टर बाबा साहेब आंबेडकर और जवाहर लाल नेहरु ने रखी जहा सबके लिए आगे बढ़ने के अवसर हों और किसी को भी उसकी धार्मिक या जातीय पहचान के आधार पर किसी भी प्रकार के अधिकारों से वंचित न किया जाये.

    दिलीप साहेब की महान विरासत को हमारा सलाम

    Vidya Bhushan Rawat

  • ऑस्ट्रेलिया हेरिटेज रेलगाड़ियां : स्लीपर, भोजन-कक्ष इत्यादि — Vivek Umrao

    ऑस्ट्रेलिया हेरिटेज रेलगाड़ियां : स्लीपर, भोजन-कक्ष इत्यादि — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ऑस्ट्रेलिया में पुरानी (हेरिटेज) रेलगाड़ियां कुछ यूं होती थीं : भोजन-कक्ष, सोने की व्यवस्था इत्यादि

    भोजन कक्ष

    यात्री कक्ष

    स्लीपर क्लास

    स्लीपर कोच

    स्टीम-इंजन (लगभग 150 वर्ष पुराना)

    हेरिटेज रेल-बस 

    बच्चे स्टीम-इंजन के कलपुर्जों को समझते हुए

    फोटो व वीडियो क्रेडिट — विवेक उमराव

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • क्या वैवस्वत मनु के राज्याभिषेक से सप्तर्षि संवत प्रारम्भ हुआ? — Dr Surendra Bisht

    क्या वैवस्वत मनु के राज्याभिषेक से सप्तर्षि संवत प्रारम्भ हुआ? — Dr Surendra Bisht

    Dr Surendra Bisht

    भारतीय परंपरा में उपलब्ध सबसे प्राचीन सप्तर्षि संवत है जो 6777 ईसा पूर्व (6777 BCE) से प्रारंभ होता है। इसकी जानकारी पुराणों में उपलब्ध है और पंडित चंद्रकांत बाली जी का निष्कर्ष है कि इसे यूनानी इतिहासकारों ने भी लिखकर सुरक्षित किया है। उन्नीसवीं सदी (1883) में ‘बुक ऑफ इंडियन इराज’ के लेखक कंनिंगघम ने भी इस 6777 ईसा पूर्व से प्रारंभ होने वाले सप्तर्षि संवत को अपनी पुस्तक में स्थान दिया है।

    जब से चंद्रकांत बाली जी के लेखों में मैंने सप्तर्षि संवत के विषय में पढ़ना शुरू किया तो मेरे मन में एक प्रश्न अनेक बार उठा – सप्तर्षि संवत 6777 ईसा पूर्व इसी वर्ष से क्यों प्रारम्भ किया गया ? इसका उत्तर ढूंढने का मैंने प्रयत्न किया पर मुझे कोई उत्तर नहीं मिला। वह 6770 ईसा पूर्व से भी शुरू किया जा सकता था, या 7800 ईसा पूर्व से शुरू किया जा सकता था या 6600 ईसा पूर्व से भी शुरू किया जा सकता था ? ऐसे अनेक प्रश्न मन में आये। 6777 ईसा पूर्व में ऐसी कौन सी घटना हुई कि उसी वर्ष से सप्तर्षि संवत प्रारम्भ हुआ ?

    इस प्रश्न का कुछ उत्तर मुझे पंडित बाली जी के ही एक अन्य लेख में मिलता प्रतीत हो रहा था। पर कल जब मैंने श्री ब्लॉगपोस्ट (bharatbhumika.blogspot) पर भारत के प्राचीन इतिहास पर लेख पढ़ा तो मुझे लगा कि वर्षों से जो निष्कर्ष मैं निकालने की कोशिश कर रहा था, वह उसके अधिक नजदीक पहुंचते हुए दिखने लगा। इस पर कुछ विचार करते हैं।

    पंडित भगवत दत्त जी ने ‘भारतवर्ष का बृहद इतिहास’ में सैकड़ों प्रमाणों को एकत्र किया है। उसी में है मेगस्थनीज की इंडिका के प्रमाण। उन प्रमाणों के आधार पर पंडित चंद्रकांत बाली जी ने एक लेख लिखा – ‘यूनानी इतिहासकारों के भारतीय कालसन्दर्भ’। इसमें 3-4 संदर्भ हैं, पर जो अधिक सुस्पष्ट है उसे देखते हैं।

    “From the time of Father Bacchus to Alexander the Great, their Kings are reckoned at 154 whose reigns extend over 6451 years and three months.” (Pliny)

    अर्थात फादर बैकस से सिकंदर महान तक भारतीयों के अनुसार उनके 154 राजा हो गए हैं और उनके राज्यकाल को 6451 वर्ष और 3 महीने बीत चुके हैं।

    इस पर बाली जी पंडित भगवत दत्त जी का वाक्य भी साथ में लिखते हैं – ‘ यह वर्ष संख्या मेगस्थनीज ने भारत के राजवृत्तों से ली । इसमें थोड़ी सी भूल हो सकती है अधिक नहीं।’ साथ में बाली जी अपनी बात जोड़ते हैं – ‘हम बड़ी दृढ़ता से घोषित करते हैं कि यूनानी इतिहासकारों के भारतीय काल संदर्भ सर्वथा आप्त हैं।’ अगर सिकंदर महान के समय भारत में 154 वां राजा प्रतिष्ठित था तो प्रथम राजा कौन था ? स्वाभाविक है वैवस्वत मनु प्रथम राजा थे। पर इसका विवेचन बाली जी के लेखों में नहीं मिल रहा था । पर बाली जी ने यह जरूर लिखा है कि 6451 वर्ष अवश्य सप्तर्षि संवत के हैं।

    इसी बीच कल ही मैंने एक ब्लॉगपोस्ट पढ़ी – भारतभूमिका। उसमें फिर यूनानी इतिहासकारों का उपरोक्त काल संदर्भ दिया है। साथ में इस लेख में यह भी लिखा है कि अगर गुप्त राजा चंद्रगुप्त से पीछे गिनते हैं तो बीच के काल में हुए विदेशी राजाओं को छोड़ दें तो चंद्रगुप्त से वैवस्वत मनु तक 154 राजा बैठते हैं। जिनमें दशरथ पुत्र राम 65 वें हैं और महाभारत में भाग लेने वाले इक्ष्वाकु वंश के बृहदबल 98 वें राजा हैं। अतः मेरे मन में जो समाधान था कि 154 राजाओं में पहले राजा वैवस्वत मनु थे, उसे एक अन्य विद्वान ने भी स्वीकार किया है।

    उपरोक्त बातों के कारण मैं सप्तर्षि संवत के विषय में मन में उठने वाले सवालों के समाधान के नजदीक पहुंच गया। यूनानी इतिहासकार लिखते हैं 154 राजा हो गए और उनका काल 6451 वर्ष और 3 महीने हो गया है। हम सब जानते हैं मेगस्थनीज 3 री शताब्दी ईसा पूर्व में भारत आया था। अगर उपरोक्त दो विद्वानों का कहना 100% सही है कि ये 6451 वर्ष सप्तर्षि संवत के हैं और प्रथम राजा वैवस्वत मनु थे तो इन दो तथ्यों से क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं ?

    पहला निष्कर्ष तो हम यह निकाल सकते हैं कि मेगस्थनीज किस वर्ष में उपरोक्त लेख लिखा होगा ? 6777 ईसा पूर्व में से 6451 वर्ष घटाते हैं तो 326 ईसा पूर्व निकलता है, जो इतिहासकारों के अनुसार सटीक है क्योंकि मेगस्थनीज 321 ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त के राज्याभिषेक का भी उल्लेख करता है।

    हमारे लिए दूसरा निष्कर्ष महत्वपूर्ण है जिसे मैं सबके सम्मुख रखना चाहता हूँ। यूनानी इतिहासकारों का 320-30 ईसा पूर्व में लिखना कि भारत के 154 राजाओं का अबतक 6451 वर्ष कार्यकाल हुआ है और उसी के साथ भारतीय परंपरा में 6777 ईसा पूर्व में सप्तर्षि संवत का प्रारंभ होना, इन दोनों तथ्यों को जोड़कर देखते हैं, तो उससे हम एक निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि 6777 ईसा पूर्व से प्रारंभ सप्तर्षि संवत इसलिए प्रारम्भ हुआ क्योंकि उस वर्ष वैवस्वत मनु का राज्याभिषेक हुआ था। अर्थात सप्तर्षि संवत का प्रारंभ और भारत में राज्यव्यवस्था का प्रारंभ आपस मे जुड़े हुए तथ्य हैं।

    6777 ईसा पूर्व से सप्तर्षि संवत प्रारम्भ हुआ क्योंकि उसी वर्ष में वैवस्वत मनु का राज्याभिषेक हुआ था, और इसीलिए 6770 या 6800 या 6600 आदि से सप्तर्षि संवत का प्रारंभ नहीं हुआ। अगर यह निष्कर्ष कि 6777 ईसा पूर्व से प्रारंभ सप्तर्षि संवत का प्रारंभ वैवस्वत मनु के राज्याभिषेक वर्ष से प्रारंभ हुआ है, तो शायद यह निष्कर्ष भारतीय इतिहास की अनेक समस्याओं और गुत्थियों को सुलझाने में सहयोगी हो जाएगा।

    अब एक प्रश्न है कि उपरोक्त वैवस्वत मनु कौन हैं ? प्राचीन ग्रंथों में अनेक मनु वर्णित हैं। पहले वे मनु हैं जो सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के मानसपुत्र लिखे गए हैं। फिर सात मन्वंतर के प्रारंभ में एक एक मनु लिखे गए हैं। फिर जलप्रलय के समय सृष्टि के बीज बचाने वाले मनु भी ग्रंथों में वर्णित है। इन सबसे भिन्न एक मनु और हैं जिनका वर्णन रामायण, महाभारत, कौटिल्य अर्थशास्त्र में आदि राजा के रूप में है। महाभारत में इस विषय को विस्तार से लिखा है। आप सभी जानते हैं कि महाभारत में लिखा है कि आदि युग में -‘ न कोई राजा था, न राज्य था, न कोई दंड देने वाला था और न ही कोई दंड पाने वाला, सभी धर्म के अनुसार परस्पर की रक्षा करते थे।’ पर बाद जनसंख्या बढ़ी, लोगों में संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी, इसलिए अनाचार भी बढ़ने लगे। ऋषियों ने इन अधर्म जन्य अराजकता पर विचार किया और राज्य संस्था के गठन का निर्णय किया। उन ऋषियों ने अपने में से ही महर्षि मनु को अपना पहला राजा नियुक्त किया। उसी राजा के पुत्र थे इक्षवाकु और पुत्री थी इला। इक्षवाकु से आगे इक्ष्वाकु वंश चला जिसे सूर्यवंश भी कहते हैं। और इला का पुरुरवा से ऎल वंश चला, जिसे चंद्रवंश भी कहते हैं। महाभारत में जिस मनु को पहला राजा बनाने का साक्ष्य उपलब्ध है, वे ही हमारे 154 राजाओं में प्रथम राजा वैवस्वत मनु हैं।

    हमने अपनी बात संक्षेप में रखा दी है। बाकी भविष्य की गोद में।

    Dr Surendra Singh Bisht

  • सरकारी नौकरी प्रतियोगी परीक्षा के छात्र की कहानी — Er Akhilesh Pradhan

    सरकारी नौकरी प्रतियोगी परीक्षा के छात्र की कहानी — Er Akhilesh Pradhan

    Er Akhilesh Pradhan

    अगर पाठक भावुक कर देने वाले किसी लेख की उम्मीद में हैं तो आपको इस लेख का पहला पैराग्राफ ही निराश कर सकता है, इसलिए आप यहीं से पढ़ना बंद कर सकते हैं।

    एक प्रतियोगी परीक्षा का छात्र ग्रेजुएट होने के बाद जिस दिन सरकारी नौकरी की चाह में कोंचिग/ट्यूशन लेना शुरू करता है। पहले दिन से ही उसके भीतर की अभूतपूर्व संभावनाओं का ह्रास होना शुरू हो जाता है। प्रतियोगिता शब्द का महत्व उसे पहले दिन से ही समझा दिया जाता है कि यह एक ऐसी लंबी रेस है, जिसमें पूरी सहजता से, विनम्रता से अपने आसपास के वातावरण को, उसमें उपस्थित सभी तत्वों को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ना है। उतना ही देखना सुनना जानना है जितना आपकी इस रेस के लिए आवश्यक है। इसके अलावा आपको निरंतर छंटनी करने की प्रक्रिया से गुजरना है।

    आगे बढ़ने की इस कसौटी में आपको सबसे पहले अपनी सामाजिकता गिरवीं रखनी होती है। परिवार, मित्र, समाज इन सबको कुछ समय के लिए किनारे रखना होता है, क्योंकि इस अंधी रेस में अमूमन माना‌ यह जाता है कि आप जिस समाज का हिस्सा हैं वह इतना असंवेदनशील है कि वहाँ ये तत्व आपकी बेशकीमती पढ़ाई में आवश्यक व्यवधान पैदा करने के लिए ही बने हुए हैं। यह मानते हुए भी छात्र समाजशास्त्र का क,ख,ग समझ लेता है। पढ़ाई के दौरान ऐसे विरोधाभास आपको हर शास्त्र में मिलते हैं चाहे वह भौतिकशास्त्र हो, खगोलशास्त्र हो, राजनीति शास्त्र हो, अर्थशास्त्र हो या फिर दर्शनशास्त्र। आप इन विरोधाभासों के बीच बुरी तरीके से उलझते जाते हैं, लेकिन आपको इसका इंच मात्र भी आभास नहीं होने दिया जाता है क्योंकि नौकरी पा लेने की महत्वाकांक्षा को आपके मस्तिष्क में एक ऐसे चिप की भांति फिट कर दिया जाता है जो समय-समय पर आपके लिए खाद पानी का काम करता है, लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। आपके भीतर जो संभावनाओं के भ्रूण पैदा हो सकते थे, वे जन्म से पूर्व ही मृत्यु को प्यारे हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में अपने भीतर की संभावनाओं को मूर्त रूप में बचाना ठीक कुछ वैसा ही है कि पानी में आप तैर भी रहे हैं और अपने शरीर में आपको पानी की बूंदों का स्पर्श तक नहीं चाहिए।

    एक प्रतियोगी छात्र अपने पूरी तैयारी के दौरान अगर किसी शब्द से सबसे ज्यादा मुखातिब होता है तो वह है “वस्तुनिष्ठ” या “आॅब्जेक्टिव” । मूलमंत्र यह है कि जितना वह वस्तुनिष्ठ प्रश्नों से धींगामुस्ती करेगा, उसके प्रमेय को समझेगा, उतनी शीघ्रता से वह कुछ हासिल कर जाएगा। लेकिन इसमें भी आप विडम्बना देखें कि वह आजीवन इस शब्द का का मर्म ही समझ नहीं पाता है। क्योंकि संभावनाओं के समुद्र को सोखने की तैयारी पहले दिन से ही शुरू हो जाती है।

    उदाहरण के लिए देखें कि एक प्रतियोगी छात्र के सम्मुख किताबों के बाद दूसरी सबसे जरूरी चीज न्यूजपेपर होती है। न्यूजपेपर पढ़ने की भी उसे कला बताई जाती है, यहाँ भी उसे नजरबंद किया जाता है, जैसे आपको सिर्फ रूटिन तरीके से संपादकीय ही पढ़ना है और इसके अलावा देश-विदेश, खेल और अर्थशास्त्र से जुड़ी कुछ छुटपुट खबरें। इसके अलावा आपको देश, समाज, मोहल्ले की तमाम घटनाओं को पढ़ना छोड़िए, उनके प्रति उपेक्षा रखनी होती है, प्रतिक्रिया देना तो दूर की बात हो गई, आपको सोचने की भी मनाही होती है, क्योंकि इससे आपके मशीन बनने का कोई खास संबंध नहीं होता है। वास्तव में होना यह चाहिए कि आपको दृष्टा भाव से वस्तुनिष्ठता के साथ घटनाओं को देखना सीखाना चाहिए लेकिन होता इसका उल्टा है आपको सबजेक्टिव बनाया जाता है, गलती से कहीं आप सबजेक्ट से अलग भटकने का प्रयास भी करते हैं तो आपको उलाहना दी जाती है, ताकि आप सीधे से लाइन पर आ जाएं। यहीं से आपकी ऑब्जेक्टिविटी की धज्जियाँ उड़नी शुरू हो जाती है।

    वस्तुनिष्ठता को लेकर अभी हाल-फिलहाल का एक उदाहरण देता हूं-

    मेरा एक बचपन का मित्र है, मित्र कम भाई ज्यादा है, रेल्वे में कार्यरत है, अभी जब ट्रेन में हो रही अव्यवस्थाओं की वजह से सैकड़ों मजदूरों की मौत हुई, तो उस पेपर कटिंग को मैंने सोशल मीडिया में अपलोड किया, मेरे मित्र की प्रतिक्रिया यह रही – “हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, हमें स्याह पहलू को हटाकर, उस अच्छे पहलू को भी देखना चाहिए कि लाखों मजदूर घर भी तो पहुंचे हैं।” मैं अपने मित्र की इस प्रतिक्रिया से अवाक रह गया। मैंने जवाब में कहा – कहो तो घर पहुंचने वाले लोगों की संख्या से मौतों की संख्या को भाग देकर प्रतिशत निकालें। सीधी सपाट चीज है, हम ऐसे क्यों हो गये हैं कि एक इंसान की मृत्यु भी हमें दिखाई नहीं देती है, मृत्यु मृत्यु है बस, अब हम इसमें भी ऐसे सिक्के पहलू जैसे बेफिजूल के तर्क घुसेड़ेंगे क्या। मित्र ने फिर कहा – रेल्वे की जो क्षमता है वह उस हिसाब से अपना बेस्ट दे रही है। मित्र के इस जवाब के बाद मेरे पास अब बोलने के लिए कुछ नहीं रह गया था। गलती मेरे मित्र की भी नहीं है, वह सिस्टम का हिस्सा बन चुका है, वह उतना ही सोच पाता है, जितना उसे सोचने के लिए कहा जाता है, सोच के स्तर पर भी वह सीमा नहीं लांघ पाता है। अन्यथा एक रेल्वे कर्मचारी से इतर उसके भीतर का एक आम इंसान यह कहता कि इतने लोगों की मौत एक बहुत बड़ी मानवीय चूक है, रेल्वे के लिए यह शर्मिंदगी का विषय है, रेल्वे को इसके लिए बकायदा माफी माँगनी चाहिए। वह शोक जताता, पीड़ा होती उसे, यह पीड़ा उसके शब्दों से उभर कर आती, एक रेल्वे कर्मचारी होने के नाते वह ग्लानि से भर जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, उल्टे उसने जस्टिफाई किया, क्योंकि चीजों को जस का तस देखने के विरूध्द जो आवश्यक प्रतिबंध होते हैं वह व्यवस्था ने बहुत पहले ही उस पर लगा दिए हैं। दोष उसका नहीं है, उसकी ट्रेनिंग ही ऐसी हुई है। इसलिए वह चाहकर भी आॅब्जेक्टिव नहीं हो पाता है, शायद सबजेक्टिव होना ही उसकी नियति में है।

    वास्तव में देखा जाए तो सही को सही और गलत को गलत देखना एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र की डिक्शनरी में होता ही नहीं है, भले वह इनके होने करने का प्रपंच कर सकता है, लेकिन धरातल में ऐसा कुछ नहीं होता है। असल में उसकी डिक्शनरी में होती है विवेचना, समालोचना, चैक एंड बैलेंस, योग्यता, सफलता और इस जैसी ढेरों लोकलुभावन शब्दावलियाँ, जो आगे जाकर उसे मशीनरी में फिट करती हैं, जिसकी वह आजीवन पालना करता है।

    जिजीविषा से भरे, कुछ विरले, कुछ एक अपवाद स्वरूप मेरे मित्र हैं, जो सरकारी नौकरी में हैं, वे बार-बार कहते हैं – हमारी ट्रेनिंग में ही हमें शोषणकारी तंत्र की पृष्ठभूमि समझा दी जाती है, असल‌ में प्रबंधन के नाम पर हम कुप्रबंधन के विशेषज्ञ होते हैं। हमें ईशारों में ही समझा दिया जाता है कि व्यवस्था के नाम पर हमें निरंतर अव्यवस्था को सुचारू रूप से संभालना है। हमें वस्तुस्थिति को “दृष्टा भाव” से नहीं वरन् “समता भाव” से देखना होता है, ट्रेनिंग के दौरान ही जब हमें यही सब सिखाया जाता है तो आगे जाकर हममें से अधिकांश लोग दफ्तर या फील्ड में क्या क्या करते होंगे अंदाजा लगा लीजिए। मैं उनकी इस बात पर असहमति जताते हुए इतना ही कहूंगा कि “आपकी ट्रेनिंग उसी दिन से शुरू हो जाती है जब आप सरकारी नौकरी की तैयारी के इस दलदल में कूदते हैं, ट्रेनिंग ऐसा औपचारिक पड़ाव है, जहाँ आपके व्यक्तित्व का अंतिम प्रमाणीकरण होता है।”

    Er Akhilesh Pradhan

  • कोरोना :: लाकडाउन बनाम प्रवासी महापलायन — Bimal Siddharth

    कोरोना :: लाकडाउन बनाम प्रवासी महापलायन — Bimal Siddharth

    Bimal Siddharth

    मज़दूरों का पलायन जब शुरू हुआ तो मुझे भी लगा कि उन्हें लॉक डाउन का पालन करना चाहिए। जहाँ हैं वहीं रुक कर करोना संक्रमण को रोकना चाहिए। लॉक डाउन का प्रधानमंत्री का फ़ैसला भी जायज़ लगा था। लगा कि सरकार करोना संकट के प्रति गम्भीर है और युद्ध स्तर पर योजनाएँ बनाते हुए कार्यवाई करेगी। किसी भी वाइरस संक्रमण को रोकने का पहला क़दम टेस्टिंग है। इसके बग़ैर आपको पता ही नहीं चल सकता कि कौन व्यक्ति संक्रमित है और कौन नहीं। लॉक डाउन के बावजूद यदि लोग आवश्यक कामों से बाहर निकल रहे हैं, लेनदेन कर रहे हैं तो संक्रमण की सम्भावना बनी ही रहेगी। टेस्टिंग के अभाव में संक्रमित व्यक्ति अनजाने ही फैलाव का कारण बनता रहेगा। लॉक डाउन तो महज़ संक्रमण की तेज़ गति को स्लो डाउन करने की एक रणनीति है। दुनिया की सभी जागरूक और ज़िम्मेवार सरकारें ऐसा ही कर रही थीं। लॉक डाउन किया। समय रहते टेस्टिंग और उपचार की समुचित व्यवस्था की और करोना से युद्ध में उतर पड़े।

    लॉक डाउन एक ऐतिहासिक घटना थी। अचानक एकसाथ पूरे देश- समाज का स्थिर हो जाना कोई सामान्य बात नहीं थी। दो चार छह दिन तो इस अजीबोग़रीब स्थिति से तालमेल बनाते ही निकल गए। ख़बरों से पता चलता रहा कि पुलिस सक्रिय है। सख़्ती से लॉक डाउन का पालन करा रही है। पब्लिक भी जागरूकता के साथ सहयोग कर रही है। लोग बेहद ज़रूरी काम से ही बाहर निकल रहे हैं। मास्क सबने लगा रखा है। सोशल डिसटेंसिंग का पालन हो रहा है। करोना और पुलिस के डर ने बहुत तेज़ी से एक नयी सामाजिक व्यवस्था को आकार दे डाला है।

    लेकिन टेस्टिंग? कई दिन बीत जाने के बावजूद यह सिरे से ग़ायब थी। यदा कदा थर्मल स्क्रीनिंग की बात ही सुनाई पड़ी। थर्मल स्क्रीनिंग से करोना संक्रमित का पता नहीं चल सकता, इसका ख़ुलासा भी कई दिनों बाद हुआ। टेस्टिंग किट के अभाव की बात आई। मन में सवाल उठा कि इस अभाव को दूर कर पाने में हम क्या असक्षम हैं? कुछ लक्षणों को नाप सकने वाला कोई भी उपकरण रौकेट साइंस तो नहीं! फिर रौकेट साइंस में भी हम कम तो नहीं। ख़बर पढ़ी कि गाड़ियाँ बनाने वाली कम्पनी महिंद्रा के तकनीशियनों ने दो ढाई दिनों में ही वेंटिलेटर बना डाला है। वेंटिलेटर तो एक जटिल और संवेदनशील उपकरण है जिसकी बाज़ार क़ीमत चार- पाँच लाख रुपए है। कम्पनी के प्रमुख ने कहा कि वे मानवता और देशहित में इसे साढ़े सात हज़ार रुपए में ही उपलब्ध करा सकते हैं। फिर ख़बर आई कि पुणे में एक महिला चिकित्सा वैज्ञानिक ने टेस्टिंग किट भी बना डाला है जो काफ़ी कम समय में सटीक परिणाम दे पाने में सक्षम है। सुखद संयोग देखिए कि इस टेस्टिंग किट को जन्म देने के अगले दिन ही महिला वैज्ञानिक ने अपने बच्चे को जन्म दिया।

    प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री केयर्स फ़ण्ड की स्थापना करते हुए देशवासियों से आर्थिक सहयोग का आह्वान किया। महज़ कुछ दिनों में बड़े कारपोरेट घरानों से लेकर आम नागरिकों ने कई हज़ार करोड़ रुपए का सहयोग कर डाला। देश का हर नागरिक, छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या ग़रीब, अपनी क्षमतापूर्वक करोना से लड़ने के लिए एकजुट था। राजनीतिक विरोधी भी अपने वैचारिक मतभेद को किनारे रख सरकार के साथ खड़े थे। प्रधानमन्त्री के हर आह्वान को लोगों ने पूरी आस्था से निभाया। थाली बजाओ, थाली बजाया। दीप जलाओ, दीप जलाया।

    प्रधानमंत्री ने क्या किया?

    प्रधानमंत्री ने समय नष्ट किया। इस आपदा से लड़ने के लिए समय ही सबसे बड़ी पूँजी थी। अमूल्य समय नष्ट होता रहा और प्रधानमंत्री हर हफ़्ते दस दिन बाद टीवी पर अवतरित हो चमत्कार का आश्वासन देते रहे मानो लॉक डाउन के ब्रहमास्त्र से ही करोना ख़त्म हो जाएगा। व्यापक टेस्टिंग को सम्भव बनाने के लिए कोई पहलकदमी ही नहीं ली गयी। मेक इन इण्डिया का नारा देने वाले ने इतने विशाल संसाधनों वाले देश पर भरोसा कर ख़ुद उत्पादन करने की बजाय टेस्टिंग किट आयात किया। बढ़ी हुई क़ीमतों पर घटिया किट्स का आयात, जिन्हें आते ही रिजेक्ट करना पड़ा। यदि विज़न होता तो समय रहते आप आशा जैसे फूट सोलज़र्स, शिक्षकों की बड़ी फ़ौज, सरकारी कर्मचारियों की पढ़ी लिखी सक्षम जमात, तीनों सेनाओं की ताक़त, लाखों की संख्या में छोटे मंझोले और बड़े उद्योगों को नियोजित कर सारे उपकरण और टास्क फ़ोर्स तैयार कर सकते थे। मोहल्ले- मोहल्ले गाँव- गाँव टीम नियुक्त कर टेस्टिंग शुरू कर सकते थे। प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ करने की बजाय हेलीकाप्टरों से फूल बरसवाए और अगले हफ़्ते तक एक बार फिर अदृश्य हो गए।

    सन दो हज़ार एक की जनगणना के हिसाब से देश भर में एक राज्य से दूसरे राज्य में जा कर कामकाज करने वालों की संख्या सैंतिस करोड़ थी। इनमें से अधिसंख्य दिहाड़ी मज़दूर या फुटपाथों पर ठेला खोमचा लगाने वाले होंगे। इनकी आय बेहद सीमित होगी जिसका अधिकांश हिस्सा वे अपने घरों को भेजते जाते होंगे। आमतौर पर महानगरों में ये संख्या किराए के नर्क में रहती है। लॉकडाउन में जब आय की सारी सम्भावनाएँ ख़त्म हो चुकी हों और टीवी अख़बार रातदिन करोना के भूत से डराते जा रहे हों, वह मदद और हौसले के बिना कब तक टिक पाता? प्रधानमंत्री ने दोनों नहीं दिया। सिर्फ़ प्रवचन दिया। उसके पाँव उखड़ने लगे तो घर तक पहुँचने का साधन भी नहीं दिया। जब वह स्वयं की व्यवस्था- अव्यवस्था से निकल पड़ा तो उसे जहाँ तहाँ रोक पुलिस से पिटवाया ज़रूर गया।

    भारतीय रेल सामान्य तौर पर हर रोज़ सवा दो करोड़ लोगों को यात्रा कराती है। प्रधानमंत्री चाहते तो क्या पूरी अप्रवासी आबादी को विश्वास में लेकर दो चार हफ़्तों में सुकून और सुरक्षा से घर तक पहुँचवा नहीं सकते थे? क्या रेल राष्ट्र की धरोहर नहीं है? क्या रेल ने अपने कर्मचारियों की छुट्टी कर दी है या फिर तनख़्वाह बन्द कर दी है? अभी भी महापलायन और प्रताड़ना जारी है। लोगों को राज्य की सीमा पर रोका और पीटा जा रहा है। मदद करने वालों को राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है। प्रधानमंत्री जी, आप की राजनीति किस बात से प्रेरित है जो निरीह आबादी की ऐसी दुर्गति पर उतारू है?

    अब जब अराजक पलायन ने सोशल डिसटेंसिंग की धज्जियाँ उड़ा दी हैं तब क्या पता करोना कितना कहाँ जा रहा है?

  • वीडियो — घरेलू कूड़ा-संग्रह : कैनबरा, ऑस्ट्रेलिया — Vivek Umrao

    वीडियो — घरेलू कूड़ा-संग्रह : कैनबरा, ऑस्ट्रेलिया — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    कैनबरा में जनरल-कूड़ा, रिसाइकिल-कूड़ा व ग्रीन-कूड़ा तीन प्रकार के घरेलू कूड़ा-संग्रह का काम कैनबरा-सरकार करती है।

    जनरल-कूड़ा : हर सप्ताह (महीने में चार बार)

    रिसाइकिल-कूड़ा : एक सप्ताह छोड़कर (महीने में दो बार)

    ग्रीन-कूड़ा : एक सप्ताह छोड़कर (महीने में दो बार)

    जिस सप्ताह रिसाइकिल-कूड़ा का संग्रह नहीं होता, उस सप्ताह ग्रीन-कूड़ा का संग्रह होता है। जिस सप्ताह ग्रीन-कूड़ा का संग्रह नहीं होता, उस सप्ताह रिसाइकिल-कूड़ा का संग्रह होता है। हर सप्ताह दो प्रकार के कूड़ा-संग्रह का काम होता है।

    रिसाइकिल व ग्रीन प्रकार के कूड़ा-बिन्स में अप्रासांगिक-कूड़ा नहीं डाला जा सकता है। कूड़ा-संग्रह वाहनों में वीडियो कैमरे लगे होते हैं, जो कूड़ा उठाने व कूड़ा डालने इत्यादि प्रक्रियाओं को सुपरवाइज करते हैं, नियंत्रण-कक्ष से कनेक्ट रहते हैं। कूड़ा-संग्रह का काम वाहन में लगा रोबोट करता है, रोबोट सलीक से बिन उठाता है, कूड़ा वाहन में डालता है, फिर बिन वापस रख देता है, इस पूरी प्रक्रिया में कूड़ा छितरता नहीं है।

    पूरे साल का एक कैलेंडर होता है, जिसके अनुसार कूड़ा-संग्रह किया जाता है। हर मोहल्ले के लिए सप्ताह में एक दिन तय हो जाता है, हर सप्ताह उसी दिन कूड़ा-संग्रह किया जाता है। सुबह सात बजे के पहले कूड़ा-बिन्स सड़क के पास रखना होता है, क्योंकि सुबह सात बजे से कूड़ा-संग्रह शुरू कर दिया जाता है। अधिकतर लोग कूड़ा-संग्रह वाले दिन के एक दिन पहले वाली रात में कूड़ा-बिन्स सड़क के पास रखते हैं, ताकि अगली सुबह कोई हड़बड़ी न रहे।

    हर कुछ महीनों में, जरूरत के अनुसार साल में एक या एक से अधिक बार, बड़े व भारी कूड़ा-संग्रह का काम भी होता है। इसकी सूचना दी जाती है, ताकि निवासी-गण अपने घरों के कूड़े को सड़क पर रख सकें।

    पहला वीडियो जनरल-कूड़ा के संग्रह का है, दूसरा वीडियो रिसाइकिल-कूड़ा संग्रह का है। यह दोनों वीडियो हमारे घर के कूड़ा-संग्रह के हैं। हमारे मोहल्ले में हर शुक्रवार को कूड़ा-संग्रह होता है, हम लोग हर बृहस्पतिवार को बिन्स सड़क के पास रख देते हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.