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मोदी जी की पकोड़ों वाली बात का समर्थन करता हूँ : लेकिन बिना गंभीरता, दृढ़ता व दूरदर्शिता के केवल बयान देने भर से कुछ नहीं होने वाला

Vivek "सामाजिक यायावर"

सुनने में आया है कि मोदी जी ने लोगों को पकोड़े बनाकर बेचने या इस जैसे ही रोजगारों की ओर रुचि लेने का सुझाव दिया है, प्रोत्साहित किया है। या ऐसा ही कुछ। बड़ा हंगामा पड़ा हुआ है फेसबुक, व्हाट्सअप व अन्य सोशल मीडिया पर। इस बयान की खिल्लियां उड़ाई जा रहीं हैं। लोगबाग अपने-अपने राजनैतिक खांचों के आधार पर बयान के समर्थन विरोध में जुटे पड़े हैं।

Narendra Modi


मेरा मानना है कि मोदी जी की पकोड़ों वाली बात सूक्ष्मदृष्टि वाली बात है। भारतीय समाज के लिए लाभकारी बात है। लेकिन केवल बयान देने भर से काम नहीं चलेगा। देश के प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी को कुछ दूरदर्शी व ठोस निर्णय भी लेने होगें। इन निर्णयों के लिए मोदी जी को उसी इच्छाशक्ति व लोगों की चीख-चिल्लाहट पर बिलकुल ध्यान न देने जैसी दृढ़ता का पालन करना होगा जैसे कि उन्होंने नोटबंदी में दिखाया था। नोटबंदी से तो खैर कोई लाभ नहीं था, लेकिन पकोड़े बात के विस्तार से बेशक भारतीय समाज को बहुत लाभ होगा। लेकिन पहली व अंतिम शर्त यह है कि मोदी जी ऐसा कर पाएं, तब।

नौकरी:

सरकारी नौकरी या प्राइवेट नौकरी कभी भी किसी समाज के लिए समाधान दे ही नहीं सकती है। यह संभव ही नहीं कि सभी को सरकारी नौकरी दी जा सके। सभी को निजी संस्थान नौकरी दे सकें। स्वावलंबन व स्वावलंबन से जुड़े व्यापार व बाजार किसी समाज के आर्थिक विकास की मूलभूत शर्त हैं।

भारत में शिक्षा, योग्यता, मेधाविता व प्रतिभा के मानदंड केवल स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में चलनी वाली पुस्तकों को रटने तक ही पूरी तरह प्रतिष्ठित कर दिए गए हैं। ऐसा शुरू से ही रहा है, पहले पोथियां रटीं जातीं थीं, जो ब्राह्मण पुरोहित गुरु जितनी पोथियां रट कर शब्दशः दोहरा ले, वह उतना ही अधिक महान योग्य व प्रतिष्ठित।

यह सारी शिक्षा, योग्यता, मेधाविता व प्रतिभा इत्यादि का अंतिम लक्ष्य सरकारी या गैरसरकारी नौकरी पाना ही रहा। किसी भी देश समाज में हो, सरकारी नौकरियां हमेशा ही लोगों की संख्या से बहुत कम होती हैं। फिर भारत जैसे देशों में तो केवल नौकरियां देने के लिए ही जरूरत बिलकुल भी न होने के बावजूद अनेक विभागों व अनेक पदों का सृजन किया गया। शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य सरकारी नौकरी पाना रहा।

पीवी नरसिंहाराव जी ने बाजार खोला तो गैरसरकारी नौकरियां भी पैदा हुईं। समय के साथ परिवर्तन हुए, गैरसरकारी नौकरियों में ऊंचे वेतन मिलने लगे। जो लोग सरकारी नौकरी न प्राप्त कर पाते वे ऊंचे वेतन वाली गैरसरकारी नौकरियों की ओर जाने लगे।

लेकिन सरकारी नौकरियों के प्रति भयंकर आकर्षण आजतक व्याप्त है। सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण खतम होते ही नौकरियों के प्रति आकर्षण स्वतः खतम होने लगेगा। तब ऐसा समय आएगा जब मोदी जी की पकोड़ों वाली बात की गहराई लोगों को समझ में आ पाएगी। तब तक यह बात भी एक जुमला ही बनकर रह जाएगी।

सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण के मुख्य कारण हैं। सरकारी कर्मचारियों व नौकरशाहों को भारतीय समाज का मालिक होना, सार्वजनिक संपत्तियों यहां तक कि आम लोगों के जीवन पर इन लोगों का निरंकुश अधिकार होना। जब तक ऐसा रहेगा, तब तक न दहेज बंद होगा, न हिंसा, न भ्रष्टाचार, न गैरजिम्मेदारानापन (मोदी जी चाहें तो हर महीने नोटबंदी लागू करते रहें)। 

लोगों की सोच बदलनी होगी कि नौकरी करने वाला महान नहीं होता। अभी यह माना जाता है कि जिसने कोई परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी पा ली है वह योग्य है, प्रतिभावान है, मेधावी है। जबकि नौकरी मिलने का मानदंड या तो कुछ किताबों को रटना होता है या भ्रष्टाचार।

कोई पकोड़े क्यों बेचे:

कोई पकोड़े बेचकर भले ही करोड़पति हो जाए लेकिन एक अदना सा सरकारी अधिकारी उसको सड़कछाप कुत्ते की तरह नचा सकता है। पकोड़े बेचना वाला वर्षों तक प्रतिदिन रातदिन मेहनत करके अपने व्यापार को स्थापित करेगा, एक मुकाम तक पहुंचाएगा। वहीं एक सरकारी अधिकारी जो कुछ किताबें रटकर नौकरी पाया होता है वह जब चाहे तब व्यापारी को सड़कछाप कुत्ते की तरह नचा सकता है, जब मन हो तब नचा सकता है, जब तक मन हो तब तक नचा सकता है।

आदमी मेहनत भी करे, रिस्क भी ले, जीवन भी खपाए और कुत्ता भी बनना पड़े। कुत्ता न बनना हो तो भ्रष्टाचार के नेक्सस का अंग बने। इतनी माथापच्ची से बेहतर कि सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करते हुए सकून के साथ जीवन गुजारा जाए।

जाति-व्यवस्था का दंश:

हजारों वर्षों से जाति व्यवस्था के कारण समाज की अधिसंख्य जनसंख्या को सार्वजनिक संपत्तियों पर अधिकार नहीं रहे। कागज में भारत के लोकतांत्रिक होने के बावजूद, वास्तव में भारत का सरकारी तंत्र लोकतांत्रिक न होकर सामंती है। सरकारी कर्मचारियों व नौकरशाही को निरंकुश सामंती अधिकार हैं। अधिकारी स्वयं को सेवक न मानकर, अभिभावक मानने के दंभ में जीते हैं। सामंती सोच का स्तर यह है जो स्वयं को अभिभावक मानता है उसको बहुत अच्छा व जिम्मेदार नौकरशाह माना जाता है, बाकायदा पुरस्कार मिलते हैं। 

मोदी जी क्या करें:

सरकारी नौकरियों में काम नहीं लेकिन भारीभरकम वेतन व सुविधाएं। विभागों व पदों के आधार पर भ्रष्टाचार का महासागर बहता रहता है, जवाबदेही बिलकुल नहीं। कोई क्यों पकोड़े तले…. ।

पहले योग्यता, प्रतिभा, मेधाविता, परिश्रम इत्यादि के प्रति मिथक दूर कीजिए, कंडीशनिंग दूर कीजिए, वाहियात व बेबुनियाद प्रतिष्ठापनाएं हटाइए। सरकारी कर्मचारियों व नौकरशाहों के अनियंत्रित अधिकार बहुत कम कीजिए, अधिकारों का चरित्र लोकतांत्रिक कीजिए, आम आदमी के प्रति पूरी तरह से जवाबदेह बनाइए। सरकारी तंत्र के पूरे ढांचे को लोकतांत्रिक बनाइए व आम लोगों के प्रति जिम्मेदार व सम्मानपूर्ण बनाइए। इसके बाद ही पकोड़ों वाली बात का वास्तव में कोई सार्थक मायने होगा। लोग स्वयं ही पकोड़े तलने लगेंगे।

बात सिर्फ मोदी जी की दृढ़ता व ईच्छाशक्ति की है।


 

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