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बंदर को पूर्वज मानते ही जाति व्यवस्था, संस्कृति का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिक-श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाती है

Vivek "सामाजिक यायावर"

मंत्री जी का बयान तथा समाज का वैज्ञानिक दृष्टिकोण:

मेरा अनुमान है कि मंत्री जी का भाव दूसरा था, मंत्री जी को यह लगता है कि मनुष्य सीधे आसमान से टपका था। मंत्री जी का बंदर को मनुष्य का पूर्वज मानने से विरोध इसलिए है क्योंकि यदि बंदर को मनुष्य का पूर्वज मान लिया जाएगा तो ईश्वर की काल्पनिक अवधारणाओं, पौराणिक कथाओं व पुराणों का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिकता पूरी तरह से खतरे में पड़ जाएगी। ब्राह्मण मुंह से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य कही और से व शूद्र पैरों से पैदा हुआ मानने वाली जाति व्यवस्था का आधार छिन्न भिन्न हो जाएगा।

स्वर्ग नर्क की अवधारणा खतरे में पड़ जाएगी। स्वर्ग नर्क, देवी देवताओं, देवराज इत्यादि की आधार पर गढ़ी गईं सैकड़ों हजारों कहानियों व सांस्कृतिक तामझाम के आमूलचूल अस्तित्व पर खतरा आ जाएगा। पुष्पक विमान, सूक्ष्म शल्य चिकित्सा व अन्य वैज्ञानिक दावों का वजूद पूरी तरह से ही खतम हो जाएगा।

किसी कागज में चार लकीरें खींच कर, ग्रहों का एक घर से दूसरे घर में जाना। ग्रहों के इस प्रकार एक घर से दूसरे घर में आने-जाने का किसी मानव के जीवन के उतार चढ़ाव यहां तक कि वह किससे शादी करेगा, कब सेक्स करेगा, कब खाना खाएगा, कब मूत्र-त्याग करेगा, कब शौच क्रिया करेगा, शौच क्रिया करते समय किस-किस पशु-पक्षी से मुलाकात होगी, किस दिन किस समय क्या खाएगा, इत्यादि-इत्यादि की गणना तक कर ली जाती है। सैकड़ों-हजारों वर्षों से चली आ रही इन सब फर्जी वैज्ञानिकता, विशेषज्ञता, शुचिता व ईश्वरीय संबंधों इत्यादि के फर्जीवाड़े के तामझाम पर सवाल उठना शुरू हो जाता है।

मैं यह नहीं मानता कि मंत्री जी ने इस प्रकार का बयान किसी धूर्तता पूर्ण सोची समझी साजिश के कारण दिया। मेरा मानना है कि सैकड़ों-हजारों वर्षों से यह सब हमारे आपके दिलोदिमाग में बहुत गहरे पैठ गया है। हम कितना भी विज्ञान पढ़ लें। वैसे भी हम विज्ञान नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं। जिसे हम पढ़ना कहते हैं उस पढ़ने का मतलब होता है रट लेना। रट कर परीक्षा की उत्तर पुस्तिका में उल्टी करके लिख देना।

लोग IIT के पढ़े होंगे, कम्प्यूटर प्रयोग करते होंगे, स्मार्ट फोन प्रयोग करते होंगे। जल, जंगल, जमीन, आसमान, पशु-पक्षियों, रसायनों व अंतरिक्ष विज्ञान को समझने का दावा करते होंगे। खुद समझने का दावा न भी कर पाते हों तो भी दूसरों के किए गए दावों से खुश होते हैं।

अपने बच्चों के लिए छोटी उम्र से ही IIT में भेजने की योजना बनाते हैं। छोटी कक्षाओं से ही बच्चों के मन-मस्तिष्क में भर देते हैं कि IIT पहुंचना है। यहां मैं IIT का नाम केवल इसलिए ले रहा हूं क्योंकि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में न होने के बावजूद भारत में सबसे बेहतर संस्थान माने जाते हैं। पटाक से नौकरी लगती है। चूंकि अंधों में काने राजा हैं ही तो ऊंची सरकारी नौकरियां भी पटाक से लगतीं हैं।

आप इन पढ़े लिखे लोगों की जीवन शैली देखिए। इनके घरों में छोटे-मोटे मंदिर तक मिलेंगे। पूजा पाठ करेंगे व बच्चों से करवाएंगे। वह भी इसलिए क्योंकि बच्चे को अच्छे नंबर मिलें, बच्चे को परीक्षाओं में सफलता मिले, बच्चे को मनचाही नौकरी मिले।

ऐसा ही बहुत कुछ और भी।

एक तरफ तो विज्ञान की किताबें रटा रहे हैं ताकि नौकरी मिले, ऐशो-आराम वाली तरक्की मिले। दूसरी तरफ बच्चे के दिलोदिमाग में कूट-कूट कर भर रहे हैं कि देवी-देवता होते हैं जो सबकुछ निर्धारित करते हैं। किसी खास तरीके से कुछ कर्मकांड करने से जीवन में यह सफलता मिलती है, वह मिलता है। बच्चा भले ही IIT या IISc से विज्ञान या तकनीक में PhD कर ले। लेकिन उसकी मानसिकता तो वही रहेगी जैसी बचपन से वह अपने इर्द-गिर्द देखता आया है।

यही कारण है अपवादों को छोड़कर अपने समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लोग होना बहुत मुश्किल होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना अलग बात है, वैज्ञानिक पदों, विज्ञान के शिक्षकों, विज्ञान या तकनीक के विषयों की प्रोफेसरी इत्यादि की नौकरियां करना बिलकुल अलग बात है। जिस समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव हो, उस समाज के मंत्री जी ने जो बयान दिया है। वह इस कारण भी हो सकता है कि मंत्री जी को सच में ही ऐसा लगता हो। यह जरूरी नहीं कि मंत्री जी के बयान के पीछे कोई सोची-समझी धूर्तता ही हो।

यह कल्पना करने में क्या जाता है कि हम पुष्पक विमान बनाते थे, हम सूक्ष्म शल्य-चिकित्सा करते थे, हम वानर-मनुष्य के पसीने से मछली को मुंहे से गर्भवती कराकर वानर-मनुष्य पैदा करवाते थे। हम पहले विज्ञान में बहुत ही आगे थे, फिर कुछ ऐसा हुआ कि सबकुछ अचानक तहस-नहस हो गया, केवल इन वैज्ञानिक उपलब्धियों की बात करने वाले ग्रंथ किसी तरह बचे रह गए, जिससे हमको मालूम पड़ता है कि हम कितने विकसित व महान थे। हमारे काल्पनिक ऋषि मनीषी बहुत महान थे, पूरी सृष्टि व ब्रह्मांण की चिंदी-चिंदी समझ रखी थी। सबकुछ वैदिक-संस्कृत जैसी गूढ़ भाषा के गूढ़ मंत्रों में दिया गया है। दुनिया का सारा ज्ञान इन मत्रों में समाया है, सभी मंत्रों में गूढ़ व सूक्ष्म विज्ञान छुपा है, बस समझने वाली बात है।

लीजिए कर लीजिए जो बन पड़े। वैज्ञानिकता गई तेल लेने। स्वंभू विज्ञान, स्वयंभू वैज्ञानिकता, स्वयंभू वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

मेरी बात कि बंदर मनुष्य के पूर्वज नहीं थे:

मैं लंबे समय तक यही मानता रहा कि बंदर ही मनुष्य के पूर्वज हैं। जीव विज्ञान की किताबों में यही पढ़ाया गया था। इधर कुछ वर्षों में कुछ गंभीर व विश्वविख्यात वैज्ञानिकों की कुछ पुस्तकें हाथ लगीं। मालूम पड़ा कि क्रमिक विकास की प्रक्रिया में बंदर मनुष्य के पूर्वज नहीं थे वरन् बंदर व मनुष्य के पूर्वज एक ही थे। मालूम पड़ा कि एप, चिम्पाजी व बंदर में अंतर होता है। मालूम पड़ा कि एप मनुष्य के पूर्वज थे। मालूम पड़ा कि चिम्पाजी मनुष्य के पूर्वज थे। बंदर मनुष्य के पूर्वज न होकर सहोदर थे, समान पूर्वजों से निकली एक दूसरी शाखा।

हमारे समाज की शिक्षा-प्रणाली ऐसी है कि हमें गंभीर स्वाध्याय करने की जरूरत नहीं रहती। हमारा लक्ष्य केवल परीक्षाओं में नंबर पाना होता है। आपको विज्ञान, गणित या किसी अन्य विषय की समझ हो, आप बहुत अधिक अध्ययन करते हों यह भी संभव है कि आपको अपने विद्यालय में विषय के शिक्षकों से अधिक आता हो लेकिन यदि आप परीक्षा में नंबर नहीं ला पाते हैं। यदि आप नौकरी नहीं पा पाते हैं तो आपको कुछ नहीं आता। परीक्षा में नंबर व नौकरी ही आपकी योग्यता के मानदंड हैं।

अपने समाज में अधिकतर लोग ऐसे होते हैं जिन्होंने कभी भी गंभीर व विस्तृत स्वाध्याय नहीं किया होता है। विषय वस्तु को गहराई व वस्तुनिष्ठता से समझने जानने के गंभीर प्रयास की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपनी या अपनी मानसिकता को पसंद आने वाला या मुफीद बैठने वाला कुछ पढ़ पुढ़ लेते हैं, फिर उसी को आधार बना कर अपनी तार्किक क्षमता व स्तर के घालमेल करते हुए अपने भीतर एक अनुकूलता तैयार कर लेते हैं, फिर उसी अनुकूलता से देखते समझते व दिखाते समझाते हैं। ऐसा करते-करते अनुकूलता की पैठ इतनी हो जाती है कि इन लोगों को यह लगने लगता है कि ये सबकुछ समझते हैं। दुनिया की सारी थियरीज, सारे सिद्धांत, सारी अवधारणाएं सभी कुछ समझे हुए हैं या समझने की क्षमता रखते हैं। रटना, मान लेना, पहले से ही रटे हुए व माने हुए को तर्क से साबित करना तथा माने हुए को अधिक पुख्ता करना .... इसी प्रकार के तथाकथित विद्वानों व ज्ञानियों की समझ, ज्ञान, विद्वता, चिंतन, विचाशीलता इत्यादि का कुल यही जमा खाता होता है।

चूंकि ऐसे लोगों की विद्वता, ज्ञान, समझ इत्यादि सभी कुछ शब्दों के रटाव व मानने तथा रटे हुए शब्दों व मानने के तार्किक झोलझाल तक सीमित रहता है; इसलिए इन लोगों की जीवन शैली, जीवन के प्रति सोच, जीवन के प्रति मानसिकता आदि में बेहद खोखलापन व विरोधाभास रहता है। लेकिन तार्किक झोलझाल वाली विद्वता, ज्ञान व समझ का अहंकार इतना अधिक होता है कि विरोधाभास व खोखलापन दिखाई भी नहीं देता है।

ऐसे लोग मानसिक, वैचारिक व भावनात्मक रूप से विकृत व कुंठित होते हैं क्योंकि इनका जीवन की सार्थकता, समाज व समाधान से कोई ईमानदार व प्रतिबद्ध लेना देना नहीं होता। उल्टे ये लोग इन सब तत्वों को मूर्खता मानते हैं। काश ये लोग तार्किक क्षमता का बेहतर प्रयोग कर पाते। लेकिन शायद इनकी तार्किक क्षमता भी सूक्ष्मता के स्तर की नहीं ही होती है, अन्यथा सूक्ष्मता देख पाने, स्वीकार कर पाने व उसको जी पाने की क्षमता भी होती।

इतना ही नहीं बल्कि दुनिया के लोग जो अध्ययन करते हैं, आविष्कार करते हैं, मौलिक शोध करते हैं, एक एक बिंदु की सूक्ष्मता को समझने के लिए सालों लगाते हैं, यहां तक कि अपना जीवन तक लगाते हैं, कुछ लोग तो अपने ऊपर ही जीवंत प्रयोग तक करके देखते हैं, बार बार असफल होने के बावजूद लगे रहते हैं …. इत्यादि लोग अयोग्य होते हैं, नासमझ होते हैं मूर्ख होते हैं। ये नासमझ व मूर्ख लोग बिना मतलब निरंतर इतनी मेहनत करते हैं, धैर्य रखकर समझने का प्रयास करते हैं। इतनी मेहनत व धैर्य इत्यादि की बजाय यदि ये लोग भी अपनी पसंद/नापसंद के आधार पर तर्क/वितर्क/कुतर्क के साथ इस अनुच्छेद के ऊपर वाले बाक्स में तीन अनुच्छेदों में बताए गए विद्वानों व ज्ञानियों की तरह कुछ पढ़ पुढ़ लेते, कुछ रट रटा लेते तो दुनिया की सारी थियरीज, सारे सिद्धांत, सारी अवधारणाएं सबकुछ अपने आप ही समझ कर विद्वान व ज्ञानी हो जाते।  

चलते-चलते:

भारत के एक मंत्री जी ने संभवतः एक बयान दिया कि मनुष्यों के पूर्वज बंदर नहीं थे। मैंने भी कई पोस्टें लिखीं जिनमें कहा कि बंदर मनुष्य का पूर्वज नहीं था। मेरी बात व मंत्री जी की बयान के पीछे के भावों व कारणों में बहुत अधिक अंतर है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संभावना का हनन, खाचों को प्राथमिकता देने के कारण ही होता है। यह खांचा भले ही ब्राह्मणवाद हो या ब्राह्मणवाद का विरोध या किसी राजनैतिक दल या विचार का समर्थन या विरोध। सामाजिक समाधान व वास्तविक शिक्षा बेहद गूढ़, सूक्ष्म व दृष्टि वाली बात होती है।  

 

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