Author: संपादक मंडल

  • जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत

    जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत

    मित्र : भारत में ऐसी मान्यता है कि भारत शताब्दियों पहले इतना अमीर था कि सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस मुद्दे पर आपका क्या मत है? 

    नोमेड : भारत में बहुत ऐसी मान्यताएं हैं जिनमें शताब्दियों पहले भारत दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश था। मान्यताओं का क्या, जो भी प्रयोजित कर दिया जाए वही मान्यता बन जाती है। जिस भारत में कुल जनसंख्या के पाँच मे से चार हिस्सों को शिक्षा, समाज के लिए सोचने-विचारने, अभिव्यक्ति, मानव के रूप में प्रकृति से सहज भाव से प्राप्त मौलिक अधिकार आदि भी न रहे हों; वहाँ मान्यताएं क्या कहतीं हैं से क्या फर्क पड़ता है। मेरा मानना है कि भारतीय समाज में इतिहास व मान्यताओं के नाम पर अपवाद छोड़कर जो भी है, वह लगभग सब कुछ प्रायोजित ही है और सामाजिक-कपट व ढोंग के साथ प्रायोजित है। प्रायोजित तर्कों से ऊपर उठकर यदि सामाजिक प्रतिबद्धता व ईमानदारी से सोचिए, तो आप मेरे विश्लेषण कि जाति-व्यवस्था के होते हुए भारत के आर्थिक विकास व समृद्धि की कल्पना ही असंभव और अव्याहारिक है, से सहमत होगें।


    भारत के सैकड़ों जिलों के हजारों गाँवों के लाखों लोगों से संवाद करके उनको जीवन जीते देख कर, उनके विकास के लिए उनके ही जैसे होकर धरातलीय कार्यों को करते हुए, जो समझ व अनुभव हुए उनसे मैं इन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचता हूँ। समाज के लोगों की वास्तविक जीवन-शैली, मान्यताओं, जीवन-मूल्यों और दर्शन आदि में भारी अंतर दिखता है। क्या आपको नहीं लगता कि भारत के लोग दोहरे चरित्र के होते हैं। उनकी कथनी, करनी व प्रस्तुतीकरण आदि में भयंकर व विरोधात्मक अंतर होता है। कभी-कभी तो विपरीत ध्रुवों जैसा अंतर होता है।


    मित्र : जी बिलकुल लगता है?

    नोमेड : क्योंकर लगता है, आपको?


    मित्र : जीवन को उनके साथ जीने की प्रक्रिया में स्पष्ट अनुभव होता है, इसलिए लगता है।

    नोमेड : सबको तो नहीं लगता है, आपको ही क्योंकर लगता है?


    मित्र : संभवतः मैं कारकों को देखने की चेष्टा करता हूं, इसलिए लगता है।

    नोमेड : संभवतः नहीं। यही यथार्थ है कि चूंकि आप कारकों को देखने की चेष्टा करते हैं या कारकों को समझना चाहते हैं, इसलिए आपको दिखना शुरु हो जाता है। वैसे ही मुझे भी जीवन जीने की प्रक्रिया में अनुभव होता है। मेरी व आपकी दृष्टि व समझ में अंतर सिर्फ मात्रा, गुणवत्ता व चरित्र आदि का हो सकता है। 


    मित्र : आप क्या मानते हैं कि भारत कभी सोने की चिड़िया रहा होगा?

    नोमेड : जी बिलकुल मानता हूँ कि भारत सोने की चिड़िया नहीं, सोने का डायनासोर रहा होगा। 


    मित्र : इसका मतलब भारत का समाज बहुत समृद्ध रहा होगा।

    नोमेड : बिलकुल नहीं।


    मित्र : ऐसा कैसे हो सकता है?

    नोमेड : क्यों नहीं हो सकता है। आज भारत में कुछ लोग बहुत अमीर हैं, दुनिया भर के ऐशोआराम में हैं, लेकिन समाज की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग पौष्टिक भोजन, अच्छे कपड़े व सामान्य स्तर का घर तक नहीं पाती है। 


    मित्र : जी सहमत हूँ, लेकिन तब भी ऐसा ही अंतर रहा होगा, ऐसा क्योंकर हो सकता है?

    नोमेड : तब तो और भी वीभत्स अंतर रहा होगा। अब तो जाति-व्यवस्था का अपवाद स्वरूप ही सही किंतु कुछ क्षय हो रहा है, तब तो जाति-व्यवस्था ही समाज व अर्थ-शास्त्र का मूल-आधार थी।


    मित्र : जी।

    नोमेड : दरअसल यदि भारत कभी भी समाज के रूप में समृद्ध समाज रहा होगा तो उसके कुछ अवशेष तो दिखने ही चाहिए। एक ऐसा समाज, जिसमे समाज की कुल जनसंख्या के बहुत बड़े प्रतिशत भाग को वैज्ञानिक प्रयोगों, आर्थिक व्यवस्था प्रयोगों, शोधों व प्रबंधनों को करने की बात तो छोड़िए खुद के परिश्रम के द्वारा उत्पादित संपत्ति पर ही अधिकार नहीं रहा हो, सामान्य जानकारियों को प्राप्त करने की शिक्षा का भी अधिकार नहीं रहा हो, अपने व अपने परिवार के विकास व प्रगति आदि के संदर्भ में विचार करने व अपने मन की बात की अभिव्यक्ति का अधिकार तक नहीं रहा हो, ऐसा समाज समृद्ध हो सकता है, इसका प्रश्न का ही कोई औचित्य नहीं है और आप समाज की समृद्धि की प्रासंगिकता की बात करना चाह रहे हैं।


    मित्र : अभी आप ही ने कहा कि भारत सोने की चिड़िया क्या डायनासोर रहा होगा। आपके ऐसा कहने का क्या तात्पर्य है?

    नोमेड : दरअसल भारत की अर्थव्यवस्था का आधार समाज में अच्छी अर्थ-व्यवस्था या संसाधनों का बेहतर प्रबंधन या वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि नहीं था। यदि होता तो अवशेष दिखाई पड़ते जैसे अन्य तत्वों के अवशेष दिखाई पड़ते हैं। अवशेष न भी दिखाई देते तो परंपराएं दिखाई पड़तीं, जैसे अन्य तत्वों की परंपराएं दिखाईं पड़ती हैं, भले ही विकृत रूप में दिखाई पड़तीं। 


    जाति-व्यवस्था के कारण शूद्र को दासों की तरह आजीवन लगातार परिश्रम करके उत्पादन करना पड़ता था और परिश्रम करके उत्पादित संपत्ति के एवज में पशुओं की तरह घिसटकर जी लेने लायक सामग्री ही प्राप्त होती थी; ताकि परिश्रम करने वाले दासों की संख्या कम न हो जाए। जाति-व्यवस्था के कारण व्यापार का अधिकार केवल व्यापारी वर्ग को रहा। इन सब तत्वों को जोड़कर देखने से यह मालूम होता है कि व्यापारी को किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं थी और उत्पादन के लिए व्यापारी को नगण्य के बराबर निवेश करना पड़ता था। इस तरह परंपरा में व्यापारी जाति-व्यवस्था के कारण बिना कुछ किए ही दूसरों के परिश्रम के उत्पादन से बैठे-बैठे व्यक्तिगत लाभ कमाने की अवस्था में रहा है। इस प्रकार के व्यापार से केवल व्यापारी और राज-सत्ताओं का ही लाभ हुआ। 


    शूद्र उत्पादन करता रहा और व्यापारी और राज-सत्ताएं शूद्र के आजीवन व अनवरत अवैतनिक-परिश्रम से भरपूर ऐश करतीं रहीं। इसीलिए भारत में व्यापारियों ने विज्ञान-तकनीक, शोध व मौलिक सोच आदि को प्रोत्साहित करने के बजाय कुंठित ही किया, ताकि दूसरों के परिश्रम के द्वारा भरपूर लाभ बटोरा जा सके। भारत के उद्योपतियों व व्यापारियों की मानसिकता आज भी ऐसी ही है। इसीलिए ये लोग पूरी निर्दयता, निरंकुशता व दृष्टिहीनता के साथ भारत के लोगों के परिश्रम व सामाजिक संसाधनो को कब्जाने व सभी स्तरों पर शोषणों के द्वारा अर्जित लाभ की तकनीक पर ही व्यापार करते हैं।

    लाभ का बटवारा व्यापारी-वर्ग व राज-सत्ताओं के मध्य होने की परंपरा आज भी वैसे की वैसी ही है। आम-आदमी के परिश्रम की उपेक्षा तब भी थी और आज भी है; आम-आदमी के हाथों में संसाधनों व उसके द्वारा अर्जित संपत्ति का अधिकार व नियंत्रण तब भी नहीं था और आज भी नहीं है। पहले जो केवल शूद्रों के साथ होता था, आज पूरे आम-समाज के लोगों के साथ हो रहा है, यदि इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो आज की स्थितियाँ और अधिक भयावह हैं और इन सबकी वीभत्सता व भयावहता आदि का आधार जाति-व्यवस्था ही है। यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो समाज की मानसिकता व अनुकूलन ऐसा नहीं होता, जिनके कारण ऐसी भयावह परिस्थितियाँ निर्मित हो चुकी हैं। 


    मित्र : बहुत विचारक किस्म के लोगों से सुनता हूँ कि अंग्रेजो के पहले भारत के लोगों की स्थितियाँ बिलकुल ही भिन्न थीं। भारत के लोग बहुत समृद्ध थे और भारत के गाँवो में स्वावलंबन की बहुत ही अद्वितीय व्यवस्था थी। अंग्रजों ने भारत के इतिहास को तोड़-मरोड़ दिया ताकि विश्व में भारत की महानता नहीं सिद्ध हो सके।

    नोमेड : बिलकुल सही सुनते हैं आप, मैं भी यही सुनता आया हूँ। 


    मित्र : आपके क्या विचार हैं, इन सब मान्यताओं के बारे में?

    नोमेड : आधारहीन मान्यताएं हैं।


    मित्र : कैसे?

    नोमेड : इन मान्यताओं को मानते ही, यह मानना पड़ेगा कि भारत के प्रत्येक गाँव में अधिकतर लोगों के घर समृद्ध थे और सुविधाओं से संपन्न थे। मैंने भारत के लगभग पचास हजार छोटे-बड़े गाँवों को देखा है, खुद भी ग्रामीण परिवेश से हूँ, लगभग दो दशकों से भारत के अतिपिछड़े गाँवों के लिए धरातलीय काम कर रहा हूँ। गाँव में जमींदारों, लंबरदारों, व्यापारियों व राज-सत्ता के चाटुकारों आदि के अलावा किसके पास समृद्धि व सुविधा थी? लुहार, बढ़ई, माली, कहार आदि परंपरा में सैकड़ों वर्षों तक पीढ़ी दर पीढ़ी वही काम करते हुए भी कभी भी दो-जून की रोटी, जैसे तैसे तन ढकने वाले मांगकर लाए गए कपड़ों के टुकड़ों व जमींदार के तालाबों से खोद कर लाई गई मिट्टी के छोटे-छोटे घरों आदि से ऊपर न उठ पाए।


    जिस समाज में लोगों को पेट भरने के लिए सामाजिक कार्यक्रमों में बड़े लोगों द्वारा अपनी खाई हुई पत्तलों में अपना जूठा खाना इसलिए छोड़ने की घिनौनी परंपरा बनाई गई कि भूखे पेट लोग उस बचे-खुचे जूठे खाने को खाकर जूठा खाना छोड़ने वाले की उदारता के प्रति कृतज्ञता महसूस करेंगे और अवसर पड़ने पर उसके लिए बेगार करेंगे; ऐसी परंपराएं शोषित वर्ग के लोगों का आत्मविश्वास तोड़ने व अंतःमन में शोषण को ईश्वरीय प्रयोजन व अपने जीवन की नियति स्वीकारने के लिए बनाईं गईं। उनको सुंदर शाब्दिक तर्को से गढ़ा हुआ कृत्रिम किंतु सुंदर आवरण चढ़ा कर ढक दिया गया। स्वावलंबन व सुसंस्कृत संस्कृति की अजीबोगरीब कसौटियाँ और मानदंड हैं, जहाँ घोर अमानवीयता को भी निर्लज्जता के साथ महानता व संवेदनशीलता परिभाषित कर दिया जाता है।

    लुहार का बेटा लुहार, बढ़ई का बेटा बढ़ई, माली का बेटा माली, कहार का बेटा कहार आदि आदि का तथाकथित स्वावलंबन भीषण शोषण व दया पर आधारित था, न कि व्यवस्थित आर्थिक व्यवस्था पर। लुहार का बेटा सुनार नहीं बन सकता, सुनार का बेटा लुहार नहीं बन सकता। शोध, विकास व नई तकनीक आदि की दूर-दूर तक कोई भी संभावनाएं नहीं। जो है, जैसा है उसी को उटपटांग तरीके से या सुलझे हुए तरीके से आगे बढ़ाना।


    ऐसे इतने कुंठित व परतंत्र तंत्र को स्वावलंबन की अद्वितीय व्यवस्था कहा व सिद्ध किया जाता है। दरअसल जाति-व्यवस्था जन्म आधारित दास-व्यवस्था थी। लेकिन इसको कर्म-आधारित व्यवस्था मानने के मिथक को सही मान लिया गया है। इसे सही मानने के पीछे अनेकानेक निहित स्वार्थ, सामाजिक-कपट व दुर्भावनाएं पोषित होती हैं। किंतु यदि संवेदनशीलता, जातिगत दुर्भावना से ऊपर उठकर, सामाजिक-ईमानदारी व जीवन-मूल्यों के आधार पर विश्लेषण कीजिए, आपको समतामूलक स्वावलंबन कही नहीं दिखेगा। 


    यदि आपके द्वारा उद्धृत विचारक किस्म के लोगों की मान्यताएं मान ली जाएं तो यह भी मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने हर गाँव में सैकड़ों सुविधा-संपन्न व समृद्ध घरों को उजाड़ कर खेती की लहलहाती जमीन को ऐसे बदल दिया मानो वहाँ कभी कुछ था ही नहीं और गाँवों में सुअर के गंदे बाड़ों जैसी मलिन-बस्तियाँ बना दीं। यदि अंग्रेजों के पास आज से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व भवनों को नष्ट करके उपजाऊ भूमि में बदलने की इतनी उन्नत तकनीक थी। तो आज हमें उनकी उस जमाने की इस अद्वितीय तकनीक को सीखने की जरूरत है क्योंकि भारत की आजादी के बाद जिस तरह से कृषि भूमि के विकास के नाम पर अधिग्रहण करके कंक्रीट के जंगल खड़े किए हैं; वह भी बिना किसी खास प्रयोग व प्रयोजन के। उनको तोड़ कर उपजाऊ कृषि भूमि में बदल कर देश के लोगों के सामने सुरसा जैसे मुँह बाए खड़ी खाद्य व भूजल की भयावह समस्या को हल करने की जरूरत सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता के रूप में है।   


    यदि कभी वास्तव में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता होगा, तो मैं इसका सिर्फ यह मतलब निकालता हूँ कि उस समय भारत के व्यापारियों व राजाओं आदि के पास खूब संपत्ति रही होगी। चूंकि भारत में सैकड़ों राज्य होते थे, जिनमें राजा, प्रधानमंत्री, दीवान, मंत्री, सेनापति, रिश्तेदार व चाटुकार आदि होते थे। राज्यों में व्यापारी होते थे। इसलिए समाज की अधिसंख्य जनसंख्या के शोषित होने के बावजूद, भारत सोने की चिड़िया लगा करता होगा। यदि वास्तव में भारत सोने की चिड़िया कहलाने लायक जैसा समृद्ध होता तो समाज की समृद्धि के अवशेष समाज की परंपराओं में मिलते। 


    कोई भी समाज जो सांस्कृतिक व आर्थिक रूप से समृद्ध होता है, वह अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों का शोषण बर्बरता से नहीं करता है और न ही खुद अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों से विद्रूपता के साथ घृणा ही करता है।

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से लिया गया लेख (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • सामाजिक न्याय :: जाति-व्यवस्था-सामाजिक-आरक्षण बनाम संवैधानिक-आरक्षण

    सामाजिक न्याय :: जाति-व्यवस्था-सामाजिक-आरक्षण बनाम संवैधानिक-आरक्षण

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से

    (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारहवें महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)


    मित्र : आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं?

    नोमेड : जी बिलकुल।


    मित्र : क्यों?

    नोमेड : क्योंकि संवैधानिक-आरक्षण, शोषक-वर्गों द्वारा शोषित-वर्ग के साथ सैकड़ों वर्षों तक लगातार प्रति क्षण की गई क्रूरता व बर्बरता का सक्रिय माफीनामा है। और साथ ही एकमात्र औजार है, जिससे जाति-व्यवस्था के पारंपरिक अन्याय को सामाजिक-न्याय में बदला जा सकता है।


    मित्र : क्या आपकी रोजी-रोटी, व्यवसाय आदि में संवैधानिक आरक्षण का योगदान है?

    नोमेड : बिलकुल नहीं, मैं ऐसा कोई व्यवसाय नहीं करता,  मैं ऐसी कोई नौकरी नहीं करता जिस तक पहुंचने के लिए  मुझे संवैधानिक आरक्षण मिला हो। मेरी क्रियाशीलता, मेरी गतिविधियों, मेरी सोच, मेरी समझ, मेरे व्यक्तित्व आदि में संवैधानिक आरक्षण का कोई योगदान नहीं रहा। मैंने बचपन से लेकर आज तक संवैधानिक आरक्षण की रोटी व सुविधा नहीं खाई। मेरे पिता की रोजी-रोटी, आर्थिक-आय आदि में उनको कभी संवैधानिक आरक्षण नहीं मिला। मेरी पत्नी को नहीं मिला। मेरी संतानों को नहीं मिलेगा।


    मित्र : फिर भी आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं, क्यों?

    नोमेड : क्योंकि मानवता, संवेदना, न्याय आदि तत्व समाज, देश, देश की भावी-पीढ़ियों के लिए  मानव-निर्मित राजनैतिक, आर्थिक व धार्मिक तंत्रों आदि को धनात्मक, कल्याणकारी, सृजनशील, ईमानदार व सामाजिक प्रतिबद्ध बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। ध्यान से देखा जाए तो शक्तिशालियों, विजेताओं और तंत्रों को बनाने व चलाने वालों ने शोषक वर्ग व शोषक वर्ग के सहयोगी वर्गों के हितों के लिए जाति-व्यवस्था के रूप में “सामाजिक आरक्षणों” का स्थायी प्रबंध कर दिया।


    मित्र : सामाजिक आरक्षण किसको कह रहे हैं आप?

    नोमेड :  सामाजिक आरक्षणों का तात्पर्य यह कि समाज की शक्तियों, सत्ताओं, संपत्तियों व संस्कृति आदि पर जन्मजात केवल जाति विशेष का होने के कारण ही अधिकार मिल जाना। हर स्तर पर जन्म के आधार पर सामाजिक आरक्षण रहे और शताब्दियों तक रहे, यदि सतयुग से कलियुग तक के युग-चक्र की अवधारणा को सत्य मान लिया जाए तो लाखों वर्षों से ये सामाजिक आरक्षण निर्बाध रूप से आज तक लागू हैं।


    संपत्ति पर सामाजिक आरक्षण –

    खेतों में काम करके उत्पादन करने वाला शूद्र पूरे साल प्रतिदिन बिना अवकाश के भरपूर बेगार परिश्रम करने के बावजूद, उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रखता था। यहां तक कि उसे अपना व अपने परिवार का पेट भरने, तन पर कपड़े ढकने व टुटही झोंपड़ी के लिए  भी शोषक जाति के लोगों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था। परिश्रम का अर्थ तिरस्कार व कर्म का अर्थ शोषण करना/बर्बरता/क्रूरता/कब्जाना/हड़पना/प्रपंच/छल/छद्म आदि। परिश्रम व कर्मशीलता के कोई मायने ही नहीं। 


    शक्ति व सत्ता पर सामाजिक आरक्षण –

    चूंकि उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था, इसलिए   समाज की वास्तविक शक्ति व सत्ता पर कोई अधिकार नहीं रहा और न ही हो पाया। शूद्रों ने अपने बहुत ही सीमित, बिना स्वतंत्रता वाले कुंठित समाज में भी किसी तरह से कोई आंतरिक व सापेक्षिक सत्ता बना ली हो जो उनके अपने ही बीच में श्रेष्ठता को प्रायोजित कर सके तो इतर बात है।


    ज्ञान पर सामाजिक आरक्षण –

    शूद्रों को ज्ञान का अधिकार नहीं, वेदों-उपनिषदों की ऋचाएं यदि किसी शूद्र के कानों ने सुन लीं तो सुनने वाले कानों को बहरा कर देना।  किसी शूद्र ने भूलवश यदि मुंह से वेदों उपनिषदों की ऋचाएं टूटेफूटे तरीके से भी बोल दीं तो जीभ काट देना आदि आदि। यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ना।


    संस्कृति पर सामाजिक आरक्षण –

    ग्रंथ आदि लिखकर अपने स्वार्थों के लिए  पूर्वनिर्धारित कर्मकांड से भरी परंपराएं बना दी गईं। समाज के द्वारा सहज स्फूर्त तरीके से कला, संस्कृति को विकसित पल्लवित नहीं होने दिया गया, कुछ लोगों ने ही सबकुछ तय कर दिया। इसे तय करने में शूद्रों के लिए कोई आधार नहीं छोड़ा गया।


    मित्र : सामाजिक आरक्षणों से हुई क्षतियां कैसीं रहीं?

    नोमेड :  सैकड़ों वर्षौ की जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज की लाखों प्रतिभाओं की प्रतिवर्ष भ्रूण हत्या की है।


    मित्र :  प्रतिभाओं की भ्रूणहत्या, वह कैसे?

    नोमेड :  जन्म के आधार पर ही आदमी की व्यक्तिगत योग्यता, व्यक्तिगत चरित्र व सामाजिक प्रतिष्ठा तय करने की बर्बर व क्रूर जाति-व्यवस्था के कारण लाखों करोड़ों संभावित प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या प्रतिवर्ष लगातार शताब्दियों तक कैसे होती रही, इस बात को समझने के लिए तथ्यों को खुले व साफ मन से समझने की आवश्यकता है।


    मित्र :  जी

    नोमेड : 

    • ब्राह्मण का पुत्र भले ही मूढ़-बुद्धि हो, उसे विद्वान, पवित्र व प्रतिष्ठित ही माना जाएगा। अपने पूरे जीवन में उसका काम सिर्फ और सिर्फ कुछ पोथियों को सीधा, उल्टा-पुल्टा या ऊटपटांग गलत तरीके से बांच देना है।  घोर से घोर मूढ़ को भी महानता व विद्वत्ता की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए केवल किसी ब्राह्मण के यहां जन्म लेना पर्याप्त।

    • इसी प्रकार घोर से घोर कायर को भी क्षत्रिय के यहां जन्म लेना मात्र ही उसके अद्वितीय बहादुर होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए  पर्याप्त।

    • वैश्य के पुत्र को व्यापार व प्रबंधन का ककहरा न आते हुए भी, व्यापार व प्रबंधन का पुरोधा होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता केवल उसका जन्म वैश्य जाति में होने मात्र से ही मान लिया गया।

    • शूद्र को जन्म से ही किसी लायक नहीं माना गया, उसको पशुओं से भी निकृष्ट माना गया।  जिस समाज में गाय को पूजा गया, सुअर को दैवीय अवतार माना गया।  उसी समाज में शूद्र को इतना निकृष्ट माना गया कि उसे अछूत कर दिया गया, शूद्र यदि ज्ञान को सुन भी ले तो ज्ञान अपवित्र मान लिया जाता था।  इसीलिए  शूद्र को ऊपर के तीन वर्णों के दास के रूप में जबरन स्थापित किया गया और इसको ईश्वरीय प्रयोजन साबित करके ईश्वरीय दंड-विधान आदि तय करके, जबरन थोपी गई सामाजिक-दासता को जन्म के आधार पर दैवीय-नियति के रूप में स्वीकारे जाने के लिए  समाज की मानसिकता को ही अनुकूलित कर दिया गया।

    बात ज्ञान के ऊपर दावेदारी की हो, पौरुष के ऊपर दावेदारी की हो या व्यापार-प्रबंधन की दावेदारी की हो। भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था ने लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण-हत्या हर साल लगातार हजारों वर्षों तक की है और पूरी धूर्तता, कपट व सामाजिक/शारीरिक/मानसिक क्रूर-हिंसा के साथ की है।


    मित्र :  जी

    नोमेड :  सोचिये, यदि शोषक जातियों के बच्चों को पैदा होते ही जन्म के आधार पर बिना कुछ किए बैठे बिठाए ही महान, विद्वान, विशेषज्ञ व प्रतिष्ठित न माना जाता होता; तो उनको अपने पुरुषार्थ से विद्वता, विशेषज्ञता व प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए  समाज के वास्तविक विकास के लिए  अपनी ऊर्जा का प्रयोग करना पड़ता न कि शोषित जातियों का शोषण करते रहने के लिए नित्य नए कपटों व धूर्तताओं में लगाना पड़ता। शोषित जातियों के लोगों को पैदा होते ही वे तिरस्कृत व अपमानित होने के लिए  ही पैदा हुए हैं ऐसा स्वीकारते हुए शोषक जाति के लोगों की सेवा करने को ही जीवन-धर्म मानने को विवश किया गया।


    शोषित जातियों के लोगों को अपनी प्रतिभा को दिखाने का अवसर मिला होता तो संभव है कि दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक भारतीय समाज ने दे दिए होते। यदि जातियाँ न होतीं तो हो सकता है कि किसी ब्राह्मण जाति में पैदा होने वाले बच्चे की चमड़े के काम के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो संभव है कि उसने पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। यदि क्षत्रिय जाति में पैदा होने वाले बच्चे की लुहार-गिरी के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो लौह-यंत्रों की पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। ऐसे ही सैकड़ों-हजारों उदाहरण सोचे जा सकते हैं और बहुत ही सहजता से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि जाति-व्यवस्था ने कैसे प्रति वर्ष लाखों प्रतिभाओं की लगातार सैकड़ों हजारों वर्षों तक पूरी बेशर्मी व घिनौनी सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ भ्रूण हत्याएं की।


    भारत में जाति-व्यवस्था के कारण योग्यता व प्रतिभा को कभी सहेजा ही नहीं गया, ऊंची जातियों के बहुत ही सीमित दायरे में यदि कोई तुलनात्मक रूप से कुछ बेहतर निकल गया तो उसको हीरो के रूप में प्रायोजित कर दिया गया और यही तरीका आज तक भी लागू है।


    इन सामाजिक आरक्षणों से अपूरणीय क्षतियां हुईं, पूरा भारतीय समाज सड़ गया। भारत में वैज्ञानिक आविष्कारों और भारत के लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास की संभावननाओं का पतन हुआ।  भारत सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी और फिर मानसिक गुलामी में फँस गया। 


    मित्र :  संवैधानिक आरक्षण का विरोध कौन करते हैं, क्यों करते हैं।

    नोमेड :  जाति-व्यवस्था के हजारों वर्षों के काल में जबकि शूद्रों को समाज में मनुष्य की तरह जीने के मौलिक अधिकार भी नहीं थे, सैकड़ों हजारों वर्षों तक जिन्होंने शूद्रों को कुचला है और उसी कुचलते जाने के परिणाम स्वरूप आज तक जो संसाधनों व विभिन्न सत्ताओं के भोग करने के मजे ले रहे हैं। हजारों साल तक पारंपरिक व सामाजिक भ्रष्टाचार को महिमामंडित करते हुए जिन्होंने उनकी मेहनत का शिद्दत के साथ बिना उत्तरदायित्व के खाया है। इस वर्ग के प्रति थोड़ी सी भी ईमानदारी और प्रेम उनके साथ साझा करने की मानवीयता न दिखा पाने की जड़ता व असंवेदनशीलता भी जाति-व्यवस्था से ही आई है।


    संवैधानिक आरक्षण का विरोध केवल असंवेदनशील व स्वार्थ में अंधे लोग करते हैं।  जिनकी सामाजिक दूर दृष्टि नहीं और जिनके लिए  मानवीयता, न्याय व सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों के कोई मायने नहीं। योग्यता के नाम पर संवैधानिक आरक्षण का विरोध किया जाता है। जिसको योग्यता कहा जाता है वह तथाकथित योग्यता का मापदंड सरकारी नौकरी प्राप्त करने जैसी वाहियात और बेफिजूल की कसौटियों के आधार पर किया जाता है। शताब्दियों के सामाजिक आरक्षणों का भोग करते हुए तो योग्यता का कोई प्रमाण कथा कहानियों व प्रायोजनों से आगे नहीं बढ़ा और सरकारी नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण की बात आते ही, योग्यता का मुद्दा उठा दिया जाता है।


    दरअसल शोषक जातियों ने आज तक कभी शूद्रों को अपने समकक्ष मनुष्यों के रूप में स्वीकारा ही नहीं, कभी भी समाज को जाति-व्यवस्था से ऊपर उठकर देखने की चेष्टा ही नहीं की। जाति-व्यवस्था का विरोध केवल सरकारी नौकरियों में शूद्रों के हिस्से को खतम करने के लिए और राजनैतिक सत्ता में उनकी बढ़ती भागीदारी से डर कर किया जाता है। जो लोग इस दावे या भ्रम में जीते हैं कि भारत में सामाजिक रूप से “जाति-व्यवस्था” खतम हो रहा है, तो वे लोग खुद के ही बनाए हुए झूठों में जीते हैं और “जाति-व्यवस्था” जैसी सामाजिक विभीषिका को स्व-केंद्रित स्वार्थों से परे नहीं देखना चाहते हैं।


    ज्यों ज्यों शूद्र जातियाँ प्रशासनिक व राजनैतिक ताकत प्राप्त करतीं जा रहीं हैं, त्यों त्यों शोषक जातियों को समाज से “जाति-व्यवस्था” खतम होते दिख रहा है, इसलिए  “आरक्षण” व “जाति-व्यवस्था की राजनीति” का विरोध किया जाता है। दूर से देखने में भले ही सुंदर लगे कि यह विरोध “जाति-व्यवस्था” के विरोध में है। बहुत सुंदर तर्क भी दिए जाते हैं, किंतु यथार्थ में संवैधानिक आरक्षण के विरोध का आधार तो उनके अपने स्वार्थ ही हैं।


    मित्र : जी

    नोमेड :  सैकड़ों सालों तक शोषक जातियों ने अपना अधिकांश जीवन/मानसिक/सामाजिक ऊर्जा समाज के बहुसंख्य को अघोषित दास बनाए रखने में लगाया।  इससे पूरा समाज जड़ हो गया। शोषक जातियाँ भी और शोषित जातियाँ भीं। यदि मानवीयता व सामाजिकता के व्यापक संदर्भों में सूक्ष्मता से देखा जाए तो जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के स्तर तक पहुंचाया है। किंतु शोषक जातियों के लोग अपने विद्रूप अहंकारों और स्व-केंद्रित-स्वार्थ को जीवन का परम-लक्ष्य मानने के कारण, अब भी यह चिंतन करने को तैयार नहीं हैं कि भारतीय समाज भीषण रूप से जड़ हो चुका है, सड़ांध से भरपूर है। और इस सड़ांध के पराकाष्ठा तक पहुंचाने और समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, मूल्यों व भावों को जड़ करने व जड़ता में ही बनाए रखने में केवल और केवल जाति-व्यवस्था की परम्परा का ही हाथ रहा है।


    शोषक जातियों को बिना वास्तविक पुरुषार्थ के ही उपलब्ध समस्त विलासिताओं को भोगने की बड़ी भयंकर लिप्सा हमेशा से रही है और आज भी है। और इसी लिप्सा-भोग प्राप्ति के लिए  किए जाने वाले विभिन्न प्रायोजनों को हम सामाजिक परिवर्तन, समाज निर्माण व देश का विकास आदि के लुभावने नामों से प्रायोजित करते आए हैं। यह लिप्सा ही सामाजिक आरक्षण अर्थात् जाति-व्यवस्था का मूलभूत कारण रही और आज भी हमारे समाज की जड़ता के मूलभूत कारकों में से है।


    दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक मानने वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील मानने वाले लोगों में, जो शोषक जातियों के हैं, अपने स्वार्थ की लिप्सा व जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिए  घृणा का भाव रखते हैं, क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करने लगा है और शोषक जातियों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करने लगा है।


    मित्र :  समाधान कैसे होगा।

    नोमेड : समाधान तभी होगा जबकि जाति-व्यवस्था की विद्रूपता व गहरी जड़ों को ईमानदारी व बिना पूर्वाग्रह के सामाजिक उत्तरदायित्व पूर्वक न्यायपूर्ण भाव से समझने की चेष्टा की जाएगी। और ईमानदारी से समाधान की चेष्टा की जाएगी। बिना सामाजिक ईमानदारी के “जाति-व्यवस्था” का पत्ता भी नहीं हिलने वाला। शोषक जातियों की ओर से जब भी जाति-व्यवस्था के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- “ संवैधानिक-आरक्षण “ और “ जाति-व्यवस्था की राजनीति “।  दोनों ही मुद्दे शक्ति व सत्ता प्राप्त करने के अवयव हैं।


    यदि शोषक जातियाँ सच में ही सामाजिक ईमानदार होतीं और जाति-व्यवस्था को खतम करने के लिए थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करतीं तो जाति-व्यवस्था कब की खतम हो गई होती।  शोषक जातियों को केवल अपने अंदर से जाति-व्यवस्था की भावना वास्तव में खतम करनी है। इसके लिए बिना ढोंग के जीवंत रूप में जाति-व्यवस्था की भावना को गहरे से खींचकर खतम करने की जरूरत है। जो ईमानदार व मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अपने अंदर गहरे जमी हुई घृणा व जाति-व्यवस्था की श्रेष्ठता के छुपे हुए अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालने से ही संभव है। जाति-व्यवस्था लोगों के मन में बहुत गहरे स्थापित है जो शाब्दिक भाषणों, परिभाषाओं, लिखावटों आदि से खतम नहीं होगी।


    जाति-व्यवस्था का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ ईमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है। यह समाधान ही नए समाज, नए देश व नए सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर व वास्तविक होगें और बिना कपट व धूर्तता के होगें।

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से

    (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)

     

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • चाकलेट प्रेमियों के लिए: Yummsss (यम्म्‌स्स्स) हाथ से बनाई अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की चाकलेट, भोपाल, मध्यप्रदेश

    चाकलेट प्रेमियों के लिए: Yummsss (यम्म्‌स्स्स) हाथ से बनाई अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की चाकलेट, भोपाल, मध्यप्रदेश

    Vivek Umrao Glendenning

    मैं भारत में अपने मित्रों से कहा करता हूँ कि यदि भारत में हाथ से बनी अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की चाकलेट का स्वाद लेना है वह भी तर्कसंगत कीमत पर तो आपको Yummsss की चाकलेट खानी चाहिए। जैसा कि नाम में ही दिखता है Yummy का Yumm मतलब बहुत ही स्वादिष्ट, फिर sss मतलब बिना मुंह से कुछ बोले केवल स्वाद का आनंद लीजिए, पूरा नाम हुआ Yummsss.

    हुआ यूं कि अपने मित्र सचिन खरे व उनकी जीवन संगिनी ने सोचा कि क्यों न भारत में भी उचित कीमत पर हाथ से बनी असली चाकलेट लोगों को उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने चाकलेट के बारे में अध्ययन करना शुरू किया। महीनों तक इंटरनेट में घंटों-घंटों चाकलेट से संबंधित जानकारियों व उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन करते। कई देशों के लोगों से संपर्क करना शुरू किया ताकि इंटरनेट के बाहर की भी जानकारी उपलब्ध हो पाए।

    खरे दंपत्ति को अहसास हुआ कि भारत में चाकलेट के नाम पर सुगर (शक्कर/चीनी) खिलाई, पिलाई जाती है। चाकलेट के असली स्वाद से बहुत लोग परिचित ही नहीं है। असली चाकलेट स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है, जबकि भारत में बेची जानी वाली अधिकतर चाकलेट शरीर के लिए नुकसानदायक होती है। 

    Yummsss की शुरूअात:

    कम-ज्यादा लगभग डेढ़ साल पहले खरे दंपत्ति ने भोपाल में Yummsss के बैनर तले हाथ से बनी चाकलेट बनानी शुरू की। असली व बेहतरीन स्वाद के लिए यह लोग बेल्जियम से भी चाकलेट मंगाते हैं, फिर बेल्जियम चाकलेट से अपने घर में चाकलेटों के विभिन्न संस्करण तैयार करते हैं। मानव शरीर के लिए कौन सा तत्व बेहतर है, इसका अध्ययन करते हुए, विभिन्न प्रकार के स्वाद-संस्करण तैयार करते हैं। स्वाद-संस्करणों की विभिन्नता के लिए रसायनों का प्रयोग करने की बजाय प्राकृतिक रूप से उपलब्ध फल, मेवा, ड्राई-फ्रूट्स, फूल, पत्ती, रस इत्यादि का प्रयोग करते हैं। डार्क चाकलेट भी उपलब्ध कराते हैं।

    Yummsss बनाम बाजार व कीमत:

    खरे दंपत्ति चाहता तो भोपाल के किसी पॉश इलाके में चाकलेट की दुकान खोल सकता था। दुकान के किराए, दो चार पांच लोगों को दुकान की रखवाली करने के लिए रखते। इस प्रकार के ऊंचे आवर्ती खर्चों के कारण चाकलेट की कीमतें ऊंची रखनी पड़तीं। लागत निकालने के लिए चाकलेट का पुराना स्टाक प्रयोग करना पड़ता। खराब हो चुकी चाकलेट को बहुत अच्छा बताते हुए बेचना पड़ता। चाकलेट की कीमतें कम से कम रख पाएं, चाकलेट के स्वाद व गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ करने के लिए विवश न होना पड़े इसलिए इन्होंने चाकलेट की कोई दुकान नहीं खोली।

    इनका मुख्य उद्देश्य चाकलेट को उसके असली स्वाद व लाभदायक गुणों के साथ उपलब्ध कराना था। दंपत्ति ने विचार किया और निर्णय लिया कि जब तक बेहद आवश्यकता नहीं पड़ती है तब तक चाकलेट को घर में ही बनाया जाएगा व बिना किसी दुकान के आनलाइन बेचा जाएगा। घर में चाकलेट बनाते हैं, आनलाइन बेचते हैं। इनकी अपनी वेबसाइट है, जिस पर जाकर पूरे भारत से चाकलेट का आर्डर दिया जा सकता है। 

    Yummsss व सामाजिक जिम्मेदारी:

    खरे दंपत्ति चाकलेट से होने वाली आय का दस प्रतिशत से अधिक सामाजिक कार्यों में सहयोग करते हैं। समय-समय पर विकलांग, मूक, बधिर, अंधे व मानसिक रूप से अक्षम बच्चों के लिए स्वादिष्ट चाकलेट खिलाने का कार्यक्रम भी आयोजित करते रहते हैं।

    चलते-चलते:

    यदि मुझे भारत में किसी को मिठाई खिलानी होती है तो मैं यहीं सिडनी, आस्ट्रेलिया में बैठे-बैठे Yummsss की वेबसाइट में जाकर चाकलेटों का आनलाइन आर्डर कर देता हूँ। यदि आप चाहें तो आप अपने, अपने बच्चों, रिश्तेदारों, मित्रों व उनके बच्चों के जन्मदिनों में Yummsss की चाकलेट खिलाकर, उपहार देकर बच्चों को बेहतर चाकलेट उपलब्ध करा सकते हैं।

    शादी के पहले लड़के-लड़कियों की देखा-दूखी में भी Yummsss की चाकलेट खिलाकर दाम्पत्य जीवन की संभावनाओं की शुरूआत असली स्वाद से कर सकते हैं।

    आप में से जो लोग अफोर्ड कर सकते हों वे प्रतिदिन अपना दिन हाथ से बनी असली चाकलेट के स्वाद से शुरू कर सकते हैं।

    यदि आप Yummsss की चाकलेट खा चुके हैं या खाने वाले हैं तो स्वाद कैसा रहा, यह बताना न भूलिएगा।

  • यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो

    यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो

    Vivek Umrao Glendenning

    भारत के लोगों व राजनीतिक दलों के लिए दो बातें क्रिस्टल क्लियर साफ हैं। या तो आप सच में मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है या आप नहीं मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है। ईवीएम में छेड़खानी की जा सकती है या नहीं, यह चर्चा का वास्तविक मुद्दा बिलकुल भी नहीं हो सकता है क्योंकि दुनिया की कोई भी मशीन परफेक्ट नहीं। मुद्दा सिर्फ यह हो सकता है कि आप ईवीएम में छेड़खानी की जाती है, ऐसा मानते हैं या नहीं मानते हैं।

    यदि आप ईवीएम में छेड़खानी नहीं मानते हैं:

    यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी नहीं की जाती है तो चुनाव प्रक्रिया होते समय व चुनाव परिणाम आने के बाद ईवीएम को दोष देना बिलकुल भी उचित नहीं। चुनाव प्रक्रिया के समय व चुनाव परिणाम आने के बाद ईवीएम ईवीएम चिल्लाना बिलकुल ही गलत है।

    यदि आप ईवीएम में छेड़खानी मानते हैं:

    लेकिन यदि आप मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो सारे कामकाज छोड़कर केवल और केवल ईवीएम के विरोध में बहुआयामी व्यापक अभियान तब तक चलाया जाना चाहिए जब तक ईवीएम का प्रयोग पूरी तरह से हमेशा के लिए बंद न हो जाए।

    ईवीएम का विरोध करने के लिए फेसबुक व व्हाट्सअप इत्यादि में फर्जी क्रांतिकारी बनने, फर्जी क्रांतिकारिता का ढोंग करने, गाली बकने, लाइक करने, शेयर करने, कमेंट करने से कुछ भी नहीं होने वाला। आपको अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आना होगा, आपको वास्तविक धरातल पर आना होगा, आपको वास्तविक लोगों के बीच वास्तविकता में जाकर वास्तव में खतरे उठाते हुए संघर्ष करना होगा।

    यदि आपको शून्य दशमलव शून्य एक (0.01) प्रतिशत भी लगता है कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो आपको सारे कामकाज रोक कर सबसे पहले ईवीएम के प्रयोग के खिलाफ अनवरत अनथक अभियान चलाना चाहिए।

    जो जो राजनैतिक दल व मतदातागण वास्तव में ईवीएम के प्रयोग के विरोध के प्रति गंभीर हैं तो आपको बिना किसी नानुकुर व किंतु परंतु के प्रारंभिक चरण में निम्न कार्यक्रम तत्काल प्रभाव से करने ही चाहिए –

    • जिन जिन राज्यों में आपकी सरकारें हैं, वहां से स्तीफा दीजिए।
    • राजनैतिक दलों के सभी सासंदों व विधायकों को पूरे देश में एक साथ त्यागपत्र देना चाहिए, बिना किसी ढोंग या नौटंकी के।
    • ईवीएम के प्रयोग बंद होने तक किसी भी चुनाव में भागीदारी बिलकुल बंद कर देनी चाहिए।
    • चुनाव होने के समय स्थानीय स्तर व व्यापक स्तर पर असहयोग आंदोलन व जेल भरो आंदोलन चलाए जाने चाहिए, बिना किसी ढोंग या नौटंकी के।
    • ईवीएम के मुद्दे के अतिरिक्त किसी भी चुनावी मुद्दे पर कोई मीडिया चर्चा नहीं, मीडिया में चुनाव से संबंधित अन्य किसी मुद्दे पर चर्चा का पूरी तरह से बहिष्कार।
    • जिन मतदाताओं का मानना है कि ईवीएम में छेड़खानी होती है उनको भी चुनाव प्रक्रिया में असहयोग आंदोलन करना चाहिए।
    • जब तक ईवीएम का प्रयोग पूरी तरह से बंद न हो जाए तबतक किसी भी मनोविज्ञान व रणनीति के जाल से अप्रभावित रहना चाहिए।

    यदि आप बहानेबाजी करने की बजाय सच में ही यह मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी की जाती है तो केवल यही लोकतांत्रिक व समाधान का रास्ता है, ईवीएम के प्रयोग को बंद करवाने का।

    रास्ता मुश्किल है, गंभीर त्याग व संघर्ष भी मांगता है, लेकिन यदि इच्छाशक्ति से चले तो विजय सुनिश्चित है। रास्ता मुश्किल है लेकिन बहुत जल्द समाधान मिलेगा। कोई और रास्ता भी नहीं। सोशल नेटवर्किंग साइट पर क्रांति की नौटंकी तो बिलकुल ही बेबुनियाद व दिशाहीन रास्ता है। 

  • भारत के विकसित, समृद्ध व वास्तविक विश्वगुरू होने की कुंजी भारत की ग्रामीण कृषक महिला है

    भारत के विकसित, समृद्ध व वास्तविक विश्वगुरू होने की कुंजी भारत की ग्रामीण कृषक महिला है

    Vivek Umrao Glendenning

    हम MBA की पढ़ाई करके, इंजीनियरी की पढ़ाई करके, व्यापार करते हुए भले ही व्यापार में हम किसी दुकान में बैठकर चूरन की पुड़िया ही बेचते हों, अर्थशास्त्र पढ़ते या पढ़ाते हुए इत्यादि इत्यादि करते हुए व्यापार, आय, लाभ हानि, श्रम, उत्पादन, सर्विस सेक्टर, लागत इत्यादि की बहुत चर्चाएं करते हैं, गुणा गणित करते हैं।

    बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करते हुए लागत की गणना करते समय बारीक से बारीक चीज यहां तक कि किसी से बात करने, मीटिंग करने इत्यादि की भी गणना करते हुए  आय, लाभ, हानि व लागत इत्यादि का आंकलन करते हैं।

    इस लेख में मैं बहुत ही सरल गणित से आपको भारतीय समाज की सबसे अधिक उपेक्षित मानी जाने वाली ईकाई ग्रामीण कृषक महिला के बारे में बताता हूँ, वह भी जीवंत उदाहरण के साथ। वह ग्रामीण महिला जो काम करती है, लेकिन उपेक्षित है, कुशल प्रबंधक है लेकिन दोयम स्तर की मानी जाती है, योग्यता के साथ उत्पादन करती है लेकिन मूर्ख मानी जाती है, देश की इकानोमी की रीढ़ (बैकबोन) है लेकिन GDP में उसकी गणना तक नहीं होती।

    जो लोग शहरों में रहते हैं यहां तक कि महिलाएं भी, वे स्वयं को ग्रामीण महिलाओं की तुलना में श्रेष्ठ मानने, ग्रामीण कृषक महिलाओं को गवांर कहते हुए स्वयं से निम्नतर व दोयम स्तर का मानने की मानसिकता में जीते हैं। जिन महिलाओं के पति सरकारी नौकरी या ऊंचे वेतनमानों वाली प्राइवेट नौकरी में हैं, वे महिलाएं तो ग्रामीण कृषक महिलाओं को बिलकुल ही दोयम स्तर का मानने की मानसिकता में जीती हैं। जो महिलाएं नौकरी करतीं हैं भले ही दो चार पांच हजार रुपए की ही नौकरी क्यों न हो, ग्रामीण कृषक महिलाओं के प्रति उनकी मानसिकता के तो कहने ही क्या।

    यहां उन ग्रामीण महिलाओं की बात नहीं हो रही है, जो खाना बनाने, घर के दो चार कमरों में झाड़ू मारने, चार पांच कपड़े धोने में ही पूरा दिन गुजार देतीं हैं, हाय-तौबा ऊपर से। यहां उन ग्रामीण महिलाओं की बात हो रही है जो खाना बनाने, झाड़ू मारने, कपड़े धोने जैसे कामों को काम ही नहीं मानती हैं, इन कामों को चुटकी बजाते कर लेती हैं। इनकी दृष्टि में काम का मतलब उत्पादन से जुड़े हुए काम। श्रेणी अलग करने के लिए इस प्रकार की महिला को ग्रामीण कृषक महिला कह रहा हूँ।

    मैं उत्तर प्रदेश के दो भिन्न इलाकों की जिन दो ग्रामीण कृषक महिलाओं की चर्चा उदाहरण के लिए इस लेख में करने जा रहा हूँ। वे दोनों मध्यवर्गीय किसान परिवार से हैं। उनके पति भी किसान हैं, नौकरी नहीं, व्यापार नहीं। कृषि के अतिरिक्त आय का स्रोत नहीं। एक महिला पश्चिमी उत्तर प्रदेश से है व एक महिला मध्य उत्तर प्रदेश से है। हर जिले में आपको इन जैसी सैकड़ों हजारों ग्रामीण कृषक महिलाएं मिल जाएंगी। खेती की जमीन, जानवरों की संख्या व अन्य कारकों के कारण उत्पादन व आय में अंतर हो सकता है। ईमानदारी से गुनिए कि भारत की वास्तविक इकोनोमी  की वास्तविक रीढ़ (बैकबोन) कहां है, कहीं ऐसा तो नहीं कि सबसे उपेक्षित, सबसे तिरस्कृत, सबसे दोयम मानी जानी वाली ईकाई ही वास्तविक बैकबोन है।

    “धर्मवती” पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक ग्रामीण कृषक महिला (आय 60,000 रुपए महीना से अधिक):

    Dharmvati

    यह धर्मवती हैं, उम्र लगभग 52 साल है। गांव में रहतीं हैं। कभी कभार रिश्तेदारों से मिलने या कोई रिश्तेदार बीमार हुआ तो उसको देखने, उसकी सेवा करने इत्यादि के लिए शहर भले ही आ जाएं। पांचवीं तक पढ़ाई की है। घर में टीवी नहीं, फ्रिज नहीं, कार नहीं, एसी नहीं।

    यहां केवल उस आय की चर्चा हो रही है जो शुद्ध रूप से धर्मवती जी की मेहनत का परिणाम है।

    धर्मवती गाय भैंस पालती हैं, उनकी सेवा टहल अपने बच्चों की तरह करती हैं, उनके नखरे झेलतीं हैं। दूध, दही, घी, अचार, सिरका, छाछ व सब्जी का उत्पादन करतीं हैं। खेती के उत्पादन को नहीं जोड़ रहा हूँ क्योंकि उसमें घर के पुरुषों का भी सक्रिय सहयोग रहता है। जानवरों के खानपान की लागत को धर्मवती के खेती उत्पादन में श्रम के योगदान से पूरा किया जा सकता है, धर्मवती भी खेती में सक्रिय सहयोग करतीं हैं। इसलिए जानवरों के भोजन की लागत को आय में से नहीं घटा रहा हूँ।

    यहां उस घी या दही की बात नहीं हो रही है जिसमें बाजार से दूध खरीद कर गर्म करके मलाई रखकर गर्म करके फुर्सत में घी बना लिया गया। यहां बात पूरे उद्योग की हो रही है। जानवर की सेवा टहल से लेकर दूध का उत्पादन फिर दूध को घर में पारंपरिक विधियों से प्रोसेस करके घी, मक्खन, छाछ इत्यादि के रूप में उत्पादित करना।

    दूध, दही, छाछ, घी, मक्खन, सब्जी, सिरका, अचार इत्यादि का जितना भी उत्पादन बाजार में बेचने या घरेलू खपत के लिए धर्मवती अपनी मेहनत व कौशल से करतीं हैं। वह सालाना लगभग 750,000 (साढ़े सात लाख) रुपए है। यदि खेती से होने वाली कुल आय में धर्मवती के श्रम योगदान की गणना को भी संज्ञा में लिया जाए तो यह आय और अधिक बढ़ जाएगी। लेकिन चूंकि बात केवल धर्मवती की आय की हो रही है। तो मैं केवल उस आय की बात कर रहा हूँ जो धर्मवती की मेहनत व कौशल के कारण होती है।

    750,000 (साढ़े सात लाख) रुपए सालाना मतलब 60,000 (साठ हजार) रुपए महीने से भी अधिक जबकि खेती से होने वाली आय इसमें नहीं जुड़ी है। सरकारी प्राथमिक शिक्षक, सरकारी कर्मचारियों व ऊंची कंपनियों में नौकरी करने वाले प्रोफेशनल्स के वेतन से भी अधिक अर्थात 60,000 रुपए महीने से अधिक की आय करने वाली धर्मवती का अपना खर्च औसत लगभग 800 से 900 रुपए महीना है, जिसमें उनके कपड़े, जूते, चप्पल, लिपिस्टिक, क्रीम, बिंदी इत्यादि खर्च सम्मिलित हैं।

    “मनोरमा” मध्य उत्तरप्रदेश की एक ग्रामीण कृषक महिला (आय 60,000 रुपए महीना से अधिक):

    मनोरमा उम्र लगभग 40 वर्ष। गांव में रहतीं हैं। अपने छोटे भाई बहनों की परवरिश में मदद करतीं रहीं, उनके विवाह संपन्न कराए। सुबह चार बजे जगतीं हैं, रात में लगभग दस बजे सोती हैं। दिन में शायद ही कभी आराम करतीं हों। बारहवीं तक पढ़ाई की है।

    बारहवीं तक पढ़े होने के बावजूद बहुत जागरूक महिला हैं। गांव में बिजली होने के बावजूद घर में बिजली नहीं ली, सोलर पैनल से पूरे घर का काम चलता रहा। घर में टीवी, कूलर, फ्रिज, मोटरसाइकिल, कार, एसी नहीं। अभी पिछले साल घर में बिजली लगवाई, फ्रिज लिया। केवल दो लड़कियां हैं, लड़के के लिए कभी मंशा नहीं रही, दो लड़कियों के साथ बेहद खुश।

    [pullquote align=”normal”]दोनों लड़कियों को खूब मजे से रखतीं हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई का पूरा ध्यान। दोनों बच्चियां पढ़ने में बहुत अच्छी हैं। रोज गांव से साइकिल चलाकर दूसरे गांव में स्थापित स्कूल में पढ़ने के लिए भेजती रहीं। गांव के स्कूल में पढ़ने के बावजूद बड़ी लड़की ने दसवीं व बारहवीं की उत्तरप्रदेश बोर्ड परीक्षा में 85% से अधिक नंबर प्राप्त किए। दसवीं या बारहवीं में से किसी एक बोर्ड परीक्षा में शायद 90% के आसपास नंबर थे। आजकल आईआईटी इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही है। छोटी लड़की ने भी उत्तरप्रदेश बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में 85% से अधिक नंबर प्राप्त किए हैं। छोटी लड़की की इच्छा डाक्टरी पढ़ने की है। बड़ी लड़की को भारत सरकार से मेधावी छात्रों के लिए प्रोत्साहन वैज्ञानिकी पुरस्कार व छात्रवृत्ति भी मिल चुके हैं।  [/pullquote]

    बहुत लोग बच्चों से पढाई करने के नाम पर घरेलू काम नहीं करवाते हैं। मनोरमा की दोनों बच्चियां घरेलू व कृषि के कामों में सक्रिय भागीदारी करतीं आई हैं, अपने कपड़े वह भी हैंडपंप से पानी निकाल कर हाथ से धोतीं आईं हैं। इन सब कामकाजों को करते रहने के बावजूद पढ़ने में भी बहुत मेधावी रही हैं। खेती से होने वाली आय का पूरा हिसाब किताब इनकी दोनों बच्चियां ही बचपन से करतीं व रखती आईं हैं। लाखों रुपए का सालाना हिसाब किताब देखने के बावजूद आजतक कभी भी एक रुपए का झोल नहीं। माता-पिता व बच्चियां सभी आपस में विश्वास के साथ जीवन जीते हैं।

    मनोरमा की दोनों पुत्रियां खेतों में काम करते हुए

    चूंकि घर में बंदूक थी इसलिए इन दोनों बच्चियों ने सात-आठ साल की उम्र से ही बंदूक चलाना सीख लिया था। दोनों लड़कियां शालीन हैं, अपने काम से मतलब रखतीं हैं लेकिन स्वाभिमानी व आत्मविश्वास की धनी हैं। यदि किसी ने उटपटांग की बात की तो शालीनता के साथ उसकी समझ में आने वाली भाषा में जवाब हाजिर। गांव में बाकायदा छोटे बच्चों व बच्चियों की वानर सेना बना रखी है। कोई भी स्कूल आने जाने वाले बच्चों बच्चियों को परेशान नहीं कर सकता है। टेंपो टैक्सी बस वाले बच्चा समझ कर अधिक किराया नहीं वसूल सलते हैं। वानर सेना हड़कंप मचाती है। रोज शाम को वानर सेना गीत व नृत्य का कार्यक्रम करती है। शाम के पहले पढ़ाई होती है, रात में पढ़ाई होती है, सुबह जल्दी जगकर पढ़ाई होती है। सबकुछ स्वेच्छा से, कोई दंड नहीं, कोई दवाब नहीं, सहजता व सरलता के साथ।

    मनोरमा गाय भैंस पालती हैं। उनके घर की खेती इनके ही दम पर चलती है। केवल दूध, दही, घी, सब्जी इत्यादि के उत्पादन से ही घरेलू खपत व बाजार विक्रय की 70,000 रुपए से अधिक मासिक आय हो जाती है। इनका अपना व्यक्तिगत खर्च कपड़े, चप्पल, क्रीम, पाउडर इत्यादि का औसत 500 रुपए महीना है।   

    मनोरमा जानवरों के भोजन का इंतजाम करते हुए
    मनोरमा खेतों में काम करते हुए

    चलते-चलते:

    जब भी आपको अपने मन में यह लगे कि ग्रामीण कृषक महिला दोयम है, मूर्ख है, गवांर है, अजागरूक है या आपके किसी मित्र या जानने वाले की मानसिकता हो। आप अपने आसपास उपस्थित ऐसे हजारों उदाहरणों को देखकर अपने भीतर के अहंकार व विकृत मानसिकता को नियंत्रित कर सकते हैं। 

    भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भारत की ग्रामीण कृषक महिला है, न कि बड़े-बड़े कारपोरेट। भारत की सरकारों, समाज व लोगों को ग्रामीण कृषक महिला के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। उनके हित में नीतियां बनाकर क्रियान्वयित करना चाहिए, सबसे प्रमुख प्राथमिकता के साथ।

    भारत की ग्रामीण कृषक महिला बहुत बेहतर प्रबंधक, उद्यमी, कुशल व योग्य है। जरूरत केवल उसे सफल इंट्रेप्रेन्योर के रूप में स्वीकारने, सम्मानित करने व नीति निर्देशक के रूप में स्वीकारने की है।

     

  • खानपान, किवदंतियां, खानपान का मनोविज्ञान व हमारा शरीर

    खानपान, किवदंतियां, खानपान का मनोविज्ञान व हमारा शरीर

    दुनिया की कोई जलवायु हो, मानव शरीर के लिए जो आवश्यक तत्व हैं वे समान ही रहते हैं। प्रकृति ने जलवायु के आधार पर अनाज, फल इत्यादि बनाए हैं आदमी को नहीं बनाया। दुनिया का आदमी समान है। तभी आदमी किसी भी महाद्वीप, उपमहाद्वीप, देश, राज्य, जिला, गांव में जाकर रह सकता है। खाने पीने की आदतों व मान्यताओं के कारण एडजस्ट करने में परेशानियां भले ही आ जाएं, प्रकृति की ओर से ऐसा कोई अंतर नहीं है।

    आदमी धरती में यहां वहां भटकता रहा। जहां-जहां उसने अपना आशियाना बनाया वहां-वहां जो सहजता से उपलब्ध रहा उसके अनुरूप उसने अपनी आदतें बना लीं। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ नियम बना लिए। पुराने समय के नियम किवदंतियों व श्रुतियों के ऊपर आधारित थे, वैज्ञानिक दृष्टिकोण व शोधों पर नहीं। भारत में तो किवदंतियां, श्रुतियां व पोथियां आज भी विज्ञान पर पूरी तरह से हावी हैं।

    विज्ञान के विकास के साथ दुनिया के बहुत क्षेत्रों के लोगों ने अपनी परंपराएं बदल लीं, बहुत क्षेत्रों के लोगों ने पुराने तरीकों के खानपान को चिपकाए रखा, कुछ क्षेत्रों के लोगों ने परंपरा, संस्कृति इत्यादि के नाम पर अहंकार के साथ हानिकारक खानपान के तरीकों को जबरदस्ती चिपकाए रखा। अगली पीढ़ियां खामियाजा भुगत रहीं हैं। यह तो समाज व समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, कंडीशनिंग व दृष्टिकोण की बात है।

    शरीर यह नहीं समझता कि प्रोटीन, वसा, अम्ल, क्षार, विटामिन इत्यादि मांस से आया है या दाल से या अंडे से या बादाम से या दूध से या किसी और वस्तु से। शरीर को सिर्फ तत्वों से मतलब है, हम उन तत्वों को उपलब्ध कराने का माध्यम कुछ भी चुनें।

    माता पिता का शरीर कैसा था, क्या अच्छाईयां खराबियां थीं। माता ने गर्भावस्था में क्या खाया पिया। दुग्धपान के समय माता ने क्या खाया पिया। बच्चे को बचपन में कैसा आहार दिया गया। इन बातों पर भी मनुष्य के शरीर का चरित्र निर्धारित होता है। एक ही प्रकार की जलवायु में पूरा जीवन गुजारने वाले लोगों के शरीरों में विभिन्न अनाज, फल व सब्जी का भिन्न असर होता है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि शरीर को कैसे ढाला गया है।

    किवदंतियां भी मनोविज्ञानिक असर डालती हैं:

    बहुत बच्चे पूरा जीवन यह मानकर जीते हैं कि भूत होते हैं, उनको बाकायदा भूत दिखने का अहसास भी होता है। क्योंकि उनके मन में यह बिठा दिया गया है कि भूत होता है इसलिए उनका मस्तिष्क उनके शरीर व मन की चरित्र उसी प्रकार गढ़ लेता है।

    यही खाने के लिए भी लागू होता है। मैं बहुत लोगों को जानता हूँ जो कुछ भी इतर खा लेंगे तो उनको बीमारी सी महसूस होने लगती है। उनके दिमाग में लोगों की कहानियों, किवदंतियों इत्यादि ने बिठा दिया होता है कि यह खाने से ऐसा होता है, वह खाने से वैसा होता है।

    दुनिया के अधिकतर देशों के लोग, दुनिया की कुल जनसंख्या का 85% से भी अधिक का मुख्य भोजन चावल ही है, चाहे जिस भी जलवायु के हों, चावल ही खाते हैं। लेकिन भारत में बड़ी जनसंख्या वाले कई राज्य ऐसे हैं जहां बुखार आने पर, खासी, जुकाम होने पर वैद्य, हकीम, डाक्टर इत्यादि सबसे पहले चावल बंद करते हैं। जो कंडीशनिंग गहरे घुसी है वह निकाले नहीं निकलती है।

    दुनिया की 85% से अधिक जनसंख्या चावल खाती है, रोटी नहीं खाती। दुनिया को छोड़िए, भारत को ही लीजिए बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलांगाना व केरल जैसों राज्यों के लोग क्या करें। चावल न खाएं तो भूखे रहें। लेकिन भारत में ऐसे बहुत लोग हैं जिनके मन में यह बैठा हुआ है कि चावल नुकसान करता है, रात में नहीं खाना चाहिए, पता नहीं क्या-क्या। चूंकि मन में बैठा हुआ है इसलिए चावल देखते ही मन के माध्यम से शरीर में प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है, चावल खाने के बाद बीमार महसूस करने लगता है। ऐसा ही अन्य खाद्य पदार्थों से जुड़ी किवदंतियों से ग्रस्त मन के विकार के कारण होता है।

    मेरा रहन-सहन:

    मैं शाकाहारी हूँ, आप मुझे किसी भी जलवायु में शाकाहार में जो भी खाने योग्य उत्पाद हैं, कुछ भी खाने को दीजिए, मैं सबकुछ खाता हूँ, मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरा शरीर सामान्य रूप से काम करता रहता है। मैं बहुत ही कम बीमार पड़ता हूँ। मैंने व मेरी पत्नी ने दिल्ली में रहते हुए बिना दवाओं के डेगूं तक ठीक कर लिया था। मैं कई-कई वर्ष एक भी दवा नहीं खाता। जबकि शरीर की ऐसी तैसी भी खूब करता हूँ। कभी कभी 36-36 घंटे या 48-48 घंटे सोता ही नहीं हूँ, लगातार काम करता हूँ। कभी-कभी 24-24 घंटे गाड़ी चलाई है वह भी भीड़भाड़ वाले इलाकों में रात दिन दोपहर। शरीर बिलकुल ठीक से काम करता है। कभी बहुत ही अधिक मुलायम गद्दे कभी पथरीली जमीन, कहीं भी सोने को मिल जाए सो लेता हूं। कभी-कभी दिन-दिन भर पैदल चलना तो कभी सप्ताहों एक ही घर में रहना। कभी-कभी खड़े-खड़े ही सो लिया, कभी-कभी बैठे-बैठे ही सो लिया। चर्चा करते हुए बीच में दो-चार मिनट की नींद मार ली और फिर आगे के दस-बारह घंटों के लिए तैयार।

    मतलब यह कि शरीर ऐसा ढला हुआ है कि कभी भी किसी भी परिस्थिति के लिए हर पल तैयार। अभी तक तो ऐसा ही चल रहा है। अब आगे भविष्य में कुछ गड़बड़ हो तो नहीं कह सकता हूँ। आगे गड़बड़ की संभावनाओं को कम करने के लिए। शरीर के लिए आवश्यक तत्वों का अध्ययन करने में भी लगा हूं, ताकि तत्वों की डिफीशियंसी से शाकाहारी उत्पादों के सेवन से बचा जा सके।

    जब से आस्ट्रेलिया आया हूँ तबसे किस सब्जी में कौन सा तत्व होता है, किस फल में कौन सा तत्व होता है, किस मेवे में कौन सा तत्व होता है। इस सबका अध्ययन करता हूँ। फिर उसी हिसाब से शरीर को पोषक तत्व उपलब्ध कराता हूं। अपना तो प्रयास यही है कि शरीर लंबे समय तक सक्रिय बना रहे। चूंकि यहां इस प्रकार की सब्जियां, साग, फल व मेवे इत्यादि सहजता से उपलब्ध हैं, इसलिए शरीर की भी देखभाल करने के प्रयास में भी हूं।

    जब तक माता पिता के संरक्षण में रहता रहा तब तक हमेशा कमजोर रहा, बहुत कमजोर। क्योंकि मेरी माता किवदंतियों पर चलती हैं। नींबू नहीं खाना, टमाटर नहीं खाना, अचार नहीं खाना, मिर्च नहीं खाना। केवल लौकी, तरोई, कद्दू, पालक पानी व नमक में उबाल कर खा लीजिए। शरीर को इसके अलावा किसी तत्व की जरूरत नहीं। हमेशा बीमार रहा, दिन में पंद्रह से बीस तीस बार पेचिस जाने वाली स्थिति महीने में कम से कम पंद्रह दिन तो रहती ही थी। नारफ्लाक्स-टीजेड का एक दस टेबलेट वाला पत्ता मेरी जेब/पर्स/झोले में हमेशा पड़ा ही रहता था।

    जबसे माता पिता के संरक्षण में रहना छोड़ा तबसे शाकाहार में विभिन्न तत्वों वाले उत्पाद खाने शुरू किए। कभी कोई बीमारी नहीं हुई, उल्टे शरीर और दुरुस्त होता चला गया। जेब या पर्स में छोड़िए घर में दवा नहीं मिलेगी। नारफ्लाक्स-टीजेड तो भूल ही चुका हूँ कि क्या चीज होती है।

    सामाजिक कार्यों को करते हुए हजारों गावों में गया। हजारों गांवों में पानी पिया, खाना खाया, सोया। कभी बीमार नहीं हुआ। कभी थकावट महसूस नहीं की। आप मेरे जमीनी साथियों से पूछ सकते हैं, मेरी जीवन शैली के बारे में।

    कहा जाता है कि ठंठा गरम एक साथ नहीं पीना चाहिए। मुझे आप पहले ठंठा फिर गरम, पहले गर्म फिर ठंठा कैसे भी दीजिए कोई फर्क नहीं पड़ता। सर्दियों में फ्रिज का पानी गटकता हूँ, बर्फ चूसता हूँ। दो-दो दिन का फ्रिज में रखा खाना, फ्रिज से निकाल कर बिना गर्म किए ठंठा ही खाता हूँ, कोई फर्क नहीं। कहा जाता है कि मूली रात में नहीं खानी चाहिए, बहुत नुकसान करती है। मैं रात में खूब मूली खाता हूँ, कभी कोई परेशानी नहीं।

    चलते-चलते:

    मुझे आप किसी भी जलवायु वाले इलाके में कुछ भी शाकाहार खाने को दे दीजिए सब पचा जाता है। मेरा तो अभी तक का पूरा जीवन ही गुजरा है यात्राएं, यात्राएं और यात्राएं करते हुए, विभिन्न जलवायुओं के इलाकों में रहते हुए। मैने आजतक कभी भी किसी भी गांव में खाना परोसने वाले से यह नहीं कहा कि मैं यह नहीं खाता या मुझे फलानी चीज नुकसान करती है। मैं शाकाहार में जो भी खाने योग्य वस्तु परोस दिया गया है, वह मैं खा लेता हूँ। हां खाना परोसने वाले व खाना खिलाने वाले का भाव जरूर जानना समझना चाहता हूँ। यदि कोई भार समझ कर खाना खिलाता है, परोसता है तो मैं उसके यहां खाना कम खाता हूँ या संभव हुआ तो कोई बहाना बना कर खाना खाने से मना कर देता हूँ, भूखे रहना पसंद करता हूँ। मेरा मानना है कि भोजन भले ही बिलकुल साधारण हो लेकिन प्रेम से बनाया व खिलाया जाना चाहिए।


  • Video: आदि का स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलना व उल्टा चढ़ना

    Video: आदि का स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलना व उल्टा चढ़ना

    लगभग साढ़े सात महीने की आयु में पहली बार दो कदम अपने आप चले। आठवें महीने में दोनों हाथों की मेरी उंगलियां पकड़ कर चलने लगे। दसवें महीने में सिर्फ एक उंगली पकड़ कर चलने लगे। एक-एक दिन में कई-कई किलोमीटर चल जाते। 


    आदि बिना किसी ट्रेनिंग के एक झटके में सीढ़ियां चढ़ना शुरू किए, एक झटके में ही एक दिन सीढ़ियां उतरना भी शुरू किए। यूं लगता है आदि अपने मन के अंदर आब्जर्व करते हुए सीखते रहते हैं, आब्जर्व करते हुए एक दिन जब उनको विश्वास हो जाता है कि वे ऐसा कर सकते हैं तब वे एक झटके में कर जाते हैं या कर डालने का प्रयास करते हैं।


    आदि कुछ दिन बाद साढ़े पंद्रह महीने के होगें। अब आदि पार्क में आदि स्लाइडर में फिसलने के लिए लोहे की ऊंचे-स्टेप वाली सीढ़ियां अपने आप चढ़ते हैं, फिर स्लाइडर से अपने आप नीचे फिसलते हैं। फिर स्लाइडर में फिसलन की ओर से ऊपर चढ़ने का प्रयास करते हैं। थकने पर पानी पीने जाते हैं। 


    इन सभी गतिविधियों को इस वीडियो में देखा जा सकता है। 

  • Video: जोखिम उठाने वाला “आदि”

    Video: जोखिम उठाने वाला “आदि”

    आदि को ज्यों ही यह अनुमान लग जाता है कि वह ऐसा कर सकते हैं, तब वे बिना डरे वैसा कर गुजरने की इच्छाशक्ति रखते हैं। पार्क में खेलने आते समय उन्होंने कई बार देखा कि सात-आठ वर्ष के बच्चे लकड़ी के इन लाग्स के ऊपर संतुलन बनाते हुए चलते हैं। आदि की इच्छा रहती रही कि वे भी ऐसा करें लेकिन समझ गए कि अभी वे ऐसा नहीं कर सकते हैं। बहुत दिनों से मन ही मन में गुणा-गणित लगा रहे होंगे, चुपचाप आब्जर्व कर रहे होंगे, अपनी शारीरिक क्षमता को नाप-तौल रहे होंगे। दो दिन पहले उनको लगा कि वे ऐसा कर सकते हैं इसलिए जोखिम लिया जा सकता है। वीडियो को देखकर स्वयं ही आनंद लीजिए, आदि की एक नई गतिविधि का, जोखिम लेने के साहस का।

     

  • Video: पढ़ाकू आदि

    Video: पढ़ाकू आदि

    ज्यों ज्यों आदि बढ़े होते जा रहे हैं उनकी रुचि किताबों में बढ़ती जा रही है। अपना काफी समय किताबों के साथ गुजारते हैं, वह भी आपके बिना अपने हिसाब से। आदि अब हर समय आपके साथ रहना नहीं चाहते हैं, आपको आपकी जगह छोड़कर अपने पसंदीदा कोनों में जाकर अपनी किताबों के साथ समय गुजारना भी पसंद करते हैं। कभी कभार आदि लगभग आधा घंटा या अधिक समय भी अकेले अपनी किताबों के साथ अपने हिसाब से गुजारते हैं। अपनी पसंद की किताबें निकाल कर उनके पन्ने उलटते हुए पढ़ते रहते हैं। लगभग 6 मिनट का यह वीडियो आपको रुचिकर भी लग सकता है या बोरियत वाला भी। 

  • आदि व टोस्ट – अपना काम खुद करने का गर्व

    आदि व टोस्ट – अपना काम खुद करने का गर्व

    आदि की टोस्ट खाने की इच्छा थी। आदि के लिए टोस्ट का छोटा सा डिब्बा किचन बेंच पर रखा रहता है। जब उनको खाने की इच्छा हो वह मांग सकते हैं या खुद अपने सीढ़ीदार स्टूल पर चढ़कर हाथ बढ़ा कर ले सकते हैं। शायद आदि की टोस्ट खाने की इच्छा रही होगी, इसीलिए आदि पहले सीढ़ीदार स्टूल पर चढ़े, हाथ बढ़ाया लेकिन टोस्ट-डिब्बा उनकी पहुंच से दूर था। अब आदि के सामने दो विकल्प थे, आदि मुझे आवाज लगाते या किसी तरह डिब्बे तक पहुंचने का जुगाड़ स्वयं करते। आदि ने दूसरे विकल्प को चुनते हुए प्रयास करने का निर्णय लिया।

    आदि स्टूल से किसी तरह नीचे उतरे (कभी कभार जुगाड़ जमाकर उतर लेते हैं नहीं तो हमको आवाज लगाते हैं, उनको अच्छा लगता है जब हम उनको हवा में उड़ाते हुए उनके सीढ़ीदार स्टूल से नीचे उतारते हैं)।

    स्टूल से अपने आप नीचे उतर कर, अपनी छोटी सी डायनिंग कुर्सी पर चढ़े, कुर्सी से अपनी डायनिंग मेज पर चढ़े, अब टोस्ट-डिब्बे की ओर अपना हाथ बढ़ाया, यहां से टोस्ट-डिब्बे तक पहुंच गए। यदि न भी पहुंच पाते तो हमें तो आवाज लगाकर डिब्बा मांग ही लेते। लेकिन अपना काम खुद करने की खुशी आदि के लिए अलग ही रही।

    हमारी ओर देख कर खूब जोर की आवाज लगाई और बहुत अधिक खुशी व गर्व के साथ हमको अपना टोस्ट डिब्बा दिखाए। आदि को अपने काम खुद करने व हमारे कामों में सहयोग करने में बेहद खुशी होती है। कामों को अपनी उपलब्धि के तौर पर लेते हुए खुशी भी महसूसते हैं।

    आदि
    (उम्र 15 महीने 10 दिन)