Author: संपादक मंडल

  • इवांका मसले से निकली बात : मोदीजी बनाम हमारी सैडिस्टिक-सोच

    इवांका मसले से निकली बात : मोदीजी बनाम हमारी सैडिस्टिक-सोच

    [thrive_headline_focus title=”Vivek Umrao Glendenning” orientation=”right”]

    मोदीजी व सेल्फी

    लगभग पांच वर्ष पहले हमारी मित्र सूची में एक मुस्लिम तथाकथित पत्रकार हुआ करते थे। बहुत लोग इनकी पोस्टें साझा करते रहते हैं, हमको भी इनकी पोस्टें लटक-लुटक कर मिलती रहतीं हैं जबकि इनकी पोस्टों को देखकर ही हमको इनकी सैडिस्टिक सोच से मितली आती है। इन महाशय की शान में कसीदे पढ़ने को गाहे बगाहे मिलते रहते हैं, लोग बाकायदा अपनी पोस्टों में पत्रकारिता के लिए रैंक देते हैं, वह बात अलग है कि पत्रकारिता वास्तव में क्या है इसका ककहरा तक न पता हो, लेकिन रैंक देने के लिए पिले पड़े रहेंगे।

    पत्रकारिता के नाम पर बहुत लोग इनके नाम की कसमें तक उठाते हैं। बीमार मानसिकता के लोगों का बीमार आदर्श। यह महोदय मोदीजी के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं। मोदीजी की सेल्फी प्रेम का उपहास उठाते रहते हैं। मोदीजी को गाली देना ही इनकी जागरूकता, सामाजिक प्रतिबद्धता व क्रांतिकारिता मानी जाती है। यही महोदय पांच वर्ष पहले अपनी एक पोस्ट में बड़े फक्र के साथ यह बता रहे थे कि कैसे उनको एक एसडीएम ने चाय पिलाई। इनके लिए एक एसडीएम के साथ चाय पीना जीवन की उपलब्धियों में से थी। पहले एसडीएम के साथ चाय पीने को बेंचेंगे, फिर डीएम के साथ, फिर कमिश्नर के साथ, फिर सचिव के साथ, फिर मुख्यमंत्री के साथ।

    मोदीजी के सेल्फी प्रेम का उपहास उड़ाने वालों का खुद का अपना स्तर क्या है, इसकी भी बात होनी चाहिए।

    यह कौन सी बात हुई कि आप किसी प्रधान के लिए पलकपावड़े बिछा दें। आपके घर में इलाके का ब्लाक स्तर का अधिकारी आ जाए या एसडीएम के साथ चाय पी लें या ऐसा ही कुछ-कुछ और हो जाे तो आप खुद को महान समझने लगें। इसको छोड़िए आपका बच्चा किसी महंगे स्कूल में पड़ने जाता हो तो आप खुद को तोप मानने लगें। यह भी छोड़िए आपका बच्चा अपने स्कूल की क्लास में अच्छे नंबर पा जाता है तो आप चौड़े से अंकतालिका की सेल्फी लेकर अपने लिए सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं। बच्चे की मेहनत पर अपना कब्जा जमाते हैं, पूरी निर्दयता व बेशर्मी के साथ। खुद तो जीवन में पहचान बना नहीं पाए लेकिन बच्चे की मेहनत से अपनी पहचान खोजते हैं। बच्चे की मेहनत से अपनी पहचान खोजने की बीमार मानसिकता के कारण बच्चे को कितना तनाव देते हैं, कितनी हिंसा करते हैं, उसका बचपन मार डालते हैं।

    हममें से हजारों लोग जनरल डिब्बों में भेड़ों की तरह नर्कीय यात्रा करते हुए मुंबई जाते हैं। आंधी, वर्षा, तूफान, गर्मी, सर्दी में भूखे प्यासे सिनेमा में रद्दी अभिनय करने वाले अभिनेताओं व अभिनित्रियों के घरों के सामने उनकी एक झलक पाने के लिए घंटों, दिनों, सप्ताहों, महीनों खड़े रहते हैं। अभिनेता या अभिनेत्री हाथ की उंगलियों को हल्की सी जुंबिश भी दे देता है तो हम अपना जीवन धन्य मान लेते हैं। 

    हमें अपनी इन टपोरी छिछली व बीमार मानसिकता वाली सेल्फियां नहीं दीखती हैं। लेकिन यदि मोदीजी जापान, चीन या अमेरिका के राजनेताओं के साथ सेल्फी ले लेते हैं तो हमें बड़ी परेशानी होती है। हमें अपना गिरेबां भी झांकना चाहिए।

    मोदीजी व लखटकिया सूट

    हम आदमी का मूल्यांकन उसके कपड़ों से करने की बीमार मानसिकता में जीते हैं। यदि किसी ने महंगा ब्रांडेड कपड़ा पहन रखा है, महंगा ब्रांडेड जूता पहन रखा है तो हम उसको बड़ा आदमी मानते हैं, उसको आदर देते हैं। यदि किसी ने सस्ते कपड़े व सस्ते चप्पल पहन रखे हैं तो उसे छोटा आदमी मानते हैं। तिरस्कृत करते हैं, दुत्कारते हैं। उसको चोर उचक्का उठाईगीर मान लेते हैं।

    महंगे कपड़े व जूते पहनने के लिए हम भ्रष्टाचार करते हैं, दलाली करते हैं, बेईमानी करते हैं, झूठ बोलते हैं, फरेब करते हैं, शोषण करते हैं, हिंसा करते हैं। यदि मोदीजी लखटकिया सूट पहनते हैं तो हमें परेशानी क्यों होती है। मोदीजी तो हमारी ही मानसिकता का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं।

    मोदीजी व डिग्री

    बहुत लोगों को मोदीजी के इतिहास ज्ञान व उनकी डिग्रियों के संदर्भ में बहुत तकलीफ रहती है। चाहे व दक्षिण भारत हो या उत्तरी भारत। उन्नीस बीस, ढका-मुंदा सभी जगहों पर शिक्षा के नाम पर जमकर मजाक होता है, फर्जीवाड़ा होता है। वह बात अलग है कि बदनाम केवल बिहार ही होता है। बिहार बदनाम इसलिए होता है क्योंकि वहां लालू प्रसाद यादव जैसे नेता सबकुछ खुलासे में करने लगते हैं, बिना लाग-लपेट के। लालू सचिन तेंदुलकर से कह देते हैं कि आइए आपको डिग्री हम अपने राज्य से दिलवा देते हैं। लालू यादव गांव से हैं, एडीकेट नहीं जानते हैं, हर बात को राजनैतिक हानि-लाभ से जोड़कर देखते हैं। प्लीज, थैंक्यू, एक्सक्यूज मी जीवन में शायद ही कभी किसी को कहे हों। राबड़ी जी को प्रेम में चुटकी लेते हुए बोल देते हों तो बात अलग है।

    जो जानकार हैं, जिनके सोर्स हैं, जिनके पास जानकारियां रहतीं हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि दिल्ली व मेट्रो शहरों के नामचीन स्कूलों जिनके बच्चे भारत टाप करते हैं, वे स्कूल वास्तव में कितनी गहराई व चतुराई से शिक्षा के फर्जीवाड़े के दलदल में घुसे हुए हैं। सारा फर्जीवाड़ा बहुत ही सूक्ष्म रूप में, बेहद व्यवस्थित रूप से, बहुत सुरक्षित नेक्सस के रूप में होता है। आप फर्जीवाड़े की एक चिंदी तक साबित नहीं कर सकते, जबकि पूरा तंत्र ही फर्जीवाड़े में जमाने से लिप्त है।

    लाखों छात्र हर साल नकल करते हैं, पेपर लीक करवाते हैं, अपनी जगह किसी और को बैठाल कर परीक्षा दिलवाते हैं। लाखों लोग हर साल गेसपेपर रट कर परीक्षाओं में अच्छे नंबर लेकर आते हैं। यूनिवर्सिटीज, डिग्री कालेज खुलेआम नकल करवाते हैं। छात्र बढ़िया नंबर पाते हैं। अभिभावकों को कोई तकलीफ नहीं। अभिभावक अच्छे नंबरों के लिए रुपिया खर्च करने को तैयार। इंटर पास करते ही प्राइवेट इंजीनियरी, मेडिकल, प्रबंधन व बीएड इत्यादि कालेजों में सीटें खरीदने को कमर कसे तैय़ार। जिसका जुगाड़ हुआ वह सरकारी संस्थानों में जुगाड़ लगाता है। जिनकी पहुंच बहुत ऊंची है वे आईआईटी व आईआईएम में भी चौड़े से प्रवेश पाते हैं।

    [pullquote align=”right”]भारत में एक भी नौकरशाह ऐसा नहीं होगा जो वास्तव में स्पष्ट व सूक्ष्म ईमानदार हो, संभवतः अपवाद भी नहीं। ईमानदारी केवल नेक्सस के बाहर के लोगों के सामने प्रस्तुत की जानी वाली वस्तु है। श्रेणी, स्तर, भूख का स्तर, तौर-तरीके, आकार-प्रकार इत्यादि के चरित्र, प्रकार इत्यादि भिन्न हो सकते हैं। [/pullquote] डिग्री मिलने के बाद लाखों रुपए खर्च करके नौकरियों के शिकार में जुट जाते हैं। नौकरियों के लिए पूरे सरकारी तंत्र को भ्रष्ट करने को कटिबद्ध। एक जमाना था जब सरकारी छापेखाने का चपरासी के भी घर का हर सदस्य IAS हो जाता था। IAS में अब भी झोल होते हैं लेकिन बेहद सुव्यवस्थित नेक्सस से। चिंदी भी साबित करना नामुमकिन। जैसे चेतना को केवल महसूस किया जा सकता है, साबित नहीं किया जा सकता है। वैसे ही इन नेक्सस को महसूस किया जा सकता है, साबित नहीं। भारतीय सरकारी ढांचों में नेक्सस ही चेतना है।

    बारहवीं व स्नातक के बाद शहरों में ककुरमुत्तों की तरह उगी हुई कोचिंगों को क्या कहेंगे? लाखों रुपए साल की फीस, छात्रों के रहने खाने के लिए इलाके के लोगों ने अपने घरों में छोटे-छोटे कमरे निकाल कर लाखों रुपए महीना का स्थाई कारोबार बना रखा है, बाकायदा कोचिंग वालों को कमीशन भी जाता है। व्यवस्थित बाजार। छोटे शहरों के लोग भी चाहते हैं कि उनके घर के आसपास कोई संस्थान खुल जाए ताकि वे भी छात्रों को किराए में कमरे देकर पैसा कमा सकें।

    फर्जी डिग्रियां, फर्जी जाति प्रमाणपत्र, फर्जी डोमेसाइल बनवा कर लोगों ने नौकरियां पाईं/पा रहे हैं। मोदीजी की डिग्री से ही परेशानी है। मोदीजी से इस व्यक्तिगत खुन्नस का कारण क्या? उन्होंने आपकी कौन सी भैंस खोल ली थी। किसको लेना देना है शिक्षा व शिक्षा स्तर से। सबका एक ही लक्ष्य, किसी तरह से पैसा कमाना। शिक्षा का लक्ष्य पैसा कमाना। शिक्षा देने का लक्ष्य पैसा कमाना, अय्याशी करना।

    मोदीजी व लड़की की जासूसी

    ऐसी खबरें सुनने में आतीं रहीं कि मोदीजी ने मुख्यमंत्री रहते हुए किसी लड़की को प्रेम किया, उसकी जासूसी करवाई। इन खबरों में सच्चाई कितनी है मुझे बिलकुल नहीं पता।  मैं इतना जानता हूँ कि अपवाद प्रतिशत छोड़कर अधिकतर नेताओं, नौकरशाहों व व्यापारियों के अपनी पत्नियों से अलग महिलाओं से यौन रिश्ते होते हैं। बहुतों की बाकायदा घोषित/अघोषित रखैंले हैं। जिसकी जितनी औकात व क्षमता है वह उतनी रखता है। रखैलों से बाकायदा संताने हैं। दूसरों से उनकी पत्नियों को छीन कर अपनी रखैलें बनाईं हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि भारत में अपवाद प्रतिशत छोड़कर अधिकतर युवा लड़की पटाते हैं। मारपीट करते हैं। लड़कियों का पीछा करते हैं। पूरे फिल्मी अंदाज में। छेड़खानी करते हैं।

    मोदीजी ने यदि किसी लड़की को प्रेम किया भी तो क्या परेशानी, इतनी हाय तौबा क्यों…बहुत ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने अपनी पहली पत्नियों को छोड़ा और नईं नईं पत्नियां बनाईं। न केवल नईं नईं पत्नियां बनाईं बल्कि उनसे हुई संतानों को राजनीति में आगे भी बढ़ाया।

    मोदीजी व इवांका

    दुनिया के विकसित देशों में यदि इवांका जाएं तो उनको कोई नहीं पूछेगा। जैसे सामान्य पर्यटक आते हैं वही स्तर रहेगा उनका। लेकिन हमारा समाज ऐसा नहीं है। हमारे समाज का ढांचा बिलकुल अलग है। हमारे यहां ज्ञानी की संतान ज्ञानी होती है (ब्राह्मण), बहादुर की संतान बहादुर होती है (क्षत्रिय), अर्थशास्त्री की संतान अर्थशास्त्री होती है (वैश्य) व गुलाम की संतान गुलाम होती है (शूद्र)। 

    हमारे यहां बच्चों के माता पिता क्या हैं इसके आधार पर उनका मूल्यांकन होता है। बच्चे की अपनी गुणवत्ता का कोई मायने नहीं होता है। मेरा ही उदाहरण ले लीजिए, मेरे माता पिता की नजरों में मैं हरामखोर हूँ तो मेरा पुत्र आदि भी उनकी नजरों में हरामखोर है।

    जब नितीश कुमार जी ने राजद से अलग होकर सरकार बनाई तो हमने रातोंरात लालू प्रसाद जी की संतानों को भारत के महान राजनेताओं के रूप में प्रतिष्ठित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नितीश कुमार द्वारा लागू की गई अनेक सामाजिक हित की नीतियां कूड़े के भाव में। लालू जी क्रांतिकारी नेता रहे तो हमने उनकी संतानों को भी बैठे बिठाए क्रांतिकारी नेताओं के रूप में स्थापित कर दिया। सिर्फ इसलिए क्योंकि वे लालू जी के पुत्र हैं। लालू जी की संतान होना ही पर्याप्त है। दो चार लाइन के कुछ सवाल पूछ लेना, एक दो छोटे-मोटे भाषण ही पर्याप्त से अधिक हैं, भारत के सबसे जागरूक, महान व प्रगतिशील सोच के राजनेता हो पाने के लिए।

    लालू जी ही क्यों पूरे भारत में अनेक पार्टियों के राजनेताओं की संतानें अपने माता-पिता की गद्दी संभालती मिल जाएंगीं। न संभाल पाएं गद्दी तब भी विधायक सांसद तो हो ही जाते हैं। पत्नियां हो जातीं हैं, बहुएं, बेटियां माताएं भी विधायक सांसद हो जातीं हैं। और हम लोग उनकी संतानों की शान में कसीदे पढ़ते हुए। बाकायदा तेल-पालिश करते हुए, बटरिंग करते हुए, उनके लिए जीने मरने की कसमें खाते हुए।

    भारत के पर्यटन इलाकों में हजारों युवा विदेशी महिला के साथ फोटो खिचाने को लालायित रहता है। अपने घर की महिलाओं के साथ गाली गलौच करेगा लेकिन विदेश महिला के सामने निहायत सभ्य होने का ढोंग करता है।

    मोदीजी ने दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी की गोरी-चिट्टी, लंबी-तगड़ी बेटी को यदि ठीक से खाना खिला दिया, ठीक से हाय हेलो कर दी। तो इसमें परेशानी क्यों…. इतनी भी खुन्नस किस बात की।

    मित्र की बेटी को अपनी बेटी की तरह प्रेम करना, स्वागत करना गुनाह कब से हो गया। यह तो भारत की पुरानी परंपरा है। यहां तो गांव की बेटी को अपनी बेटी मानने की परंपरा रही है।

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    चलते-चलते

    यह भी गजब है, बहुतों को गांधीजी से खुन्नस आपको मोदीजी से खुन्नस। फर्क क्या। चरित्र तो एक ही हुआ।

    मोदीजी को आपने चुना है। मोदीजी बंपर बहुमत से सरकार बनाकर आए हैं, आप यह नहीं कह सकते कि आपने नहीं बल्कि आपके पड़ोसी न चुना है। सच यही है कि मोदीजी को आपने केवल इसलिए चुना है क्योंकि मोदीजी में आपको अपना अक्श दिखाई दिया। आपको लगा कि अपने जैसा आदमी आएगा तो फुलटू मौज रहेगी, जीवन अय्याशी व लफ्फाजी से सराबोर रहेगा।

    फेसबुक, व्हाट्सअप व अन्य सोशल मीडिया में मोदी जी के खिलाफ अभियान चलता हैI लोग कापी पेस्ट फारवर्ड करते हुए खुद को किरांतिकारी, जागरूक व सामाजिक ईमानदार जिम्मेदार, प्रतिबद्ध मान लेते हैंI लेकिन हममें से कितने ऐसे हैं जो अपने भीतर के खोखलेपन व बेहद विकृत व बीमार सैडिज्म को देख पाते हैं, सैडिज्म से दूर हो पाने की बात तो कल्पनातीत है।

    सारा मामला खांचों का, कौन किस खांचे में है व सैडिस्टिक मानसिकता का। स्वयं के भीतर के सैडिज्म को देखने व स्वीकारने की हिम्मत होनी चाहिए। दरअसल जब तक आप स्वयं उसी चरित्र के होते हैं जिस चरित्र का विरोध करने का ढोंग कर रहे होते हैं तब तक आप वास्तव में विरोध करते हुए भी विरोध की बजाय पुष्टीकरण ही कर रहे होते हैं।

  • Video: आदि, किताबें व आदि का अपना पुस्तकालय

    Video: आदि, किताबें व आदि का अपना पुस्तकालय

    लगभग एक मिनट के इस वीडियो में  आपको आदि के चेहरे व व्यवहार के कई आयाम दिखाई देंगे। यह वीडियो आपको आनंद देगा यह मेरा विश्वास है। कैसे आदि अपनी पसंद की किताब लाने के लिए आपकी बताई किताब का नाम मटेर देते हैं। कैसे उनकी पसंद की किताब बताने पर खुशी मन से किताब लाने जाते हैं। आपकी बताई किताब लाने के बावजूद, आपसे वही किताब पढ़ने को कहते हैं जो किताब वह पढ़ना चाहते हैं।

    एक समय था जब आदि लगभग आठ महीने के थे, तब बिस्तर में ढेर लगी किताबों में से किताब का नाम बताने पर किताब निकाल कर देते थे। फिर समय आया जब वे दूसरे कमरे में से नाम बताने पर किताब लाकर देने लगे। अब समय आ गया है जब आदि अपनी पसंद की किताब लाकर देने लगे हैं। आपकी जिद पर पसंदीदा किताब ला तो देते हैं लेकिन किताब कौन सी पढ़नी है, यह आदि ही तय करते हैं।

  • मेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे की कहानी

    मेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे की कहानी

    Vivek Umrao Glendenning

    प्रस्तावना परिचय

    प्रस्तावना परिचय से आगे:
    इसी काल में शुरू होती है पूर्वी उत्तर प्रदेश के पिछड़े इलाके के गांव के रमाशंकर पाण्डे की। उन रमाशंकर पाण्डे की, जिन्होंने मुझे तब सहारा दिया जब मुझे चारों तरफ से लातें पड़ रहीं थीं। रमाशंकर पाण्डे एक पिछड़े गांव के सामान्य किसान परिवार से हैं। इनके कई भाई हैं। जयशंकर पाण्डे इनके सबसे बड़े भाई, मेरे सामाजिक मित्र रहे। मेरे व रमाशंकर पाण्डे के बीच संबंधो का रास्ता यही जयशंकर पाण्डे थे। रमाशंकर पाण्डे उन दिनों बनारस के सर्वसेवासंघ में रहा करते थे। दो कमरे, एक रसोई व एक शौचालय।

    मैंने आईआईटी कानपुर के भौतिकी के प्रोफेसर एच सी वर्मा जी से बात की, उनको परिस्थितियों व माता-पिता द्वारा बेदखली से अवगत कराया। उनका कहना हुआ कि मैं भारत के जिस शहर में जाना चाहूं, जैसी भी कोचिंग करना चाहूँ या मैं किसी गांव जाकर वहां कुछ करना चाहूँ तो वे मेरा पूरा खर्च कुछ वर्षों तक बिना शर्त वहन करने को तैयार हैं। मेरे लिए यह बहुत बड़ा संबल था। मैंने सोचा कि यदि जीवन मरण का प्रश्न खड़ा होगा तो यह विकल्प है ही। किंतु उस समय मैंने इस विकल्प को स्वीकार करने से मना कर दिया, भविष्य के गर्भ के लिए विकल्प को संभावनाओं के साथ छोड़ दिया।

    दो सौ रुपए, एक पिठ्ठू बैग, कुछ किताबें, दो जोड़ी कपड़े व कुछ दस्तावेज। कुल जमा यही गृहस्थी थी जिसे लेकर मैं जयशंकर पाण्डे के यहां सर्वसेवासंघ पहुंचा। दो सौ रुपयों में से काफी रुपए कानपुर से वाराणसी पहुंचने में खर्च हो चुके थे। यूं समझिए कि मेरे पास पैसे नहीं थे।

    जयशंकर पाण्डे वहां रहते नहीं थे। रमाशंकर पाण्डे रहते थे। रमाशंकर के पास भी पैसे नहीं होते थे। रमाशंकर संस्कृत से स्नातक की पढ़ाई पढ़ रहे थे। उनको भी घर से खर्च बहुत कम मिलता था। मैं व रमाशंकर दाल चावल, कभी कभी दाल नमक प्याज खाकर कई महीने रहे। मैंने कई मित्रों से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की लेकिन सभी कन्नी काट गए। स्थिति यह थी कि प्रोफेसर एच सी वर्मा जी के पास जाने तक के किराए के लिए पैसे नहीं थे। जीवन को मुख्यधारा की रूटीन हिसाब से इतर अपनी शर्तों में जीने के लिए भारत में बहुत संघर्षों, उपेक्षाओं, प्रताडंनाओं व तिरस्कारों को झेलना पड़ता है।

    उन्हीं दिनों दिल्ली की गांधी निधि, गांधी शांति प्रतिष्ठान, अवार्ड व कनाडा की यूनिवर्सिटी संयुक्त सेमिनार आयोजित करने वाली थी। जागृति राही दीदी व उनके पति संजय सिंह भाई के सहयोग व सुझाव पर मैं दिल्ली पहुंचा जहां मेरी मुलाकात व मित्रता अनुपम मिश्र जी से हुई। दिल्ली पहुंचने पर भी मेरे पास लगभग पचास रुपए व पिठ्ठू बैग वाली गृहस्थी थी। ट्रेन का किराया व टैक्सी का किराया जागृति राही दीदी द्वारा दिया गया था।

    जब क्लेयर से मेरा विवाह हुआ तब मैंने क्लेयर को बताया कि रमाशंकर पाण्डे मेरे जीवन की रक्षा करने वाले लोगों में से एक हैं। मैंने व मेरी पत्नी ने रमाशंकर से पूछा कि वह क्या करना चाहते हैं। रमाशंकर ने दिल्ली आने की इच्छा जाहिर की। रमाशंकर कई वर्षों तक हमारे घर में हमारे सगे छोटे भाई की तरह कई सालों तक रहे। रमाशंकर ने अंग्रेजी स्पीकिंग कोर्स, जिम इत्यादि जो भी सीखना व करना चाहा उसके लिए पूरी सुविधाएं दी गईं जैसे कि अपने घर के बच्चों को दी जातीं हैं।

    वहीं रमाशंकर आज देश भर में बाडी बिल्डिंग में नाम व शोहरत कमा रहे हैं। सामान्य किसान परिवारों का लाखों युवा दिल्ली आकर रोजी रोटी का जुगाड़ करना चहता है, सपने देखता है। रमाशंकर चाहते तो दिल्ली में ही अच्छा खासा जीवन यापन कर सकते थे। लेकिन रमाशंकर वापस अपने गांव लौटे। बिना पूंजी के शुरूआत की, और धीरे-धीरे इलाके का सबसे बेहतर जिम स्थापित किया। 

    रमाशंकर का जिम केवल कसरत नहीं कराता है, वरन् स्वस्थ व सक्रिय रहने की जीवन शैली की बात करता है। खानपान के तौर तरीके बताता है। रमाशंकर ने अपनी मेहनत के दम पर पूरे जिले व पड़ोसी जिलों में अपनी सम्मानपूर्ण पहचान बनाई है। सरकारी अधिकारी व उनके परिवार भी खानपान व स्वास्थ्य के तौर तरौके सीखने समझने आते रहते हैं।

    रमाशंकर पाण्डे राज्य व राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में धमाल मचाते रहते हैं। Mr NCR, Mr North India to Time, Delhi Classic Shree, Mr UP, Mr Delhi जैसी प्रतियोगिताओं में खिताब जीत चुके हैं। ऐसी ही एक प्रतियोगिता में एक अच्छी मोटरसाइकिल भी उपहार में मिली।

    इतने खिताबों को जीत चुकने तथा फिटनेस व हेल्थ सेंटर से अचछा खासा पैसा कमाने के बावजूद, रमाशंकर अपने खेतों में काम करते हैं। मजदूरी करते हैं। मेेेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे ऐसे ही बने रहें, नाम व शोहरत कमाते रहें।

    Ramashankar Pandey

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  • राष्ट्रवाद बनाम लोकवाद बनाम निजता

    राष्ट्रवाद बनाम लोकवाद बनाम निजता

    Vivek Umrao Glendenning

    लोक से राष्ट्र होता है। राष्ट्र से लोक नहीं। बिना लोक के राष्ट्र संभव ही नहीं। लोक ही राष्ट्र का निर्माता है। जैसा लोक वैसा राष्ट्र। यदि लोक लोकतांत्रिक मूल्यों को जीता है तो राष्ट्र में भले ही राजा हो लेकिन राष्ट्र का मूल चरित्र लोकतांत्रिक होता है। यदि लोक लोकतांत्रिक मूल्यों को नहीं जीता है तो राष्ट्र भले ही लोकतांत्रिक होने का दावा करे लेकिन उसका मूल चरित्र लोकतांत्रिक नहीं होता है। यदि लोक स्वतंत्रता महसूस करता है तो राष्ट्र स्वतंत्र है, यदि लोक स्वतंत्रता नहीं महसूस करता है तो राष्ट्र कभी सही मायनों में स्वतंत्र नहीं हो सकता, संभव ही नहीं। यदि लोक भ्रष्ट है तो राष्ट्र भ्रष्ट होगा। यदि लोक ईमानदार है तो राष्ट्र किसी भी सूरत में लोक को भ्रष्ट नहीं बना सकता। राष्ट्र का लोक बिना कोई भी वजूद नहीं।

    यदि राष्ट्र से लोक होता तो राष्ट्र के सभी लोग एक ही तरह के होते। राष्ट्र लोक बनाने का सांचा या खांचा नहीं होता कि राष्ट्र से लोक होता हो। राष्ट्र का अस्तित्व लोक से बनता है। लोक बड़ा होता है राष्ट्र से, क्योंकि लोक राष्ट्र का निर्माता व दिशा निर्देशक है। यदि राष्ट्र को संविधान माना जाए तब भी संविधान लोगों ने ही अपनी समझ के अनुसार लिखा या दूसरे के लिखे को नकल करके लिखा। संविधान में संशोधन भी लोग ही करते हैं, क्योंकि जो पहले के लोगों ने सोचा व लिखा वह कालांतर में या तो गलत निकला या मूर्खतापूर्ण निकला। निर्माता व दिशानिर्देशक अंततः लोक ही होता है।

    जो राष्ट्र या संविधान लोक के लिए नहीं, उनका कोई मायने नहीं। जब भी यह कहा जाता है कि राष्ट्र व संविधान के लिए समर्पित तो इसका मतलब सिर्फ यह कि जो लोग विभिन्न स्तरों पर राष्ट्र की विभिन्न सत्ताओं व शक्तियों का भोग करते हैं उनको समर्पित। राष्ट्र एक राजनैतिक सीमाओं की परिकल्पना है, राष्ट्र का स्वयंभू रूप में कोई अस्तित्व नहीं। राष्ट्र एक काल्पनिक व बेहद परिवर्तनशील इंटिटी होती है। भारत में कभी सैकड़ों राष्ट्र थे, हम अपनी जिद में भले ही यह कहते रहें कि भारत एक राष्ट्र था। एक राष्ट्र का मतलब किसी एक का शासन। जिसने जितने राजाओं को पराजित कर लिया वह उतना बड़ा राष्ट्र। बहुत साधारण है समझना।

    राजनैतिक सत्ताओं की देखभाल के लिए लोगों का समर्पण प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड जैसे देशों ने राष्ट्रवाद का कांसेप्ट दिया। मजेदार बात यह है कि जिन्होंने राष्ट्रवाद का कांसेप्ट दिया, उन्हीं लोगों ने सबसे पहले स्वयं को राष्ट्रवाद के कांसेप्ट से मुक्त कर लिया। क्योंकि उनको जल्द ही अहसास हो गया कि राष्ट्र से बड़ा लोक है, इसलिए वे लोग राष्ट्रवाद से लोकवाद पर आ गए। लगातार लोकवाद को परिष्कृत करते जा रहे हैं।

    परिभाषाओं व विचारों को रटना:

    हममें से अधिकतर लोग जीवन में अधिकतर बातें व विचार रटते हैं या कई किताबें/विचार पढ़कर उनका अपने दिमाग में पीसते हुए अपनी सब्जेक्टिविटी/पूर्वाग्रह/वैचारिक-पसंद/नापसंद के आधार पर विभिन्न मसालों का प्रयोग करते हुए चटनी बनाते हैं। इस चटनी बनाने को हम स्वयं का चिंतन करना व स्वयं को चिंतक मान लेते हैं।

    हममें से बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं तो व्यापकता, व्यापक-विभिन्नता, वस्तुनिष्ठता, निरपेक्षता व अननकूलता के साथ अध्ययन व कर्म स्वाध्याय करते हैं या कर पाते हैं।

    हम जीवन भर शब्दों, विचारों, भावों व परिभाषाओं को बिना निरपेक्षता व वस्तुनिष्ठता से समझे हुए ही धड़ल्ले से प्रयोग करते रहते हैं। ऐसा करने को हम अपना विचारशील व चिंतनशील होना भी मानते हैं। जीवन व समाज के हर आय़ाम पर हममें से अधिकतर लोग ऐसा ही जीते हैं।

    मानव समाज ने समय के साथ समझते हुए गति की है। एक समय था जब राजा को भगवान का दूत माना जाता था और राज्य के सारे लोग व संपत्ति राजा के सब्जेक्ट हुआ करते थे। यह मानसिकता वैसी ही है जैसी कि आज हम ताकतवर सरकारी नौकरी करने वालों को, या बड़ी कंपनीज में ऊंचे वेतन व सुविधाओं से नौकरी करने वालों को योग्य, मेधावी, सफल मानते हैं।

    राजा रहा हो या आज के भारतीय समाज के नौकरशाह या ऊंचे वेतनमान के नौकरी करने वाले लोग। मूलभूत मामला संपत्ति के भोग का ही रहा है। संपत्ति हमेशा मूल में रही, पैकिंग बदलती रही। संपत्ति को भोगने को सौभाग्यशाली होना हमेशा माना जाता रहा।

    [themify_quote]समाज जिन परिभाषाओं, विचारों, कंडीशनिंग इत्यादि से अपनी पीढ़ियों को ट्रेन करता है। जिन परिभाषाओं को रटाया जाता है। वे निरपेक्ष नहीं होतीं हैं। बहुत प्रकार के तामझाम व घालमेल के सापेक्षिक होतीं हैं। यह तो व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपना जीवन सापेक्षिक दृष्टि के साथ देखते समझते जीना चाहता है या जो जैसा है उसको वैसा ही देखने समझने की निरपेक्ष दृष्टि का विकास करते हुए जीना चाहता है।[/themify_quote]

    निजता व राष्ट्र:

    बिना लोक के समृद्ध व मजबूत हुए कभी भी राष्ट्र समृद्ध व मजबूत नहीं हो सकता है, संभव ही नहीं। यदि लोक मजबूत व समृद्ध है तो राष्ट्र स्वतः ही समृद्ध व मजबूत होता है। राष्ट्र मजबूत हो फिर लोक मजबूत हो, ऐसा संभव ही नहीं, मूर्ख बनाकर लोक पर सत्ता व शक्ति का भोग करने की कवायद होती है और कुछ भी नहीं। बिना लोक के राष्ट्र अपने आप में कुछ भी नहीं, कोई भी अस्तित्व नहीं।

    बिना निजता के लोक का विकास, समृद्धि व मजबूती संभव ही नहीं। लोक निजता मतलब राष्ट्र की निजता। लोक की निजता जितनी समृद्ध होगी राष्ट्र की निजता उतनी ही समृद्ध होगी। लोक की निजता जितनी कमजोर व निरीह होगी, राष्ट्र की निजता उतनी ही कमजोर व निरीह होगी। लोक की निजता को ध्वस्त करना मतलब राष्ट्र की निजता को ध्वस्त करना।

    लोक की निजता कभी भी राष्ट्र विरोधी हो ही नहीं सकती। असंभव है। (इस बिंदु को सू़क्ष्मता, गहराई व व्यापकता से सोचिए तभी समझ पाएंगे नहीं तो समझना संभव नहीं)।

    चलते-चलते:

    राष्ट्र दरअसल लोक का ईमानदार व पारदर्शी आइना होता है। जैसा लोक वैसा राष्ट्र, बिना किसी लागलपेट के। लोक की निजता मतलब राष्ट्र की निजता। लोक की सुरक्षा मतलब राष्ट्र की सुरक्षा। लोक की समृद्धि मतलब राष्ट्र की समृद्धि। लोक का विकास मतलब राष्ट्र का विकास। लोक का परिष्कृत होना मतलब राष्ट्र का परिष्कृत होना। लोक का ताकतवर होना मतलब राष्ट्र का ताकतवर होना। लोक के बिना राष्ट्र जैसा कुछ होता ही नहीं।

    मेरी बातें बहुत लोगों को फिलासोफिकल लग सकतीं हैं। लेकिन दुनिया का यथार्थ यही है कि जिन-जिन राष्ट्रों ने इसको जीवन में उतार लिया है वे लोक-कल्याण, विकास, समृद्धि, मजबूती, जागरूकता, शिक्षा, स्वास्थ्य, विद्वता, सामाजिक-विश्वास, सामाजिक-न्याय, समता इत्यादि संदर्भों में बहुत आगे निकल गए हैं।


  • गोरखपुर में बच्चों की मौत का वास्तविक जिम्मेदार कौन

    गोरखपुर में बच्चों की मौत का वास्तविक जिम्मेदार कौन

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”
    संस्थापक सह मुख्यसंपादक, ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    संस्थापक सह वाइसचांसलर, गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय

    कटु सच्चाई है कि हम समाज के रूप में बहुत कमजोर, भयंकर असंवेदनशील व बेहद गैरजिम्मेदार हैं। पूरे देश में प्रतिदिन अनेक भयावह व लज्जित करने वाली घटनाएं होतीं हैं, अधिकतर घटनाएं सामने आ ही नहीं पातीं हैं। हम, हमारा समाज, हमारा मीडिया व हमारे आग्रह सभी का चरित्र व्यक्तिनिष्ठ चयनात्मक हैं।

    हम घटनाओं के होने के बाद राजनैतिक दलों के प्रति अपनी निष्ठा, पसंद नापसंद व स्वार्थों के पूर्वाग्रहों के आधार पर अपना पक्ष चुनते हैं। गोरखपुर मेडिकल कालेज में बच्चों के मरने की घटना को ही ले लीजिए। हम दिखावा तो ऐसा कर रहे हैं कि बच्चों की मृत्यु से अंदर तक झिंझूड़ गए, लेकिन सच्चाई यह नहीं है। सच यह है कि हम संवेदनशीलता का चोला ओढ़ कर अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों को जी रहे हैं।

    एक समय था जब केवल नेता लोग ही राजनैतिक पूर्वाग्रहों व सामाजिक असंवेदनशीलता को जीते थे। क्योंकि अखबारों व टीवी चैनल्स में बात रखने की उपलब्धता कम होने से हम लोगों को अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों व सामाजिक असंवेदनशीलता को जी पाने का अवसर नहीं मिलता था। किंतु अब सोशल मीडिया के आने से समय बदल गया है, हमें भी अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों व सामाजिक असंवेदनशीलता को जी पाने का माध्यम व अवसर मिल गया है।

    इस माध्यम से अब हम विकृति, कुंठाओं व मानसिक हिंसा की सीमा तक जाकर अपने पूर्वाग्रहों को जीते हैं। जो अपवाद लोग पूर्वाग्रहों को नहीं जीते हैं, हम उन लोगों को मूर्ख मानते हैं, अव्यवहारिक मानते हैं, अपरिवर्तनशील व अजागरूक मानते हैं। हमने अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार अपनी परिभाषाएं गढ़ ली हैं।

    इसी घटना को लीजिए, जो भाजपा या योगी विरोधी हैं, वे जुट पड़े हैं संवेदनशीलता का ढोंग करते हुए अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों को जी सकने पर। जो भाजपा या योगी समर्थक हैं, वे इस जुगत में जुटे पड़े हैं कि कैसे मामले का ठीकरा अपने सर फूटने से बचा जाए। दोनों ही सूरतों में वास्तविक संवेदनशीलता व सामाजिक ईमानदारी कहां है !!

    यदि अखिलेश यादव जी भी मार्च में चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनते तब भी बच्चे यूं ही मरते। तब क्या अखिलेश यादव दोषी होते। दरअसल योगी आदित्यनाथ जी या अखिलेश यादव जी दोषी तब होते जब सरकारी ढांचे व सामाजिक तानेबाने का चरित्र संवेदनशील व जिम्मेदार होता। तब ऐसी घटनाएं होने पर सरकार का मुखिया का दोषी होता। लेकिन चूंकि अब सबकुछ राजनैतिक पूर्वाग्रहों से ही तय होता है, राजनैतिक पूर्वाग्रह ही सामाजिक संवेदनशीलता, परिवर्तन, जागरूकता का रूप ले चुके हैं। हममें से अपवाद छोड़कर सभी लोग इसी धींगामुस्ती में लिप्त हैं।

    चलते-चलते

    दरअसल हम व हमारा समाज बेहद असंवेदनशील, गैरजिम्मेदार व पूर्वाग्रहों से भीषण रूप से ग्रस्त है। बात केवल सरकारी डाक्टरों की नहीं है। जो जहां पर है वहां पर जितना तरव जिस स से असंवेदनशील हो सकता है उतना है, पूरी ताकत व जोरशोर के साथ है, बिना रुके लगातार है।

    हमारा समाज ऐसे ही लोगों को बना रहा है। हम संवेदनशील तब होगें जब हम ऐसी घटनाओं के मूल कारणों व समाज के लोगों के मनोविज्ञान को समझें। स्वयं की मानसिकता, समाज की मानसिकता को बदलने का ईमानदार प्रयास करें। राजनैतिक पूर्वाग्रहों से देखना व प्रतिक्रिया देना बंद करें। समाज को वास्तव में संवेदनशील बनाने का प्रयास करें।

    कुछ न कर पाएं तो कम से कम संवेदनशीलता के ढोंग को जीना बंद कर दें। दोषी राजनेता नहीं। हम आप व समाज है। बाकी मुद्दों को छोड़िए। व्यक्तिगत स्तर पर, परिवार स्तर पर, समाज स्तर पर; हम वास्तव में बच्चों के लिए ईमानदारी से कितना संवेदनशील हैं, इसका ही मूल्यांकन ईमानदारी से अपने भीतर करके देखा जाना चाहिए।

  • काण्डोम –Anupama Garg

    Anupama Garg

    भैया,
    मूड्स के कोंडम का एक पैकिट देना।’’
    मेरी बेशर्म आवाज़,
    जैसे ही मेडिकल स्टोर में दी सुनाई,
    मेरा छोटा कद,
    बच्चों सा चेहरा देख कर,
    बगल में खड़ी लड़की,
    धीमे से बुदबुदाई………
    ‘‘आप ………पर से खुद ही क्यों नहीं उठा लेती’’

    फिर उसे जैसे ध्यान आया,
    कि मैं तो चरित्रहीन कुलटा हूँ।
    गंगा का प्रवाह उल्टा हूँ।
    वो, अच्छी लड़की थी।
    फेयर एण्ड लवली लेकर,
    चुपचाप पैसे दे कर,
    चलती बनी।

    मगर स्टोर में पसरी थी,
    मेरे मुँह खोलने से ले कर,
    वहाँ से निकलने तक,
    चुप्पी घनी।

    लगभग, हर किसी की भौंहे खिंची हुई थी,
    और सबकी निगाहें मुझसे बचती हुई,
    मैं दुकान से ऐसे निकली,
    मानों कोई सनसनी।

    वैसे,
    दीगर बात ये है ,
    कि कॉण्डोम मुझे चाहिये थे,
    सेक्स के लिए नहीं,
    एक रिसर्च प्रोजेक्ट की फाईल में सेम्पल लगाने के लिए,
    ये तमाशा तो यूँ ही खड़ा किया था मैंने,
    लेगों की शरीर धर्मिता आज़माने के लिए।

    आखिर, ऐसा है क्या उस माँस के टुकड़े में,
    जो लड़की के स्तन देख कर फड़फडाता है।
    खड़ा हो जाता है।
    मगर उसी लड़की के कहने पर,
    कॉण्डोम, न खरीदना, न बेचना, न पहनना चाहता है।

    कॉण्डोम सिर्फ़ रबर का टुकड़ा नहीं,
    ये स्वीकृति की सीमा भी दर्शाता है।
    क्या ही अच्छा होता, गर लोग समझते,
    कि कॉण्डोम सिर्फ़ सुरक्षित सेक्स नहीं,
    स्त्री की देह की गरिमा व शरीर धर्मिता का,
    सम्मान भी सिखाता है।

    Anupama Garg

    Anupama identifies herself as a young, energetic, thoughtful and sensitive human being before anything else. An author, a content strategist, a communications expert, a ghost writer, a blogger, a devil’s advocate and a woman are some other hats she wears.

    She writes books on controversial subjects, expresses her opinions and thoughts vocally and believes in empowerment and responsibility of expression. She can be reached on her LinkedIn/Facebook profile(s) at:

    https://in.linkedin.com/in/anupama-garg-1b059b31

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  • संघ-विरोधियों को संघ से सीखना चाहिए

    संघ-विरोधियों को संघ से सीखना चाहिए

    Vivek “Samajik Yayavar”

    राजनैतिक ईकाईयां

    संघ ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में भारतीय जनसंघ ने अपने आपको जनता पार्टी में समाहित कर दिया, जनता पार्टी की सरकार बनी जो 1977 से 1980 तक चली। 1980 में संघ ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। 2013 में जनता पार्टी ने अपने आपको भारतीय जनता पार्टी में समाहित कर दिया। 1989 में जनता दल के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई जो 1990 तक चली।

    दरअसल जो लोग संघ को पानी पी-पीकर कोसते हैं, उन्होंने संघ की राजनैतिक इकाइयों के साथ मिलकर समय समय पर सरकारें बनाईं हैं। जयप्रकाश नारायण के अनुयायी लोगों ने 1977 में संघ की राजनैतिक ईकाई के साथ मिलकर सरकार बनाई। आगे चलकर 1989 में फिर से संघ की राजनैतिक ईकाई के साथ मिलकर सरकार बनाई।

    भारतीय जनता पार्टी 1996 में 13 दिनों के लिए सरकार में आई। 1998 में एक साल के लिए सरकार में आई, 1999 में फिर सरकार में आई।

    भारतीय जनता पार्टी केंद्र में कुल लगभग 6 वर्षों तक सरकार में रही वह भी गठबंधन करते हुए। फिर 10 वर्षों तक लगातार सरकार में नहीं रही। इसके बावजूद 2014 में भारी बहुमत के साथ केंद्र में सरकार बनाती है। आज की तारीख में देश के अधिकतर राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की या भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सरकारें हैं।

    रणनीतिक कुशलता, सांगठनिक क्षमता व लचीनापन की रणनीति

    राजनैतिक रणनीतिक लचीलापन इतना अधिक कि 1951 को स्थापित की गई राजनैतिक ईकाई को संघ जरूरत पड़ने पर 1977 में जनता पार्टी में समाहित कर देता है। 1989 में जनता दल के साथ गठबंधन करके सरकार बनाता है। 1998 में देश भर की राजनैतिक पार्टियों को बटोर कर सरकार बनाता है।

    भ्रष्टाचार की बात अपनी जगह, रणनीतिक तौर तरीकों की बात अपनी जगह, व संघ के एजेंडे के साथ सहमति असहमति अपनी जगह। लेकिन संघ का हर कदम एजेंडे की ओर गति करता है, यह एक सच्चाई है। भले ही 1996 में 13 दिन की सरकार हो या कुछ और।

    उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी जो दलितों की पार्टी है, जिसकी उत्पत्ति ही संघ के एंजेडे के विरोध में है उसने भी संघ की राजनैतिक ईकाई भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई।

    मायावती की भी मान-मनौवल करते हुए बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ सरकार बनाता है। छोटी-छोटी पार्टियों को भी साथ मिलाकर सरकार बनाता है। यदि किसी पार्टी से कुछ हजार मतों का भी लाभ मिलना होता है तो भी उसको गठबंधन में लाने का प्रयास करता है।

    1977 में स्वयं को जनता पार्टी में समाहित कर देना, 1989 में जनता दल का पिछलग्गू बनना। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाजवादी पार्टी का पिछलग्गू बनना। बिहार में नितीश कुमार का पिछलग्गू बनना।

    भारतीय जनता पार्टी सरकार चलाती है तब भी संघ लोगों के बीच निरंतर संगठन प्रसार में लगा रहता है। क्योंकि संघ का मूल एजेंडा सत्ता प्राप्ति व सत्ता भोगना तक ही सीमित नहीं है। सत्ताएं तो मूल एजेंडे के लिए औजार हैं।

    संघ विभिन्न दिशाओं में समानांतर रूप में लगातार काम करता रहता है। पूरे देश में विद्यालय खोले। पूरे देश में शाखाएं चलाईं। आपदाओं में राहत कार्य के लिए पहुंचते रहे। लोगों का विश्वास जीतने, लोगों की सोच बदलने, लोगों के दुख में सहयोगी के रूप में खड़े होने जैसे विभिन्न स्तरों पर लगातार जमीनी प्रयास किए।

    जरूरत पड़ी तो राम मंदिर, कश्मीर में धारा 370 इत्यादि को बहुत बड़ा मुद्दे बनाए ताकि लोगों का राजनैतिक ध्रुवीकरण हो। जब राजनैतिक लाभ मिल गया तब इन मुद्दों को ठंडे बस्ते डाल दिया गया। क्योंकि यह सब संघ के मूल एजेंडा है ही नहीं। यह सब तो रणनीतियां हैं। संघ ने सबसे पहले हिंदुत्व के मूल एजेंडे से ऊंची जातियों को अपने साथ जोड़ा, फिर पिछड़ी जातियों को जोड़ा, अब दलितों को जोड़ रहा है।

    संघ अपनी रणनीतियां बदलता है, राजनैतिक लचीलापन रखता है लेकिन अपने मूल एजेंडे से कभी नहीं भटकता है। संघ अपने एजेंडे के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहता है, दृष्टि व चिंतन में स्पष्टता रखता है, लोगों के साथ लगातार संवाद में रहता है, संगठन का दायरा बढ़ाता रहता है।

    संघ-विरोध

    उत्तर प्रदेश में मायावती को अवसर मिला पांच वर्षों तक बहुमत से सरकार चलाई। दलितों के प्रति, सामाजिक न्याय के प्रति कोई एजेंडा नहीं। जमीनी संगठन के लिए क्या किया। कांसीराम ने जो बनाया था उसको सत्ता प्राप्ति के चक्कर में नेस्तनाबूत कर दिया।

    उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को अवसर मिला पांच वर्षों बहुमत से सरकार चलाई। समाजवाद व सामाजिक न्याय के प्रति कोई गंभीर एजेंडा नहीं। जमीनी संगठन के लिए क्या किया। मुलायम यादव ने संघर्ष करके जो संगठन बनाया उसको सहेज तक न पाए, समृद्ध करना तो दूर की बात है।

    बिहार में लालू यादव ने 15 वर्षों तक सरकार चलाई, एजेंडा क्या रहा, केवल सरकार में बने रहना, सत्ता भोगना। 1990 में आडवाणी का रथ रोक दिया, चरवाहा विद्यालय की घोषणा कर दी। बस हो गए सांप्रदायिक शक्तियों के विरोध व सामाजिक न्याय के ऐतिहासिक पुरोधा। 15 वर्षों तक सरकार में रहते हुए सामाजिक न्याय के एजेंडे को कितना मजबूत किया जा सकता था, इस पर कोई चर्चा नहीं। कोई प्रश्न नहीं। सत्ता भोगना ही सामाजिक न्याय हो गया, चरवाहा विद्यालय की घोषणा ही हो गई वंचितों की मजबूती के लिए सुनहरे अक्षरों में लिखी जाने वाली ऐतिहासिक सामाजिक क्रांति।

    पहले संघ की राजनैतिक ईकाईयों के साथ मिलकर कांग्रेस का विरोध, फिर कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा का विरोध। कुल जमा मूल बात सत्ता भोगना ही रही। दीवालियेपन में इसी को सामाजिक न्याय कह लिया जाए या सांप्रदायिकता-विरोध या कुछ और। 

    समाज तो चाहता रहा कि सामाजिक न्याय की बात हो, जाति से मुक्त हुआ जाए, सांप्रदायिक सौहार्द की बात हो इसीलिए तो गैरभाजपा, गैरकांग्रेस सरकारें बनतीं रहीं। लेकिन जिनकी सरकारें बनतीं रहीं वे सत्ता भोगने के अलावे करते क्या रहे, उनके मूल चरित्र में अंतर क्या रहा ….

    गुजरात में 2002 के बाद भारत में सैकड़ों NGO, सामाजिक/NGO सेलिब्रिटी, मैगसेसे पुरस्कृत लोगों ने मानवाधिकार के नाम पर, सांप्रदायिका के नाम करोड़ों रुपए की ग्रांट पाई। संघ, भारतीय जनता पार्टी व नरेंद्र मोदी का पानी पी-पीकर विरोध किया।

    विरोधी पानी पी-पीकर विरोध करते रहे, जबकि संघ ने भरपूर दुस्साहस के साथ नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे कर दिया। विरोधियों ने लगातार जमकर नरेंद्र मोदी के विरोध में हंगामा काटा लेकिन नरेंद्र मोदी धुआंधार बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बन गए। यह है संघ का रणनीतिक कौशल्य व जमीनी सांगठनिक क्षमता व व्यापकता।

    संघ विरोधी लोग बिना जमीन में गंभीरता से गए ऊपरी तौर पर बिना स्पष्ट दृष्टि व बिना प्रतिबद्धता के संगठित होते हैं। जबकि संघ जमीन पर अपने संगठन का अधिक मजबूती से विस्तार करता चला जाता है।

    संघ-विरोधी लोग हल्ला गुल्ला करते हैं, आजकल सोशल मीडिया भी हो गया है तो उसमें संघ विरोध को नशे की तरह ओढ़ते बिछाते, खाते-पीते शौच करते, थूका-थाकी करते हुए खुद को क्रांतिकारी चिंतक व सामाजिक लंबरदार मान लेते हैं, लाइकों की संख्या पाकर सामाजिक परिवर्तन करते हैं।

    जबकि संघ जमीन पर लोगों के साथ सीधे संवाद व काम करते अपने एजेंडे के लिए परिश्रम करता है। सोशल मीडिया वाले लोगों का मनोरंजन करने के लिए, व्यस्त रखने के लिए, क्रांतिकारी/परिवर्तनकारी होने के अहंकार को पोषित करने के लिए, हल्ला-गुल्ला बना रहे, के लिए समय-समय पर कुछ सुर्रा छोड़ देता है। संघ-विरोधी लोग सुर्रों पर पिल पड़ते हैं।

    जो जितना अधिक पिलता है उसको उतना बड़ा चिंतक व क्रांतिकारी मान लिया जाता है। यह माना जाता है कि संघ यही करके शक्तिशाली बन पाया है, तो यही करके संघ को सत्ताओं से हटाया जा सकता है। इसी कारण पिले रहते हैं संघ विरोध को नशे की तरह ओढ़ते बिछाते, खाते-पीते शौच करते, थूका-थाकी करते हुए। इस मानसिकता को मूर्खता कह लीजिए, टटपुंजियागिरी कह लीजिए, मक्कारी कह लीजिए, भ्रांति कह लीजिए, कुछ भी कह लीजिए।

    राजनैतिक सत्ता भले ही कुछ-कुछ समय के लिए संघ के हाथ से निकलती रहें लेकिन संघ भारत में प्रमुख शक्ति तब तक बनी रहेगी जबतक बेहद दूरदर्शी, गंभीर व ठोस प्रयास निरंतर-प्रतिबद्धता व भीषण संघर्षों के साथ नहीं शुरू किए जाएंगे।

    संघ-विरोधियों को एक कटु यथार्थ स्वीकार कर लेना चाहिए कि हवाई तौर-तरीकों, सतहीपन, खोखलाहट, टटपुंजियागिरी से व बिना जमीन पर गंभीरता व ठोस रूप से उतरे हुए कभी भी संघ के विरोध में वास्तविक शक्ति नहीं खड़ी कर सकते हैं।

    चलते-चलते

    संघ के सांगठनिक ढांचे, मनोविज्ञान व समाजविज्ञान की गुणवत्ता यह है कि राजनैतिक रणनीतियों के तहत अनेकानेक उटपटांग एजेंडों को प्रमुख व महत्वपूर्ण एजेंडों के रूप में वर्षों तक पोषित व प्रायोजित करते रहने के बावजूद मूल एजेंडे को ही समृद्धि व शक्ति मिलती रहती है।

    संघ को बैठे बिठाए, चुटकुले सुनाने, प्रेस रिलीज जारी करने, भाषण रटकर विद्वान व क्रांतिकारी बनने जैसी चोचले बाजियों या टटपुंजिएपन से यह सब प्राप्त नहीं हुआ है।

    संघ के एजेंडे के प्रति सहमति असहमति हो सकती है। लेकिन संघ की दृष्टि-स्पष्टता, सामाजिक मनोविज्ञान की विशेषज्ञता, प्रचार तंत्र, सांगठनिक ढांचा, संगठन, एजेंडे के प्रति प्रतिबद्धता, व परिश्रम के संदर्भ में प्रश्न नहीं खड़े किए जा सकते हैं।

    संघ बहुत अधिक व्यवहारिक व व्यापक जमीनी संगठन है। संघ अपने मूल एजेंडे के लिए जरूरत पड़ी तो भारतीय समाज से जाति को खतम करने में गंभीरता से जुट जाएगा।

    संघ का तोड़ भारत में किसी भी पार्टी के पास नहीं है। संघ के परिश्रम, दृष्टि की स्पष्टता, कर्मठता, रणनीतिक कौशल, सांगठनिक क्षमता व कौशल व एजेंडे के प्रति प्रतिबद्धता को नकारना सबसे बड़ी मूर्खता है।

    विरोधी की क्षमताओं, कौशल व विशेषज्ञता को नकारने की बजाय, सीखना चाहिए। विभिन्न रणनीतियां बनाते हुए, लाचीलापन रखते हुए स्पष्ट दृष्टि व प्रतिबद्धता के साथ एजेंडे के लिए एकाग्रता के साथ काम करते रहने की कला संघ से सीखना चाहिए।

  • पानी, भूजल व नदियों के संदर्भ में हमारी समझ : निर्मल गंगा अविरल – प्राकृतिक नियम, परस्परता व संतुलन बनाम जादू-टोना/दैवीय मिथक

    पानी, भूजल व नदियों के संदर्भ में हमारी समझ : निर्मल गंगा अविरल – प्राकृतिक नियम, परस्परता व संतुलन बनाम जादू-टोना/दैवीय मिथक

    Vivek “Samajik Yayavar”

    गंगा

    गंगा व गंगा की सहयोगी नदियां भारत के लगभग 11 राज्यों में बहती हैं तथा भारत के लगभग 50 करोड़ लोगों का जीवन प्रभावित करतीं हैं। गंगा में प्रतिदिन लगभग 300 करोड़ लीटर सीवर गिरता है। एक समय की पवित्र गंगा आज दुनिया की सबसे अधिक जहरीली व विदूषित नदियों में से है। गंगा में प्रतिवर्ष लगभग 10 करोड़ लोग पापों से मुक्ति होने के लिए स्नान, शव-दाह, शव-प्रवाह इत्यादि क्रियाओं से गंगा को विदूषित करने का काम करते हैं।

    Ganga
    Ganga

    प्रस्तावना

    मैंने बिहार राज्य में बिहार का शोक कही जाने वाली कोसी नदी की बाढ़ों की विभीषिकाओं में कई वर्ष सैकड़ों गांवों में राहत व पुनर्वास के लिए काम किए हैं। कोसी नदी की बाढ़ को समझने व राहत कार्यों के लिए मैने सप्ताहों 12 से 14 घंटे प्रतिदिन कोसी बाढ़ में तेज प्रवाहित नदी में बहती हुई सैकड़ों लाशों को देखते हुए नावों में यात्रा करते हुए गुजारे हैं ताकि बीहड़ से बीहड़ गावों में पहुंच कर लोगों का जीवन बचाने में योगदान कर सकूँ।

    बाढ़ से ग्रस्त गांवों में ही रहना। जो मिला वह खा लेना। अधिकतर सूखा चूड़ा, नमक व प्याज से ही काम चलता था। खेतों में नदी का पानी भरा होने के कारण बांस से बने जुगाड़ू टट्टी-घर मे टट्टी जाना जिसमें टट्टी जाने के लिए पूरा गांव सुबह पंक्तिबद्ध रहता था। रुके हुए पानी व सड़ी हुई लाशों के कारण संक्रमित बीमारियों का खतरा ऊपर से।

    Kosi River Flood

    कोसी बाढ़ की विभीषिकाओं को नजदीक से देखने महसूस करने के बाद मेरा यह भी प्रयास रहा कि दुनिया के जल, नदी व बाढ़ प्रबंधन के विशेषज्ञों को जोड़कर सामाजिक प्रबंधन की दिशा मे काम करूं। मैंने नीदरलैंड्स, आस्ट्रेलिया व संबंधित वैश्विक संस्थानों के वैज्ञानिकों से संपर्क किया। एक-एक विशेषज्ञ को जोड़ने में समय, संसाधन व ऊर्जा लगी।

    इन्हीं प्रयासों के तहत चाहे-अनचाहे यूरोपियन यूनियन संसद व अन्य वैश्विक स्तर पर जल संबंधित कई वैश्विक दस्तावेजों को तैयार करने में भी मेरा योगदान हो गया।

    नीदरलैंड्स समुद्र से घिरा व समुद्री सतह से नीचे स्थित बेहद घनी जनसंख्या वाला भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से छोटा सा देश है। हम लोग हर बात के लिए भारत की जनसंख्या को एक मूलभूत बहाने के रूप में प्रयोग करते हैं। जबकि नीदरलैंड्स की जनसंख्या का घनत्व भारत की जनसंख्या घनत्व से काफी अधिक है। नीदरलैंड्स में वर्ष में कई महीने बर्फ के कारण पूरे देश की जमीनें बंजर पड़ी रहती हैं। समुद्री सतह से नीचे बसे होने के कारण पूरे वर्ष समुद्री व समुद्री नदियों के कारण बाढ़ की स्थिति। नीदरलैंड्स के लोगों ने बाढ़ के साथ व्यवस्थित संतुलन स्थापित करके जीना सीखा परिणामतः दुनिया में नीदरलैंड्स बाढ़ प्रबंधन का विशेषज्ञ माना जाता है। इतनी विषम परिस्थितियों के बावजूद नीदरलैंड्स ने वैज्ञानिक खोजें की, कृषि व दूध पर दुनिया को नए आयाम दिए। दुनिया के सबसे विकसित, सुविधासंपन्न व कल्याणकारी देशों में से एक है। कृषि से संबंधित दुनिया का सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालय भी यहीं स्थापित है। आस्ट्रेलिया का स्थान दुनिया में जल प्रबंधन के लिए विशेषज्ञ माने जाने वाले सबसे ऊपर के देशों में आता है।

    भारतीय समाज का मनोविज्ञान 

    मैंने यह महसूस किया कि भारतीय समाज में ऐसा माना जाता है कि हर बात का समाधान मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री के पास है। बिहार का शोक कोसी नदी की बाढ़ विभीषिका हो या गंगा का निर्मल अविरल होना या कोई अन्य मुद्दा। यह माना जाता है कि यदि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चाह लें तो कोसी की बाढ़ रुक जाएगी व गंगा निर्मल व अविरल हो जाएगी। धरना, प्रदर्शन, लेखन, मीडिया इत्यादि की दिशा इसी मानसिकता के इर्दगर्द ही रहती है।

    राजनेतागण व उनके समर्थक लोग भी यही माहौल बनाते हैं कि उनके पास जादुई ताकत है, वे पलक झपकते ही परिवर्तन कर देंगे। भारत चूंकि पौराणिक मिथकों व जादुई सिद्धियों की कहानियों को मानने वाला सामंती मानसिकता का समाज है इसलिए अवतारवाद व जादुई ताकतों पर विश्वास भी किया जाता है।

    मैं मजाक में कहा करता हूं कि यदि बिहार का मुख्यमंत्री कोसी नदी को बाढ़ न लाने का आदेश दे दे, कैबिनेट कोसी नदी को बाढ़ न लाने का प्रस्ताव पारित कर दे तो कोसी बाढ़ लाना बंद कर देगी। देश का प्रधानमंत्री गंगा को आदेश दे कि वह निर्मल व अविरल हो जाए या देश की कैबिनेट गंगा के लिए निर्मल व अविरल होने का प्रस्ताव पारित कर दे तो गंगा निर्मल व अविरल हो जाएगी।

    बात केवल दो नदियों की नहीं है। बात किसी भी नदी की हो, जंगल की हो, प्राकृतिक संसाधन की हो, कुरीतियों की हो; हमारे समाज व समाज के लोगों के अधिकतर प्रयास सरकार के खिलाफ धरना, प्रदर्शन, प्रेस कन्फेरेंश, विदेशी फंडिंग संस्थाओं को आकर्षित करने, कुछ दिखावटी जमीनी कामों के तामझाम व अवतारवाद इत्यादि तक ही संकुचित व कुंठित रहते हैं।

    गंगा में व्यवसायिक जल-यातायात

    एक खबर जोरशोर से आती है कि देश के परिवहन मंत्री श्री गडकरी जी की दृढ़ इच्छा है कि गंगा में व्यवसायिक जल परिवहन शुरू हो, गंगा में जहाज चलें। जैसा यातायात ट्रेनों व सड़कों से होता है वैसा यातायात गंगा नदी में भी शुरू हो। ऐसा हो इसके लिए मंत्री जी व सरकार पूरी तरह से कटिबद्ध है। जोरशोर से प्रयास जारी हैं ऐसा मीडिया में बारबार बताया गया। 

    किंतु मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट अपना संदेह व्यक्त करते हुए, यह कहते हुए लिखी, कि जल परिवहन के लिए प्रथम मूलभूत तत्व गंगा में पर्याप्त व निरंतर जल स्तर व प्रवाह का बने रहना है। यह कैसे संभव होगा। बिना इसके परिवहन संभव ही नहीं। जिन लोगों को यह लगता है कि प्रकृति नियमों, परस्परता व संतुलन की बजाय अवतारवाद, नारों व जादू-टोनों से चलती है, उन लोगों को मेरी यह बात पसंद नहीं आई।

    दरअसल गंगा का निर्मल व अविरल होना तथा गंगा में जल-यातायात होना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इनको अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता है, न ही अलग-अलग करके समाधानित किया जा सकता है।

    मीडिया से मालूम पड़ा कि भारत के सर्वोच्च तकनीकी संस्थानों, भारत सरकार के जल से संबंधित विभागों के वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों ने गहन विचार विमर्श करके गंगा नदी में ड्रेजिंग की जाएगी, निष्कर्ष निकाला। सरकार ने तीसियों हजार करोड़ रुपए की लगत से गंगा नदी में ड्रेजिंग की जाने की घोषणा की।

    जल यातायात के लिए नदी में निरंतर जल की मात्रा व प्रवाह होना आवश्यक है। नदी में जल की मात्रा व प्रवाह मूलभूत रूप से नदी व नदी की सतह (बेड) के भूजल-स्रोतों पर निर्भर करता है।

    ड्रेजिंग

    ड्रेजिंग से नदी की सतह को खुरचा जाता है। ऐसा माना जाता है कि नदी की सतह को खुरचने से नदी के भूजल-स्रोत खुल जाएंगे और नदी में जल की मात्रा व प्रवाह बढ़ जाएगा। खुरचने की क्रिया को ड्रेजिंग कहते हैं।

    ड्रेजिंग तकनीक नदियों के लिए हानिकारक होती है, विशेषकर उन नदियों के लिए ताबूत में अंतिम कील की श्रेणी की हानिकारक होती है जिनके भूजल स्रोत मृतप्राय हो चुके होते हैं। ऐसी नदियों में ड्रेजिंग भूजल स्रोतों के साथ नदी की जल-शिराओं को नष्ट कर देती है, क्योंकि नदी में जल लाने वाले भूजल-स्रोतों के मृत हो जाने से नदी में जल लेकर आने वाले प्रवाह मृत हो जाते हैं, जिसके कारण अंदर से जल-शिराएं बनना कम होकर बंद हो जाती हैं। नई जल-शिराओं के बनने की प्रक्रिया में भयंकर कमी, ऊपर से ड्रेजिंग के कारण जल-शिराओं का अपने बचे-खुचे स्रोतों से रिश्ता टूटना, कुछ समय के लिए अस्थाई रूप से जल स्तर का बढ़ना लक्षित हो सकता है, लेकिन नदी के दीर्घकालीन जीवन के लिए बहुत अधिक भयानक होता है।

    Narmada River

    भूजल स्रोतों की जल-शिराओं व नदी का रिश्ता समझने के लिए नर्मदा नदी बहुत बेहतर उदाहरण है। नर्मदा नदी की उत्पत्ति एक छोटे से कुंड से होती है, तेज प्रवाह नहीं, यदि बताया न जाए तो अंदाजा लगाना मुश्किल कि नर्मदा इसी कुंड से निकलती हैं। कई किलोमीटर तक नर्मदा नदी एक पतली सी धारा के रूप में बहती है, मोटी भैंस खड़ी होकर नदी का प्रवाह अवरुद्ध सकती है। यही नदी भूजल स्रोतों व जल-शिराओं से संबंधित होते हुए मध्य भारत की सबसे महत्वपूर्ण व विशालकाय नदी के रूप में विकसित होती है।

    गंगा के लिए प्रयास

    • गंगा महासभा
      मदनमोहन मालवीय ने 1905 में गंगा को हिंदुओं की पवित्र नदी के रूप में ब्रिटिश हुकूमत से स्वीकृति दिलाने के लिए गंगा महासभा की स्थापना की। लगभग दस वर्षों के संघर्ष के पश्चात 1914 में ब्रिटिश हुकूमत ने गंगा को हिंदू धर्म की मान्यताओं के तहत पवित्र नदी का दर्जा दिया। 5 नवंबर 1914 को “अविरल गंगा समझौता दिवस” का नाम दिया गया। 1916 में यह समझौता लागू भी हो गया। लेकिन आजादी के बाद गंगा नदी का प्रयोग बिजली उत्पादन, बांध बनाने, सिचाई के लिए नहर निकालने, औद्योगिक अपद्रव्य व सीवर इत्यादि प्रवाहित के लिए राज्य व केंद्र सरकारों व उद्योगपतियों ने लगातार धुआंधार प्रयोग किया।
    • गंगा एक्शन प्लान
      जनवरी 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने व अविरल प्रवाह के लिए गंगा एक्शन प्लान की स्थापना की।
    • नेशनल रिवर गंगा बेसिन अथारिटी व गंगा राष्ट्रीय नदी

      गंगा को सन् 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने “राष्ट्रीय नदी” घोषित किया। फरवरी 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार ने नेशनल रिवर गंगा बेसिन अथारिटी की स्थापना की। 2010 में आगामी दस वर्षों के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपयों की घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा की गई। 2011 में विश्व बैंक ने लगभग 6000 करोड़ रुपए का अनुदान दिया।
    • नमामि गंगे व गंगा मंथन
      वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद आगामी पांच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपयों की घोषणा “नमामि गंगे” नाम देते हुए कर दी। 7 जुलाई 2014 को गंगा के संदर्भ में विचार विमर्श, चिंतन मनन इत्यादि करने के लिए “गंगा मंथन” कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम को आयोजित करने में अरबों रुपए खर्च हुए। नमामि गंगे कर तहत 2014 से 2016 तक दो वर्षों में लगभग 3000 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 

    उपसंहार

    सन् 2014 में जब माननीय नरेंद्र मोदी जी देश के प्रधानमंत्री बने तब मित्र सचिन खरे को प्रधानमंत्री आवास में प्रधानमंत्री से मिलने व भोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वहां से लौटने के बाद जब मित्र सचिन खरे ने बताया कि उनको प्रधानमंत्री आवास में बेहद स्वादिष्ट आमों का स्वाद लेने का अवसर मिला तो हम अपना मन मसोस कर रह गए, आमों के बारे में मुझे अपने वे दिन याद आ गए जब भारत के “औद्यानिकी विभाग” के राष्ट्रीय महानिदेशक महोदय प्रतिवर्ष देश के सबसे बेहतरीन कई प्रकारों के आमों के कई बड़े डिब्बे हमारे घर भिजवाते थे। उन आमों में कई प्रजातियां तो ऐसी थीं कि खाने के बाद कई-कई दिन तक पेट के भीतर से मुंह में अच्छी सुगंध आती रहती थी, स्वाद बना रहता था।

    मित्र सचिन खरे ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया के पुराने पाठकों में से हैं। उन्हें पता था कि मैंने भारत देश के कई राज्यों के सैकड़ों गांवों में भूजल व कृषि मुद्दों पर स्थानीय सामाजिक स्तर पर हो रहे जमीनी प्रयासों के संदर्भ में “जल व कृषि” पर आनलाइन व प्रिंट दोनों पत्रिकाओं में लाखों रुपयों की लागत से विशेषांक निकाले थे।

    उन्होंने हमसे पूछा कि गंगा के लिए सरकार को क्या करना चाहिए, वे कोशिश करेंगे कि मेरे सुझावों को सरकार, प्रधानमंत्री व गंगा मंत्री तक पहुंचाएं। हमने उनको एक सीधा फार्मूला बताया और कहा कि इस फर्मूले के अलावे कोई अन्य वास्तविक समाधान भी नहीं है, यह भी कहा कि इस फार्मूले को तभी लागू किया जा सकता है जब प्रधानमंत्री महोदय नौकरशाही व सरकारी मंत्रालयों, विभागों व संस्थानों में ऊंचे पदों व ऊंचे वेतनमानों व सुविधाओं के साथ कार्यरत इंजीनियरों व वेतनभोगी जल वैज्ञानिकों की नहीं सुनेंगे। मित्र महोदय ने “जल व कृषि” के विशेषांक की कुछ प्रतियां मुझसे लीं और कहा कि कुछ दिनों में उनकी मुलाकात गंगा मंत्री सुश्री उमा भारती से होने वाली है। वे कोशिश करेंगे कि मेरे सुझाव व प्रतिकाएं उन तक पहुंचा दें, आगे मंत्री जी जानें सरकार जाने।

    अब तक तो इन्हीं सब तथाकथित जल-विशेषज्ञों की बातें ही सुनी व मानी जा रहीं हैं। पिछले कुछ दशकों में गंगा व देश की लगभग सभी नदियां मरणासन्न स्थितियों में पहुंच गईं हैं, गांवों में तालाब, कुएं व सोख्ते नष्ट हो चुके हैं, जमीन के पानी का जलस्तर लगातार तेजी से नीचे जा रहा है। अब चेतने का अंतिम समय है, बेहतर कि इन तथाकथित विशेषज्ञों व कार्यकारी ढांचे को लक्ष्य दिया जाए, लक्ष्य को प्राप्त करने का तरीका बताया जाए। ये लोग सिर्फ लक्ष्य व लक्ष्य प्राप्ति के तरीकों का अनुसरण करें। इन लोगों की विशेषज्ञता, ज्ञान व समझ का परिणाम स्पष्ट दीख रहा है। बेहतर कि प्राकृतिक नियमों, संबंधों व संतुलनों का अनुसरण किया जाए, दुनिया के जो समाज वास्तव में विशेषज्ञ हैं उनसे सीखा जाए।

    चलते-चलते :

    इतने रुपए, संसाधन, चिंतन मनन, तामझाम इत्यादि के बावजूद गंगा नदी दिन प्रतिदिन मरती जा रही है। कारण सिर्फ यह है कि हम भूजल व नदी के प्राकृतिक संबंध, तालमेल व समता को समझना नहीं चाह रहे हैं। हम अपने-अपने स्वार्थों, लोभों, ग्लैमर, भोगों व अहंकारों में लिप्त हैं। हम भोगने की दौड़ में हैं, अगली पीढ़ियां भोग सकें इस चकरघिन्नी में लिप्त हैं, रात दिन व्यस्त हैं, लेकिन एक क्षण के लिए यह नहीं सोचते कि जब जीवन ही नहीं रहेगा तो भोगेंगे कैसे।

    गंगा को पवित्र या दैवीय न मानिए, क्योंकि ऐसा मानते ही हम उसकी चिंता करना बंद कर देते हैं। बेहतर कि गंगा को नदी मानिए, ऐसी नदी जो हमारे कारण मर रही है, जहरीली हो चुकी है, जो जीवनदायिनी व पापनाशक मानी जाती है उसे हमने अपने पापों से जहरीले पाप में परिवर्तित कर दिया है। हम ही गंगा को बचा सकते हैं।

    अन्यथा न देश बचेगा, न देश के लोग। जब देश के लोग ही नहीं रहेंगे तो देश की संस्कृति, अस्मिता, आकार-प्रकार, परंपरा या सभ्यता इत्यादि का कोई मायने क्योंकर हो सकता है।

  • नितीश कुमार, भाजपा व बिहार : पसंद नापसंद के खाचों से इतर व्यवहारिक चर्चा

    Vivek “Samajik Yayavar”


    यदि मार्च 2000 में जब नितीश कुमार केवल 8 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, को छोड़ दिया जाए तो नितीश कुमार नवंबर 2005 में स्थाई रूप से बिहार के मुख्यमंत्री बने। 2005 में जनतादल (यू) व भाजपा ने बिहार में चुनाव मिल कर लड़ा था, वह भी लालू यादव के विरुद्ध। 2005 से 2010 तक जनतादल (यू) व भाजपा ने मिलकर सरकार चलाई। 2010 के बिहार चुनावों में इस गठबंधन ने दुबारा सरकार बनाई 243 सीटों में 206 सीटें जीतकर, जिसमें जनतादल (यू) ने 115 व भाजपा ने 91 सीटें जीती थीं।

    नितीश कुमार ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार का चेहरा बदल दिया। यदि बिहार व गुजरात का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए तो बिहार में विकास विपरीत परिस्थितियों में बहुत बदहाल स्थिति से हुआ था। गुजरात की परिस्थितियां से बिलकुल भिन्न व बहुत अधिक दुरूह।

    भाजपा ने बिहार में सरकार में गठबंधन में होते हुए कभी सीमा से अधिक दबाव नहीं डाला नितीश कुमार के काम करने के तौर तरीकों में। तालमेल से सरकार चल रही थी। गड़बड़ तब हुई जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया। जबकि नितीश कुमार की दबी हुई इच्छा थी उनको बनाया जाए। नितीश कुमार का अनकहा तर्क, यदि NDA द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार का चुनाव विकास से ही तय होना था तो नितीश कुमार का चुनाव होना चाहिए था।

    जून 2013 में नरेंद्र मोदी जी का नाम प्रधानमंत्री के रूप में आगे आते ही, कुछ ही दिनों में जनतादल (यू) पार्टी भाजपा गठबंधन से अलग हो गई, जबकि जनतादल (यू) के ही शरद यादव NDA के राष्ट्रीय समन्वयक थे। नितीश कुमार ने लालू यादव के सहयोग से सरकार बनाई लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में करारी हार हुई। भाजपा ने 40 में से 32 सीटें जीतीं। नितीश कुमार, लालू यादव व कांग्रेस 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव मिलकर लड़े, सरकार बनाई।

    लेकिन नितीश कुमार व लालू यादव का तालमेल दो साल भी नहीं चल पाया। नितीश कुमार को भी यह अहसास हो चुका था कि अब प्रधानमंत्री बनना नहीं। बेहतर कि सकून के साथ तालमेल के साथ पहले जैसे सफलता से सरकार चलाई जाए। लालू यादव के साथ तालमेल न तो चल पा रहा था और न ही चलना ही था, किसी तरह गाड़ी खिंच रही थी। लालू यादव अपनी संतानों को राजनीति में लंबी दूरी के लिए सेट करने की हड़बड़ी में भी हैं।

    नितीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन करके नई सरकार बनाकर छठवीं बार मुख्यमंत्री बने। मेरा मानना है कि नितीश कुमार 2015 के बाद से ही भाजपा के साथ गठबंधन करके सरकार चलाना चाहते थे। नितीश कुमार व भाजपा दोनों बिहार में एक दूसरे के साथ पूरकता में लंबे समय तक सरकार अच्छे से चला चुके हैं। भाजपा ने नितीश के ऊपर बिहार में सरकार चलाते हुए सीमा से अधिक दबाव नहीं डाला, उंगलबाजी नहीं की। दोनों ने बिहार के लिए बेहतर काम भी किए।

    2013 से 2017 तक के चार वर्षों के चक्र में मेरे अनुमान के अनुसार नितीश कुमार से राजनैतिक गणनाओं में दो बार गलतियां हुईं।

    1. 2013 में छिपी हुई प्रधानमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा के कारण नितीश कुमार NDA से अलग हुए। उन्होंने नरेंद्र मोदी के प्रबंधन को हलके में लिया। उनको लगा कि त्रिशंकु संसद में उनकी संभावना रहेगी, उनको यह भी लगा कि वे संसदीय चुनावों में बिहार राज्य में 15 से 20 सीटें निकाल ले जाएंगे।
    2. 2014 में लोकसभा चुनावों में भाजपा की भयंकर जीत व मीडिया प्रबंधन के कारण नितीश कुमार डर गए, उनको लगा कि यदि वे अकेले चुनाव लड़ते हैं तो वे सरकार नहीं बना पाएंगे। यदि बिहार में भाजपा की सरकार बन गई तो मोदी उनके राजनैतिक भविष्य को पूरी तरह खतम कर देंगे।इसलिए नितीश कुमार बिहार चुनाव में अकेले उतरने की बजाय लालू यादव के साथ उतरे। लालू यादव अपने साथ कांग्रेस को भी उतार लाए। जबकि यदि नितीश कुमार यदि हिम्मत दिखाते तो अकेले चुनाव लड़कर भी अच्छी स्थिति में रहते। आवश्यकता पड़ती तो चुनाव के बाद गठबंधन बनाते।

    भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार होने के बावजूद नितीश कुमार ने बिहार में कभी सांप्रदायिक माहौल नहीं बनने दिया। दलितों महादलितों व पिछड़ी जातियों के लिए काम किया। बिहार के लोग आराम चाहते हैं, विकास चाहते हैं, तुलनात्मक बेहतर गवरनेंस चाहते हैं। वे विकास व तुलनात्मक बेहतर गवरनेंस का स्वाद चख चुके हैं।

    इसमें कोई संदेह नहीं कि नितीश कुमार ने बिहार में विकास के माध्यम से चेहरा बदला। नितीश कुमार को बिहार की पिछड़ी जातियां, दलित, महादलित व मुस्लिम पिछड़ी जातियां पसंद करते हैं। नितीश कुमार ने जातिगतता से ऊपर उठकर सर्वमान्य रूप में लोकप्रियता अपने कामों व गवर्नेंस से हासिल की। बिहार का चेहरा बदलने का काम वास्तव में किया, तब भाजपा के साथ ही गठबंधन सरकार में थे। अभी भी उनके पास तीन सालों का समय है। पिछले लगभग 12 सालों से सरकार चला ही रहे हैं, जिसमें लगभग आठ साल सरकार भाजपा के साथ मिलकर ही चलाई है। लोगों का दिल फिर से जीतना असंभव भी नहीं।