Author: संपादक मंडल

  • संयुक्त राष्ट्र संघ, चाइना की स्थाई सदस्यता/वीटो-पावर व पं० नेहरू

    संयुक्त राष्ट्र संघ, चाइना की स्थाई सदस्यता/वीटो-पावर व पं० नेहरू

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई। पांच स्थाई सदस्य थे – अमेरिका, रूस, फ्रांस, इंग्लैंड व रिपब्लिक ऑफ चाइना। अमेरिका व इंग्लैंड इत्यादि ने द्वितीय विश्व युद्ध में चाइना के सक्रिय सहयोग को ध्यान में रखते हुए रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य बनवाया। चाइना संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से है। मतलब यह चाइना संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य मतलब वीटो वाला सदस्य सन् 1945 से है जब भारत आजाद भी नहीं हुआ था इंग्लैंड का ही हिस्सा हुआ करता था। पं० नेहरू का प्रधानमंत्री बनना तो बहुत दूर की कौड़ी थी उस समय। 

    चाइना व संयुक्त राष्ट्र संघ के मुद्दे को समझने के लिए हमें रिपब्लिक ऑफ चाइना व पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के अंतर को समझना पड़ेगा।

    1945 में जब संयुक्त राष्ठ्र संघ की स्थापना हुई तब चाइना को रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा जाता था और चाइनीज नेशनलिस्ट पार्टी का शासन था। 1949 के लगभग जब माओ ने गृहयुद्ध में चीन में तख्तापलट किया और ताइवान इलाके को छोड़कर पूरे चाइना पर कब्जा कर लिया तब चाइना का नाम पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा गया। ताइवान को रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा गया।

    चूंकि 1945 में जो देश स्थाई सदस्य बना था वह था रिपब्लिक ऑफ चाइना, न कि पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना, इसलिए 1949 के बाद भी संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपब्लिक ऑफ चाइना (1949 के बाद वाला ताइवान ही रहा)। 1949 में रूस द्वारा कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) को सैन्य व अन्य सहयोग दिए जाने तथा आगे चल कर मंचूरिया को रिपब्लिक ऑफ चाइना को वापस करने की बजाय पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को दिलवाने इत्यादि जैसे कार्यों के लिए रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) संयुक्त राष्ट्र संघ में रूस को कंडेम्न करना का प्रस्ताव लाया, और यह प्रस्ताव जीता भी। इतना ही नहीं रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) ने 1955 में मंगोलिया मसले पर वीटो का भी प्रयोग किया।

    1960 के दशक में अल्बानिया ने संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव लाने शुरू किए कि संयुक्त राष्ट्र संघ से रिपब्लिक ऑफ चाइना को चाइना न माना जाए बल्कि पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को चाइना माना जाए, तथा रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ से बाहर कर दिया जाए। 1961 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह प्रस्ताव पारित किया कि रिपब्लिक ऑफ चाइना व पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संदर्भ में बदलाव करने के लिए दो तिहाई मतों की जरूरत होगी। सन् 1969 तक संयुक्त राष्ट्र संघ के विएना कन्वेशन्स इत्यादि में भी रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) ही स्थाई व संस्थापक सदस्य के रूप में हस्ताक्षर करता रहा था। यहां यह ध्यान देने की बात है कि पं० नेहरू का देहांत 27 मई 1964 में ही चुका था।

    1970 के आसपास दुनिया के विकसित व अन्य देशों ने पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का चाइना) को रिकगनाइज करना शुरू किया। 1971 में भी संयुक्त राष्ट्र संघ में पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपब्लिक ऑफ चाइना की जगह स्थाई सदस्य मानने के कई प्रस्ताव खारिज हुए। यहां यह ध्यान देने की बात है कि पं० नेहरू का देहांत 27 मई 1964 को हो चुका था।

    1971 वर्ष के अंतिम महीनों में संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपब्लिक ऑफ चाइना की जगह पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना माना गया। इस तरह पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का चाइना) को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मुख्य चाइना मानते ही वह स्वतः स्थाई सदस्य व वीटो पावर वाला देश बन गया।

    जिस नुक्ते के कारण रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) 1945 से 1971 तक संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई व वीटो पावर वाला देश बना रहा। उसी नुक्ते के कारण पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना के बाद से रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता आज तक नहीं मिल पाई है। क्योंकि जैसे पहले रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चीन माना जाता था तथा पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइन को उसका हिस्सा। उसी तरह 1971 के बाद से पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चीन मानने के बाद से रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) को उसका हिस्सा माना जाता है।

    चलते-चलते​

    यदि रिपब्लिक ऑफ चाइना या पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना मानने के नुक्ते को अलग कर दिया जाए तो मुख्य चाइना संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से ही स्थाई सदस्य व वीटो पावर का देश रहा है। 1945 में भारत आजाद तक नहीं हुआ था। 1971 के बहुत पहले ही पं० नेहरू का देहांत हो गया था।

    पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना माने जाने का प्रस्ताव अल्बानिया लेकर आया था, इस तरह के प्रस्ताव कई बार लाए गए जो 1971 के अंत तक हमेशा अस्वीकृत होते रहे थे।

    इसलिए पं० नेहरू ने चाइना को स्थाई सदस्य बनवाया या वीटो पावर दिलवाया, यह सब फालतू बकवास है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह की बकवास थरूर साहेब अपनी किसी किताब में करें या वर्तमान सरकार के नुमाइंदे।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • बदली — Hukum Singh Rajput

    बदली — Hukum Singh Rajput

    ​हुकुम सिंह राजपूत

    ​रहती हू———घर नही!
    भागती हू——-डर नही!
    उड़ती हू—— –पर नही!
    देती हू ——- कर नही!
    आदि से हू —–अमर नही!
    नारी हू ———–नर नही!
    बिन मेरे गुजर बसर नही!
    इस पहेली का अर्थ है 
    बदली

    आइये बदली पर प्रकाश डाले:

    नित्य कहॉ से आती बदली,
    नित्य कहॉ जाती है बदली!
    अपना रङ्ग जमाती बदली,
    सबको नाच नचाती है बदली!

    झटपट रङ्ग बदल देती बदली,
    सफेद से लाल काली हो जाती है बदली!
    तुरन्त आकाश से हट जाती बदली,
    कभी आकाश पर छाई रहती है बदली!

    जङ्गल देख धीरे धीरे चलती बदली,
    रूखी धरती दोड़ खूब लगाती है बदली!
    सीधी कभी ना चलती बदली,
    गोल गोल घूमती रहती है बदली!

    पर्वत पर छा जाती बदली,
    अपना रङ्ग दिखाती है बदली!
    चन्दा सूरज छुपाती बदली,
    कभी खूद छुप जाती है बदली!

    हवा को पलट देती बदली,
    कभी हवा के सङ्ग चल देती है बदली!
    ओष को रोक देती बदली,
    ओले खूब गिराती है बदली!

    प्रात: तूषार गिराती बदली,
    जल खूब बरसाती है बदली!
    गरज गरज कर चलती बदली,
    बिजली खूब चमकाती है बदली!

    इन्द्रधनुष रच देती बदली,
    मयूर को नाच नचाती है बदली!
    धारवा छोड़ देती बदली,
    मूसलाधार जल बरसाती है बदली!

    बेजान झरनो मे जान डालती बदली,
    धरती पर स्वर्ग बनाती है बदली!
    गरजती तो बॉस उगाती बदली,
    चमकती तो आम के फूल जलाती है बदली!

    ठण्ड खूब गिराती बदली,
    गर्मी भी गिराती है बदली!
    सिमट सिमट कर सिमट जाती बदली,
    छोटी से बड़ी हो जाती है बदली!

    बूदबूद कर जल बरसाती बदली,
    फूर फूर से भी काम चला लैती है बदली,
    सागर से गुजर जाती बदली,
    खारे पानी को मीठा बना देती है बदली!

    घट घट कर घट जाती बदली,
    आकाश से हट जाती है बदली!
    कहॉ से जल लाती बदली,
    कोन जाने जल कैसे बरसाती है बदली!

    धरती पर हरियाली करती बदली,
    हरे रङ्ग को हर लेती है बदली!
    सागर की पनिहारी बदली,
    गगन की पटराणी है बदली!
    पल मे ​LOC पार करती बदली,
    बिन पासपोर्ट देश विदेश घूमती है बदली!
    बिना जङ्गल पानी नही बरसाती है बदली,
    बिन पेड़ धरती से प्यार नही करती है बदली!

    कोइ कहे सागर से पानी लाती बदली,
    कोइ कहे पर्वत पर सो जाती है बदली!
    कहे राजपूत बदलीबदली फिरती बदली,
    क्योआपने जङ्गल काटे ऐसा कहती है बदली!

    कटे जङ्गल देख तड़प तड़प कर भागती बदली,
    कही सूखा,कही ज्यादाजल बरसातीहै बदली!
    ज्यादा कम के चक्कर मे खुद फट जाती बदली,
    सारा का सारा जल एक स्थान पर डाल देतीहै बदली!

    पेड लगाओ सीचो संभालो ऐसा कहती बदली,
    कभी धार चलाना नही समझाती है बदली!
    नाच नाच कर पैडृ मुझे नचाता बतलाती बदली ,
    होगा जङ्गल होगा मङ्गल पुकारती है बदली!

    मेडक को आजाद करती बदली,
    पपीहे को पानी पिलाती है बदली!जब जब बरसन लगती बदली,
    दिन रात बरसती रहती है बदली!
    बडै बडे बॉध तोड़ देती बदली,
    बाढ़ नदियो मे लाती है बदली!
    सब कुछ बहा देती बदली,
    जब जब घनघोर बरसती है!

    अलग अलग दल मे रहती है बदली,
    बरसने पर एक हो जाती है बदली!
    जग मै सबसे बडी दाता बदली,
    जग की जीवन जननी है बदली!

    घणा जल है सागर मै बताती बदली,
    बिन जङ्गल जल कैसे बरसायै सोचती है बदली!
    सागर से मिलकर आई कालीकाली बदली,
    अथाह जल भर कर लाई , नही बरसाती है बदली 

    अल्प विराम (क्षमा करना)

    बदली हमे क्या कहती है?
    नाच नाच कर पेड बादल को नचाने वाला है,
    तवासी जलती धरती पर पेड ही जल बरसाने वाला है!
    सागर वही है, पानी वही है, बादल वही है, हवा वही है, फिर सूखा क्यो पडृ जाता है ?
    बस जङ्गल नही है?
    बादल जङ्गल की रानी,
    सागर से लाती है पानी!
    बिन जङ्गल कैसे बरसाये पानी!!
    सूखा ऐसे पड जाता है?

    कारी बदरी घिरघिर आई,
    अथाह जल भर कर लाई!
    बिन जङ्गल होगयी पराई!!
    सूखा—————*

    हमने जङ्गल काटने की ठानी,
    सो बादल नही बरसाती है पानी!
    बादल करती है मनमानी!!
    सूखा————-*

    हमने हाथो से हर लिया मङ्गल,
    काट दिया देखो सब जङ्गल!
    अब घर घर होता देखो दङ्गल!!
    सूखा बार बार पड जाता है
    सूखा—-‘———

    बिन जङ्गल बादल भटकाई,
    कही सूखा कही बरसाई!
    भटकत भटकत बादल फटजाई!
    देखो नयी मूसीबत आई 
    सूखा जबजब पड जाता है—
    जङ्गल कटा तो सब कुछ जल गया???
    छाछ मिली—-‘दु:ख जल गया!
    दूध मिला—–मुख जल गया!
    माचीस मिली—दिया जल गया!
    सहेली मिली—-पिया जल गया!
    चाय मिली——तन जल गया!
    नजर मिली—-मन जल गया!
    पक्षी मिला—-विमान जल गया!
    कूर्सी मिली—-ईमान जल गया!
    हवामिली–पसीना अपने आप जल गया!
    नोकरी छुटी–‘हसीनो का बाप जल गया!
    ज्यादा करन्ट मिला—t—-b जल गयी!
    जेब खाली हुई—b—b’–जव गयी!
    धुम्रपान किया—बहुत कूछ जल गया!
    और
    जङ्गल काटा—तो—‘सब कुछ जल गया!

    ​Hukum Singh Rajput

    ​Hukum Singh Rajput, around 85 years, is a farmer, a poet, an inventor and an innovative community scientist. He is a part of a group of farmers who changed the entire face of their local communities.

  • रिफ्यूजी — Neelam Swarnkar

    रिफ्यूजी — Neelam Swarnkar

    ​Neelam Swarnkar

    मेरी आँखों ने जो मंज़र देखे हैं
    वो सोने नहीं देते रात भर
    आँख बंद किये भी मैं जागता रहता हूँ।
    सपने में आने वाले हैवानों को हकीकत में देखा है
    वे इंसानों का चेहरा ओढ़े हमारे घर जला रहे थे।

    ​भागते हुए जिन लाशों को लांघा
    उनमे से कई चेहरे मेरे बेहद करीब थे
    मेरा छोटा भाई
    जो बिछड़ गया था मुझसे
    तीन दिन बाद मिला
    न रो पाया न हँस पाया।

    ​मेरा सबसे छोटा भाई
    जिसे बाँहों में कस कर पकड़ रखा था मैंने
    नाव पर चढ़ने के दौरान
    बहुत छोटा है, बोलता कुछ नहीं
    बस बड़ी-बड़ी आँखों से देखता है।
    वो पहले ऐसा नहीं था..

    ​माँ..
    जो पिता की याद और हमारे भविष्य की फ़िक्र में रोती है
    और खीझती है,
    वो भी ऐसी नहीं थी..

    ​दरअसल इस रिफ्यूजी कैंप का हर इंसान बदल गया है
    पहले ऐसा कहाँ था
    अब सब बदल गया
    मेरा मुल्क़, मेरे लोग
    ये दुनिया ही पूरी बदल गयी है।

    Neela​m Swarnkar

  • हमारी दुनिया — Anand Kumar

    हमारी दुनिया — Anand Kumar

    ​Anand Kumar

    ​ये कविता एक प्रयास है असमानता के दुनिया भर के कुछ उदाहरणों को साथ लेते हुए। इसे पढ़े तब कल्पना करें की कोई अश्वेत या दलित या महिला कुछ कहना चाह रहे हैं या जिन्होंने भी समानता के लिए कुछ किया या सोचा,  उनकी सोच कैसी रही होगी, बदले की और किस तरह के बदले की।

    कविता के तकनीकी पहलुओं में गड़बडियो के लिए माफ़ी चाहता हूँ, पहला प्रयास है। आशा है इसमें आपको बताये गये तीनो लोग, अश्वेत दलित व महिला मिल जायेंगे। कविता मे हुई भूल चूक के लिए माफ़ी।

    ​हमारी दुनिया

    ​तुम्हारी दुनिया में न मैं था न थे सपने मेरे
    पीढ़ी दर पीढ़ी दफ़्न कर रहे थे तुम निशां मेरे
    हक़, सम्मान और आवाज़ छीन चुके थे तुम
    रोटी,पानी और ज़मीन भी बीन चुके थे तुम
    अफ़्रीका से उठा बाज़ारों में बेचा
    श्रम को मेरे तुमने खूब नोचा
    गर्म तेल से नहला रहे थे
    शहरों से भगा रहे थे
    और इसी बीच
    अपने ग्रंथों में भी
    मेरे वजूद को अपनी दुनिया के लिए भद्दा बता रहे थे तुम।

    घर में कैद किया
    या छिपा के रख लिया  
    कमतर हुँ ये गाये जा रहे थे तुम
    कमर तोड़ दी और आशा भी
    पर छिपाने को परदे बहुत सुनहरे लगाये जा रहे थे तुम
    बस यूँ कहुँ की जाने किस आदर्श पे चलके
    न जाने किसकी दुनिया बसा रहे थे तुम।

    पर मेरी दुनिया थोड़ी अय्याश और
    तुम्हारे आदर्शों को ठेंगा दिखने वाली होगी
    कैद न हो कोई
    पीछे न रह जाये कोई
    फिर कोई अपने घरों से उजाड़ा न जाये
    प्रेम की हवा पे पहरा न लगाया जाये  
    धर्म के आगे कोई बहरा न हो जाये
    कुछ ऐसी ही बातों की मटकी फिर न टूटे
    इसकी गारन्टी देने वाली होगी
    मेरी दुनिया थोड़ी अय्याश और
    आदर्शों को ठेंगा दिखाने वाली होगी।

    तुमने जो सब करने से रोका मुझे
    जैसा मेरा वजूद सोचा तुमने
    मैं तुमसे जी भरके बदला लूंगा
    जैसा किया उसके उलट कर दूंगा।
    अपने हक़ को तो तुमसे लड़ूंगा ही
    तुम्हारे हक की भी बात करूँगा
    बोलना भुलाया तुमने मेरा
    मैं तुम्हारा बोलना न भूलने दूंगा
    न रहना इस ग़लत फ़हमी में की सहूँगा अब
    पर तुम्हे भी सहने नहीं दूंगा
    मैं तुमसे जी भरके बदला लूंगा।

    विज्ञानं साहित्य और कला के आगे किसी को आने नहीं दूंगा
    खुद को सिखाऊंगा सीखूंगा गिरूंगा उठूंगा फिर से लिखूंगा
    पर इस बार किसी को किसी का वजूद कमतर न लिखने दूंगा
    अब इस दुनिया से जी भर के बदला लूंगा।

    माना कुछ पुरानी बातें भी लिख दी है
    सुधरे है हालात काफ़ी
    पर ये भी सच है कि अभी चलना है और दूर और काफ़ी
    तुम्हारी दुनिया में मैं न था
    पर हमारी दुनिया मै ऐसा न होगा।

    Anand Kumar

  • ऑस्ट्रेलिया गांव-श्रंखला : मडजी-गांव

    ऑस्ट्रेलिया गांव-श्रंखला : मडजी-गांव

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ऑस्ट्रेलिया में केंद्र या राज्य सरकार की ओर से ग्राम-समाज के लिए नौकरशाही नियुक्त नहीं होता है। कोई नौकरशाह स्थानांतरण होकर नहीं आता है कि राज्य-सरकार या केंद्र-सरकार अपने द्वारा नियुक्त नौकरशाहों को ग्राम-समाज को संचालित करने के लिए भेजे।

    ग्राम समाज अपनी जरूरतों के लिए नौकरियां निकालता है, अपनी नौकरशाही की नियुक्ति स्वयं करता है तथा नौकरशाही पर संपूर्ण नियंत्रण ग्राम-समाज का होता है। ग्राम-समाज नौकरशाही को बर्खास्त कर सकता है। योग्यता के मानदंड सरकारें तय करतीं हैं, वेतन सरकारें देतीं हैं।

    ग्राम-समाज को अपनी सामाजिक संपत्तियों व लगाए गए करों पर अधिकार होता है। रेवेन्यू में से कुछ हिस्सा केंद्र सरकार, कुछ हिस्सा राज्य सरकार को जाता है, बड़ा हिस्सा ग्राम-समाज के पास रहता है। छोटी-छोटी बात के लिए ग्राम-समाज को राज्य या केंद्र सरकार के आगे भिखारी की तरह हाथ नहीं पसारने पड़ते हैं। ग्राम-समाज अपनी संपत्तियों का प्रयोग अपने अनुसार करता है।

    ग्राम-समाज को नियंत्रित करने के लिए ग्राम विकास अधिकारी, ब्लाक विकास अधिकारी, तहसीलदार, उपजिलाधिकारी, जिलाधिकारी जैसी सांमती, राजसी व अलोकतांत्रिक तथा केंद्र/राज्य सरकार केंद्रित नौकरशाही नहीं होती है।

    राज्य की राजधानी से लगभग 260 किलोमीटर तथा विधानसभा क्षेत्र के मुख्यालय से लगभग 130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक गांव है मडजी। यह गांव समुद्र तट पर या समुद्र तट को जोड़ने वाले किसी मार्ग पर भी स्थित नहीं है, पर्यटन स्थल भी नहीं है। कहने का तात्पर्य यह कि यह गांव प्रिविलेज्ड गांव नहीं है, इसके बावजूद इस गांव की जीवन-शैली, जीवन-स्तर, सुविधाओं व सामाजिक-मूल्यों इत्यादि से ऑस्ट्रेलिया की व्यवस्थाओं, सरकारी व सामाजिक तंत्रों की जिम्मेदारी व जवाबदेही के संदर्भ में कल्पना तो की ही जा सकती है।



    लेख के सबसे अंत में हाईस्कूल व प्राइमरी स्कूल की अनेक फोटो हैं, अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया के गांव तक में सरकारी शिक्षा व्यवस्था का स्तर कैसा है।

    (लेख में प्रयुक्त सभी फोटो मडजी गांव की ही हैं)

    —जीवन-स्तर—

    मडजी की जनसंख्या ग्यारह हजार से कम है, लेकिन 60 से अधिक अच्छे रेस्त्रां व 6 से अधिक सुपरमार्केट हैं। 10 से अधिक पेट्रोल पंप हैं। कार कंपनियों के शोरूम हैं। लोग खूबसूरत व अत्याधुनिक सुविधाओं से संपन्न घरों में रहते हैं। घरों की कीमत लगभग एक करोड़ रुपए से शुरू होकर 15-20 करोड़ रुपए या अधिक तक है।

    • हवाई-अड्डा है। रेलवे स्टेशन है। लोकल बस सेवा है। लंबी दूरी बस सेवा है।
    • सीनियर सिटिजन के लिए मुफ्त स्थानीय व अंतःराज्यीय सामुदायिक-यातायात व्यवस्था है। 
    • सामुदायिक स्टेडियम है। गोल्फ-क्लब, क्रिकेट क्लब जैसे विभिन्न प्रकार के खेलों के अनेक क्लब हैं।
    • सामुदायिक तरणताल (स्विमिंग पूल) हैं।
    • सामुदायिक लाइब्रेरी है, सामुदायिक सिनेमा हाल है। थिएटर है।
    • न्यायालय है। अस्पताल हैं। पुलिस स्टेशन है, पोस्ट आफिस है।
    • बैंकों की शाखाएं व अनेक एटीएम हैं।
    • हाईस्कूल है। प्राइमरी स्कूल है।
    • बच्चों के लिए प्लेग्राउंड व पार्क हैं। फुटपाथ हैं।
    • साइकिल के लिए विशेष सड़के हैं। 
    • सेवज ट्रीटमेंट प्लांट है।
    • वर्षा जल-संग्रहण व शुद्ध पेयजल के लिए प्लांट है।
    • चौबीसो घंटे बिजली की आपूर्ति है।
    • चौबीसो घंटे पेयजल की आपूर्ति है।
    • 24 से अधिक बड़े पार्क हैं। 6 बड़े प्रदर्शनी स्थल हैं।

    निवास

    रेस्टोरेंट व सुपरमार्केट

    कार शोरूम

    —ग्राम-समाज के सामाजिक मूल्य—

    ग्राम-सूचना केंद्र

    अशक्त व अक्षम लोगों के लिए मुफ्त भोजन

    जो लोग बहुत कमजोर हैं या वृद्ध हैं या युवा लोग चलने में अक्षम हैं और पहियों पर भोजन की सेवा के लिए अहर्ता रखते हैं उनके लिए ग्राम-पंचायत गर्म व पौष्टिक व स्वादिष्ट भोजन उनके घर पर उपलब्ध कराती है। इसका योजना का नाम पहियों पर भोजन दिया गया है। समाज का मानना है कि सभी को अच्छे भोजन का अधिकार है, इसलिए इस सेवा के लिए जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनसे ही आर्थिक सहयोग लिया जाता है, जो सक्षम नहीं हैं उनको यह सेवा मुफ्त उपलब्ध कराई जाती है।  

    सामुदायिक-यातायात

    ग्राम-पंचायत सामुदायिक-यातायात की सेवा उपलब्ध कराती है। यह सेवा मडजी के आसपास के इलाकों से लेकर राज्य की राजधानी तक ले जाने व वापस लाने तक की सेवा उपलब्ध कराती है। यात्रा का कारण पिकनिक मनाने जाना, मित्रों या रिश्तेदारों से मुलाकात करने जाना, चिकित्सा कारणों से संबंधित यात्रा, दूसरे शहर या दूसरे गांव की बाजार में खरीदारी करने जाना, पर्यटन इत्यादि कुछ भी हो सकता है।

    आवश्यकतानुसार इस सेवा के लिए कारों से लेकर बसें तक उपलब्ध हैं। चालक स्वयंसेवक होते हैं, उनको उनकी सेवा के लिए वेतन नहीं मिलता है। अरबपति खरबपति लोग भी इस सेवा के लिए सहर्ष स्वयंसेवक बनते हैं।

    इस सेवा के लिए कोई बंधा किराया नहीं है क्योंकि यह सेवा व्यापारिक लाभ के लिए नहीं होती। नाममात्र का मेंटीनेंस खर्च (औसत निकाल कर) व पेट्रोल/डीजल का खर्च। वाहन में जितने लोग यात्रा कर रहे होते हैं, यह खर्च उनमें बराबर बांट दिया जाता है।

    जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, उनके लिए यह सुविधा मुफ्त होती है, उनका खर्च ग्राम-पंचायत/सरकार वहन करती है।

    सामुदायिक-सब्जी-उद्यान

    जैविक सब्जियों व फलों के सामुदायिक उत्पादन के लिए मडजी में सामुदायिक उद्यान हैं। यहां उत्पादन में सक्रिय भागीदारी करते हुए सीखने सिखाने का काम होता है। जो भी उत्पादन में सक्रिय भागीदारी करता है उसके लिए उत्पाद मुफ्त उपलब्ध होता है।

    जल-स्रोतों की देखभाल

    ग्राम-पंचायत के क्षेत्र से निकलने वाली नदियों, बरसाती नालों, झीलों, तालाबों इत्यादि की साफ-सफाई, रिपरियन जोन व आसपास के क्षेत्र में पेड़-पौधों का रोपड़ व देखभाल की जिम्मेदारी गांव-समाज ईमानदारी से करता है।

    जल-स्रोतों की देखभाल करने के पीछे के प्रमुख कारण – पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, जलचरों के उत्पादन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, कृषि के लिए जल की शुद्धता व गुणवत्ता सुनिश्चित करना, प्राकृतिक सौंदर्य संरक्षण इत्यादि।

    राजमार्गों व सड़कों इत्यादि के निर्माण कार्य से होने वाली पर्यावरण की क्षति को राजमार्गों व सड़कों के आसपास वृक्षारोपड़ तथा वर्ष-जल-निकास इत्यादि के प्रबंधन की जिम्मेदारी।

    वृक्षारोपड़

    प्रतिवर्ष कई बार ग्राम-पंचायत द्वारा वृक्षारोपड़ अभियान चलाया जाता है। इसके अंतर्गत जल-स्रोतों के किनारों व आसपास, सड़कों, स्कूलों, सार्वजनिक आर्द्रिभूमि इत्यादि क्षेत्रों में पौधारोपड़ किया जाता है। जिसको जिस क्षेत्र में रुचि हो वह उस क्षेत्र के स्वयंसेवक समूह के साथ जुड़ सकता है।

    कूड़ा-प्रबंधन

    सामान्य कूड़ा, कागज-गत्ता वाला कूड़ा, टिन लोहा स्टील एल्म्युनियम कांच प्लास्टिक-बोतल इत्यादि कूड़ा, जैविक कूड़ा; इन चार प्रकार के कूड़ों के लिए हर घर को चार प्रकार के कूड़ा-कोष्ठ मिलते हैं। सामान्य व जैविक दो प्रकार के कूड़ा-कोष्ठ प्रति सप्ताह तथा अन्य दो प्रकार के कूड़ा-कोष्ठ पाक्षिक रूप से ग्राम-पंचायत द्वारा घर से उठाए जाते हैं।

    बच्चों के लिए प्लेग्राउंड व पार्क

    साइकिल के लिए विशेष मार्ग

    —सुविधाएँ—

    हवाई-अड्डा है, रेलवे स्टेशन हैं, लोकल बस सेवा है, सामुदायिक यातायात व्यवस्था है। हाईस्कूल है, प्राइमरी स्कूल हैं। सामुदायिक स्टेडियम है, सामुदायिक तरणताल हैं। गोल्फ-क्लब है। सामुदायिक लाइब्रेरी है, सामुदायिक सिनेमा हाल है। ग्राम-पंचायत का न्यायालय है। अस्पताल हैं, पुलिस स्टेशन है, पोस्ट आफिस है। कई बैंकों की शाखाएं व अनेक एटीएम हैं। फुटपाथ हैं, साइकिल के लिए विशेष सड़के हैं।

    सेवज ट्रीटमेंट प्लांट है। पीने के पानी के लिए प्लांट है। चौबीसो घंटे बिजली की आपूर्ति है। चौबीसो घंटे पेयजल की आपूर्ति है। 24 से अधिक बड़े पार्क हैं। 6 बड़े प्रदर्शनी स्थल हैं।

    सेवज-ट्रीटमेंट प्लांट

    मडजी का सारा सेवज-वाटर पहले ट्रीट किया जाता है, फिर स्थानीय नदी में पहुंचा दिया जाता है।

    वर्षा जल-संग्रहण व पेयजल

    पेयजल व घरेलू आपूर्ति के लिए दो बांध बनाकर बड़ी-बड़ी झीलें बनाई गई हैं। इन झीलों की पानी संग्रहण की क्षमता यह है कि यदि इनमें पानी पूरा भरा है और यदि पानी नहीं बरसे तो उस स्थिति में भी यदि हर परिवार हजार-दो हजार लीटर पानी भी प्रतिदिन प्रयोग करे, झीलों का पानी वाष्पित भी होता रहे तब भी पूरे मडजी को पंद्रह-बीस वर्षों से भी अधिक समय तक पानी की आपूर्ति की जा सकती है। धरती के अंदर के पानी को प्रयोग करने की जरूरत नहीं। पानी की आपूर्ति के पहले उसको पेयजल-वाटर-ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट किया जाता है।

    हवाई-अड्डा

    तकरीबन 250 एकड़ के क्षेत्रफल में मडजी का हवाई-अड्डा बना हुआ है। जिसके मुख्य-रनवे की लंबाई लगभग पौने-दो किलोमीटर है।

    रेलवे-स्टेशन

    चूंकि लोग कारों व छोटे हवाई जहाजों का प्रयोग यातायात के लिए अधिक करने लगे, इसलिए लगभग दो दशकों पूर्व स्थानीय लोगों की सहमति लेकर यहां के लिए रेलवे सेवा बंद कर दी गई। रेलवे-स्टेशन अब भी है, हेरिटेज के रूप में पंजीकृत है। आजकल रेलवे-स्टेशन के एक हिस्से का प्रयोग कला व शिल्प वीथि के रूप में किया जाता है।

    ऑस्ट्रेलियन रूरल एजुकेशन सेंटर

    ऑस्ट्रेलिया में ग्राम-पंचायतों में ऑस्ट्रेलियन रूरल एजुकेशन सेंटर होते हैं। जहां विभिन्न प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है। किसानों के उत्पादों तथा संबंधित विज्ञान, तकनीक इत्यादि के लिए मेले लगते हैं। मेले के दिनों में ग्राम-पंचायत की ओर से मुफ्त बस सेवाएं चलाई जाती है।

    लाइब्रेरी

    लाइब्रेरी में इंटरनेट, प्रिंटिंग, कम्प्यूटर, स्कैनिंग, सभा-कक्ष, प्रोजेक्टर-रूम इत्यादि की सुविधाएं हैं। नवजात शिशुओं से लेकर छोटे बच्चों के आयु-वर्ग के लिए लाइब्रेरी द्वारा हर सप्ताह दो दिन विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

    मोबाइल लाइब्रेरी की भी सुविधा है। मोबाइल लाइब्रेरी स्कूलों व चुने हुए सार्वजनिक स्थानों में हर तीसरे सप्ताह के अंतराल पर पहुंचती है। किस क्षेत्र में किस सप्ताह व किस तारीख को पहुंचेगी इसकी सूचना अग्रिम उपलब्ध रहती है।

    अस्पताल

    बैंक

    न्यायालय

    पुलिस-स्टेशन

    फायर-ब्रिगेड

    पोस्ट-आफिस

    स्टेडियम व थिएटर

    टेनिस क्लब

    थिएटर

    —शिक्षा—

    हाईस्कूल

    पुस्तकालय

    पुस्तकालय

    खेलकूद

    खेलकूद

    छात्रों द्वारा बनाया गया

    छात्रों द्वारा बनाया गया

    प्राइमरी स्कूल

    ऑस्ट्रेलिया में प्राइमरी का मतलब कक्षा 6 तक की पढ़ाई। इस प्राइमरी स्कूल में लगभग 600 छात्र/छात्रा हैं, जिनके लिए कुल 76 स्टाफ हैं। लगभग 150-200 कम्प्यूटर व आई-पैड हैं। वेतन व कैंटीन के खर्चों के अलावा स्कूल का सालाना खर्च लगभग 7.5 करोड़ रुपए है। वेतन व कैंटीन के खर्चों को जोड़कर कुल सालाना खर्च कई गुना अधिक रहता है।

    क्लासरूम

    क्लासरूम

    क्लासरूम

    खेलकूद

    खेलकूद

    खेलकूद

    खाना-पीना

    खेलकूद

    कला

    कला

    कम्प्यूटर

    कम्प्यूटर

    मुख्य-हाल

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • बृजलाल द्विवेदी स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किए जाएंगे अरुण तिवारी

    बृजलाल द्विवेदी स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किए जाएंगे अरुण तिवारी

    3 फरवरी, 2019 को ‘मीडिया विमर्श’ के आयोजन में होंगे सम्मानित


    हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘प्रेरणा’ (भोपाल) के संपादक अरुण तिवारी को दिया जाएगा। सम्मान समारोह 3 फरवरी, 2019 को गांधी भवन, भोपाल में दिन में 11 बजे आयोजित किया गया है। समारोह के मुख्यअतिथि वरिष्ठ पत्रकार डा. हिमांशु द्विवेदी होंगे तथा अध्यक्षता प्रख्यात समालोचक डा. विजय बहादुर सिंह करेंगे। कार्यक्रम में मुख्यवक्ता के रूप में कथाकार श्री मुकेश वर्मा, विशिष्ट अतिथि के नाते व्यंग्यकार गिरीश पंकज और एटीजी मीडिया लिमिटेड के प्रबंध निदेशक अरविंद तिवारी मौजूद रहेगें।

    अरुण तिवारी  साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ संस्कृतिकर्मी, कवि एवं लेखक भी हैं। 21 वर्षों से वे समकालीन लेखन को समर्पित साहित्यिक पत्रिका ‘प्रेरणा’ का संपादन कर रहे हैं। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार और मीडिया विद्यार्थी हिस्सा लेंगे। पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव(पूर्व संपादकः नवभारत टाइम्स,मुंबई), रमेश नैयर (पूर्व निदेशकः छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी, रायपुर), तथा डा. सच्चिदानंद जोशी (सदस्य सचिवः इंदिरा गांधी कला केंद्र,दिल्ली) शामिल हैं।

    इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज (गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज, सद्भावना दर्पण (रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज, व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा. प्रेम जनमेजय, कला समय (भोपाल) के संपादक विनय उपाध्याय, संवेद (दिल्ली) के संपादक किशन कालजयी, अक्षरा (भोपाल) के संपादक कैलाशचंद्र पंत, अलाव (दिल्ली) के संपादक रामकुमार कृषक को दिया जा चुका है। सम्मान का यह ग्यारहवां वर्ष है। त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिल भारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रुपए, शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है।

    Arun Tiwari

  • लौटना होगा हमें भी − Ashish Pithiya ‘Farmer’

    लौटना होगा हमें भी − Ashish Pithiya ‘Farmer’

    Ashish Pithiya

    हमारे समाज मे मनुष्य सस्ती लोकप्रियता पाने के चक्कर में इतना स्वार्थी होता जा रहा जा रहा हैं कि जीवन जीने की मुलभुल चीजों का विनाश करने पर आ गया हैं और समाज व पर्यावरण के हित-अहित की चिंता किये बीना ही जीवन जीने के मूलभूत स्त्रोतों से नाश करने लगा हैं

    “लौटना होगा हमें भी”

    लौटना होगा हमें भी,
    उन मछुआरों की तरह,
    जो खाना ढूंढने जाते हैं, अपने घर से बीच समुन्दर,
    और लौट आते हैं वापिस, अपने घर खाना खाने को।
    लौटना होगा हमें भी,
    उन साँपो की तरह,
    जो गर्मी से बचने चले आते हैं, अपने बिलो से बाहर,
    और लौट जाते हैं वापिस, अपने बिलो में गर्मी से बचने को।
    लौटना होगा हमें भी,
    उन साइबेरियन पक्षियों की तरह,
    जो अपना अस्तित्व बचाने मिलों दूर से आते हैं,
    और लौट जाते हैं वापिस, अपना अस्तित्व बचाने को।
    बिलकुल वैसे ही,
    लौटना होगा हमें भी।
    ठीक उसी जगह जहाँ से ये सब शुरू हुआ था।
    साँस लेने के लिए, जंगलों की ओर
    पेट भरने के लिए, खेतों की ओर
    प्यास बुझाने के लिए, नदियों की ओर
    पर उससे भी पहले
    उन सारी नदियों को जिंदा करना होगा, जो मर गयी हैं।
    वे सारे जंगल फिर से लगाने होंगे, जिनको काटा गया है।
    उन सारे खेतों में फिर से फसल लगानी होगी, जो बंजर हो गये हैं।
    पर उससे भी पहले
    हमें मरना होगा इन जहरीली हवाओं में,
    हमें भूखा रहना होगा, आलिशान बड़ी बड़ी इमारतों में
    हमें प्यासा रहना होगा, इन चकाचौंध वाली दुनिया में
    पर उससे भी पहले
    हमें जीना होगा झूठमूठ के सारे ख्वाबों को,
    जिसके होने न होने से जीवन में कोई फर्क नही पड़ता।
    हमें खाना होगा सारे पैसे को
    जिसका भूख से कोई वास्ता नहीं।
    हमें तृप्त होना होगा उन सारी प्यासों से
    जिसका पानी से कोई रिश्ता नहीं।
    फिर लौटना होगा हमें भी।

    Ashish Pithiya ‘Farmer’


  • हिंदी फिल्मों में किन्नर व समलैंगिक समाज की उपस्थिति का विश्लेषण —Sangeeta Gandhi PhD

    हिंदी फिल्मों में किन्नर व समलैंगिक समाज की उपस्थिति का विश्लेषण —Sangeeta Gandhi PhD

    Sangeeta Gandhi PhD

    सिनेमा के विषय मूल रूप से सामाजिक,सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित होते हैं। समाज की प्रचलित मान्यताओं को ही अधिकतर सिनेमा में अभिव्यक्ति मिलती है। सामाजिक परिप्रेक्ष्यों से अलग हटकर चित्रण मुख्य धारा के हिंदी सिनेमा में गिना-चुना ही है। यही बात हिंदी फिल्मों में -किन्नर व समलैंगिक समाज के चित्रण के संदर्भ में भी कही जा सकती है। इस समाज पर बहुत अधिक फिल्में नहीं बनी। जो बनी भी हैं, वे या तो इस समाज की हास्यात्मक अभिव्यक्ति करती हैं। या मात्र उतेजक सामग्री परोसती हैं। कुछ गिनी चुनी फिल्में ही हैं, जिनमें समाज के ये उपेक्षित वर्ग सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।

    भारतीय सामाजिक सरंचना में किन्नर व समलैंगिक वर्ग सदैव हाशिये पर रहा है। भले ही इतिहास व मिथकों में बृहन्नला व शिखंडी जैसे चरित्र विद्यमान रहे हों। सामाजिक दृष्टि से तो ये वर्ग उपहास व विकृति के पर्याय रहे हैं। कानूनी दृष्टि से भी इन्हें उपेक्षित रखा गया है। किन्नर समाज सदा उपेक्षित रहा है। 15 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने किन्नर वर्ग को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दी है। समलैंगिक अभी भी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की 1880 की धारा 377 को ढो रहे हैं।इस आधार पर उन्हें अपराधी माना जाता है और इस पर मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।1993 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने समलैंगिकता को प्राकृतिक वृत्ति घोषित कर दिया था पर भारत में अभी इन्हें पहचान मिलना बाकी है।

    फिल्में समाज का आईना होती हैं। समाज किन्नर, उभयलिंगी व समलैंगिक समाज को हाशिये पर रखता है। फिल्मों में भी इस समाज को मुख्यतः हास-परिहास वाले कॉमेडी पात्र के रूप में स्थान मिला है। अभिनेता महमूद की फ़िल्म ‘कुंवारा बाप’ में किन्नर समुदाय पर एक गीत फिल्माया गया है। इन्हें परम्परागत रूप में जन्म के अवसर पर गाते, नाचते दिखाया गया है। बहुत सी फिल्मों में किन्नर पात्र का चित्रण इसी रूप में मिलता है। विवाह, जन्म आदि के अवसर पर बधाई गीत गाते हुए ही अधिकांशतः नज़र आते हैं।

    हिंदी फिल्मों में ये वर्ग स्त्रैण गुणों से युक्त एक विदूषक के रूप में चित्रित होता आया है। सामाजिक ताने-बाने का असर फिल्मों पर भी होता है। समाज इनकी हंसी उड़ाता है तो फिल्मों में भी यह वर्ग हास्यात्मक अभिव्यक्ति पाता है।

    ‘कल हो न हो’ फ़िल्म में गे सम्बन्ध तो नहीं हैं पर ‘गे सीक्वेंस’ को कॉमेडी रूप में चित्रित किया गया है। वास्तविकता यह है कि समाज समलैंगिकता को विकृति मानता है। यही कारण है कि हिंदी फिल्मों में इस प्रकार के सम्बन्ध कॉमेडी रूप में दर्शाए जाते हैं। ‘दोस्ताना’ फ़िल्म में अभिनेता अभिषेक बच्चन व जॉन अब्राहम समलैंगिक होने का नाटक करते हैं। यहां भी समलैंगिकता हास्य की वस्तु है। किन्नर वर्ग पर बनी फिल्मों में ‘शबनम मौसी’ प्रमुख है। यह फ़िल्म प्रथम किन्नर विधायक शबनम के जीवन पर आधारित है। उसके संघर्ष, पीड़ा का सजीव चित्रण फ़िल्म में हुआ है। अभिनेता आशुतोष राणा ने शबनम मौसी का किरदार निभाया है।

    किन्नर वर्ग पर आधारित दूसरी उल्लेखनीय फ़िल्म है ‘तमन्ना’। किन्नर टिकू व लड़की तमन्ना की कहानी पर आधारित यह फ़िल्म इस समाज को नई दृष्टि से देखने की सोच देती है। टिकू अनाथ लड़की तमन्ना को पालता है। कितनी तरह की कठिनाइयां उसके सामने आती हैं। परिस्थितियां कैसे उसे बार बार यह जताती हैं कि वो एक किन्नर है! इस पीड़ा की सशक्त अभिव्यक्ति इस फ़िल्म में मिलती है। अंततः फ़िल्म यह संदेश देती है कि किन्नर भी इंसान हैं। उन्हें इसी रूप में सम्मान दो। फ़िल्म में परेश रावल व पूजा बेदी ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।

    1996 की फ़िल्म ‘दरमियान’ में 1940 के दशक की एक अभिनेत्री व उसके किन्नर पुत्र की कहानी है। अभिनेत्री अपने पुत्र को स्वीकार नहीं करती, उसे समाज से छुपा कर रखती है। कहानी पारम्परिक सोच को ही दर्शाती है। किरण खेर व आरिफ जकारिया ने फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।

    किन्नर वर्ग का एक बिल्कुल अलग रूप फ़िल्म ‘सड़क’ में मिलता है। इस फ़िल्म में किन्नर ‘महारानी’ का किरदार एक खलनायक है।एक क्रूर खलनायक जो नायक, नायिका का शत्रु है। परम्परागत किन्नर चित्रण से अलग यह नवीन प्रस्तुति थी। ऐसा लगता है कि जैसे किन्नर महारानी पात्र समाज से अपनी स्थिति का प्रतिशोध ले रहा है। मुख्य भूमिका सदाशिव अमरापुरकर ने निभाई थी। इसके बाद कुछ अन्य फिल्मों में भी किन्नर पात्र खलनायक के रूप में प्रदर्शित हुए।

    समलैंगिक सम्बन्धों को हमारा समाज व कानून भले मान्यता न देता हो पर इन सम्बन्धों पर पिछले कुछ वर्षों में बहुत सी फिल्में बनीं हैं। ये फिल्में बहुत सफल नहीं रहीं । इनकी एक बड़ी कमी है- इनमें सहज समलैंगिक सम्बन्ध दिखाने के स्थान पर मात्र उतेजक विषय वस्तु को लिया गया है।

    रागिनी एमएम एस 2, ओमर, आई कांट थिंक स्ट्रेट, बॉम्बे टाकीज़, गर्ल फ्रेंड  आदि फिल्में इसी प्रकार की हैं। रीमा कागती की फ़िल्म ‘हनीमून ट्रेवल्स’ समलैंगिक सम्बन्धों के बारे में एक मुद्दा उठाती है। यदि किसी गे का विवाह अपनी सोच से विपरीत स्त्री से हो जाये तो क्या परेशानियां आती हैं? इन प्रश्नों को इस फ़िल्म में दिखाया गया है।

    मधुर भंडारकर की फिल्मों ‘पेज 3’ व ‘फैशन’ में इन सम्बन्धों का एक नया पक्ष प्रस्तुत हुआ है। आगे बढ़ने व सफलता पाने के लिए समलैंगिक रिश्ते बनाना। ‘फैशन’ व ‘हीरोइन’ फिल्मों में परिस्थितिवश बने लेस्बियन रिश्ते प्रस्तुत हुए हैं।

    समलैंगिक लेस्बियन रिश्तों पर सबसे उल्लेखनीय फ़िल्म दीपा मेहता की ‘फायर’ है। 1996 कि ये फ़िल्म बहुत विवादित भी रही। इसे कई पुरस्कार भी मिले। शबाना आज़मी व नंदिता दास की इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएं थीं। पितृसत्तात्मक समाज के दबे घुटे माहौल में पीड़ित दो स्त्रियाँ सारे बन्धन तोड़ देती हैं। पुरुषों से प्राप्त उपेक्षा उन्हें एक दूसरे के करीब लाती है।

    यहां महत्वपूर्ण यह है कि उनमें जन्मजात समलैंगिक वृति नहीं है। परिस्थितिवश एक दूसरे से प्राप्त सम्वेदना उन्हें इन सम्बन्धों के लिए प्रेरित करती है। पद्मावत फ़िल्म में अल्लाउदीन खिलजी व मलिक काफूर के ऐतिहासिक समलैंगिक रिश्तों को भी दिखाया गया है।

    हिंदी फिल्मों में किन्नर वर्ग व वैकल्पिक यौनिकता (उभयलिंगी, समलिंगी) वर्ग पर फिल्में तो बनी हैं पर इन वर्गों के संघर्ष, चेतना, पीड़ा को प्रचुरता से नहीं दर्शाया गया। इस समाज की पहचान, अस्मिता को केंद्र में रखकर इनकी शिक्षा, व्यवसाय, सामाजिक स्थान व स्वीकृति  पर आधारित फिल्मों का निर्माण अभी शेष है।

    Sangeeta Gandhi PhD

    शोध कार्य:
    • पाली -सम्वेदना और शिल्प
    • अमृतलाल नागर जी के उपन्यासों में सांस्कृतिक बोध
    सम्मान:
    • वनिका प्रकाशन व लघुकथा गागर में सागर की ओर से लघुकथा लहरी सम्मान से सम्मानित
    • साहित्य सागर व सत्यम प्रकाशन की ओर से काव्य गौरव व काव्य सागर सम्मान से सम्मानित
    प्रकाशित संग्रह:
    • दास्ताने किन्नर कहानी संग्रह में कहानी प्रकाशित
    • स्वाभिमान, नए पल्लव 2 संग्रह,आस पास से गुजरते हुए, समकालीन प्रेम विषयक लघुकथाएं, नई सदी की लघुकथाएँ, परिंदों के दरमियाँ, सहोदरी लघुकथा संग्रह में लघुकथाएँ प्रकाशित
    • सहोदरी सोपान 4 साझा काव्य संग्रह,मुसाफिर साझा काव्य संग्रह, समकालीन हिन्दी कविता संग्रह प्रकाशित
    • व्यंग्य प्रसंग ,कहानी प्रसंग ,कविता प्रसंग संग्रहों में क्रमशः व्यंग्य ,कहानी व कविताएँ प्रकाशित
    पत्रिकाएं:

    अविराम साहित्यिकी, आधुनिक साहित्य, लघुकथा कलश, दृष्टि, विभोम स्वर, शुभ तारिका, सरस्वती सुमन, शैल सूत्र, निकट, ककसाड़, शेषप्रश्न, अट्टहास, अनुगुंजन, नायिका, पर्तों की पड़ताल, सत्य की मशाल, सुरभि, नारी तू कल्याणी, प्रयास, अनुभव, सन्तुष्टि सेवा मासिक, बुन्देलखण्ड कनेक्ट, प्रणाम पर्यटन, आदि ज्ञान, नवल, क्राइम ऑफ नेशन, शतदल समय, पत्रिकाओं में कविता, लघुकथा, लेख, व्यंग्य प्रकाशित।

  • सांस्कृतिक संवेदनहीनता के समय में ‘लोक’ —Prof Sanjay Dwivedi

    सांस्कृतिक संवेदनहीनता के समय में ‘लोक’ —Prof Sanjay Dwivedi

    Prof Samjay Dwivedi

    जब समाज में गहरी सांस्कृतिक संवेदनहीनता जड़ें जमा चुकी हो और राजनीति अपने सर्वग्रासी चरित्र में सबसे हिंसक रूप से सामने हो, तो लोक और लोकजीवन की चिंताएं बेमानी हो जाती हैं। गहरी सांस्कृतिक निरक्षरता और जड़ता से भरे-पूरे नायक, लोक पर अपनी सांस्कृतिक चिंताएं थोपते हुए दिखते हैं। सबका अपना-अपना ‘लोक’ है और अपनी-अपनी नजर है। इस लोक का कोई इतिहास नहीं और कोई विचार नहीं है। उसकी सहज प्रवाही धारा के बरक्स अब ‘लोक’ को ‘लोकप्रिय’ बनाने और कुल मिलाकर ‘कौतुक’ बना देने के प्रयत्नों पर जोर है। शायद यही कारण है कि लोकसंस्कृति का भी कोई व्यवस्थित विमर्श हम आज तक खड़ा नहीं कर पाए हैं। कलाएं भी तटस्थ और यथास्थितिवादी होती हुई दिखती हैं।

    हम देखें तो लोक, समाज की सामूहिक शक्ति का प्रकटीकरण है। जबकि बाजार में हम अकेले होते हैं। ऐसे समय में लोकसंस्कृति का संरक्षण व रूपांतरण जरूरी है। संत विनोबा भावे ने हमें एक शब्द दिया- लोकनीति। एक शब्द है- लोकमंगल। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लोकमंगल शब्द का उपयोग कई बार साहित्यिक संदर्भों में किया है। साहित्य, संस्कृति, कला या किसी भी ज्ञान का उद्देश्य लोकमंगल ही होना चाहिए। लोकमंगल में ही सभी कलाओं की मुक्ति है। अफसोस यह है कि लोक को जाने बिना तो तंत्र या जड़ नौकरशाही हमने विकसित की है। जिसकी आंखों में लोक के स्वप्न नहीं हैं। इसलिए हम देखते हैं कि राज अलग जा रहा है और समाज अलग। समाज और राज की यह दूरी हर दौर में बनी रही है। हमें देखना होगा कि मूक होने के बाद भी लोक की एक सामूहिक चेतना है। जड़ों में रचा-बसा मन ही इसे महसूस कर सकता है। यह लोक प्रबुद्ध है किंतु वाचाल नहीं है।  इसीलिए कहा जाता है कि लोकमानस के पास भाषा नहीं होती, भाव होते हैं। बाजार और मीडिया के इस शोर में लोकमन को पढ़ने का अवकाश भी किसके पास है? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे, “हमारा जनसमूह निरक्षर है, मूर्ख नहीं।” लोक की मूल वृत्ति ही है- ‘आनंद’। लोक आनंद में ही विचरता है।

    हम देखें तो सारी लोकपरंपराएं, लोकाचार, लोक में व्याप्त गीत-संगीत, प्रर्दशन कलाएं आनंद के ही संसार को रचती और व्यापक बनाती हैं। यहां आनंद का आशय धन-वैभव से पैदा हुए आनंद से नहीं है। यह आनंद है ह्दय का आनंद। आंतरिक सुख और आनंद। जहां अभावों में भी एक मस्ती है। माटी की महक से ही जीवन महकता है। प्रकृति की ताल पर जीवन चलता और नाचता है। प्रकृति से संवाद की यह शैली जैसे-जैसे हमसे दूर जाती है हमारे दुख, तनाव और अवसाद बढ़ते चले जाते हैं। आनंद की उपस्थिति के लिए, उसे महसूसने के लिए शांति चाहिए। आनंद, शांति में ही पलता और विकसित होता है। शांति होती है, स्थिरता से। यह स्थिरता मन की भी है, जीवन की भी है और इसलिए शांत, आनंदमय जीवन हमारी परम आकांक्षा है। लोकमंगल की कामना इसलिए हमारी सबसे प्रिय कामना है, क्योंकि इसमें इस भूमि और राष्ट्र का भी मंगल है। इन अर्थों में लोकमंगल ही राष्ट्रमंगल है। जबकि आज बन रहे विश्वग्राम (ग्लोबल विलेज) में लोक कहां है? उसकी संस्कृति कहां है? उसके भाव कहां हैं? उसकी सांसें कहां हैं? उसके सपने कहां हैं? उसका राग कहां है? आप देखें तो हिंदी का हर बड़ा कवि लोक से आता है। तुलसी, नानक, रैदास, कबीर, मीराबाई, रहीम सब लोक से आते हैं। हमारा जो वैद्य है वह भी ‘कविराय’ है। लोक साहचर्य और संवाद की पाठशाला है। यहां आत्मीय संपर्क, समान संवेदना, समान अनुभूति और एकात्म फलता –फूलता है। यहां विभेद नहीं है। आत्मीयता यहां मूल तत्त्व है। ग्लोबल विलेज की अवधारणा एक अलग तरह की भावना है। जबकि लोक का संगीत आत्मा का संगीत है। लोक यहां अपने राग, रंग और भाव रचता है। वह मनुष्य के मन को छूता है और उससे संवाद करता है। नए बाजार की अवधारणा में लोक का विचार नहीं है। लोक को मिटाने की शर्त पर ही यह बाजार अपना विस्तार करता है। जल, जंगल और जमीन को यूं ही बाजार लोलुप निगाहों से नहीं देख रहा है। इसके कारण बहुत प्रकट और जाहिर हैं।

    हम विचार करें तो पाते हैं कि 1991 भारत में उदारीकरण की आर्थिक नीतियों को लागू होने का साल है। यह साल सामाजिक मूल्यों और समाज के बदलाव का भी साल है। 1990 से लेकर 2019 तक बदलाव की यह गति तेज ही हुई है। भारत इन सालों में जितनी तेजी से बदला उतना सदियों में नहीं बदला। यह परिर्वतनों का समय भी था और मीडिया क्रांति का भी समय था। इस समय को ‘मूल्यहीनता के सबसे बेहतर समय’ के रूप में याद किया जाना चाहिए। यह समय एक कठिन समय था। जिसमें लोग जड़ों से उखड़ रहे थे। जंगलों से भगाए जा रहे थे। गांव के गांव लुप्त हो रहे थे या तथाकथित नगरीकरण के नकारात्मक प्रभावों से जूझ रहे थे। पूरी दुनिया को एक रंग में रंगने की जुगत और जुगाड़ें तेज हो रही थीं। बाजार के जादूगरों का हमला इसी लोक पर था, जो सहमा सा इसे देख रहा था। आज हमारा लोक जीवन अगर बाजार की इस चमक में कहीं दिखता है या प्रयोग हो रहा है तो कौतुक और तमाशे की तरह। वह तमाम चमकती चीजें में एक सजावटी चीजों की तरह है जिसे मौके-बेमौके दिखाया जाता है। आज का विश्वग्राम इसीलिए सर्वग्राही भी और सर्वग्रासी भी। उसके ग्रास में लोक भी है, भाव भी हैं, मन भी हैं, संवेदनाएं भी हैं। भारत के मन से कटे लोग भारत के फैसले ले रहे हैं। ऐसे कठिन समय में हमारे गांव सहमे हैं, नदियां सहमी हुई हैं, खेतों की मेड़ों पर बैठे किसान सहमे हुए हैं। इस लोकतंत्र को जनतंत्र में बदलते देखना भी रोचक है। ‘कोलोनिजम आफ माइंड्स’(वैचारिक साम्राज्यवाद) का यह खेल सफल होता दिखता है। ‘विचारों की कंडीशनिंग’(अनुकूलन) की जा रही है। हमारी विविधता और बहुलता को खतरा साफ दिखता है। ‘भारत’ को जीना है तो उसे ‘भारत’ ही बनना होगा, पर इस आंधी में हमारे पैर टिकेंगें क्या, यह बड़ा सवाल है।

    Prof Sanjay Dwivedi

    अध्यक्ष, जनसंचार विभाग,
    माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
    प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर,
    भोपाल-462011 (मध्यप्रदेश)

  • बायो गैस संयंत्र ने बदली ज़िन्दगी — Firdaus Khan

    बायो गैस संयंत्र ने बदली ज़िन्दगी — Firdaus Khan

    बायो गैस ने लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बना दिया है. देश के अनेक गांवों में अब महिलाएं लकड़ी के चूल्हे पर खाना नहीं पकातीं, क्योंकि उनकी रसोई में अब बायो गैस पहुंच चुकी है. मध्य प्रदेश को ही लें. यहां के शहडोल ज़िले के कई गांवों में अब चूल्हे बायो गैस से ही जल रहे हैं. जंगल को बचाने के लिए सरकार ने आदिवासी बहुल इस ज़िले के गांवों में जागरुकता मुहिम शुरू की. नतीजतन, गांव महरोई समेत कई गांवों में बायो गैस संयंत्र लगाए गए और फिर बायो गैस चूल्हे जलने लगे. अब आदिवासी महिलाओं को ईंधन की लड़की लेने के लिए जंगल में नहीं जाना पड़ता, जिससे वे काफ़ी ख़ुश हैं.

    उत्तर प्रदेश के लखनऊ ज़िले के गांव बिजनौर के जय सिंह को बायो गैस संयंत्र से दिन-रात बिजली मिल रही है, जिससे वह अपनी डेयरी की सभी मशीनें चलाते हैं. उनका कहना है कि उनका 140 घन मीटर का गैस संयंत्र है, जिसे लगवाने में तक़रीबन 22 लाख रुपये ख़र्च हुए. उनके पास 150 पशु हैं, जिनसे रोज़ लगभग एक हज़ार लीटर दूध मिलता है. साथ ही रोज़ लगभग 1500 किलो गोबर मिलता है. इस गोबर को वह बिजली बनाने में इस्तेमाल करते हैं. बायो गैस संयंत्र से मिली गैस से 30 किलोवॉट का जेनरेटर चलाकर 24 घंटे बिजली पैदा करते हैं. अपने संयंत्र से बनाई गई बिजली से ही वह पशुओं का दूध दुहने वाली स्वचालित मिल्किंग मशीन, पशुओं के चारा काटने की मशीन और दूध की पैकिंग करने की मशीन को संचालित करते हैं. इसी बिजली से उन्होंने गेहूं पीसने की बड़ी मशीन भी लगा रखी है, जिसमें पूरे गांव का गेहूं पीसा जाता है. इसके अलावा उन्हें खाद भी मिल रही है. इसमें कोई दो राय नहीं कि बायो गैस संयंत्र किसानों और ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो रहे हैं. इनसे जहां रसोईघरों को ईंधन मिल रहा है, बिजली के रूप में रौशनी मिल रही है, वहीं खेतों को खाद भी मिल रही है. आज देशभर में छोटे स्तर पर तक़रीबन 33 लाख बायो गैस संयंत्र काम कर रहे हैं.

    राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले के की सीमलवाड़ा भेमईगांव में महिलाएं बायो गैस के चूल्हे पर ही खाना बनाती हैं. गांव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है. इसीलिए हर घर में पशु हैं. पहले महिलाएं गोबर के उपले बनाकर चूल्हे में जलाती थीं. जहां उपले बनाने में उन्हें काफ़ी मेहनत करनी पड़ती थी, वहीं इन्हें चूल्हें में जलाने पर धुआं भी होता था. नब्बे की दहाई में गांव में बायो गैस क्रांति आई. ज़िला परिषद के ज़रिये गांव में बायो गैस संयंत्र लगाए गए. ग्रामीणों का कहना है कि लकड़ी और एलपीजी के मुक़ाबले बायो गैस बेहद सस्ती है. इससे उन्हें अच्छी खाद भी मिल रही है. मध्‍यप्रदेश के खंडवा ज़िले के ग्राम बड़गांव पिपलौद ऐड़ा का युवक शुभम बायो गैस से आटा चक्की चला रहा है.

    कुछ महीने पहले दुग्ध संघ ने ग्राम बड़गांव पिपलौद में डेयरी समिति बनाई गई. इसमें 20 सदस्यों को नर्मदा झाबुआ ग्रामीण बैंक के माध्यम से दुग्ध उत्पादन के लिए गाय दी गई हैं. इसी समिति के सदस्य आत्मराम परसराम तिरोले ने भी चार गाय लेकर दूध उत्पादन शुरू किया. इन गायों से रोज़ काफ़ी गोबर जमा हो जाता था. उनके बेटे शुभम ने बायो गैस संयंत्र लगवा लिया, जिससे उन्हें रसोई के लिए बायो गैस मिलने लगी. फिर उसने कबाड़े में से एक डीज़ल इंजन और आटा चक्की ख़रीदी और इन्हें ठीक करा लिया. अब वह बायो गैस से इंजन चला रहा है और इस इंजन से आटा चक्की चल रही है. बायो गैस से ही वह चारा काटने की मशीन भी चला रहा है.

    पिछ्ले जून माह में दिल्ली जल बोर्ड ने कोंडली में सीवरेज शोधन संयंत्र में बायोगैस से बिजली का उत्पादन शुरू कर दिया है. सीवरेज के शोधन से निकलने वाली बायो गैस का इस्तेमाल अब बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा. इससे दिल्ली जल बोर्ड को अपने सालाना 20 करोड़ रुपये के बिजली के बिलों से राहत मिलेगी. बायो गैस से बिजली उत्पादन करने की इस प्रक्रिया को मॉडल के तौर पर शुरू किया गया है. अगर यह प्रयोग कामयाब रहता है, तो आने वाले वक़्त में जल बोर्ड अपने सभी सीवरेज शोधन संयंत्रों में बायो गैस से बिजली उत्पादन का काम शुरू करेगा. यह ईको फ्रेंडली तरीक़ा प्रदूषण के स्तर में भी कमी लाएगा. कोंडली में बायो गैस से 10 हज़ार किलोवाट बिजली पैदा की जा रही है. इससे जल बोर्ड अपनी बिजली की 35 फ़ीसद ज़रूरत पूरी कर पा रहा है.

    ग़ौरतलब है कि देश में बायो गैस संयंत्रों को बढ़ावा देने के लिए साल 1981-82 में राष्ट्रीय बायो गैस परियोजना शुरू की गई. यह अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत विभाग की महत्वपूर्ण परियोजना है. इसका मक़सद ग्रामीण क्षेत्रों में अपारंपरिक ऊर्जा के नये विकल्पों को बढ़ावा देकर पर्यावरण की सुरक्षा करना है. इसके अलावा बायो गैस संयंत्र की स्थापना में सहायता देकर ऊर्जा संरक्षण पर ज़ोर देना, ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को धुएं से होने वाली बीमारियों से बचाना और उच्च कोटि की गोबर खाद के उत्पादन में बढ़ोतरी कर कृषि को बढ़ावा देना भी इसके उद्देश्यों में शामिल है. इसके कार्यक्रम के तहत घरेलू और सामुदायिक दो प्रकार के संयंत्रों की स्थापना की जाती है. यह कार्यक्रम राज्य सरकारों और केन्द्रशासित प्रदेशों के प्रशासनों, राज्यों के निगमित व पंजीकृत निकायों आदि द्वारा चलाया जा रहा है. ग़ैर सरकारी संगठन भी इसके क्रियान्वयन में मदद कर रहे हैं. वाणिज्यिक और सहकारी बैंक बायो गैस संयंत्रों की स्थापना के लिए क़र्ज़ मुहैया करा रहे हैं. जिन ग्रामीणों के पास चार से ज़्यादा बड़े पशु जैसे भैंस, गाय या बैल हों, इस संयंत्र के लिए आवेदन कर सकते हैं. इसके लिए इच्छुक व्यक्ति को बायो गैस संयंत्र लगाने का प्रार्थना पत्र ग्राम पंचायत विकास अधिकारी/ खंड विकास अधिकारी को पूरे विवरण के साथ देना होता है

    बायो गैस पर्यावरण के अनुकूल है और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी है. बायो गैस के इस्तेमाल से लकड़ी की बचत होती है और पेड़ कटने से बच जाते हैं. महिलाओं को चूल्हे के धुएं से निजात मिल जाती है, जिससे उनकी सेहत ठीक रहती है. बायो गैस के उत्पादन के लिए ज़रूरी कच्चे माल यानी गोबर आदि की आपूर्ति गांवों से ही पूरी हो जाती है.

    विशेषज्ञों के मुताबिक़ बायो गैस संयंत्र लगवाते वक़्त सावधानी बरतनी चाहिए. बायो गैस से छोटे से छोटा प्लांट लगाने के लिए कम से कम दो या तीन पशु होने चाहिए. गैस संयंत्र का आकार गोबर की दैनिक मिलने वाली मात्रा को ध्यान में रखकर करना चाहिए. बायो गैस संयंत्र गैस इस्तेमाल करने की जगह के नज़दीक स्थापित करना चाहिए, ताकि गैस अच्छे दबाव पर मिलती रहे. बायो गैस संयंत्र लगवाने के लिए निर्माण सामग्री जैसे सीमेंट और ईंटें बढ़िया क़िस्म की होनी चाहिए. छत से किसी तरह की लीकेज नहीं होनी चाहिए. बायो गैस संयंत्र किसी प्रशिक्षित व्यक्ति की देखरेख में ही बनवाना चाहिए. यह भी ध्यान रहे कि बायो गैस संयंत्र की 15 मीटर की परिधि में कोई पेयजल स्रोत न हो. गैस पाइप और अन्य उपकरणों की समय-समय पर जांच करते रहना चाहिए. गोबर की सूखी परत बनने से रोकने के लिए गोबर डालने और गोबर निकलने का पाइप ढका रहना चाहिए. यह संयंत्र निर्देशानुसार चलाने से वर्षों तक चल सकते हैं, जिससे गैस और खाद दोनों काफ़ी मात्रा में उपलब्ध होते हैं.

    बायो गैस संयंत्र की स्थापना के बाद इसे गोबर और पानी के घोल से भर दिया जाता है. इसके बाद गैस की निकासी का पाइप बंद करके 10-15 दिन छोड़ दिया जाता है. जब गोबर की निकासी वाली जगह से गोबर बाहर आना शुरू हो जाता है, तो हर रोज़ संयंत्र में ताज़ा गोबर सही मात्रा में डाला जाता है. इस तरह बायो गैस और खाद तैयार होती है. बायो गैस संयंत्र में गोबर की क्रिया के बाद 25 फ़ीसद ठोस पदार्थ गैस के रूप में बदल जाता है और 75 फ़ीसद खाद बन जाता है. यह खाद खेती के लिए बहुत उपयोगी है. इसमें नाइट्रोजन डेढ़ से से दो फ़ीसद फ़ास्फ़ोरस एक और पोटाश भी एक फ़ीसद तक होता है. बायो गैस संयंत्रों से मिलने वाली गैसों में 55 से 66 फ़ीसद मीथेन, 35 से 40 फ़ीसद कार्बनडाई ऒक्साइड और अन्य गैसें होती हैं. ये खाद खेतों के लिए बेहद उपयोगी है. इससे उत्पादन में काफ़ी बढ़ोतरी होती है.

    कोड़े-कर्कट से भी बायो गैस बनाई जा सकती है. देशभर की सब्ज़ी मंडियों में हर रोज़ बहुत-सा कूड़ा जमा हो जाता है, जिनमें फल-सब्ज़ियों के पत्ते, डंठल और ख़राब फल- सब्ज़ियां शामिल होती हैं. ज़्यादातर मंडियों में ये कचरा कई-कई दिन तक पड़ा सड़ता रहता है. अगर इनका इस्तेमाल बायो गैस बनाने में किया जाए, तो इससे कई फ़ायदे होंगे. इससे जहां कचरे से निजात मिलेगी, वहीं बायो गैस और खाद भी प्राप्त होगी. पंजाब कांग्रेस कमेटी के सचिव मंजीत सिंह सरोआ ने पंजाब सरकार को सलाह दी है कि वह हर सब्ज़ी मंडी के समीप बायोगैस प्लांट लगाए, जिससे पैदा हुई बायो गैस की सप्लाई मंडी की दुकानों या आसपास के रिहायशी इलाक़ों में की जा सके.

    काबिले-ग़ौर है कि ऊर्जा के पेट्रोलियम, कोयला जैसे पारंपरिक स्रोत सीमित हैं. इसलिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और जैव-ऊर्जा जैसे ग़ैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. बायो गैस संयंत्र के अनेक फ़ायदे हैं. इसे लगाने से किसानों को ईंधन और खाद दोनों की बचत होती है. बेरोज़गार युवा बायो गैस संयंत्र लगाकर स्वरोज़गार अर्जित कर सकते हैं. इससे डेयरी उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, दूध बढ़ेगा और आमदनी बढ़ेगी. है न बायो गैस संयंत्र फ़ायदे का सौदा.

    About Author

    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’.