Author: संपादक मंडल

  • कविता का उद्भव

    कविता का उद्भव

    Dr Vijayanand

    राष्ट्रीय अध्यक्ष

    भारतीय संस्कृति एवं साहित्य संस्थान,

    केंद्रीय विद्यापीठ मार्ग, प्रतिष्ठानपुर,

    प्रयागराज

    जब करुणा से बोझिल सूरज,

    उन्नत शिखरों पर चढ़ जाता। 

    निर्दोषों की आंहों, लाशों में,

    चंदा भी जब न अड़ पाता।।

    भू पर अधर्म की अति होती,

    तब राम अवतरण लेते हैं।

    सीतायें तब जन्मा करती,

    जब पाप घड़ो में भरते हैं।।

    जब पर्णकुटियों की सीताएं,

    सोने का लालच करती।

    तब तब रावण आ जाता है,

    सीताएं तभी हरी जाती।।

    फिर रावण- राम युद्ध होता,

    राम कथा बन जाती है।

    पर कौंचवध की करुणा से,

    ही कविता बन पाती है।।

    रामायण और महाभारत,

    साकेत और उर्वशी कथा।

    यामा और हल्दीघाटी,

    नई कविता की नई छटा।।

    करुणा की आंहें आंखों में, 

    आंखों से अश्रु उमड़ता हो,

    जन्मा करती तब ही कविता,

    जब शिवा समर में लड़ता हो।।

    शब्दों की धार लिए नदियां,

    जब सागर में मिल जाती हैं।

    तब महाकाव्य बन जाते हैं,

    कविताएं रास रचाती हैं।।

    कविता ही सीमाओं पर जब,

    सैनिक मन में लहराती है।

    तब निर्मम आतंकी जन को,

    गोली से मार गिराती है।।

    कविता की अपनी अकथ कथा,

    इधर उधर कविता कविता।

    करुणा से क्रोध जन्म लेता,

    ढ़लता चंदा, सविता कविता।।

    ऐसे जन्मा करती कविता,

    वैसे जन्मा करती कविता।

    कविता भी बन जाती कविता,

    कविता कविता कविता कविता।।

    कविता से जोश उमड़ता है,

    भर जाता बाहु बाहु में बल।

    भारत माता की रक्षा हित, 

    तन का लोहू करता कल कल।।

    मकरंद बना करती कविता,

    जय हिंद बना करती निर्भय।

    वंदे मातरम, हुआ करती,

    कविता! भारत माता की जय।।

    Vijayanand PhD

  • उद्योगपतियों की नौटंकी, मानव विकास सूचकांक और हमारा वाला विकास — Rajneesh Sachan

    उद्योगपतियों की नौटंकी, मानव विकास सूचकांक और हमारा वाला विकास — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    लोगों की जिस सोच, इच्छा, उम्मीद और मांग के साथ भाजपा सत्ता में आई थी, भाजपा सरकार वही कर रही है। लोगों ने भाजपा को वोट न तो नौकरियों के लिए दिया था, न जीवन स्तर बेहतर करने के लिए दिया था, और न ही भारत को कोई आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए दिया था।

    हमने भाजपा को वोट दिया था देश को विश्वगुरु बनाने के लिए, देश को हिन्दूराष्ट्र बनाने के लिए, मुल्लों को औक़ात में रखने के लिए, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन वाला विकास करने लिए, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे छोटे पड़ोसियों पर धौंस जमाकर रखने के लिए (ताकि अमेरिका और चीन की चाटुकारिता करने में अहम् को जो चोट पहुँचती है उसकी भरपाई की जा सके), पुराने गौरवशाली भारतवर्ष की पुनर्थापना के लिए, राम राज के लिए …. आदि आदि। असली कारण यही और इसी तरह के थे। बाकी बोला और सुना बहुत कुछ गया है मगर वह सब सिर्फ बोलने और सुनने के लिए था। बोलने वाला भी और सुनने वाला भी दोनों जानते हैं इसमें सच क्या है और लफ़्फ़ाज़ी कितनी है।

    लोकसभा चुनावों में विभिन्न दलों को कुल कॉर्पोरेट फंडिंग लगभग 1100 करोड़ हुई। इसमें 1000 करोड़ के आसपास भाजपा के लिए हुई और 100 करोड़ में बाकी सारी पार्टियां। तो जाहिर है व्यापारियों और पूंजीपतियों ने इकतरफा भाजपा को चुना था। आगे फिर चुनेंगे इसलिए जो दो- चार बिज़नेसमैन हल्ला मचा रहे हैं वह सब नौटंकी है। जिसे सीधा नुकसान हुआ है सिर्फ उसी को तकलीफ है बाकी सब खुश हैं। लेकिन ऐसा तो पूरे समाज का ही हाल है। जिसने सीधा सीधा कोई नुकसान झेला है बस वही विरोध कर रहा है बाकी सब खुश हैं। परोक्ष नुकसान के लिए दूसरे कई कारण उन्हें समझा दिए गए हैं या खुद उन्होंने गढ़ लिए हैं।

    सरकारी आंकड़ों में कश्मीर, मानव विकास सूचकांक के हर मामले में गुजरात से कहीं आगे है। आखिर फिर कौन सा विकास हम कश्मीर में देखना, करना चाहते हैं? तो असली बात यह है कि भारतीय समाज के लिए विकास का अर्थ मानव विकास सूचकांक जैसा कोई भी विकास कभी रहा ही नहीं है। भारतीय समाज के लिए विकास का अर्थ है गाड़ियां,  बंगले, पुल, मॉल, ऊँची ऊँची बिल्डिंगें, बड़े बड़े उद्योगपति जो दुनिया के टॉप 10 में आते हों…. आदि ।

    भले ही यह सब भोगने वाले 2-4 % लोग ही हों। बाकी इस उम्मीद में इस विकास का समर्थन करते जाते हैं कि कभी कोई चमत्कार होगा और हम नहीं तो हमारे बच्चे इन गाड़ियों में घूमेंगे, ऐसे उद्योगपति बनेंगे, ऐसे बंगलों में रहेंगे ..आदि आदि। इसीलिए बचपन से हम अपने बच्चों के दिमाग में यही सब भरते जाते हैं।

    तो कश्मीर में भी अब यही विकास होगा। मानव विकास सूचकांक में तो बांग्लादेश और श्रीलंका ने भी हाल फ़िलहाल हमें पीछे छोड़ दिया है। लेकिन कुछ अपवाद को छोड़कर किसी भारतीय को इससे कोई समस्या हुई क्या? हमें तो चीन बनना है, अमेरिका बनना है यहाँ तक कि इज़राइल बनना है … वह भी कोरी लफ़्फ़ाजी और ढकोसले के बूते ।भूटान के बारे में आप सर्वे करा लीजिए, कुछ अपवाद छोड़कर हर भारतीय उसे बहुत गरीब और पिछड़ा देश कहेगा।

    इसका सीधा अर्थ है कि हम इंसानों के जीवन और जीवन स्तर को कतई प्राथमिकता नहीं देते। और जो समाज जीवन स्तर को प्राथमिकता नहीं देता वह निहायत ढोंगी,क्रूर,सामंती और अलोकतांत्रिक होता है। और ये सारे गुण हममे हैं। और एक ढोंगी, क्रूर और सामंती समाज अपने में से सबसे बड़े ढोंगी, सबसे ज़्यादा क्रूर और सबसे अधिक सामंती प्रवृत्ति के व्यक्तियों को ही अपने नेता के रूप में चुनेगा।

    यह सच है कि कोई सरकार, कोई नेता जादू करके देश में सब कुछ अचानक ठीक नहीं कर सकता वैसे ही सच यह भी है कि कोई नेता या सरकार अचानक जादू से सबकुछ बरबाद भी नहीं कर सकती। मोदी या भाजपा पर ही सारा दोष मढ़ देना देना असली समस्याओं से मुँह चुराना है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि ये लक्षण समाज के अंदर कहीं गहरे बैठे हुए थे जो माकूल वातावरण पाकर मुखर रूप में बाहर आ गए। यह देश यह समाज सही अर्थों में विकास तभी कर सकेगा जब लोग ढोंग की बजाय ईमानदारी से जीवन मूल्यों को अहमियत देना शुरू करेंगे। वर्ना हम जिधर जा रहे हैं वहां आगे ब्राज़ील है अफगानिस्तान है सीरिया है।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • आत्म मुग्ध, सामंती भारतीय समाज और कश्मीर — Rajneesh Sachan

    आत्म मुग्ध, सामंती भारतीय समाज और कश्मीर — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    जब हम मानव (human) के बारे में बात करते हैं तब हमारी सोच में मानव के अतिरिक्त धरती पर बसने वाले अन्य जीवनों के हित कितने शामिल होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    जब हम अपने देश के बारे में बात करते हैं तब धरती पर बसे अन्य तमाम देशों के हित और उनमे बसने वाले तमाम लोगों के हित हमारी सोच का कितना बड़ा हिस्सा होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    जब हम अपने राज्य के बारे में सोचते हैं तब हमारी सोच में अन्य सभी राज्यों और उनमे बसने वाले लोगों के हित कितने शामिल हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    जब हम अपने क्षेत्र/भाषा/संस्कृति आदि के बारे में बात करते हैं तब हमारी सोच में अन्य सभी क्षेत्रों/भाषाओँ/संस्कृतियों के हित कितने शामिल होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    अपने को केंद्र मानकर अपने हित दूसरों पर थोपना, अपने आप को केंद्र में रख कर अपने सही गलत को बाकी सबका सही-गलत मान लेना, अपने को केंद्र मानकर अपनी विकास की परिभाषा को बाकी सब की विकास की परिभाषा समझ लेना आदि-आदि मानवता नहीं है. सामंतवाद है, जाहिलियत है ।

    अपनी बहुचर्चित किताब ‘सेपियन्स’ में युवाल नोआ हरारी ने एक बात कही है, जो बहुत महत्वपूर्ण है – “विलुप्त होने की कगार पर खड़ी गैंडों की एक प्रजाति का आखिरी गैंडा जंगल में अपनी स्वतंत्रता के साथ कहीं ज़्यादा खुश होगा, बजाय उन लाखों-करोड़ों बछड़ों के जो अपना जीवन एक बाड़े में काट देते हैं और आखिर में काट दिए जाते हैं “

    भारत के गृह मंत्री ने राज्य सभा में जो भाषण पिलाया उसका लब्बो लुआब यह है कि कश्मीर के लोग खुश नहीं हैं, वहां विकास नहीं हो रहा है, वहां शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल बदहाल है। और ख़ुशी, विकास और शिक्षा स्वास्थ्य की परिभाषा भी अमित शाह वाली, भाजपा वाली, पूंजीपतियों वाली।

    एक कश्मीरी अपनी ख़ुशी और विकास को कैसे परिभाषित करता है यह मायने नहीं रखता।

    विकास की यह परिभाषा यहीं नहीं रुकेगी। विकास की यह परिभाषा समूचे उतर-पूर्व और सारे आदिवासी क्षेत्रों में ऐसी ही तबाही मचाएगी। देश में एक ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ लोग हर साल भूख से न मरते हों, ठण्ड से न मरते हों,लू से न मरते हों, बाढ़ से न मरते हों ,हत्याएं बलात्कार लूट न होती हो। लेकिन कश्मीर का विकास नहीं हो पा रहा यह सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय है।

    अधिकांश भारतीय समाज ने कश्मीर के साथ हुई ज्यादिती पर जैसी प्रतिक्रिया दी है उसे देख कर मैं इस बात से पूरी तरह मुतमईन हूँ कि भारतीय समाज सामंती है और घोर अलोकतांत्रिक है।

    यह समाज इसी लायक है कि भारत आर्थिक और सामरिक रूप से हमेशा कमज़ोर रहे। यह समाज जिस तरह की अमानवीय, कट्टर सामंती सोच के साथ आज है ऐसी स्थिति में अगर भारत आर्थिक और सामरिक दृष्टि से मजबूत हुआ तो हम बांग्लादेश,पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान आदि पडोसी देशों के लोगों का जीना हराम कर देंगे।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • समाज, देश, सामूहिक स्वामित्व की परिकल्पना और हम — Rajneesh Sachan

    समाज, देश, सामूहिक स्वामित्व की परिकल्पना और हम — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    जिन दो किसानों के खेत एक दूसरे से लगे हुए होते हैं उन दोनों किसानों के खेतों के बीच में एक मेढ़ होती है, जो दोनों के लिए साझी होती है,और वह पतला सा ज़मीन का टुकड़ा दोनों का साझा होता है । कुछ अपवाद मामलों को छोड़कर अधिकतर किसान खेत जोतते समय हर बार थोड़ी थोड़ी मेढ़ खुरचते जाते हैं। एक समय ऐसा आता है कि मेढ़ के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगता है। फिर दोनों किसान आपसी सहमति से दोबारा मेढ़ बनाते हैं। जो खेत सड़क किनारे होते हैं या नहर किनारे होते हैं उन खेतों के मालिक किसान हर बार जुताई करते हुए थोड़ी सड़क या नहर की तरफ की ज़मीन या खेत से लगी कोई भी सार्वजनिक ज़मीन खुरचते जाते हैं।

    ऐसा नहीं है कि दो चार इंच ज़मीन से पैदावार में कोई अंतर आता है। लेकिन मामला मानसिकता का है।

    कस्बों में शहरों में लोग जब अपने घर बनाते हैं तो जो ज़मीन उन्होंने खरीदी होती है, उस ज़मीन के बिलकुल बाहरी छोर पर दीवार खड़ी करने की कोशिश करते हैं। कोशश तो यह होती है कि जहाँ तक संभव हो दीवार बाहर खड़ी कर लो। पार्कों और गलियों में कब्ज़ा कर लेना बहुत सामान्य घटना है। घर के आगे सड़क तक की ज़मीन तो अपनी ही होती है उसपर कोई शक नहीं होता किसी को।

    बेचारे फ़्लैट वाले ज़मीन कब्ज़ा नहीं पाते तो हवा में जितना संभव हो स्ट्रक्चर बढ़ा कर कुछ नहीं तो गमले ही रख लेते हैं।

    कुल मिलाकर कहना यह है कि हम लोग; सार्वजनिक ज़मीन या साझे की ज़मीन या वह ज़मीन जो किसी भी तरह से विवादित है या जिस पर किसी का एकाधिकार नहीं है या जिसकी है वह कमज़ोर है मजबूती से अपना दावा नहीं कर पा रहा; ऐसी हर उस ज़मीन पर कब्ज़ा ज़माना अपना अधिकार समझते हैं। और यह सच सिर्फ ज़मीन तक सीमित नहीं है, यह हर तरह की चल अचल संपत्ति, वस्तुओं, लोगों आदि सब के लिए उतना ही सच है।

    हम अभी तक एक समाज के तौर पर सामूहिक स्वामित्व और सामूहिक जिम्मेदारी की सोच का विकास नहीं कर पाए हैं। एक देश की तरह सोचना तो बहुत दूर की बात है। हमारे लिए देश/प्रदेश/जिले आदि ज़मीन का टुकड़ा मात्र हैं।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय संविधान, जीडीपी, भ्रष्टाचार और हमारा समाज — Rajneesh Sachan

    दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय संविधान, जीडीपी, भ्रष्टाचार और हमारा समाज — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    समाज दो तरह के नियमों से चलता है एक लिखित नियम और दूसरे अलिखित नियम। दुनिया में अलिखित नियम पहले आए और लिखित नियम (संविधान के रूप में या किन्ही अन्य रूप में) बहुत बाद में आए।

    किसी भी समाज की सामूहिक चेतना, विवेक,संवेदनशीलता,लोकतांत्रिक सोच आदि को जांचने के कई पैमाने होंगे लेकिन लिखित और अलिखित कानूनों के बीच का अनुपात और उनका प्रकार मेरी नज़र में सबसे प्रभावी तरीका है।

    जो समाज जितना परिपक्व होता है उसे उतने कम और उदार लिखित नियमों की ज़रुरत पड़ती है। जो समाज जितना अपरिपक्व और अराजक होता है उसके लिए उतने ज़्यादा और कठोर लिखित नियमों की आवश्यकता होती है। एक परिपक्व समाज के अलिखित कानून संवेदनात्मक/लोकतांत्रिक/तार्किक होते हैं और उनका पालन भी बहुत ही सहजता के साथ होता है।

    ‘जॉर्ज सेबिलिस’ और ‘डोमिनिक जे. नार्डी’ ने OECD (आर्गेनाईजेशन फॉर इकनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेन्ट) देशों के संविधानों की लम्बाई (शब्द संख्या के आधार पर ) और GDP एवं भ्रष्टाचार के बीच संबंधों को दर्शाने वाले अपने तथ्यात्मक और तार्किक लेख में दो निष्कर्ष मोटे तौर पर स्थापित किये हैं। ( A Long Constitution is a (Positively) Bad Constitution: Evidence from OECD Countries)

    1. बड़े संविधान वाले देशों में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का स्तर नीचे रहने और भ्रष्टाचार ज्यादा होने की प्रवृत्ति होती है। प्रति व्यक्ति जीडीपी पर संवैधानिक लंबाई का प्रभाव जारी रहता है, भले ही भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हो।
    2. लम्बे संविधानों में संशोधन करना अधिक कठिन होता है फिर भी आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि छोटे संविधानों की तुलना में इन्हे अधिक बार संशोधित किया जाता है।

    संविधान की लंबाई और संशोधनों के बीच संबंध के बारे में लुत्ज़ ने शंका जताई थी कि बड़े संविधानों को अधिक बार संशोधित किया जाएगा, क्योंकि उनमें विस्तृत प्रावधान शामिल होने की संभावना है जो समय के साथ अप्रचलित होने का जोखिम रखते हैं। जब ऐसे प्रावधान सत्ताधारी बहुमत के कार्यों को प्रतिबंधित करते हैं, तो उन्हें या तो संशोधित किया जाएगा या पूरी तरह से हटा दिया जाएगा। नेग्रेट्टो ने लैटिन अमेरिका के लिए लुत्ज की भविष्यवाणियों की पुष्टि की।

    समाज जैसे-जैसे परिपक्व होता जाता है वैसे-वैसे लिखित कानूनों की आवश्यकता कम होती जाती है। कई कानून तो सिर्फ कागज़ में रह जाते हैं और उनके अनुपालन के लिए सरकार या सत्ता को कोई प्रयास नहीं करना होता है। समाज को नियंत्रित करने वाले नए कानूनों की आवश्यकता नहीं होती यानी व्यवहारिक रूप में अलिखित कानूनों का अनुपात बढ़ता जाता है। नए कानून या नियम उन्ही क्षेत्रों में बनाने पड़ते हैं जो क्षेत्र नए विकसित हुए होते हैं, उदाहरण के लिए साइबर क़ानून।

    इसके उलट अगर समाज अपरिपक्व हो रहा है तो आये दिन सरकार या सत्ता द्वारा नए नए क़ानून बनाये जाते हैं या अदालतों द्वारा बार बार परिभाषित किए जाते हैं और उनके अनुपालन के लिए तमाम तरह की संस्थाएं खड़ी की जाती हैं और कठोर दंड के प्रावधान करने पड़ते हैं। अर्थात लिखित कानूनों/ नियमों का अनुपात बढ़ता जाता है और दंड की कठोरता भी उसी अनुपात में बढ़ती है। साथ ही साथ कई नियम और कानून जो अर्से से निष्क्रिय पड़े थे उन्हें भी पुनर्जीवित किया जाता है।

    किसी भी देश में अविश्वास का स्तर जितना ज़्यादा होता है उस देश में आर्थिक विकास की दर उसी अनुपात में कम होती है। ऐसे देश संविधान की लम्बाई का उपयोग अविश्वास की राजनीतिक संस्कृति के लिए एक प्रॉक्सी के तौर पर करते हैं। चूंकि संविधान बनाने वाले लोग या समिति अविश्वास के चलते दूसरे राजनीतिक दलों या सदस्यों को विवश रखना चाहते हैं इसलिए अधिक अविश्वास वाले देश अधिक विस्तृत कानून लिखने की संभावना रखते हैं।

    भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है यानी जब संविधान बना तब हम दुनिया के कुछ सबसे अपरिपक्व और अविश्वास से भरपूर समाज में से एक थे इसलिए इतने बड़े संविधान की आवश्यकता हुई। लेकिन इससे भी भयावह पहलू यह है कि संविधान बनने के बाद से नियमों और कानूनों की संख्या और सज़ाओं की कठोरता में बढ़ोतरी ही हुई है। यानी हम एक समाज के तौर पर कतई परिपक्व नहीं हुए हैं।

    एक उदाहरण के साथ मैं अपनी बात ख़त्म करूँगा। मैं नॉएडा में रहता हूँ और यहाँ अभी तक चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल तो हैं लेकिन उसे तोड़ने पर चालान करने के लिए ट्रैफिक पुलिस नहीं है ,इसके उलट दिल्ली में हर चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस तैनात रहती है। आपने सिग्नल ब्रेक किया नहीं कि तुरंत आपको दंड मिलेगा। तो वही लोग जो दिल्ली में हर ट्रैफिक रूल फॉलो करते हैं, नॉएडा में घुसने के बाद बड़े इत्मीनान से सिग्नल ब्रेक करते हुए चलते हैं। जिससे अराजकता फैलती है।

    यानी लिखित नियम भी समाज कितना मानता है यह भी एक बड़ा पहलू है। जो समाज लिखित नियम भी सिर्फ दंड मिलने के डर से मानता है वह अलिखित नियम कितना मानता होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • नफरत हारती रहे — Pankaj Chaturvedi

    नफरत हारती रहे — Pankaj Chaturvedi

    ​Pankaj Chaturvedi

    पुरानी दिल्ली ने हरा दिया नफरत को, अभी एक हफ्ता पहले पुरानी दिल्ली ने लाल कुआँ में एक साधारण से झगड़े को कुछ बहरी लोगों ने साम्प्रदायिक रंग दिया और कुछ देश द्रोहियों ने एक मंदिर में तोड़ फोड की थी, तनाव था लेकिन आज पुश्तों से साथ रहने वाले पुरानी दिल्ली के लोगों ने एक साथ आ कर शानदार मिसाल पेश की। अमन कमेटी के लोगों ने शोभा यात्रा निकाल रहे लोगों के लिए खाना और पानी का भी इंतजाम किया है।

    आज सुबह दस बजे से हौज क़ाज़ी में एक शोभा यात्रा निकाली गयी जिसमे मंदिर में दुर्गा की नई प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा किया गया, इस जुलुस में मुस्लिम समाज सबसे आगे शहनाई बजा रहा है, जगह जगह मुस्लिम समाज ने जुलुस के स्वागत के लिए व्यवस्था कि, फतेहपुरी मस्जिद के इमाम मस्जिद के सामने जुलुस का स्वागत करना चाहते थे लेकिन किसी “ऊपर” से आये आदेश के बाद उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया, फिर भी दोनों धर्म के लोग साथ साथ मंदिर तक गए और जता दिया कि सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा। यही नहीं, दूसरे समुदाय के लोगों ने शोभा यात्रा निकाल रहे लोगों का स्वागत फूल बरसा कर किया। इसके अलावा भाई-चारे की मिसाल पेश करते हुए लोगों ने प्रसाद भी बंटवाया।

    ​Photo credits- ANI

    ​Pankaj Chaturvedi

    ​Author, Freelance Journalist, Environmentalist

    ​Associate Editor – Hindi, National Book Trust​, Ministry of Human Resource Development, Govt. of India

  • फ़िल्म समीक्षा: “आर्टीकल 15” — Sanjay Jothe

    फ़िल्म समीक्षा: “आर्टीकल 15” — Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe 

    आर्टिकल 15 एक अच्छी फिल्म है, सभी मित्रों को जरुर देखनी चाहिए. इसमें कई खूबियाँ और कई कमियाँ है. यहाँ जब मैं इसे अच्छी फिल्म कह रहा हूँ तो इसका यही अर्थ है कि यह बहुत सारी दिशाओं में विचार करने को विवश करती है. कोई भी फिल्म या रचना एक आयाम में ही अपने निर्णयों को री-इन्फोर्स करती है तो वह अच्छी रचना या फिल्म नहीं कही जा सकती. समाज, और विशेष रूप से भारत का समाज एसा नहीं है जिसमे कोई एक आयाम में सोचकर किसी विश्लेषण या निर्णय तक पहुंचा जा सकता हो. एक ‘डायनेमिक कोम्प्लेक्सिटी’ है जिसके बीच हर अच्छी और बुरी चीज पनपती और चलती आई है. इस कारण किसी भी अच्छी या बुरी चीज का न तो एक सरल सा कारण है न एक सरल सा परिणाम ही है. इसीलिये इन चीजों या समस्याओं से मुक्त होने का कोई ‘एक स्वर्णिम सूत्र’ भी नहीं हो सकता.


    कुल मिलाकर इस फिल्म में जो मुख्य स्वर है वह है ‘भारत की हजारों साल पुरानी सामाजिक व्यवस्था के प्रति असंतोष और उसे बदलने की तीव्र इच्छा’. अब ये इच्छा किसके दिल में और क्यों जन्म ले रही है ये बात अधिक महत्वपूर्ण है. ये इच्छा सबसे पहले तो अतिशूद्रों या दलितों के दिल में जन्म ले रही है जो इस व्यवस्था से केवल नुकसान ही उठाते आये हैं. लेकिन जाति और वर्ण व्यवस्था में बीच के पायदान पर बैठे लोगों शुद्र या ओबीसी में ये इच्छा बिलकुल नहीं है. ये वो लोग हैं जिन्हें इससे कुछ फायदा है और कुछ नुक्सान है, ये लोग सबसे ज्यादा असमंजस में हैं. ये असल में ओबीसी तबका है. इन बीच के लोगों को इस व्यवस्था से फायदा हो रहा है उन्हें इस व्यवस्था में बदलाव की नहीं बल्कि उतने सुधार की जरूरत है जितने से उनका खुद का शोषण रुक जाए लेकिन वे दूसरों का शोषण करना बदस्तूर जारी रखें. यही ‘ग्रेडेड इन-इक्वालिटी’ का चमत्कार है जिस पर बाबा साहेब अंबेडकर के अनुसार भारत की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था खड़ी है. बाबा साहेब के इस वक्तव्य को आगे बढायें तो समझ में आता है कि यही भारत का धर्म और राजनीति भी है, इसीलिये उन्होंने राजनीति बदलने की भरसक कोशिशें करने के बाद अंत में धर्म बदलने की सलाह दी थी जिस पर दुर्भाग्य से आज भी दलित वंचित समुदाय अमल नहीं कर पा रहे हैं.फिल्म में इस जाति व्यवस्था की सडांध को बदलने की तीव्र इच्छा एक दूसरे तबके में भी दिख रही है. ये तबका वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊपर बैठा हुआ है. उसी तबके से नायक और नायक की प्रेयसी आती है. ये नायक ब्राह्मण है और यूरोप में उच्च शिक्षा हासिल किया हुआ है, दिल्ली के सुरक्षित महलों से निकलकर यूरोप के सभ्य समाज में पढने जाता है और अचानक भारत के बर्बर और असभ्य समाज के गहरे गड्ढे में फेंक दिया जाता है.
    ऐसे में स्थिति बदलने की जो तीव्र इच्छा पैदा होती है उसके दो कारण हैं. 


    पहला कारण ये कि वो अभी तक जिस देश समाज और धर्म को अपना समझकर उसमे सम्मान का अनुभव करता था वो देश, समाज और धर्म कुछ और ही शक्ल लेकर सामने आ रहा है. इस देश, समाज और धर्म की जब वो यूरोप के सभ्य समाज से तुलना करता है तो उसे ग्लानि होती है, नायक का अहंकार चोटिल होता है. इसी अवस्था में उसकी प्रेयसी भी है वह भी दलित वंचित समुदाय से नहीं आती बल्कि एक सवर्ण प्रष्ठभूमि से आती है और लिबरल वाम तबके की नारीवादी है. इन दोनों के लिए विकास और सभ्यता की परिभाषाएं भारत के बाहर से आई हुई हैं. ये बड़ी अच्छी बात है. इसी अन्दर बाहर की तुलना ने उपनिवेश काल में भारत के समाज को सभ्य बनाने की शुरुआत की थी. दूसरा कारण ये कि जिस सभ्य यूरोपीय समाज से नायक आ रहा है उससे तुलना करने के लिए या उससे अपने देश की नैतिकता की बराबरी करने के लिए उसे सुदूर अतीत या परम्परा के कोई चीज नहीं मिलती. उसे सभ्यता और नैतिकता का आश्वासन देने वाली जो एकमात्र चीज मिलती है वह है भारत का संविधान. इसी को आधार बनाने के लिए वह तैयार हो जाता है और आगे की लड़ाई लड़ता है. अब ये गजब की बात है ये दोनों कारण असल में यूरोप से आ रहे हैं. यहाँ नोट किया जाये कि संविधान भी यूरोपीय लिबरल मूल्यों से प्रेरित है और उसमे हर कदम पर बर्बर भारतीय समाज की प्राचीन परम्पराओं और नियमों से दूर जाने कि स्पष्ट पृवृत्ति है.


    फिल्म का नायक भारत में एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में जब अपने राष्ट्र और धर्म पर ‘पौरुष भरे गर्व’ को चूर-चूर होता देख रहा होता है तभी उसकी प्रेयसी उसके गर्व को एक अन्य कोमल और नारीवादी आयाम से चोट मारती है. यूरोप के सभ्य समाज से भारत की तुलना कर रहा यह नायक ठीक इसी समय बारी बारी से उन लोगों से मुखातिब होता है जो पूरे शोषक हैं, जो आधे शोषक आधे शोषित हैं और अंत मे वो उन लोगों से भी मुखातिब होता है जो सौ प्रतिशत शोषित हैं.

    कहानी आगे बढती है. पित्रसत्ता, पुरुषसत्ता, जातीय दंभ को परम्परा और पवित्र शास्त्रों, भगवानों के उद्धरण से जायज ठहराते हुए यह स्थापित किया जाता है कि ये शोषण जो हो रहा है वह असल में आ कहाँ से रहा है.

    इसके बाद शोषित लोगों की बुरी हालत को भी समझाया जाता है. ‘औकात’ शब्द बार-बार आता है जो असल में भारत के धार्मिक राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन की धुरी है. शोषण का मूल आधार ‘औकात’ का होना या न होना ही है लेकिन ये जब अभिव्यक्त होता है तो आर्थिक आधार पर होता है. ‘औकात’ भारत के धर्म और शास्त्रों ने पहले ही तय कर दी है और औकात तय करने के बाद स्वाभाविक रूप से उभरने वाली सामाजिक व्यवस्था का पालन करना और करवाना हर जाति की अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी बन जाति है.

    इस जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए अपने से नीची जाति का अपमान करना, मजदूरी कम देना, पिटाई करना, बलात्कार करना, गंदे कामों में लगाए रखना, भयभीत कुपोषित बनाए रखना इत्यादि इत्यादि धर्म और शास्त्रों के अनुसार जायज काम हैं जो कि व्यवस्था को बनाये रखने के लिए स्वयं इश्वर या ब्रह्म ने बताये हैं.

    अपने देश, समाज या धर्म को इस नायक ने गलती से जिस रूमानियत में कुछ और ही समझ लिया था, वो जमीन पर हकीकत में कुछ और ही निकलता है. इससे उसे और उसकी प्रेयसी को चोट लगती है. पूरी फिल्म में यह चोट बार बार शोर मचाती है. साथ ही अछूत या अस्पृश्य जातियों से आने वाले गरीब और असहाय लोगों का रुदन और विलाप भी इसमें बहुत कलाकारी और सावधानी से उभारा गया है. 

    इस फिल्म में कई सारे उल्लेख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आते हैं. भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण, रोहित वेमुला प्रकरण, खैरलांजी काण्ड, अतीत के महाकाव्यों से उभर रहे पात्र और इन सबके साथ ही उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीती के कई सारे बिंब एकसाथ समानांतर बहते हैं और इस देश और इसके समाज के बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं.

    इन समानांतर बह रहे बिंबों के बीच यूरोप के सभ्य समाज से सभ्यता और ज्ञान की सुगंध लेकर अचानक भारतीय समाज की सडांध में आ गिरने वाले नायक को अपने गर्व और नैतिकता को बचाने के लिए एकमात्र उम्मीद भारत के संविधान में नजर आती है. मेरे लिए यही इस फिल्म का केन्द्रीय बिंदु है जहाँ से फिल्म में और फिल्म के बाहर भी सब कुछ बदल जाता है.

    इस फिल्म में कुछ कमजोरियां भी हैं जिन्हें नजरअंदाज करना ठीक नहीं. एक सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी में है. शोषित वर्ग के अर्थात दलितों वंचितों के नायकों और मुक्तिकामियों को यहाँ कमजोर और असहाय बताया गया है. वे हमेशा रोते सिसकते रहते हैं जैसे कि यूरोप अमेरिका से आने वाले किसी सवर्ण द्विज मसीहा का इंतज़ार कर रहे हैं. उनके अपने संघर्ष का कोई परिणाम तभी निकल सकता है जब कि शोषक अर्थात सवर्ण द्विज तबके या जातियों में ही जन्मा कोई मसीहा यूरोप से सभ्य होकर भारत आएगा और उनकी मदद करेगा. एक तरह से दलितों वंचितों की मुक्ति की संभावना सवर्ण द्विजों के प्रयासों और सदिच्छा पर ही निर्भर है.

    ये निर्भरता पीड़ित करती है. इसका कारण समझना भी आसान है. असल में यह फिल्म उन लोगों के लिए बनाई गयी है जो स्वयं जातिगत शोषण की इस डिजाइन में फायदा उठा रहे हैं. ये फिल्म उनके ह्रदय परिवर्तन कि दृष्टी से बनाई गयी है. इसीलिये शोषकों के जातीय अहंकार को इतनी भी चोट न लगे जाए कि हृदयाघात ही हो जाए. हृदय परिवर्तन के लिए सच्चाई को उजागर करते हुए उसे सुरक्षित सीमाओं में रखना होता है ताकि हृदयाघात ही न हो जाए. शोषकों के ह्रदय परिवर्तन की उम्मीद और इंतज़ार करने का यह आग्रह इस फिल्म की कहानी में एक ऐसी मजबूरी बनकर उभरता है जो बहुत निराश करती है. इतिहास में जाकर अगर हम गांधी और अंबेडकर की अप्रोच के बीच के तनाव को देखें तो यह वाही तनाव है. गांधी ह्रदय परिवर्तन चाहते हैं और अंबेडकर व्यवस्था- परिवर्तन और धर्म परिवर्तन चाहते हैं.

    ये सुरक्षित सीमा बनाये रखना बिजनेस और मार्केटिंग के नजरिये से भी जरुरी है. सीधी सी बात है आपके प्रोडक्ट को खरीदने वाले लोगों की नैतिकता और धर्म पर बेरहम चोट नहीं पहुंचाई जा सकती. एक सुरक्षित सी ‘चपत’ लगाकर प्यार से आग्रह करना फायदेमंद है. यही इस फिल्म में भी किया गया है. अंत में इस फिल्म को देखने वाला ‘कास्ट ब्लाइंड’ तबका अगर अपनी विरासत धर्म और समाज पर रत्ती भर भी गर्व न कर सके तो वो सिनेमा हाल में बैठे बैठे ही टूट जायेगा. नायक और नायिका तो संविधान में गर्व करते हुए स्वयं को बचा लेते हैं लेकिन आम सवर्ण भारतीयों से इतनी उम्मीद नहीं की जा सकती. उन्हें अंतिम रूप से गर्व करने के लिए संविधान नहीं दिया जा सकता. वे जिस एकमात्र चीज में गर्व कर सकते हैं वो बात ये है कि “चलो अतीत में हमने जो भी गलत किया लेकिन वर्तमान में या भविष्य में इसे ठीक भी हम ही करेंगे”.

    यही वो केन्द्रीय बात है जो मुझे पीड़ित करती है. शोषित की ‘एजेंसी’ या ‘कर्ता होने की संभावना’ को व्यवस्था या ‘स्ट्रक्चर’ फिर से निगल लेता है. यहाँ दलितों शोषितों को सन्देश ये दिया जा रहा है कि शोषण भी हम ही करेंगे और तुम्हे मुक्त भी हम ही करेंगे. तुम बैठकर रामलीला देखते रहो.

    अभी भी भारत का समाज इतना सभ्य नहीं हो सका है कि वो स्त्रीयों की आजादी का श्रेय किसी स्त्री को दे सके. या दलितों- ट्राइबल्स की मुक्ति का श्रेय खुद दलितों या ट्राइबल नेताओं को दे सके. भारत का सवर्ण द्विज पुरुष आज भी स्त्रीयों का मुक्तिदाता खुद बनना चाहता है, साथ अवर्णों, दलितों और वंचितों को मुक्त करने का श्रेय स्वयं ही लेना चाहता है. इसका एक गहरा कारण है. जब शोषक तबके से आने वाले लिबरल नायक वंचितों को मुक्त करने वाली इबारत लिखते हैं तो वे व्यवस्था में कोस्मेटिक बदलाव कर आपद धर्म निभाते हैं.

    वे शोषण के कील मुहांसों का फौरी इलाज करके निकल जाते हैं ताकि इस समाज की शिराओं में बह रहा जहरीला और दूषित रक्त ही पूरी तरह न बदल जाए. स्मृति शास्त्रों में दी गयी व्यवस्था कोई पूरी तरह न उखाड़ दे, इसके लिए पहले ही आगे दौड़कर चलताऊ बदलाव कर दीजिये. इस तरह महान बनने का श्रेय भी मिल जाएगा और प्राचीन व्यवस्था भी जस की जस बनी रहेगी. फिर जब समय अनुकूल होगा तो स्मृतियों को कानून की तरह लागू करने का कोई रास्ता निकाल लेंगे.

    इस तरह ये चलताऊ सुधार असल में शोषण की पीड़ा से भी अधिक खतरनाक होता है. कील मुहांसों का इलाज करके सामाजिक व्यवस्था के मूल आधार, उसके रक्त अर्थात उसके धर्म और नैतिकता को न बदलते हुए चलताऊ सुधार ले आना एक षड्यंत्र है. इसके जरिये धर्म, शास्त्र और नैतिकता की मूल प्रस्तावनाओं को तात्कालिक चोटों से बचाया जाता है. ये भारतीय द्विजों का सबसे बड़ा षड्यंत्र है.

    राजा राममोहन रॉय, ईश्वरचंद विद्यासागर, केशव चन्द्र या गांधी जैसे सुधारकों ने आज तक भारत में यही किया है. वे इस देश के धर्म दर्शन और नैतिकता पर उतनी ही चोट लगाते हैं जितनी कि यूरोपीय सभ्यता को एकोमोडेट करने के लिए जरुरी हो. वे उससे एक इंच भी आगे नहीं जाते. इसके विपरीत अंबेडकर, कबीर, फूले, पेरियार और ललई सिंह यादव जैसे क्रांतिकारी इससे कहीं आगे जाकर इस धर्म और इसकी नैतिकता पर ही चोट करते हैं ताकि जहरीले पेड़ की जड़ ही सूख जाए. द्विज क्रांतिकारी जहरीले पेड़ के पत्ते और फल नष्ट करते हैं लेकिन उसकी जड़ पर प्रहार नहीं करते.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • कश्मीर का भारत में विलय: महान उपलब्धि है!! — Dr Surendra Bisht

    कश्मीर का भारत में विलय: महान उपलब्धि है!! — Dr Surendra Bisht

    ​Dr Surendra Singh Bisht

    सनातन समाज का पतन होने के कारण भारत का अंतिम विभाजन 1947 में हुआ। पतनशील सनातन समाज के कारण केवल दो पीढ़ी पूर्व मुस्लिम बने जिन्ना इस विभाजन के शिल्पकार बने! 1940 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग में भारत विभाजन का प्रस्ताव पारित कराया। खिलाफत के बाद सनातन धर्म के महान नेताओं जैसे महामना मालवीय, लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानंद, लाला हरदयाल, कवींद्र रवींद्र नाथ ठाकुर आदि के द्वारा व्यक्त की गई आशंका को ही जिन्ना मूर्त्त रूप दे रहा था। 8 अगस्त 1942 को “अंग्रेजों’ भारत छोड़ो” आंदोलन की घोषणा वाले भाषण में गांधीजी ने कहा – ”मुसलमानों की जो जायज मांग है, वह जिन्ना की जेब में है। या मानो प्रत्येक मुसलमान की जेब में है। पाकिस्तान तब संभव है, जब आजादी आएगी। अतः आजादी की लड़ाई में साथ दो। जितना जायज है, उतना मिल जाएगा, उससे एक इंच भी अधिक पाने के लिए लड़ना होगा।”

    न मुस्लिम लीग आजादी की लड़ाई में शामिल हुए और न ही अधिकांश मुसलमान। 1943 में राजगोपालाचारी जेल में जाकर गांधीजी से मिले। उन्होंने भारत विभाजन के प्रस्ताव पर गांधीजी की सहमति ली। राजाजी ने भारत विभाजन कैसे हो, इसका एक प्रारूप सबके विचारार्थ प्रस्तुत किया। उसे जिन्ना को भी भेजा। आगे गांधीजी जेल से बाहर आये। गांधीजी भारत के भविष्य पर बात करने जिन्ना को मिले। राजाजी का दस्तावेज साथ ले गए थे। पर जिन्ना उस पर तैयार नहीं हुए। जिन्ना पूरा पंजाब, पूरा बंगाल सहित असम और कश्मीर के साथ मिलाकर पाकिस्तान बनाने पर अड़े रहे। “चतुर बनिया” गांधी से जिन्ना बचते रहे और अंग्रेजों पर भरोसा करते रहे। उसी में गांधीजी ने दबाव बनाने के लिए सार्वजनिक बयान देना शुरू कर दिया – ‘भारत विभाजन मेरी लाश पर होगा!’ अंग्रेज जल्दी भारत छोड़कर जाना चाहते थे, गांधी और कांग्रेस की सहमति के बिना वे देश को आजादी नहीं दे पा रहे थे और भारत को तोड़े बिना भी नहीं जाना चाहते थे। अब अंग्रेजों ने जिन्ना को दबाया कि जो मिल रहा है, ले लो, नहीं तो वो भी नहीं मिलेगा। अंत में गांधी की सहमति से बनी राजाजी योजना के अनुसार ही जून 1947 में भारत विभाजन अंग्रेजों और जिन्ना को स्वीकारना पड़ा। योजना अनुसार, नेहरू के पुरुषार्थ के बावजूद सिंध का एक जिला, थारपारकर को भारत मे नहीं मिलाया जा सका !

    जिन्ना उस आधे अधूरे मिले पाकिस्तान से आहत था। सत्ता हस्तांतरण समझौते के अनुसार देशी रियासतें भारत या पाकिस्तान में मिलने के लिए स्वतंत्र थी। अब जिन्ना कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने का षड्यंत्र में लग गए। गांधी – नेहरू भी जिन्ना की बची नाक काटने के लिए आतुर थे। स्वतंत्रता से पहले ही जुलाई 1947 में आपसी विचार (माउंटबेटन, गांधी, नेहरू और पटेल के बीच) के बाद गांधीजी पहली बार कश्मीर पहुंचे। घोषित उद्देश्य महाराजा से शेख अब्दुल्ला को रिहा करने की मांग थी। गांधीजी महाराजा से मिले और कश्मीर को भारत में मिलाने की मांग रखी। महाराजा तुरंत तैयार नहीं हुए। शाम को महारानी को मिलने बुलाया गया। नेहरू द्वारा भेजी गई फ़ाइल उन्हें दिखाई गई। फ़ाइल देखने के बाद महारानी ने कहा – मुझे क्या करना है ? गांधीजी ने कहा कि मैं लौटने से पहले महाराजा से कश्मीर के भारत में विलय पर सहमति लेना चाहता हूँ। अगले दिन महाराजा ने गांधीजी को मौखिक आश्वासन दे दिया। गांधीजी ने लौटते समय ट्रैन में रिपोर्ट लिखी और नेहरू को भेज दी।

    रियासतों का विलय गांधीजी ने सरदार पटेल को सौंपा था। मुस्लिम बहुल होने के कारण कश्मीर के भारत में विलय के प्रति सरदार पटेल अनिच्छुक थे। वे व्यवहारिक राजनेता थे इसलिए वे मुस्लिम बहुल होने के कारण कश्मीर को हमेशा का सरदर्द पालना मान रहे थे। पर कुछ समय बाद जिन्ना ने गलती कर दी। सरदार पटेल के गुजरात की हिन्दू बहुसंख्या वाली जूनागढ़ रियासत को पाकिस्तान में विलय के समझौते पर जिन्ना ने हस्ताक्षर कर दिए। अब सरदार पटेल को बहाना मिल गया। उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय की प्रक्रिया शुरू कर दी।

    तभी प्रधानमंत्री नेहरू को गुप्त समाचार मिला कि पाकिस्तान कश्मीर को हड़पने के लिए सेना घुसाने वाला है। नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिख कर नाराजगी व्यक्त की कि विलय समझौते में देरी क्यों हो रही है, जल्दी करो, पाकिस्तान सेना घुसा सकता है। कुछ ही दिनों में पाकिस्तानी सेना श्रीनगर के पास पहुंच गई, तब आनन फानन में कश्मीर विलय पर हस्ताक्षर हुए। गांधी ने जनरल करियप्पा को आशीर्वाद देकर कश्मीर भेजा। कुछ सामाजिक संगठनों ने श्रीनगर हवाई अड्डे को दुरुस्त करने जैसा मामूली सहयोग भी दिया। सेना ने कश्मीर में पहुंच कर श्रीनगर को बचा लिया।

    अब माउंटबेटन बीच में आ गए। उन्होंने नेहरू पर दबाव बनाया। बीच का रास्ता पर अनौपचारिक (और अघोषित भी) समझौता कर दिया। नेहरू ने तब कश्मीर का मामला सरदार पटेल से निकाल कर अपने हाथ में ले लिया। सेना को रोककर कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले को संयुक्त राष्ट्र संघ में नेहरू ले गए। गांधी और सरदार पटेल उससे बहुत नाराज हुए पर तब तक गलती हो चुकी थी।

    बाद में एक नराधम ने गांधी की हत्या कर दी। सरदार पटेल कमजोर पड़ गए। आगे 1950 में असमय ही सरदार पटेल का देहांत हो गया। कश्मीर समस्या पर पूर्णविराम नहीं लग पाया। तब से कश्मीर के बहाने पाकिस्तान को पीटने का लगातार मौका भारत को मिल रहा है।

    जिन्ना को छोटा से छोटा पाकिस्तान देने की गांधी की कूटनीति और नेहरू के कश्मीर प्रेम का परिणाम है कश्मीर का भारत में विलय! सरदार पटेल और नेहरू की कुछ गलतियों के कारण पूरा कश्मीर भारत मे नहीं मिला सके। सरदार पटेल ने कश्मीर विलय में जो देरी का अपराध किया और नेहरू ने पाकिस्तानी आक्रमण के बाद माउंटबेटन की बात मानकर कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने की गलती की, उसके कारण एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान में अभी भी है। पर मुस्लिम बहुल होते हुए कश्मीर का भारत में विलय तत्कालीन नेताओं की महान उपलब्धि है।

    जिन संगठनों और नेताओं की महत्वकांक्षा के आड़े गांधीजी आ गए, उन्होंने अपने अनुयायियों के दिल- दिमाग में गांधी के विषय में अनेक असत्य बातें घुसा दीं हैं। उसी में गांधी को भगवान मानने वाले सरदार पटेल को महान बताया जा रहा है और पटेल के भगवान को खलनायक सिद्ध किया जा रहा है। कश्मीर के विलय के विषय में दुष्प्रचार भी उसी का हिस्सा है।

    ​Dr Surendra Singh Bisht

    राष्ट्रीय संयोजक – भारत अभ्युदय प्रतिष्ठान (वैकल्पिक नीतियों के लिए शोध, चिंतन व सामाजिक प्रयोगों पर कार्यरत बौद्धिक ​संस्थान)
    मुख्य संपादक – भारत अभ्युदय पत्रिका

  • हम भारतीय लोग पानी के संदर्भ में निरक्षर हैं व मिथकों द्वारा संचालित हैं — Vivek Umrao Glendenning

    हम भारतीय लोग पानी के संदर्भ में निरक्षर हैं व मिथकों द्वारा संचालित हैं — Vivek Umrao Glendenning

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    आमुख

    अनुपम मिश्र जी से मेरी पहली मुलाकात लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व हुई थी। बहुत विनम्र व्यक्तित्व थे। पहली मुलाकात के बाद हम लोगों की सैकड़ों मुलाकातें हुईं, बहुत बार तो हम लोग दिन-दिन भर साथ रहे, लंबी चर्चाएं होतीं थीं। बहुत बार ऐसा हुआ कि वे गांधी शांति प्रतिष्ठान के अपने कार्यालय में अपनी मेज पर लिखापढ़ी वाला कामकाज निपटा रहे होते थे और मैं चुपचाप उनके साथ बैठा हुआ, उनको देश विदेश से आए दस्तावेजों का अध्ययन कर रहा होता था।

    अनुपम जी की दो पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुईं, “राजस्थान की रजत बूंदे” व “आज भी खरे हैं तालाब”। जब भी मेरे पास उनकी दी हुई प्रतियां खतम हो जातीं थीं, उपलब्ध होने पर वे मुझे और प्रतियां दे देते थे। मैंने उनकी इन दो पुस्तकों की प्रतियां बहुत लोगों को बांटीं। इन पुस्तकों का लेखन व शिल्प बहुत ही अधिक सुरुचिपूर्ण व सादगीपूर्ण था। इन पुस्तकों से ही अनुपम जी की सौन्दर्यबोध की गहरी समझ का पता चल जाता था।

    अनुपम जी की इच्छा के कारण ही मैंने स्वीडन के सहयोग से राजेंद्र सिंह द्वारा स्थापित की गई “तरुण जल विद्यापीठ” में भूमिका निभाने का कार्य किया था। अनुपम जी व उनकी पत्नी दिल्ली से तरुण भारत संघ तक मुझे छोड़ने भी गए थे।

    तरुण जल विद्यापीठ में पहुंचने के कुछ महीने बाद “जल-बिरादरी” के राष्ट्रीय अधिवेशन में मुझे व अरुण तिवारी जी को संयुक्त-राष्ट्रीय-संयोजक का उत्तरदायित्व भी दिया गया था।

    तरुण जल विद्यापीठ व जलबिरादरी के बाद मैं भारत के कई राज्यों में ऐसे प्रयासों व कार्यों से सक्रिय रूप से संबद्ध रहा जिनके कारण सैकड़ों गावों में पानी का जलस्तर बढ़ा, दशकों से सूखी पड़ी मर चुकी नदियां भी पुनर्जीवित हुईं। सैकड़ों तालाबों को पुनर्जीवित किया गया। इन प्रयासों व कार्यों के अतिरिक्त एक लेखक, पत्रकार व संपादक के रूप में भी कुछ ऐसे क्षेत्रों में भी गया जहां स्थानीय लोगों ने पानी की समस्याओं को अपने बूते हल किया।

    पानी से जुड़े वैश्विक संस्थानों के अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों के निर्माण में मैंने सहयोग भी दिया। दस्तावेजों में मुझे विशेष रूप से सम्मान के साथ धन्यवाद ज्ञापित भी किया गया। दुनिया की नामचीन विश्वविद्यालयों के जल-विज्ञान विभागों के प्रोफेसरों व शोधार्थियों से भी समय-समय पर मेरी लंबी चर्चाएं होती रही हैं।

    मेरी जीवनसाथी नदियों की विशेषज्ञ हैं, जल-विज्ञान से स्नातक करने के बाद उन्होंने नदियों के व्यवहार व पुनर्जीवन पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पीएचडी की। उनकी पीएचडी-थीसिस का मूल्यांकन दुनिया के कई देशों के प्रकांड जल-विज्ञानी लोगों ने किया। कई योरपीय देशों की विख्यात विश्वविद्यालयों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में इनके द्वारा लिखे गए अध्याय जोड़े गए हैं। आजकल ऑस्ट्रेलिया सरकार के नदियों वाले राष्ट्रीय विभाग में अच्छे पद पर कार्यरत हैं। ऑस्ट्रेलिया वर्षाजल-प्रबंधन व भूजल प्रबंधन के मामलों में दुनिया के सबसे अग्रणी देशों में है। जीवनसाथी से भी मुझे जल के संदर्भ में बहुत कुछ जानने समझने का अवसर मिलता रहता है।

    पानी के मिथक बनाम आर्गनाइज्ड सामाजिक अपराध

    जमीनी धरातल पर काम करने, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन इत्यादि से मैं एक तथ्य बहुत अच्छी तरह समझ पाया कि भारतीय समाज ने पानी के संदर्भ में बहुत ही अधिक गलतियां की हैं, गलतियों की श्रंखला। इसके अतिरिक्त भी बहुत बड़ा मुद्दा यहा है कि पानी के संदर्भ में भारतीय समाज के लोगों की सोच व मानसिकता अनेक मिथकों द्वारा नियंत्रित होती है। पानी से जुड़े कई भयंकर मिथकों के कारण जाने-अनजाने भारतीय समाज के लोगों से लगातार बढ़ते हुए क्रम में पानी के संदर्भ में सामाजिक अपराध होते जा रहे हैं। यह लेख ऐसे ही कुछ मिथकों पर चर्चा करने का प्रयास है।

    भूजल पेयजल होता है, ताजा होता है — मिथक

    भूजल का मतलब होता है, धरती के अंदर का पानी। गांव हो या शहर, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़ भारतीय समाज में अपवाद छोड़कर सभी का यही मानना है कि भूजल पेयजल होता है, सबसे अधिक शुद्ध होता है। इससे भी बड़ी बात यह कि पानी जितना गहराई से निकाला जाता है, उसको उतना ही शुद्ध माना जाता है। जबकि होता इसके विपरीत है। धरती के अंदर के पानी को ताजा भी माना जाता है। जबकि यदि धरती के अंदर का पानी ताजा हुआ तो फिर गैर-ताजा पानी क्या हुआ।

    दरअसल भूजल को पेयजल व ताजा मानने के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं। एक — पानी का रंग, दो — पानी का तापमान, तीन — आलस्य/कामचोरी।

    लोगों ने तालाब, बरसाती नाले, नदियां भ्रष्ट कर दीं या नष्ट कर दीं या प्रदूषित कर दीं। इसलिए इनका पानी गंदा दीखता है। भूजल साफ दीखता है। लीजिए भूजल पेयजल सिद्ध हो गया, इतिश्री।

    भूजल सर्दी में गर्म व गर्मी में ठंडा महसूस होता है। भूजल का तापमान पूरे वर्ष लगभग कमोवेश उतना ही रहता है, लेकिन बाहरी वातावरण के तापमान के कारण हमें गर्म व ठंडा महसूस होता है, इसलिए हमारी स्वादेंद्रियों को लगता है कि पानी ताजा है। लीजिए भूजल ताजा-पानी सिद्ध हो गया, इतिश्री।

    जब मशीन लगाकर बोर खोदकर घर के भीतर पानी का स्रोत बनाया जा सकता है तो तालाब बनाने, वर्षा-जल संग्रहण करने, तालाब से घरों तक पानी की आपूर्ति व्यवस्था करने जैसी व्यवस्थाओं को करने की क्या जरूरत है। आलस्य/कामचोरी ने भूजल को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर दिया, इतिश्री।

    भूजल अनन्त है — मिथक

    पौराणिक कथाओं में पाताललोक व धरती का शेषनाग के फन पर रखे होने जैसी काल्पनिक मान्यताओं इत्यादि के कारण परंपरा में स्थापित होकर भारतीय समाज की संस्कृति की सोच का अभिन्न भाग बन चुका है कि धरती के अंदर का पानी अनन्त है। चूंकि धरती के भीतर का पानी अनंत है इसलिए कितना भी पानी निकाला जा सकता है।

    यही कारण है कि जब जलस्तर नीचे जाता है तो लोग पानी के लिए चिंतित नहीं होते, वे चिंतित होते हैं कि उनको और गहरा बोर करना पड़ेगा। पानी के संदर्भ में विज्ञान व तकनीक का प्रयोग और गहरे जाकर पानी निकालने की सुविधा तक सीमित है। भूजल को पेयजल मानने का मिथक जब भूजल को अनन्त मानने वाले मिथक के साथ जुड़ जाता है तो स्थिति बहुत ही अधिक अनियंत्रित व भयावह हो जाती है। इन दो मिथकों का जुड़ना भी पानी के संदर्भ में भारतीय समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है।

    पानी बचाओ नारा — मिथक

    पानी जीवन के लिए अतिआवश्यक तत्व है। केवल मानव शरीर के जीवित रहने के लिए ही नहीं, शाकाहारी व मांसाहारी सभी तरह के भोजन उत्पादन, कपड़ा उत्पादन, कृषि उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन, जंगल, जीव-जंतु, पर्यावरण इत्यादि-इत्यादि के लिए भी पानी मूलभूत तत्व है। कितना भी शोर मचाया लिया जाए, व्यवहारिकता यह है कि पानी की खपत कम नहीं की जा सकती है। चूंकि पानी की खपत कम नहीं की जा सकती है तो पानी को बचाया भी नहीं जा सकता है, संभव ही नहीं।

    पानी बचाने के नाम पर यदि कुछ किया जा सकता है तो वह केवल यह कि पानी का दुरुपयोग कम किया जा सकता है। पानी के दुरुपयोग के संदर्भ में यदि गहराई से तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए तो भारत के 70% से अधिक लोग पानी का दुरुपयोग करना तो दूर, सामान्य आवश्यकता के लिए पानी की उपलब्धता तक नहीं रखते हैं, दुरुपयोग कर पाने की संभावना तक नहीं रखते हैं। लेकिन चूंकि हम भारतीय समाज के लोग सामंती मानसिकता से बेहद ग्रस्त हैं, इसलिए हर समस्या की जड़ जो लोग हाशिए पर हैं, उन्हीं को मानने की बीमार, कुंठित व बर्बर मानसिकता में रहते हैं।

    पानी का स्वतंत्र-अस्तित्व है — मिथक

    भूजल पेयजल होता है, भूजल अनन्त है, पानी बचाया जा सकता है, इत्यादि-इत्यादि मिथकों के कारण यह मानसिकता स्वतः बन जाती है कि पानी का स्वतंत्र अस्तित्व होता है। इसीलिए पानी, पेड़, जंगल, पर्यावरण, तालाब, बरसाती नालों, नदियों, समुद्र इत्यादि-इत्यादि के अंतःसंबंध क्या हैं, अंतःनिर्भरताएं क्या हैं, इत्यादि-इत्यादि की समझ भी नहीं विकसित हो पाती है। पानी को स्वतंत्र अस्तित्व मानने का मिथक भी बहुत ही अधिक भयावह मिथक है।

    भारतीय समाज की पानी की महान-परंपराएं — मिथक

    भारत में ऐसे बहुत लेखक हैं जो शताब्दियों पहले भारत में होने वाले वर्षा जल प्रबंधन को बहुत गौरव के साथ आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं, मानों दुनिया के दूसरे समाज मूर्ख थे और केवल भारतीय समाज ही ऐसा कर रहा था। इनमें से अपवाद छोड़कर अधिकतर लोगों ने पानी के लिए कोई ठोस काम जमीन पर नहीं किया होता, फिर भी अपने आपको पानी विशेषज्ञ मानते हैं। जबकि इनमें से अधिकतर लोगों की पानी के संदर्भ में ठोस व व्यापक समझ नहीं होती, हवाबाजी से समझ विकसित हो भी नहीं सकती, संभव ही नहीं।

    इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि केवल भारतीय समाज ही नहीं, अपितु दुनिया के हर समाज ने पानी के स्रोतों से स्वयं को जोड़ कर रखा, उस जमाने में और कोई रास्ता ही नहीं था, विकल्प नहीं थे। इसलिए ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि भारतीय समाज के अलावा दुनिया के अन्य समाजों ने पानी के संदर्भ में परंपराएं व सामाजिक नियम नहीं बनाए थे। बल्कि दुनिया के अनेक समाजों ने भले ही कितना विकास कर लिया हो, पानी के संदर्भ में परंपराओं व नियमों को अधिक परिष्कृत किया।

    यूं लगता है कि भारतीय समाज में पानी के संदर्भ में परंपराएं व सामाजिक नियमों की जड़े गहरी नहीं थीं, जो भी था वह मजबूरी में था। ठोस सामाजिक समझ व योजना के अंतर्गत नहीं था। दुनिया में भारत जैसे समाज अपवाद हैं जिन्होंने निर्दयता के साथ लगभग पूरे देश में पानी के स्रोतों को खतम किया वह भी बिना किसी ठोस कारण। केवल फूहड़ जीवन-शैली व बीमार मानसिकता के कारण, कुओं, तालाबों, बरसाती नालों को पाट दिया। यह सब किया भारतीय समाज के आम लोगों ने। व्यवस्था तंत्रों ने तो बहुत ही अधिक आगे जाकर नदियों को ही खतम करने व पाटने का काम किया।

    दरअसल जब सामाजिक परंपराओं व नियमों के साथ समाज के लोग स्वयं को सहजता व परिष्करण के साथ जोड़कर नहीं रख पाते, वरन् इनको मजबूरी मानते हैं। तो ऐसी सामाजिक परंपराओं व नियमों को समय के साथ-साथ तार-तार होने में देर नहीं लगती।

    यही कारण है कि भारत में राजस्थान राज्य सहित लगभग सभी समाजों में पानी से जुड़ी परंपराएं तार-तार हुई हैं। राजस्थान चूंकि रेगिस्तानी राज्य था इसलिए वहां विभीषिका बहुत स्पष्ट रूप में लोगों के सामने आना शुरू हो गई तो मजबूरी में लोगों को जल-संरक्षण वाली परंपराओं की ओर लौटना पड़ा। इस पर भी जिन लोगों के पास परंपराओं में लौटने की मजबूरी नहीं थी या जिनके जीवन में विभीषिका स्पष्ट रूप में नहीं परिलक्षित हुई, उनमें से अधिकतर लोगों ने जल-संरक्षण की परंपराओं की ओर लौटना बिलकुल जरूरी नहीं समझा।

    राजस्थान जैसे इलाके जहां वर्ष जल का संग्रहण करना जीवन की मजबूरी रही है, को छोड़कर वर्षा जल संग्रहण को अब भी जीवन का अभिन्न हिस्सा, जरूरत, जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व नहीं मानना, यह भारतीय समाज की बीमार सोच ही है। भारतीय समाज ने बेढंगे विकास के नाम पर पानी हर स्तर पर सबसे अधिक उपेक्षित व तिरस्कृत किया गया है। समाज व लोगों ने जिन परंपराओं से सबसे अधिक व शीघ्रता से नाता तोड़ा वे पानी से जुड़ी परंपराएं थीं।

    गैर-जिम्मेदार सरकार, फूहड़ बेहूदे जल-विभाग/संस्थान/विश्वविद्यालय

    भूजल के प्रति मिथकों को पालने पोषने का काम भारत की सरकारों, जल-इंजीनियरों, जल-संस्थानों, तकनीकी-संस्थानों व विश्वविद्यालयों इत्यादि ने भी धुआंधार तरीके से किया। इतना अधिक किया कि अब वापस लौटना तो असंभव है ही, दूर-दूर तक समाधान तक नहीं दीख रहा है। बेसिरपैर के बेहूदे शोध किए गए।

    लंबे समय से भारत की सरकारों, उद्योगों, कृषि व लोगों ने अंधाधुंध तरीके से भूजल का प्रयोग किया। भूजल का प्रयोग करने के चक्कर में धरती के ऊपर के पानी के महत्वपूर्ण स्रोतों को खतम कर दिया गया। स्थितियां इतनी अधिक खतरनाक कि सरकार ने खुद एक-एक गांव को अनेक-अनेक हैंडपंप बाटे। पेयजल के नाम पर सरकार हैंडपंप लगाती है या ट्यूबवेल लगाकर टंकियों में पानी भरकर आपूर्ति करती आई है। सरकार जब पेयजल के आकड़े देती है हो लगाए गए हैंडपंपों की संख्या बताती है। कृषि की बात कीजिए तो सरकार गर्व से बताती है कि कितने गहरे व कितनी संख्या में ट्यूबवेल लगवाए गए। भयंकर मूर्खता है, लगातार की गई है, अब भी की जा रही है, बेरोकटोक की जा रही है।

    समाधान

    पानी बचाना, पानी का समाधान नहीं है, हो ही सकता, बिलकुल ही असंभव है। पानी बचाने की बजाय, पानी पैदा करने की बात करनी चाहिए, यही एकमात्र विकल्प व एकमात्र समाधान है। जब लोग पानी पैदा करना सीख जाएंगे, पानी पैदा करना शुरू कर देंगे। तब अपने आप पानी का सदुपयोग करना भी सीख जाएंगे। अपने आप पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक हो जाएंगे।

    पानी पैदा करने की घटना से जुड़ी बहुत सी अंतःसंबंधित, अंतःनिर्भर घटनाएं होती हैं, उन सभी से भी स्वतः साक्षात्कार होना चला जाएगा। यही साक्षात्कार होना ही किसी समाज को पानीदार समाज बनाता है, न कि राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग एजेंसीज से फंड प्राप्त करने के तीन-तिकड़म या टीवी चैनलों में साक्षात्कार देना, न कि सोशल मीडिया में जो भी अधकचरा है उसको थूक देना, न कि मीडिया सेलिब्रिटिज्म।

    अंतिम बात, भयावह साामजिक-समस्या का समाधान सरल नहीं होता। बहुत ही अधिक साामजिक जीवटता, इच्छाशक्ति, दृढ़ता व दीर्घकालिक सामाजिक-योजनाएं लगतीं हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • आग, बचाव व बच्चों का प्रशिक्षण — Vivek Umrao Glendenning

    आग, बचाव व बच्चों का प्रशिक्षण — Vivek Umrao Glendenning

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ​ऑस्ट्रेलिया में आग व बचाव सेवाएं कहा जाता है, बहुत महत्वपूर्ण व सम्मानित सेवा मानी जाती है। छोटे-छोटे बच्चों के लिए वर्ष में कई बार कार्यक्रम आयोजित होते हैं। छोटे-छोटे बच्चों जिनको ढंग से चलना व बोलना तक नहीं आता, उन बच्चों को भी आग व बचाव सेवाओं के वाहनों व यंत्रों से परिचित करवाया जाता है। पूरा का पूरा अत्याधुनिक वाहन बच्चों के हवाले कर दिया जाता है, बच्चे उसमें चढ़ सकते हैं, बटनें दबा सकते हैं, स्टियरिंग से खेल सकते हैं। खुद करते हुए अपनी जिज्ञासाएं शांत कर सकते हैं। बच्चों को इस सेवा से जुड़े खिलौने उपहार के रूप में दिए जाते हैं, ताकि बच्चे घर में भी सीख समझ सकें।

    आग व बचाव सेवाओं  के लोग बहुत ही मिलनसार होते हैं, यदि आपातकाल में नहीं जा रहे हैं तो किसी बच्चे की रुचि होने पर वाहन में बैठाकर घुमाने जैसी क्रिया कोई बड़ी बात नहीं। यदि आग व बचाव सेवाओं का कोई वाहन जा रहा है, तो रास्ते में मिलते बच्चों से सेवाओं के लोगों द्वारा हाय हेलो बोलना, मुस्कुराना इत्यादि सामान्य बात है।

    आग व बचाव सेवाएं बच्चों के लिए डरावनी नहीं है, न ही बच्चों की पकड़ व पहुंच से दूर। बच्चों के साथ विश्वास व सम्मान का रिश्ता कायम होता है, जो बड़े होने तक चलता रहता है।

    ​आग व बचाव सेवाओं के कई स्तर होते हैं, छोटी से लेकर बड़ी दुर्घटना से लड़ने व बचाव के लिए। यह सेवा केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं है, यह सेवा पेड़-पौधों, जंगल, जानवर, पक्षी सभी प्रकार के जीव-जंतुओं की सेवा व सुरक्षा के लिए है। यह सेवा कुत्ता बिल्ली इत्यादि को भी बचाती है। यह सेवा किसानों की फसलों व किसानों के पशुओं को भी बचाती है। आग हो, बाढ़ हो, तूफान हो या अन्य मामले, यह सेवा लोगों व जीव-जंतुओं को बचाने का प्रयास करती है, ईमानदारी व प्रोफेशनल तरीके से करती है।

    ​मेरा पुत्र आदि जब एक वर्ष का था तब वह फायर ब्रिगेड के अत्याधुनिक वाहन के अंदर घुसकर सबकुछ देख चुका था। चालक की कुर्सी पर बैठकर स्टियरिंग घुमा चुका था। स्कूलों में यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों को भी आग, आग का प्रयोग, सावधानी व बचाव के तरीके सिखाए जाते हैं।

    मेरा पुत्र लगभग पौने तीन वर्ष का है। बिना भवन व ढांचे वाले जंगल-पहाड़ स्कूल जाता है। जंगली जीव-जंतुओं, पहाड़, जंगल, नदी-नालों में उछलते-कूदते हुए सीखता समझता है। हजारों एकड़ का जंगल है, पहाड़ है, जाहिर है जहरीले सांप, चीटियां, लिजर्ड इत्यादि भी होते हैं। इनसे डरने की बजाय इन जीवों के साथ तालमेल व उनको हानि पहुंचाए बिना स्वयं को सुरक्षित रखना सिखाया जाता है।

    आजकल इस जंगल पहाड़ स्कूल में आदि व अन्य बच्चों को आग के बारे में सिखाया जा रहा है। कितने प्रकार से आग जलाई जा सकती है। धातुओं व पत्थरों के घर्षण, माचिस व अन्य तरीकों से आग जलाना सिखाया जाता है। आग जलाते समय चोट लगने पर क्या किया जाए, सिखाया जाता है। आग कैसे बुझाई जाए, सिखाया जाता है। कहां आग जलानी है, कहां नहीं जलानी है, यह सिखाया जाता है।

    प्राकृतिक-संरक्षित जंगल में बच्चे आग की जानकारी प्राप्त करते हुए

    ​आदि धातुओं के घर्षण से आग जलाना सीखते हुए

    बच्चे छोटे हैं, वे पूरी तरह से सीख नहीं पाते हैं, न ही याद कर पाते हैं। लेकिन उनका मस्तिष्क इन जानकारियों को ​संरक्षित तो करता ही है, स्टोर की गई इन जानकारियों का प्रयोग बच्चों के कुछ बड़े होने पर मस्तिष्क बेहतर तरीके से करता है, यदि सीखने सिखाने का क्रम चलता रहा।

    ऑस्ट्रेलिया में कई प्रकार के जंगल होते हैं। एक श्रेणी प्राकृतिक संरक्षित जंगल की होती है, प्राकृतिक संरक्षित जंगलों में आग नहीं जलाई जा सकती है, जंगल में कुछ छोड़ कर आना व जंगल से कुछ लेकर आना प्रतिबंधित होता है। प्रतिबंध का मतलब यह नहीं कि प्रवेशद्वार पर पुलिस लगती है या जांच होती है। एक छोटा सा सूचनापट लगा देना ही पर्याप्त होता है।
    आदि जिस जंगल-पहाड़ स्कूल में जाते हैं, वह प्राकृतिक संरक्षित जंगल है। वहां आग नहीं जला सकते तो बच्चों को घेरा बनाकर, लकड़ी रखकर काल्पनिक आग जलाने व काल्पनिक आग से जानकारी दी गई। अब अगले चरण में उनको ऐसे पार्क में ले जाया जाएगा जहां आग जलाने की सुविधा है। वहां बच्चे असल आग जलाना व सुरक्षा/सावधानी के साथ प्रयोग करना सीखेंगे।

    मस्ती की मस्ती, सीखना का सीखना।

    कोई भी व्यवस्था रातोंरात कानून बनाने से नहीं बनती है। समाज को जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, पीढ़ी दर पीढ़ी सीखने-सिखाने का काम बिना थके, बिना ऊबे करते रहना पड़ता है। अपने आप कुछ भी नहीं होता है। यदि समाज जागरूक नहीं, यदि समाज अपनी जिम्मेदारी नहीं महसूस करता उल्टे राजनैतिक/धार्मिक/आर्थिक सत्ताओं के हाथ में छोड़ देता है तो ऐसा समाज अपनी स्वतंत्रता, विकास व परिष्करण सबकुछ सत्ताओं के हाथों में गिरवी रख कर गुलाम बन जाता है।

    यदि समाज व लोग जागरूक व जिम्मेदार हैं तो व्यवस्था की इतनी औकात हो ही नहीं सकती कि सीढ़ी छोटी पड़ जाए, बैराज के पानी निकालने वाले छेद खुले रह जाएं और समाज के बच्चे अकाल मृत्यु प्राप्त करते रहें।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.