Author: संपादक मंडल

  • पर्यटन : पछवादून, उत्तराखंड — Sanjay Jain

    पर्यटन : पछवादून, उत्तराखंड — Sanjay Jain

    Sanjay Jain

    शनिवार छुट्टी का दिन था। तीन दिनों से लगातार भारी बारिश ने घर में कैद किया हुआ था। दोपहर 1:00 बजे के करीब बारिश थोड़ी हल्की हुई नाश्ता भोजन सब हो चुका था सो स्कूटी निकाली और चल पड़ा भीगने के लिए भीगी हुई प्रकृति के रंगों को महसूस करने के लिए। तेज बारिश सीधी आंखों पर पड़ती है पर यह फुहारे थी, स्कूटी चलाने के लिए एकदम संतुलित मात्रा। जा पहुंचा घर से 2 किलोमीटर दूर जमना किनारे नाव घाट। भारी बारिश के बाद उफनती, इठलाती जमना नदी। बीच टापू पर कुछ बगुला भगत अपना शिकार कर रहे थे। कुछ देर बाद कुछ कोए भी इनकी दावत में शामिल हो गए। अब सब मिलकर शिकार करने लगे थे, कोई रंगभेद नहीं काले और सफेद का!!

    आस-पास के गांव वाले पानी में बह कर आई हुई लकड़ियों को ललचाई नजरों से देख रहे थे। लेकिन वहां पर पानी का बहाव बहुत तेज था वरना वह नदी में घुसकर लकड़िया निकाल लाते। नदी किनारे बिना प्लास्टर वाले मकान में दरारें उभर आई थी, उसे खाली किया जा रहा था। रात में ढहने की आशंका थ। बच्चे बूढ़े लड़कियां मर्द सब आ रहे थे उफनते दरिया को देखने के लिए। पहाड़ों पर से बादल भी नीचे उतर आए थे जमुना जी के पांव धोने के लिए। बच्चे नंबर प्लेट वाली साइकिल लेकर घूम रहे थे। हल्की बारिश जारी थी। लोग आ जा रहे थे। यहां से 5 किलोमीटर दूर डाकपत्थर बैराज की ओर चल पड़ा। विराज के पास गरमा गरम समोसे देख कर ठिठक गया। भीगने पर चाय और गरम समोसे ने मौसम का आनंद दुगना कर दिया। दोनों स्वाद बने हुए थे।

    बैराज पर किसी मेले की तरह का मंजर था। जमुना के उफान का नजारा लेने के लिए बच्चे औरत मर्द शहरी देहाती सब आए थे, बुर्के वाली भी थी और बेपर्दा भी हिंदू मुसलमान सब। प्रकृति सबको जोड़ देती है ना कोई रंगभेद करती है ना धर्म भेद। हर की पौड़ी गंगा पर शायद ही कोई मुस्लिम जाता हो, लेकिन यहां सब धर्म के लोग थे। सब के कैमरे निकले हुए थे,धड़ाधड़ सेल्फीयां!! जमुना के साथ फोटुएं!!! बैराज पर बने पार्कों में कोई नहीं जाना चाहता था।

    भुट्टे चाय और पकौड़ी वाले भी अपना-अपना हिस्सा बांट रहे थे। पुल पार 12-15 के झुंडों में युवक नदी से लकड़ियां निकाल रहे थे, बड़े-बड़े स्लीपर भी थे। घर की औरतें और बच्चे भी मदद कर रहे थे आखिर उन्हें भी सर्दियों में लकड़ियां जलानी थी। घोड़ा बग्गी भैंसा बुग्गी टेंपो मोटरसाइकिल सब लकड़ियां ढोने में लगी हुई थी। छोटे-छोटे झगड़े भी थे लकड़ी के लिए। तूने क्यों उठाई मेरी लकड़ी मैंने निकालकर इकट्ठी की थी। ड्रिफ्ट वुड के लिए भी लकड़ी देखने लगा लेकिन कोई शेप नहीं मिली। उन्हें लकड़ियां निकालता छोड़ सात किलोमीटर दूर बॉर्डर पार कर हिमाचल के किल्लोड़ गाँव की तरफ निकल गया।

    टोंस नदी के किनारे खड़ी चढ़ाई और भारी बरसात में पूरी सड़क बैठ कर कच्चे रास्ते में तब्दील हो गई थी। स्कूटी बहुत संभल-संभलकर चलानी पड़ी। आखिर मंजिल आ ही गई। तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरी सुंदरता से भरपूर किल्लोड़ घाटी! आसपास में मेरी सबसे प्रिय जगह। गजब की शांति। शहर के शोर और ट्रैफिक की चकचक से दूर। कभी-कभी एक आद बस या स्कूटर मोटरसाइकिल आ जाती है या जानवरों के लिए चारा पत्ती लेकर जाती महिलाएं। मैं जूते निकाल कर पैराफिट पर बैठ गया और प्रकृति को आत्मसात करने की कोशिश करने लगा। थोड़ी देर बाद लेट गया। ठंडी ठंडी हवा और कीटों का मधुर संगीत जैसे देव लोक।

    इस शांति को भंग किया शाम 6:00 बजे से मंदिर के लाउडस्पीकर ने, देवता रुष्ट ना हो। इसलिए गांव वालों ने नया मंदिर बना लिया था महासू देवता का। पूरी घाटी में भजन नुमा बजते रहे। उस नीरव शांति में थोड़ी देर ऐसे भी झेला। विकास यहां तक पहुंचने लगा है। पास ही देवदार के जंगल के बीच एक ही स्कूटी खड़ी थी। आसपास निगाह दौड़ाई कोई नहीं तभी ऊपर पहाड़ी पर प्रेमी जोड़े का अक्स दिखाई दिया ऐसी जगह जहां से कोई उन्हें नहीं देख सके, लेकिन वह सब को देख सकते थे प्रेमियों के लिए मुफीद जगह। अंधेरा होने लगा था। किल्लोड़ का पांच सात दुकानों का बाजार जहां दुकान पर पेंसिल जूते से लेकर सीमेंट तक हर जरूरत की वस्तु मिल जाती थी, बिना किसी तामझाम के। मैंने एक और चाय और नमकीन ली। अब अंधेरा होने लगा था। वापस चला तो रास्ते में जिन झरनों को छोड़ आया था वह मुझे वापस जाने से रोकने लगे खैर उन झरनों का भी आतिथ्य  स्वीकार किया, और उनका जल ग्रहण किया। बारिश कुछ देर रुकने के बाद फिर शुरू हो गई थी, भीग चुका था। वापसी में बैराज पर फिर चाय की तलब लगी। गरम चाय और समोसे ने अपने अंदाज में समा बांध दिया। कोयलों पर सिंकते भुट्टों के बिना भीगना कैसे पूरा होता। अंततः बरसात में बह गई सड़क और टूटे गड्ढों के बीच घर वापसी। प्रकृति का आनंद लेना हो तो समय का बिल्कुल ख्याल ना रखें, जल्दबाजी ना करें, सुबह 7:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक का लक्ष्य लेकर चलें। खाना-पीना घर से साथ ले जाएं या वहीं गरम चाय समोसे सुड़कें। अकेले या केवल एक और साथी हो जो प्रकृति को आत्मसात कर सके तो बेहतर होगा। इसलिए निकल पड़ो घर से बरसते बादलों के बीच साइकिल या स्कूटी उठाकर या फिर पैदल ही, पर कारों में  तो बिल्कुल नहीं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से मात्र चालीस किलोमीटर की दूरी पर पछवादून में यह सौंदर्य बिखरा हुआ है आइए और आनंद उठाइए।!!!!

    Sanjay Jain


  • अहंकार हार गया और राहुल जीत गए –Firdaus Khan

    अहंकार को एक दिन टूटना ही होता है। अहंकार की नियति ही टूटना है। इतिहास गवाह है कि किसी का भी अहंकार कभी ज़्यादा वक़्त तक नहीं रहा। इस अहंकार की वजह से बड़ी-बड़ी सल्तनतें नेस्तनाबूद हो गईं। किसी हुकूमत को बदलते हुए वक़्त नहीं लगता। बस देर होती है अवाम के जागने की। जिस दिन अवाम बेदार हो जाती है, जाग जाती है, उसी दिन से हुक्मरानों के बुरे दिन शुरू हो जाते हैं, उनका ज़वाल (पतन) शुरू हो जाता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी यही तो हुआ। यहां अहंकार हार गया और विनम्रता जीत गई। चुनाव नतीजों वाले दिन शाम को हुई प्रेस कॊन्फ़्रेंस में राहुल गांधी ने कहा कि हम किसी को देश से मिटाना नहीं चाहते। हम विचारधारा की लड़ाई लड़ेंगे। मैं मोदी जी का धन्यवाद करता हूं, जिनसे मैंने यह सीखा कि एक पॉलिटिशियन होने के नाते मुझे क्या नहीं कहना या करना चाहिए।

    ये राहुल गांधी का धैर्य, विनम्रता और शालीनता ही है कि उन्होंने विपरीत हालात का हिम्मत से मुक़ाबला किया। जब भारतीय जनता पार्टी द्वारा उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए गए, चुनावों में नाकामी मिलने पर उनका मज़ाक़ उड़ाया गया, उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन राहुल गांधी ने कभी अपनी तहज़ीब नहीं छोड़ी, अपने संस्कार नहीं छोड़े। उन्होंने अपने विरोधियों के लिए भी कभी अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने मिज़ोरम और तेलंगाना में जीतने वाले दलों को मुबारकबाद दी। चुनावों में जीतने वाले सभी उम्मीदवारों को शुभकामनाएं दीं। अहंकार कभी उन पर हावी नहीं हुआ। विधानसभा चुनावों में जीत का श्रेय उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दिया। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकर्ता बब्बर शेर हैं। राहुल गांधी में हार को क़ुबूल करने की हिम्मत भी है। पिछले चुनावों में नाकामी मिलने पर उन्होंने हार का ज़िम्मा ख़ुद लिया। ये सब बातें ही तो हैं, जो उन्हें महान बनाती हैं और ये साबित करती हैं कि उनमें एक महान नेता के सभी गुण मौजूद हैं।

    अमूमन देखा जाता है कि जब कोई पार्टी सत्ता में आ जाती है, तो उसे घमंड हो जाता है। राजनेता बेलगाम हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि सत्ता उनकी मुट्ठी में है, वे जो चाहें कर सकते हैं। उन्हें टोकने, रोकने वाला कोई नहीं है। साल 2014 के आम चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। उन्हें ख़ूब सब्ज़ बाग़ दिखाए थे, लेकिन सत्ता में आते ही अपने वादों से उलट काम किया। भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई कम करने का वादा किया था, लेकिन उसके शासनकाल में महंगाई आसमान छूने लगी। भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर रोक लगाने का वादा किया था, लेकिन आए-दिन महिला शोषण के दिल दहला देने वाले मामले सामने आने लगे। भारतीय जनता पार्टी ने किसानों को राहत देने का वादा किया था, लेकिन किसानों के ख़ुदकुशी के मामले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। किसानों को अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ा। भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को रोज़गार देने का वादा किया था, लेकिन रोज़गार देना तो दूर, नोटबंदी और जीएसटी लागू करके जो उद्योग-धंधे चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने का काम किया है। जो लोग काम कर रहे थे, वे भी रोज़ी-रोटी के लिए तरसने लगे। भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो भी फ़ैसले ले रही है, उनसे सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों को ही फ़ायदा हो रहा है। ऑक्सफ़ेम सर्वेक्षण के मुताबिक़ पिछले साल यानी 2017 में भारत में सृजित कुल संपदा का 73 फ़ीसद हिस्सा देश की एक फ़ीसद अमीर आबादी के पास है। राहुल गांधी ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल भी किया था। ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राओं और उनकी सरकार पर अमीरों के लिए काम करने और उनके कर्ज़ माफ़ करने को लेकर लगातार हमला करते रहे हैं। इतना ही नहीं भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए राफ़ेल लड़ाकू विमान सौदे पर भी राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं।

    दरअसल, एक तरफ़ केन्द्र की मोदी सरकार अमीरों को तमाम सुविधाएं दे रही है, उन्हें करों में छूट दे रही है, उनके कर माफ़ कर रही है, उनके क़र्ज़ माफ़ कर रही है। वहीं दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता पर आए दिन नये-नये कर लगाए जा रहे हैं, कभी स्वच्छता के नाम पर, तो कभी जीएसटी के नाम पर उनसे वसूली की जा रही है। खाद्यान्नों और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं। मरीज़ों के लिए इलाज कराना भी मुश्किल हो गया है। दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं और ख़ून के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं। ऐसे में ग़रीब मरीज़ कैसे अपना इलाज कराएंगे, इसकी सरकार को ज़रा भी फ़िक्र नहीं है। सरकार का सारा ध्यान जनता से कर वसूली पर ही लगा हुआ है। वैसे भी प्रधानमंत्री ख़ुद कह चुके हैं कि उनके ख़ून में व्यापार है।

    ऐसे मुश्किल दौर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अवाम के साथ खड़े हैं। वे लगातार बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की दुर्दशा, महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसक वारदातों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अलख जगाए हुए हैं। अवाम को भी समझ में आ गया है कि उनसे झूठे वादे करके उन्हें ठगा गया। इसलिए अब जनता उन वादों के बारे में सवाल करने लगी है। जनता पूछने लगी कि कहां हैं, वे अच्छे दिन जिसका इंद्रधनुषी सपना भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दिखाया था। कहां हैं, वह 15 लाख रुपये, जिन्हें उनके खाते में डालने का वादा किया गया था। कहां है वह विदेशी काला धन, जिसके बारे में वादा किया गया था कि उसके भारत में आने के बाद जनता के हालात सुधर जाएंगे।

    अवाम अब जागने लगी है। इसी का नतीजा है कि उसने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी को उखाड़ फेंका और कांग्रेस को हुकूमत सौंप दी। अवाम राहुल गांधी पर यक़ीन करने लगी है। वह समझ चुकी है कि कांग्रेस ही देश की एकता और अखंडता को बनाए रख सकती है। कांग्रेस के राज में ही सब मिलजुल कर चैन-अमन के साथ रह सकते हैं, क्योंकि कांग्रेस विनाश में नहीं, विकास में यक़ीन रखती है। जनता अब बदलाव चाहती है।

    About Author

    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति

    शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति

    Pushpraj

    भारतीय पत्रकारिता को भारतीय लोकतंत्र और भारत के लोक की रक्षा करनी है तो इस पत्रकारिता को अपने आईकॉन चुनने होंगे। भगत सिंह के लेख छापने वाले प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने भगत सिंह की शहादत के दो दिन बाद ही अपनी शहादत क्यों दी थी।क्या प्रताप के संपादक अपने एक स्तंभकार की शहादत से प्रेरित होकर दंगाईयों के सामने खड़े हो गए थे।अगर भगत सिंह ही गणेश शंकर विद्यार्थी की  शहादत के प्रेरक थे तो गणेश शंकर विद्यार्थी और भगत सिंह को अपना हीरो मानने वाले मुफस्सिल पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की शहादत को भारतीय पत्रकारिता किस तरह भुला सकती है। मैं पत्रकारिता के नियंताओं से करबद्ध प्रार्थना करना चाहता हूँ कि सिरसा में 21 नवंबर 2002 को हर हाल में सच कहने की जिद में शहीद हुए पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के शहादत दिवस को “पत्रकारिता प्रेरणा दिवस” के रूप में आयोजित किया जाए। शहीद छत्रपति के शहादत की 16 वीं वर्षी पर सिरसा(हरियाणा) में छत्रपति के अनुगामियों की ओर से एक स्मृति सभा जरूर आयोजित है पर भारतीय प्रेस परिषद, भारत के पत्रकार संगठन, संस्थान छत्रपति से अब तक अनजान क्यों हैं?

    अपनी शहादत के बाद 15 वर्षो बाद रामचन्द्र छत्रपति पिछले वर्ष 2017 के अगस्त माह में तब मुख्यधारा की मीडिया में चर्चे में आए थे, जब हरियाणा में देवताधारी-बलात्कारी को जेल भेजा गया था।तथाकथित देवता गुरमीत (राम-रहीम) के जेल जाने के बाद जिस तरह की हिंसा भड़काई गई और जिस तरह हिंसा को रोकने के लिए सेना की मदद ली गई, यह वाकया दुनियाँ की मीडिया में जितना चर्चित हुआ। काश, इस तथाकथित देवता को पहली बार बलात्कारी घोषित करने वाले रामचन्द्र छत्रपति की आवाज उनकी शहादत के बाद सुन ली गई होती। अंग्रेजी पत्रकारिता पर आरोप है कि अंग्रेजी पत्रकारिता अक्सर भारत की समस्याओं को अंग्रेज हुकूमत की तरह देखती है। लेकिन हम पूछते हैं कि हिंदी पत्रकारिता ने 16 वर्ष पूर्व सिरसा में शहीद हुए एक पत्रकार की शहादत को तब राष्ट्रीय महत्व क्यों नहीं प्रदान किया था।साध्वियों के साथ बलात्कार, साध्वी के भाई की हत्या,बलात्कार को उजागर करने वाले पत्रकार की हत्या,400 साधुओं को नपुंसक बनाने के सिद्ध हो चुके आरोपों के अभियुक्त राम रहीम को क्या भारतीय मीडिया अभी भी दुनियाँ का सबसे बड़ा खूनी राक्षस घोषित करने के लिए तैयार है?दुनियाँ में क्या इससे बड़े क्रूर, हवशी, राक्षस की कथा आपने सुनी है? क्या देवी-देवताओं वाले राष्ट्र में मीडिया के आकाओं के दिल में इस बलात्कारी -बाबा के प्रति कोई आस्था कायम है? भारत के नारीवादी संगठन जो मीटू अभियान में ज्यादा जोर लगा रहे हैं, वे सिरसा के इस मामले को दुनियाँ का सबसे बड़ा बलात्कार कांड घोषित करने में मुहूर्त का इंतजार क्यों कर रहे हैं?

    मैं 2003 में पहली बार मेधा पाटकर के साथ जनांदोलनों की एक राष्ट्रव्यापी यात्रा के दौरान सिरसा पहुँचा था तो प्रसिद्ध समाजशास्त्री योगेंद्र यादव जो हरियाणा में यात्रा के मगर्दर्शक थे, उन्होंने तब बताया था कि “सिरसा में हमारे मित्र रामचन्द्र छत्रपति ने इस तरह सच लिखने की जिद के साथ अपनी शहादत दी है।”मुझे तब यह जानकारी भी मिली कि तत्कालीन भारत के प्रसिद्ध संपादक प्रभाष जोशी ने रामचन्द्र छत्रपति की शहादत के बाद सिरसा की यात्रा की है और छत्रपति के कातिलों को ललकारते हुए कहा है कि “हमारी पत्रकारिता के समक्ष छोटे-छोटे हिटलर खड़े हैं, अगर हम इन हिटलरों से युद्ध नहीं रचेंगे तो हमारी यह प्यारी पत्रकारिता नष्ट हो जाएगी”।प्रभाष जोशी की चेतावनी को हमने अपनी चुनौती मान ली और हम 15 वर्षों से सिरसा को बकोध्यानम देख रहे हैं। 2004 में हिन्दुस्तान की प्रधान संपादक मृणाल पाण्डेय ने अपने अखबार के संपादकीय पृष्ठ में मेरा आलेख प्रकाशित कराया था, जिसकी हजारों प्रति तब हरियाणा में पाठकों की माँग पर अलग से भेजी गई थी। उस विशिष्ट आलेख का शीर्षक था-“रामचन्द्र छत्रपति की शहादत का मतलब पूरा सच।”संपादकीय पृष्ठ की अपनी सीमा होती है, बावजूद किसी हिंदी अख़बार ने पहली बार छत्रपति की शहादत को इस तरह प्रस्तुत किया था।मैंने 2004 में राम रहीम के सच्चा सौदा डेरा के अंदर प्रवेश करने का साहस जुटाया था। मैंने डेरा के अंदर एक-एक हिस्से को अपनी आँखों से देखने की कोशिश की थी पर देवता के गुफा के बाहर आकर मेरे कदम रूक गए थे या सिहर गए थे। देवता के मायालोक में तमाम विहंगम दृश्य, तिलिस्म, चमत्कार देखने के बावजूद मैंने गुफा द्वार से लौटकर आज से 14 वर्ष पूर्व जो डायरी लिखी थी, उसके कुछ हिस्से को रामबहादुर राय के संपादकत्व मेधा प्रथम प्रवक्ता और योगेंद्र यादव के संपादकत्व वाले सामयिक वार्ता ने प्रकाशित किया था। छत्रपति की शहादत के एक दशक पूरे होने पर संतोष भारतीय ने चौथी दुनियाँ में उस सिरसा डायरी को अक्षरशः प्रकाशित किया था, बावजूद मैं दावे के साथ कह रहा हूँ कि मेरी उस सिरसा डायरी को गंभीरता से नहीं लिया गया।शायद इस मान्यता की वजह से भी कि शहादत को पत्रकारिता का वसूल नहीं बनाना चाहिए या इस वजह से कि जिन्हें देवता मानकर राष्ट्र के प्रधानमंत्री नमन करते हों, उनके भाल पर हमारी पत्रकारिता की वजह से कोई खरोंच ना आए।

    रामचन्द्र छत्रपति खेती-किसानी से जुड़े एक मुफस्सिल पत्रकार थे। उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित कुछ राष्ट्रीय हिंदी दैनिकों के लिए जिला संवाददाता का कार्य किया था। वे संवाददाता के रूप में अपने शहर सिरसा स्थित “सच्चा सौदा डेरा” के झूठ को विशेष महत्व देना चाहते थे। राष्ट्रीय समाचार पत्रों में अपने प्राथमिक विषय को प्राथमिकता ना मिलने की वजह से उन्होंने खेती-किसानी के पसीने की ताकत से वर्ष 2000 में दैनिक समाचार पत्र”पूरा सच” की शुरूआत की थी। 30 मई 2002 को “पूरा सच” में छपा था -“धर्म के नाम पर किए जा रहे हैं,साध्वियों के जीवन बर्बाद”। इस खबर ने हरियाणा-पंजाब की वादियों में तूफान मचा दिया था। डेरा भक्तों के द्वारा हरियाणा-पंजाब के शहरों में हो रहे हिंसा के  प्रभाव में चंडीगढ़ उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पूरा सच की इस खबर के आधार पर सीबीआई जाँच का आदेश दिया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह एक अविस्मरणीय अध्याय है कि एक मुफस्सिल अखबार की खबर के आधार पर उच्च न्यायालय ने स्वतः स्फूर्त सीबीआई जाँच का आदेश दिया हो। इस घटना के बाद भी “पूरा सच” के संपादक की सुरक्षा के प्रति राज्य ने कोई सुध नहीं ली। रामचन्द्र छत्रपति को राम रहीम के द्वारा नियुक्त अपराधियों ने गोली मारी, शासन ने बेहतर ईलाज की जिम्मेवारी नहीं ली औऱ हमले के 27 दिन बाद 21 नवम्बर को छत्रपति ने अपोलो दिल्ली में दम तोड़ दिया। छत्रपति की हत्या के नामजद अभियुक्त गुरमीत राम-रहीम ने इस हत्या के विरूद्ध सीबीआई जाँच को बार-बार रोकने व प्रभावित करने की कोशिश की पर रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति के अनुरोध पर न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर  सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए तो अब सारी गवाहियों के बाद साध्वी बलात्कारों के अभियुक्त गुरमीत जल्दी ही छत्रपति की हत्या के अभियोग में 20 वर्षों की जेल या फाँसी की सजा पाने के लिए मजबूर होंगे। छत्रपति के न्याय के संघर्ष में विश्वास है कि जल्दी ही जीत हासिल हो।

    Ramchandra Chhatrapati (In Portrait) and His Son Anshul Chhatrapati

    “पूरा सच” के संस्थापक संपादक ने ढाई साल की छोटी सी अवधि में अपने अखबार को बहुत लंबी उमर दे दी। पुत्र ने संपादक पिता के बताए नक्से कदम पर अख़बार के संपादन के साथ-साथ मुकदमे की पैरवी को एकसूत्री लक्ष्य मान लिया। पूरा सच डेरा के कुकृत्यों को लगातार उजागर करता रहा। शहादत की विरासत पर खड़े अख़बार ने कभी मुड़ कर देखना जरूरी नहीं समझा। गुरू गोविंद सिंह जी का रूप धारण कर भक्तों को अमृत छकाने की खबर को भी पहली बार अंशुल छत्रपति के संपादन में पूरा सच ने ही उजागर किया। लेकिन अंशुल ने अपनी सुरक्षा के प्रति सावधानियां बरती। पूरा सच ने ही एक कामपिपासु बाबा के हवस में 400 साधुओं को नपुंसक बनाने की खबर को पहली बार उजागर किया। अंशुल ने विवेकपूर्ण सावधानी यह बरती की कि कभी दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर अपने किए से कीर्तिमान प्राप्ति करने की चेष्टा नहीं की।साध्वी बलात्कार मामला, अपने पिता की हत्या,साध्वी के भाई की हत्या सहित साधु नपुंसक मामलों में अलग-अलग सीबीआई जांच के लिए गवाही जुटाने, योग्य अधिवक्ताओं को तलाशने की जिम्मेवारी अंशुल ने अपने कंधे पर ली।जिम्मेवारियों के वजन से अंशुल का कंधा ना टूटा पर अंशुल का घर बिक गया। पूरा सच को अर्थाभाव की वजह से 4 साल पहले बंद करना पड़ा है।जो पत्रकारिता को सबसे कमजोर की आवाज मानते हैं, उनके लिए रामचन्द्र छत्रपति बेहतर आईकॉन हो सकते हैं। मैंने अपने आईकॉन से आपको परिचित कराया।यहाँ दुनियाँ की सबसे ऊँची मूर्ति तो आपको नहीं मिलेगी, दुनियाँ के सबसे बडे सेक्स स्कैंडल को उजागर करते हुए शहादत देने वाले एक संपादक की कीर्ति मिलेगी। पत्रकारिता को बदलने की लीक दिल्ली से नहीं, सिरसा से शुरू होती है। मेरे लिए सिरसा इस समय पत्रकारिता का तीर्थ हो चुका है, आईये आप भी मेरे तीर्थ को अपना तीर्थ बनाइये।

    आनंद बाजार के पत्रकार सुब्रतो बसु को 2018 का रामचन्द्र छत्रपति सम्मान

    शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के सुधि प्रशंसक पिछले 8 वर्षों से भारत में साहित्य और पत्रकारिता में जन-प्रतिबद्धता के लिए प्रतिबद्ध लेखक-पत्रकारों को रामचन्द्र छत्रपति की स्मृति में “छत्रपति सम्मान” से सम्मानित करते हैं। सिरसा के प्राध्यापक, अधिवक्ता, साहित्यकारों की पहल पर गठित “संवाद सिरसा” ने 2010 से छत्रपति के शहादत दिवस के अवसर पर सिरसा में छत्रपति की स्मृति सभा आयोजित कर छत्रपति सम्मान देने की परंपरा कायम की है। प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर 2012 में छत्रपति सम्मान से सम्मानित हुए थे। कुलदीप नैयर के साथ-साथ रवीश कुमार, अभय कुमार दुबे, ओम थानवी, उर्मिलेश, गुरदयाल सिंह, जगमोहन सिंह छत्रपति सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। सुब्रतो बसु को बिहार में सरिता -महेश की शहादत से पूर्व उनके सामाजिक कर्म को आनन्द बाजार में पहली बार कवरेज करने के लिए ” IFJ Award” मिल चुका है। सुब्रतो आनंद बाजार कोलकाता में स्थानीय क्षेत्रीय संपादक हैं और इन्होंने अपने अखबार में रामचन्द्र छत्रपति की शहादत से जुड़ी पृष्ठभूमि को कई किस्तों में लिखा था।

    कुलदीप नैयर को सिरसा आने से रोकने के लिए गुप्तचर एजेंसियों के द्वारा सूचना भिजवाई गई थी। कुलदीप नैयर के सम्मान प्राप्त कर दिल्ली पहुंचने के बाद डेरा भक्तों ने सिरसा में गुरुद्वारा के ग्रंथी की गाड़ी में आगजनी क़र शहर में कर्फ्यू कायम करवाया था। कुलदीप नैयर ने सिरसा में अभिभूत होकर कहा था-मैं छत्रपति को भारतीय पत्रकारिता के भीतर भगत सिंह की तरह देख रहा हूँ इसलिए कि मैंने लाहौर में भगत सिंह के शहादत स्थल पर खड़ा होकर जिस तरह महसूस किया था,उसी तरह का अहसास आज सिरसा आकर महसूस हो रहा है।

    पुष्पराज

    जनांदोलनों को लिखने वाले यायावर पत्रकार और चर्चित पुस्तक नंदीग्राम डायरी के लेखक

  • ऑस्ट्रेलिया व ऑस्ट्रेलियाई-आदिवासी बनाम हमारा भारतीय समाज –Vivek Umrao Glendenning

    ऑस्ट्रेलिया व ऑस्ट्रेलियाई-आदिवासी बनाम हमारा भारतीय समाज –Vivek Umrao Glendenning

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    Headlines

    आमुख

    ब्रिटिश लोग 200-225 साल पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के प्रति रेसिस्ट थे। ऑस्ट्रेलिया उनका देश नहीं था, वहां के लोग मतलब आदिवासी उनके अपने देश या समाज के लोग नहीं थे। यहां तक कि उनकी तरह दिखने वाले तक नहीं थे, रंग भी अलग था। इन सबके बावजूद ऑस्ट्रेलिया समाज आज कहां खड़ा है। हम अपने भारतीय समाज व लोगों के गिरेबां में भी झांकें ताकि हमें यह अंदाजा हो सके कि, हम व हमारा समाज अपने ही लोगों के लिए कितना अधिक रेसिस्ट व हिंसक मानसिकता से भयंकर रूप से ग्रस्त है। वह भी तब, जब हमारा देश हमारा ही है/था, हमारा समाज हमारा ही है/था, हमारे लोग अपने ही लोग हैं/थे।

    हमारे कुंठित मन को जब ऑस्ट्रेलिया को गाली देने के लिए कुछ विशेष नहीं मिल पाता तो हम टेरना शुरू कर देते हैं कि ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की बर्बर हत्याएं कीं, ऐसा किया वैसा किया। जबकि अधिकतर होता यह है कि हम अपने पूर्वाग्रह से मनचाही कल्पना करते हुए तर्कशीलता का प्रयोग करते हुए तर्क गढ़ते हैं, गूगल करके कुछ अधकचरे तथ्य जोड़ते हैं, और अपनी मानसिक हिंसक प्रवृत्ति के द्वारा नियंत्रित हो लेते हैं।

    हम यह सब साबित कुछ यूं करते हैं, मानो दुनिया में आज से 200-225 वर्ष पहले के देश, सभ्यताएं व समाज बहुत अधिक अहिंसक, मानवता-वादी हुआ करते थे; उस समय जब सबकुछ आदर्शवादी होता था, मानवीय मूल्य चरम पर थे तब भी ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया में ऐसा किया। 

    हम यह भूल जाते हैं कि भारत में सैकड़ों राजे-रजवाड़े थे। जो छोटी-छोटी बात में आपस में युद्ध करते रहते थे। इन्हीं सब में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की हत्याएं होती थीं। जितने लोगों की हत्याएं हमारा भारतीय समाज प्रतिवर्ष करता था, उतनी तो संभवतः उस समय ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी जनसंख्या भी न होगी।

    हम यह भूल जाते हैं कि, ब्रिटिश लोगों ने लगभग 200-225 वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जितनी हत्याएं की। उससे बहुत-बहुत अधिक हत्याएं तो हम भारतीयों ने आजाद होने के बाद के वर्षों में ही खुद अपने ही समाज के दलितों व आदिवासियों की हत्याएं कर दी हैं, आजतक करते आ रहे हैं।

    हमारे दोहरेपन की हालत यह है कि अपने समाज व अपने अंदर की आज की बर्बरता के बारे में भी बात नहीं करना चाहते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में 200-225 साल पहले हुई घटनाओं को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं।

    हमारी कुंठा हमें यह भी नहीं देखने देती है कि 200-225 वर्षों में ऑस्ट्रेलिया के समाज ने कितनी अधिक लोकतांत्रिक परिपक्वता हासिल की है, मानवाधिकारों की किन ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं। कैसे एक बेहतर समाज का निर्माण किया है। यह सब हो पाना दोहरेपन, आदर्शों की बतोलेबाजी, मानसिक हिंसा व बर्बरता इत्यादि से संभव नहीं होता। यह सब हो पाने का सीधा अर्थ यही है कि समाज ने समय के साथ-साथ अपने आपको परिष्कृत किया है, परिपक्व किया है, सीखा है, समझा है, गलतियों को स्वीकार किया है। 

    हमारे दोहरेपन से यह भी साबित होता है कि हमारे अंदर ऑस्ट्रेलिया जैसे लगातार परिपक्व व बेहतर होते जाने वाले समाजों से कुंठा है, द्वेष है, ईर्ष्या है, जलन है। यही कारण है कि, जब कुछ नहीं मिलता तो 200-225 वर्ष पहले पहुंच कर तथ्यों को तोड़-मोड़कर अपनी कुंठा को खाद-पानी दे लेते हैं। तर्क/वितर्क देकर अपनी मानसिक हिंसा की प्रवृत्ति को जी लेते हैं।

    ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में यह लेख कम से कम उन लोगों को तो लाभ पहुंचा ही सकता है, जो अंदर से मानसिक बीमार नहीं हैं, पूर्वाग्रह से भयंकर स्तर तक कुंठित नहीं हैं, देखने समझने की संभवानाएं शेष हैं। यह लेख शोधपत्र नहीं है, इसलिए यह लेख कामनसेंस के आधार पर ही पढ़ा जाए। लेख लंबा है लेकिन यदि आप पढ़ने में रूचि रखते हैं तो आपको पूरा लेख पढ़ना चाहिए। धन्यवाद।


    1788 के पूर्व ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी

    जिस समय दुनिया की सभी सभ्यताओं ने बड़े-बड़े साम्राज्य बना लिए थे। हजारों वर्षों से नगरीय सभ्यताओं में जी रहे थे। तोपों, बंदूकों का सैकड़ों वर्ष पहले प्रयोग करना शुरू कर चुके थे। स्टीम इंजन का कामर्सियल प्रयोग शुरू हो चुका था। सैकड़ों-हजारों प्रकार के कपड़ों का प्रयोग हो रहा था। बड़े-बड़े समुद्री जहाजों का प्रयोग हो रहा था। लोग हजारों किलोमीटर लंबी समुद्री यात्राएं करते थे। घड़ी का प्रयोग हो रहा था। परमाणु होता है ऐसी कई वैज्ञानिक सिद्धांत आ चुके थे। दूरदर्शी व सूक्ष्मदर्शी यंत्रों का प्रयोग हो रहा था। दुनिया का पहला कैमरा डिजाइन हो चुका था। पूरी दुनिया में शताब्दियों पहले से ही बड़े-बड़े महल, किले व पूजागृह खड़े हो रहे थे।

    उस समय ऑस्ट्रेलिया की सभ्यता यह तक नहीं जानती थी कि एक जगह पर गांव या नगर बनाकर स्थाई रूप से रहना क्या होता है। कपड़ा क्या होता है। ब्रोंज क्या होता है। लोहा क्या होता है। जबकि दुनिया हजारों वर्षों पहले ही ब्रोंज व आयरन युगों को पार कर चुकी थी। ऑस्ट्रेलिया आदिवासी पाषाण युग में ही जी रहे थे, जबकि शेष दुनिया बहुत अधिक आगे आ चुकी थी। 

    नगर/गांव इत्यादि नहीं थे

    ऑस्ट्रेलिया के लोग नहीं जानते थे कि स्थाई रूप से एक ही जगह पर रहना क्या होता है, इसलिए नगर/गांव इत्यादि नहीं होते थे। जब ब्रिटिश पहुंचे तब पूरे आस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या कम अधिक लगभग पांच – सात लाख थी। लिपि नहीं थी। संपत्ति नहीं थी। 700 से अधिक बोलियां थीं। मतलब यह कि हर 700 – 900 लोगों पर बोली बदल जाती थी। स्थाई कबीलाई संस्कृति भी नहीं थी क्योंकि लोग स्थाई तौर एक स्थान पर नहीं रहते थे। समूहों के मुखिया बड़े बुजुर्ग होते थे, अनुभव मायने रखता था।

    भोजन व कृषि

    व्यवस्थित कृषि नहीं थी। पशुपालन नहीं था। शिकार करते थे। 

    धातुओं का प्रयोग

    पाषाण युगीन जीवन था। धातु का प्रयोग करना नहीं जानते थे।

    हथियार

    बिना धातु वाले लकड़ी व पत्थर के हथियार। 

    कला, संगीत इत्यादि

    पाषाण युगीन स्टोन पेंटिंग, वाद्ययंत्र इत्यादि।


    ब्रिटिशर्स का आना
    1788 से ऑस्ट्रेलिया आदिवासी

    ऑस्ट्रेलिया दिवस/ 26 जनवरी

    ऑस्ट्रेलिया दिवस का सिर्फ मतलब यह कि 26 जनवरी 1788 को ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पहली बार 11 जहाजों व 1500 लोगों की ब्रिटिश फ्लीट का पदार्पण हुआ। वैसे यह फ्लीट ऑस्ट्रेलिया 20 जनवरी 1788 के आसपास पहुंच चुकी थी लेकिन समुद्र में तरंगो के बहुत विकराल होने व अन्य कारणों के कारण ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण 26 जनवरी 1788 को हो पाया। इसी दिन 26 जनवरी 1788 को पहली बार ब्रिटेन का झंडा ऑस्ट्रेलिया में गाड़ा गया।

    ऐसा नहीं था कि ब्रिटिश लोगों ने पहले कई वर्षों या दशकों तक ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का कत्लेआम किया या उनके साथ युद्ध लड़े, फिर समूचे ऑस्ट्रेलिया पर विजय प्राप्त होने पर 26 जनवरी 1788 को विजय पताका लहराई, जिसके कारण ऑस्ट्रेलिया-दिवस मनाते हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया दिवस की बात की जाए तो ऑस्ट्रेलिया दिवस का ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के साथ हिंसा का नाता नहीं। यह दिवस सिर्फ यह इंगित करता है कि इस दिन पहली बार ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण किया।

    26 जनवरी को ऑस्ट्रेलिया दिवस के रूप में पूरे देश में मनाया जाएगा और इस दिन पूरे देश में पब्लिक-हालीडे होगा। यह भी तय हुआ 1994 में, महज लगभग 24 वर्ष पूर्व वह भी लोकतांत्रिक तरीके से। ऐसा नहीं है कि सरकार का मना आया और तय कर दिया कि इसको पूरे देश में ऑस्ट्रेलिया-दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

    ऑस्ट्रेलिया में ऐसा कोई दिवस सार्वजनिक रूप से सरकारी तौर पर नहीं मनाया जाता, जिससे यह साबित हो कि कब पूरा ऑस्ट्रेलिया कब्जाया गया या कब वहां ऑस्ट्रेलिया को गुलाम के रूप में इंग्लैंड का संविधान लागू हुआ, इत्यादि-इत्यादि। उल्टे ऑस्ट्रेलिया में प्रतिवर्ष नेशनल सॉरी डे मनाया जाता है। यह सब होना भी आज के ऑस्ट्रेलिया समाज की लोकतांत्रिक परिपक्वता व संवेदनशीलता को ही दर्शाता है।

    बीमारियों से मौतें

    ऑस्ट्रेलिया एक हजारों वर्षों से अछूती जमीन थी, वहां के लोग जंगलों में पाषाण युग की ही तरह रहते थे। बिना वैज्ञानिक विकास के। इसलिए प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार की कोई भी छेड़छाड़ नहीं हुई। इसका परिणाम यह रहा कि आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के शरीर में बाहरी दुनिया की बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो पाई। उनके शरीर दुनिया की सभ्यताओं में मनुष्यों को होने वाली बीमारियों को जानते तक नहीं थे।

    ब्रिटिश जब ऐसी अछूती जगह पहुंचे तो उनके शरीरों से ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के लिए बीमारियां अपने आप हावी होती गईं। आदिवासियों की कुल हुई मौतों में से अधिकतर लगभग 95% मौतें बीमारियों से हुईं। उस समय तकनीक इतनी व्यवस्थित नहीं थी कि बिना बैकफायर हुए खड़यंत्र करके बीमारियों के कीटाणुओं को इंजेक्ट करके सामूहिक हत्याएं वह भी स्थितियों में नियंत्रण रखते हुए की जा सके। आदिवासी लोगों में नगरीय सभ्यता का विकास तक नहीं था कि उन्हें किसी घेरे में आइसोलेट करके बीमारियों के कीटाणुओं से मारा जा सके।

    ब्रिटिश लेखकों की संवेदनशीलता व लेखन-ईमानदारी ही है कि वे बीमारियों से होने वाली मौतों के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते थे/हैं। जबकि उस काल में ऐसा कर पाना नियंत्रित तरीके से संभव नहीं था, कि आदिवासियों को जबरदस्ती बीमारियों के कीटाणु पिला कर उनकी सामूहिक हत्याएं किया जाना संभव हो।  लेकिन ब्रिटिश लेखक यह मानते थे/हैं कि यदि वे लोग नहीं आते तो बीमारियां नहीं फैलतीं और लोग नहीं मरते, इसीलिए वे कहते हैं कि हमने बीमारी फैलाकर आदिवासियों को मारा।

    संघर्ष में मौतें

    ब्रिटिश 1788 में ऑस्ट्रेलिया आए। पहला सामूहिक हत्याकांड 1838 में हुआ जिसमें 28 आदिवासियों की हत्याएं हुईं।1884 में 200 से अधिक आदिवासी मारे गए। ऑस्ट्रेलिया में आने के बाद आदिवासियों के साथ लगभग 200-225 वर्षों के संघर्ष में प्राइवेट हत्याओं को जोड़ते हुए आदिवासियों की लगभग 10 से 20 हजार मौतें हुईं। लगभग डेढ़ से दो शताब्दियों में इतनी हत्याएं दुनिया के इतिहास को देखते हुए तथा ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी व ब्रिटिश के लोगों के विकास व सभ्यताओं के स्तर के भयंकर अंतर को देखते हुए, नगण्य संख्या ही है। पाषाण-काल में जीने वाले ऑस्ट्रेलिया-आदिवासियों की तुलना में ब्रिटिश इतना विकसित थे कि पूरी आदिवासी सभ्यता को ही कुछ महीनों में ही चुन-चुन कर खतम कर सकते थे।


    वर्तमान ऑस्ट्रेलिया व आदिवासी समाज

    जिन लोगों ने वास्तव में कभी भी कहीं भी जमीन पर समाज के लिए गंभीर व बड़े स्तर पर सामाजिक काम किया है, जिन लोगों के पास मौलिक सामाजिक सोच है, जो घृणा, पूर्वाग्रह इत्यादि पर आधारित नहीं है। ऐसे लोगों ने यदि योरप, अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया देशों के समाजों को नजदीक से देखा है। तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वे इस बात से सहमत होंगे कि ऑस्ट्रेलियन्स विनम्र, अहिंसक, लोकतांत्रिक व गैर-सामंती मानसिकता के लोग हैं।

    ऑस्ट्रेलियाई समाज की एक विशिष्टता और है, कि आज ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या के लगभग 65% लोग अनीश्वरवादी हैं। दुनिया में देश की जनसंख्या का प्रतिशत जो अनीश्वरवादी है, ऑस्ट्रेलिया चौथे/पांचवे स्थान पर आता है। मैं यहां चीन जैसे देशों को नहीं जोड़ रहा हूं जहां लोगों की अधिकतर इच्छा अनिच्छा स्वैच्छिक न होकर सरकार के जबरदस्ती थोपे गए नियमों के आधार पर होता है। यदि चीन के सरकारी-गुंडई के दावों को छोड़ दिया जाए तो चीन की जनसंख्या का लगभग 20% लोग ही अनीश्वरवादी हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया के उन लोगों के आकड़े न जोड़े जाएं जो लोग भारत व चीन जैसे देशों से जाकर बसे हैं तो आस्ट्रेलिया दुनिया का पहला या दूसरा ऐसा देश हो सकता है जिसकी जनसंख्या का सबसे अधिक प्रतिशत लोग अनीश्वरवादी हैं।

    किसी भी हिंसक, बर्बर व क्रूर मानसिकता के लोकतांत्रिक समाज के लोग विनम्र, अहिंसक, गैर-सामंती व लोकतांत्रिक मूल्यों के लोग नहीं हो सकते हैं। बहुत बड़ी संख्या में स्वेच्छा से अनीश्वरवादी नहीं हो सकते हैं। लेख में आगे की बातों को समझने व महसूस करने के लिए यह एक मूलभूत तत्व है।

    आदिवासियों का दूतावास

    26 जनवरी 1972 को ऑस्ट्रेलिया दिवस की शाम को चार आदिवासी युवाओं माइकल अंडरसन, बिल्ली क्रैगी, बर्ट विलियम्स और टोनी कूरे ने ऑस्ट्रेलिया संसद के सामने एक बीच छाता लगाकर उसे आदिवासी दूतावास का नाम दे दिया। इस दूतावास को ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी व गैर-आदिवासी नागरिकों का सहयोग मिला, विभिन्न उतार चढ़ाव देखते हुए यह दूतावास 1995 में ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्वपूर्ण स्थानों के रूप में पंजीकृत हुआ।

    आदिवासी संरक्षित क्षेत्र

    ऑस्ट्रेलिया में अनेकों आदिवासी संरक्षित क्षेत्र हैं। इस आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी संस्कृति पूरे सम्मान के साथ जीवित व संरक्षित है। उनकी संस्कृति से न्यूनतम छेड़छाड़ किए हुए बेहतरीन नागरिक सुविधाएं देती है। इन क्षेत्रों में गैर-आदिवासी लोगों का प्रवेश बिना सरकार व बिना आदिवासियों की अनुमति के प्रवेश प्रतिबंधित रहता है।

    आदिवासियों को विशिष्ट सुविधाएं

    आदिवासियों की वर्तमान जनसंख्या लगभग साढ़े सात लाख है। सरकार ने बेहतरीन गुणवत्ता के लगभग दो लाख घर, डेढ़ लाख से अधिक स्विमिंग पूल, पौने दो लाख से अधिक आउटडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग डेढ़ लाख इनडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग पौने दो लाख सामुदायिक/सांस्कृतिक केंद्र तथा लगभग दो लाख अतिरिक्त सुविधाएं आदिवासी समाज के लिए उपलब्ध कराए हैं। 

    आदिवासियों को अनेक प्रकार के विशेष भत्ते मिलते हैं।

    — आदिवासियों को आवास

    सरकार द्वारा आदिवासियों को दिए गए घरों में से एक घर

    — आदिवासियों के लिए प्राथमिक चिकित्सा केंद्र
    — आदिवासियों के लिए शिक्षा
    — आदिवासी बच्चों के लिए स्विमिंग पूल
    आदिवासियों को आरक्षण

    बेहतरीन सुविधाओं के अतिरिक्त जितना प्रतिशत आदिवासियों की संख्या है, उतना प्रतिशत उनको विभिन्न स्तरों पर आरक्षण भी प्राप्त है। चूंकि समय के साथ आदिवासियों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है, इसलिए आरक्षण भी बढ़ता जा रहा है। बढ़ते रहने के बावजूद आरक्षण का गैर-आदिवासियों द्वारा विरोध नहीं होता, उल्टे आरक्षण को सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हैं। यह सामाजिक परिपक्वता ही है कि लगभग 200 वर्ष पहले तक पूरी तरह पाषाण युग में जीने वाले लोगों के लिए मेधाविता, योग्यता इत्यादि कारण बताते हुए आरक्षण का विरोध करने की बजाय, सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हुए, आरक्षण का स्वागत करते हैं। आदिवासियों को दोयम नजरों से नहीं देखा जाता है। उनका अपमान नहीं किया जा सकता है। दबंगों द्वारा उनको चौराहों में नंगा करके पीटा नहीं जाता है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं किया जाता है। जबकि भारत में दलितों के साथ आज भी ऐसा होता है, प्रतिवर्ष ऐसी हजारों घटनाएं होती हैं।

    नेशनल सॉरी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) 26 मई

    बाहरी सभ्यता के ब्रिटिश लोगों के आने के कारण ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की बीमारियों के कारण लगातार मौतें हो रहीं थीं। उनकी संख्या कम होती जा रही थी। ब्रिटिश पुरुषों के संपर्क में आने के कारण आदिवासी महिलाओं से संकर-जाति के आदिवासी बच्चे भी पैदा हो रहे थे। 

    1906 के लगभग आस्ट्रेलिया सरकार ने यह निर्णय लिया कि जो संकर बच्चे हैं उनको उनकी आदिवासी माताओं से लेकर सरकार के संरक्षण में रखा जाए। उनको पढ़ाया लिखाया जाए, प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे आधुनिक सभ्यताओं के साथ तालमेल बना कर जी सकें। ये बच्चे 16 से 18 वर्ष की आयु तक सरकारी संरक्षण में रखे जाते थे। उसके बाद उनको उनके आदिवासी परिवार का परिचय दिया जाता था, उनको अपनी आदिवासी माता का सरनेम लगाने का अधिकार भी दिया जाता था। इन बच्चों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती थी लेकिन उनके पास अपना परिवार नहीं होता था। इस नीति के कारण लगभग 60 वर्षों में लगभग 25,000 बच्चे अपनी आदिवासी माता से अलग करके सरकारी संरक्षण में पाले गए।

    लेकिन कुछ दशकों बाद सरकार को यह महसूस हुआ कि यह तरीका उचित नहीं है, अमानवीय है तथा जो भी होता आया है वह गलत है। तब सरकार ने 1967 में यह नीति बंद कर दिया। आगे चलकर सरकार ने यह स्वीकार किया कि यह आस्ट्रेलिया के लिए सबसे शर्मिदगी वाली नीति रही। ऐसा नहीं होना चाहिए था। 

    सरकार ने पूरे देश की ओर से आदिवासियों से क्षमायाचना करने के लिए 26 मई 1998 को पहली बार आधिकारिक तौर पर नेशनल सारी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) के रूप में मनाया, तब से प्रतिवर्ष 26 मई नेशनल सारी डे के रूप में मनाया जाता है। हजारों-लाखों लोग मार्च करते हैं।

    प्रधानमंत्री ने संसद व सरकार की ओर से आधिकारक रूप से क्षमा मांगी

    आस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री ने पूरे देश की ओर से आधिकारिक तौर पर आदिवासियों से 13 फरवरी 2008 को पुरानी सरकारों व संसदों की ओर से क्षमायाचना की।

    यह आधुनिक ऑस्ट्रेलिया-समाज की परिपक्वता ही है कि उन्होंने समय के साथ परिष्कृत होते हुए, गलतियों को स्वीकारते हुए, एक ऐसा देश बनाया जिसमें लोग अभय के साथ बेहतर जीवन जीते हुए रहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो मौका देखकर आदिवासी व गैर-आदिवासी एक दूसरे की हत्याएं कर रहे होते। जगह-जगह पुलिस व सेना के बैरियर लगे रहा करते। ऑस्ट्रेलिया एक बेहद शांतिप्रिय व लोकतांत्रिक देश नहीं होता।


    हमारा भारतीय समाज

    यदि हम भारतीय भी चिंतन व दस्तावेजी लेखन में ईमानदार होते तो हमारे पास भी दस्तावेज होते जिनमें लिखा होता कि हमारी जाति व्यवस्था के कारण अछूतों को ऐसी गंदी जगहों में रहने के लिए बाध्य होना पड़ा कि हर साल बीमारियों से हजारों लाखों अछूत मरता रहा। यह भी लिखते कि जमीनों में अधिकार न होने, लेकिन उन्हीं जमीनों में रात दिन बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के कारण, अकाल में लाखों अछूतों की हत्याएं की जाती रहीं। लेकिन इतना ईमानदार होने के लिए जिस समझ दृष्टि व जिगर की जरूरत होती है, वह न तब थी और न ही अब उन लोगों के पास है। जो लोग अपने गिरेबां में झांकने की बजाय पूरी बेशर्मी के साथ ऑस्ट्रेलिया को 200-225 वर्ष पहले के लिए गाली देते हैं, उनके अपने ही पूर्वजों व उनके अपने ही समाज ने ऑस्ट्रेलिया की तुलना में सैकड़ों-हजारों गुना अधिक हत्याएं की हैं, वह भी अपने ही समाज के लोगों की।

    जाति-व्यवस्था के द्वारा संस्थागत हत्याएं

    भारतीय समाज ने लाखों शूद्रों की हत्याएं संस्थागत रूप से की हैं। यहां तक की आजादी के बाद भी प्रतिवर्ष सैकड़ों हजारों हत्याएं हमारा समाज करता आ रहा है, अब भी कर रहा है। सैकड़ों हत्याएं तो केवल अलग-अलग जाति के लड़का लड़की के प्रेम के कारण आनर किलिंग के कारण होती हैं।

    बीमारियों से मौतें

    यदि हम यह मानते हैं कि ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याएं बीमारियां फैला कर जानबूझकर कीं। तो यही बात हमें अपने समाज पर भी लागू करनी पड़ेगी क्योंकि हैजा, चेचक, मलेरिया जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों में से अधिकतर मौतें शूद्रों की ही होती थीं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि शूद्रों की हत्याएं करने के लिए ऐसी बीमारियां फैलाई जातीं थीं। भारत में प्रतिवर्ष विभिन्न माध्यमों से लाखों शूद्रों की हत्याएं होतीं थीं।

    अकाल से मौतें

    भारत में पिछले लगभग 150 वर्षों में अकाल से लगभग 6 करोड़ मौतें हुईं। इनमें से अधिकतर मौतें शूद्रों की हुईं। जाति व्यवस्था के कारण सामाजिक आर्थिक ढांचा ऐसा रहा कि अकाल के कारण करोड़ों शूद्रों की मौतें हुईं।  

    स्त्री-भ्रूण हत्याएं

    हम और हमारा समाज इतना रेसिस्ट है कि केवल लिंगभेद के कारण ही सख्त कानूनों व जागरूकता के बावजूद केवल पिछले 20 वर्षों में ही एक करोड़ से अधिक स्त्री-भ्रूण हत्याएं की हैं। मतलब यह कि हमारा समाज प्रति वर्ष उतनी स्त्रियों की हत्या उनके जन्मने के पहले ही कर देता है, जितनी लगभग ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जनसंख्या थी, जब 1788 में ब्रिटिशर्स ऑस्ट्रेलिया पहली बार पहुंचे थे। हमें ब्रिटिशर्स का रेसिज्म दीखते है लेकिन अपना रेसिज्म नहीं दीखता है, जबकि हमारा रेसिज्म बेहद अधिक घिनौना व भयानक है।

    दहेज हत्याएं

    हमें यह दीखता है कि संपत्ति के लिए ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की हत्याएं 200-225 वर्ष पहले कीं। हमें यह भी देखना चाहिए कि हमने आजादी के बाद दहेज में संपत्ति के लिए कितनी महिलाओं की हत्याएं कीं। जितनी हत्याएं ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की कुल हत्याएं की, उस संख्या से तो तुलना ही नहीं हो सकती क्योंकि हमने केवल दहेज के चक्कर में ही ऑस्ट्रेलिया में कुल आदिवासियों की संख्या से अधिक हत्याएं की हैं।

    धार्मिक-दंगों में हत्याएं

    आजादी के समय, 1964 में गुजरात दंगे, 1984 में सिखों के विरुद्ध दंगे (20,000 से अधिक सिख मारे गए) 50,000 से अधिक सिख-घर जलाए गए।

    माओवादियों द्वारा हत्याएं

    1970 के बाद भारत में माओवादियों की जमात ने पिछले लगभग 50-60 वर्षों में अपने ही देश के हजारों लोगों व आदिवासियों की हत्याएं की हैं। इससे बहुत ही कम हत्याएं 200-225 वर्ष पहले ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की थी, वह भी तब जब ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी न तो ब्रिटिश थे न ही गोरे लोग थे। भारत में माओवादियों ने भारतीय आदिवासी समाजों की संस्कृति लगभग पूरी तरह नष्ट कर दी, उनको अपना मानसिक गुलाम बना रखा है। छोटी-छोटी बात पर प्रतिवर्ष अनेकों आदिवासियों की हत्याएं आज भी कर रहे हैं।


    चीन में माओवाद/वामपंथ की हिंसा
    (माओवाद के प्रति रोमांस रखने वालों के लिए)

    यदि माओ द्वारा सत्ता प्राप्ति की प्रक्रिया में व सत्ता प्राप्ति के बाद करवाई जाने वाली करोड़ों हत्याओं की चर्चा न भी की जाए, तब भी चीन ने केवल 1989 में ही अपने ही देश के दसियों बीसियों हजार युवाओं को तियाननमेन चौक पर गोलियों से भून दिया। यह संख्या उन कुल हत्याओं से भी अधिक है जो ब्रिटिश ने ऑस्ट्रेलिया में 200-225 वर्ष पूर्व के समय से लगभग 150 वर्षों में कीं।

    जितनी हत्याएं चीन ने 1989 में केवल तियाननमेन चौक पर कीं, उसकी तुलना ब्रिटिशर्स द्वारा की गई ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याओं से हो ही नहीं सकती, जबकि वे ऑस्ट्रेलिया में बाहर से आकर कब्जा कर रहे थे।


    चलते-चलते

    हमारे भारतीय समाज में सोशल मीडिया का प्रयोग करने वाले ऐसे बहुत लोग हैं, जिनके पेट भरे हैं, भारी भरकम वेतन व सुविधाएं पाते हैं। जीवन में कभी भी समाज में जाकर कोई भी ठोस व गंभीर काम/प्रयास तक नहीं किए होते हैं। ठोस व गंभीर काम/प्रयास छोड़िए दूसरों के गंभीर कामों/प्रयासों में सक्रिय भागीदारी तक नहीं किए होते हैं। कुल मिलाकर बात यह कि समाज क्या है, समाज के लोग क्या हैं, इत्यादि को जानने समझने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं, कोई जीवंत अनुभव नहीं। समाज को समझने के लिए अपने अनुभव का कुछ न कुछ तो आधार होना ही चाहिए। यदि ऐसा नहीं तो जो कुछ भी है वह सिवाय तर्कबाजी या बतोलेबाजी के कुछ भी नहीं। बिना वस्तुनिष्ठता के तर्कों का कोई भी वास्तविक मोल नहीं, बौद्धिक विलासिता जरूर होती है।

    ऐसा भी नहीं कि ये लोग जमीन पर ठोस व गंभीर काम/प्रयास नहीं करते हैं, तो गंभीर व विस्तृत स्वाध्याय ही करते हों। पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहते हैं, अपने मन में पहले से अपनी पसंद नापसंद के आधार पर तय कर लेते हैं। इसके बाद गूगल में सर्च करते हैं या कुछ किताबों को सरसरी दृष्टि से पढ़ लेते हैं। फिर कुछ अपना टटपुंजिया कमेंट के रूप में कुछ शब्दों या कुछ लाइनों का एडिटर्स नोट टाइप लगाते हुए कोई लिंक उठाकर चिपका देते हैं या कभी कभार कुछ फालतू समय हुआ या आफिस में बैठे-बैठे ऊबऊ महसूस कर रहे हों तो गूगल में कहीं कुछ मनचाहा मिल गया हो तो उसका हिंदी अनुवाद करके चिपका देते हैं, दो चार शब्दों या लाइनों का अपने ज्ञान का तड़का भी लगा सकते हैं।

    इसमें से कहीं भी, कुछ भी ऐसा नहीं, जिसमें समाज को जानने समझने के प्रति गंभीरता, वस्तुनिष्ठता, ईमानदारी, संवेदनशीलता इत्यादि होती हो।

    करेला ऊपर से नीम चढ़ा वाली स्थिति यह होती है कि, भारतीय समाज में कोरी भावुकता सबसे अधिक प्रभावी रहती है। अधकचरी व यहां वहां से नकल उतारी जानकारी को उटपटांग तरीके से तोड़मोड़ देना ज्ञानी होना होता है। अहंकार भी इतना कि मानसिक व भावनात्मक हिंसा की हदों की सीमा ही नहीं। तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता के साथ चर्चा हो ही नहीं सकती है। जब गंभीरता है ही नहीं, तो जानने समझने का गंभीर व ईमानदार प्रयास हो ही नहीं सकता, संभव ही नहीं। सबकुछ पूर्वाग्रह व व्यक्तिगत पसंद नापसंद व रोमांटिज्म के द्वारा ही नियंत्रित होता है, इस प्रकार के चरित्र से तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा करना ही व्यर्थ होता है।

    यह पोस्ट पेट भरे, सुरक्षित व सुविधाओं से युक्त लग्जरियस जीवन जीने वाले उन वामपंथी व माओवादी सोच के लोगों के लिए भी है जिनके खाते में सिर्फ बतोलेबाजी के सिवाय, ईमानदार गंभीर सामाजिक सक्रियता व योगदान नहीं आते हैं। यदि किंचिंत मात्र सा भी चिंतन करने, देखने समझने, महसूस करने का ईमानदार शऊर होगा, तो उनको इस पोस्ट से कुछ सीखने समझने को मिल ही जाएगा। अन्यथा जैसा उनकी सोच व चरित्र है, वह तो है ही।

    चिंतन व विश्लेषण पूर्वाग्रह, व्यक्ति पसंद नापसंद से इतर वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। ऐसा होना तभी हो पाता है जब समझने में जीवन विभिन्न स्तरों में जीवन लगाया गया हो। नहीं तो क्षुद्र चिंतन तो हजारों वर्षों से अनेक लोग करते चले आ रहे ही हैं, इतिहास पुरुषों के रूप में प्रायोजित भी होते रहते हैं, जबकि समाज उत्तरोत्तर अधिक सड़ता रहता है। हम वास्तव में कैसे हों, हमारी सोच व मानसिकता कैसी हो, हमारी समझ का स्तर क्या हो, हमारे ज्ञान का स्तर क्या हो, यह निर्णय तो हमें ही लेने होते हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • गौतम बुद्ध और विपस्सना सिखाने वाले वेदांती –Sanjay Jothe

    गौतम बुद्ध और विपस्सना सिखाने वाले वेदांती –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    गौतम बुद्ध की परम्परा, उनके धर्म और संस्कृति को नष्ट करने के लिए बहुत गहराई से चाल चली गयी थी. पिछली सदी में डॉ. अंबेडकर सहित आज के इंडोलोजिस्ट्स भी यह बात सिद्ध कर चुके हैं कि एक धीमा और बहुत बारीक षड्यंत्र ब्राह्मणों के द्वारा फैलाया गया. श्रमण बौद्ध परम्परा जो कि इस शरीर और मन सहित इन दोनों के सम्मिलित परिणाम – व्यक्तित्व को अस्थाई मानती थी उस परम्परा में ऐसी मिलावट की गयी जो बाद में सनातन आत्मा को सही सिद्ध करने लगी.

    गौतम बुद्ध सनातन आत्मा के सिद्धांत को नकारते हैं. सनातन आत्मा असल में वेदान्त और ब्राह्मणवाद का केन्द्रीय सिद्धांत है. इसी से पुनर्जन्म और विस्तारित कर्म का सिद्धांत निकलता है. यह सिद्धांत यह बताता है कि कोई आदमी मरकर एक से दुसरे जन्म में अपने मन, व्यक्तित्व, प्रवृत्तियों इत्यादि को लेकर जाता है और दुसरे शरीर या जन्म में फिर से अपनी जीवन यात्रा शुरू करता है.

    इसके विपरीत गौतम बुद्ध सिखाते हैं कि ऐसी कोई आत्मा नहीं होती जो एक से दुसरे जन्म में अपने पूरे व्यक्तित्व और संस्कारों को लेकर जाती हो. बुद्ध तो यहाँ तक कहते हैं कि अभी इसी जिन्दगी में आप अपने शरीर और व्यक्तित्व को कई बार बदलते हैं वह शरीर और वह स्व पल पल बदलता है.

    यही बुद्ध का केन्द्रीय सिद्धांत – अनित्यता है. इस अनित्यता के सिद्धांत के अनुसार पूरी प्रकृति कम्पायमान है. भौतिक पदार्थ, चार महाभूत (धरती, जल,वायु, अग्नि) सब निरंतर कम्पायमान हैं और शरीर और मन भी निरंतर बदलता रहता है. ऐसे में हमारे सामने नजर आ रहे किसी एक व्यक्ति का कोई ठोस व्यक्तित्व या स्व या आत्मा नहीं होती. वह व्यक्ति कोई नयी भाषा नया व्यवहार सीखकर अपने आपको पूरी तरह बदल सकता है. अभी वह व्यक्ति सामान्य बातचीत कर रहा है और दो मिनट में वह क्रोधी और हत्यारा बन सकता है. उसका शरीर भी रोज किये जा रहे भोजन से निरंतर बदल रहा है.

    ऐसे में बदलते शरीर और बदलते मन के परिणाम में जन्मा यह स्व या यह आत्म या यह व्यक्तित्व सनातन कैसे हो सकता है?

    वेदान्त इसके विपरीत जाते हुए कहता है कि आत्मा सनातन होती है. जो कुछ पिछले जन्म में किया गया वह उस आत्मा के साथ पूरी तरह जुड़ जाता है इसीलिये पिछले जन्म के कर्मों का परिणाम भुगतना होता है. इसीलिये आज जो गरीब बीमार और शोषित है उसे अपने कर्म ठीक करने चाहिए. उसने किसी पिछले जन्म में कोई पाप कर्म किया होगा इसलिए वह गरीब और दुखी है. वेदांती यह भी बताते हैं कि पूर्व जन्मों की अनंत श्रंखला में किये गए महापाप के कारण ही कोई व्यक्ति शूद्र या चांडाल बनता है और पूर्व जन्मों के दान पुण्य वृत तप इत्यादि के कारण ही कोई व्यक्ति ब्राह्मण बनता है.

    यह सिद्धांत भारत में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को बनाये रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता आया है. ऐसे सिद्धान्तकारों से पूछना चाहिए कि पिछले जन्म में पुण्यकर्म करने वाले लोग ही अगर ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य बनते रहे हैं तो उनके सैकड़ों जन्मों में किये गये दान, तप और पुण्य के बावजूद इस वर्तमान जन्म में आकर वे छुआछूत,घृणा, शोषण और दमन क्यों करने लगते हैं? उनकी अपनी सनातन आत्मा के पूर्व जन्म के सभी अच्छे संस्कार इस जन्म में अचानक निरस्त क्यों हो जा रहे हैं? उनका दान पुण्य उनका सदाचरण अचानक इस जन्म में घृणा और जातीय हत्याओं और बलात्कारों में क्यों बदल जा रहा है?

    ऐसे सवालों के जवाब आज तक कोई वेदांती बाबा नहीं दे पाया है.

    दुर्भाग्य से ऐसे वेदांती बाबा बहुत पुराने समय से ही दलितों बहुजनों और आदिवासी समाज में भी घुसकर सनातन आत्मा का सिद्धांत सिखाते रहे हैं. पहले वे अनपढ़ लोगों को कर्मकांड व्रत उपवास मान मनौती सिखाते हैं. और इन्ही में से शिक्षित हो रहे और जागरूक हो रहे लोगों को वे ध्यान समाधि साधना के जाल में फसाते आये हैं. दलित बहुजन और आदिवासी समाज के शिक्षित सम्पन्न वर्ग को अध्यात्म और ध्यान समाधी के नाम पर फिर से वाही सनातन आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत सिखाया जा रहा है. यह बहुत पुरानी चाल है. यह आज फिर से सफल होती नजर आ रही है.

    अभी हमारे समय में भी कई बाबा और आचार्य सक्रीय हैं. आजकल कुछ लोग विपस्सना के नाम पर फिर से सनातन आत्मा का वेदांती सिद्धांत दलितों बहुजनों को सिखा रहे हैं. कई किस्म के सद्गुरु और बाबा दलितों बहुजनों के शिक्षित युवाओं को ध्यान समाधि सिखाने के लिए बुला रहे हैं और आजकल बुद्ध के नाम का और विपस्सना के नाम का भी भारी उपयोग कर रहे हैं. ऐसे विपस्सना सिखाने वाले गुरु असल में बुद्ध और डॉ अंबेडकर ज्योतिबा फूले के आन्दोलन को बहुत गहराई से कमजोर कर रहे हैं.

    आजकल के ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव सहित कुछ विपस्सना गुरु और उनके हजारों विपस्सी साधक दावा कर रहे हैं कि बुध्द पूर्व जन्म के ब्राह्मण थे। वे कह रहे हैं कि सिर्फ बुध्द ही नहीं बल्कि डॉ. अंबेडकर और आप, मैं भी कई जन्मों में ब्राह्मण रह चुके हैं। इस पूरी चर्चा में जो केंद्रीय प्रश्न उभरता है वो ये कि जब बुध्द और डॉ अंबेडकर सहित ज्योतिबा फूले और पेरियार आदि ने स्व के अस्तित्व और स्व के पुनर्जन्म को सीधे सीधे नकार दिया है तो ये विपस्सी लोग किसके समर्थन में खड़े हैं? क्या ये बुध्द, डॉ आंबेडकर और फूले के समर्थक हैं? क्या ये उनके मिशन के सहयोगी हैं?

    आज तक एक भी विपस्सी साधक ने अभी तक यह व्याख्या नही की है कि जब आत्म या स्व है ही नहीं तो उसका पुनर्जन्म कैसे होता है? इधर उधर की बात करके समय बर्बाद करते हैं। ये विशुध्द ब्राह्मणवादी तकनीक है जो बुद्ध और अंबेडकर के आंदोलन को कमजोर करने के लिए बुनी गयी है।

    डॉ आंबेडकर के अपने आंदोलन में उनके अपने लोगों के बीच वेदांती और ब्राह्मणवादी गुरुओ की शिक्षा का असर नजर आने लगा है। ये लोग बुध्द के मुंह से वेदांत बुलवा रहे हैं और डॉ आंबेडकर की स्थापनाओं का विरोध कर रहे हैं। आप लोग अपनी आंखों के सामने देख सकते हैं कि किस तरह दलित बहुजन समाज के भीतर के अंधविश्वास लोग अपने ही हाथों से अंबेडकरी आंदोलन को बर्बाद कर रहै है।

    आज बाबा साहेब अंबेडकर और भगवान बुद्ध के आन्दोलन को इन्हें “अंदरूनी” दुश्मनों से खतरा है जो विपस्सना के नाम पर सनातन आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत सिखा रहे हैं. और सबसे बड़ी दुःख की बात ये है कि इस षड्यंत्र की कहीं कोई चर्चा ही नहीं हो रही है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • पालक, टमाटर व आलू की रसीली सब्जी –सामाजिक यायावर

    पालक, टमाटर व आलू की रसीली सब्जी –सामाजिक यायावर

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    पालक
    आलू
    टमाटर
    मिर्च
    प्याज
    लहसुन
    अदरक
    नींबू
    जीरा
    मेथी
    हींग
    आमचूर
    धनिया पाउडर
    सेंधा नमक

    विधि:

    पालक की पत्तियां तोड़ कर धो लीजिए। एक बर्तन में थोड़ा सा पानी डालकर उसमें पालक की धुली हुई पत्तियां डालकर कुछ मिनट तक उबाल लीजिए। उबली हुई पालक को सामान्य तापमान में आने के बाद पीसकर एक पात्र में रख लीजिए।

    टमाटर को भी पीस कर एक पात्र में रख लीजिए। प्याज व मिर्च को भी एक साथ पीस कर एक पात्र में रख लीजिए। लहसुन अदरक का पेस्ट बना लीजिए।आलू को छोटे टुकड़ों में काट कर एक पात्र में रख लीजिए।

    पात्र में तेल डालकर आलू के टुकड़ों को भून लीजिए, आलू के तेल में भुने हुए टुकड़ों को निकाल कर रख लीजिए।

    इसी तेल में हींग, मेथी व जीरा डालकर भूनिए, फिर इसमें लहसुन अदरक का पेस्ट डालकर भूनिए, फिर इसमें पीस कर रखी गई प्याज व मिर्च डालकर भूनिए, फिर इसमें पीस कर रखा गया टमाटर डालकर भूनिए।

    अब इसमें पीसी हुई पालक व तेल में भुनी हुई आलू डाल दीजिए। कुछ देर बाद सेंधा नमक, आमचूर व धनिया पाउडर डाल दीजिए। कुछ मिनट पकने दीजिए। अब आंच बंद करके नीबूं का रस डाल कर मिला दीजिए।

    लीजिए आपकी आलू, पालक व टमाटर की रसीली सब्जी तैयार है। खाइए व खिलाइए।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • कात्सु बहन (कात्सु होरिउची), गांधी शांति-दर्शन, काका कालेलकर व भारत

    कात्सु बहन (कात्सु होरिउची), गांधी शांति-दर्शन, काका कालेलकर व भारत

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    कात्सु होरिउची जब पहली बार भारत आईं थीं तब वे युवती थीं, अब उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष है। हम भारतीय, समाज में शांति के प्रति इनके समर्पण को सम्मान देते हुए, प्रेम व सम्मान से कात्सु बहन पुकारते हैं। लगभग 30 वर्ष से भारत में रह रहीं हैं। इनका जीवन विश्व में शांति का संदेश फैलाने के लिए समर्पित है। जापान से आईं कात्सु बहन लगभग 17-18 वर्ष पहले भारत की नागरिक बन गईं थीं।

    दत्तात्रेय बालकृष्णा कालेलकर, लोकप्रिय नाम “काका कालेलकर”, कात्सु बहन के जीवन गुरुओं में से थे तथा कात्सु बहन को अपनी दत्तक पुत्री मानते थे। 

    महात्मा गांधी की इच्छा थी कि समाज में धर्मवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, संस्कृतिवाद, भाषावाद इत्यादि से ऊपर उठकर लोगों के हृदय मिलने चाहिए, हृदय से एकाकर होना चाहिए। इसके लिए संस्थानों की स्थापना होनी चाहिए। इसी जिम्मेदारी को स्वीकारते हुए काका कालेलकर ने 1955 में दिल्ली के राजघाट में  गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा (सन्निधि)  की स्थापना की।

    काका कालेलकर गुजरात विद्यापीठ के सह-संस्थापक व वाइस-चांसलर रहे। काका कालेलकर भारत के प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग) के अध्यक्ष भी रहे थे।

    कात्सु बहन से मिलने का सौभाग्य मुझे 2005 में हुआ। मैं उन दिनों गांधी स्मारक निधि, राजघाट में रहता था तथा गांधी स्मारक निधि, गांधी शांति प्रतिष्ठान, अवार्ड तथा कनाडा के कुछ विश्वविद्यालयों के द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन में सहयोग कर रहा था तथा गांधी स्मारक निधि के मंत्री के सचिव के तौर पर कार्य कर रहा था।

    उस समय कात्सु बहन की उम्र लगभग 65 वर्ष रही होगी। मैं कात्सु बहन की सहृदयता व विनम्रता से प्रभावित हुआ था, मेरा प्रयास रहता था कि यदि अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार की आयोजन समिति की बैठक शाम को नहीं है, तो भले ही कुछ मिनट के लिए ही सही कात्सु बहन के दर्शन कर लूं। कभी कभार स्वादिष्ट स्नैक्स भी खाने को मिल जाते थे। 2005 के बाद पिछले लगभग साढ़े 13 वर्षों में उनसे कभी कोई संवाद, मुलाकात या संपर्क भी नहीं हुआ। इसलिए कात्सु बहन को शायद ही मेरी याद हो, यदि मैं उनको आज भी याद हूँ तो मेरे लिए यह अत्यधिक सौभाग्य की बात है।

    गांधी शांति-दर्शन से प्रभावित कात्सु बहन हिंदी बहुत अच्छे से जानती हैं। बच्चों के लिए जापानी लोक कथा नामक पुस्तक भी हिंदी में लिखी। सन्निधि की पत्रिका का संपादन भी करतीं थीं। कात्सु बहन की विश्व शांति के लिए शांति स्तूप, इंद्रप्रस्थ, दिल्ली की स्थापना में भी सक्रिय भूमिका रही।

    गांधीवादी रमेश कुमार शर्मा भाई की फेसबुक पोस्ट देखकर कात्सु बहन से जुड़ी मेरी यादें ताजा हो गईं। रमेश भाई को बहुत बहुत धन्यवाद। फोटो में कात्सु बहन, रमेश भाई व विष्णु प्रभाकर जी के पुत्र अतुल प्रभाकर भी हैं, जिन्हें मैं अवसर मिलने पर अपना मित्र कहने का सौभाग्य प्राप्त कर लेता हूँ।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • विकास का अर्थ कृत्रिमता बनाम सहज प्रकृति

    Apoorva Pratap Singh


    पिछले साल एक न्यूज़ थी कि घर में आग लगने पर पालतू कुत्ता और मालिक का दुधमुंहा बच्चा जल के मर गए । जब उनकी लाश निकाली गयी तो कुत्ते की पूरी जली बॉडी उस बच्चे के ऊपर झुकी हुई हालत में मिली। अर्थ यह है कि वो कुत्ता उस बच्चे को आग से बचाने की कोशिश में उस बच्चे के ऊपर झुका रहा, क्यूंकी उसे लगा कि वो ऐसे बच्चे तक आग नहीं पहुँचने देगा!!! क्या इतना समर्पण इंसान दे पाएगा!! अब आप कहेंगे कि यह तो प्रेक्टिकल ही नहीं है, मूर्खता है? पर कोई सोसाइटी कितनी तरक्की कर चुकी है इसका मानक यह क्यूँ नहीं होना चाहिए कि वहाँ का प्राणी कितना प्रेम कर सकता है!! यह क्यूँ मानक है कि वो दूसरे ग्रह पर पहुँच उस को भी बर्बाद करने के लिए कितनी जोड़-तोड़ कर रहा है!!

    मनुष्य को कैसे पता कि वो ही समस्त प्राणियों में सर्वोच्च है ? मतलब कैसे ? उसने घर बनाए हैं, गाड़ी – मोटर वगैरह, मतलब एक पूरी कृत्रिम व्यवस्था जो कि प्राकृतिक व्यवस्था के समानान्तर है, उसने खड़ी की है ! आप कहेंगे उसके पास भाषा है, इमोशन्स हैं ! पर हाऊ डू यू नो कि आपके अलावा किसी और प्राणी के पास आपसे बेहतर लिंबिक सिस्टम नहीं है ? लिंबिक सिस्टम मस्तिष्क की वो संरचनाएं जो यादों व भावों जैसी ही कई एब्स्त्रेक्त चीजों को संचालित करती हैं।

    मसलन डोलफ़िन और व्हेल दिमाग के साइज़ से ले कर इंटेलिजेंस में भी मानव से ज़्यादा होशियार होती हैं। वो अपनी एनेटोमी को भी मनुष्य से रिलेट करती हैं, जैसे कि अगर आप बार बार अपना दायां हाथ उसके समक्ष उठाएंगे तो वो भी अपना दायाँ फिन वैसे ही हिलाना शुरू हो जाएंगी। वो शीशे में भी खुद को पहचानती हैं और अब तो यह भी पता चल रहा है कि वो अपने समूह में डोल्फ़िंस को भी अलग अलग नाम देती हैं और वैसे ही स्वर में उन्हें बुलाती भी हैं । मानव की अपेक्षा व्हेल्स और डोलफ़िन लगभग 20 गुना ज़्यादा तेज़ी से सुन के प्रोसेस कर सकती हैं। यहाँ तक कि पूरी संभावना है कि वो जब आवाज़ देती हैं तो जो वो अपने आसपास देख रही होती है तो उस आवाज़ के संग ही वो डेटा भी दूसरी डोलफ़िन को देती हो । मतलब मनुष्य जहां यह काम दो ऑर्गन से करता है वहीं वो बस अपने एक ही सेंस यानि औडिओ से कर देतीं हैं!

    ऐसे ही सारस या सियार, साथी के मरने पर वो फिर से जोड़ा नहीं बनाते, यह तो परम मानव के गुण हैं !! बस एक से लौ लग गई तो बस लग गई !! वो यह साबित करते हैं कि सब कुछ मन में होता है, शारीरिक जरूरतें सेकेन्डरी हैं ! जीवन हॉर्मोन्स-लिपिड्स से भी पहले भावनाओं से संचालित होता है।

    एक और बात यह भी कि कुत्ता और भेड़िया में से भेड़िया ज़्यादा स्ट्रॉंग है लेकिन सदियों पहले कुत्ता भी भेड़िया ही था, लेकिन वो भेड़िये कुत्ते बन गए जो अपनी से अलग प्रजाति यानि मनुष्य से भी प्रेम करने लगे। मनुष्य के मानकों के अनुसार तो कुत्ते ने मनुष्य के अनुसार खुद को ढाल अपने को कमजोर ही किया किन्तु अगर विकास प्रेम करने कि क्षमता से नापा जाये तो कुत्ता बहुत आगे हो जाएगा।

    ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि डोलफ़िन जैसे अति विकसित प्राणी भी विकास के उस चरम पर पहुंचे हों कभी पर उसके आगे उन्होने विकास चुना ही नहीं, जीवन चुना, प्रेम चुना, शारीरिक विकास भी चुना पर जिसे मनुष्य तरक्की मानता है वो नहीं चुना, वो उस एज पे पहुँच के रुक गए और वापिस लौटे! क्या पता उनकी प्रकृति की समझ हमसे बेहतर हो इसलिए उन्हें पता हो कि इस चूहा दौड़ का कोई हासिल नहीं है।

    मैं सोचती हूं कि इंसान पहले फैसले दिमाग से करता है, फिर खुद को भोला और प्योर भी फील करने को अपने दिल से अपने फेवर में तर्क गढ़वाता है जबकि यहीं जानवर इसका उलट करते हैं, दिल से फैसले ले के उनका दिमाग उन के तर्क गढ़ता है।

    यह बेहतर ही तो है शायद !!!

    Apoorva Pratap Singh


    Apoorva Pratap Singh

  • APS बनाम IAS

    APS बनाम IAS

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    भारत में जैसे IAS (Indian Administrative Sevice), आस्ट्रेलिया में वैसे APS (Australian Public Sevice)। भारत में जैसे UPSC (Union Public Service Commission), आस्ट्रेलिया में वैसे APSC (Australian Public Service Commission)। आइए देखते समझते हैं कि IAS व APS के मूलभूत चरित्रों में क्या अंतर है। 

    आस्ट्रेलिया में APS

    आस्ट्रेलिया में जो योग्य है, जो वास्तव में देश के लिए योगदान करना चाहता है, वह APS बनता है। APS बनना योग्यता का मानदंड नहीं है। जो योग्य है वह APS बनता है।

    APS की सबसे बड़ी खासियतें यह हैं कि स्वतः प्रमोशन जैसी व्यवस्था नहीं। यदि कोई सामान्य स्नातक है और APS बना है तो वह अपनी योग्यता के आधार पर ही APS के स्तर पर रहेगा, स्वतः प्रमोशन पाते हुए देश का सचिव नहीं बन सकता या नीति निर्माताओं या निर्णय लेने जैसे स्तरों तक नहीं पहुंच सकता है। पहुंचेगा भी तो अपनी योग्यता प्रमाणित करते हुए।

    APS के किसी भी स्तर पर कोई भी कभी अपनी योग्यता प्रमाणित करके APS का वह स्तर ज्वाइन कर सकता है। आयु की कोई सीमा नहीं।

    मतलब यह कि यदि आप विशेषज्ञ हैं, योग्य हैं तो आप पचास साठ साल की आयु में भी अपनी योग्यता के आधार पर APS का स्तर ज्वाइन कर सकते हैं।

    आपने जीवन में कभी भी कोई सरकारी नौकरी न की हो, लेकिन यदि आप योग्य हैं, यदि आप विशेषज्ञ हैं तो आप देश के महत्वपूर्ण विभागों का सचिव बन सकते हैं। आप 21 साल की आयु में देश का सर्वोच्च सचिव बन सकते हैं, आप 80 साल की आयु में सचिव बन सकते हैं।

    यही कारण है कि आस्ट्रेलिया में कोई नौकरशाह किसी आम-आदमी का अपमान नहीं करता। क्योंकि क्या मालूम कि आज जो कुर्सी के उस पार बैठा है कल को उस नौकरशाह का बाप बनकर बैठ जाए। वैसे भी आस्ट्रेलिया में नौकरशाही का जो चरित्र है वह आम आदमी के लिए है। आम आदमी वास्तविक मालिक है देश का।

    आस्ट्रेलिया में किसी भी नौकरशाह को भले ही देश का सर्वोच्च नौकरशाह हो को आवास जैसी सुविधाएं नहीं मिलती हैं। आपका पड़ोसी भी देश का सर्वोच्च नौकरशाह हो सकता है। बिलकुल आपके ही जैसा आम आदमी। जिसके ऊपर वह सभी नियम कानून लागू होते हैं जो आपके ऊपर लागू होते हैं। उसको भी आपकी ही तरह बिजली पानी इत्यादि के बिल देने पड़ते हैं। वह भी आपकी तरह अपनी कार चलाते हुए ट्रैफिक के नियमों का पालन करता हुआ अपने आफिस पहुंचता है। उसके बच्चे भी आपके बच्चों की ही तरह बस स्टाप में बस का इंतजार करते हैं। कोई अतिरिक्त छूट, सुविधा या महिमामंडन नहीं।

    आस्ट्रेलिया में जो नौकरशाह जिस विभाग में है वह उस विभाग के संदर्भ में योग्यता व विशेषज्ञता रखता है। ऐसा नहीं है कि एक इतिहास का स्नातक वित्त या अंतर्राष्ट्रीय विकास या पानी या ऊर्जा या तकनीक या स्वास्थ्य या सुरक्षा की नीतियां बनाना शुरू देगा। ऐसा भी नहीं है कि एक BA पास आदमी किसी अधिक योग्य व विशेषज्ञ को ज्ञान देना शुरू कर देगा। ऐसी कल्पना तक नहीं की जा सकती है।

    यही कारण है कि आस्ट्रेलिया जैसे विकसित हैं और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देशों में आते हैं। क्योंकि वास्तव में योग्यता व विशेषज्ञता का सम्मान होता है, काम करने की छूट मिलती है, आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं। योग्यता व विशेषज्ञता का देशहित में प्रयोग होता है।

    आस्ट्रेलिया में APS संसद के प्रति जिम्मेदार होता है। ध्यान दीजिए संसद के प्रति न कि राष्ट्रपति या कैबिनेट या सरकार के प्रति। यही कारण है कि ऊंचे से ऊंचा नौकरशाह भी एक निर्दलीय सांसद तक से नीचे माना जाता है। भारत में तो उपजिलाधिकारी भी गैर-सत्तापक्ष वाले सांसद/विधायक से चाहें तो तहजीब से बात तक न करें, निर्दलीयों की तो बात ही छोड़ दीजिए।

    आस्ट्रेलिया में जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी इत्यादि जैसे सामंती व राजसी पद नहीं होते हैं। इस तरह के पद होते भी हैं तो वे स्थानीय सरकारों के अधीन होते हैं। भारत में अंग्रेजो की गुलामियत वाली प्रशासनिक व्यवस्था आजतक बदले हुए नामों के साथ लागू है। भारत में क्या कल्पना की जा सकती है कि जिलाधिकारी जिलापंचायत के अधीन हो। जिला पंचायत जिलाधिकारी की वैकेंसी निकाले, चयन परीक्षा करवाए, वेतन दे। जिलाधिकारी है तो स्थानीय सरकार के स्तर का सरकारी कर्मचारी ही।

    जिले का जिलाधिकारी होने का मतलब स्थानीय स्तर पर नौकरी करना, मतलब स्थानीय सरकार के लिए नौकरी करना न कि राज्य या केंद्र सरकार के लिए नौकरी करना। लेकिन भारत के तंत्र का ढांचा ऐसा है कि ये लोग राजा होते हैं बाकी लोग गुलाम, ऊपर से भारत के राष्ट्रपति के प्रतिनिध के रूप में नौकरी करते हैं। 

    भारत में IAS

    भारत में IAS होने के लिए स्नातक होना होता है। स्नातक होने के बाद परीक्षा में बैठना होता है। जो जितना अधिक रट लेता है वह IAS बन जाता है। भारत में समाज के लोग IAS को व जो स्वयं IAS है वह अपने आपको सर्वज्ञाता मानता है। ऐसा माना जाता है कि वह सबसे अधिक विद्वान व योग्य है तभी IAS बन पाया है।

    IAS होने की परीक्षा जो महज आवेदकों की संख्या छटनी करने का प्रतियोगी तरीका भर है, को योग्यता व विशेषज्ञता के रूप में महिमामंडित किया जाता है। स्थिति यह है कि बिना किसी विशेषज्ञता का एक सामान्य स्नातक भी IAS बन कर देश की नीतियां तय करने वाला निरंकुश नौकरशाह बन जाता है। नीति निर्माता होने के लिए वास्तविक योग्यता व विशेषज्ञता के लिए न तो दरवाजा रहता है न ही विकल्प। जो दिखावटी सलाहकार समितियां बनती भी हैं तो उनका कोई विशेष मतलब नहीं होता क्योंकि सबके ऊपर तो IAS रूपी नौकरशाह कुंडली मारकर बैठा रहता है।

    भारत में कुछ किताबें रटकर IAS बन सकते हैं। कुछ किताबें रटिए, संख्या छटनी प्रतियोगी-परीक्षा में जगह बनाइए फिर जीवन में आपको कुछ नहीं करना है सबकुछ स्वतः होगा। प्रमोशन स्वतः होते हैं। समय से प्रमोशन न हो तो कोर्ट जा सकते हैं, प्रमोशन न होने पर सरकार के खिलाफ मुकदमे दायर कर सकते हैं। प्रमोशन के लिए केवल समय काटना होता है। इन मुद्दों पर सरकार के खिलाफ मुकदमे करके हीरो बना जा सकता है, क्रांतिकारी के रूप में प्रतिष्ठा पाई जा सकती है। सरकार यदि किसी IAS को बर्खास्त करना चाहे या निलंबित करना चाहे तो सरकार को नाकों चने चबाने पड़ जाते हैं।

    स्नातक कीजिए, एक खास उम्र तक IAS बनिए। आजीवन देश की दशा व दिशा तय करने के लिए महानता व योग्यता अर्जित हो गई। अब कोई सवाल नहीं खड़ा हो सकता, किसी सुझाव की जरूरत नहीं।

    इतिहास से BA स्नातक IAS बनकर भारत का वित्त सचिव बन सकता है, स्वास्थ्य सचिव बन सकता है, नदी मंत्रालय का सचिव बन सकता है, इंजीनियरी विभाग का सचिव बन सकता है, विदेश मंत्रालय का पूरा ठेकेदार बन सकता है। इंजीनियरिंग से स्नातक/परास्नातक IAS बनकर स्वास्थ्य सचिव बन सकता है।

    कामर्स स्नातक या MBBS स्नातक या LLB की पढ़ाई किया हुआ IAS, इंजीनियरी से पीएचडी किए इंजीनियर को इंजीनियरी के ऊपर ज्ञान देगा। इंजीनियरी की पढ़ाई किया हुआ IAS, डाक्टर व वित्त व अन्य विशेषज्ञों को उनकी विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में ज्ञान देगा।

    एक BA या BSc की पढ़ाई किया हुआ IAS, जिलाधिकारी या उपजिलाधिकारी बनकर पूरे जिले या अपने हलके के इंजीनियर्स, डाक्टर्स, वित्त विशेषज्ञों, व्यापारियों, व प्रोफेसरों को भरपूर ज्ञान देता है। सब उसके जूतों तले रहते हैं। निर्णय वही लेता है। बाकियों को अपने द्वारा लिए गए निर्णयों के संदर्भ में IAS की सहमति लेनी होती है।

    यहां तक कि जिलाधिकारी, IAS, सुरक्षा विशेषज्ञ भी होता है, जिला पुलिस अधीक्षक, IPS, को ज्ञान देता है। पूरी नौकरशाही के ढांचे में टाप टु बाटम ऐसा ही है। सर्वज्ञाता होने व योग्य होने की इनकी सीमा असीमित है। फैशन डिज्ञाइन संस्थानों, तकनीकी संस्थानों के निदेशक बन जाते है।

    एक लाइन में यह समझिए कि घास के तिनके से लेकर अंतरिक्ष यान तक सभी कुछ के ज्ञाता व धुरंधर विशेषज्ञ होते हैं। ज्ञाता होने व योग्य होने का अहंकार, बाप रे बाप। ईश्वर भी पानी भरे। बिलकुल राजतंत्र वाला अंदाज। एक राजा और बाकी सब जी-हुजूरी करने वाले दरबारी।

    जिस-जिस IAS को बहुत संवेदनशील, लोकतांत्रिक व अपवाद इत्यादि माना जाता है। वह स्वयं को अपनी प्रजा का अभिभावक मान कर कुछ थोड़े बहुत काम कर देता है। इसके लिए भी उसको पुरस्कार वगैरह मिल जाते हैं, मनचाहे पद मिल जाते हैं। आइडिया इन्वेंटर मान लिया जाता है। योग्यता व महानता का अहंकार और जबरदस्त कुलांचे मारता है।

    जो IAS हैं, उन्हीं में से चुनाव करना है कि किसको किस पद पर कहां रखा जाए, किसको कहां सचिव बनाया जाए। जो वित्त सचिव है उसे वित्त का ककहरा पता है या नहीं, यह मायने नहीं रखता। बाइचांस भगवान भरोसे यदि कोई वित्त विशेषज्ञ निकल आए तो अलग बात है। यहां भी वित्त विशेषज्ञ का मतलब यह कि किसी ने वित्त या कामर्स इत्यादि जैसे विषयों से स्नातक कर रखा हो।

    यहां तक कि सांसद व विधायक निधियों तक के बारे में भी निर्णय लेता है। मतलब यह कि ईश्वर के बाद सबसे अधिक ज्ञाता लोग भारत का IAS. इस ढांचे की सबसे बड़ी विडम्बना यह है है कि भारत में जो भी IAS होता है वह दिखावटी नौटंकी चाहे जो करे, लेकिन वह खुद ही स्वयं को सर्वज्ञाता मानता है।

    भारत में पूरा प्रशासनिक ढांचा ही भीषण रूप से सामंती, अलोकतांत्रिक व गैरजिम्मेदाराना चरित्र का है। IAS बनने की प्रक्रिया भी ऐसी है कि वह लोगों के अंदर सामंती चरित्र, गैर-जिम्मेदारानपन, अहंकार व शोषण करने की मानसिकता विकसित करती है। बेहतर लोगों को IAS बनकर देश व समाज के लिए योगदान देने की संभावना नगण्य रहती है।

    भारत का IAS लोकतंत्र को कमजोर करता है, सामंती चरित्र का होता है, योग्यता व विशेषज्ञता से लेना-देना नहीं होता है। देश व देश के लोगों के प्रति कोई जिम्मेदारी का भाव कम से कम IAS का ढांचा तो नहीं ही विकसित करता है, हां यदि वह व्यक्ति जो IAS है वह अपने व्यक्तिगत मूल्यों के आधार पर ऐसा महसूस करे तो बिलकुल अलग बात है।

    चलते-चलते

    भारतीय तंत्र में मूलभूत रूप से गंभीर खामियां होने के कारण ही भारतीय तंत्र का चरित्र सामंती व अलोकतांत्रिक है तथा आम आदमी के प्रति उपेक्षा, उपहास व गैर-जवाबदेह वाली मानसिकता कूट-कूट कर भरी है।

    चकाचौंध की बजाय विकसित देशों से भारत को बहुत कुछ सीखने समझने की महती जरूरत है।

    भारत में बहुत चिंतक लोग अपने आपको क्रांतिकारी, समाजवादी व वामपंथी मानते हुए चीन-चीन या अमेरिका-अमेरिका चिल्लाते रहते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि व आस्ट्रेलिया व यूरोप के अनेक देशों का चरित्र बेहतर समाजवादी व लोकतांत्रिक है। चीन की तथाकथित साम्यवादी व्यवस्था से बेहतर व्यवस्था रखते हैं। भले ही नारे न लगाते हों।

    कोई देश व समाज व उसके लोग वास्तव में कितने समाजवादी व लोकतांत्रिक हैं, वह उस देश व समाज के आंतरिक व व्यवहारिक ढांचों व व्यवस्थाओं का सूक्ष्म अध्ययन करने पर ही मालूम पड़ता है। कथा कहानियों भाषणों बयानों या किसी टीवी एंकर के सतही लेखों या सतही टीवी कार्यक्रमों या सेमिनारों या दस्तावेजी लिखापढ़ी की नौटंकी/प्रायोजनों से नहीं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist; He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव के साथ सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक फ्रैंक हुज़ूर की बेबाक बातचीत

    समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव के साथ सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक फ्रैंक हुज़ूर की बेबाक बातचीत

    शीर्षक

    अपने संगठनात्मक कौशल से समाजवादी पार्टी की नीव को अटूट मजबूती देने वाले शिवपाल सिंह यादव (उम्र, 63) को 1996 में पहली बार जसवंत नगर की जानते ने अपना प्रतिनीधि चुनकर विधानसभा में भेजा। इसी जसवंत नगर विधानसभा से नेताजी ने अपने राजनैतिक सफ़र की शुरुवात की थी, फिर केंद्र की राजनीति में दस्तक देने के बाद प्रदेश की राजनीति को बतौर उत्तराधिकारी जसवंत नगर की सीट से शिवपाल के राजनैतिक सफ़र की शुरुआत करायी। जिस तरह से भारतीय राजनीति मुलायम सिंह यादव को नेताजी और अखिलेश यादव को भईयाजी के नाम से जानती है उसी तरह शिवपाल सिंह यादव को चाचाजी के नाम से जाना जाता है। देश के समाजवादियों के कतार में खांटी समाजवादी की पहचान को बनाये हुए जनहित के मुद्दों को लेकर कभी कलेक्ट्रेट तो कभी ब्लॉक पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले रहते थे।

    Shivpal Singh Yadav and Frank Huzur

    फ़्रैंक हुज़ूर: मेरा पहला सवाल है कि सैफई, जिस गाँव में आपका जन्म हुआ है, आज भारत में जब भी समाजवाद की बात होती है तो उसे सैफई से भी जोड़ कर देखा जाता है।आपने नेता जी में पहली बार राजनीति को कब महसूस किया? और पहली बार आप में राजनीति करने की इच्छा कब जगी?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! पहले तो आपने सैफई का ज़िक्र किया तो सैफई एक छोटा सा गाँव है जो अब बड़ा हो गया है वहाँ बहुत सी सुविधायें हो गई हैं जैसे रोड़ की सुविधा हो गई, तहसील की सुविधा को गई अस्पताल की सुविधा हो गई है। लेकिन पहले तो एक छोटा सा गाँव ही था।

    हम लोग वही पैदा हुए, वही पढ़ाई किये। प्राइमरी स्कूल में पढ़े हैं, उस समय प्राइमरी स्कूल में सिर्फ़ एक कमरा हुआ करता था, उसी एक कमरे में एक से लेकर पाँचवी क्लास तक की पढ़ाई होती थी।

    वही से शुरूआती पढ़ाई लिखाई शुरू हुई थी फिर कक्षा पाँच पास करने के बाद छठी कक्षा में हमारा एडमिशन जैन इंटर कॉलेज करहैल में हुआ, जहाँ नेता जी लेक्चरर थे, तो छठी से लेकर बारहवाँ तक वही पढ़े, गाँव से स्कूल तक पैदल जाते थे तब तो साइकल भी नही थी।

    हमारे गाँव के सभी बच्चे स्कूल तक पैदल ही जाते थे। नेता जी पढ़ाने के लिये साइकल से जाते थे। तब तो वैसा कोई रास्ता भी नही था स्कूल तक जाने के लिये, बारिश के समय पर तो हम लोग खेतों की मेड़ों से होकर जाते थे। वहाँ एक बम्मबा नहर था जिसमें पानी भरा रहता था तो स्कूल तक जाने में दिक़्क़तें होती थी।

    नेताजी 1967 में जब पहला चुनाव लड़े थे तब हम बारह-तेरह साल के बच्चे थे तो ज़्यादा कुछ पता नही था। नेता जी पहला चुनाव जीत कर सदन में पँहुचे।

    हम लोग बचपन में नेताजी के चुनाव प्रचार के लिए गाँव गाँव जाकर पोस्टर लगाते थे, उनके लिए नारे लगते थे….

    फ़्रैंक हुज़ूर: जब पहला चुनाव नेताजी लड़े तो उनके चुनाव प्रचार में आपकी क्या भागीदारी थी?

    शिवपाल सिंह यादव: हम लोग उस समय बच्चे ही थे तो क्या चुनाव प्रचार करते, जहाँ तक मुझे याद है कि सत्तर के बाद जब हम हाईस्कूल में पहुँच गये थे तो उसके बाद जो भी चुनाव आता था हम लोग नारे लगाते थे। जब भी किसी समाजवादी की गाड़ी आती थी तो हम नारे लगाते थे और किसी दूसरे पार्टी की गाड़ी आती थी तो उसका विरोध करते थे। गाँव गाँव पोस्टर लगाते थे। ये सारे काम आज भी चलते हैं, हम जब भी गाँव जाते हैं छोटे छोटे बच्चे नारे लगाने लगते हैं।

    फ़्रैंक हुज़ूर: 1971 के उस दौर में पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध भी हुआ था, उस समय नौजवानों में, गाँव के लोगो में किस तरह का माहौल हुआ करता था? उस दौर की कोई बात जो आपके ज़ेहन में हो?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! 1971 में तो हमारे गाँव से कई लोग सेना में भर्ती हो गये थे। जब युद्ध हुआ तो हमारे सबसे बडे़ भाई रतन सिंह भी जाकर सेना में भर्ती हो गये थे। हमारे पड़ोस के रामशरण यादव भी सेना में भर्ती हो गये थे और नेता जी के जो बार्बर थे राममूर्ती वो भी भर्ती हो गये थे। एक ड्राइवर हुआ करते थे बेंचे वो भी भर्ती हो गये थे, तो उस समय जब भर्ती हो रही थी तो ये सब लोग जाकर सेना में शामिल हो गये थे। उस समय का इतना ही याद है। ये लोग छूट्टी लेकर गाँव आते थे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: जब ये लोग सेना से लौटकर गाँव आते थे तो क्या बताते थे?

    शिवपाल सिंह यादव: वही सब बातें बताते थे कि चाइना से कैसे युद्ध लड़े, पाकिस्तान से कैसे युद्ध लडे़। सीमा पर की कहानियाँ सुनाते थे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: उन लोगो की बातें सुनकर कभी ऐसा लगा कि हमें भी सेना में जाना चाहिये? या फिर सियासत मे आने की वजह सिर्फ़ नेताजी बने?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! जब नेताजी चुनाव लड़ने लगे तो हम सब उनके लिये काम करते थे, उस समय पर्चियाँ काटी जाती थी। चुनाव के एक महीने पहले से पर्चियाँ काँटना शुरू कर देते थे। वोटर लिस्ट लेकर के हम लोग पर्चियाँ तैयार करते थे और चालिस-पचास लोग मिलकर के साइकल से गाँव गाँव प्रचार करने जाते थे, पोस्टर लगाते थे, नारे लगाते थे।

    तो यही सब काम चलता था। ये तो हम लोगो ने 1972 में शुरू कर दिया था। 1974 में फिर से नेताजी विधायक बन गये थे और 1975 में एमरजेंसी लग गई थी। जब एमरजेंसी लगी तो हम के.के. डिग्री कॉलेज, इटावा में पढ़ते थे। जहाँ हम लोग रहते थे वहां कभी कभी नेताजी भी वही आ जाते थे। नेताजी जब भी लखनऊ से लौटते थे तो हम लोगो के पास इटावा में रूक जाते थे। हम लोग एक ही मकान में रहते थे।

    जब एमरजेंसी लगी तो हम वही इटावा में थे, नेताजी भी थे। हमारे पास एक फ़िलिप्स का ट्रांजिस्टर था उस पर सुना था कि एमरजेंसी घोषित हो गई है। पुलिस घूमने लगी मोहल्ले में, तब तो शायद लोकदल हुआ करता था या जन संघ पार्टी हुआ करता था, इनके लोगो की गिरफ़्तारियाँ शुरू हो चुकी थी ट्रांजिस्टर पर हम लोग सुनते थे। तब तो हमें एमरजेंसी का मतलब भी नही पता था, हमारे पड़ोस में एक कांग्रेस के नेता थे रामाधिन शर्मा,उनका हमारे यहाँ उठना बैठना होता था तब हमने उनसे बात की, उनसे पूछा कि एमरजेंसी का मतलब क्या है? तब उन्होंने बताया कि एमरजेंसी लग चुकी है गिरफ़्तारियाँ शुरू है।

    उस समय हमारे घर पर भी पुलिस आती थी। पुलिस वाले पुछते थे कि विधायक जी कहाँ हैं, उस समय नेताजी को विधायक जी कहा जाता था। तब तक तो हम लोगो को पता चल ही चुका था कि गिरफ़्तारियाँ शुरू हो चुकी है। उस समय नेताजी भर्तना की ओर किसी शादी में गये हुए थे, तो हम लोगो ने पुलिस को उसके उल्टी तरफ़ सिकोहाबाद की ओर बता दिया कि नेताजी उधर गये हैं। तो नेताजी जब रात में लौटे तो हम लोगो ने घर में बाहर से ताला लगा दिया और पुलिस आई तो उसको बता दिये कि घर पर कोई है हि नही, फिर सबेरे चार बजे नेता जी को मोटरसाइकिल से गाँव तक छोड़ आये।

    उस समय एक नेता हुआ करते थे राम सेवक जो अभी भी हैं, वो किसी की मोटरसाइकिल लेकर आये और नेता जी को सुबह चार बजे गाँव छोड आये। तब उस समय नेता जी की गिरफ़्तारी नही हो पाई। उसके बाद नेता जी गाँव गाँव जाते रहे लोगो से मिलते रहे, एक महीने के बाद नेताजी की गिरफ्तारी हुई। नेता जी 18-19 महीने तक जेल में रहे।

    जब नेताजी एमरजेंसी के समय जेल में बंद थे तो मैं हर रोज उनसे मिलने जेल में जाता था….

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या आप नेताजी से मिलने जेल में जाते थे?

    शिवपाल सिंह यादव: हाँ, एक दिन में दो बार तो अनिवार्य रूप से रोज मिलने जाते थे। नेताजी को जिस भी सामान की ज़रूरत पड़ती थी हम पहुँचा आते थे। उस समय के एक जेलर थे वाजपेयी जी जिनसे हमारी दोस्ती भी हो गई थी। जब कभी जेल में नेताजी से मुलाक़ात नही हो पाती थी तो जेलर साहब को ही सामान दे आया करते थे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: जब आप नेताजी से जेल में मुलाक़ात करके वापस गाँव, घर, परिवार के बीच लोटते थे तो लोग क्या पुछते थे?

    शिवपाल सिंह यादव: अरे! उस एमरजेंसी के समय तो हम लोग लड़के ही थे। जब हम लोग जेल के गेट तक पहुँचते थे तो पुलिस खदेड़ती थी, हम लोग भाग जाते थे। एमरजेंसी लगने के एक-दो महिने तक तो पुलिस का आतंक था। लेकिन हम लोगों को क्या ही फ़र्क़ पड़ता था, पुलिस खदेड़ती थी हम लोग भाग जाते थे। जेल के पास में ही स्टेशन था तो उधर की भाग जाते थे। और जब भी कभी नेताजी से मुलाक़ात होती तो नेताजी जो भी पत्र लिख कर देते थे उसे गाँव तक हम लोग पहुँचा आते थे। फिर हम लोग चुनाव की तैयारी भी करते थे, तो वहीं से हमारी राजनीति शुरू हो गई थी, एमरजेंसी के बाद।

    फ़्रैंक हुज़ूर: एक नेता के रूप में आपने पहला भाषण कब दिया था?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! हम लोग तो अपना काम करते रहे, उस समय केवल हम लोगो का काम था कि नेताजी की मीटिंग बडे़ नेताओं से करायें जैसे जनेश्वर मिश्राजी थे, रामनारायण जी थे, अनंत जायसवाल जी थे।

    ये सभी बडे़ समाजवादी नेता हुआ करते थे। इनकी जब मीटिंग होती थी तो हम लोग कराते थे। गाँव में छोटे छोटे पंचायत के स्तर पर इन नेताओं की मीटिंग कराते थे। फिर हम 1988 में ज़िला सहकारी बैंक के चेयरमैन हो गये। मुझे याद है कि हरदोई में नेताजी की एक मीटिंग होनी थी, वहाँ मैने अपना पहला भाषण दिया था। हमारे यहाँ समाजवादी पार्टी के जिले के महासचिव गया प्रसाद वर्मा जी थे जो तीन बार विधायक बने थे तो उनके साथ कई मीटिंग हमने अटेंड की फिर तो धिरे धिरे एक महराज सिंह हुआ करते थे पार्टी के अध्यक्ष, वो भी पाँच बार भर्तना से विधायक बने। कोऑपरेटिव मूवमेंट से इसकी शुरूआत हुई।

    जब उत्तर प्रदेश को पहली बार कोई पिछड़ा मुख्यमंत्री मिला तो गाँव गाँव लोगो में बहुत उत्साह था…….

    फ्रैंक हुज़ूर: उस दौर में कांग्रेस की जो राजनीति थी, जो भी उस पार्टी के मुख्यमंत्री पद के नेता बनते थे वो भी ज़्यादातर सवर्ण समाज के होते थे। जिस तरह से आज भाजपा पर सवर्णपरस्ती का आरोप लगता है वैसे ही उस समय कांग्रेस पर भी लगता था तो उस समय जब पहली बार रामनरेश यादव उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बनते हैं और वो उस समय पिछड़ो के प्रतिनिधित्व/अधिकार की बात करते हैं जिसके चलते गाली भी खाते हैं। क्या उस समय समाज में किसी तरह का विरोधाभास पैदा हुआ था? जिस तरह से मंडल कमीशन के बाद हुआ था।

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! एमरजेंसी के बाद जब सरकार बनी, सबकी मिली जुली जनता पार्टी बनी। सभी लोग कांग्रेस के विरोध में हो गये थे। और यहाँ मुख्यमंत्री रामनरेश यादव बने उनके बाद बनारसी दास भी मुख्यमंत्री बने। जब  रामनरेश यादव मुख्यमंत्री बने तो पिछड़ो में ख़ुशी का माहौल था। पहली बार जब कोई यादव मुख्यमंत्री बना तो गाँव गाँव लोगो में बहुत उत्साह था क्योंकि इसके पहले तो केवल सवर्ण ही मुख्यमंत्री बनते थे।

    नेताजी पढ़ाई लिखाई में भी गुरू रहे, पॉलिटिक्स में भी गुरू रहे और परिवार के गार्जियन भी रहे……

    फ़्रैंक हुज़ूर: जब नेताजी पहली बार कोऑपरेटिव मिनिस्टर बने थे तब लखनऊ से आपका जुड़ाव ज़्यादा हो गया रहा होगा?

    शिवपाल सिंह यादव: उस समय भी हम पढाई ही कर रहे थे। एमरजेंसी के पहले ही हमने बी ए कर लिया था उसके बाद एम ए किया फिर 1978 में लखनऊ के क्रिश्चियन कॉलेज से ही बीपीएड किया तब नेताजी कोऑपरेटिव मिनिस्टर थे। पहले नेताजी 16, गौतमपल्ली में रहते थे हम भी उनके साथ ही रहे और विक्रमादित्य में जब नेता जी रहे तब भी हम कुछ दिनों तक उनके साथ ही रहे। इसके बाद ही हम राजनीति में सक्रिय हो गये थे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: आप पर नेताजी की राजनीति का असर लगातार हो रहा था तो क्या आप कह सकते हैं कि नेताजी आपके राजनैतिक गुरू हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: हाँ, नेताजी के साथ ही हमेशा काम किया है और हमारे जिले के जो गया प्रसाद वर्मा जी थे, महराज सिंह जी थे इनके साथ भी काम किया है।

    फ़्रैंक हुज़ूर: कहते हैं कि गोपाल कृष्ण गोखले, गांधी जी के भी गुरू थे, कुछ लोग कहते हैं कि वो जिन्ना के भी गुरू थे तो उसी तरह आपका राजनैतिक गुरू किसे कहा जाय?

    शिवपाल सिंह यादव: तब तो नेताजी को ही कहा जायेगा। नेताजी ने पढ़ाया भी है, मेरा विषय पॉलिटिकल साइंस भी था। पहला पीरियड नेताजी का ही लगता था वही पढ़ाते थे। तो नेताजी पढ़ाई लिखाई में भी गुरू रहे, पॉलिटिक्स में भी गुरू रहे और परिवार के गार्जियन भी रहे।

    अखिलेश (टीपू) हमारे साथ ही रहते थे…..

    फ़्रैंक हुज़ूर: उसी समय में अखिलेश जी का जन्म होता है और नेताजी पिता भी बन जाते हैं, तो उस दिन के बारे में कुछ बतायेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: हाँ, उस समय तो मैं गाँव में ही था, जिस दिन इनका जन्म हुआ 1972 में लोगो ने ख़ुशी ज़ाहिर की थी। जिसको हम लोग बड़ी माँ बोलते थे, जो प्रोफ़ेसर की माँ थी उन्होंने सबसे पहले आकर हमें बताया सुबह सुबह जब अखिलेश जी का जन्म हुआ। फिर ख़ुशी का माहौल था।

    फ़्रैंक हुज़ूर: अखिलेश जी ने अपना ज़्यादातर समय आपके परिवार के साथ बिताया, मिलेट्री स्कूल से लेकर हर जगह आप गार्जियन के रूप में मौजूद रहे। क्या आपने उस समय कभी ऐसा महसूस किया कि ये लड़का आगे चलकर राजनीति में जायेगा?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! शुरूआत में जब नेताजी कोऑपरेटिव मिनिस्टर थे तब ये बहुत थे चार साल के रहे होंगे। तब मेरे साथ ही गाँव से लखनऊ आकर के पंद्रहदिन तक रहे थे, तक तक उनका एडमिशन नही हुआ था। उसके बाद ही उनका एडमिशन इटावा सेंट मैरी में कराया गया था। सेंट मैरी स्कूल सेचौथी क्लास पास करने के बाद ही मिलिट्री स्कूल, धौलपुर में एडमिशन कराने मैं ही ले गया था।

    फ़्रैंक हुज़ूर: अखिलेश के साथ कुछ ऐसी बातें या कोई यादगार पल जो आप साझा करना चाहें?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! जब हमारे साथ ही रहे तो यादगारे तो बहुत सी हैं, अब जो चाहे लिख लेना।

    फ़्रैंक हुज़ूर: बचपन में अखिलेश जी का व्यवहार कैसा था? जैसे सीधे थे, शरारती थे या शर्मीले थे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! शर्मीले तो नही थे। खेल कुद में ज़्यादा मन लगता था।

    फ़्रैंक हुज़ूर: किस खेल में इनका ज़्यादा मन लगता था? कौन सा खेल खेलते थे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! मोहल्ले में जहाँ हम लोग रहते थे किराये के मकान में, तो मोहल्ले के लड़के इकट्ठे हो जाते थे उनके साथ खेलते थे और जब बडे़ हुए तोक्रिकेट, फ़ुटबॉल ज़्यादा खेलते थे। फ़ुटबॉल में उनका ज़्यादा मन लगता था।

    बाबरी विध्वंस के समय मैं इटावा में था फिर भी मुझपर मुक़दमे किये गये, मैं 6 महीने तक अंडरग्राउंड था…..

    फ़्रैंक हुज़ूर: अब लौटते हैं आपकी राजनीति पर, 1988 में आप ज़िला कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन बने और 1989 में नेता जी मुख्यमंत्री बन गये। नेता जी ने 1987 से 89 तक पूरे प्रदेश में क्रांति रथ लेकर चले तो उसके बारे में कुछ बताइये?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! 1989 में केंद्र में दोबारा सरकार बन गई थी लेकिन सरकार बनने के बाद ज़्यादा दिन तक सरकार नही चल पाई थी। बाबरी मस्जिद प्रकरण के वजह से सब लोग अलग हो गये थे। इसे लेकर पहले केंद्र सरकार में झगड़ा हुआ फिर उसके बाद नेताजी ने इस्तिफा दिया था फिर चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने फिर उन्होंने भी इस्तिफा दिया उसके बाद नेताजी ने यहाँ से इस्तिफा दिया फिर चुनाव के मैदान में गये उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने।

    उसी दौर में कारसेवा निकली, कार सेवा में अधिकारियों ने गोली चलाई और मुझ पर भी उस केस में एफ़आइआर हुआ। जब पहली बार कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने तो उस सरकार में मुझपर बहुत से झूठे मुक़दमे हुए जिसके चलते 6 महिने तक मैं अंडरग्राउंड भी रहा फिर कोर्ट से स्टे आर्डर लिया। कार सेवकों पर जो भी लाठी चार्ज हुआ ,गोलियाँ चली वो अधिकारियों ने किया था उस समय तो मौक़े पर हम थे ही नही फिर भी फ़र्ज़ी मुक़दमे मुझपर कराये गये।

    फ़्रैंक हुज़ूर: कारसेवकों पर गोलियाँ चली, संविधान को, सामाजिक न्याय को और इस देश की धर्मनिर्पेक्ष राजनीति को बचाने के लिये नेताजी ने बहादुरी से क़दम उठाया, जिसका स्वागत देश की धर्मनिर्पेक्ष व सामाजिक न्याय पसंद आवाम ने किया और दूसरे तरफ़ भाजपा के लोगो ने मुल्ला मुलायम जैसे नारों को उछाला उसका ख़ूब प्रचार प्रसार किया गया। उस समय आपका कहाँ खड़े थे? आप क्या सोच रहे थे?

    शिवपाल सिंह यादव: हम तो पार्टी का काम करने लगे थे। इटावा और उसके आसपास के इलाक़ों में पार्टी का काम कर रहे थे। 1991-92 में जब बाबरी मस्जिद पर हमला किया तो भाजपा की सरकार चली गई उसके बाद 1993 में जब फिर से चुनाव हुआ तो नेताजी मुख्यमंत्री बने, कांशीराम से समझौता होने के बाद सरकार बनी थी। फिर वो सरकार 18 महिने चली कांशीराम ने समर्थन वापस ले लिया था तो सरकार गिर गई उसके बाद कुछ समय के लिये मायावती मुख्यमंत्री बनी फिर कल्याण सिंह कुछ दिन के लिये मुख्यमंत्री बने।

    नेताजी ने बाबरी मस्जिद को बचाने के लिये सारा पुलिस फ़ोर्स लगा दिया था……

    फ़्रैंक हुज़ूर: बाबरी विध्वंस के दिन आप नेताजी के साथ बैठे होंगे तो उस घटना को लेकर क्या बात हो रही थी?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! उस समय जब बाबरी मस्जिद टूटी तो मैं इटावा में था। नेताजी के समय में जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद पर हमला किया तब मैं लखनऊ में था। नेताजी ने तब भी बचा लिया था, पूरी पुलिस फ़ोर्स बाबरी मस्जिद को बचाने के लिये लगाई थी। उसके बाद जब 1992 में मस्जिद गिराई गई तब मैं इटावा में था प्रदेश के लोग सहमे दिखाई दे रहे था, बाबरी विध्वंस के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन शुरू हो गया था और भाजपा वाले बाबरी विध्वंस के समर्थन नारे लगा रहे थे। उस समय पूरे प्रदेश में हमारी पार्टी के लोगो ने भाजपा के खिलाफ ज़िलाधिकारियों को ज्ञापन दिया था और हम लोगो ने भाजपा का विरोध किया। उस समय सड़कों पर समाजवादी पार्टी के लोगों का भाजपा के लोगो से बहुत जगह तकरार भी हुआ, मुक़दमे भी लिखे गये।

    जैसे नेताजी ने बाबरी मस्जिद को बचाया था वैसे ही कांग्रेस भी चाहती तो बचा लेती….

    फ़्रैंक हुज़ूर: बाबरी मस्जिद पर जब हमला हुआ तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, नरसिम्हा राव तात्कालिक प्रधानमंत्री थे। आपको क्या लगता है कि बाबरी मस्जिद गिराने में कांग्रेस की भी मिली भगत थी?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! उस समय बचाया जा सकता था, वो प्रधानमंत्री थे। अगर चुप नही बैठे होते तो बचाया जा सकता था, जब संविधान की धज्जियाँ उड़ रही थी तब अगर चुप नही बैठते तो बचाया जा सकता था, देश के प्रधानमंत्री थे। जिस तरह से 1990 में नेताजी ने बचाया था उस तरह से बचाया जा सकता था।

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या कांग्रेस ने मंडल-कमंडल की राजनीति में कमंडल की राजनीति को हवा दी और देश में भाजपा की राजनीति को बढ़ने का मौक़ा दिया?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! चुप रहना ही एक तरह का समर्थन ही था, जब संविधान की धज्जियाँ उड़ रही थी कोर्ट में मामला पहुँच चुका था तो फिर प्रधानमंत्री को रक्षा करना चाहिये था।

    “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी”

    फ़्रैंक हुज़ूर: उसी दौर में मंडल आयोग लागू हुआ था। उस समय मंडल, कमंडल की राजनीति जैसे मुहावरे गढ़े जा रहे थे जिसमें मंडल की राजनीति नेता जी की राजनीति का मुख्य केंद्र था। समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में भी मंडल कमीशन को शामिल किया गया था। आज सबसे ज़्यादा हमले दलित-पिछड़ो के अधिकारो पर हो रहे हैं, इसे आप कैसे देखते हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! आरक्षण के मामले में जैसे इस समय पिछड़ो की संख्या 54 प्रतिशत से ज़्यादा हो गई है और पिछड़ो को अभी भी 27 प्रतिशत ही आरक्षण मिल रहा है। हमारी माँग है कि हर वर्ग, जाति को उसके जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण दो। पिछड़े हैं, अति पिछड़े हैं दलित हैं अति दलित हैं सबकी गिनती करके उनका हक दे दो। “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी”

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या आप लोग “संख्या के हिसाब से भागीदारी” के आंदोलन को तेज करने जा रहे हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: हाँ, इस मुद्दे को लेकर हम अभी पिछड़ो की एक बैठक बुलायेंगे फिर निर्णय लेंगे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: नवउदार नीतियों के बाद सरकारी कम्पनियों का भी नीजिकरण हुआ जिसका ख़ामियाज़ा दलित-पिछड़ो को भुगतना पड़ा क्योंकि प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण नीति को नहीं किया गया है। तो क्या आप प्राइवेट सेक्टर में भी प्रतिनिधित्व की बात करेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! प्राइवेट और सरकारी सभी में हिस्सेदारी मिलनी चाहिये जिसे लेकर हम लोग जल्द ही बैठक करेंगे और बड़ा सम्मेलन बुलायेंगे जिसमें हमारी यही माँग होगी।

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या जब आपकी पार्टी सत्ता में वापस आयेगी तो आप लोग इस प्रतिनिधित्व के मुद्दे को लेकर कोई क़ानून बनायेंगे जिससे सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों में सबको आबादी के हिसाब से हक़ मिले?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! ये हमारे हाथ में तो नही है लेकिन ये हमारा मुद्दा है और हम अपने राष्ट्रीय नेतृत्व को इस मुद्दे पर राय देंगे कि सरकार इसे लेकर क़ानून बनाये।

    फ़्रैंक हुज़ूर: आप अपने पहले चुनाव के बारे में कुछ बताईये?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! 1996 में जब नेताजी संसद में चले गये तो उसके बाद जसवंतनगर की सीट ख़ाली हो गई। उस समय मैने जसवंतनगर से पहला चुनाव लड़ा। पहली बार हम 13000 से जीते फिर जब दूसरा चुनाव हुआ तो वो चुनाव हम 52000 वोट से जीते इसी तरह तीसरा चुनाव लगभग 32000 से और चौथा चुनाव 81000 से जीते थे। इसमें दो बार हम मंत्री भी रहे। 2012 में मुझे मंत्री पद से बर्खास्त भी किया गया।

    मुझे जिस भी मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली उस विभाग में मैंने सबसे बेहतर काम किया। मुझपर एक भी आरोप नहीं है….

    फ़्रैंक हुज़ूर: परिवार में हुए विवाद को लेकर कुछ कहना चाहते हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! उसमें तो मुझे कुछ नही कहना है बस इतना कहना चाहूँगा कि 2012 में जब हम मंत्री बने जो भी हमें विभाग मिले मैने उसमें सबसे बेहतर काम किया। आजतक मुझपर कोई आरोप भी नही लगा है।

    पीडब्ल्यूडी में इतनी चौड़ी चौड़ी सड़के बना दी जो कभी नही बन सकती थी। पचास कोऑपरेटिव बैंकों में से पच्चीस बैंकों बंद होने कगार पर थी, मैने सभी बैंक चला दिये। कोऑपरेटिव का चुनाव मैने पूरी निष्पक्षता से करा दिया था कही से एक भी शिकायत नही मिली थी।

    राजस्व सहिंता राजस्व विभाग में 36 वर्षों से लागू नही हो पा रहा था मैने उसे लागू कराया जिससे किसानो को उनके दरवाज़े पर न्याय मिल जाय कही पर भी उसे भागना न पड़े। मैने बुंदेलखंड में कई बाँध बनाये थे वहाँ पारिछा में पानी पीने वाला बाँध भी बनाया था जिसका उद्घाटन अखिलेश ने किया।

    नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे व्यापार खत्म कर दिए, किसानो को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया…..

    फ़्रैंक हुज़ूर: उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानो के आत्महत्या की परम्परा कभी नही रही लेकिन हाल के दिनों में यहाँ किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये। अभी अखिलेश यादव ने महोबा का दौरा किया, वहाँ एक किसान ने आत्महत्या कर लिया था तो उस परिवार से मिलने गये थे। किसान बहुत ज़्यादा तनाव के दौर से गुज़र रहा है ऐसे में भारत सरकार इज़रायल के किसानी के मॉडल को यहाँ लागू करना चाहती है जोकि पूरे तरह मशीन पर आधारित है जबकी हमारे देश में अभी किसानो की स्थिति इतनी अच्छी नही है कि वो महँगे मशीनों को ख़रीद सके। किसानो की इस स्थिति पर क्या कहना चाहेंगे आप?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! जब मैं सिंचाई मंत्री था तो एक बार इज़रायल का दौरा किया था। इज़रायल मे तो बहुत ज़्यादा पानी की कमी है लेकिन हमारे यहाँ तो पानी की नही है। हमारे यहाँ मैनेजमेंट बहुत ख़राब है अगर हम बारिश के पानी को संग्रहित कर लेने में सफल हो जाएँ तो हमें कभी पानी की समस्या से नही जूझना पड़ेगा। हमारे यहाँ बारिश होती है तो बारिश का पानी नालों और नहरों के माध्यम से सीधा समुद्र में चला जाता है।

    मैने तो इज़रायल में देखा है कि जितना भी नाले का गंदा पानी होता है उसको पहले साफ़ कर लेते हैं फिर तालाब बनाकर उसमें डाल देते हैं जो सिंचाई के काम आ जाता है। हमारे यहाँ तो नदियों में बहुत समस्या है जैसे गंगा नदी ही गंदी होती जा रही है, भाजपा सरकार ने तो सफ़ाई अभियान भी चलाया है जिसका बजट बीस हज़ार करोड़ रखा है, चार साल को गये कुछ नही हुआ अभी तक।

    जब उमा भारती जल संसाधन मंत्री थी तब मैने उनसे कहा था कि हमें पाँच सौ करोड़ ही दे दो हम नदियों को साफ़ कर देंगे। अगर नदियाँ गहरी कर दि जाय, नाले के गंदे पानी को नदियों में डालने के बजाय बडे बडे तालाब बनाकर उसमें डाला जाय तो किसानो के लिये पानी की समस्या ही खत्म हो जायेगी। मैने मैनपुरी में दो और इटावा में तीन नदियों को गहरा किया है। पहले वहाँ एक भी फ़सल पैदा नही हो पाती थी अब तो दो फ़सल हो जाती है। अगर इस तरह से काम किया जाय तो समस्या खत्म हो जायेगी लेकिन इसके लिये सरकार को निर्णय लेना होगा। यहाँ तो सरकार निर्णय क्या ले रही है? नोटबंदी का निर्णय ले रही जिससे व्यापार खत्म हो गया। अब किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है? पहले तो किसान को पानी नही दे पाती सरकार फिर खाद महँगा हो गया है जिसके चलते किसान क़र्ज़ में डूबा हुआ है। अगर किसी तरह किसान फ़सल पैदा कर भी देता है तो उसके लिये बजार में अच्छे दाम नही मिलते क्योंकि बिचौलियों की लूट मची हुआ है। किसानो को इस बार भी समर्थन मूल्य न मिल सका क्योंकि अधिकारी और दलाल पैसे लूट लिये। अब किसान के परिवार भी चलाना है अपने बेटे, बेटी की शादी भी करनी है तो यह सब कैसे करेगा किसान इस हालात में, बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ाना भी है क्योंकि सरकारी स्कूल बर्बाद हो चुके हैं। यही सारी वजहें किसानो में तनाव का कारण है।।

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या आप अगले लोकसभा में चुनाव लड़ेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! अभी तो मैं विधायक हुँ, अभी मेरे पास चार साल का समय है लेकिन जो फ़ैसला या जो आदेश होगा करेंगे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: अगर राष्ट्रीय नेतृत्व आपको लोकसभा चुनाव लड़ने को कहते हैं तो आप चुनाव लड़ेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! वैसे तो मेरा मन नही है सांसद बनने का क्योंकि परिवार में बहुत से सांसद हैं तो हम विधानसभा ही पसंद करेंगे।

    मेरा तो हमेशा प्रयास रहा है कि सब लोग एक साथ आयें….

    फ़्रैंक हुज़ूर: बसपा सपा के गठबंधन को लेकर क्या कहना चाहेंगे? क्या कांग्रेस भी शामिल होगी इस गठबंधन में? सीटों के बँटवारा का आँकड़ा क्या होगा?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! अभी सीटों के बँटवारे को लेकर हमने कोई विचार नही किया है। गठबंधन में तो सभी को शामिल होना चाहिये। मेरा तो हमेशा प्रयास रहा है कि सब लोग एक साथ आयें। जब हमारी सरकार थी तब भी हमने प्रयास किया था, लालू,नीतीश, देवेगौड़ा, शरद, ओम प्रकाश चौटाला, कमल मोरारका, अंसारी बंधु और जितने भी छोटे छोटे विभिन्न जातियों के दल थे उन सबसे हमारी बात हुई थी। मैं तो पहले से ही जोड़ने की बात कर रहा था अगर हम सबको जोड़ लिये होते तो आज हम सरकार में होते। लेकिन अच्छा है अगर भाजपा को हराना है तो सबको एक साथ रहना चाहिये।

    फ़्रैंक हुज़ूर: इस चुनाव में कांग्रेस की भूमिका को कैसे देखते हैं? पिछले चुनाव में तो गठबंधन में थे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! कांग्रेस से हमारी बात कभी नही हुआ न तब हुई थी न अब हो रही है बाकि पार्टी के जो ज़िम्मेदार लोग हैं वो बात कर रहे हैं वो करें। हमारी सहमती रहेगी।

    फ़्रैंक हुज़ूर: राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच कुछ वर्षों में जो नज़दीकियाँ बढ़ी हैं उसको आप कैसे देखते हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! इस समय अगर भाजपा तो हराना है तो सब लोगो को एक साथ आना पड़ेगा। अब ये सब वो लोग समझे कि एक दूसरे से कैसे गठबंधन हो सीटों का बँटवारा कैसे हो, बाकि अगर शिर्ष नेतृत्व मुझसे सलाह लेना चाहेगा तो हम ज़रूर देंगे। अगर सलाह की ज़रूर नही होगी तो वो जो भी फ़ैसला लेंगे उसमें हमारी सहमती होगी।

    फ़्रैंक हुज़ूर: फूलपुर व गोरखपुर चुनाव में बसपा के सहयोग से जीत मिली। क्या इस सपा बसपा गठबंधन को लेकर आपसे भी कुछ बात हुआ था?

    शिवपाल सिंह यादव: नही, हमारी कोई बात नही हुई थी। इधर बीच दो बार प्रोफ़ेसर साहब से बात हुई है। अब अगर राष्ट्रीय नेतृत्व कोई सलाह लेना चाहेगा तो ज़रूर देंगे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: लोहिया जी के ज़माने में जब समाजवाद का उदय हुआ तो उस समय ग़ैर कांग्रेसवाद के लिये लोग एकजुट हो रहे थे। उसी आधार पर नेताजी ने अखिलेश को कांग्रेस से गठबंधन न करने को कहा था और आज भाजपा के विरोध में ऐसी स्थिति बन गई है कि कांग्रेस को साथ लेकर चलना पड रहा है। इस पर क्या कहना चाहेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! आचार्य नरेंद्र देव, लोहिया और जय प्रकाश जी के समाजवादी आंदोलन की राह पर चलकर नेता जी ने राजनीति की है। एक समय था जब ग़ैर कांग्रेसवाद चला था तब ये सब मिले था फिर कांग्रेस को हटाया था और जो इस समय भाजपा के खिलाफ एकजुटता का माहौल चल रहा है वो इसलिये हो रहा क्योंकि भाजपा ने जनता से जो भी वादे किये थे उसे पूरा कर पाने में असफल रही, वो चाहे किसानो का सवाल हो या नौजवानों का, सबको पंद्रह लाख देने की बात कही थी, हर साल दो करोड़ नौकरियाँ देने का वादा किया था।

    एक भी वादा न पूरा कर सकी भाजपा। सौ दिन के अंदर भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कही थी लेकिन हम तो देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार पाँच गुना बढ़ गया। इस समय थाने में जो व्यक्ति केस लिखवाने जाता है उससे भी पैसा लेता है थानेदार और अगर अज्ञात के नाम से केस दर्ज हो जाता है तो पुलिस उस पूरे इलाक़े से पैसा वसूलता है। मेरी तो सरकार से माँग है कि इस चार साल के अंदर जितने भी अधिकारी हैं उन सबकी सम्पत्ति की जाँच करा लें।

    नोटबंदी के समय का भ्रष्टाचार देखना हो तो बैंक कर्मचारियों के बैंक खाते चेक करा ले, इनकम टैक्स अधिकारियों के खाते चेक करा ले। अब जीएसटी को देख लीजिये जब जीएसटी लागू करना था तब बोला गया कि केवल एक टैक्स लगेगा लेकिन यहाँ तो हर चिज पर अलग अलग टैक्स लग रहा है।

    छोटे व्यापारी रोज का सौ पाँच सौ कमाते हैं उनपर जिएसटी का नियम लगा दिया वो गरीब अब कहाँ से चार्टर एकाउंटेंट लायेगा? कहाँ से वक़ील लायेगा?

    योगी जी ईमानदार हैं लेकिन उनके निचे के लोग भ्रष्ट हैं….

    फ़्रैंक हुज़ूर: उत्तर प्रदेश के सरकार के कार्यशैली पर क्या कहना चाहेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: केंद्र और प्रदेश दोनो के बारे में मैने सब कुछ तो बता हि दिया है, कोई व्यक्ति टिप्पणी मही करूँगा। हम ये तो जानते हैं कि योगी जी ख़ुद तो इमानदार हैं लेकिन निचे कितना भ्रष्टाचार है, उसपर तो अंकुश लगायें।

    Shivpal Singh Yadav

    पूरा प्रदेश जानता है कि अगर मुझे  मुख्यमंत्री बनना होता तो मैं 2003 में बन गया होता……

    फ़्रैंक हुज़ूर: एक आखिरी सवाल। बहुत से लोग कहते हैं कि शिवपाल सिंह यादव के अंदर मुख्यमंत्री बनने की चाह है, आप इसको किस तरह से देखते हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! अभी तक तो मेरे अंदर कभी भी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा नही रही है। पूरा प्रदेश जानता है कि अगर मुझे  मुख्यमंत्री बनना होता तो मैं 2003 में बन गया होता।

    उस समय हमारे 144 विधायक थे, चाहे कल्याण सिंह के विधायक हो या अजीत सिंह के विधायक हो सब हमारे साथ था बाकि जो 40 विधायक टूट कर आये थे वो भी हमारे साथ थे।

    उस समय नेताजी दिल्ली थे और नेताजी मना भी कर रहे थे कि सरकार नही बनेगी क्यों बना रहे हो? तो हमें बनना होता तो उसी समय मुख्यमंत्री बन गये होते। अभी तक तो मेरे मन में कभी नही आया लेकिन मौक़ा आयेगा तो देखेंगे। मेरे नसीब में नही है तो नही है। हमने देखा है बहुत से लोगो की ज़िंदगी निकल जाती है काम करते करते लेकिन विधायक तक नही बन पाते और बहुत से ऐसे लोग हैं नसीब वाले जिन्होंने कोई काम नही किया है वो एमएलसी, विधायक, मंत्री तक बने बैठे हैं।

    (इंटरव्यू का अनुवाद- रत्नेश यादव )