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सांस्कृतिक संवेदनहीनता के समय में ‘लोक’ —Prof Sanjay Dwivedi

Prof Samjay Dwivedi

जब समाज में गहरी सांस्कृतिक संवेदनहीनता जड़ें जमा चुकी हो और राजनीति अपने सर्वग्रासी चरित्र में सबसे हिंसक रूप से सामने हो, तो लोक और लोकजीवन की चिंताएं बेमानी हो जाती हैं। गहरी सांस्कृतिक निरक्षरता और जड़ता से भरे-पूरे नायक, लोक पर अपनी सांस्कृतिक चिंताएं थोपते हुए दिखते हैं। सबका अपना-अपना ‘लोक’ है और अपनी-अपनी नजर है। इस लोक का कोई इतिहास नहीं और कोई विचार नहीं है। उसकी सहज प्रवाही धारा के बरक्स अब ‘लोक’ को ‘लोकप्रिय’ बनाने और कुल मिलाकर ‘कौतुक’ बना देने के प्रयत्नों पर जोर है। शायद यही कारण है कि लोकसंस्कृति का भी कोई व्यवस्थित विमर्श हम आज तक खड़ा नहीं कर पाए हैं। कलाएं भी तटस्थ और यथास्थितिवादी होती हुई दिखती हैं।

हम देखें तो लोक, समाज की सामूहिक शक्ति का प्रकटीकरण है। जबकि बाजार में हम अकेले होते हैं। ऐसे समय में लोकसंस्कृति का संरक्षण व रूपांतरण जरूरी है। संत विनोबा भावे ने हमें एक शब्द दिया- लोकनीति। एक शब्द है- लोकमंगल। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लोकमंगल शब्द का उपयोग कई बार साहित्यिक संदर्भों में किया है। साहित्य, संस्कृति, कला या किसी भी ज्ञान का उद्देश्य लोकमंगल ही होना चाहिए। लोकमंगल में ही सभी कलाओं की मुक्ति है। अफसोस यह है कि लोक को जाने बिना तो तंत्र या जड़ नौकरशाही हमने विकसित की है। जिसकी आंखों में लोक के स्वप्न नहीं हैं। इसलिए हम देखते हैं कि राज अलग जा रहा है और समाज अलग। समाज और राज की यह दूरी हर दौर में बनी रही है। हमें देखना होगा कि मूक होने के बाद भी लोक की एक सामूहिक चेतना है। जड़ों में रचा-बसा मन ही इसे महसूस कर सकता है। यह लोक प्रबुद्ध है किंतु वाचाल नहीं है।  इसीलिए कहा जाता है कि लोकमानस के पास भाषा नहीं होती, भाव होते हैं। बाजार और मीडिया के इस शोर में लोकमन को पढ़ने का अवकाश भी किसके पास है? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे, “हमारा जनसमूह निरक्षर है, मूर्ख नहीं।” लोक की मूल वृत्ति ही है- ‘आनंद’। लोक आनंद में ही विचरता है।

हम देखें तो सारी लोकपरंपराएं, लोकाचार, लोक में व्याप्त गीत-संगीत, प्रर्दशन कलाएं आनंद के ही संसार को रचती और व्यापक बनाती हैं। यहां आनंद का आशय धन-वैभव से पैदा हुए आनंद से नहीं है। यह आनंद है ह्दय का आनंद। आंतरिक सुख और आनंद। जहां अभावों में भी एक मस्ती है। माटी की महक से ही जीवन महकता है। प्रकृति की ताल पर जीवन चलता और नाचता है। प्रकृति से संवाद की यह शैली जैसे-जैसे हमसे दूर जाती है हमारे दुख, तनाव और अवसाद बढ़ते चले जाते हैं। आनंद की उपस्थिति के लिए, उसे महसूसने के लिए शांति चाहिए। आनंद, शांति में ही पलता और विकसित होता है। शांति होती है, स्थिरता से। यह स्थिरता मन की भी है, जीवन की भी है और इसलिए शांत, आनंदमय जीवन हमारी परम आकांक्षा है। लोकमंगल की कामना इसलिए हमारी सबसे प्रिय कामना है, क्योंकि इसमें इस भूमि और राष्ट्र का भी मंगल है। इन अर्थों में लोकमंगल ही राष्ट्रमंगल है। जबकि आज बन रहे विश्वग्राम (ग्लोबल विलेज) में लोक कहां है? उसकी संस्कृति कहां है? उसके भाव कहां हैं? उसकी सांसें कहां हैं? उसके सपने कहां हैं? उसका राग कहां है? आप देखें तो हिंदी का हर बड़ा कवि लोक से आता है। तुलसी, नानक, रैदास, कबीर, मीराबाई, रहीम सब लोक से आते हैं। हमारा जो वैद्य है वह भी ‘कविराय’ है। लोक साहचर्य और संवाद की पाठशाला है। यहां आत्मीय संपर्क, समान संवेदना, समान अनुभूति और एकात्म फलता –फूलता है। यहां विभेद नहीं है। आत्मीयता यहां मूल तत्त्व है। ग्लोबल विलेज की अवधारणा एक अलग तरह की भावना है। जबकि लोक का संगीत आत्मा का संगीत है। लोक यहां अपने राग, रंग और भाव रचता है। वह मनुष्य के मन को छूता है और उससे संवाद करता है। नए बाजार की अवधारणा में लोक का विचार नहीं है। लोक को मिटाने की शर्त पर ही यह बाजार अपना विस्तार करता है। जल, जंगल और जमीन को यूं ही बाजार लोलुप निगाहों से नहीं देख रहा है। इसके कारण बहुत प्रकट और जाहिर हैं।

हम विचार करें तो पाते हैं कि 1991 भारत में उदारीकरण की आर्थिक नीतियों को लागू होने का साल है। यह साल सामाजिक मूल्यों और समाज के बदलाव का भी साल है। 1990 से लेकर 2019 तक बदलाव की यह गति तेज ही हुई है। भारत इन सालों में जितनी तेजी से बदला उतना सदियों में नहीं बदला। यह परिर्वतनों का समय भी था और मीडिया क्रांति का भी समय था। इस समय को ‘मूल्यहीनता के सबसे बेहतर समय’ के रूप में याद किया जाना चाहिए। यह समय एक कठिन समय था। जिसमें लोग जड़ों से उखड़ रहे थे। जंगलों से भगाए जा रहे थे। गांव के गांव लुप्त हो रहे थे या तथाकथित नगरीकरण के नकारात्मक प्रभावों से जूझ रहे थे। पूरी दुनिया को एक रंग में रंगने की जुगत और जुगाड़ें तेज हो रही थीं। बाजार के जादूगरों का हमला इसी लोक पर था, जो सहमा सा इसे देख रहा था। आज हमारा लोक जीवन अगर बाजार की इस चमक में कहीं दिखता है या प्रयोग हो रहा है तो कौतुक और तमाशे की तरह। वह तमाम चमकती चीजें में एक सजावटी चीजों की तरह है जिसे मौके-बेमौके दिखाया जाता है। आज का विश्वग्राम इसीलिए सर्वग्राही भी और सर्वग्रासी भी। उसके ग्रास में लोक भी है, भाव भी हैं, मन भी हैं, संवेदनाएं भी हैं। भारत के मन से कटे लोग भारत के फैसले ले रहे हैं। ऐसे कठिन समय में हमारे गांव सहमे हैं, नदियां सहमी हुई हैं, खेतों की मेड़ों पर बैठे किसान सहमे हुए हैं। इस लोकतंत्र को जनतंत्र में बदलते देखना भी रोचक है। ‘कोलोनिजम आफ माइंड्स’(वैचारिक साम्राज्यवाद) का यह खेल सफल होता दिखता है। ‘विचारों की कंडीशनिंग’(अनुकूलन) की जा रही है। हमारी विविधता और बहुलता को खतरा साफ दिखता है। ‘भारत’ को जीना है तो उसे ‘भारत’ ही बनना होगा, पर इस आंधी में हमारे पैर टिकेंगें क्या, यह बड़ा सवाल है।

Prof Sanjay Dwivedi

अध्यक्ष, जनसंचार विभाग,
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर,
भोपाल-462011 (मध्यप्रदेश)

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