Author: संपादक मंडल

  • तुम अपने बच्चों से तुरंत क्षमा मांगो — Prof Puneet Shukla

    तुम अपने बच्चों से तुरंत क्षमा मांगो — Prof Puneet Shukla

    Prof Puneet Shukla

    ​तुम
    अपने उन बच्चों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इस बात पर पीट दिया
    क्योंकि उन्होंने तुम्हारी बात नहीं मानी।

    तुम
    अपने उन बच्चों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इसलिए मार दिया या छोड़ दिया
    क्योंकि उन्होंने अपनी पसन्द का जीवनसाथी चुना।

    तुम
    अपने उन पड़ोसियों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इसलिये नफ़रत किया
    क्योंकि वे दूसरे धर्म, जाति या विचारधारा के व्यक्ति थे।

    तुम
    अपने उन पड़ोसियों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इसलिये सज़ा दिया
    क्योंकि उनके पूर्वजों ने कुछ गलतियाँ की थीं।

    तुम
    अगर इस तरह क्षमा माँगोगे तो
    तुम्हारी ग़लतियों में सुधार नहीं होगा
    लेकिन, यह संसार थोड़ा सा सुधर जायेगा
    और, आने वाली पीढ़ियों के लिये
    रहने लायक एक अच्छी दुनिया का निर्माण शुरू होगा।

    Prof Puneet Shukla

  • सौ से अधिक तालाबों के पुनरुद्धार व निर्माण कार्यों में भयंकर भ्रष्टाचार की जांच : जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा थे ब्रांड अम्बेसडर — Ashish Sagar

    सौ से अधिक तालाबों के पुनरुद्धार व निर्माण कार्यों में भयंकर भ्रष्टाचार की जांच : जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा थे ब्रांड अम्बेसडर — Ashish Sagar

    Ashish Sagar
    Environment Representative,
    Ground Report India

    उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार में बुंदेलखंड के 101 तालाबों के पुनरुद्धार-खुदाई कार्यो की वर्तमान भाजपा सरकार ने स्थानीय लोगों द्वारा की गई अनियमितता की जांच की मांग को स्वीकार करते हुए जांच शुरू कराई। महोबा के चंदेलकालीन 56 बड़े तालाबों में 100 करोड़ रुपये से हुआ था मिट्टी निकासी का काम। जलनिगम /सिंचाई विभाग महोबा के अधिशाषी अभियंता समेत तीन अभियंताओं पर कार्यवाही की जा चुकी है।

    मुख्यबिंदु

    • तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने महोबा के इस ड्रीम प्रोजेक्ट का ब्रांड अम्बेसडर जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा को बनाया था, मिला था यश भारती सम्मान
    • सम्मान पाने वालों को 50 हजार रुपये मासिक पेंशन दिए जाने का एलान था जिसे मौजूदा सरकार ने बन्द कर दिया है।
    • अखिलेश यादव के कार्यकाल में महोबा सहित बाँदा में सिंचाई प्रखंड / जलनिगम ने टेंडरिंग व्यवस्था कर जेसीबी के द्वारा तालाबों का गहरीकरण कार्य किया गया था।
    • अधिकारियों की सेटिंग से काम पाए कार्यदाई ठेकेदारों ने लाखों रुपये की मिट्टी तालाबों से निकाल कर बेची थी।


    सीएम योगी की सरकार में महोबा के चरखारी से बीजेपी नेता गंगाचरण राजपूत ने हाई कोर्ट में पीआईएल दायर की और चरखारी समेत महोबा के 56 तालाबों में मिट्टी खुदाई कार्य की अनियमितता में जांच की मांग की थी। सीएम योगी ने बीते मई माह में पीडब्ल्यूडी के मुख्य अभियंता अंबिका सिंह के नेतृत्व में टीम गठित कर जांच कराई, इसकी रिपोर्ट सीएम को प्रेषित की गई है।

    उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 मई-जून माह में 100 करोड़ की लागत से अकेले महोबा में 56 तालाब मसलन शहर के कीरत सागर (पुरातत्व के संरक्षण में), मदन सागर, कल्याण सागर, किराड़ी, कुलपहाड़ तहसील के मोहन तालाब, बड़ा तालाब, बेला सागर, पचपहरा, उर्वरा, सिजहरी, पवा, राजमोहन सिंह तालाब, बिलखी, दाऊपुरा, चरखारी नगर के चंदेल कालीन कोठी ताल, जय सागर, विजय सागर, मलखान सागर, रपट तलैया, गुमान बिहारी सागर, वंशिया, गोला घाट, श्रीनगर तहसील के तालाब में बड़े स्तर पर सिल्ट-गाद हटाने के नाम पर मिट्टी खुदाई का कार्य मशीनों से हुआ था। गौरतलब है तब भी कार्यदाई संस्था जलनिगम -सिंचाई प्रखंड सहित ठेकेदार पर मिट्टी खोदने, मिट्टी बेच लेने के आरोप लगे और शिकायत किसानों ने की थी लेकिन मामला दबाया गया था।

    वर्ष 2016 जून में बुंदेलखंड के भयावह सूखा और अखिलेश सरकार के इन तालाबों का पुनरुद्धार कार्य देखने देश के बड़े पत्रकार फील्ड विजिट पर आए थे। रिपोटिंग के वक्त वरिष्ठ पत्रकारों यथा श्री अरबिंद कुमार सिंह (राज्यसभा संवाददाता दिल्ली), बीबीसी हिंदी लखनऊ के रीजनल हेड समीर आत्मज मिश्रा, तत्कालीन समय ओपीनियन पोस्ट की विशेष संवाददाता संध्या द्विवेदी (अब आजतक डिजीटल कार्यरत) ने महोबा के इन तालाबों सहित झाँसी, बाँदा, चित्रकूट के पाठा बीहड़ों, मध्यप्रदेश के पन्ना जनपद में शिवराज सरकार के तालाबों का रिवाइवल कार्य देखा था।

    मध्यप्रदेश (एमपी) के ज़िला पन्ना में भी तालाबों की खुदाई मिट्टी निकासी मानव श्रम की बनिस्बत जेसीबी से हुई थी। जबकि शासन की मंशा थी यह कार्य मजदूरों से लिया जाए ताकि सूखा प्रभावित क्षेत्र में जलसंकट समाधान के साथ मौसमी रोजगार भी मिले। कमोवेश जो टेंडरिंग तरीका यूपी बुंदेलखंड के बाँदा, महोबा में हुआ वही मध्यप्रदेश के पन्ना में हुआ।

    आज यूपी बुंदेलखंड के यह बे-पानी तालाब एक जनपद महोबा में ही 100 करोड़ रुपये खर्च कर जांच की गिरफ्त में है। बड़ी बात है पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने इन तालाबों पर खर्च धनराशि और बुंदेलखंड को पानीदार बनाने की कवायद को विधानसभा चुनाव के दौरान हर बड़े समाचार पत्रों में जलपुरुष के साथ विज्ञापन देकर चुनावी माहौल बनाया था।

    जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा

    यहां तक कि स्वयं जलपुरुष ने महोबा के मदन सागर में श्रमदान की प्रतीकात्मक रस्में फावड़ा चलाकर पूरी की थी। समूचे बुंदेलखंड में पानी पिलाने की यह रणनीति लखनऊ से दिल्ली तक कौतूहल का विषय बनी थी। महत्वपूर्ण तथ्य है कि महोबा के कीरत सागर में खुदाई के बाद पौधरोपण कार्य हुआ जो चरखारी में भी किया गया। उरई की संस्था परमार्थ ने यह कार्य तत्कालीन डीएम वीरेश्वर सिंह के साथ किया। यह अलग बात है आज कीरत सागर समेत चरखारी के तालाबों में न पौधों की सलामती रही और न इन सभी तालाबों में एजेंडा प्रोजेक्ट के मुताबिक रौनक ज़िंदा बची।

    मुख्यमंत्री योगी ने बुंदेलखंड के 101 तालाबों की जांच रिपोर्ट तलब कर महोबा के कीरत सागर में पुनरुद्धार कार्य मे अनियमितता बरतने वाले तत्कालीन अधीक्षण अभियंता सिंचाई कार्य मंडल बाँदा डीएस सचान,तत्कालीन अधिशासी अभियंता सिंचाई प्रखंड महोबा विशंभर को निलंबित कर अनुशासनिक कार्यवाही के आदेश दिए है। इनके अतिरिक्त तत्कालीन मुख्य अभियंता (बेतवा) सिंचाई विभाग झाँसी, नवनीत कुमार (सेवानिवृत्त) के विरुद्ध कार्यवाही का आदेश किया है। इन पर परियोजना स्वीकृति लागत 197.76 लाख के सापेक्ष 508.11 लाख की तकनीकी स्वीकृति का बगैर अनुबंध काम कराने का आरोप है। बुंदेलखंड को तत्कालीन समय गोद लेने वाले आज दूसरे अभियान में व्यस्त है और तालाबों पर भ्रस्टाचार की जांच हो रही है।

    हकीकत ये कि इस 100 करोड़ के बंदर-बांट की तरह यदि बाँदा के तत्कालीन जिलाधिकारी (डीएम) हीरालाल के ‘कुआँ तालाब जियाओ’ भूजल बढ़ाओ-पेयजल बचाओ (लिम्का बुक रिकॉर्ड) की भी जांच हो जाये तो पूत के पांव पालने में दिखते है वाली कहावत चरितार्थ हो सकती है। फिलहाल बुंदेलखंड की ये कागजी तालाब रिवाइवल गतिविधि कार्यवाही की जद में हैं।

    आशीष सागर, पर्यावरणविद व पत्रकार

  • Video: Aadi reads words himself (वीडियो: आदि शब्द स्वयं पढ़ लेते हैं)

    Video: Aadi reads words himself (वीडियो: आदि शब्द स्वयं पढ़ लेते हैं)

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    साढ़े तीन वर्षीय आदि पूरी एबीसीडी जानते हैं, किस अक्षर को किस ध्वनि के साथ पढ़ते हैं, यह भी जानते हैं। इसलिए अब शब्दों को एबीसीडी अक्षरों व ध्वनि से संयुक्त करके पढ़ लेते हैं। एबीसीडी के अक्षरों को पहचानने, ध्वनि को समझना व शब्दों को अक्षरों व ध्वनि से संयुक्त करके पढ़ना। यह सब आदि ने अपने आप सीखा है। मैंने या डा० क्लेयर ने कभी आदि को कुछ रटाया नहीं है, न ही आदि ऐसे किसी स्कूल जाते हैं जहां यह सब सिखाया पढ़ाया रटाया जाता हो।

    आदि ने यह सबकुछ अपने आप खेल-खेल में सीखा है। आदि पिछले कई महीनों से अपना नाम लिख लेते हैं। आजकल अपने आप एबीसीडी लिखने का अभ्यास भी करते रहते हैं। अंको को भी लिखने का अभ्यास करते रहते हैं। आदि यह सब अपने आप खेल-खेल में मस्ती से सीखते समझते रहते हैं। मैं या डा० क्लेयर कभी भी आदि पर कभी भी किसी प्रकार का दबाव नहीं डालते हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश महासंघ : असंभव नहीं केवल ईमानदार भावना व दूरदृष्टि चाहिए

    भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश महासंघ : असंभव नहीं केवल ईमानदार भावना व दूरदृष्टि चाहिए

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    दरअसल हम भारतीयों में से अधिकतर लोग अपने मन के अंदर नफरत व तिरस्कार की बहुत गहरी परतों को बनाते हुए अपना जीवन जीते हैं। हमारे रोजमर्रा के जीवन का आधार प्रेम न होकर ईर्ष्या द्वेष जलन इत्यादि होता है। यही कारण है कि वयस्क होने के पहले ही भाई-भाई, भाई-बहन, बहन-बहन तक में ईर्ष्या जलन व नफरत इत्यादि बहुत गहरे तक पैठ जाता है। इतना गहरे पैठता है कि हमारा पूरा जीवन ही नफरत, ईर्ष्या, द्वेष जलन इत्यादि से ही नियंत्रित होने लगता है। परिणामतः हम ढोंग, फरेब व दिखावे में जीवन जीने लगते हैं, और इसी तरह जीने को जीवन जीने का सलीका मान लेते हैं।

    जब अपने ही परिवार, अपने सगों के प्रति हम ऐसे भाव रखते हैं तो कल्पना कीजिए कि जिनको हम अपना दुश्मन मानने की मानसिकता के साथ बचपन से पले-बढ़े होते हैं, उनके प्रति कितने भयंकर ऋणात्मक भाव रखते होंगे। यही ऋणात्मकता हमें मनुष्य के तौर पर बहुत ही अधिक पीछे धकेलती चली जाती है। हमें पता ही नहीं चलता लेकिन हम मानसिक, भावनात्मक व वैचारिक रूप से अधिक और अधिक कुरूप मनुष्य बनते चले जाते हैं।

    पाकिस्तान हो या बांग्लादेश भारत में जो भी वैध-अवैध शरणार्थी आए हैं, उनका बहुत बड़ा हिस्सा गैर-मुस्लिमों का रहा है। इसका कारण संभवतः यह हो सकता है कि पाकिस्तान व बांग्लादेश आधिकारिक तौर मुस्लिम देश हैं और वहां गैर-मुस्लिमों को सामान्य नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं।

    कारण कई हैं, आपस में बहुत अधिक गढ्ढमढ्ढ भी हैं। हमारी सामाजिक कंडीशनिंग, नफरत, अजानकारी तथा जानकारी के प्रति उपेक्षा की मानसिकता, पूर्वाग्रह इत्यादि कई आवेगों इत्यादि के कारण हमारे मन में यह चित्रण रहता है कि पाकिस्तान व बांग्लादेश निहायत ही सड़ियल देश हैं जहां के लोग घिसटते हुए जीवन जीते हैं।

    इसी तरह की मानसिकताओं के कारण, पूर्वाग्रहों के कारण हम लोगों को यह लगता है कि ऊंची बिल्डिंगे खड़ी करने, सड़के बनाने, चकाचौंध होने से हम विकसित देश बनने की ओर लगातार तेजी से बढ़ रहे हैं। परिणामतः हम विकसित देशों के विकास को ढंग से, गहराई से जाने समझे बिना, भोंढे तरीके से सतही तौर पर नकल करने में पूरी ऊर्जा के साथ जुटे रहते हैं। हम अपने जीवन, परिवार, समाज व देश को बेहतर बनाने के लिए जीवन के प्रति समझ व दृष्टि विकसित करते ही नहीं हैं।

    हम यह देखना व स्वीकारना नहीं चाहते हैं कि पाकिस्तान हो, बांग्लादेश हो या भारत सभी के समाजों व लोगों की मानसिकता व कंडीशनिंग का चरित्र समान है। तीनों देशों के समाज व लोग सामंती व भ्रष्ट मानसिकता के हैं। तीनों ही देशों के समाज, परिवार, लोग, व्यवस्थाएं व तंत्र कागजी लोकतंत्र हैं, न कि चारित्रिक तौर पर लोकतंत्र।

    हम यह देखना व स्वीकारना नहीं चाहते हैं कि जैसे हमने अपने आपको बाजार बना लिया वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश भी तो अपने आपको बाजार बना सकते हैं। जैसे हमारे यहां करोड़ों लोग उपभोक्ता के रूप में उपलब्ध हैं, वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी करोड़ों लोग उपभोक्ता के रूप में उपलब्ध हैं। जैसे हमारे यहां विदेशी कंपनियों ने अपना बाजार स्थापित करने के लिए चकाचौंध का विकास किया, उसी तरह पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी विदेशी कंपनियों ने अपना बाजार स्थापित करने के लिए चकाचौंध का विकास किया।

    हम यह देखना व स्वीकारना नहीं चाहते हैं कि जैसे भारत से पढ़े लिखे इंजीनियर व अन्य लोग विदेश जाते हैं वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश से भी जाते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि जैसे हम अपने बच्चों को घर, जमीन जायदाद बेचकर या गिरवी रखकर या बेईमानी निर्लज्जता झूठ फरेब भ्रष्टाचार से कमाए गए पैसों से विकसित देशों के संस्थानों में डिग्री पढ़ने के लिए भेजते हैं, वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश के लोग भी अपने बच्चों को भेजते हैं। विकसित देशों में भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश से आने वाले छात्रों का बहुत ही कम प्रतिशत छोड़कर जाते हैं भारी भरकम फीस देकर पढ़ने लेकिन माता-पिता झूठ बोलते हैं कि छात्रवृत्ति पर पढ़ने गए हैं। बचपन से लेकर मृत्यु तक पूरा जीवन ढोंग, झूठ व दोहरेपन में ही लिप्त रहता है, इसी तरह जीने को हम लोगों ने व्यवहारिकता मान लिया है, स्मार्टनेस मान लिया है। 

    हम यह देखना व स्वीकारना नहीं चाहते हैं कि पूजा-पाठ के तौर तरीकों इत्यादि जैसी कुछ बातों को छोड़ भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश के समाज व लोगों में चारित्रिक अंतर नहीं है। सैकड़ो-हजारों वर्षों की कंडीशनिंग को जीवन के प्रति सोच में आमूलचूल परिवर्तन किए बिना परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि अलग-अलग देश बन जाने के बावजूद, कई दशक गुजर जाने के बावजूद मानसिकता व कंडीशनिंग में चारित्रिक अंतर नहीं आया है। 

    हम कोरे व सतही राष्ट्र-गौरव के दंभ में इस कदर डूबे रहते हैं कि हम देखने व सोचने समझने की दृष्टि का विकास ही नहीं होने देते हैं, इतना ही नहीं दूसरों के द्वारा इस ओर किए जाने वाले प्रयासों का उपहास करते हैं, तिरस्कृत करते हैं, उपेक्षित करते हैं। ऊपर से हमारी राजनैतिक-साक्षरता मतलब करेला ऊपर से नीम चढ़ा जैसी स्थिति। हम यह समझना व स्वीकारना ही नहीं चाहते कि तीनों देशों के समाजों व लोगों का मूल चरित्र समान है, जबकि तीनों देशों के लोगों के चरित्र की स्थिति अपवाद छोड़ स्थिति-गति-परिस्थिति कमोबेश एक जैसी है, बाहरी आवरणों में कुछ अंतर भले ही हो सकता है।

    चूंकि समाज एक ही था, तानेबाने का चरित्र कैसा भी रहा हो लेकिन बहुत गहराई से सामाजिक तानाबाना बुना हुआ था। देशों का अलग होना राजनैतिक सीमाओं का अलगाव था। समाज व लोगों का मूल चरित्र दशकों के राजनैतिक सीमाओं में अंतर के बावजूद समान ही रहा है। सामंती नौकरशाही, भ्रष्टाचार इत्यादि का चरित्र भी कमोबेश समान है। 

    विज्ञान, आधुनिक बाजार व आर्थिक तंत्रों ने जाति-व्यवस्था को कमजोर होने के लिए विवश किया है, भले ही शोषक वर्गों/जातियों का षणयंत्र व पुरजोर प्रयास रहता हो कि समाज व लोग जाति-तंत्रों में ही फसे रहें। यदि राजनैतिक दुराग्रहों से परे हम जाति व धर्म की गुलामी से स्वयं को मुक्त करके अपनी अगली पीढ़ियों, अपनी संतानों, अपने समाज व अपने देश के बारे में ईमानदारी से वस्तुनिष्ठता से विचार करें व निर्णय लें तो भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश के महासंघ की स्थापना सरलता से संभव है। यदि ये तीन देश महासंघ की स्थापना करते हैं तो यह सुनिश्चित है कि निकट भविष्य में इस महासंघ में नेपाल, म्यमनार, श्रीलंका, मालद्वीप व अफगानिस्तान भी स्वयं को सम्मिलित करना चाहेंगे।

    भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

    भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • बांग्लादेश — इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास

    बांग्लादेश — इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ढाका, राष्ट्रीय राजधानी बांग्लादेश

    बांग्लादेश का नाम आते ही हम भारतीयों के जेहन में ऐसा चित्रण आता है जैसे भारत के किसी बहुत पिछड़े हुए गांव, जहां कोई सुविधाएं नहीं, लोग बाग किसी तरह घिसटते हुए जीवन गुजार रहे होते हैं। रहने के लिए ढंग के घर नहीं, ढंग की सड़के नहीं। स्कूल नहीं, यूनिवर्सिटी नहीं, सुख सुविधा नहीं। ऐसा ही कुछ चित्रण बनता है हमारे जेहन में।

    पड़ोसी देशों विशेषकर मुस्लिम-धर्म की बहुतायत वाले पड़ोसी देशों के प्रति बचपन से ही हमारा माइंडसेट ही ऐसा बना दिया जाता है कि हमें लगता है कि भारत बहुत अधिक विकसित है और पाकिस्तान व बांग्लादेश अति पिछड़े देश हैं, वहां बैलगाड़ियों पर लोग चलते हैं। इसके अतिरिक्त बांग्लादेश से आए हुए शरणार्थियों व घुसपैठियों से जुड़े मुद्दों को दशकों से इस प्रकार का राजनैतिक रूप दिया जाता रहा है कि हम भारतीयों को लगता है कि मानो बांग्लादेश में लोग अभी भी गुफाओं या झोपड़ियों या मिट्टी के बने घरोंदो या छोटे-मोटे घरों में रहते हैं।

    हम यह नहीं सोच पाते हैं कि जैसे हम भारत में विदेशी कंपनियों की कार्यशालाओं के लिए सस्ती जमीनें, सस्ता कच्चा माल, प्राकृतिक संसाधन व सस्ता मानव श्रम उपलब्ध कराते हैं, उसी तरह पाकिस्तान व बांग्लादेश भी तो उपलब्ध करा सकते हैं। हम यह सोचने की बजाय विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में स्थापित कार्यशालाओं में बनी वस्तुओं व उपकरणों के बारे में यह सोचते हैं कि यह हमारे देश की उपलब्धि है और हम राष्ट्र-गौरव का दंभ जीने की कोशिश में जुट जाते हैं। जबकि इन कंपनियों की कार्यशालाएं भारत के अलावा अनेक अन्य देशों में भी होती हैं, जहां भी उन्हें सस्ता कच्चा माल, सस्ता मानव श्रम उपलब्ध हो जाता है।

    हम यह नहीं सोच पाते हैं कि जैसे हमने अपने आपको बाजार बना लिया वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश भी तो अपने आपको बाजार बना सकते हैं। जैसे हमारे यहां करोड़ों लोग उपभोक्ता के रूप में उपलब्ध हैं, वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी करोड़ों लोग उपभोक्ता के रूप में उपलब्ध हैं। जैसे हमारे यहां विदेशी कंपनियों ने अपना बाजार स्थापित करने के लिए चकाचौंध का विकास किया, उसी तरह पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी विदेशी कंपनियों ने अपना बाजार स्थापित करने के लिए चकाचौंध का विकास किया।

    1947 से 1971 तक मतलब जब तक बांग्लादेश स्वयंभू राष्ट्र नहीं बना था, तब तक तो बांग्लादेश की स्थिति बहुत ही अधिक खराब थी। 1971 को पाकिस्तान से अलग होने के बाद बांग्लादेश ने धीरे-धीरे खड़ा होना शुरू किया। जनसंख्या घनत्व बहुत होने, निरक्षरता बहुत अधिक होने तथा प्राकृतिक आपदाओं से भयंकर रूप ग्रस्त इस देश बांग्लादेश ने धीरे-धीरे जूझते हुए अपना बहुत अधिक विकास किया है। शिक्षा व स्वास्थ्य पर बेहतर करने के लिए प्रयासरत है।

    आइए इस फोटो-लेख में फोटो के माध्यम से बांग्लादेश में इन्फ्रास्ट्रक्चर वाले विकास को जानने समझने का प्रयास करते हैं साथ ही भारत व बांग्लादेश में विकास के प्रति मानसिकता की चारित्रिक समानता को भी समझने का प्रयास करते हैं। फोटो बांग्लादेश के विभिन्न इलाकों की हैं।

    भवन

    शिक्षण संस्थाएं

    स्कूल
    यूनिवर्सिटीज

    अस्पताल

    माल्स/सुपर मार्केट्स

    सड़कें

    जल यातायात

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

    भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    समय-समय पर भारत में नेताओं के बयान आते रहते हैं व आम लोग बातचीत में कहते रहते हैं कि पाकिस्तान भेज दो या पाकिस्तान चले जाओ। इसका मतलब यह निकलता है कि जैसे पाकिस्तान में लोग खानाबदोश की तरह रहते हैं। पाकिस्तान में सड़कें नहीं हैं, सुविधाएं नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं हैं, शिक्षा नहीं है, नागरिक सुविधाएं नहीं हैं। ऐसा ही और भी बहुत कुछ।

    हम भारतीय विशेषकर हिंदू-धर्म के अनुयाई इस कल्पना में जीते हैं कि पाकिस्तान में विकास का ककहरा तक नहीं होगा, बहुत बुरी गत से लोग रहते होंगे। हम यह भूल जाते हैं कि भारत व पाकिस्तान का समाज एक ही था। इसलिए धार्मिक मामलों को छोड़कर समाज की मानसिकता व कंडीशनिंग कमोबेश समान ही रही है। विभाजन के बाद मानसिकता व कंडीशनिंग में कुछ बहुत बदलाव आए हो सकते हैं, लेकिन चारित्रिक मूल-आधार समान है।

    जैसे भारत ने तीन-तिकड़म से परमाणु बम, मिसाइल इत्यादि बनाए। पाकिस्तान ने भी उसी तरह के तीन-तिकड़म से परमाणु बम, मिसाइल इत्यादि बनाए। जैसे भारतीय समाज ने अपने लिए गैर-वैज्ञानिकों को महान वैज्ञानिकों के रूप प्रायोजित किया ताकि राष्ट्र-दंभ को तृप्त किया जा सके। उसी तरह पाकिस्तान समाज ने अपने लिए गैर-वैज्ञानिकों को महान वैज्ञानिकों के रूप में प्रायोजित किया ताकि राष्ट्र-दंभ को तृप्त किया जा सके।

    विकसित देशों में भारतीयों की संख्या पाकिस्तानियों की तुलना में कुछ अधिक हो सकती है, लेकिन यदि जनसंख्या का कितना प्रतिशत विकसित देशों में अनिवासी के रूप में रहता है तो पाकिस्तान के लोगों का प्रतिशत अधिक निकलेगा। भारतीयों की तरह पाकिस्तानी भी विकसित देशों में बड़े व प्रतिष्ठित पदों पर काम करते हैं। विकसित देशों में पाकिस्तानियों को जिम्मेदार व मेहनती लोगों के रूप में माना जाता है।

    जहां विकसित देशों के लोग खूबसूरत लकड़ी के घरों में रहना पसंद करते हैं, घर छोटा भी हो तब भी बागवानी रखते हैं, घरों को हवादार व प्रकाश से भरपूर बनाते हैं। वहीं हम भारतीय इन्फ्रास्ट्रक्चरल-चकाचौंध को विकास मानते हैं। हम पेड़-पौधों को काट-काट कर कांक्रीट के जंगल खड़ा करने को विकास मानते हैं। चकाचौंध को विकास व उपलब्धि मानने के कारण हमारा समाज भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा है, क्योंकि पैसे से चकाचौंध खरीदी जा सकती है। ऐसी ही मानसिकता पाकिस्तान-समाज की है। पाकिस्तान-समाज चकाचौंध वाले विकास के मामले में भारत-समाज से कुछ कदम आगे ही है। चूंकि दोनों देशों के समाजों की मानसिकता व मूल चरित्र समान है इसीलिए सामाजिक विकास इत्यादि के मामलों में दोनों देशों की दुनिया में रैंकिंग कुछ कम-अधिक एक जैसी रहती है।

    यदि हम भारतीय-समाज यह सोचते हैं कि सौ दो-सौ साल बाद भारत दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी में आए तो हमें मौलिक होना पड़ेगा, हमें लोकतांत्रिक सोच का होना पड़ेगा, हमें विजनरी होना पड़ेगा। भारत के हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति कूट-कूट कर भरी नफरत से बाहर आना होगा।

    यह लेख मूलतः पाकिस्तान में विकास के मामले पर है। इसलिए इस लेख को फोटो-लेख के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। फोटो पाकिस्तान के विभिन्न शहरों की हैं।

    भवन

    माल्स/सुपर-मार्केट्स

    सड़कें

    हवाई अड्डा

    शिक्षण संस्थाएं

    अस्पताल

    इस्लामाबाद

    राष्ट्रीय राजधानी — प्राकृतिक सौंदर्य व इन्फ्रास्ट्रक्चरल विकास का समन्वय


    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • विविध व विस्तृत स्वाध्याय बनाम विभिन्न प्रकार की भक्तई

    विविध व विस्तृत स्वाध्याय बनाम विभिन्न प्रकार की भक्तई

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    दरअसल भारतीय समाज में स्वाध्याय करने की आदत नहीं है। माता-पिता, परिवार, रिश्तेदार व समाज स्वाध्याय को बच्चों के बचपन से ही भयंकर रूप से हतोत्साहित करता है, हतोत्साहित ही नहीं करता तिरस्कृत भी करता है, उपहास भी उड़ाता है। यहां तक कि यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों के साथ भी यही होता है, वैसे भी ऐसे माहौल में पलने बढ़ने के कारण तथा रोजगार के बेहतरीन अवसरों पर देश के चंद यूनिवर्सिटियों का सामंती चरित्र के साथ कब्जा होने के कारण भी स्वाध्याय हतोत्साहित होता है। स्वाध्याय करते हुए घर वालों की गालियां व जूते खाएं या रोजगार के लिए मशक्कत करें।

    उसी जगह देश की जो चंद यूनिवर्सिटियां जबरदस्ती सामाजिक मसलों के चिंतन का ठेकेदार बनीं हुईं हैं। उनमें सिर्फ यह है कि वहां यदि छात्र चाहे तो स्वाध्याय के कुछ अवसर उपलब्ध हैं। लेकिन चूंकि छात्र की बचपन से स्वाध्याय की प्रवृत्ति नहीं होती इसलिए स्वाध्याय के इन अवसरों का प्रयोग पूर्वाग्रह या फैशन या कंडीशनिंग के कारण विकृत जो जाता है, व्यक्तित्व व संभावनाओं का प्रष्फुटीकरण नहीं हो पाता। इस कारण स्थिति यह हो जाती है कि इन चंद यूनिवर्सिटी के छात्र व शिक्षक देश के स्वयंभू कर्णधार व ठेकेदार बन जाते हैं। जो मन में आए, या जो इनके हित का या स्वार्थ का एजेंडा हो या पूर्वाग्रह हों या जो भी उटपटांग चिंतन स्तर हो या जो भी सतही समझ हो,  उसमें ही लिप्त हो जाते हैं। समाज की कंडीशनिंग ही ऐसी है कि यही सबकुछ इनकी महानता भी बन जाती है।

    चूंकि अधिकतर लोग स्वाध्याय बिलकुल भी नहीं करते हैं। इसलिए ये लोग चिंदी सा भी स्वाध्याय कर लेते हैं तो आदर्श बन जाते हैं, यहां तक कि महान के रूप में भी प्रायोजित हो जाते हैं, क्रांतिकारी व प्रगातिशील व जागरूक के रूप में प्रायोजित हो पाना तो बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली का खेल हो जाता है। ये लोग इतने धूर्त व सामाजिक बेईमान होते हैं कि पूरी मशक्कत के साथ खुद को समाज व देश का कर्णधार व महान चिंतक व प्रगतिशील के रूप में प्रायोजित करते हैं। इनका पूरा जीवन ढोंग व खोखलेपन में ही गुजरता है। यह लोग स्वतंत्र व ईमानदार चिंतकों से खार खाते हैं, उनके खिलाफ बाकायदा अदृश्य नेक्सस बनाते हैं।

    खतरनाक स्थिति यह होती है कि ये लोग खुद को महान मानते हैं, भारतीय समाज के आम लोगों की तो कंडीशनिंग ही ऐसी होती है कि इन चंद यूनिवर्सिटियों के लोगों को महान मानने के दायरे के बाहर कुछ सोच ही नहीं सकते।

    कोई भी देश या समाज किन्हीं नरेंद्र मोदी या अमित शाह या किन्हीं अन्य राजनेताओं के कारण चिंतन, विचार, वस्तुनिष्ठता, समझ व दृष्टि के मामले में पीछे नहीं जाता। क्योंकि कोई भी समाज राज-सत्ताओं पर कभी भी पूरी तरह अंध-विश्वास नहीं करता। सत्ताओं पर अंध-विश्वास करना संभव ही नहीं, असंभव है।

    लेकिन आम लोग उन लोगों पर विश्वास करते हैं जो लोग बुद्धिजीवी व चिंतको के रूप में प्रायोजित होते हैं। खतरनाक यह है कि भारत की चंद यूनिवर्सिटियों को बुद्धिजीवी व चिंतको को पैदा करने का छापाखाना मान लिया गया है। यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है, इससे भी खतरनाक यह है कि इसको खतरनाक मानने की बजाय, हितकारी माना जाता है, उद्धारक माना जाता है।

    जब कोई समाज खोखलाहट को, दोहरेपन को, ढोंग को, सतहीपन को आदर्श मानने लगता है, तब उस समाज को मूर्ख बनाना बहुत सरल हो जाता है। भारतीय समाज में यही हो रहा है। यही कारण है कि राजनैतिक सामाजिक मुद्दों पर आम आदमी के निर्णय प्रभावित होते आ रहे हैं। भारतीय समाज की राजनैतिक सामाजिक जागरूकता आगे बढ़ने की बजाय पीछे की ओर जा रही है, उल्टा चल रहे हैं।

    स्वाध्याय के सतहीपन का स्तर यह है कि कोई ओशो की कुछ किताबें पढ़ लेता है तो सबकुछ ओशो की बातों के आधार पर ही देखना शुरू कर देता है। कोई इतिहास की कुछ किताबें पढ़ लेता है तो इतिहासविद बन जाता है, भले ही इतिहास के नाम पर जो किताबें उसने पढ़ीं हों वे कूड़ा रहीं हों। ऐसा ही समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, शिक्षाशास्त्र व अन्य विषयों के लिए भी है। अधकचरापन बेहद खतरनाक होता है, ऊपर से यदि अधकचरेपन में इगो व अहम का तड़का लग जाए तो स्थिति बहुत ही अधिक खतरनाक हो जाती है।

    स्वाध्याय के द्वारा एक आम आदमी किसी विषय या अनेक विषयों पर भारत की सबसे बेहतरीन मानी जानी वाली यूनिवर्सिटी से पीएचडी किए छात्र या प्रोफेसर से भी अधिक व बेहतर समझ रख सकता है, यूं कहा जाए कि रखता ही है। स्वाध्याय व्यक्ति को स्वतंत्र बनाता है। स्वाध्याय व्यक्ति को अंदर से मजबूत बनाता है, सामाजिक ईमानदार बनाता है, दृष्टिवान बनाता है। बशर्ते स्वाध्याय का स्तर विविधतापूर्ण व विस्तृत हो।

    दुनिया के विकसित देशों की यूनिवर्सिटियों में तो ऐसी व्यवस्था होती है कि यदि कोई व्यक्ति योग्य है तो उसके पास डिग्री हो या न हो, वह शोध यहां तक कि पीएचडी कर सकता है, यूनिवर्सिटी बाकायदा स्कालरशिप देतीं हैं। यही कारण है कि विकसित देशों की यूनिवर्सिटियों के शोधों व पीएचडी का अलग ही स्तर होता है।

    भारतीय समाज को अपने बच्चों को बचपन से ही विविधतापूर्ण स्वाध्याय की ओर प्रोत्साहित करना चाहिए, अनगिनत अवसर उपलब्ध कराने चाहिए। स्वाध्याय कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। भारतीय समाज यदि अपने बच्चों को विविधतापूर्ण व विस्तृत स्वाध्याय के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दे, अवसर उपलब्ध कराना शुरू कर दे। केवल दो दशकों में ही आमूलचूल अंतर दीखना शुरू हो जाएगा।

    नहीं तो विकसित देशों की भोंडी नकल करने या गरियाने में ही अपना विकास व प्रगतिशीलता व चिंतनशीलता का गौरव अनुभव करता रहेगा। जो समाज सतहीपन व खोखलाहट व ढोंग से भी गौरव महसूस करने की मानसिकता में जीने लगते हैं, उनको सड़ने से बचाया नहीं जा सकता है, असंभव होता है क्योंकि सड़ांध ही उनके चरित्र के मूल में होता है।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • प्रदूषण बनाम समाज

    प्रदूषण बनाम समाज

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    अपने भारतीय समाज में प्रदूषण की बात कीजिए तो लोग बहुत चौड़े से बताते हैं कि वे बहुत जागरूक हैं, इसलिए साल में दस-बीस-पचास पेड़ों को गढ्ढा खोदकर पौधारोपड़ कर देते हैं। कुछ लोग अपने घरों में दस-बीस-सौ-पचास गमलों में फूल व सब्जी भी उगा लेते हैं। स्कूलों में अंताक्षरी करवा देते हैं। किसी अधिकारी या नेता या सेलिब्रिटी को बुलवा कर भाषण करवा देते हैं, झंडा फहरवा देते हैं। टीवी चैनलों में प्रवचन देते हैं। कभी कभार झाड़ू लेकर खड़े हो गए। वर्कशाप आयोजित कर लीं। कुछ टीवी एंकर तो केवल इसलिए महान हो गए क्योंकि वे विभिन्न मुद्दों पर सरकारों की बुराई कर लेते हैं, क्योंकि उनके द्वारा ऐसा करना हमारे समाज के लोगों की सामंती मानसिकता व कुंठा को तृप्त करता है। जमीन पर बिना ठोस प्रयास किए केवल बुराई करना व समाधान के नाम पर हवाई लफ्फाजी ही महानता की कसौटी बन जाती है।

    कुछ लोग तो ऐसे भी हैं कि किसी नदी किनारे बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता, कुछ भाषण प्रतियोगिता, घर में चाय नास्ता करते हुए पर्यावरण पर कुछ चर्चा, पत्रकारों से वार्ता, बैनर लगवा दिया, पोस्टर चिपका दिए व किसी मैगसेसे पुरस्कृत या अन्य सेलिब्रिटी के आगे-पीछे डोलने को बहुत बड़ा पर्यावरण काम व विशेषज्ञता मान कर भयंकर दंभ में जीते हैं। दो-चार विदेशियों से हाथ मिला लिए तो और महान हो गए।

    लेकिन क्या सच में ही इतने तामझाम वाले ये लोग, प्रदूषण को जानते समझते हैं… या स्वयं इन लोगों की भी जीवन शैली ऐसी होती है कि ये लोग भी पर्यावरण को भरपूर नुकसान पहुंचाते हैं, ऊपर से विडंबना यह कि यही लोग पर्यावरणविद होने की वाहवाही भी लूटते हैं।

    दरअसल प्रदूषण फूल, पत्ती व जनसंख्या सेलिब्रिटिज्म इत्यादि से इतर वस्तु है। इसका समाज व लोगों की जीवन शैली, जीवन के प्रति सोच, मानसिकता व चले आ रहे सामाजिक संस्कारों से बहुत गहरा संबंध होता है। तकनीक, विज्ञान व सुविधाओं इत्यादि के प्रयोग करने के ढंग से होता है।

    नीचे दिए गए एक मोटा-मोटी उदाहरण से कुछ मोटा-मोटी समझने का प्रयास करते हैं।

    मध्यप्रदेश, भारत

    क्षेत्रफल के अनुसार भारत का मध्यप्रदेश राज्य ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय राजधानी राज्य कैनबरा से लगभग 130 गुना बड़ा है। दोनों राज्यों के जनसंख्या घनत्व में बहुत अधिक अंतर नहीं है, मध्यप्रदेश का जनसंख्या घनत्व 240 प्रति वर्ग किलोमीटर तथा कैनबरा का जनसंख्या घनत्व 190 प्रति वर्ग किलोमीटर।

    मध्यप्रदेश राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से बहुत बड़ा है, खूब पेड़ हैं, खूब जंगल हैं। राज्य के अधिकतर हिस्से में विकास पहुंचा ही नहीं है। सैकड़ों गांव विकास से अछूते हैं। मध्यप्रदेश में बहुत अधिक उद्योग भी नहीं हैं। अनेक नदियां हैं, चौड़ी व बड़ी नदियां भी हैं। ऊंची पर्वत श्रंखलाएं हैं। हजारों एकड़ क्षेत्रफलों वाले अनेक नेशनल रिजर्व हैं।

    कैनबरा (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र), ऑस्ट्रेलिया

    कैनबरा की जनसंख्या लगभग सवा चार लाख है। निवासियों के पास तीन लाख से अधिक कारें हैं। राष्ट्रीय राजधानी है तो सरकारी विभागों की गाड़ियां भी हैं। कई हजार बसें हैं। सामान लदाई ढुलाई व अन्य व्यवसायिक वाहन हो गए। मोटरसाइकिलें हो गईं।

    लगभग हर घर व हर आफिस के हर कमरे में एसी लगे हैं। लगभग हर घर में घर को गर्म रखने वाले हीटर लगे हैं। लगभग हर घर में (जो भी जमीन पर बने हैं) लान-मोवर्स हैं जिनमें से अधिकतर पेट्रोल या डीजल से चलने वाले हैं। लगभग हर घर में कई-कई कम्प्यूटर व मोबाइल हैं। लगभग हर घर में रेफ्रीजेरेटर है, लगभग हर घर में वाशिंग मशीन है, लगभग हर घर में माइक्रोवेव व ओवन हैं।

    बिजली कटौती बिलकुल नहीं होती। दस-बीस सालों में मेंटीनेंस के लिए कुछ देर के लिए की जाने वाली कटौती को छोड़कर एक सेकंड के लिए भी नहीं होती। पानी की सप्लाई एक सेकंड के लिए नहीं रुकती। घर या आफिस कितनी भी ऊंचाई पर हो, पानी की सप्लाई तेजगति से होती है।

    कैनबरा में एयरपोर्ट है, रेलवे स्टेशन है। राजधानी होने के कारण प्रतिदिन सैकड़ों डोमेस्टिक फ्लाइट्स आती जाती हैं। प्रतिदिन लगभग दस हजार यात्री हवाई यात्रा करता है कैनबरा एयरपोर्ट पर।

    कैनबरा के द्वारा ऊर्जा की खपत व गैस इमिशन की कल्पना कीजिए। कैनबरा के इस तरह के रहन-सहन के बावजूद पर्यावरण व प्रदूषण के संदर्भ में भारत का मध्यप्रदेश जैसा बहुत बड़ा व बहुत पिछड़ा राज्य भी कैनबरा से तुलना नहीं कर सकता। जबकि मध्यप्रदेश बहुत बड़े आकार में फैला हुआ है।

    बहुत बड़े आकार में फैले हुए मध्यप्रदेश राज्य व कैनबरा राज्य की प्रदूषण तुलना नहीं की जा सकती बावजूद इसके कि जनसंख्या घनत्वों में थोड़ा सा ही अंतर है। मध्यप्रदेश में प्रदूषण की स्थिति कैनबरा की तुलना में बहुत अधिक भयावह है। फोटो में जिस समय व तापमान भी लगभग समान ही हैं। तापमान व समय भी कारण नहीं कहे जा सकते हैं।

    जनसंख्या घनत्व व क्षेत्रफल प्रदूषण की भयावह स्थिति के लिए बहुत अधिक मायने नहीं रखता। बल्कि लोगों की सोच, मानसिकता, जीवन शैली मायने रखती है। यदि भारत को बचना है तो पूरे भारत के लोगों को पर्यावरण के प्रति अपनी सोच, मानसिकता व जीवन जीने के ढंग को बदलना होगा।

    हमें यह भी समझना होगा कि अंतिम स्टेज का कैंसर सर-दर्द की सामान्य गोलियों से ठीक नहीं होता।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundwork & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • प्राथमिक शिक्षा का मतलब चकाचौंध नहीं

    प्राथमिक शिक्षा का मतलब चकाचौंध नहीं

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    इस फोटो-लेख में दी गईं फोटो ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय राजधानी कैनबरा के एक स्कूल की हैं। यह स्कूल पांच साढ़े-पांच वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए है। छोटे बच्चों के लिए कैनबरा ही नहीं ऑस्ट्रेलिया के सबसे बेहतरीन स्कूलों में से एक।

    इस स्कूल ने आलीशान भवन नहीं खड़ा किया। लकड़ी से बने एक पुराने घर को स्कूल में बदल दिया गया। बच्चों के लिए आलीशान व बहुत संख्या में टायलेट नहीं हैं। तामझाम व चकाचौंध नहीं है। महंगे व चमकीले टाइल्स से बना फर्श नहीं है। बच्चों के बैठने के लिए आलीशान कुर्सियां नहीं हैं। चमक-दमक, तड़क-भड़क व चकाचौंध जैसा शायद ही कुछ हो इस स्कूल में।

    बच्चों की क्रियाशीलता, रचनात्मक गतिविधियों इत्यादि के लिए रद्दी, बेकार, टूटी-फूटी वस्तुओं को रुचिकर बनाते हुए करते हुए सीखने समझने वाली क्रियाशील-शिक्षा के रूप में सदुपयोग कर लिया गया। जब प्रबंधन व शिक्षक क्रियाशील व रचनाशील होंगे तभी तो बच्चों की क्रियाशीलता व रचनाशीलता को सहेज पाएंगे, प्रोत्साहित कर पाएंगे। ऐसा होने के लिए किसी मेकेनिज्म या किताबी पढ़ाई की जरूरत नहीं होती। समझ व दृष्टि होने की जरूरत होती है।

    इस स्कूल में बच्चों व शिक्षकों का रिश्ता सिखाने/रटाने/घोंट कर पिलाने या शिक्षक सबकुछ जानता है या जो शिक्षक कहे वही सही है या छात्रों को शिक्षकों का अनुसरण करना है, इत्यादि-इत्यादि की बजाय शिक्षक व छात्र के बीच का संबंध मित्रता का होता है, दोनों मित्रवत भाव से करते हुए एक दूसरे से/को सीखते/सिखाते हैं।

    छात्रों को खुली छूट कि वे क्या करना चाहते हैं, कैसे करना चाहते हैं, कब करना चाहते हैं। शिक्षक की भूमिका जब बच्चे को जरूरत हो जितनी जरूरत हो तब सहयोगी के रूप में उपलब्ध। किताबों व कापियों का बोझ नहीं, होमवर्क नहीं। बच्चे का बैग नहीं जिसमें किताबों व कापियों का बोझ हो। क्लासरूम जैसा कुछ नहीं। शिक्षकों द्वारा ज्ञान बांटना/बांचना जैसा कुछ नहीं।

    प्राथमिक शिक्षा का मतलब बड़े-बड़े भवन, एसी कमरे, चमकीली कुर्सियां, इलेक्ट्रानिक-ब्लैकबोर्ड, टाइल्स के फर्श, चकाचौंध इत्यादि नहीं होता। जिन लोगों को शिक्षा की कतई समझ नहीं, उनके लिए यही सब बाजारू उटपटांग, बाहरी चमक-दमक, दिखावा जैसी मूर्खता ही प्राथमिक शिक्षा है; देखने वाले इसी सब की वाहवाही करते है व करने वाले वाहवाही लूटते हैं। जबकि गंभीर व दूरदर्शी शिक्षा प्रणाली का दूर-दूर तक नाता नहीं।

    प्राथमिक शिक्षा का संबंध संसाधन से कम समझ, सोच, मानसिकता, विचारशीलता व दूरदर्शिता से अधिक होता है। प्राथमिक शिक्षा बच्चे की सहजता, सहज बुद्धि, सहज विश्लेषण क्षमता, प्रश्न व प्रश्नों के उत्तर स्वयं करते खोजने की प्रवृत्ति का विकास, प्रकृति के साथ जुड़कर नियम व संबद्धता को सहज रूप में समझने का प्रयास। इत्यादि-इत्यादि प्राथमिक शिक्षा है।

    बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास व आविष्कारक क्षमता का विकास किताबें रटने से या किताबों में छपे नियमों व फार्मूलों को रटने व रटकर किसी परीक्षा में कापी में लिख देने से नहीं होता। रटने को बुद्धिमत्ता, मेधाविता, योग्यता इत्यादि की कसौटी व मूल्यांकन मानना भयावह होता है। जो समाज व देश रटने को कसौटी मानता है, रटने की क्षमता के आधार पर मूल्यांकन करता है, वह समाज कभी भी विकसित हो ही नहीं सकता। क्योंकि रटना व मौलिकता दो विपरीत ध्रुव हैं। मौलिकता बिना वास्तविक विकास संभव ही नहीं। 

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • संघ परिवार (RSS) पोषित आर्थिक नीतियों से देश में गहराता आर्थिक संकट — Dr Surendra Singh Bisht

    संघ परिवार (RSS) पोषित आर्थिक नीतियों से देश में गहराता आर्थिक संकट — Dr Surendra Singh Bisht

    Dr Surendra Singh Bisht​

    ​सर्वप्रथम एक उद्घोषणा

    यह लेख संघ परिवार की आलोचना करने के लिए नहीं लिखा है, बल्कि इस लेख का उद्देश्य समाज को चेताना है और संघ परिवार के विवेक को झकझोरना है। मोटे तौर पर इस विषय में दो लेख पिछले वर्ष लिख चुका हूँ, पर तब संघ परिवार को सीधे आरोपी के पिंजड़े में नहीं खड़ा किया था। वैसे संघ परिवार से जुड़े अनेक लोग लेखक के शीर्षक को पढ़कर तुरंत प्रतिक्रिया देंगे कि संघ या संघ परिवार की कोई आर्थिक नीतियां नहीं हैं, इसलिए उनकी आर्थिक नीतियों के कारण देश में आर्थिक संकट कैसे हो सकता है ? पर जो संघ और संघ परिवार को नजदीक से जानते हैं वे संघ परिवार की घोषित आर्थिक नीतियों से भी सुपरिचित हैं। यहां पर संघ परिवार की (जिसमें भाजपा भी शामिल है) दो प्रमुख घोषित आर्थिक नीतियों और उनके दुष्परिणामों पर विचार करते हैं।

    1. जब संघ परिवार केंद्र की सत्ता से बाहर रहता है तब उसकी किसी भी प्रकार के विदेशी निवेश के विरोध की नीति और केन्द्र की सत्ता में आते ही सभी प्रकार के वांछित–अवांछित विदेशी निवेश के स्वागत की नीति के दुष्प्रभाव और
    2. ‘रुपया मजबूत, तो देश मजबूत’ इस आर्थिक सिद्धांत के ढोल पीटने से उत्पन्न मानसिकता के दुष्परिणाम।

    संघ परिवार द्वारा अपनायी गयी इन दोनों नीतियों का मिलाजुला परिणाम देश के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रहा है, यही इस लेख का विषय है।

    संघ परिवार में भारतीय मुद्रा के मजबूत होने से देश की आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली बन जाने का भ्रामक दृष्टिकोण व्याप्त है। इस दृष्टिकोण का जनक कौन है और संघ परिवार ने कभी इस तरह का औपचारिक प्रस्ताव पारित किया है, इसकी जानकारी नहीं है, पर वहां के अधिसंख्य विचारक इस दृष्टिकोण से ग्रसित हैं। आपने इस संदर्भ में कुछ भाजपा नेताओं के वक्तव्य भी सुने होंगे। एक नेता ने देश के आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने के लिए 30 रुपये में 1 डॉलर हो जाने की सदिच्छा व्यक्त की थी, तो दूसरे नेता ने बहुत आगे जाते हुए 1 रुपया में 1 डॉलर की बात के भी तारे तोड़े हैं। भारतीय रुपये के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव को इन्होंने राष्ट्र के गौरव से जोड़कर एक मिथक पाल लिया है। विश्व बाजार में जब रुपये का मूल्य गिरता है तो इन संघ विचारकों की सांसें फूलने लगती हैं और इनकी गर्दन झुकने लगती है, पर अगर रुपये का मूल्य बढ़ता है तो इन संघ विचारकों का सीना फूलता है, और इनके मस्तक ऊंचे हो जाते हैं।

    2014 में जब संघ परिवार (भाजपा) की केंद्र में सरकार बनी तभी से इन्होंने विदेशी निवेश को भारत की आर्थिक विकास का सर्वोत्तम साधन माना है और उसके लिए हर प्रकार से प्रयासरत है। उनकी इस धारणा के कारण वे देश में वांछित – अवांछित विदेशी निवेश ला रहें हैं। आवश्यकता से अधिक विदेशी निवेश होने के कारण भारत का रुपया मजबूत बना हुआ है। अतिरिक्त विदेशी निवेश के कारण बाजार में रुपया मजबूत बना हुआ है, पर संघ परिवार की विचारधारा से ग्रसित लोगों को रुपये का मजबूत होना, उनके पुरुषार्थ का परिणाम लग रहा है।

    संघ परिवार द्वारा वांछित–अवांछित विदेशी निवेश के स्वागत और संघ परिवार की ‘”रुपया मजबूत, तो देश मजबूत’ वाली मानसिकता से कैसे देश में आर्थिक संकट गहराता जा रहा है और देश को इस संकट से निकालने के लिए क्या सही सिद्धांत स्वीकारने चाहिए, इस पर कुछ विस्तार से विचार करते हैं।

    I) गोल्ड स्टैण्डर्ड समाप्त हुए दशकों बीत गए

    1930 तक राष्ट्रों की मुद्राएं सोने की इकाई से जुड़ी थीं, इसलिए उनका आधार था। पर 1930 की मंदी के बाद सभी देशों ने मुद्रा को सोने से अलग कर दिया, और अब उसके आधार नए आर्थिक संकल्पनाएँ और आर्थिक मापदंड हो गए। इसलिए मुद्रा का मूल्य घटना – बढ़ना बाजार में होने वाले लेनदेन पर आधारित हो गया और वह राष्ट्रीय अस्मिता का मापदंड नहीं रहा। इस नई व्यवस्था को निम्न उदाहरण से समझते हैं।

    1960 आते आते फ्रांस की मुद्रा का अवमूल्यन होते होते वह 100 फ्रैंक में 1 डॉलर के आसपास पहुंच गयी। फ्रांस ने 1960 में घोषित कर दिया कि आज से उसका नया 1 फ्रैंक पुराने 100 फ्रैंक के बराबर होगा। अगले दिन से फिर 1 फ्रैंक का मूल्य 1 डॉलर जितना हो गया। देश की अर्थव्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ा, पर कुछ फ्रांसीसियों का आत्मगौरव भी बढ़ गया, क्योंकि अब 1 फ्रैंक में 1 डॉलर मिलने लग गया था। जो फ्रांस कर सकता था, उसे आगे टर्की ने भी किया और कभी भारत भी कर सकता है ! पर भारत मे कुछ लोग, जिसमें अधिकांश संघ परिवार से जुड़े हैं, वे इसी रुपये को मजबूत करना चाहते हैं, चाहे वैसे करते हुए देश दिवालिया हो जाये!

    II) मुद्रा युद्ध (Currency War) और मुद्रा घपला (Currency Manipulation)

    विश्व बाजार में वस्तुओं का मूल्य केवल उत्पादन लागत (Cost of Production) पर नहीं तय होते हैं, बल्कि जिस देश में वे बने, उस देश की मुद्रा के बाजार भाव पर भी निर्भर होते हैं। इसे संघ परिवार वाले अभी तक नहीं जानते हैं या उस तथ्य की उपेक्षा करते हैं।

    अर्थशास्त्र में एक शब्द प्रचलित है – करेंसी वॉर ! अर्थात मुद्रा युद्ध ! जब कोई देश या अनेक देश मंदी जैसे आर्थिक संकट के समय अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए और आयात को घटाने के लिए कृत्रिम रूप से अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करते हैं, तो उसे मुद्रा युद्ध कहते हैं। 1930 की महामंदी के समय अनेक देशों ने इस रणनीति को एक साथ अपनाया, जिस कारण से विश्व व्यापार बुरी तरह से प्रभावित हुआ। इसलिए अमेरिका में हुए ब्रेटनवुड समझौते में उस पर रोक लगाई गई। पर अनेक देश उस रणनीति को बड़ी होशियारी से और दीर्घकालिक तौर में अपनाते हैं, जिससे वे अन्य देशों की आंखों में अनेक वर्षों तक धूल झोंकने में सफल हो जाते हैं।

    अमेरिका आजकल चीन पर मुद्रा घपला ( Currency Manipulation) का आरोप लगा रहा है। वह भी करेंसी वॉर का छुपा रूप है। चीन ने 1980 से लेकर 2005 तक अपनी मुद्रा का लगातार अवमूल्यन होने दिया। 1980 में 1.53 युवान में 1 डॉलर से लेकर 2005 में 8 युवान में 1 डॉलर तक उसने धीरे धीरे अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया और उस कमजोर मुद्रा के सहारे विश्व बाजार पर कब्जा कर लिया। चीनी अर्थव्यवस्था मजबूत हो जाने के कारण 2005 के बाद युवान कुछ महंगा होते चला गया और 2015 तक 6 युवान में 1 डॉलर तक पहुंचा। लेकिन जैसे ही 2017 में अमेरिका ने चीन के साथ व्यापार युद्ध घोषित किया, मजबूत अर्थव्यवस्था होने के बावजूद और अमेरिका के साथ 500 बिलियन डॉलर का व्यापार मुनाफा होते हुए भी उसने अपने युवान का अवमूल्यन प्रारम्भ कर दिया है, अब 6 युवान में 1 डॉलर की जगह पर 7 युवान में 1 डॉलर हो गया है, अर्थात उसने अपनी मुद्रा के मूल्य को लगभग 15% गिरा दिया है। पर भारत में संघ परिवार अन्य देशों से और आर्थिक इतिहास से कुछ नहीं सीखना चाहता है।

    III) मुद्रा युद्ध नए रूप में

    2008 में अमेरिका में वित्तीय संकट आया और उससे मंदी प्रारम्भ हुई। इस बार अमेरिका ने बदनाम हो चुके मुद्रा अवमूल्यन वाले करेंसी वॉर से मंदी का सामना नहीं किया। उसने मंदी से लड़ने के लिए एक नया औजार ईजाद किया – क्वांटिटेटिव ईसिंग ( Quantitative Easing) ! अमेरिका के फेडरल रिजर्व बैंक ने अतिरिक्त डॉलर का बड़े पैमाने पर मुद्रण करके उसे देश की अर्थव्यवस्था में उतार दिया और साथ ही बैंक ब्याज दरों को लगभग शून्य कर दिया। अतिरिक्त डॉलर को छापकर उस देश में लोगों के हाथ में अधिक पैसा दे दिया गया, उससे वस्तुओं की मांग बढ़ गयी और मंदी पर असर पड़ा। पर इसका एक परिणाम और हुआ, जिसका सबसे पहले ब्राजील के अर्थमंत्री ने 2010 में खुलासा किया। उन्होंने घोषित किया कि विश्व में एक नए प्रकार का करेंसी वॉर चल रहा है। कैसे? अमेरिका और यूरोप आदि विकसित देशों ने बहुत नई मुद्रा छापी और ब्याज दर अत्यल्प कर दी। अतः इन देशों के व्यापारियों ने वह अतिरिक्त धन अन्य विकासशील देशो में निवेश करना शुरू कर दिया। इससे उन देशों की मुद्रा का मूल्य बढ़ गया। उन विकासशील देशों की मुद्रा के मजबूत होने से उन देशों में आयात सस्ता हो गया और उन देशों से निर्यात महंगा! अर्थात अमेरिका आदि ने अपने आर्थिक संकट को भारत जैसे देशों के आर्थिक संकट में बदल दिया। इसे समझने में अनेक देश गच्चा खा गए और एक नए प्रकार के करेंसी वॉर के शिकार हो गए।

    भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने अमेरिका में एक खुले भाषण में इस खतरे के प्रति चेताया था। 2015 में उन्होंने कहा था – “विकसित देश मौद्रिक शिथिलता ( QE) के द्वारा उभरते देशों में अधिक निवेश करके उनकी मुद्रा को मजबूत करने में लगे हैं।” जो बात वे खुले मंच से कह रहे थे, उसे वह भारत सरकार को भी अवश्य कह रहे होंगे। पर यहां तो ‘रुपया मजबूत, तो देश मजबूत’ वाले लोग सत्ताधारी थे। अतिरिक्त विदेशी निवेश से उनका रुपया मजबूत होने से उन्हें गौरव महसूस हो रहा था, अतः उन्हें करेंसी वॉर के शिकार होने की अनुभूति कहाँ से हो पाती!

    IV) जापान की मुद्रा को मजबूत करने से उसकी अर्थव्यवस्था में आ गया ठहराव

    आज जैसे चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका के लिए चुनौती बनी हुई है, वैसे 1980 के दशक में जापान की अर्थव्यवस्था बनी हुई थी। लग रहा था जापान जल्दी ही अमेरिका को पछाड़ देगा। पर वह चीन की तरह सैनिक शक्ति नहीं था। अमेरिका ने जापान पर आरोप लगाना शुरू किया कि उसने रणनीति बना कर अपनी मुद्रा को कमजोर बनाया है, जिससे जापान से निर्यात सस्ता हो और जापान में आयात महंगा हो। अतः उसे अपनी मुद्रा को मजबूत करना होगा। अंत में अमेरिका के न्यूयार्क शहर के प्लाजा होटल में एक समझौता हुआ, जिसमें जापान की मुद्रा को मजबूत करके 235 येन का 1 डॉलर से बढ़ाकर 150 येन में 1 डॉलर कर दिया गया। आगे 1990 आते आते 80 येन में 1 डॉलर हो गया। वहां अगर कोई संघ परिवार रहा होगा, तो येन के 150% से अधिक मजबूत हो जाने के लिए उसने होली – दिवाली एक साथ मनायी होगी ! पर येन के मजबूत हो जाने का क्या परिणाम हुआ। जापान में एक आर्थिक बुलबुला पैदा हुआ और उसके फूटने से जापान की अर्थव्यवस्था में ऐसा ठहराव आ गया कि उसके बाद उसे कोई अमेरिका का प्रतिद्वंदी अर्थव्यवस्था नहीं कहता है। जापान में उस दशक को आर्थिक दृष्टि से ‘गवांया दशक’ (Lost Decade) कहा जाता है।

    जापान के येन के मजबूत होने से अगर उसकी अर्थव्यवस्था बैठ गयी तो भारत में संघ परिवार किस आधार पर कहता है कि– “रुपया मजबूत, तो देश मजबूत!”

    V) भंगुर अर्थव्यवस्था (Fragile Economy) में भारत की गणना

    मॉर्गन स्टैनले नामक संस्था के अर्थशास्त्री ने 2013 में विश्व की 5 अर्थव्यवस्थाओं का नामकरण भंगुर अर्थव्यवस्था ( Fragile Economy) किया था। उसमें ब्राजील, इंडोनेशिया, तुर्की और दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत को भी शामिल किया था। भंगुर अर्थव्यवस्था कहने के लिए उन्होंने कारण दिया था कि इन देशों को अपना व्यापार घाटा और विदेशी देनदारियां चुकाने के लिए विदेशी निवेश पर अति निर्भर रहना पड़ रहा है। उसके बाद 2014 में संघ परिवार की सरकार केंद्र में आयी, और देश को पहले से अधिक विदेशी निवेश पर निर्भर होना पड़ रहा है। 2018-19 में व्यापार घाटा (Trade Deficit) 150 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया था, इसी से आप अनुमान लगा सकते हैं कि “रुपया मजबूत, तो देश मजबूत!” के सिद्धान्तवादियों की मानसिकता ने देश की अर्थव्यवस्था को कितना अधिक भंगुर (Fragile) अवस्था तक पहुंचा दिया है।

    उपरोक्त 5 तथ्यों के प्रकाश में अब शीर्षक में संघ परिवार द्वारा लागू आर्थिक नीतियों के दुष्परिणाम पर पुनः विचार करते हैं। कुछ पुनरुक्तियाँ होंगी, पर इसे फिर से समझने की कोशिश करते हैं।

    भारत के रुपये का बाजार भाव इस समय लगभग 70 रुपये में 1 डॉलर है। रिजर्व बैंक के अनुसार जिन 6 प्रमुख देशों के साथ भारत का व्यापार होता है, उन देशों की मुद्रा के साथ तुलना करने पर भारतीय रुपये का वास्तविक मूल्य (REER – Real Economic Exchange Rate) 120% था। अर्थात रुपये के बाजार भाव (Market Rate) उसके वास्तविक मूल्य (REER) से 20% अधिक था। 70 रुपये में 1 डॉलर बाजार भाव था तो वास्तविक भाव हुआ 84 रुपये में 1 डॉलर! अर्थशास्त्रियों के अनुसार अगर किसी मुद्रा का बाजार भाव उसके वास्तविक भाव से 5% कम – अधिक हो तो वह स्वस्थ दशा मानी जाती है। पर भारत का रुपया स्वस्थ दशा से कहीं अधिक महंगा बिक रहा है !

    संघ परिवार में हावी विचारकों के अनुसार रुपया मजबूत है, तो देश के हित में है । पर देश के जाने – माने अर्थशास्त्री इससे सहमत नहीं हैं। वे आयात घटाने और निर्यात बढ़ाने के लिए रुपये का उसके वास्तविक मूल्य से नीचे गिरना लाभदायी मानते हैं। आपने ऐसी सलाह देने वाले रघुराम राजन, जगदीश भगवती, अरविंद पनगढ़िया, शंकर आचार्य, राजवाड़े आदि अनेक अर्थशास्त्रियों के लेख समाचार पत्र–पत्रिकाओं में पढ़े होंगे। पर उनकी नेक सलाह का संघ परिवार में हावी विचारकों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।

    रुपया का बाजार भाव 2014 से लगातार वास्तविक भाव से अधिक बना हुआ है। इसके कारण आयात सस्ता हो गया है, और निर्यात महंगा। रुपये के बाजार भाव के अधिक होने से आयात सस्ता हो गया है, जिससे देश में अनेक वस्तुओं का उत्पादन स्पर्धा में नहीं टिक पा रहा है, इसलिए उन्हें बनाने वाली कंपनियां या तो बंद हो रहीं हैं या बीमार पड़ गयीं हैं। इससे देश मे रोजगार घट रहा है। इसीप्रकार अन्य मुद्राओं के सामने रुपये के मजबूत होने से निर्यात महंगा हो गया है। अतः अन्य देशों से हमारे निर्यातक स्पर्धा नहीं कर पा रहें हैं। उस कारण भी निर्यात करने वाले कारखाने बीमार या बंद हो रहें हैं। जिससे रोजगार भी घट रहा है। सस्ता विदेशी माल के खपत से देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) बढ़ते हुए दिख रहा है पर रोजगार घट रहें हैं। इसीको रोजगार रहित वृद्धि (Employmentless Growth) कहा जा रहा है।

    जब निर्यात कम है और आयात अधिक है तो सामान्य अर्थशास्त्र के नियमानुसार रुपये का बाजार भाव उसके वास्तविक भाव से नीचे होना चाहिए था, पर भारत में 2014 से तो उल्टा दिखाई दिखाई दे रहा है। रुपया अपने वास्तविक मूल्य से बाजार में महंगा है। रुपये का अपने वास्तविक मूल्य (REER) से मजबूत बने रहना, वांछित – अवांछित विदेशी निवेश का परिणाम है, या अमेरिका, यूरोपीय देश, चीन आदि द्वारा प्रारम्भ नए मुद्रा युद्ध (Currency War) का परिणाम है, पर रुपया का मजबूत बने रहना देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार के मुद्रा युद्ध से अनभिज्ञ संघ परिवार के विचारक अपने ‘रुपया मजबूत, तो देश मजबूत’ के कारण रुपये की मजबूती को अपनी विजय मान रहे हैं।

    अमेरिका यूरोप चीन आदि आर्थिक महासत्ताओं द्वारा मौद्रिक शिथिलता (QE) द्वारा जारी नए मुद्रा युद्ध का परिणाम है भारत में रुपया का मजबूत होना। भारत जैसे विकासशील देशों की मुद्रा मजबूत होने के कारण चीन आदि से सस्ते में आयात हो रहा है और भारत से निर्यात नहीं हो पा रहा है। ऊपर से विदेशी निवेश करने का उपकार और जता रहे हैं। और हमारे ‘रुपया मजबूत, तो देश मजबूत‘ वाले आत्ममुग्ध हैं कि हमारा रुपया भी मजबूत है और अधिक से अधिक विदेशी निवेश लाने में भी सफल हो रहें हैं!

    पर वास्तविकता क्या है? जब केंद्र में 2014 में भाजपा सत्तारूढ़ हुयी, तो उसने अगले 5 वर्षों में अर्थात 2019 तक वस्तुओं का निर्यात 500 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया था। 2013-14 में भारत से वस्तुओं का निर्यात (Merchandise Export) 314 बिलियन डॉलर हुआ था। भाजपा सरकार के आने के बाद 2014-15 में 310 बिलियन डॉलर निर्यात हुआ। अगले वर्ष 2015-16 में केवल 266 बिलियन डॉलर का ही निर्यात हुआ। आगे 2016-17 में 275 बिलियन डॉलर हुआ। 2017-18 में 303 बिलियन डॉलर निर्यात हुआ। अब 2018-19 में जाकर 2013-14 से अधिक 330 बिलियन डॉलर निर्यात हो पाया है। अर्थात 2014 में जितना निर्यात किया था, लगभग उतना ही निर्यात भाजपा के 5 वर्ष के बाद हो पाया। इस विफलता का प्रमुख कारण है – भारतीय रुपये का अपने वास्तविक मूल्य से लगातार महंगा बने रहना!

    संघ परिवार द्वारा भ्रामक आर्थिक नीतियों से छुटकारा ही है उपाय

    संघ परिवार की नीति “रुपया मजबूत तो देश मजबूत” के कारण से हो रहे दुष्परिणामों को दूर करने के उपायों को समझने से पहले निम्न बातें स्पष्ट हो जाना आवश्यक है।

    1. ​भारत अन्य देशों की भांति विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य है। जब ऐसा नहीं था, तब हम आयात पर अपनी सुविधा के अनुसार आयात शुल्क लगा सकते थे। उस जमाने में 300 से 500% तक भी आयात शुल्क ( Custom Duty) लगाते थे। पर अब विश्व व्यापार संगठन का सदस्य होने से अधिक आयात शुल्क नहीं लगा सकते। अतः रुपये की स्थिर दर (Fixed Rate) या रुपये का मजबूत होना अब देश के आयात को नियंत्रित करने के खिलाफ जाता है। जैसे आजकल केंद्र में संघ परिवार की मजबूत रुपये की नीति के कारण हो रहा है। अगर आयात को नियंत्रित करने के लिए विश्व व्यापार संगठन में बनी सहमति से अधिक आयात शुल्क लगाते हैं, तो अन्य देश भी भारत से होने वाले आयात पर शुल्क बढ़ा देंगे या विश्व व्यापार संगठन में भारत की शिकायतें करके निपटारा करेंगे। इसलिए अत्यधिक आयात शुल्क बढ़ाना अब सीमित विकल्प बचा है।
    2. आज की अर्थव्यवस्था, पश्चिम में विकसित अर्थशास्त्र के अनुसार चलती है। भारत भी लगभग उसी अर्थशास्त्र के नियमों को पालन करता है। पर अगर 99% उनके अर्थशास्त्र के नियम पाले, पर रुपये के बाजार में मूल्य को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश की, तो वह बात हमारे खिलाफ भी जा सकती है, जैसे आजकल संघ परिवार के मजबूत रुपये की नीति हमारे देशहित के खिलाफ जा रही है।
    3. आंतरिक बाजार में किसी वस्तु का बिक्री मूल्य उसके उत्पादन लागत पर निर्भर होता है, पर निर्यात करते समय उत्पादन लागत के साथ ही उस देश की मुद्रा का मूल्य भी उसके बिक्री मूल्य को प्रभावित करता है। अगर कोई मुद्रा अपने वास्तविक मूल्य (REER) से अधिक मजबूत हो तो उससे उस देश से होने वाला निर्यात महंगा हो जाता है और महंगा होने से विश्व बाजार में स्पर्धा में पिछड़ जाता है, जैसे आजकल संघ परिवार की नीतियों के कारण हो रहा है।
    4. हम यहां पर रुपये के बाजार भाव को उसके वास्तविक भाव (REER) तक गिरने देने की वकालत कर रहें हैं, रुपये का उससे अधिक अवमूल्यन की सलाह नहीं दे रहें हैं। अतः विश्व का अन्य कोई देश हम पर मुद्रा घपला (Currency Manipulation) मुद्रा युद्ध (Currency War) का आरोप भी नहीं लगा सकता है। दुर्भाग्य से अधिकांश संघ विचारक रुपये को वास्तविक मूल्य तक नीचे गिरने देने की सलाह को रुपये का अवमूल्यन (Depriciation) करने की सलाह मानने की गलती करते हैं।
    5. रुपये का अपने वास्तविक मूल्य से मजबूत होने के आयात-निर्यात के अलावा और क्या परिणाम होते हैं? पहले रुपया के मजबूत होने के सकारात्मक का आभास करने वाले परिणाम कुछ परिणाम। भारत पेट्रोलियम पदार्थों के लिए 80% से अधिक आयात पर निर्भर है। इसलिए रुपया मजबूत होने से पेट्रोलियम सस्ता मिलता है। पेट्रोलियम के सस्ता मिलने का अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव यह होता है कि देश में उसके विकल्प उससे महंगे बने रहते हैं, इसलिए हमारी आयात पर निर्भरता बनी रहेगी। रुपया मजबूत रहने से देश द्वारा लिए विदेशी कर्ज रुपये के बाजार भाव से नहीं बढ़ता।पर आयात सस्ता और निर्यात महंगा होने से देश का व्यापार घाटा हमेशा बढ़ते रहता है। अतः रुपये के मजबूत रहने से जो विदेशी कर्ज नहीं बढ़ता है, वहीं व्यापार घाटे को भरने के लिए हमारी विदेशी निवेश पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। पहले व्यापार घाटे को पाटने के लिए विदेशों से ऋण लिया था 3 से 5% ब्याज पर, और अब रुपये के मजबूत होने से बढ़े व्यापार घाटा को पाटने के लिए अधिकाधिक विदेशी निवेश बुला रहें हैं। विदेशी निवेश आएगा 10 से 15% लाभांश की आशा में ! तो भारत के अधिक हित में क्या है – रुपये के मजबूती से बढ़ा व्यापार घाटा या रुपये के कमजोर होने से घटने वाला व्यापार घाटा? इसका विचार कौन करेगा?

    इन सब बातों के आधार पर हमें अमेरिका जैसे देशों द्वारा प्रारम्भ अभिनव मुद्रा युद्ध को पहचानना चाहिए, जिससे देश में आवश्यकता से अधिक विदेश निवेश हो रहा है, उस अधिक विदेशी निवेश के कारण हमारे देश की मुद्रा अपने वास्तविक मूल्य से अधिक मूल्य पर बाजार में बिक रही है। इस प्रकार रुपये के मजबूत होने से आयात सस्ता हो गया है और निर्यात महंगा हो गया है। आयात सस्ता और निर्यात महंगा होने के कारण देश में पुराने उद्योग बीमार हो रहें हैं या बंद हो रहें हैं और नए उद्योग नहीं खुल पा रहें हैं।

    उपरोक्त सभी तथ्यों को ध्यान में रख कर संघ परिवार की “रुपया मजबूत, तो देश मजबूत” वाली मानसिकता से अर्थव्यवस्था पर हो रहे घातक दुष्परिणामों को समझ सकते हैं। संघ परिवार के विचारक भी उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करें और देश में गहरा रहे आर्थिक संकट से देश को उबारने में पहल कर सकते हैं। अमेरिका आदि द्वारा प्रारम्भ या संघ परिवार के “रुपया मजबूत, तो देश मजबूत” की मानसिकता के कारण या दोनों कारणों से आज भारत की मुद्रा अपने वास्तविक मूल्य से महंगी बिक रही है।

    भारत पर आए आर्थिक संकट को दूर करने के लिए रुपये को अपने वास्तविक मूल्य (REER) के आसपास तक नीचे गिरने देने की रणनीति बनाना और उस अमल करना ही एकमेव प्रमुख उपाय है। अभी आर्थिक संकट को दूर करने के लिए सरकार हड़बड़ी में कुछ उपाय कर रही है। उसमें अधिक विदेशी निवेश का स्वागत भारत के खिलाफ ही जाने वाला है, विदेश से आने वाली अतिरिक्त पूंजी भारतीय रुपये को और अधिक महंगा बनाने का काम करेगी, जो निकट भविष्य संकट को अधिक विकट करेगा। बिना रुपये को सस्ता किये देशी निवेश को बढ़ावा देने के बैंकों से सस्ता ऋण उपलब्ध कराने के लिए किए जा रहे उपाय भी अधिक फलदायी नहीं हो पाएंगे, क्योंकि रुपये के मजबूत रहते विदेशों से सस्ता माल से बाजार पर कब्जा किये रहेंगे, रुपया मजबूत बने रहने से निर्यात कठिन बना रहेगा, इन दोनों कारणों से मांग में वृद्धि की संभावनाएं क्षीण होने से सस्ते ब्याज पर ऋण उपलब्ध होते हुए भी कोई उद्योगपति क्यों निवेश करेगा ? हां, भारत के बाजार पर कब्जा करने के लिए में अकूत लाभ कमाई विदेशी कंपनियां अवश्य कुछ वर्षों तक सस्ते में सामान या सेवाएं बेचने के निवेश करने का सामर्थ्य रखती हैं, जैसा आजकल दिखाई दे रहा है। अतः एक तरफ अवांछित विदेशी निवेश के मोहजाल से बचना होगा और दूसरी तरफ रुपये को उसके वास्तविक मूल्य (REER) तक गिरने देना होगा। तभी आर्थिक संकट को दूर करने के लिए किए जाने वाले अन्य उपाय भी वांछित फल देने में सफल हो पाएंगे।

    रुपये को अपने वास्तविक मूल्य (REER) तक नीचे गिरने देने से निम्न सकारात्मक परिणाम होंगे।

    1. ​आयात महंगा होगा, जिससे अनेक वस्तुओं का देश में उत्पादन स्पर्धा में टिकने लायक हो जाएगा। अतः देश में आयात कम होने के साथ रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। अभी रुपया मजबूत होने कारण आयात सस्ता है, उस आयात के कारण देश में नहीं,विदेशों में रोजगार बढ़ रहें हैं।
    2. रुपया सस्ता होने से निर्यात भी सस्ता हो जाएगा। अतः अन्य देशों की अपेक्षा भारत की अनेक वस्तुएं सस्ती हो जाने से निर्यात बढ़ेगा, उस बढ़ते निर्यात के लिए देश में उत्पादन बढ़ेगा। उस उत्पादन के लिए देश में रोजगार भी बढ़ते जाएंगे।
    3. रुपये के अपने वास्तविक मूल्य तक कमजोर होने से आयात घटेगा और निर्यात बढ़ेगा, जिससे व्यापार घाटा (Trade Deficit) कम होगा। अतः कम घाटे को भरने के लिए कम विदेशी पूंजी निवेश की आवश्यकता पड़ेगी। अतः अवांछित विदेशी पूंजी निवेश को स्वीकारने की लाचारी दूर होगी।

    लेख विस्तृत हुआ है, अनेक बातों को दोहराना पड़ा है। पर विदेशी अभिनव मुद्रा युद्ध से और सत्ताधारी संघ परिवार की मजबूत रुपये की मानसिकता से 2014 से देश की अर्थव्यवस्था पर घातक प्रभाव हुए हैं, और अब उन नीतियों से देश में मंदी का संकट गहरा गया रहा है।आने वाले कुछ वर्षों में अत्यधिक विदेशी निवेश के कारण भारत के विदेशी जाल में फंस जाने की संभावना भी बलवती हो रही है। संकट की गंभीरता के कारण अति विस्तार से सब बातों को रखना पड़ा है। सभी प्रबुद्धजनों से इस विषय पर अपने विचार अभिव्यक्त करने का अनुरोध है।

    राष्ट्रीय संयोजक – भारत अभ्युदय प्रतिष्ठान (वैकल्पिक नीतियों के लिए शोध, चिंतन व सामाजिक प्रयोगों पर कार्यरत बौद्धिक ​संस्थान)
    मुख्य संपादक – भारत अभ्युदय पत्रिका

    Dr Surendra Singh Bisht