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नितीश कुमार, भाजपा व बिहार : पसंद नापसंद के खाचों से इतर व्यवहारिक चर्चा

Vivek “Samajik Yayavar”

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यदि मार्च 2000 में जब नितीश कुमार केवल 8 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, को छोड़ दिया जाए तो नितीश कुमार नवंबर 2005 में स्थाई रूप से बिहार के मुख्यमंत्री बने। 2005 में जनतादल (यू) व भाजपा ने बिहार में चुनाव मिल कर लड़ा था, वह भी लालू यादव के विरुद्ध। 2005 से 2010 तक जनतादल (यू) व भाजपा ने मिलकर सरकार चलाई। 2010 के बिहार चुनावों में इस गठबंधन ने दुबारा सरकार बनाई 243 सीटों में 206 सीटें जीतकर, जिसमें जनतादल (यू) ने 115 व भाजपा ने 91 सीटें जीती थीं।

नितीश कुमार ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार का चेहरा बदल दिया। यदि बिहार व गुजरात का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए तो बिहार में विकास विपरीत परिस्थितियों में बहुत बदहाल स्थिति से हुआ था। गुजरात की परिस्थितियां से बिलकुल भिन्न व बहुत अधिक दुरूह।

भाजपा ने बिहार में सरकार में गठबंधन में होते हुए कभी सीमा से अधिक दबाव नहीं डाला नितीश कुमार के काम करने के तौर तरीकों में। तालमेल से सरकार चल रही थी। गड़बड़ तब हुई जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया। जबकि नितीश कुमार की दबी हुई इच्छा थी उनको बनाया जाए। नितीश कुमार का अनकहा तर्क, यदि NDA द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार का चुनाव विकास से ही तय होना था तो नितीश कुमार का चुनाव होना चाहिए था।

जून 2013 में नरेंद्र मोदी जी का नाम प्रधानमंत्री के रूप में आगे आते ही, कुछ ही दिनों में जनतादल (यू) पार्टी भाजपा गठबंधन से अलग हो गई, जबकि जनतादल (यू) के ही शरद यादव NDA के राष्ट्रीय समन्वयक थे। नितीश कुमार ने लालू यादव के सहयोग से सरकार बनाई लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में करारी हार हुई। भाजपा ने 40 में से 32 सीटें जीतीं। नितीश कुमार, लालू यादव व कांग्रेस 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव मिलकर लड़े, सरकार बनाई।

लेकिन नितीश कुमार व लालू यादव का तालमेल दो साल भी नहीं चल पाया। नितीश कुमार को भी यह अहसास हो चुका था कि अब प्रधानमंत्री बनना नहीं। बेहतर कि सकून के साथ तालमेल के साथ पहले जैसे सफलता से सरकार चलाई जाए। लालू यादव के साथ तालमेल न तो चल पा रहा था और न ही चलना ही था, किसी तरह गाड़ी खिंच रही थी। लालू यादव अपनी संतानों को राजनीति में लंबी दूरी के लिए सेट करने की हड़बड़ी में भी हैं।

नितीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन करके नई सरकार बनाकर छठवीं बार मुख्यमंत्री बने। मेरा मानना है कि नितीश कुमार 2015 के बाद से ही भाजपा के साथ गठबंधन करके सरकार चलाना चाहते थे। नितीश कुमार व भाजपा दोनों बिहार में एक दूसरे के साथ पूरकता में लंबे समय तक सरकार अच्छे से चला चुके हैं। भाजपा ने नितीश के ऊपर बिहार में सरकार चलाते हुए सीमा से अधिक दबाव नहीं डाला, उंगलबाजी नहीं की। दोनों ने बिहार के लिए बेहतर काम भी किए।

2013 से 2017 तक के चार वर्षों के चक्र में मेरे अनुमान के अनुसार नितीश कुमार से राजनैतिक गणनाओं में दो बार गलतियां हुईं।

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  1. 2013 में छिपी हुई प्रधानमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा के कारण नितीश कुमार NDA से अलग हुए। उन्होंने नरेंद्र मोदी के प्रबंधन को हलके में लिया। उनको लगा कि त्रिशंकु संसद में उनकी संभावना रहेगी, उनको यह भी लगा कि वे संसदीय चुनावों में बिहार राज्य में 15 से 20 सीटें निकाल ले जाएंगे। 
  2. 2014 में लोकसभा चुनावों में भाजपा की भयंकर जीत व मीडिया प्रबंधन के कारण नितीश कुमार डर गए, उनको लगा कि यदि वे अकेले चुनाव लड़ते हैं तो वे सरकार नहीं बना पाएंगे। यदि बिहार में भाजपा की सरकार बन गई तो मोदी उनके राजनैतिक भविष्य को पूरी तरह खतम कर देंगे।इसलिए नितीश कुमार बिहार चुनाव में अकेले उतरने की बजाय लालू यादव के साथ उतरे। लालू यादव अपने साथ कांग्रेस को भी उतार लाए। जबकि यदि नितीश कुमार यदि हिम्मत दिखाते तो अकेले चुनाव लड़कर भी अच्छी स्थिति में रहते। आवश्यकता पड़ती तो चुनाव के बाद गठबंधन बनाते।
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भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार होने के बावजूद नितीश कुमार ने बिहार में कभी सांप्रदायिक माहौल नहीं बनने दिया। दलितों महादलितों व पिछड़ी जातियों के लिए काम किया। बिहार के लोग आराम चाहते हैं, विकास चाहते हैं, तुलनात्मक बेहतर गवरनेंस चाहते हैं। वे विकास व तुलनात्मक बेहतर गवरनेंस का स्वाद चख चुके हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि नितीश कुमार ने बिहार में विकास के माध्यम से चेहरा बदला। नितीश कुमार को बिहार की पिछड़ी जातियां, दलित, महादलित व मुस्लिम पिछड़ी जातियां पसंद करते हैं। नितीश कुमार ने जातिगतता से ऊपर उठकर सर्वमान्य रूप में लोकप्रियता अपने कामों व गवर्नेंस से हासिल की। बिहार का चेहरा बदलने का काम वास्तव में किया, तब भाजपा के साथ ही गठबंधन सरकार में थे। अभी भी उनके पास तीन सालों का समय है। पिछले लगभग 12 सालों से सरकार चला ही रहे हैं, जिसमें लगभग आठ साल सरकार भाजपा के साथ मिलकर ही चलाई है। लोगों का दिल फिर से जीतना असंभव भी नहीं।

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