राष्ट्रवाद बनाम लोकवाद बनाम निजता

Vivek Umrao Glendenning

लोक से राष्ट्र होता है। राष्ट्र से लोक नहीं। बिना लोक के राष्ट्र संभव ही नहीं। लोक ही राष्ट्र का निर्माता है। जैसा लोक वैसा राष्ट्र। यदि लोक लोकतांत्रिक मूल्यों को जीता है तो राष्ट्र में भले ही राजा हो लेकिन राष्ट्र का मूल चरित्र लोकतांत्रिक होता है। यदि लोक लोकतांत्रिक मूल्यों को नहीं जीता है तो राष्ट्र भले ही लोकतांत्रिक होने का दावा करे लेकिन उसका मूल चरित्र लोकतांत्रिक नहीं होता है। यदि लोक स्वतंत्रता महसूस करता है तो राष्ट्र स्वतंत्र है, यदि लोक स्वतंत्रता नहीं महसूस करता है तो राष्ट्र कभी सही मायनों में स्वतंत्र नहीं हो सकता, संभव ही नहीं। यदि लोक भ्रष्ट है तो राष्ट्र भ्रष्ट होगा। यदि लोक ईमानदार है तो राष्ट्र किसी भी सूरत में लोक को भ्रष्ट नहीं बना सकता। राष्ट्र का लोक बिना कोई भी वजूद नहीं।

यदि राष्ट्र से लोक होता तो राष्ट्र के सभी लोग एक ही तरह के होते। राष्ट्र लोक बनाने का सांचा या खांचा नहीं होता कि राष्ट्र से लोक होता हो। राष्ट्र का अस्तित्व लोक से बनता है। लोक बड़ा होता है राष्ट्र से, क्योंकि लोक राष्ट्र का निर्माता व दिशा निर्देशक है। यदि राष्ट्र को संविधान माना जाए तब भी संविधान लोगों ने ही अपनी समझ के अनुसार लिखा या दूसरे के लिखे को नकल करके लिखा। संविधान में संशोधन भी लोग ही करते हैं, क्योंकि जो पहले के लोगों ने सोचा व लिखा वह कालांतर में या तो गलत निकला या मूर्खतापूर्ण निकला। निर्माता व दिशानिर्देशक अंततः लोक ही होता है।

जो राष्ट्र या संविधान लोक के लिए नहीं, उनका कोई मायने नहीं। जब भी यह कहा जाता है कि राष्ट्र व संविधान के लिए समर्पित तो इसका मतलब सिर्फ यह कि जो लोग विभिन्न स्तरों पर राष्ट्र की विभिन्न सत्ताओं व शक्तियों का भोग करते हैं उनको समर्पित। राष्ट्र एक राजनैतिक सीमाओं की परिकल्पना है, राष्ट्र का स्वयंभू रूप में कोई अस्तित्व नहीं। राष्ट्र एक काल्पनिक व बेहद परिवर्तनशील इंटिटी होती है। भारत में कभी सैकड़ों राष्ट्र थे, हम अपनी जिद में भले ही यह कहते रहें कि भारत एक राष्ट्र था। एक राष्ट्र का मतलब किसी एक का शासन। जिसने जितने राजाओं को पराजित कर लिया वह उतना बड़ा राष्ट्र। बहुत साधारण है समझना।

राजनैतिक सत्ताओं की देखभाल के लिए लोगों का समर्पण प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड जैसे देशों ने राष्ट्रवाद का कांसेप्ट दिया। मजेदार बात यह है कि जिन्होंने राष्ट्रवाद का कांसेप्ट दिया, उन्हीं लोगों ने सबसे पहले स्वयं को राष्ट्रवाद के कांसेप्ट से मुक्त कर लिया। क्योंकि उनको जल्द ही अहसास हो गया कि राष्ट्र से बड़ा लोक है, इसलिए वे लोग राष्ट्रवाद से लोकवाद पर आ गए। लगातार लोकवाद को परिष्कृत करते जा रहे हैं।

परिभाषाओं व विचारों को रटना:

हममें से अधिकतर लोग जीवन में अधिकतर बातें व विचार रटते हैं या कई किताबें/विचार पढ़कर उनका अपने दिमाग में पीसते हुए अपनी सब्जेक्टिविटी/पूर्वाग्रह/वैचारिक-पसंद/नापसंद के आधार पर विभिन्न मसालों का प्रयोग करते हुए चटनी बनाते हैं। इस चटनी बनाने को हम स्वयं का चिंतन करना व स्वयं को चिंतक मान लेते हैं।

हममें से बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं तो व्यापकता, व्यापक-विभिन्नता, वस्तुनिष्ठता, निरपेक्षता व अननकूलता के साथ अध्ययन व कर्म स्वाध्याय करते हैं या कर पाते हैं।

हम जीवन भर शब्दों, विचारों, भावों व परिभाषाओं को बिना निरपेक्षता व वस्तुनिष्ठता से समझे हुए ही धड़ल्ले से प्रयोग करते रहते हैं। ऐसा करने को हम अपना विचारशील व चिंतनशील होना भी मानते हैं। जीवन व समाज के हर आय़ाम पर हममें से अधिकतर लोग ऐसा ही जीते हैं।

मानव समाज ने समय के साथ समझते हुए गति की है। एक समय था जब राजा को भगवान का दूत माना जाता था और राज्य के सारे लोग व संपत्ति राजा के सब्जेक्ट हुआ करते थे। यह मानसिकता वैसी ही है जैसी कि आज हम ताकतवर सरकारी नौकरी करने वालों को, या बड़ी कंपनीज में ऊंचे वेतन व सुविधाओं से नौकरी करने वालों को योग्य, मेधावी, सफल मानते हैं।

राजा रहा हो या आज के भारतीय समाज के नौकरशाह या ऊंचे वेतनमान के नौकरी करने वाले लोग। मूलभूत मामला संपत्ति के भोग का ही रहा है। संपत्ति हमेशा मूल में रही, पैकिंग बदलती रही। संपत्ति को भोगने को सौभाग्यशाली होना हमेशा माना जाता रहा।

[themify_quote]समाज जिन परिभाषाओं, विचारों, कंडीशनिंग इत्यादि से अपनी पीढ़ियों को ट्रेन करता है। जिन परिभाषाओं को रटाया जाता है। वे निरपेक्ष नहीं होतीं हैं। बहुत प्रकार के तामझाम व घालमेल के सापेक्षिक होतीं हैं। यह तो व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपना जीवन सापेक्षिक दृष्टि के साथ देखते समझते जीना चाहता है या जो जैसा है उसको वैसा ही देखने समझने की निरपेक्ष दृष्टि का विकास करते हुए जीना चाहता है।[/themify_quote]

निजता व राष्ट्र:

बिना लोक के समृद्ध व मजबूत हुए कभी भी राष्ट्र समृद्ध व मजबूत नहीं हो सकता है, संभव ही नहीं। यदि लोक मजबूत व समृद्ध है तो राष्ट्र स्वतः ही समृद्ध व मजबूत होता है। राष्ट्र मजबूत हो फिर लोक मजबूत हो, ऐसा संभव ही नहीं, मूर्ख बनाकर लोक पर सत्ता व शक्ति का भोग करने की कवायद होती है और कुछ भी नहीं। बिना लोक के राष्ट्र अपने आप में कुछ भी नहीं, कोई भी अस्तित्व नहीं।

बिना निजता के लोक का विकास, समृद्धि व मजबूती संभव ही नहीं। लोक निजता मतलब राष्ट्र की निजता। लोक की निजता जितनी समृद्ध होगी राष्ट्र की निजता उतनी ही समृद्ध होगी। लोक की निजता जितनी कमजोर व निरीह होगी, राष्ट्र की निजता उतनी ही कमजोर व निरीह होगी। लोक की निजता को ध्वस्त करना मतलब राष्ट्र की निजता को ध्वस्त करना।

लोक की निजता कभी भी राष्ट्र विरोधी हो ही नहीं सकती। असंभव है। (इस बिंदु को सू़क्ष्मता, गहराई व व्यापकता से सोचिए तभी समझ पाएंगे नहीं तो समझना संभव नहीं)।

चलते-चलते:

राष्ट्र दरअसल लोक का ईमानदार व पारदर्शी आइना होता है। जैसा लोक वैसा राष्ट्र, बिना किसी लागलपेट के। लोक की निजता मतलब राष्ट्र की निजता। लोक की सुरक्षा मतलब राष्ट्र की सुरक्षा। लोक की समृद्धि मतलब राष्ट्र की समृद्धि। लोक का विकास मतलब राष्ट्र का विकास। लोक का परिष्कृत होना मतलब राष्ट्र का परिष्कृत होना। लोक का ताकतवर होना मतलब राष्ट्र का ताकतवर होना। लोक के बिना राष्ट्र जैसा कुछ होता ही नहीं।

मेरी बातें बहुत लोगों को फिलासोफिकल लग सकतीं हैं। लेकिन दुनिया का यथार्थ यही है कि जिन-जिन राष्ट्रों ने इसको जीवन में उतार लिया है वे लोक-कल्याण, विकास, समृद्धि, मजबूती, जागरूकता, शिक्षा, स्वास्थ्य, विद्वता, सामाजिक-विश्वास, सामाजिक-न्याय, समता इत्यादि संदर्भों में बहुत आगे निकल गए हैं।


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