Author: संपादक मंडल

  • देश को गर्त में झोंकने की तथाकथित क्रांति के लिए आप भी उत्तरदायी हैं

    सामाजिक यायावर


    एक निहायत ही मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी आदमी आपके पास आता है। बेहूदा, खोखला व फर्जी दावा ठोंकता है कि उसने दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था का गहरा अध्ययन किया है।

    चूंकि आपने कभी जीवन में गहरा अध्ययन किया नहीं, गंभीर लोग आपकी सलाहकार व मित्र मंडलियों में दिखते नहीं। आप काल्पनिक व गढ़े गए इतिहास को वास्तविकता के रूप में प्रायोजित करते हुए जीते दीखते हैं क्योंकि ऐसा करने से अपनी सभ्यता के स्वयंभू महान होने का दंभ पूरा होता है। इसलिए आपने इस मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी के बेहूदे व फिजूल तर्कों को हाथों-हाथ लेकर देश को गर्त में पहुंचाने का कर्मकांड कर डाला।

    यह आदमी आपकी इन कमियों को जानता है, सबसे बड़ी बात यह आदमी यह भी जानता है कि आपको स्वयं को ऐतिहासिक क्रांतिकारी पुरुष के रूप में स्थापित करने की सनक है, जिस सनक के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं। यह आदमी आपसे कुछ मिनट की औपचारिक मुलाकात करने का समय मांगता है। उसके नेटवर्क ऐसे होते हैं कि उसको आपसे औपचारिक मुलाकात करने का समय मिल जाता है।

    यह निहायत ही मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी आदमी आपसे मिलता है, आपको देश में आमूलचूल परिवर्तन के सपने हकीकत में बदलते दिखाता है। आप एक तीर से कई शिकार करने की राजनैतिक योजना बनाते हैं। आपने यह समझने का प्रयास नहीं किया कि यह आदमी जो दुनिया के देशों का अर्थशास्त्र समझने का दावा (बिलकुल ही फर्जी दावा) ठोंक रहा है वह भारतीय समाज व यहां के लोगों की मानसिकता को समझता है या नहीं।

    चूंकि आपको प्रवचन देने व प्रवचन सुनने के लिए प्रशिक्षित किया गया है इसलिए आपको प्रवचन सुनने के बाद उसको आगे बढ़ाते हुए प्रवचन देने की शीघ्रता रहती है। सो आपने एक मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी का स्वादिष्ट प्रवचन सुना और बिना योग्य, गंभीर व विशेषज्ञ लोगों से परामर्श किए उसके प्रवचन को देश के लोगों को प्रवचन के रूप में सुना दिया।

    किंतु यह प्रवचन केवल प्रवचन नहीं था, देश की हजारों वर्षों के ढांचे को तहस-नहस करने की बात थी। अरबों लोगों के विश्वास टूटने की बात थी। अरबों लोगों के सुचारु रूप से चल रहे जीवन में छीछालेदर होने की बात थी।

    इस आदमी को की शान में कई मित्रों ने बाकायदा आपके साथ उसकी फोटुओं के साथ साबित करते हुए यह बताया कि यह दुनिया का महान अर्थशास्त्री है जिसके आगे दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री पनाह मांगते हैं। जबकि मुझे पहले पल से ही यह आदमी मानसिक विकृत, झूठा, फरेबी, लफंगा व लुच्चा आदमी प्रतीत हुआ है।

    ये मित्रगण जिनको न तो भारतीय समाज की समझ है, न ही अर्थशास्त्र की, न ही इन्होंने कभी कोई ठोस जमीनी काम ही समाज के लिए किया है, न ही इन्होंने अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जीवन की प्राथमिकताओं को सामाजिक प्राथमिकताओं के लिए भेंट ही चढ़ाया है। इन मित्रों के द्वारा इस मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी को महान अर्थशास्त्री मानने के पीछे उनके अपने मन के भीतर की ही वे कुंठित मानसिकताएं हैं जिनके कारण वे राजा या सामंत को सबसे योग्य, महान व दैवीय मानते हैं। इसलिए इस मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी की महानता व योग्यता का सबसे बड़ी कसौटी यही है कि आपने इसकी बेहूदी बकवास लगभग दो घंटे तक सुनी, आपने इसकी बेहूदी बकवास पर देश में आमूलचूल परिवर्तित करने वाली ऐतिहासिक क्रांति के बीज खोजे।

    यह मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी आदमी व इसके दुमछुल्ले मित्र व जानपहचान वाले फायदे में रहे। यह आदमी मीडिया में स्थान पाया, क्रांतिकारी सोच रखने वाले महान चिंतक आदि जैसे होने की फर्जी वाहवाही लूटा। इस आदमी के मित्र व जानपहचान वाले मानसिक विकृति वाले इस दंभ का मजा लिए कि वे इस आदमी के मित्र हैं या इसको जानते हैं। 

    लेकिन आपका व देश का क्या हुआ ….. आपके ऊपर सवाल खड़े होना शुरू हुए, आपको अगंभीर पुरुष माना जाने लगा, देश के लोगों की जो हालत है वह यदि आपको सच में ही नहीं पता तो यह अत्यधिक चिंता वाली बात है …..। यदि आप सच में देश के प्रति सहज भाव रखते हैं तो आपको इस आदमी व इस आदमी के मित्रों व जानपहचान वालों जैसे लफंगों, मानसिक विकृत व अधकचरे ज्ञानी लोगों से बचना चाहिए क्योंकि अपने देश का माइंडसेट ऐसा है कि लफंगे ही मौज करते हैं।

    जो आपने किया, करने के बाद भी जिस तरीके से हैंडल किया व कर रहे हैं; उससे लोगों को इतना तो स्पष्ट मालूम पड़ता जा ही रहा है कि आपमें देश को लफंगई के माइंडसेट से मुक्त कर पाने की दृष्टि, योग्यता व क्षमता नहीं; आप देश को समझते नहीं। इसलिए देश हित में बेहतर यही है कि केवल आप स्वयं को लुच्चों-लफंगों के स्वादिष्ट व लुभावने प्रस्तावों, दावों व तर्कों आदि के प्रभाव से ही मुक्त रख पाएं ताकि कम से कम देश और अधिक गर्त में तो नहीं पहुंचेगा।

     

    चलते-चलते :

     

    संभव है कि आपको लगता हो कि कबीलाई सोच व सभ्यता अबतक कि सबसे बेहतरीन सोच व सभ्यता थी। हो सकता हो आपको लगता हो कि चाणक्य का अर्थशास्त्र जो कबीलाई तौर-तरीकों पर आधारित था, वह दुनिया का सबसे बेहतरीन अर्थशास्त्र है। हो सकता हो आपको लगता हो कि देश के लोग मूर्ख हैं, उनको जैसे चाहे वैसे हांका जा सकता है।

     

    लेकिन मुझे लगता है कि देश के लोगों ने आप पर विश्वास किया था क्योंकि उनको लगा था कि आप उनके सपनों व कल्पनाओं को साझा करते हैं। आप उनको उनके सपनों व कल्पनाओं का देश बनाकर देंगें। बहुत लोग अब भी ऐसा ही सोचते हैं। लेकिन बहुत लोग ऐसे भी हैं जो अब यह मानने लगे हैं कि आपसे ऐसा संभव नहीं।

     

    जिन लोगों ने सिर्फ बैठे-बैठाए अय्याशी करने के लिए आपको ऐशोआराम उपलब्ध करवाने की शक्ति रखने वाला अवतार मानकर आपको बिना सवाल राजपाट सौंप दिया। आपको लगता है कि ऐसे लोग कबीलाई सभ्यता की ओर वापस जाना चाहेंगे। मुझे तो बिलकुल नहीं लगता है। आखिर कब तक लोग आपकी इन बातों पर विश्वास करते रहेंगे कि इतना कष्ट और झेल लो फिर जीवन स्वर्ग जैसा हो जाएगा। आखिर कब तक फर्जी सपनों व कल्पनाओं को देखते हुए लोग सब्र करते रहेंगे।

     

    दरअसल यह आदमी जो निहायत ही मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी है, की बात मानकर आपने लोगों के मन में गंभीर व चिंतनीय सवाल पैदा कर दिए हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आप केवल सपने दिखाते हैं, उन सपनों को धरातल में उतारने के लिए आप लोगों से कष्ट भोगने व बलिदान करने की मांग के ऊपर मांग प्रस्तुत करते हैं जबकि वास्तव में सपनों को धरातल पर उतार पाने की दृष्टि, सोच, समझ, योग्यता व क्षमता आप में नहीं है। …….

     

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  • समलैंगिकता – प्राकृतिक या अप्राकृतिक

    सामाजिक यायावर


    मैं जब प्राकृतिक शब्द का प्रयोग करता हूं तो इसका अर्थ प्रकृति की व्यवस्था के सहज नियमों को जानना, समझना व अनुपालन करना है, न कि केवल प्रकृति में होना मात्र। यदि प्राकृतिक होने का अर्थ प्रकृति में होना मात्र है तो फिर पर्यावरण असंतुलन, बलात्कार, शोषण आदि का कोई तात्पर्य नहीं रह जाता है। कुछ भी सब प्राकृतिक है।

    समलैंगिकता को मैं अप्राकृतिक मानता हूं। अप्राकृतिक क्यों मानता हूं क्योंकि प्रकृति में जिन भी स्तनपायी जीव जंतुओं के पास योनि व गुदा अलग-अलग हैं, उनमें गुदा-मैथुन नहीं होता है। दूसरी बात सेक्स प्राकृतिक रूप से संतानोत्पत्ति के लिए है। जीव जंतुओं में रात दिन जब मन हो जाए तब सेक्स नहीं होता है। जब संतानोत्पत्ति के लिए ऋतु आएगी तभी पशुओं में सेक्स होता है। जीवन की गति चलती रहे इसके लिए सेक्स एक व्यवस्था है प्रकृति में।

    समलैंगिकता को अप्राकृतिक मानने के बावजूद, मेरा ऐसा मानना है कि जो लोग समलैंगिकता को जीना चाहते हैं उनको ऐसा जीने का पूरा अधिकार है। उनको समलैंगिकता का प्रचार प्रसार करने, समलैंगिकता को प्रतिष्ठित करने, समलैंगिकता को महानता साबित करने, समलैंगिकता को धर्म के रूप में भी प्रतिष्ठित करने आदि-आदि का संपूर्ण अधिकार है।

    समलैंगिकता के विरोध का मतलब सिर्फ यह है कि स्त्री-स्त्री व पुरुष-पुरुष के साथ सेक्स न करे, जीवन भर सेक्स करते रहने के साथी के रूप में न चुने। दो पुरुष या दो स्त्री साथ में रहें लेकिन आपस में सेक्स न करें तो मामला समलैंगिकता का नहीं होता। मुख्य मामला सेक्स करने के तरीके का है और कुछ नहीं।

    यदि बात सेक्स करने के तरीके पर की जाएगी तो हममें से बहुत ऐसे लोग होगें जो अपने दाम्पत्य जीवन में अपनी पत्नी के साथ या अपनी प्रेमिका के साथ या वेश्या के साथ या बलात्कार करते समय या पशु के साथ गुदा मैथुन करते होगें। बहुत ऐसी स्त्रियां होगीं जो अपने पति से या प्रेमी से या पशु से या छोटे बच्चों से मुख-मैथुन करती होगीं। यह भी तो समलैंगिकता ही हुई।

    मैं समलैंगिकता को अप्राकृतिक इसलिए मानता हूं क्योंकि मैं गुदा-मैथुन, मुख-मैथुन, हस्त-मैथुन आदि को अप्राकृतिक मानता हूं। लेकिन मैं समलैंगिकता का विरोध नहीं करता क्योंकि मैं यह भी जानता हूं कि हम सभी लोग गर्भ में बीज बनने से लेकर मृत्यु तक पूरा का पूरा जीवन अप्राकृतिक रूप से जीते हैं।

    राष्ट्र की सीमाएं, संविधान, सेना, कानून, परंपराएं, कर्मकांड, धर्म, संस्कार, ईश्वर की कल्पनाएं, मुद्रा, व्यापार, बाजार, संपत्ति-अधिकार आदि-आदि सभी कुछ अप्राकृतिक है। समलैंगिकता की तुलना में बहुत अधिक खतरनाक कोटि के धूर्तता, नीचता व पाखंड से भरे हुए अप्राकृतिक हैं। जब इन जैसी अप्राकृतिक बातों को हमनें सर-आखों पर प्रतिष्ठित कर रखा है तो समलैंगिकता जैसी व्यक्तिगत-स्वाद पर आधारित इच्छा जो किसी का शोषण नहीं करती, हिंसा नहीं करती, पर सवाल उठाने व विरोध करने का कोई औचित्य नहीं।

    हमने धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कार जैसी निहायत ही अप्राकृतिक चीजों में स्वयं के संपूर्ण अस्तित्व को ही विलीन कर रखा है। हमने अपने स्वाद पर आधारित तौर-तरीके जैसे भोजन, भोजन करने के तौर-तरीकों, कपड़े पहनने के तौर-तरीकों, बोलचाल के तौर-तरीकों, अभिवादन करने के तौर-तरीकों, सम्मान प्रेम आदि को व्यक्त करने के तौर-तरीकों, संपत्ति कब्जाने व उसके बटवारे के तौर-तरीकों आदि-आदि को संस्कृति व सभ्यता आदि के रूप में प्रतिष्ठित कर रखा है।

    चलते – चलते :

    हम पूरा जीवन एक से बढ़कर एक अप्राकृतिक, धूर्तता, हिंसा, बेहूदगी व झूठ से भरे झोल-झपाटों को प्रतिष्ठा के साथ स्वयं को महान व अद्वितीय मानते हुए स्वीकार कर रखते हैं। लेकिन हम इतनी मूलभूत ईमानदारी क्यों नहीं रख पाते कि हम समलैंगिकता जैसी बातों को भी धर्म या संस्कृति या सभ्यता या स्वाद के एक तौर-तरीके के रूप में स्वीकार कर लें, या फिर हम किसी भी झोल-झपाटे को न स्वीकार करें।

     

    जब तक हम कंडीशनिंग से स्वयं को मुक्त करने का ईमानदार प्रयास नहीं शुरू करेंगें हम दोहरे चरित्र/कसौटियों/मापदंडों आदि को ईश्वरीय, महान व अद्वितीय आदि मानने की मूर्खता व भ्रम में जीते रहेंगे।

     

     

  • To be or not to be – Socio-political and Economic dehumanization and the next generation!

    Anupama Garg

    So the Indian currency controversy – err… No, the Indian currency crisis – erm…Well, the Indian currency reality? Scenario? Situation? Whatever you want to call it please! This reality has made me lose my faith in literally everything ! Everything that I stood for! In fact I didn’t even feel like writing about it and yet, I could not really calm myself down.

    I stood for structures, governance, low maintenance, paying taxes, being a law-abiding citizen. But more than anything, I believed in a family. I still do, but no longer do I believe in a family that I would have in future. I now, believe only in a family that I have by birth and by extension of emotions so far.

    Allow me to remind you, I’m an educated, free-spirited young woman raised in a traditional, low-middle income-group family. Through my hard work, I educated myself through university degrees and more. But that’s not all. I make it a point to stay updated about what happens in the world around me. I also ensure that my opinions are not biased as far as possible and that I try to probe beyond the obvious.

    Hence, I do understand the implications of a massive reform in order to remove black-money as they say. I understand the logic and the plea they give. I understand. I really do! However, I cannot ignore the other facts either. I cannot ignore that the state elections are approaching. I cannot ignore the population size of my country. I cannot ignore the number of ID-less, unidentified people in my land, people who are at the bottom of even the lowest socio-economic strata, people who feed hand-to-mouth. Those who have JDY accounts, but do not know how to use them are in trouble. Those who do not even have the accounts, are in an even pathetic state.

    Do not get me wrong. I elected this government and as a law – abiding citizen, I WILL obey the new regulation, maybe even see the glam points to the strategy despite the obvious loopholes. In fact I didn’t even want to write this. But my head just, wouldn’t stop hurting and my heart bleeds. I will always remember that the unstable world we live in, is not fit to marry and raise children.

    I am not a beaurocrat, an academician or a political or economic theory expert. I am a human being and I no longer want to marry. I no longer want to marry, have family and kids because I do not think this world is a safe or a sane place to live for us anymore; worse for the future generations, should we continue to choose silence, violence and ignorance.

    Call me despondent if you wish but all I am is merely disillusioned. I no longer want to have my savings (hard earned, devotedly saved, kept for critical emergencies at home), to be declared to the world, or trashed. I no longer want to bank on kids’ piggy banks for change.

    I don’t want to marry, have children and then have to let governments decide how my children and I will spend my, hard – earned, legal money. I don’t want my housewife mum to feel helpless in gifting some treats to her grand children when they visit her, because she didn’t have the little sum stowed in her box and she didn’t find time to go to the ATM. I don’t want her to feel at a loss of something deeper – her sense of strength and freedom.

    I do not wish to raise my children in fear; in insensitivity to the lowest socio-economic strata of the society being considered dispensable. I don’t want my next generation to witness what happens in public health system when hospital bills and medicines can’t be bought only because a certain denomination of currency is not available.I do not want them to witness this loss of human dignity. I do not want my children to have a big fat wedding, but that’s because I don’t want them to grow entitled. Not because their savings were trashed overnight.

    I do not want them to escort senior citizens in Kms long queues – not because they will be ill-bred, but because the senior citizens shouldn’t have to stand in queues to convert their long saved money, in the first place.

    I do not want to be standing in queues to get my own money as if it was alms and not be able to work for two days. At least, I do not want my children to have to witness the shame. I do not want them to watch the racism, the class-conflict, the feeling of being underprivileged. I do not want them to witness humanity and support systems at the cost of this massive dehumanization.

    I do not want to raise my children in a world full of greed, chaos and hatred.
    Look at Greece, look at Brexit, look at US, look at India, Middle East, Somalia, Cuba, South Asia. Look everywhere carefully. Look at what we humans HAVE done and CONTINUE doing to ourselves. It’s sad. It’s sad to see what we’ve done to this beautiful world we were gifted with. I don’t want to add to it. I’m sure there are many others who already feel like this, or will slowly and gradually start feeling like this.

    Does this mean I will stop making an effort to make this world a better place? Does this mean I will stop voicing the concerns of those around me? Does it mean, common, simple, loving and good people will stop helping each other, doing real, solid, constructive effort? Well, the answer is no as most of you would agree.

    So, let’s be broken hearted, let our hearts bleed, let us weep together and wipe each other’s tears. But more importantly, let’s remember that we will not fall in stupor again, we’ll not close our eyes any more, and we will be vigilant, hard working, aware and mature citizens of our democracy and that of the world at large. Let our blood, tears and sweat motivate us more to make this world livable again!
    After all, there’s always hope!

    Anupama Garg

    Anupama identifies herself as a young, energetic, thoughtful and sensitive human being before anything else. An author, a content strategist, a communications expert, a ghost writer, a blogger, a devil’s advocate and a woman are some other hats she wears.

    She writes books on controversial subjects, expresses her opinions and thoughts vocally and believes in empowerment and responsibility of expression. She can be reached on her LinkedIn/Facebook profile(s) at:

    https://in.linkedin.com/in/anupama-garg-1b059b31

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  • भ्रांतियों से मुक्त होकर रचनात्मक कान्फ्लिक्ट-रिजोलूशन की गतिमान प्रक्रियाओं को समझने से ही बस्तर में कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारियों की जरूरत व योगदान को समझना संभव हो सकता है

    सामाजिक यायावर


    प्रस्तावना

    मेरा निवेदन स्वीकारें और खुले दिमाग से व्यवहारिकता के साथ इस लेख को पढ़ने का प्रयास कीजिए। लेख कुछ लंबा है इसलिए धैर्य की भी महती जरूरत है।

    यदि हम बस्तर क्षेत्र में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन में अपना योगदान देना चाहते हैं तो हमें बस्तर को वास्तविक धरातल से समझना पड़ेगा। बस्तर को समझने के लिए हमें पूर्वाग्रहों, पक्षपातों, पूर्वधारणाओं, भ्रांतियों व फ्रैबीकेटेड-तथ्यों आदि से मुक्त होना पड़ेगा। हमें फ्रैबीकेशन, प्रायोजित-प्रतिस्थापनाओं व प्रायोजित आदिवासी हीरोज के जाल से बाहर आना पड़ेगा। यदि हम वास्तव में बस्तर के आम आदिवासियों के प्रति संवेदनशील हैं तो हमें बस्तर के वास्तविक धरातल को गहराई से समझना पड़ेगा।

    बहुत अधिक संभावना इस बात की है कि मेरे इस लेख से छत्तीसगढ़ के नीतिनिर्माता नौकरशाह व नागरिक प्रशासनिक नौकरशाह आदि भी असहमत हों, मुख्यधारा के लोग जो बस्तर की धरातलीय वास्तविकता से परिचित नहीं है उनका असहमत होना तो अवश्यंभावी है।

    अधिकतर लोगों के द्वारा असहमत होने की प्रबल संभावनाओं के बावजूद मैं बस्तर समाधान के मुद्दे पर भिन्न दृष्टिकोण से कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारियों के योगदान पर अपनी बात रखना चाहता हूं। कई बार हम वस्तुस्थिति व तथ्यों से परिचित न होने के कारण भिन्न दृष्टिकोण से वस्तुस्थितियों को नहीं देख पाते हैं। बस्तर जैसे क्षेत्रों में समाधान के लिए हमें बहुत सारे कोणों से वस्तुस्थितियों को समझना पड़ता है। पूर्वाग्रहों, पक्षपातों तथा मनगढ़ंत व फ्रैबीकेटेड तथ्यों की भरमार के कारण वस्तुस्थिति को समझ पाना असंभव सा हो जाता है, इसलिए बहुत बार हम इन कारकों के आधार पर अपनी कल्पना, तार्किकता व सैद्धांतिकता के कारण अपना पक्ष चुन लेते हैं जो गलत भी हो सकता है।

    जब बात बस्तर की आती है तो माओवाद, आदिवासी, सलवाजुडूम व आदिवासी हीरोज की बात आती ही है। आदिवासी हीरोज से मेरा तात्पर्य उन लोगों से है जिनको बस्तर के आदिवासी लोगों के लिए नागरिक व पुलिस प्रशासन के शोषण के खिलाफ संघर्ष व आदिवासियों के लिए विकास के कार्य करने वालों के रूप में, कुछ NGOs, माओवाद के प्रति झुकाव लिए हुए प्रतिष्ठित लेखकों, प्रोफेसरों व मीडिया आदि के द्वारा प्रायोजित किया जाता है। तथ्यों के फ्रैबीकेशन का मूलभूत कारण निहित-स्वार्थ, पूर्वाग्रह, पक्षों के प्रति झुकाव व वस्तुस्थिति की सही सूचनाएं न होना ही है।

    बस्तर में चल रहे कान्फ्लिक्ट-रिजोलूशन के दीर्घकालिक-रचनात्मक समाधान के प्रयासों की चर्चा मैं बस्तर पर अपनी आगामी किताब में कर रहा हूं। यहां इस लेख में बहुत तत्वों पर बात करना संभव नहीं इसलिए केवल कुछ भ्रांतियों पर प्रथम दृष्टया-चर्चा करना चाहता हूं। यदि हम बस्तर से संबंधित कुछ मूलभूत भ्रांतियों को समझ लें तो कल्लूरी जैसे अधिकारियों की जरूरत व योगदान की व्यवहारिकता स्वतः समझ में आने लगती है। यह भी समझ आता है कि कल्लूरी जैसे अधिकारियों के व्यवहारिक योगदान को यूं ही नहीं नकारा जा सकता है।

    भ्रांतियां व हमारे मानदंडों का घिनौना दोगलापन

    बस्तर से जुड़े कुछ मुद्दों पर बेहिसाब व अनापशनाप भ्रांतियां फैलाई गई हैं। फ्रैबीकेशन व भ्रांतियों का स्तर इतना अधिक संगठित है कि उच्चतम न्यायालय तक को तथ्यों के फ्रैब्रीकेशन से भ्रम में डाल दिया जाता है।

    माओवादी व आदिवासी :

     

    bomb-narayanpur

    बस्तर के बारे में सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि माओवादी आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, आदिवासियों के हित के लिए काम करते हैं और स्थानीय आदिवासी ही माओवादी है। बस्तर के आम आदिवासी की बात तो छोड़ ही दीजिए, वह आदिवासी भी जो संघम का सक्रिय सदस्य है तक भी माओवाद का ककहरा नहीं जानता है। कुछ लोगों को माओवाद के शब्द रटा दिए गए है। जब 12-13 वर्ष की आयु के बच्चों को उनके माता पिता के घर से जबरिया अपहृत कर ट्रेनिंग कैंपों में डालकर कई-कई वर्षों तक वही शब्द व तर्क जबरिया ठूंस-ठूंस कर रटाए जाएंगें तो इससे मानसिक विकास व सोचने विचारने की शक्ति विकसित होगी या कुंठित होगी। स्वयं सोच लीजिए। क्या यह हिंसा नहीं है। बेहद ही खतरनाक हिंसा है। पीढ़ी दर पीढ़ी तक अनवरत चलने वाली हिंसा है।

    आदिवासियों की हालत यह है कि वे दिन में सड़क बनाते हैं तो रात में माओवादियों के दबाव में सड़क खोदते हैं लेकिन कहते हैं कि हमने स्वेच्छा से सड़क खोदी। प्रशासन के पास चुपके से आते हैं, कहते हैं कि हमको सड़क चाहिए, स्कूल चाहिए, अस्पताल चाहिए लेकिन माओवादियों को पता न चले कि हम यह सब मांग रहे हैं।

    संभव है कि भारत के दूसरे क्षेत्रों में माओवादियों की कोई विचारधारा हो जिसका आदिवासियों या आम लोगों की दुख तकलीफ आदि से रिश्ता हो, लेकिन बस्तर में ऐसा बिलकुल भी नहीं है। बस्तर में माओवाद कैसे पनपा इस पर विस्तृत बात बस्तर पर मेरी आने वाली किताब में होगी। प्रथम दृष्टया आप यह समझिए कि बस्तर में माओवाद बस्तर के आम आदिवासियों का प्रतिनिधित्व बिलकुल नहीं करता है, उल्टे आम आदिवासी माओवाद से त्रस्त है।

    सलवा-जुडूम :

    सलवा जुडूम के बारे में इतनी अधिक भ्रांतिया फैलाईं गईं कि सलवा जुडूम का नाम लेना भी गाली देना जैसा बना दिया गया। उच्चतम न्ययालय को प्रतिबंध लगाना पड़ गया। अंदाजा लगाया जा सकता है कि तथ्यों को फैब्रीकेट करने व भ्रांतियां फैलाने की श्रंखला कितनी गहरी व ढांचागत है।

    सलवा जुडूम के बारे में कितनी ही कहानियां गढ़ी गईं। चूंकि लोग सलवा जुडूम व बस्तर की आदिवासी संस्कृति व धरातल से परिचित नहीं इसलिए गढ़ी गई कहानियां सच मान ली जाती रहीं।

    सलवा जुडूम की शुरुआत बीजापुर जिले के एक माओवाद से त्रस्त गांव के तीन-चार बिलकुल निरक्षर व मासूम आदिवासी बंधुओं ने की थी। उनके पास इच्छा तो थी लेकिन ताकत नहीं थी माओवाद की हिंसा से लड़ने के लिए। सलवा जुडूम एक खालिस स्वतःस्फूर्त जनांदोलन था। हजारों-हजार आम आदिवासी इसके साथ खड़ा था। माओवादी नहीं चाहते थे कि इस तरह का कोई जनांदोलन खड़ा हो पाए क्योंकि ऐसा स्वतःस्फूर्त आंदोलन उनके अस्तित्व को खतम कर सकता था। मुख्यधारा के लोगों की इस भ्रांति को खतम कर सकता था कि माओवादी आदिवासियों के प्रतिनिधि हैं।

    माओवादियों के कारण सैकड़ों गांवों को वीरान होना पड़ा। सैकड़ों हजारों मासूम आदिवासियों की हत्याएं कर दी गईं। हजारों आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा। लेकिन ठीकरा हमेशा फोड़ा गया सलवा जुडूम के ऊपर।

    यदि हम माओवाद के नामपर आदिवासियों के हथियार उठाने को न्यायोचित मानते हैं तो जब माओवाद की हिंसा व शोषण से ऊबकर आम आदिवासी माओवाद का संगठित विरोध करने के लिए स्वतःस्फूर्त जनांदोलन सलवा जुडूम बनाता है तो हम उसका विरोध क्यों करते हैं, जबरिया बदनाम क्यों करते हैं, उसको नष्ट करने के लिए पूरी ताकत क्यों लगा देते हैं। हमारे मानदंड इतने सतही खोखले व दोगले क्यों हैं।

    हत्याएं, शोषण व यौन-शोषण :

    बस्तर में पुलिस जब किसी का इनकाउंटर करती है तो हम यह साबित करके ही दम लेते हैं कि इनकाउंटर बिलकुल गलत था। लेकिन हम माओवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं का विरोध क्यों नहीं करते हैं जबकि माओवादियों ने पुलिस की तुलना में कई गुना अधिक मासूम आदिवासियों की हत्याएं की हैं। हम एक लाइन का भी विरोध नहीं करते हैं। पुलिस को नियंत्रित करने के लिए न्यायालय है, मानवाधिकार आयोग हैं, हम और आप हैं। लेकिन हम आदिवासियों की सुरक्षा व विकास व मानवाधिकार के नाम पर माओवादियों का विरोध क्यों नहीं करते, क्या वे ईश्वरीय अवतार हैं। हमारे मानदंड इतने दोगले क्यों हैं।

    हम पुलिस कस्टडी में दी जाने वाली प्रताड़नाओं की सच्ची झूठी कहानियों की सत्यता की परख किए बिना तुरंत से सच मानकर पुलिस का विरोध करना शुरू कर देते हैं। लेकिन प्रतिवर्ष माओवादियों द्वारा सैकड़ों 12-13 वर्ष के बच्चे-बच्चियों को बर्बरता पूर्वक उठाकर ट्रेनिंग कैंपों में डाल दिए जाने व वहां पर होने वाले शोषण व यौन-शोषण का विरोध हम क्यों नहीं करते हैं। 

    क्या यह मान लिया जाए कि किशोरियों का ट्रेनिंग कैंपों में लगातार होने वाला यौन-शोषण, ब्रेन-वाश कर दिए जाने के कारण यौन-शोषण नहीं रह जाता है। महान मानवीय संवेदनशील व उच्चतर सामाजिक मूल्यों वाला विशिष्ट तत्व हो जाता है।

    जांचों व रिपोर्टों की विश्वसनीयता का स्तर

    CBI आदि जैसी आधुनिक तकनीक व सुविधाओं से समृद्ध विशेषज्ञ व प्रतिष्ठित संस्थाओं की जांचे भी बस्तर जैसे इलाकों में कितनी सही या गलत हो सकती हैं इसको सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है।

    मान लीजिए आप बस्तर के बीजापुर जिले के सुदूर इलाके में जा रहे हैं। रास्ते में आपको दो बच्चे मिलते हैं जिनकी उम्र महज 9 से 13 वर्ष है। वे पत्तों के बने दोनों में जामुन लिए हैं कि यदि कोई उस रास्ते से गुजरे और उनसे जामुन खरीदता है तो उनको पांच दस रुपए मिल जाएंगे। आप जामुन खरीदते हैं। आपको पता नहीं होता लेकिन आपके उस रास्ते से गुजरने की जानकारी ये बच्चे संघम के सदस्यों को देते हैं। लौटते समय माओवादी या संघम सदस्य आपकी खाल को भोथरे पत्थर से छील-छील कर घंटों तड़पा-तड़पा कर आपकी हत्या कर दी जाती है।

    अगले दिन वही बच्चे फिर से दोनों में जामुन लिए खड़े होते हैं। आपकी दृष्टि में ये बच्चे नृशंस हत्या के अपराध में भागीदार हैं या नहीं। यदि आप उन बच्चों को हत्या के अपराध में भागीदार मानते हैं तब भी जब तक खुद संघम सदस्य या खुद वे बच्चे नहीं स्वीकारेंगे तब तक आप कैसे साबित कर सकते हैं या जान सकते है कि वे बच्चे हत्या के अपराध में भागीदार थे। आदिवासी यदि संघम सदस्य नहीं भी है तो भी वह क्यों माओवादियों व संघम के विरुद्ध जाने की कोशिश करेगा यह जानते हुए भी कि अगले ही दिन उसकी सपरिवार तड़पा-तड़पा कर हत्या कर दी जाएगी।

    अनुवादक यदि स्थानीय है तो क्या वह अपने पूर्वाग्रह के अनुसार तथ्यों को तोड़मरोड़ नहीं सकता। यदि अनुवादक बाहरी है तो वह शाब्दिक व व्याकरणीय अनुवाद तो कर सकता है लेकिन भावात्मक अनुवाद तो नहीं ही कर सकता है जब तक कि स्थानीय समाज को बेहतर तरीके से समझता नहीं होगा। इस तरह के अभावात्मक अधकचरे अनुवाद से कही गई बात का वास्तविक अर्थ व संदेश पूरी तरह से कुछ का कुछ और निकल सकता है। जब CBI जैसी सक्षम अत्याधुनिक तकनीक व सुविधाओं से युक्त संस्थाओं की जांच दावे से पूरी सही नहीं कही जा सकती। जब CBI की भी अपनी सीमाएं हैं तो बाहरी लोग कुछ घंटे या कुछ दिन के लिए किसी स्थान में जाकर वहां के चुनिंदा स्थानीय लोगों से चर्चा करके बिलकुल सही व निष्पक्ष जांच कर पाने का दावा कैसे ठोंक सकते हैं।

    ऐसी जांचों का परिणाम मूलभूत रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि जांच कर्ता के समक्ष जिस स्थानीय व्यक्ति या समूह को प्रस्तुत किया गया है वह किस पक्ष की ओर झुकाव रखता है। पुलिस आम आदमी की सुरक्षा सुदूर गावों में हर क्षण नहीं कर सकती है, इसलिए अधिकतर ऐसी जांचों में माओवाद के विरुद्ध बात न करना व पुलिस के विरुद्ध में बात करना जीवन के लिए बहुत अधिक सुरक्षित होता है।

    मीडिया के जो लोग पहुंचते हैं और कहीं कुछ दिन रुककर लोगों से कुछ चर्चा करते हैं। स्थानीय आदिवासी मीडिया के लोगों का पक्ष व पूर्वाग्रह समझ कर ही अपनी बात रखेगा। बाहर से जाने वाले कितने मीडिया वाले लोग हैं जिनको माओवादियों द्वारा बर्बरता से की जाने वाली हत्याओं की जानकारी दी जाती है। माओवादी गावों से 12-13 साल की लड़कियों को उठा ले जाते हैं, इसकी चर्चा तो उठाई गई लड़कियों के माता-पिता भी बाहरी मीडिया के लोगों से नहीं करते हैं। क्यों करेंगें, क्यों वे अपनी व अपने परिवार की जान खतरे में डालेंगें।

    मीडिया के लोगों की रिपोर्टें इस बात पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं कि उन्होंने जिन लोगों से बात कीं उन लोगों का झुकाव किस तरफ है तथा खुद मीडिया के लोगों का झुकाव किस तरफ है।

    बस्तर के वर्तमान पुलिस महानिरीक्षक “कल्लूरी”

    कल्लूरी को मैं प्रत्याक्रमण का विशेषज्ञ पाता हूं। ध्यान दीजिए मैं कह रहा हूं कि वे प्रत्याक्रमण के विशेषज्ञ हैं, मैं यह नहीं कह रहा कि वे आक्रमण के विशेषज्ञ हैं। बस्तर में सुदूर गांवों तक में बिलकुल नीचे तक सूचनाओं के बेहद व्यवस्थित श्रंखला तंत्र की स्थापना व मजबूत पकड़ रखने वाले कल्लूरी हर स्तर पर प्रत्याक्रमण करते हैं माओवादियों की हिंसक घटनाओं जैसी प्रत्यक्ष आक्रमण के प्रत्याक्रमण से लेकर माओवादियों के समर्थकों के द्वारा फ्रैबीकेटेड तथ्यों व आदिवासी हीरोज के प्रायोजन रूपी अप्रत्यक्ष आक्रमण के प्रत्याक्रमण तक।

    हर स्तर पर प्रत्याक्रमण की विशेषज्ञता ही कल्लूरी को चहुंओर से आलोचनाओं का शिकार बना देती है। माओवादी, माओवादी समर्थक तथा क्रांति के साथ रोमांस की भावना से नियंत्रित होने वाले वे लोग जो वास्तविक धरातल से अपरिचित हैं या फ्रैबीकेटेड तथ्यों को ही अकाट्य सच मान लेते हैं, आदि जैसे लोग कल्लूरी जैसे अधिकारियों के इस स्तर के भयंकर विरोधी बन जाते हैं कि अपने अंदर वास्तविकता व व्यवहारिकता को समझकर विश्लेषण की संभावना के भ्रूण को भी नहीं उत्पन्न होने देते हैं। धरातलीय वस्तुस्थिति को कान्फ्लिक्ट-रिजोलूशन के व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखने समझने की बात तो कल्पनातीत है। 

    कल्लूरी व आदिवासी समाज
    कल्लूरी व आदिवासी समाज
    बस्तर में रहने वाला आम आदिवासी व आम गैर-आदिवासी लोग, जिनका NGO-दुकानदारी या राजनैतिक या माओवाद का समर्थन आदि पर आधारित  निहित स्वार्थ नहीं हैं, अपवाद छोड़कर वे सभी एक तथ्य को स्वीकार करते हैं कि जब से कल्लूरी बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक बने हैं तब से माओवादियों की गतिविधियां बहुत अधिक नियंत्रित हुई हैं। घोर माओवादी नियंत्रित इलाकों में भी सड़के, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक वितरण आदि नागरिक सेवाएं पहुंची हैं। सैकड़ों गावों के आम आदिवासियों ने स्वयं को सुरक्षित महसूस करना शुरू किया है।

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    पुलिस व नागरिक प्रशासन के बेहतर तालमेल से ही सुदूर माओवादी इलाकों में विकास व शांति का पहुंच पाना संभव हो पा रहा है। अन्यथा विकास केवल जिला मुख्यालयों तक ही सीमित था क्योंकि तुलनात्मक रूप से जिला मुख्यालय आदि ही सबसे सुरक्षित इलाके थे। जिसने भी अंदर के इलाकों में जाने का प्रयास किया उसकी स्थिति सुकमा के पूर्व जिलाधिकारी अलेक्स पी मेनन जैसी कर दी गई। अलेक्स मेनन ग्रामीण विकास के बेहतरीन आइडियाज के साथ गांव-गांव जा रहे थे, लोगों पर विश्वास करके बिना सुरक्षा के आम-आदिवासी के पास उसके जैसा बनकर पहुंचते थे। सैंद्धांतिक रूप से यह बेहतर बात थी लेकिन व्यवहारिक रूप में यह हुआ कि उनकी इस शैली ने माओवादियों को उनका अपहरण करने के लिए प्रोत्साहित किया। बेहतरीन आइडियाज रखे रह गए।

    ज्यों-ज्यों स्थितियां नियंत्रण में आती चली जाती हैं या परिस्थितियां परिवर्तित होती हैं त्यों-त्यों कल्लूरी की क्रियान्वयन नीतियां भी बदलती जाती हैं। माओवाद का प्रभाव क्षेत्र कम होने के साथ ही कल्लूरी ने माओवादियों के आत्मसमर्पण व पुनर्वास की नीति को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया। आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवनयापन करने में भी भरपूर सहयोग करते हैं। कुछ माओवादियों की धूमधाम से शादी भी कराई। 

    इस लेख में कल्लूरी की कुछ फोटो दे रहा हूं, इनमें से हर एक फोटो बिना शब्दों के ही बहुत कुछ कहती है।

    चलते-चलते

    मैंने पिछले ग्यारह-बारह वर्षों में बस्तर को बदलते देखा है। बस्तर के दूर-दराज के कई सैकड़ा गांवों को एक दशक पहले ही देख चुका था। तब बस्तर में सड़कें नहीं होतीं थीं, पेट्रोलपंप नहीं होते थे, मोबाइल नहीं होते थे। एक गांव से दूसरे गांव में जाने के लिए जंगली रास्ते होते थे, माओवाद अपने पूरे उफान पर था ही। न मेरी कोई NGO उस समय थी और न ही आज है, न मुझे वहां जाने के लिए कहीं से कोई फंड मिलता था, न ही मैंने कभी कहीं माओवाद पर कोई लेख या रिपोर्ट ही लिखा। तात्पर्य यह कि मेरा कोई निहित स्वार्थ नहीं रहा, अपितु केवल वस्तुस्थिति को समझने व आम आदिवासियों के विकास की चेष्टा करना ही उद्देश्य रहा। एक दशक से अधिक समय तक मैंने बस्तर को धैर्य के साथ धरातल में रहते हुए देखा, समझा व जाना है।

    बस्तर बहुत अधिक बदल रहा है। बस्तर में रचनात्मक विकास की क्रांति हो रही है। यह क्रांति करने वाले बाहर से आए हुए लोग नहीं है वरन हमारे ही देश के वे नौजवान हैं जो कि IAS व IPS बनते हैं। बस्तर में प्रशासन का तालमेल दिखता है। नए अधिकारियों के द्वारा पूर्व के अधिकारियों के काम को आगे बढ़ाया जाना दिखता है।

    छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कितना अच्छे हैं या कितना बुरे यह मैं दावे से नहीं जानता। लेकिन एक बात मैं दावे से जानता हूं कि बस्तर में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन की दिशा में जो गंभीर व दीर्घकालिक रचनात्मक विकास व समाधान के कार्य हो रहे हैं, वह रमण सिंह की नेतृत्व दूरदृष्टि के बिना बिलकुल भी संभव नहीं। यह रमण सिंह की इच्छाशक्ति, दृढ़ता व अपने निर्णय शक्ति पर विश्वास ही है कि अनगिनत आलोचनाएं झेलने के बावजूद वे बस्तर में जुझारू व कर्मठ अधिकारियों को भेजते हैं, उन पर विश्वास करते हैं तथा उनको प्रोत्साहन देते हैं।

    मैं छत्तीसगढ़ सरकार की कई नीतियों व तौर तरीकों से बिलकुल सहमत नहीं, लेकिन जब बात बस्तर में सामाजिक समाधान व रचनात्मक विकास की आती है तब मैं अपने आपको छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, उनकी सलाहकार टोली व बस्तर के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ खड़ा पाता हूं।  बस्तर में जैसी गति व दिशा चल रही है यदि वैसी ही चलती रही तो आगामी कुछ वर्षों में बस्तर क्षेत्र विकास व नागरिक सुविधाओं के मुद्दे पर देश के सबसे बेहतरीन इलाकों में से होगा।  इसका संपूर्ण श्रेय रमण सिंह, उनकी सलाहकार टोली व प्रशासनिक अधिकारियों को ही जाता है।

    IAS अधिकारियों को तो उनके प्रयासों के लिए प्रशंसा व पुरस्कार मिल जाते हैं लेकिन कल्लूरी जैसे अधिकारियों को मिलती हैं सिर्फ गालियां व आलोचनाएं। जबकि बस्तर में कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति के बिना नागरिक प्रशासन सामान्य मलहम लगाने जैसा छिटपुट सेवा जैसा काम तो करता रह सकता है लेकिन विकास के ठोस व दीर्घकालिक कार्यक्रम नहीं चला सकता है, सुदूर इलाकों में तो बिलकुल भी नहीं।

    यदि बस्तर की पुलिस व कल्लूरी सच में वैसे ही राक्षस हैं, रावण हैं जैसा कि प्रायोजित किया जाता है तो बस्तर में विकास व रचनात्मक कार्य संभव ही नहीं हो पाता। रचनात्मक विकास की वास्तविकता तो यह है कि पुलिस का नागरिक प्रशासन के साथ संपूरकता का तालमेल है तभी वहां इतनी गति से काम हो पा रहे हैं।

    इसलिए बस्तर को यदि अनबलगन, आर० प्रसन्ना, ओमप्रकाश चौधरी, पी० दयानंद, नीरज बनसोड़, के० देवासेनापथि, अमित कटारिया, अब्दुल हक, अलेक्स मेनन, डा० अय्याज तांबोली, टामन सिंह सोनावानी, सौरभ कुमार व सुश्री अलारमेलमंगई आदि-आदि जैसे IAS अधिकारियों की जरूरत है तो स्व० राहुल शर्मा, अमरेश मिश्र, अभिषेक मीणा, के एल ध्रुव, कल्यान इलेसा, कामलोचन कश्यप, एम० एल० कोटवानी, आर० एन० दास व संतोष सिंह आदि-आदि जैसे IPS अधिकारियों व कल्लूरी जैसे प्रत्याक्रमण विशेषज्ञ पुलिस अधिकारियों की भी जरूरत है।

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  • जो भारत के कालाधन की वास्तविकता का केवल ककहरा ही समझते हैं मेरा दावा है कि वे यह भी समझते हैं कि सस्ती लोकप्रियता वाले चोचले कालाधन का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते उल्टे कालेधन के नेक्सस को मजबूती व सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं

    सामाजिक यायावर


    मोटा-मोटी समझा जाए तो भारत में कालाधन दो प्रकार का होता है। लेख को पढ़ने के बाद आप स्वयं ही तय कर लें कि क्या सतही चोचलेबाजी से वास्तविक कालेधन पर नियंत्रण संभव है। सतही चोचलेबाजी से उल्टे वास्तविक कालाधन व कालाधन रखने वाला अधिक सुरक्षित व ताकतवर होता जाता है। लोगों की नजरों में कालाधन न रखने के रूप में सदचरित्रता का प्रमाणपत्र ऊपर से मिल जाता है।

    लेखाजोखा की चतुराई से पैदा किया गया कालाधन

    ऐसा कालाधन आयकर से बचने के लिए आय को कम बता कर आयकर न दिए जाने के कारण बनता है। इस प्रकार के कालाधन में कम से कम 70 % हिस्सा कालाधन नहीं होता है। क्योंकि यदि आय आयकर की सबसे ऊपर वाली स्लैब में भी आती है तो भी आयकर 30% ही होगा। इस प्रकार वाले काला धन में अधिकतम केवल 30% की ही आयकर चोरी संभव होती है। इसमें आम आदमी के विकास के लिए सार्वनजिक संपत्तियों की चोरी, देश की संपत्ति पर कब्जा, देश के लोगों का संगठित रूप से शोषण, प्रताड़ना आदि की मात्रा न के बराबर रहती है।

    इस प्रकार का कालाधन भारत के सभी व्यापारियों के पास होता है। चाहे वह छोटा हो या बड़ा। छोटे कस्बे का हो या मेट्रो शहरों का। पूरे देश में कुछेक अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो गांव से लेकर देश की राजधानी तक भारत के सभी व्यापारी बिक्री व आय कर की चोरी करते हैं। इस प्रकार का कालाधन उन लोगों के पास भी होता है जो कंपनियों में नौकरियां करते हैं और कभी-कभार अवसर मिलने पर फर्जी बिल लगा कर अपने पास कुछ पैसा बना लेते हैं।

    इस प्रकार के कालाधन में सार्वजनिक संपत्तियों, राष्ट्र की संपत्तियों पर कब्जा नहीं होता है, लोगों का शोषण नहीं होता है, हिंसा नहीं होती है, धूर्तता नहीं होती है। केवल कर चोरी होती है वह भी लिखापढ़ी की चतुराई व पारस्परिक निर्भरता से, मसलन खरीदार भी खुश होता है कि उसका वैट बच गया क्योंकि पक्का बिल नहीं बना। लगभग सभी स्तरों पर इस प्रकार के कालेधन की पैदाइश होती है।

    इस प्रकार का कालाधन जल्दी पकड़ाई में आ जाता है क्योंकि व्यापार के लिए व्यापारियों को कैश इन हैंड रखना होता है क्योंकि हर स्तर पर व्यापार कैश इन हैंड ही होता है ताकि बिक्री व आय कर से बचा जा सके। बहुत ऐसे व्यापार हैं जिनका चरित्र ही ऐसा होता है कि पूरा का पूरा व्यापार ही कैश इन हैँड से चलता है, व्यापारी चाहे तब भी वह बिल-वाउचर नहीं बना सकता है, संभव ही नहीं। इसलिए व्यापारी के न चाहते हुए भी उसके पास का धन तकनीकी रूप से कालाधन की श्रेणी में आ जाता है।

    बिक्रीकर के अधिकारियों, विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों व आयकर के अधिकारियों को दी जाने वाली घूस जो देनी ही है अन्यथा उनसे बिना मतलब की परेशानी लगातार झेलनी पड़ती है। यह राशि बिना बिल बाउचर में झोल किए हुए पैदा ही नहीं की जा सकती है। भारत में सरकारी अधिकारियों को इतने अधिक अधिकार हैं कि एक झटके में दशकों से चली आ रहे व्यापार को ताला पड़वा सकते हैं।

    इस प्रकार का कालाधन स्वेच्छा से कई गई कर चोरी व लालफीताशाही के प्रपंचों व प्रताड़नाओं की विवशता के कारण उत्पन्न होता है।

    धूर्तता, बर्बरता, क्रूरता व भ्रष्टाचार के व्यापक नेक्सस से पैदा किया गया कालाधन

    इस प्रकार का कालाधन भ्रष्टाचार, नौकरशाही के सामंती अधिकार, सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ व्यापक नेक्सस आदि से उत्पन्न होता है। इस प्रकार के कालेधन में हर एक पैसा कालाधन होता है और बिना अपवाद सारा का सारा कालाधन सार्वजनिक संपत्तियों व राष्ट्र की संपत्तियों पर कब्जे, देश के लोगों के शोषण व प्रताड़ना तथा बर्बरता व निर्लज्जता से पैदा किया जाता है।

    इस प्रकार का कालाधन बहुत अधिक खतरनाक होता है। भारत में नेक्सस इतना तगड़ा है कि इस कालाधन को साबित करना बिलकुल ही असंभव है। कालाधन रखने वाले मूछों में ताव देते हुए बाकायदा खुद को ईमानदार घोषित करते हुए रहते हैं, क्योंकि उनको पता है कि उनके पास कालाधन है यह साबित हो ही नहीं सकता है। इनको खुद पर नहीं नेक्सस पर विश्वास होता है।

    चूंकि हर स्तर पर नेक्सस है इसलिए लिखापढ़ी काफी दुरुस्त रहती है, या तो सभी पकड़े जाएं या कोई नहीं। इस नेक्सस में व्यापारी, NGO, मानवाधिकार कार्यकर्ता, मीडिया, न्यायपालिका, कार्यपालिका व विधायिका सभी गुथ्थमगुत्था हैं।

    इस प्रकार के कालेधन की उत्पादन की सबसे महत्वपूर्ण व मूलभूत कड़ी हर स्तर पर भारत की नौकरशाही है। बिना इस कड़ी के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। भ्रष्टाचार की जांच भी यही कड़ी करती है, भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्यवाही करने का अधिकार भी इसी कड़ी के पास रहते हैं। न्यायपालिका भी नौकरशाही ही है। सार्वजनिक व राष्ट्रीय संपत्तियों के संदर्भ में नीतियां बनाने का अधिकार भी इसी कड़ी के पास रहते हैं। बहुत गहरा व व्यापक नेक्सस है, इस नेक्सस को छुआ नहीं जा सकता, बिलकुल सुरक्षित नेक्सस। इनमें हर स्तर पर कालाधन पैदा करने वाली कड़ियों में तीन प्रमुख हैं। मीडिया को इनमें इसलिए नहीं रख रहा क्योंकि ऊपर के लेवल की बात यदि छोड़ दी जाए तो पत्रकारों के पास छोटा हिस्सा ही आ पाता है जबकि बदनामी अधिक पाता है।

    व्यापारी व NGO 

    मैं व्यापारी व NGO को इसलिए एक साथ रख रहा हूं क्योंकि सरकारी ग्रांट से चलने वाले NGO व व्यापारियों का चरित्र स्तर के श्रेणी पर एक समान ही होता है। NGO को ज्यादे खतरनाक व नीच इसलिए मानता हूं क्योंकि NGO सामाजिक विकास के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति कब्जाता है। नेक्सस व सेटिंग के आधार पर सरकारी ग्रांट से चलने वाले NGO कई प्रकार के होते हैं। इनमें से एक वे होते हैं जो स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों व नेताओं से सेटिंग करके प्रोजेक्ट लेकर पैसा कमाते व कमवाते हैं। इनके पास का एक-एक पैसा कालाधन होता है और लोगों के विकास के लिए प्रयोग किए जाने वाला पैसा होता है। इनके घर की एक-एक ईंट, इनके बच्चों के मुंह का एक-एक निवाला सभी कुछ देश की संपत्ति का होता है। बहुत व्यापारी लोगों ने इस प्रकार के NGO तंत्र को अपने धंधे के रूप में स्थापित कर लिया है।

    इनमें से बहुत NGO वाले ऐसे होते हैं जो नया-नया पैसा देखे होते हैं तो खूब दिखावा करते हैं व कूदफांद करते हैं, यदि इस प्रकार के मूर्खों को छोड़ दिया जाए तो यह कड़ी सुरक्षित कड़ी होती है।

    कुछ बड़े व्यापारी व NGO तो इतने ताकतवर होते हैं कि उनके लिए करोड़ों, अरबों व खरबों के प्रोजेक्ट राजनेताओं व नौकरशाही के नेक्सस द्वारा बनाए जाते हैं ताकि राष्ट्रीय संपत्तियों पर कब्जा किया जा सके। इन लोगों को कोई परेशानी न हो इसलिए देश के लोगों की सुविधा को ताक में रखकर नीतियां व नियम बनाए जाते हैं। यह कड़ी बहुत अधिक सुरक्षित कड़ी होती है।

    नेता

    इन सबमें सबसे असुरक्षित कड़ी नेता वाली होती है। कारण यह है कि नेता को अपने लगुओं-भगुओं की देखभाल करनी होती है। चुनाव लड़ना होता है। बिना चुनाव के भी अपनी फिजा बनाने के लिए लगातार पैसा खर्चते रहना पड़ता है। इसलिए नेता के पास पैसा है यह सबको दिखता है। नेता सबसे कम भ्रष्ट होते हुए भी सबसे अधिक बदनाम इसीलिए रहता है। नेता पकड़ा भी जाता है क्योंकि उसको अपने पास खर्चों के लिए कैश इन हैंड रखना पड़ता है, अन्यथा उनकी नेतागिरी ठप्प हो जाएगी।

    नौकरशाह

    सबसे सुरक्षित कड़ी नौकरशाह वाली होती है। सबसे अधिक भ्रष्ट, क्रूर, बर्बर व निर्लज्ज लेकिन सबसे अधिक ईमानदार मानी जाने वाली कड़ी। भ्रष्टाचार का कालाधन बिना नौकरशाही के उत्पन्न ही नहीं हो सकता। फिर भी सबसे अधिक ईमानदार मानी जाने वाली कड़ी क्योंकि इनकी संपत्ति व पैसा दिखता नहीं है। क्योंकि इनको कहीं खर्च ही नहीं करना है, दूसरा सारे अधिकार इन्हीं के पास हैं, सरकार से इतनी सुविधाएं मिलती हैं कि इनको अपनी संपत्ति व पैसा खर्च करने की जरूरत ही नहीं।

     

    इस प्रकार का कालाधन किसी गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल के चपरासी से लेकर देश के व्यापारियों, नेताओं व आला-नौकरशाहों तक सभी के पास होता है। वैसे संभव तो नहीं लेकिन हो सकता है कि देश में इक्का दुक्का सरकारी लोग सच में ही कालाधन की एक चवन्नी नहीं रखते हों।

     

    इस प्रकार वाले कालेधन का अधिकतर हिस्सा मुद्रा के रूप में नहीं होता है। इसका लेनदेन या तो अचल संपत्तियों के रूप में होता है या इसको अचल संपत्तियों के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। बेनामी संपत्तियों के रूप में होता है। विश्वसनीय रिश्तेदारों के व्यापार में अलिखित शेयर के रूप में प्रयोग होता है। विदेशी बैंको में जमा होता है फिर वहां से घुमा फिरा कर वापस भारत में व्यापारिक निवेश के रूप में लाया जाता है।

     

    दरअसल  समाज के विकास को अवरुद्ध करने वाला कालाधन यही धूर्तता, बर्बरता, क्रूरता व भ्रष्टाचार के व्यापक नेक्सस से पैदा किया गया वाला कालाधन होता है। लेकिन भारत में इसको छेड़ा तक नहीं जाता है, उल्टे समय-समय पर इसको बचाने के लिए झोल झपाटे वाले चोचलेबाजी की जाती है, लोगों को लगता है कि क्रांति हो रही है।

     

    चलते-चलते

    भारत में कम संख्या में ही सही लेकिन ऐसे भी नौकरशाह हैं जो भले लोग हैं, समाज के भले के लिए जज्बे के साथ काम करते हैं। समाज के विकास के लिए ऊर्जा से काम करते हैं। इनमें से लगभग सभी लोग यह जाहिर करते हैं कि वे आर्थिक रूप से बेहद ईमानदार हैं। मैं जानता हूं कि वे आर्थिक रूप से ईमानदार नहीं हैं। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि वे मेरे लिए उनका आर्थिक ईमानदार न होना बिलकुल भी मायने नहीं रखता। मेरे लिए उनका सामाजिक प्रतिबद्ध होना, समाज के भले के लिए जज्बे के साथ काम करना सर्वोच्च ईमानदारी होती है इसलिए मेरी दृष्टि में वे विशुद्ध ईमानदार हैं, इसलिए कोई उनके साथ खड़ा हो या न हो लेकिन मैं बिना किसी नेक्सस के आजीवन अपनी छोटी-बड़ी क्षमता के साथ उनके साथ खड़ा रहूंगा।

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  • हमारे प्रधानमंत्री जी को “कौटिल्य-शास्त्र” की चौपतियाओं व नारा-संस्कृति वाली क्रांतिकारिता से बाहर आने की महती जरूरत है

    सामाजिक यायावर


    इसमें संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी जी की मंशा रहती है कि देश बेहतर हो। लेकिन केवल मंशा रखने भर से, नारे देने व भक्तों के तर्क वितर्क कुतर्क से कुछ भी साबित करते रहने से देश का निर्माण नहीं होता, देश आगे नहीं बढ़ता है।

    झाड़ू लेकर सफाई हो, बेटी बचाओ वाली बात हो, 24 घंटे बिना सोए देश के लिए काम करता हूं या ऐसी ही अन्य बातें। सभी नारे के रूप में निकलीं, नारे के रूप में प्रायोजित हुईं और धरातलीय वास्तविकता पर सड़ियल दिखावे व चोचलेबाजी के रूप में परिवर्तित होकर अपनी परिणति को प्राप्त हुईं। 

    pm-india-narendra-modiशायद हमारे प्रधानमंत्री जी को ऐसा लगता है कि वे 24 घंटे बिना सोए देश के लिए काम करते हैं जैसे नारों को प्रायोजित कर देने मात्र से देश का तंत्र जिम्मेदार व कार्यशील हो जाता है। सफाई का नारा दे देने मात्र से लोग सफाई करना शुरू कर देंगें। बेटी के साथ सेल्फी का नारा देने मात्र से लोग कन्या भ्रूण हत्या बंद कर देंगे, दहेज बंद हो जाएगा, प्रेम विवाहों का स्वागत होने लगेगा, लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की आजादी मिल जाएगी।

    कम से कम मुझे यह बिलकुल भी नहीं लगता कि मोदी जी यह चाहते होगें कि उनके दिए गए नारों की परिणति इस प्रकार हो। मोदी जी नारे देते हैं, क्योंकि उनको लगता है कि उनका काम नारे देने का है और लोग उनके नारों को सामाजिक बदलाव वाले आंदोलनों का रूप दे देगें। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता, उनके दिए नारे बहुत ही सड़ियल परिणति को प्राप्त होते हैं।

    हमारे प्रधानमंत्री जी समझ ही नहीं पाए हैं कि नारों से जीवन जीने की प्रमाणिकता में अंतर नहीं आता है। वे देख ही नहीं पाए कि सफाई, बेटी बचाओ आदि जैसे मुद्दों पर उनके दिए नारों का जमीन पर क्या परिणति हुई। किस प्रकार उनके दिए नारे जमीन पर आते-आते सड़क छाप नारा व चोचलेबाजी का रूप ले लिए।

    नारों की इस तरह परिणति होने में प्रधानमंत्री जी के भक्तों व अंध भक्तों का बहुत बड़ा योगदान है। क्योंकि उनके अंध भक्त भी यही मानते हैं कि हमारा प्रधानमंत्री केवल नारे देता है, हवाई बातें करता है जिसका जीवन जीने की प्रमाणिकता से कोई संबंध नहीं। इसलिए प्रधानमंत्री जी के अंध भक्त लोग तक भी प्रधानमंत्री जी के नारों को जीवन में उतारने की बजाय गैर-भक्तों के साथ तर्को, कुतर्को व गाली गलौज से प्रधानमंत्री जी के नारा-प्रयासों की और अधिक छीछालेदर करते रहते हैं।

    तर्क, वितर्क, कुतर्क व गाली गलौज की बजाय यदि भक्त व अंध भक्त गण प्रधानमंत्री जी के दिए नारों को खुद अपने ही जीवन में उतार कर जीना शुरू कर देते तो बिना अतिरिक्त प्रयास के ही प्रधानमंत्री जी लोकप्रियता घटने की बजाय बढ़ती और भक्तों को गाली गलौज करने तथा फर्जी गाथाएं, फर्जी फोटुवें व फर्जी रपटें गढ़ने की कोई जरूरत नहीं होती, लोग खुद ब खुद मोदी जी के फालोवर बनते चले जाते और मोदी जी के नारे जनांदोलन का रूप ले लेते।

    दरअसल जितने भी गांधी विरोधी लोग हैं, जो गांधी को नहीं समझते हैं या गांधी के कारण जिनके वेस्टेड इंटरेस्ट्स को क्षति पहुंचती है, वे सभी यही समझते कहते व प्रायोजित करते हैं कि गांधी को अंग्रेजो ने प्रायोजित किया। बहुत लोग तो ऐसे हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया यही प्रायोजित करने में कि गांधी में कोई खासियत नहीं थी वे केवल अंग्रेजों द्वारा प्रायोजित थे।

    इस प्रकार की सोच रखने वाले विकृत मानसिकता वाले लोगों को यही लगता है कि महानता, मानवीय मूल्य, संवेदनशीलता, ईमानदारी, त्याग आदि जीवन में जीकर प्रमाणित होने वाले मूल्य न होकर केवल सत्ताओं द्वारा प्रायोजित किए जाने वाले मूल्य हैं। इसलिए ऐसे लोग मूल्यों को स्वयं में प्रमाणिकता से जीने की बजाय सत्ता व सत्ता द्वारा स्वयं के प्रायोजित करवाने के तिकड़मों में लगे रहते हैं।

    परिणाम यह होता है कि समाज व समाज के लोग जीवन मूल्यों के प्रति अवहेलना व तिरस्कार की अवस्था की ओर बढ़ जाते हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी के भक्त व अंध भक्त गण ऐसी ही अवस्थाओं में जीने वाले लोग होते जा रहे हैं। जिन्हें उचित-अनुचित, सही-गलत, मूल्यों व संवेदनशीलता का भान नहीं। तुर्रा वे यह सोचते हैं कि वे देश निर्माण में प्रधानमंत्री जी के साथ कंधा से कंधा से मिलाए खड़े हैं।

    500 व 1000 रुपए को बंद करने वाले मुद्दे की ही बात कर ली जाए। जो भी ईमानदार चिंतक है जिसे सामाजिक अर्थशास्त्र की समझ है वह अच्छी तरह जानता है कि 500 व 1000 रुपयों को बंद करने की कवायद जिस तरह के झोल झपाटे से हुई उसका काला-धन समाप्ति व भ्रष्टाचार नियंत्रण से दूर-दूर तक कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता है। लेकिन भक्तगण पिले पड़े हुए हैं। इसके लिए इमोशनल नारे व इमोशनल ब्लैकमेल करने वाले तर्क गढ़ते हैं। इन सब चोचलों से आम आदमी कशमशा कर रह जाता है, उसके सोचने समझने की शक्ति कुंद होती चली जाती है। 

    व्यक्तिगत रूप से मैं इसमें प्रधानमंत्री जी का दोष नहीं मानता, दोष उनकी समझ का है उनके भावों का नहीं। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जी अर्थशास्त्री है ही नहीं, उन्हें तो अर्थशास्त्र का ककहरा भी शायद ही आता हो। वे तो कौटिल्य शास्त्र, जो राजतंत्रीय काल में आधुनिक व्यवस्था से बिलकुल ही भिन्न व्यवस्था में लिखा गया था, का अनुसरण करने वाले प्राणी हैं। उदाहरण के लिए मान लीजिए यदि कौटिल्य ने कहीं लिख दिया कि मुद्रा का विमूल्यीकरण कर देना चाहिए तो हमारे प्रधानमंत्री जी के लिए यह ब्रह्मवाक्य होगा और वे बिना सोचे विचारे विमुद्रीकरण कर देंगें वह भी इस अहंकार के साथ कि वे जो कर रहे हैं वह व्यवस्था परिवर्तन के लिए है। मैं यह बिलकुल नहीं कह रहा हूं कि प्रधानमंत्री जी ने वर्तमान विमुद्रीकरण कौटिल्य जी से पूछकर किया। मैंने केवल उदाहरण दिया अपनी बात को समझाने के लिए।

    आगे का काम हमारे प्रधानमंत्री जी के भक्त गण संभाल लेते हैं। पिल पड़ते हैं मोदी जी की बात को सही व ऐतिहासिक साबित करने के लिए। भले ही इसके लिए किसी निहायत ही सड़ियल सी टेक्स्ट बुक के किसी पन्ने को नीला पीला करके बताना पड़े कि देखो वहां लिखा है कि विमुद्रीकरण करना चाहिए। बस हो गया भक्तों का काम खतम। भारत व भारत के लोग चाहे गर्त में चले जाएं। बिना सवाल अपने आराध्य की भक्ति रूपी भक्तियोग परंपरा में महान योग के रूप में प्रतिष्ठित है ही। 

    दरअसल 500 व 1000 रुपयों को खतम करने वाली बात उतनी सीधी व सपाट है नहीं जितनी इसको लागू करते समय बताई गई व प्रायोजित की गई थी। ढेर सारे टेढ़े मेढ़े पेंच हैं। खैर फेसबुक में या पब्लिक में खुलेआम इन पेंचों की बात नहीं की जा सकती। जो दृष्टि रखते हैं उनको शुरू से ही अंदाजा हो गया था। जिनके पास दृष्टि नहीं है उनको तो हाथी सूप, रस्सी, खंभे आदि रूप में ही दिखेगा। खैर…

    मोटा-मोटी यह समझा जाए कि माननीय प्रधानमंत्री जी खुद को क्रांतिकारी व राष्ट्र निर्माता के रूप में प्रायोजित करने में बहुत तगड़ी हड़बड़ी कर गए। उनके द्वारा दिए गए नारों को ही उनके भक्तगण देश निर्माण, देश प्रेम, देश भक्ति, जागरूकता, प्रगतिशीलता व विकास की कसौटी मानते हैं। इसलिए मोदी जी भी नारा-आसक्ति में जीते हैं। सो उन्होंने 500 व 1000 नोटों के मामले में काला धन वगैरह-वगैरह का क्रांतिकारी नारा दिया और निकल लिए। बाकी का काम उनके भक्तों व उनकी कैबिनेट ने संभाल लिया जिसमें देश के लोगों को इमोशनल टच देते हुए बयानबाजी करते रहना है जैसे देश के लिए इतना तो कष्ट भोगना ही पड़ेगा। देश के लिए यह, देश के लिए वह, इत्यादि।

    आम आदमी के लिए देश कल्याणकारी होने की बजाय लगातार कष्ट देने व बलिदान मांगने की मशीन हो गया। लोकतांत्रिक देश लोगों के कल्याण के लिए होता है। जिम्मेदार व ईमानदार जनप्रतिनिधि देश के लोगों के पहले स्वयं कष्ट भोगने की शुरुआत करता है। लेकिन यहां तो मानो केवल आम आदमी ही देश बनाने के लिए जिम्मेदार हैं सो केवल और केवल वही कष्ट भोगें और लगातार भोगेंगे। मानो उनकी पैदाइश ही हुई है कष्ट भोगने के लिए, कष्ट भोग-भोग कर देश निर्माण के लिए।

    देश के आम आदमी की हालात पुराने जमाने के शूद्रों जैसी है। जिनका जन्म ही होता है कष्ट भोगने के लिए। कष्ट भोगना उनकी ईश्वरीय नियति मान ली जाती है। शूद्र कष्ट भोगते गए ऊपर वाले मौज करते गए। बिलकुल वैसे ही आम आदमी कष्ट भोग-भोग कर देश निर्माण करता रहे और ऊपर वाले मौज करते रहें।

     

    दरअसल भारत जैसे देशों में जहां का ढांचा भले ही कागज में लोकतंत्र की बात करता हो लेकिन वास्तविक चरित्र सामंतवादी का होता है उन देशों में जो नेता लोग बहुत लंबे समय तक सत्ता या सत्ता के नजदीक रहते हैं, उनमें इतना अधिक अहंकार व मद आ जाता है कि वे आम लोगों को तकलीफों के प्रति घोर असंवेदनशील हो जाते है। उनको देश के आम लोग लिजलिजाते कीड़े-मकोड़े की तरह लगते हैं। उनको लगता है कि आम आदमी की पैदाइश ही लिजलिजा जीवन जीते रहने के लिए ही होती है। वर्तमान भारत सरकार के कैबिनेट मंत्रियों व भक्तगणों के बयानों व तर्कों से तो यही लगता है कि उनकी असंवेदनशीलता सीमाएं पार कर चुकी है। उनको लगता है कि आम लोग तो पैदा ही हुए हैं लिजलिजाते कीड़े मकोड़ों के रूप में घिसटती हुई जिंदगी जीने के लिए। 

    जबकि स्थिति यह है कि इस झोल झपाटे से देश को आर्थिक रूप से भयंकर क्षति हुई है, लंबे समय तक लगातार क्षति होती रहेगी। देश कब उबर पाएगा इसका अंदाजा नहीं। भक्तगण क्या कहते हैं इसकी बात न की जाए क्योंकि वे तो देश को आर्थिक महाशक्ति एक घंटे में बना दें, सोशल मीडिया है ही। क्या पता आर्थिक महाशक्ति बना भी चुके हों, इसलिए शायद कुछ दिनों में सोशल मीडिया में तैरते-उतराते भारत महान आर्थिक शक्ति के तौर पर हमारे आपके पास पहुंच भी जाए।

     

    मैं मोदी जी के कई गुणों का प्रशंसक हूं, उनकी कई नीतियों का आलोचक भी हूं। लेकिन मैंने एक बात पर हमेशा विश्वास किया है कि मोदी जी देश के लोगों के प्रति निर्दयी नहीं हैं, हिंदुत्व के दर्शन पर विश्वास करते हैं। लेकिन देश के आम लोगों को लिजलिजाते कीड़े-मकोड़े समझना, उनसे हमेशा देश निर्माण के नाम पर कष्ट भोगते रहने की ही इमोशनल मांग करते रहना और खुद विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र बजाने का आनंद लेना। कुछ भी हो सकता है लेकिन महान गौरवाशाली हिंदुत्व संस्कृति दर्शन नहीं ही हो सकता। 

    प्रधानमंत्री जी व उनके भक्तों को समझने का प्रयास करना चाहिए कि अब राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है। राजतंत्र में राजा गलतियां करते हुए, आम लोगों को कष्ट देते हुए भी राजा बना रहता है। लेकिन लोकतंत्र में गलतियां करते जाना बहुत कुछ बदल देता है। लोकतंत्र में लोग अपने कष्ट को कम करने के लिए जन-प्रतिनिधियों को शक्ति देते हैं। आम आदमी कभी भी यह सवाल खड़ा कर सकता है कि क्या देश निर्माण में कष्ट भोगने का ठेका सिर्फ उस आम आदमी का ही है जिसका जीवन पहले से ही कष्ट में है।

    विश्वास कीजिए एक दिन यह आम आदमी जिसे लिजलिजाता हुआ कीड़ा-मकोड़ा समझा जाता है, खुद को लिजलिजाता कीड़ा-मकोड़ा मानने से मना कर सकता है। क्योंकि आम आदमी देख सकता है कि देश निर्माण के नाम पर कष्ट भोगते रहने के बावजूद उसकी स्थिति में अंतर नहीं आता है, जो देश निर्माण के नाम पर कष्ट नहीं भोगते हैं उनकी स्थिति जरूर ही और बेहतर होती चली जाती है। उस दिन आम आदमी इमोशनल ब्लैकमेल करने के लिए चतुराई से गढ़े गए खूबसूरत तर्कों को भी धता बता देगा।

     

    भक्तगण कुछ भी कहें लेकिन लोगों की सोच व समझ प्रतिक्षण बदल रही है। लोग अपने आराम व स्वार्थ के प्रति प्रतिपल जागरूक हो रहे हैं। लोगों को दिखता है कि कैसे उनको कष्ट मिलता है देश निर्माण के नाम पर और कुछ प्रतिशत लोग कैसे मौज करते हैं। इन सबमें देश की ऊर्जा बर्बाद होती है, देश व समाज के लोगों के मूल्य पतित होते चले जाते हैं।

    सत्ता में बने रहने के लिए इमोशनल ब्लैमेलिंग व लोगों की गलत कंडीशनिंग करने की बजाय लोगों के कल्याण के लिए गंभीर व दूरदर्शी काम करते रहना चाहिए। सत्ता में बने रहने के लिए कौटिल्य शास्त्र व नारा-क्रांतिकारिता शायद ही बार-बार काम आ पाए। देश के प्रधानमंत्री को नारा-क्रांतिकारिता व कौटिल्य शास्त्र से बाहर निकल आना चाहिए। 

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  • राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र के संवेदनशील लोगों के लिए सूचना – अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे आपसे मिलने दिल्ली पहुंच चुके हैं

    सामाजिक यायावर


    अबुझमाड़ भारत का वह आदिवासी इलाका है जहां पर 2009 तक अबुझमाड़ से बाहर के लोगों के लिए अबुझमाड़ में प्रवेश प्रतिबंधित रहा था। माओवादियों ने जंगल के प्रवेश मार्गों पर लैंड माइन्स लगा कर प्रशासनिक सेवाओं का मार्ग अवरुद्ध कर रखा था। इसलिए अबुझमाड़ के आदिवासी लोग हमारी आपकी दुनिया से कटे रहे, अपरिचित रहे।

    Dr Santosh Kr Dewangan

    डा० संतोष कुमार देवांगन, अतिरिक्त जिला दंधाधिकारी, ADM, नारायणपुर ने टेलीफोनिक चर्चा के दौरान बताया कि श्री टामन सिंह सोनवानी, जिलाधिकारी, DM, नारायणपुर के निर्देश पर वे व श्री दीपक हिरवानी, निजसचिव, जिलाधिकारी नारायणपुर अबुझमाड़ के बच्चों के साथ दिल्ली भ्रमण पर पहुंच चुके हैं।

    अबुझमाड़ क्षेत्र के ये आदिवासी बच्चे भारत के राष्ट्रपति आदि से मिलने, लोकतंत्र के विभिन्न पहलुओं को समझने, संसद, सेना मुख्यालयों, चुनाव आयोग, लाल किला, कुतुबमीनार आदि देखने के लिए दिल्ली कुछ दिनों के लिए आए हैं।

    यदि आप इन बच्चों से मिलकर उनका हौसला बढ़ाना चाहते हैं, उनका नई दुनिया में स्वागत करना चाहते हैं, उनको महसूस कराना चाहते हैं कि उनके घर अबुझमाड़ के बाहर की दुनिया व लोग कैसे हैं। तो आप इन बच्चों से मिलें, उनके साथ कुछ समय बिताएं। 

    यदि आप ऐसा करने के इच्छुक हैं तो आपकी सुविधा के लिए दिल्ली में बच्चों के प्रस्तावित-कार्यक्रम व संपर्क की सूचना निम्न है।

     

    • 11 नवंबर – भारत के राष्ट्रपति, लोटस टेम्पल व इंडिया गेट
    • 12 नवंबर – कुतुब मीनार, विज्ञान भवन, हुमाऊँ का मकबरा, राजघाट
    • 13 नवंबर – अक्षरधाम मंदिर, मेट्रो ट्रेन, अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, विभिन्न देशों के राजदूतों के कार्यालय
    • 14 नवंबर – थलसेना मुख्यालय, वायुसेना मुख्यालय, जलसेना मुख्यालय, CRPF मुख्यालय
    • 15 नवंबर – भारतीय चुनाव आयोग, खेलगांव
    • 16 नवंबर – नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT), भारत के प्रधानमंत्री, भारत की संसद, मीडिया संस्थान

     

    संपर्क :
    डा० संतोष कुमार देवांगन, अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी, ADM, 09425253589 व
    श्री दीपक हिरवानी, निज सचिव, जिला दंडाधिकारी (जिलाधिकारी), DM, 09425595244

     

    यह कार्यक्रम किसी NGO का फंड से आयोजित कार्यक्रम नहीं है। यह जिला प्रशासन के संवेदनशील अधिकारियों का कार्यक्रम है। यहां तक कि इन अधिकारियों ने इस आयोजन में होने वाले खर्च में सहयोग के लिए अपने वेतन में से आर्थिक सहयोग भी किया है। इन अधिकारियों ने अबुझमाड़ में क्या काम किए और कर रहे हैं, उसका कुछ अंश समझने व जानने के लिए आप दी हुई लिंक पर जाकर लेख पढ़ सकते हैं।

     

    अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे DM, ADM व अन्य के साथ

  • ​हिंदुओं को समान नागरिक संहिता (कॉमन सिविल कोड) के नुक्ते समझने होगें

    सामाजिक यायावर


    भारत में जब भी कामन सिविल कोड की बहस शुरू होती है तब यह बहस मुसलमान धर्म की कुछ बातों जैसे चार पत्नियां रखने की अनुमति उनके धर्म में होना व तीन बार तलाक बोल कर तलाक हो जाने जैसी बातों तक ही सीमित रह जाती है। यूं लगता है कि जैसे कामन सिविल कोड का नाम केवल कामन सिविल कोड है किंतु इसमें कामन व सिविल जैसा कुछ है ही नहीं। क्योंकि कामन सिविल कोड की बहस मुसलमान धर्म में चार विवाहों की अनुमति व तीन तलाक आदि तक ही सीमित हो जाती है। यूं लगता है जैसे बहस कामन सिविल कोड पर न होकर एंटी-मुस्लिम कोड पर होनी है।

    गहराई से देखने पर दिखने लगता है कि कामन सिविल कोड के लागू न हो पाने में सबसे अधिक पेंच तो हिंदू धर्म से आएंगें। चूंकि मुस्लिम घृणा को हिंदुत्व, महानता, विश्वबंधुत्व, संस्कृति, संस्कार, राष्ट्रभक्ति व सहिष्णुता आदि मानने वाले हिंदुओं को यह लगता है कि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू धर्म की परंपराओं का पालन करना होगा। सच तो यह है कि इन लोगों को कामन सिविल कोड के ककहरे का भी अंदाजा नहीं।

    प्रासांगिक यथार्थ तो यही है कि वास्तव में कामन सिविल कोड एक असमाधानित मुद्दा है जिसे हिंदुओं के अंदर एंटी-मुस्लिम भावना को हवा देते रहने के लिए जीवित रखा जाता है।

    मुस्लिम व हिंदू समाजों में वैधानिक/अवैधानिक एक से अधिक पत्नियां :

    मुस्लिम समाज में चार पत्नियां रखने की अनुमति है लेकिन बहुत ही कम प्रतिशत होगा जो वास्तव में एक से अधिक पत्नी रखने की माली हैसियत रखता होगा। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि मुस्लिम धर्म में एक से अधिक पत्नियां रखने वाले लोग नहीं होगें। होगें जरूर होगें लेकिन प्रतिशत बहुत ही कम है।

    मुस्लिम धर्म में एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति होने के बावजूद भारत में जितने प्रतिशत मुसलमान एक से अधिक पत्नियां रखते होगें। हिंदूओं में एक से अधिक पत्नियों की अनुमति न होने के बावजूद उससे अधिक प्रतिशत हिंदू रखैलें व दूसरी पत्नियां रखते होगें। बेहतर हो कि हिंदुओं को भी एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार दे दिया जाए। चोरी छिपे रखैल रखने या दावपेंच करके दूसरी पत्नी रखने से बेहतर होगा कि खुल्लमखुल्ला अधिकार मिल जाएं।

    मैंने तो ऐसे ऐसे हिंदू देखे हैं जो अपनी दो-दो पत्नियों को साथ लेकर खुलेआम घूमते हैं। दोनों पत्नियों से संतानें। यात्रा करते समय कार की सीट में वे बीच में बैठते हैं और उनके दोनों बगल उनकी दो पत्नियां बैठतीं हैं। दो पत्नियों के अलावे रखैंलें अलग से।

    बहुत हिंदू ऐसे हैं जो दबंग नहीं हैं, पारिवारिक कलह को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, वे रखैंले रखते हैं। रखैल को बाकायदा अलग घर देते हैं, महीने का पूरा खर्चा, रखैल से बच्चे भी उनका पूरा खर्चा। मतलब यह कि समानांतर एक और परिवार चलाते हैं। अंतर केवल यह कि रखैल को वैधानिकता नहीं हासिल।

    मुस्लिम समाज व हिंदू समाज में वैधानिक अवैधानिक तरीके से एक से अधिक पत्नियां या सहपत्नियां रखने वालों का प्रतिशत लगभग बराबर ही होगा। इसलिए व्यवारिक व चारित्रिक अंतर तो कुछ रहा नहीं।

    आदिवासी समाजों में एक से अधिक पत्नियां :

    भारत के आदिवासी समाजों में अधिकतर आदिवासी समाज पुरुष सत्ता की परंपरा वाले हैं। मुस्लिम धर्म में अधिकतम चार पूर्णकालिक पत्नियां रखने का अधिकार है। लेकिन भारत के अधिकतर आदिवासी समाजों में तो ऐसी व्यवस्था है कि आदिवासी पुरुष जितनी मर्जी हो उतनी पत्नी रख सकता है। यह भी एक कटु सत्य है कि भारत में अधिकतर आदिवासी लोग जिनका शहरीकरण नहीं हुआ है उनमें से अधिकतर लोग एक से अधिक पत्नियां रखते हैं। मैं अपने जीवन में ऐसे हजारों आदिवासियों से मिला हूं जिनके पास एक से अधिक पत्नियां हैं। या यूं कहूं कि जितने आदिवासियों से मिला हूं उनमें से अधिकतर के पास एक से अधिक पत्नियां हैं/थीं। आदिवासियों में एक से अधिक पत्नी रखना इसलिए भी आसान है क्योंकि महिला ही खेतों में काम करती है, जंगल से जंगल-उत्पाद चुन कर लाती है और उसके द्वारा किए गए उत्पादन पर उसके पति का मालिकाना हक होता है। तो जिसके पास जितनी अधिक पत्नियां उसकी उतनी अधिक आय। पत्नी को खाना, कपड़ा और झोपड़ी में एक कोना मिल जाए, बस यही बहुत है। इसमें भी खाना पत्नी ही बनाती है, कपड़े भी पत्नी ही बनाती है, झोपड़ी भी पत्नी ही बनाती है फिर भी यह सब पति के द्वारा दिया गया माना जाता है। इसलिए अधिकतर आदिवासियों ने जिनके पास कुछ पेड़ या कुछ जमीन है, मतलब खाने का जुगाड़ हो, एक से अधिक पत्नियां रख रखीं हैं।

    कामन सिविल कोड :

    अभी हिंदुओं के मंदिरों में बहुत ऐसे मंदिर हैं जिनके विवाह प्रमाणपत्र को वैधानिक दर्जा प्राप्त है। हिंदू रीतियों से होने वाले विवाहों का विवाह विभाग में पंजीकरण करवा लिया जाता है, क्योंकि हिंदू रीति से विवाह को मान्यता प्राप्त है। कामन सिविल कोड के लागू होने पर या तो हिंदुओं से यह सुविधाएं छिन जाएंगीं या सभी धर्मों को वर्तमान में प्राप्त सुविधाएं मिलती रहेंगी। कामन सिविल कोड का मतलब ही यही है कि सभी नागरिकों के लिए समान संहिता। इसका यह मतलब कतई नहीं कि समान सहिंता में हिंदू धर्म के तौर तरीके होगें। या तो सभी धर्मों को प्राप्त सुविधाएं बरकरार रहेंगीं या सभी धर्मों को प्राप्त सुविधाएं खतम कर दी जाएंगीं। जो भी होगा वह सभी के लिए समान होगा।

    यदि ये सुविधाएं बरकरार रहतीं हैं तो कामन सिविल कोड का औचित्य ही खतम हो जाता है। यदि खतम कर दी जातीं हैं तो हिंदू लोग भी कितना तैयार होगें यह विचारणीय तथ्य है। क्योंकि अभी तो हिंदुओं की कल्पना यही है कि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू धर्म के रीति रिवाज।

    कामन सिविल कोड यदि धर्मों की इन सुविधाओं को खतम करता है जो करना ही पड़ेगा तो पारंपरिक विवाहों की मान्यता खतम हो जाएगी। भले ही कई लाख लोगों के सामने अग्नि के सत्तर फेरे लीजिए लेकिन विवाह अवैधानिक होगा, अमान्य होगा। विवाह किसे कहा जाए इसकी परिभाषा तय होगी जो किसी धर्म के रीति रिवाजों की बजाय सभी नागरिकों के लिए समान होगी।

    आदिवासी समाजों के अधिकतर विवाह अमान्य घोषित हो जाएंगें।

    दरअसल कामन सिविल कोड बहुत ही टेढ़ी खीर है, बहुत ही अधिक पेंचदार चूड़ी है। अभी भारत के लोग कामन सिविल कोड के लिए मानसिक व सामाजिक रूप से तैयार भी नहीं हैं। हंगामा तो इसलिए होता है क्योंकि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू सिविल कोड या एंटी मुस्लिम कोड मान लिया जाता है। भारत हिंदू राष्ट्र नहीं है जो हिंदू सिविल कोड को कामन सिविल कोड मान लिया जाएगा। हिंदू सिविल कोड में भी किस जाति की परंपरा को हिंदू सिविल कोड माना जाए, यह भी बहुत पेंचदार है।

    हिंदू जब कामन सिविल कोड के समर्थन की बात करता है तो यह भूल जाता है कि उनके धर्म में हजारों जातियां व उपजातियां हैं, सबने दूसरे से अलग दिखने के लिए अपने लिए अलग-अलग रीति रिवाज व परंपराएं बनाई हैं, जो कामन सिविल कोड के लिए सबसे बड़े रोड़े बनेंगें, जब भी कामन सिविल कोड की गंभीर बहस शुरू होगी। अधिकतर हिंदुओं की मान्यता में तो कामन सिविल कोड को एंटी-मुस्लिम कोड या हिंदू सिविल कोड के रूप में देखा समझा जाता है इसलिए वास्तविक व बारीक नुक्तों पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है, न ही जानने समझने की चेष्टा ही की जाती है।

    चलते – चलते :

     

    कामन सिविल कोड में सबसे बड़ी बात यह होगी कि किसी भी परिस्थिति में एक से अधिक पत्नी रखना अवैध होगा, क्योंकि स्त्री भी एक नागरिक है। यदि पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार होगा तो स्त्री को भी एक से अधिक पति रखने का अधिकार होगा। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि एक पति कई पत्नी रखे और उसकी पत्नियां कई-कई पति। इसलिए उन हिंदुओं का क्या होगा जिन्होंने दो-दो या तीन-तीन पत्नियां कर रखीं हैं। हिंदू को एंटी-मुसलमान आवेश से बाहर निकल कर कामन सिविल कोड की जमीनी हकीकत को जानने समझने का प्रयास करना चाहिए।

     

    सभ्य लोगों के सभ्य देश का कानून किसी धर्म विशेष के प्रति घृणा के आधार पर नहीं बनाया जा सकता है। फिलहाल तो कामन सिविल कोड असमाधानित मुद्दा रूपी जिन्न है, जो बाहर तो निकाल लिया जाता है लेकिन उसे लागू कर पाना तो बहुत दूर की बात है, उसका आकार प्रकार व परिभाषाएं कैसीं हों यह ही उचित व व्यवस्थित रूप से नहीं तय हो पाया है।

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  • मुलायम काका को अखिलेश भाई जी के संदर्भ में पत्र

    सामाजिक यायावर


    आदरणीय मुलायम काका,
    सादर चरण स्पर्श।

    जो उठापटक व घमासान चल रही है, बयानबाजी चल रही है, भावावेश चल रहा है व त्यागपत्र वाले पत्र, खून से लिखे पत्र आदि लिखे जा रहे हैं। मैंने सोचा कि मैं भी काका को पत्र लिख लूं, अवसर भी है अपनी बात कहने का। मेरा आपसे या अखिलेश भाई से स्वार्थ वाला कोई रिश्ता भी नहीं है, न ही मुझे चुनाव लड़ना है। मुझे आजतक आपकी पार्टी से या अखिलेश भाई की नेतृत्व वाली सरकार से, किसी प्रकार की कोई सुविधा ही प्राप्त हुई है और न ही मेरी आपसे या अखिलेश भाई से कभी व्यक्तिगत मुलाकात ही हुई है। इसलिए मेरा सोचना है कि मैं निष्पक्ष होकर अपनी बात कह सकता हूं। आशा है कि उदारमना आप मेरी धृष्टता को क्षमा करेंगें।

    आपकी बात :

    mulayam-singh-yadavइसमें कोई संदेह नहीं कि समाजवादी पार्टी सिर्फ और सिर्फ आपकी बनाई व बढ़ाई हुई है। आपने जिस जमाने में संघर्ष शुरू किया था, उस समय के जो हालात थे, आपने जिस तरह से अपनी जगह बनाई, पार्टी खड़ी की, सत्ता तक पहुंचे। आपके उस संघर्ष को समझ पाना, उस राजनैतिक चातुर्य की प्रशंसा कर पाना, आपकी दूरदर्शिता को देख पाने की क्षमता व दृष्टि आज के उन चाटुकार युवाओं में नहीं है जो अखिलेश भैया जिंदाबाद के नारे लगाते हुए अपनी वफादारी साबित करने का प्रयास करते हैं।

    अखिलेश भाई का जयकारा लगाने वाले लोगों में अपवादों को छोड़कर अधिकतर लोग ऐसे हैं, जो अखिलेश भाई की मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को देखते हुए साथ जुड़े, मुख्यमंत्री बनने पर सत्ता की मलाई खाने के लिए साथ जुड़े, जो अब जुड़ रहे हैं या वफादारी दिखा रहे हैं उनको यह लगता है कि अखिलेश भाई आज नहीं तो कल सत्ता में आएंगे।

    इस प्रकार के लोगों से यह अपेक्षा करना कि वे आपकी सांगठनिक क्षमता को समझ पाएंगें या समर्पित कार्यकर्ताओं का क्या अर्थ होता है यह ही समझ पाएंगें।

    लोग कुछ भी कहें, अखिलेश भाई को भी बुरा लग सकता है लेकिन मैं दो टूक कहना चाहता हूं कि अखिलेश भाई आपके कारण मुख्यमंत्री बने। यदि वे आपकी ही तरह एक सामान्य परिवेश के निकले सामान्य गुमनाम से युवा होते तो इतनी बड़ी पार्टी व मजबूत संगठन खड़ा करना उनके बूते की बात नहीं थी। लेकिन चाटुकार लोगों को इन सब तथ्यों की गहराई को समझने व स्वीकारने से कोई मतलब नहीं होता। उन्हें तो हल्ला गुल्ला करना होता है।

    ये जो युवा आज अखिलेश जी के साथ खड़े दिख रहे हैं उनमें से अधिकतर का किसी विचारधारा, विकास या परिवर्तन से कोई मतलब नहीं, समझ ही नहीं जो कोई मतलब हो पड़ेगा। उनको सिर्फ इससे मतलब है कि आपके रहते आप अपने पुराने समर्पित व जांचे हुए सहयोगियों व कार्यकर्ताओं को ही महत्व देंगें, जिनके दम पर आपने इतनी बड़ी पार्टी खड़ी की और अखिलेश भाई को मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इनको तो अपनी संभावनाएं देखनीं हैं, अपने जुगाड़ देखने हैं।

    अखिलेश भाई की बात :

    akhilesh-singh-yadavमैं अखिलेश भाई का अवलोकन उस समय से कर रहा हूं जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश लिया। निःसंदेह उन्होंने बहुत कुछ सीखा है, परिपक्वता की ओर बढ़े हैं। विनम्र हैं, शालीन हैं, संवेदनशील हैं, दूरदर्शी व इच्छाशक्ति रखते हैं। भारत की वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में ऐसे सुलझे हुए लोग बहुत नहीं है। यह आपकी ही रचनात्मकता है जो आपने ऐसा अपवाद नेता भारतीय राजनीति को उपलब्ध कराया।

    अखिलेश भाई करते हुए सीखते हैं, तीव्रता से सीखते हैं, बिना अपने मूल्यों को बदलते हुए सीखते हैं। लोकतंत्र को समझते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास करने की इच्छा नहीं रखते हैं। मेरा मानना है कि उनके ऐसा होने में आपकी परवरिश का योगदान है, इसलिए श्रेय आपको भी जाता है।

    यदि शुरू के दो सालों को छोड़ दें जिनमें आपको प्रधानमंत्री पद के नजदीक जाते देखने के लिए हड़बड़ी में सरकार को चलाना रहा। लोगों ने क्या देखा मैं नहीं जानता लेकिन मुझे स्पष्ट दिख रहा था कि अखिलेश भाई आपको प्रधानमंत्री देखना चाहते थे। अच्छी सोच रखने के बावजूद लोकसभा चुनाव इतने नजदीक थे कि लोगों को लुभाने की पुरानी शैली को अपनाने के अलावे उनके पास पार्टी द्वारा स्वीकार्य विकल्प नहीं था। मामला अधकचरा रह गया। न पुरानी शैली ही पूरी तरह प्रयोग हो पाई और न ही नई शैली का आगाज हो पाया।

    लोकसभा चुनावों के बाद अखिलेश भाई ने प्रयास करना शुरू किया कि वे अपनी सोच के हिसाब से काम कर पाएं। पहली बार इतनी कम उम्र का कोई युवा मुख्यमंत्री बना था, पहली बार इतना पढ़ा लिखा युवा मुख्यमंत्री बना था, बहुत लोगों को भ्रम भी रहा कि वे कठपुतली मुख्यमंत्री रहेंगें। ये भी कारण रहे कि उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा।

    पार्टी के अंदर, नौकरशाही आदि से सहयोग न मिलने के बावजूद अखिलेश भाई ने तुलनात्मक बेहतर तरीके से सरकार चलाई। अपराध वगैरह तो आकड़ों के मामले होते हैं। अन्यथा कुल मिलाकर अखिलेश भाई ने सरकार अच्छी चलाई। विरोधी भी उनकी आलोचना दावे से नहीं कर पाते हैं। केवल उत्तर प्रदेश में नहीं बल्कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अखिलेश भाई की लोकप्रियता बढ़ी है।

    मुझे लगता है कि अखिलेश भाई की यह इच्छा है कि उन्हें बिना अवांछनीय दबाव के अपने हिसाब से काम करने का अवसर मिले। ऐसी इच्छा रखना गलत भी नहीं क्योंकि युवा हैं, ऊर्जावान हैं, दृष्टि रखते हैं तथा काम करके स्वयं की क्षमता को साबित भी किया है।

    भारत में दीर्घकालिक राजनीति अब विचारों की, परिवर्तन की व कार्यशैली की होनी है। अखिलेश भाई की कार्यशैली से यह अनुमान होता है कि वे ऐसी ही दीर्घकालिक राजनीति करने की इच्छा रखते हैं।

    आप दोनों की बात :

    akhilesh-mulayamअखिलेश भाई जो संवेदनशील हैं, विचारशील हैं, वे जरूर ही अंदर से आपके प्रति आभार व धन्यवाद ज्ञापन का भाव रखते होगें। उनके व आपके मध्य जो भी वैचारिक मतभेद है वह पीढ़ी का अंतर ही होगा।

    मेरा आपसे निवेदन है कि आप अपने ऊपर विश्वास रखें। आपने अखिलेश भाई की बेहतरीन परवरिश की है। अखिलेश भाई को पाश्चात्य को भी समझने का अवसर मिला है। यदि वे बेहतर कार्यशैली से राजनीति करना चाहते हैं तो उनको करने दीजिए। इसमें आपका ही बड़प्पन है।

    आज की जो राजनैतिक परिस्थिति है उसमें आप लोगों के आपस में मनभेदों से बहुत बड़ा नुकसान है। संभव है कि अखिलेश भाई उस क्षति से कभी उबर न पाएं। यदि सत्ता उनके हाथ में लंबे समय तक हाथ में न रही तो उनके चाटुकार लोग पाला बदलकर भाग जाएंगें।  आपको भी क्षति है क्योंकि लोकप्रियता अखिलेश भाई के साथ है, उत्तर प्रदेश के लोग उनको पसंद करते हैं, लोग अब पुरानी शैली की ओर नहीं जाना चाहते हैं।

    मेरा निवेदन है कि आप लोग व्यवहारिकता को संज्ञान में रखते हुए, पिता-पुत्र वाले दंभ को दरकिनार करते हुए, चातुर्य व संतुलन के साथ मध्य का मार्ग निकालें। पिता-पुत्र के मध्य का दंभ सुलझाएं नहीं सुलझता है। सुलझता भी है तो सिर्फ पिता द्वारा पुत्र को स्वीकारने से। जीवन परिवर्तन व परिवर्तन को स्वीकारने का नाम है।

    आप चाहें तो मेरे पत्र को बचकाना व अप्रयोगात्मक भी मान सकते हैं। उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में अखिलेश भाई से बेहतर राजनेता कोई दीखता नहीं, इसलिए उनका अपव्यय होते देखने की इच्छा नहीं है, जबकि मेरा उत्तर प्रदेश की राजनीति से कोई लेना देना नहीं, मैं तो मतदान भी नहीं करता हूं। इसीलिए आप तक अपनी बात पहुंचाने की धृष्टता कर रहा हूं।

    सादर चरण स्पर्श।
    आपका,
    सामाजिक यायावर

    पुनश्च – एक दो साल पहले मैंने अखिलेश भाई को भी पत्र लिखा था, कई लोगों ने कहा भी कि वे उन तक मेरा पत्र पहुंचा देंगें। पत्र उन तक पहुंचा नहीं पहुंचा, मुझे अनुमान नहीं। लेकिन मैंने पत्र में जो लिखा था, आज वही होते दिख रहा है। 

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  • इंट्रेप्रिन्योरशिप एक सोच होती है – 001

    सामाजिक यायावर


    मेरी माता जी की एक चचेरी-ममेरी बहन हैं, माता जी से छोटी हैं सो छोटी बहन हुईं। मेरे गांव में ही उनका ब्याह हुआ। उनके एक लड़का एक लड़की हुई। उनके पति गांव-नाते से मेरे बड़े भाई लगते हैं, पारिवारिक रिश्ते में नहीं आते हैं, सो मौसी वाला रिश्ता ही चलता है। इसलिए उनके पति को मौसा लिखूंगा।

    मौसा किसान हैं। ट्रैक्टर हैं, ट्यूबवेल है, बाग-बगीचे हैं। अच्छी किसानी करते हैं, समृद्ध किसान हैं। बहुत ही सुंदर नक्काशीदार कुआं भी रहा उनके घर में जिसका प्रयोग आस पड़ोस के सभी लोग करते रहे। कुएं में गाय बैलों के पानी पीने के लिए बढ़िया अच्छी नांदें भी बनी रहीं, कुएं से पानी नाली में बहते हुए पास के तालाब में जाता रहा। बारिश के समय के अलावे कीचड़ नहीं रहता रहा। अब जरूरत नहीं रही तो कुआं बंद हो गया।

    मौसी जी शुरू से शौकीन व जागरूक रही हैं। अपने घर की किचेन को शहर जैसी किचेन की तरह बनवाया, वास-वेसिन, बर्तन को सुखाने का टंगना, बर्तन रखने का टंगना, रेफ्रीजरेटर, कूलर, गैस-चूल्हा, मिट्टी का चूल्हा, खाना रसोई में खड़े होकर बनाया जाता है। चाऊमीन, बर्गर, समोसा, जलेबी, पनीर पकोड़ा, पनीर समोसा मतलब बहुत कुछ बनाना जानतीं हैं और प्रेम से जबरदस्ती बुला कर ठूंस कर खिलाने में इनको आनंद आता है।

    पनीर घर में बनातीं हैं। दूध के लिए घर में कई गायें पाल रखी हैं। मैंने उनके पास हमेशा गायें देखीं। बढ़िया मोटी  खूबसूरत गायें। बिना कीचड़ के पूंछ फटकारती गायें। मन आ गया तो कभी कभार गायों को रंगबिरंगा भी कर देतीं हैं, मतलब परिवार के बच्चों की तरह गायों को पालती हैं। उनका कहना है कि हमारे बच्चों की देखभाल गाय करती है तो हमारा फर्ज है कि हम गायों को अपना परिवार व बच्चा मानें, उनके नखरे खुशी से झेलें।

    मौसी जी का यह कहना रहा है कि जो खाना है बताओ मैं घर में बनाऊंगी, जो बनाना नहीं आता होगा वह बनाना सीखूंगी फिर बनाकर खिलाऊंगी लेकिन बाजार से खरीद कर नहीं खाना है क्योंकि बाजार में खाने में मिलावटी सामान प्रयोग होता है गुणवत्ता अच्छी नहीं होती। इसी चक्कर में उन्होंने खूब सारी चीजें बनानी सीखीं।

    लड़का व लड़की दोनों इंजीनियर हैं। जब भी छुट्टियों में घर आते हैं तब मौसी जी रोज नाश्ते, लंच व डिनर में आज भी अलग-अलग चीजें बनाती हैं। जब मैं गांव में होता हूं तो सुबेरे सुबेरे पूछने आ जातीं हैं कि मैं नाश्ते में क्या खाऊंगा, धोखे से भी मुंह से कुछ निकल गया कि यह खाऊंगा तो वह चीज बनेगी।

    गांव में रहते हुए भी बच्चों को शहरों जैसी सुविधाएं दीं। बहुत अच्छी वाली तकिया, बहुत अच्छा बिस्तर मुलायम व गुदगुदा गद्दा, धुली व अच्छी चादरें व बेडशीट, मच्छरदानी, सोफा आदि। अच्छी मुलायम रोएंदार तौलियाएं। बच्चों को चलने के लिए उम्र व जरूरत के हिसाब से साइकिल व मोटरसाइकिल दीं।

    मौसी जी की उम्र पचास वर्ष से अधिक होगी। सुबह चार बजे उठती हैं, बड़ा घर है लेकिन खुद ही पूरे घर में झाड़ू लगाना, सफाई करना, गायों की देखभाल करना। फिर नाश्ता बनाना। फिर कपड़े धोना, फिर खाना बनाना, गायों की देखभाल। फिर कुछ देर आराम करतीं हैं, फिर खेत-खलिहान देखने जाती हैं कि काम-काज ठीक चल रहा है या नहीं, वहां से लौटकर फिर गाय व रात का भोजन। रोज साफ सुथरे बिस्तर लगाती हैं।

    शाम को भोजन के पश्चात अपने पति के साथ बैठकर या थकावट होने पर बिस्तर में लेटे हुए टीवी देखतीं हैं, समाचार देखतीं हैं। सो जाती हैं।

    मेरा मानना है कि मौसी जी अच्छा व स्वस्थ जीवन जीतीं आईं हैं। मेहनत किया, पैसा कमाया, पैसा सुविधाओं में खर्च भी किया, पैसा बचाया भी। मेरा अंदाजा है कि वे एक अच्छी कार खरीदने की हैसियत रखतीं है, दिल्ली जैसे शहर में एक अच्छा फ्लैट खरीद सकतीं हैं। क्या मालूम किसी मेट्रो शहर में उनके दो-चार प्लाट पड़े भी हों जिनकी कीमत आज करोड़ों में हो। किसी का बैंक अकाउंट या संपत्तियों की बहुत गहरी जानकारी नहीं रखी जा सकती है। कोई क्यों बताए भला।

    उनका लड़का गांव में रहते हुए भी सुविधाओं में पला बढ़ा। इंजीनियरी की और अब लगभग पचास-साठ हजार महीना की नौकरी करता है। मेट्रो शहरों में पचास-साठ हजार रुपए महीना कोई बड़ी रकम नहीं। छोटे से फ्लैट में रहता होगा। पैसे बचाता होगा, क्या पता मौसी अब भी उसको पैसे देतीं हों। अंदर की बात क्या मालूम। क्या पता जिस मेट्रो शहर में रहता है वहां घर खरीदने में भी आर्थिक मदद करें या किया हो। 

    दरअसल यह लेख इन सब बातों की चर्चा करने के लिए नहीं लिख रहा। यह सब बातें तो मुख्य बात का आमुख हैं सो अब आता हूं लेख की असली बात पर।

    मेरा मानना है कि जितना पैसा मौसी जी ने अपने लड़के मतलब मेरे मौसेरे भाई को इंजीनियरी की डिग्री दिलाने में खर्च किया, जितना रुपया जब वह नौकरी के लिए संघर्ष कर रहा था उस समय खर्च किया होगा, जितना रुपया उसको मेट्रो शहर में घर खरीदने के लिए सहयोग कर रहीं होगीं। उससे बहुत कम पैसे से कोई व्यापार करवा सकतीं थीं या खेती किसानी को आधुनिक व व्यापाराना तरीके से करवाने की सोच दे सकतीं थीं।

    जिस कृषि ने उनको इतना सक्षम व समृद्ध बनाया कि उन्होंने बेहतर जीवन जिया व बच्चों को सुविधाओं वाली परवरिश दी। उसी कृषि को और बेहतर तरीके से करते हुए इंट्रेप्रिन्योर बनने की सोच अपने बच्चों को क्यों नहीं दे पाईं। पढ़ी लिखी व जागरूक होते हुए भी ऐसी सोच क्यों नहीं रख पाईं।

    लाखों रुपए साल का निवेश सालों तक बिना उफ किए वह भी पचास-साठ हजार रुपल्ली महीना जैसे छोटे आउटपुट के लिए।

    यदि इतना ही रुपया, इतने ही सालों तक बिना उफ किए, बिना लाभ की चिंता किए किसी व्यापार में लगाने की सोच रखतीं तो उनका लड़का आज नौकरी करने की बजाय कई लोगों को अपने यहां नौकरी दे रहा होता। जब उसकी मां उसको गांव में शहर जैसी सुविधा दे सकतीं थीं तो वह दिल्ली जैसे शहर की सुविधाओं को अपने गांव में लाकर खड़ा कर सकता था।

    लेकिन हुआ क्या अच्छी खासी समृद्धि व समृद्धि की संभावनाओं को छोड़कर वह लाखों करोड़ों की भीड़ में एक भूला हुआ बिना पहचान वाला चेहरा बनने चला गया वह भी विकास के नाम पर, प्रगति के नाम पर।

    इसमें गलती मौसी की या उनके लड़के की भी नहीं है। अपने समाज की सोच ऐसी है कि वह नौकरी को महान मानता है, नौकरी देने को महानता नहीं मानता। दूसरा रिस्क लेने की भावना अभी गांवों के लोगों में नहीं आई हैं। नौकरी में लगने वाला निवेश उनको बिना रिस्क का लगता है जबकि व्यापार का निवेश उनको रिस्क का लगता है। सामंतवादी सोच वाली ऐंठन, अहम व लोगों क्या कहेंगे जैसी मानसिकता भी बहुत बड़ा कारण है। व्यापार में विनम्र होना पड़ता है। लेकिन नौकरी करने में भी तो बातों के जूते रोज खाने ही पड़ते हैं।

    मैंने कल अपने गांव के बारे में लिखा। जैसा कि मैं करता हूं, मैंने फेसबुक व व्हाट्सअप जैसी कई सोशल मीडियाओं में उस लेख को भी पोस्ट किया। कई लोगों के अहम को मेरा लेख अनजाने में चोट कर गया। उन्होंने लेख के भाव को समझने की बजाय नुक्ताचीनी करने को प्राथमिकता दी, कुछ ने तो लेख के तथ्यों को ही गलत साबित करने को प्राथमकिता दी।

    हमारी सोच का स्तर यह है कि हमारा अहम स्वीकारने को तैयार नहीं होता, समझने को तैयार नहीं होता, सुनने को तैयार नहीं होता। यही कारण है कि हममें दृष्टि विकसित नहीं हो पाती, हम अपने आसपास घटित हो रही घटनाओं को देख नहीं पाते।

    ऐसा नहीं है कि मेरा गांव एक आदर्श गांव है, भारत में ऐसे गांव बहुत हैं, सैकड़ों हैं। ऐसा नहीं है कि मेरी चचेरी-ममेरी मौसी ही ऐसी हैं, भारत के गांवों में हजारों की संख्या में ऐसी महिलाएं हैं लेकिन हम उनको देखते नहीं, क्योंकि हमारी हमारी कंडीशनिंग, हमारे पूर्वाग्रह, हमारा अहम, हमको आब्जर्व करने से रोकता है, हमें दृष्टिहीन बनाता है।

    दरअसल इंट्रेप्रिन्योरशिप एक सोच होती है, भारत को इस सोच की व दृष्टि की बहुत अधिक जरूरत है। तभी भारत, समाज व भारत के लोग वास्तव में विकसित व जागरूक होगें।

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