Author: संपादक मंडल

  • ग्रामीण किसान-महिला बेहद परिश्रमी, उत्पादक व Entrepreneur (व्यवसायी) होती है

    Vivek Umrao Glendenning
    “SAMAJIK YAYAVAR/ Social Wayfarer”

    बेहद परिश्रमी :

    पूरे वर्ष सर्दी, गर्मी, बरसात कोई भी मौसम हो सुबह लगभग चार बजे उठना। गाय भैंस बकरी की देखभाल करना। देखभाल करने की प्रक्रिया में जानवरों को यहां से वहां बांधना ताकि रात भर में एक ही जगह खड़े या बैठे होने से शरीर की जड़ता टूटे ताकि दूध का संचार ठीक से हो पाए। भूसे को बड़ी-बड़ी टोकरियों में लादकर नांद तक पहुंचाना व जानवरों को देना या चारा मशीन को हाथ से चलाकर चारा काटकर जानवरों को देना।

    कुएं या हैंडपंप से ढेरों बाल्टी पानी खींच कर जानवरों के बैठने व रहने की जगह को साफ करना। अमूमन हैंडपंप बहुत कड़े होते हैं, दिन भर बहुत अधिक इस्तेमाल होता रहने से लुब्रीकेशन जल्द खत्म हो जाने के कारण तथा भूजल स्तर के उतार चढ़ाव के कारण हो जाता है।

    हाथों से जानवरों के थनों से दूध निकालना। देखने में यह प्रक्रिया भले ही आसान लगती हो लेकिन कभी दूध निकाल कर देखिए, मालूम पड़ेगा कि उंगलियों, हथेली व पंजो की कितनी तकनीक व मेहनत लगती है।

    घर के प्रयोग के लिए दूध निकाल कर, शेष दूध को गांव में डेयरी कलेक्शन केंद्र में जाकर दूध देने जाना। यह दूरी घर से काफी दूर भी हो सकती है, बाल्टी व दूध का वजन लाद कर दूरी तय करके डेयरी में दूध देने जाना।

    बच्चों के लिए नास्ता बनाना, स्कूल ले जाने के लिए भोजन बनाना, उनको स्कूल के लिए तैयार करना। घरवालों के लिए भोजन बनाना। बच्चों ने कुछ विशेष फरमाइश कर दी तो वह भी बनाना।

    भोजन बनाने का मतलब सौ-पचास-दो सौ रोटियां, चावल, दाल, सब्जी इत्यादि। यह सब चूल्हे में बनाना, धुआं झेलते हुए। फिर ढेर सारे बर्तनों को धोना।घर की अंदर बाहर बैठकी इत्यादि सभी स्थानों में सफाई करना। कभी कभार गोबर लीपना। कंडे पाथना। रसोई के इस्तेमाल के लिए कुएं या हैंडपंप से पानी भरना। परिवार के ढेरों कपड़े हाथ से धोना।

    दिन में कई बार समय-समय पर जानवरों की सेवा-टहल करना। उनको पानी पिलाना, यहां से वहां बांधना। चारा देना। शाम को फिर दूध निकालना। फिर से डेयरी में दूध देने जाना।

    खेतों पर जाना व खेतों पर काम करना। जानवरों के लिए चारा खेतों से काटना, लादना व ढोकर घर तक लाना। खेतों से घर की दूरी कई किलोमीटर भी हो सकती है।

    बच्चों के स्कूल से लौटने पर उनसे बातें भी करती है। उनको फिर से खिलाती है। खुद भले ही पढ़ी लिखी न हो लेकिन बच्चों को पढ़ने लिखने के लिए कहती है, इंतजाम करती है।

    ग्रामीण परिवेश में रिश्तों के बहुत मायने होते हैं। रिश्तेदारों से उनके रिश्ते के अनुसार जिम्मेदारी का निर्वाह व देखभाल भी करती है।

    रोजमर्रा के प्रयोग के लिए सब्जियों का उत्पादन भी कर लेती है। दूध का खोया बनाकर मिठाई का उत्पादन भी घर में घर लेती है।

    उत्पादक :

    ग्रामीण किसान-महिला उत्पादन करती है, उत्पादन का प्रारंभिक प्रसंस्करण भी करती है। यदि दाल, अचार, पापड़ इत्यादि की बात की जाए तो संपूर्ण प्रसंस्करण भी करती है। यदि गन्ना की खेती करती है तो प्रसंस्करण करके गुड़ बना लेती है, सिरका भी बना लेती है। दूध का प्रसंस्करण करके छाछ, मक्कन व घी का उत्पादन करती है। आलू चिप्स का उत्पादन करती है।

    कृषि से जुड़ा अनेक काम करना जैसे खेतों की निराई गुड़ाई सिचाई, बीज डालना, खर पतवार हटाना, कीटनाशक डालना, खाद डालना, गोबर की खाद बनाना, फसल काटना, फसल ढोना, उत्पादन का भंडारण तथा भंडार का प्रबंधन।

    बाजार में बेचने के लिए खेतों में उगाई जाने वाली सब्जियों की बात न भी की जाए, केवल घरेलू प्रयोग के लिए उगाई गई सब्जियों की ही बात की जाए तो भी प्रति वर्ष दसियों हजार रुपए की सब्जी का उत्पादन ग्रामीण किसान-महिला बैठे-ठाले ही कर लेती है।

    डेयरी में बेचे जाने वाले दूध की बात न भी की जाए, केवल घरेलू प्रयोग के लिए दूध उत्पादन की ही बात की जाए तो भी प्रतिवर्ष दसियों हजार रुपए के दूध का उत्पादन ग्रामीण किसान-महिला कर लेती है।

    घरेलू प्रयोग के लिए छाछ, मक्खन व घी का प्रसंस्करण पद्धति से उत्पादन करती है। इन्हीं वस्तुओं का सालाना उत्पादन बीसियों हजार रुपए होता है।

    Entrepreneur (व्यवसायी) :

    ग्रामीण महिला-किसान जिन वस्तुओं का उत्पादन व प्रसंस्करण घरेलू व पारिवारिक प्रयोग के लिए करती है, जैसे आलू चिप्स, पापड़, अचार, आम-पापड़, दूध, खोया, मक्खन, छाछ, घी, सब्जी इत्यादि।केवल इन वस्तुओं इन जैसी अन्य वस्तुओं की ही यदि बाजार भाव से गणना की जाए तो यह कई लाख रुपए प्रति वर्ष का हिसाब-किताब बैठेगा।

    यदि खेती में उसके योगदान की गणना भी कर ली जाए बाजार भाव पर तो उसकी वार्षिक आय सरकारी प्राथमिक टीचर की तुलना पर पहुंच जाएगी।यहां ध्यान देने की बात यह है कि मैं उत्पादन व प्रसंस्करण की आय की बात कर रहा हूं। मैं घरेलू कार्यों में दी जाने वाली सेवाओं की बात नहीं कर रहा हूं। मैं खाना बनाने, देखभाल करने, कपड़े धोने, घर में झाड़ू पोछा लगाने जैसी सेवाओं की बाजार भाव की गणना करने की बात नहीं कर रहा हूं।

    मैं ग्रामीण किसान-महिला की उत्पादकता व इकोनोमी में सीधे योगदान की बात कर रहा हूं।

    दूध का उत्पादन (दूध खरीदना नहीं), उत्पादित किए दूध का प्रसंस्करण करके छाछ, मक्खन, घी, खोया इत्यादि बनाना।
    सब्जी उगाना (सब्जी बाजार से खरीद कर पकाना नहीं)।
    आलू उगाकर उसका चिप्स व पापड़ बनाना (आलू खरीद कर चिप्स बनाना नहीं)।

    ग्रामीण किसान-महिला उत्पादन में बाजार रिस्क लेती है। उत्पादन का भंडारण-प्रबंधन करती है। बहुत कुछ करती है, बहुत ही अधिक स्किल्ड होती है।

    अब सवाल यह है कि जो ग्रामीण किसान-महिला इतनी स्किल्ड है, इतनी परिश्रमी है, इतनी आय करती है, देश की इकोनॉमी व JDP में जबरदस्त व सीधा योगदान करती है। उसकी हमारे समाज में व हमारे मन के अंदर वास्तविक प्रतिष्ठा क्या है?

    प्रतिष्ठा का स्तर तो यह है कि जो महिलाएं शहरों या कस्बों में रहती हैं जिनके पति दस-बीस हजार महीना कमा लेते हैं, वे भी ग्रामीण किसान-महिला को निकृष्ट मानती है उपहास उड़ाती है। जबकि शहरी महिला का वास्तविक उत्पादन, इकोनॉमी व GDP में योगदान नहीं होता है। रिस्क क्या है नहीं जानती। दो-तीन कमरों के घर में झाड़ू पोछा करने को, मशीन से कपड़े धोने को, कुछ रोटियां पकाने खाना बनाने को बहुत बड़ा काम मानती है। अपने इन कामों की तुलना नौकरों के वेतन से करती है।

    दरअसल यह चरित्र जानबूझकर जिया जाने वाला भयंकर व बेईमान विरोधाभास है। 

    चलते – चलते :

    यदि हवाई नारेबाजी तथा वस्तुनिष्ठता-हीन-तर्क वाले शाब्दिक तामझाम वाले दर्शन को तर्कसंगत (रेशनल) न माना जाए तो दरअसल भारतीय समाज में परंपरा में ही हजारों वर्षों से परिश्रम को उपेक्षित, तिरस्कृत व अछूत माना गया है। यही कंडीशनिंग हमें गांव, ग्रामीण व किसान को मूर्ख, निठल्ला, उपेक्षित, निरीह, तिरस्कृत व असभ्य मानने की मूर्खतापूर्ण मानसिकता में रखे रहती है।

    इस मानसिकता की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगया जा सकता है कि भारत का शहरी समुदाय, गांव व ग्रामीणों को गाली मानता है तभी “गवांर” शब्द गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है।

    किसान पुरुष को निठल्ला माना जाता है, किसान महिला को अजागरूक माना जाता है, किसानों की संतानों का मजाक उड़ाया जाता है, उनको दोयम स्तर का माना जाता है।

    भारतीय राष्ट्रीय मीडिया लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा मेट्रो व बड़े शहरों की बात करते हुए प्रयोग करता है, शेष लगभग दो प्रतिशत में पूरा भारत, इस बचे हुए दो प्रतिशत के भी अधिकतर प्रतिशत में छोटे शहर ही रहते हैं।

    गांव व ग्रामीण का मानों कोई अस्तित्व ही नहीं, कीड़े-मकोड़े हैं। ग्रामीण को भी इंसान समझा जाए, वे भी प्रतिष्ठित हों, उनका आर्गनाइज्ड (organised) शोषण व तिरस्कार बंद हो, बहुत बड़ी प्राथमिकता है।

    दरअसल भारतीय समाज में स्किल व श्रम को हमेशा उपेक्षित किया गया है। स्किल व श्रम को कभी ठीक से न समझा गया, न ही परिभाषित किया गया।ग्रामीन किसान-महिला जो बहुत स्किल्ड है, उत्पादक है, Entrepreneur है, उसको जागरूक करने के लिए कुछ-कुछ हजार रुपल्ली वेतन पाने वाले NGO वेतनभोगी कर्मचारी रखे जाते हैं, आशा जैसी सरकारी कर्मचारी रखी जाती हैं, प्राइमरी स्कूल की शिक्षिकाएं रखी जाती हैं।

    इतना तो कामन सेंस होना ही चाहिए कि ककहरा व गिनती रटाना अधिक स्किल का काम है या ग्रामीण किसान-महिला के उत्पादन व प्रसंस्करण के काम। ककहरा, गिनती रटाने वाले प्राइमरी स्कूल टीचर का, एक NGO कर्मचारी का, आशा का देश की इकोनॉमी व GDP में वास्तविक उत्पादन योगदान है ही नहीं। फिर भी इनका अहंकार आसमान पर रहता है।

    ग्रामीण किसान-महिला जो इन सबसे बहुत अधिक स्किल्ड है, देश की इकोनॉमी व GDP में बहुत योगदान करती है, को निकृष्ट माना जाता है, इससे सीखने की बजाय, सिखाने जाया जाता है। ग्रामीण महिला-किसान को जागरूक बनाने के लिए अभियान चलते हैं, सेमिनार होते हैं। स्किल्ड बनाने के लिए योजनाएं बनती हैं। स्किल डेवेलपमेंट कार्यक्रम चलते हैं।दरअसल जब तक हम, हमारा समाज व हमारे देश का तंत्र इन सब चूतियापों से ऊपर उठकर श्रम व स्किल को ठीक से परिभाषित नहीं करेगा तब तक हमारा समाज व देश बेहूदगी, फूहड़ता व संघटित शोषण से बाहर नहीं निकल पाएगा।

    हमें स्किल, श्रम व इकोनॉमी को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है न कि तर्क-असंगतता, मूर्खता व शोषण के तामझाम व प्रपंचो को विस्तारित करते रहने की।

  • अखिलेश सिंह यादव को मुख्यमंत्री मोड से बाहर आ जाना चाहिए

     
    Akhilesh Yadav

    मैं अखिलेश सिंह यादव का प्रशंसक रहा हूं जबकि उनसे कभी आमने सामने नहीं मिला। उनसे या उनकी सरकार से या उनकी पार्टी से या उनके कार्यकर्ताओं से मैंने कभी एक रुपए का कोई लाभ नहीं लिया।

    किंतु इधर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में उनके समर्थकों व मीडिया में अखिलेश के बयानों से यूं लग रहा है कि अखिलेश अपने अंदर से अभी यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वे अब मुख्यमंत्री नहीं रहे हैं। यह भी लगता है कि मान बैठे हैं कि वे अगली बार 2022 में यूपी में सरकार बनाने जा ही रहे हैं जैसे 2012 में बनाई थी। 2012 की परिस्थितियां भिन्न थीं लोग बसपा से लोग चिढ़े हुए थे, भाजपा कमजोर थी, सपा की सरकार बननी ही थी। अखिलेश यादव के प्रचार ने इसमें सहूलियत दी और सपा सरकार में ढंग से आ गई।

    2012 में सपा की लड़ाई बसपा व मायावती जैसे नान-प्रोफेशनल्स से थी, ट्रांसफर-पोस्टिंग में माल कमाने, जन्मदिन में महंगे उपहार लेने जैसे बहुत टटपुंजिया जैसे क्रियापलापों से लोग ऊब चुके थे। ऊपर से इनके पास दूसरी पंक्ति लीडरशिप नहीं, ठोस जमीनी संगठन नहीं, लोगों से संवाद का नेटवर्क नहीं। ऐसी परिस्थितियों में साइकिल चला कर, रथ निकाल कर, प्रेस कान्फेरेंश करके चुनाव जीता सकता है।

    वर्तमान मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से गलतियां होगीं, पिछड़ा व दलित वर्ग सवर्णों की तानशाही व आक्रामकता से ऊबकर अखिलेश के साथ खड़ा होगा क्योंकि अखिलेश ही एकमात्र विकल्प हैं। इस धारणा के कारण मीडिया में बयानबाजी करते रहने के भरोसे ही 2022 की चुनावी बैतरणी पार करने की रणनीति पर काम करने की बजाय अखिलेश यादव को अगले पांच के लिए ठोस जमीनी क्रमागत सामाजिक योजनाओं का क्रियान्वयन करना चाहिए।

    2022 में अखिलेश यादव का मुकाबला भाजपा जैसी प्रोफेशनल व भारत की सबसे ताकतवर पार्टी से होगा जो चुनावी जीत के लिए कुछ भी करती है। संघ व भाजपा का व्यापक व मजबूत संगठन है। हर स्तर पर विभिन्न योग्यताओं व विभिन्न क्षमताओं के प्रतिबद्ध लोग हैं पार्टी व संगठनों में हैं। संघ व भाजपा से संबद्ध सैकड़ों संगठन हर स्तर पर हैं।

    जैसे अखिलेश यादव स्वयं को देश के प्रधानमंत्री बनने की दौड़ की महात्वाकांक्षा रखते हैं, वैसे ही आदित्यनाथ योगी भी प्रधानमंत्री बनने की दौड़ की महात्वाकांक्षा रखते हैं। भाजपा का विस्तार व नेटवर्क तो पूरे देश में है ही। समाजवादी पार्टी तो यूपी में ही सिकुड़ रही है। अखिलेश यादव को तो बहुत ही अधिक मेहनत, दूरदर्शिता व धैर्य की मूलभूत जरूरत है।

    सपा के कार्यकर्ताओं का मनोबल वैसे तो 2014 से ही टूटना शुरू हो चुका था, लेकिन 2017 के चुनावों में हार होने सत्ता न रहने के बाद मनोबल बहुत तेजी से टूट रहा है। धैर्य तो अभी से ही खतम हो रहा है जबकि सत्ता गए हुए दो महीने ही हुए हैं, पूरे पांच साल अभी बाकी हैं।

    पांच साल सत्ता में रहते हुए अखिलेश जी ने

    नौकरशाही को जवाबदेह बनाने का प्रयास नहीं किया,
    पिछड़ों, दलितों व मुसलमानों के लिए दूरदर्शी प्रयास नहीं किए,
    पिछड़ों व दलितों की सामाजिक राजनैतिक व वैचारिक जागरूकता के लिए ठोस कार्य योजनाबद्ध तरीके से नहीं किया,
    शिक्षा की गुणवत्ता व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए कार्य नहीं किए,
    पिछड़ों, दलितों व मुसलमानों के लिए आर्थिक विकास के लिए दूरदर्शी योजनाएं लेकर नहीं आए,
    सामाजिक न्याय के लिए गंभीर व दूरदर्शी प्रयास नहीं किए,  

    ……. सत्ता रूपी अवसर व संसाधन मिलने के बावजूद बहुत कुछ नहीं किया, जो किया ही जाना चाहिए था।

    मैं अखिलेश सिंह यादव जी को सुझाव देना चाहूंगा कि –

    पिछड़े, दलित व मुसलमानों के लिए जमीन पर उतर कर काम व संघर्ष कीजिए। बिना बिस्तर के सोइए। घर में रहने व खाने की बजाय, गरीब लोगों के घरों में जाकर रहिए, खाइए। लोगों का मतलब यादव नहीं है, यादव जाति के बाहर भी लोग हैं। जमीनी संगठन बनाइए जिसमें सभी जातियों व वर्गों से अच्छे व जमीनी लोगों को जोड़िए, उनसे विश्वसनीय संबंध बनाइए, उनको महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीजिए। विश्वास कीजिए यादव जाति के बाहर भी चिंतक होते हैं, विचारक होते हैं, सांगठनिक क्षमता के लोग होते हैं।

    अध्ययन कीजिए, वैचारिक स्वाध्याय कीजिए। समाजवाद व सामाजिक समता को गहराई से जानने समझने का प्रयास कीजिए। सामाजिक लीडरशिप क्या होती है, यह जानने समझने का प्रयास कीजिए।

    समाजवादी पार्टी मतलब “समाजवाद”, समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता मतलब “समाजवादी”, उसमें भी यादव हुआ और बड़ा वाला “समाजवादी” इत्यादि टाइप के मोडों से बाहर आइए।

     .

  • समाजवादी पार्टी वाले “समाजवादियों” के लिए

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    जब से उत्तर प्रदेश के चुनाव में समाजवादी पार्टी की पराजय हुई है तब से अधिकतर समाजवादी फेसबुक में आंय बांय सांय बोले जा रहे हैं। कोई अखिलेश यादव को दोष देता है, कोई अवसरवादी युवाओं व नेताओं को दोष देता है, कोई चाटुकारों को दोष देता है। आरोप प्रत्यारोप का संगम चल रहा है। मैंने सोचा कि मैं भी विचारक के रूप में अपनी खरी-खरी बात रख दूं भले ही मैं समाजवादी पार्टी का सदस्य नहीं हूं। इसी बहाने समाजवादी पार्टी वाले समाजवादियों की सहिष्णुता व अभिव्यक्ति के स्वातंत्र्य वाले मूल्य पर उनकी आस्था व समझ का भी कुछ आकलन हो जाएगा।

    आपको अटपटा लग रहा होगा कि मैं समाजवादी पार्टी वाले समाजवादी क्यों लिख रहा हूं। वह इसलिए कि जैसे भारतीय वामपंथी पार्टी का होने का मतलब वामपंथ की समझ या वामपंथी होना नहीं होता, जैसे बहुजन समाज पार्टी का होने का मतलब बहुजन होना या बहुजन के प्रति प्रतिबद्ध होना नहीं होता जैसे भारतीय जनता पार्टी का होने का मतलब हिंदूत्व की समझ रखने वाला या हिंदू होना नही होता बिलकुल वैसे ही समाजवादी पार्टी का होने का मतलब समाजवादी होना नहीं होता। लेकिन चूंकि ऐसा माना जाता है, प्रचलन में आ गया है इसलिए मैं समाजवादी पार्टी वाले समाजवादियों कह रहा हूं।

    आप लोगों की प्रतिक्रियाओं से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो आपको पराजय बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। आपमें से बहुत लोग यह कहते हैं कि उन्होंने समाजवादी पार्टी की सरकार से कभी कुछ नहीं लिया। मेरा कहना है कि भले ही आपने पार्टी की सरकार से कुछ नहीं लिया हो लेकिन आपकी पार्टी की सरकार होना ही आपके अंदर मनोवैज्ञानिक आत्मविश्वास, प्रसन्नता व भावनात्मक आवेग आदि बनाए रखता है। इसलिए कौन कितना मलाई खाया, कौन कितना किसके चिपका रहा इत्यादि बातों का कोई विशेष मायने नहीं।

    मायने यह रखता है कि जो नुक्ताचीनी आप अब निकाल रहे हैं वह नुक्ताचीनी आपने पार्टी के सरकार में पांच साल रहते हुए क्यों नहीं की। मान लिया जाए कि आपने की भी तो पूरी शिद्दत से लगातार क्यों नहीं की। अपने भीतर गहराई में झांकिए, यदि थोड़ी सी भी दृष्टि होगी तो उत्तर आपको मिल जाएगा।

    मैं तो यही सुझाव दूंगा कि नुक्ताचीनी निकालना बंद कर दीजिए। जमीन पर उतरिए या जो जमीन पर उतरें हों उनके साथ बिना छल व धोखे व हिडेन-एजेंडे के साथ खड़े होइए बिना शर्त। यदि ऐसा न कर पाइए तो अपनी रोजी-रोटी पाइए, भविष्य में जब यदि कभी समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है तो फिर समाजवादी बन लीजिएगा। इतना करने में आखिर मुश्किल क्या है, कठिनाई कहां है। बहुत सरल है।

    Akhilesh Yadav

    आपमें से बहुत लोग सोशल मीडिया के माध्यम से अखिलेश यादव को यह बताने में लगे हैं कि उन्होंने किस पर विश्वास करके गलती किया, फलां किया ढिका किया वगैरह-वगैरह। दूर से आलोचना करना बहुत आसान है। लेकिन जब सत्ता हाथ में होती है तब लोगों व लोगों की मानसिकताओं को फिल्टर कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है। यह भी तो संभव है कि यदि आप अखिलेश यादव से चिपके होते तो आपका भी चरित्र सत्ता ग्लैमर के कारण वैसा ही हो गया होता जैसा कि उन लोगों का हुआ जिनके चिपकने को आप आज नाजायज ठहरा रहे हैं।

    चुनावी धींगामुस्ती में किसके क्या बयान थे, यह सब यदि छोड़कर ईमानदारी से बात की जाए तो यह मानना पड़ेगा कि अखिलेश यादव ने काम किया और काम करने का प्रयास किया। मैं समाजवादी पार्टी व उसके लोगों की बात नहीं कर रहा हूं। मैं सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव की बात कर रहा हूं।

    यदि नाजायज लोगों के चिपके होने के बावजूद अखिलेश यादव बेहतर सोच रख पाते हैं, बेहतर काम करने के लिए प्रयास कर पाते हैं। तो इसका मतलब यह है कि उन पर किसी के चिपके होने का कोई खास अंतर नहीं पड़ता। राजनैतिक त्रुटियां किससे नहीं होती हैं। सभी से होती हैं। राजनीति में हार जीत चलती रहती है। राजनीति में हारना या जीतना उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि अपने नेता पर विश्वास रखना और हार में भी साथ खड़े रहना।

    यदि आपको यह लगता है कि हार के जिन कारणों का विश्लेषण आप कर पा रहे हैं वह अखिलेश नहीं कर पाने में सक्षम नहीं हैं। तब अखिलेश यादव को अपने नेता के रूप में मानने का मतलब ही क्या रहा जाता है। जमीनी कार्यकर्ताओं के बारे में समझ धक्के खाने, धोखे खाने के बाद आती है। जो नेता अपनी हार के कारणों का विश्लेषण न कर पाए। जो नेता अपनी हार से सीख न ले पाए। यदि आपकी दृष्टि में अखिलेश यादव हार के कारणों का विश्लेषण कर पाने में, हार से सीख ले पाने में सक्षम नहीं तो आपके द्वारा उनको नेता के रूप में स्वीकारने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

    ऐसा भी नहीं है कि आप पूरे प्रदेश के हर एक गांव की जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं। ऐसा भी नहीं है कि आपने जमीन में बहुत बड़े काम किए हैं, लोगों के लिए भीषण संघर्ष किए हैं, जिनके कारण आपमें विशिष्ट क्षमता आ गई है घर बैठे जमीनी कारणों व हकीकत को समझने का। आप सिर्फ तार्किक व आवेगात्मक कयास लगा रहे हैं जिसे आप हार के कारणों के विश्लेषण का नाम दे रहे हैं।

    मूलभूत प्रश्न यह है कि आप अपने स्तर पर भरपूर ऊर्जा के साथ पांच वर्षों तक क्या करते रहे? आपने लोगों की मानसिकता अपने स्तर पर विकसित क्यों नहीं की। घर में बैठे-बैठे पोस्ट-अपडेट करने को जमीनी संघर्ष व योगदान मानने की उथली मानसिकता से तो आप बाहर निकल नहीं पा रहे हैं, किंतु अखिलेश यादव को बताना चाहते हैं कि वे क्या करें या न करें। यदि आपको विश्वास है कि अखिलेश यादव ने लोगों के लिए बेहतर काम करने का प्रयास किया तो उन पर विश्वास कीजिए। उनके साथ खड़े होइए। यदि आपको लगता है कि अखिलेश ने कोई काम नहीं किया, तो ऐसे नेता के पीछे समय व ऊर्जा बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं।

    आप हार को इस रूप में भी तो देख सकते हैं कि अखिलेश को जमीनी हकीकत से रूबरू होने का अवसर मिलेगा। जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति उनकी दृष्टि व समझ अधिक स्पष्ट होगी। यदि आपको लगता है कि आप बेहतर हैं, आप अधिक सक्षम हैं तो आपको अपनी पार्टी की कमान संभालनी चाहिए। मेरी समझ में आपकी यह बात समझ न आ रही कि सत्ता में न रहने, लोगों के लिए जमीनी पर रहते हुए संघर्ष करने से इतनी बेचैनी क्यों?

    आप तो भाजपा की तरह प्रयोगधर्मी व इच्छाशक्ति के धनी भी नहीं हैं कि आडवाणी जी को किनारे लगाकर मोदी जी को ले आवें। बिना किसी का चेहरा आगे किए हुए लहलहाते हुए सत्ता प्राप्त कर लें और आदित्यनाथ जी को मुख्यमंत्री बना दें और कोई चूं तक न करे उल्टे शान में रुदालियों व भांटों की तरह कसीदें पढ़ना शुरू कर दें।

    भाजपा तो समाजवादी होने का दावा नहीं करती फिर भी उसके कार्यकर्ता बिना मुंह बिचकाए बिलकुल जमीन पर घिसटते हुए अपनी पार्टी का प्रचार करते हैं। समाजवादी पार्टी तो समाजवादियों की पार्टी है फिर कार्यकर्ताओं को जमीन पर घिसटते हुए पार्टी का प्रचार करने में क्या झिझक। सत्ता किसी भी पार्टी की हो, सत्ता से सटे हुए लोग कमोवेश वही होते हैं। इसलिए कौन सत्ता से कैसे सटा है, से नहीं, जमीनी प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की लगातार की मेहनत से पार्टियां सत्ता तक पहुंचती हैं।

    खुलेमन से स्वीकारिए कि भाजपा ने मेहनत की, लोगों का माइंडसेट को अपने फेवर में करने में कामयाब रही। कारण चाहे जो भी रहे हों लेकिन लोगों को यह लगा कि समाजवादी यादवों की पार्टी है इसलिए अधिकतर पिछड़ी जातियां समाजवादी पार्टी से दूर हो गईं। इस जमीनी तथ्य का अखिलेश यादव से कुछ लोग कितना सटे रहे से कोई मतलब नहीं। हां यह आपकी व्यक्तिगत खुन्नस का विषय जरूर हो सकता है। वैसी ही खुन्नस जैसी कि पिछड़ी जातियां समाजवादी पार्टी के सत्ता पर आने से यादवों के व्यवहारों के कारण यादवों से रखने लगतीं हैं।

    यदि हो सके तो अपने स्तर पर समाजवादी पार्टी को मजबूत कीजिए। हर जाति के लोगों का दिल जीतिए। समाज के लोगों को लगे कि समाजवादी पार्टी उनकी अपनी पार्टी है। अब वे जमाने लद गए जब आपने बिना वास्तविक जमीनी आधार वाले किसी बेहूदे आदमी को उठाकर पद दे दिया और सोच लिया कि अब उस आदमी की जाति के सारे लोग लहालहा कर आपके साथ खड़े हो जाएंगें।

    भविष्य में विजय प्राप्त करना आसान नहीं। रगड़ना पड़ेगा खुद को, तपाना पड़ेगा खुद को, जमीन पर लोगों के बीच। वास्तविक जनाधार वाले नेताओं से डरिए नहीं, उनको साथ जोड़िए, तालमेल बनाइए, साझेदारी कीजिए, हिस्सेदारी दीजिए। हर स्तर पर साझा करना सीखिए, हर स्तर पर हिस्सेदारी देना सीखिए।

    यदि आपको लगता है कि आप सही हैं लेकिन आपका नेता अक्षम है, दृष्टिहीन है, कान का कच्चा है तो बदल दीजिए अपने नेता को। किंतु यदि आपको लगता है कि आपका नेता गुणी है तो उस पर विश्वास कीजिए, नुक्ताचीनी की बजाय उसके निर्णयों के साथ खड़े रहिए इस विश्वास के साथ कि आपका नेता भी कारणों का विश्लेषण करने में कम से कम उतना सक्षम है जितना कि आप हैं।

    चलते चलते एक बात बताना चाहता हूं, भाजपा आपके एजेंडे तय करती है। भाजपा जिस चुनावी रणनीति का प्रयोग आज करती है आप उस रणनीति का प्रयोग कल करते हैं जबकि भाजपा कल एक नई रणनीति के साथ चुनाव में अपना परचम लहरा रहा होती है। आपको भाजपा का अनुसरण करने की जरूरत नहीं, आपको भाजपा का प्रतिरोध करने की जरूरत नहीं, आपको भाजपा के एजेंडों के विरोध में अपने एजेंडे तय करने की जरूरत नहीं। ऐसा करके तो आप भाजपा को और अधिक मजबूत ही करते हैं।

    आप अपने एजेंडे खुद तय कीजिए जो आम लोगों के अपने एजेंडे हों। आप सत्ता में आएं या न आएं लेकिन एजेंडे अपने रखिए। भाजपा चुपचाप 10 साल सत्ता से बाहर रहकर भी अपने एजेंडे में काम करती रहती और एक दिन अचानक पूरे देश में कब्जा कर लेती है।

    धैर्य, रणनीति, जमीनी संगठन व प्रतिबद्ध कार्यकर्ता यह चार भाजपा के मूलभूत विजयी तत्व हैं। आप इन चारों में कमजोर हैं।

    पार कैसे लगेगा यह सोचने की बजाय आप तो आपसे में ही छीछालेदर करने में लिप्त हैं। अब मर्जी आपकी, आप मुझे चाहे गरिया लें या मेरी बातों पर मनन कर लें। आपकी अपनी समझ, आपकी अपनी खुशी।

    शुभकामनाओं सहित,

    सामाजिक यायावर

  • योगी आदित्यनाथ बनाम विपक्ष

    Vivek “सामाजिक यायावर Social Wayfarer”

    अभी शपथ ग्रहण भी नहीं हुआ और आप हुआ-हुआ करने लगे। यदि हुआ-हुआ ही करना था तो भाजपा को इतने भारी बहुमत से जिताया क्यों। यदि आपको यह लगता है कि भारी बहुमत EVM की करामात है तो उतरिए सड़क पर और बचाइए लोकतंत्र को, खाइए लाठियां, जाइए जेल, करिए अपना सीना पुलिस की बंदूक से निकलने वाली गोली के सामने। फेसबुक व whatsapp से दुनिया नहीं चलती है। आप एक समय की रोटी नहीं कमा सकते फेसबुक व whatsapp में मैसेजों को कापी, फारवर्ड करके, और दुनिया बदलने का ख्वाब देखते हैं।

    कुछ बातें बिलकुल चुस्ती के साथ गांठ में बांध कर समझ लीजिए।

    या तो यह स्वीकारिए कि संघ व भाजपा के कार्यकर्ता जमीन से लेकर सोशल मीडिया में हर स्तर पर आपसे बेहतर हैं। वोट फेसबुक व whatsapp की लफ्फाजी से नहीं मिलता। वोट जमीन पर उतर कर अपने नेता के लिए मेहनत करने से मिलता है। वोट जब रोड-शो करने से नहीं मिलता तो फेसबुक व whatsapp में मैसेज फारवर्ड करने से कैसे मिल सकता है।

    या यदि आप यह मानते हैं कि EVM के कारण भाजपा को बहुमत मिला, तो जैसा मैंने पोस्ट की शुरुआत में कहा कि उतरिए सड़कों पर, संघर्ष कीजिए। लफ्फाजी से बिलकुल भी काम नहीं चलेगा।

    मैं जानता हूं कि आपमें बूता नहीं कि आप सड़क पर उतर कर संघर्ष कर पाएं। कभी जमीन पर उतर कर समाज के लिए काम व संघर्ष किया हो तो कुछ हिम्मत भी पड़े। आप में से जो अपवाद हैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं।

    आपको मेरी बात बुरी लगे या भली, यह आपकी अपनी सोच का स्तर। उत्तर प्रदेश में मायावती जी के दिन लद गए, मायावती जी के दिन लदने का मतलब बसपा के दिन लद गए। चैप्टर क्लोज। भावुक मत होइए, कड़वा सच है। EVM होती या न होती, मायावती जी की हालत कम-अधिक यही होती जो है।

    अब बात आती है अखिलेश जी की। तो उनको वास्तविक जमीन पर उतरना पड़ेगा, एक आम जमीनी नेता की तरह। खुद को पूरी ताकत के साथ यादवों के अतिरिक्त अन्य पिछड़ी जातियों के मान्य व लोकप्रिय नेता के तौर पर स्थापित व साबित करना होगा। इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं। यही परीक्षा है अखिलेश जी की, उनकी राजनैतिक सूझबूझ, सांगठनिक क्षमता व दूरदर्शिता की।

    जितना मैं भाजपा व संघ को समझता हूं उसके आधार पर मैं योगी आदित्यनाथ जी को मोदी जी के बाद भाजपा के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहा हूं। मोदी जी शायद कुल दो टर्म तक प्रधानमंत्री रहेंगे, उसके बाद योगी आदित्यनाथ जी प्रधानमंत्री के रूप में पारी खेलेंगे।

    मोदी जी ने गुजरात दंगों के लिए बदनाम हुए लेकिन पूरे देश में खुद को विकास पुरुष के रूप स्थापित कर लिया। योगी जी के खाते में गुजरात दंगों जैसा कुछ है भी नहीं। तब क्या योगी जी खुद को विकास पुरुष व शांत पुरुष के रूप में स्थापित नहीं कर पाएंगें। क्या मुश्किल है। योगी आदित्यनाथ जी के राजनैतिक पैतरों वाले बयानों में मिट्टी डालकर भूल जाइए।

    केंद्र सरकार उनकी, राज्य में भारी बहुमत के साथ हैं। जितने मर्जी उतने राजमार्ग बनवा कर एयरोप्लेन उतरवा कर विकास पुरुष बन जाएंगें।  यदि एक प्रतिशत भी मान लीजिए कि योगी जी ने संतुलन के साथ काम किया तो कैसे रोक पाएंगें आप उनको। इस बार न रोक पाए तो अगली बार कैसे रोक लेंगें।

    लोगों को लगा कि भाजपा अखिलेश जी से बेहतर काम करेगी, अवसर दिया। यदि योगी जी बेहतर काम करते हैं तो अखिलेश जी को और अधिक बेहतर कामों के विचारों के साथ लोगों को लुभाना पड़ेगा।

    Yogi Adityanath, CM, Uttar Pradesh

    मैं तो चाहता हूं कि योगी आदित्यनाथ जी अच्छा काम करें। ताकि उनके विपक्ष को और अधिक अच्छे कामों की मंशा के साथ आगे आना होना। यह एक बेहतर राजनीति की शुरुआत होगी।

    काम करने की प्रतिस्पर्धा वाली राजनीति से डर किस बात का। यदि ऐसा हो पाया तो यह तो भारत की राजनीति में बहुत ही अधिक बेहतर शुरूआत होगी।

    आप 2012 से मोदी का विरोध करते आ रहे हैं। क्या उखाड़ लिया। 2014 में भारी बहुमत से केंद्र में सरकार बनाई। आप और अधिक विरोध करने लगे। उन्होंने नोटबंदी लागू कर दी। आपको लगा कि रसगुल्ला आ गया मुंह में। आपने और अधिक विरोध किया।

    आपका विरोध हवाई है। आप लोगों के बीच नहीं जाते। आप जमीन पर नहीं जाते हैं। आप तर्क गढ़ते हैं जमीन पर न जाने के। परिणाम देख लीजिए, आपने जितना विरोध किया मोदी जी उतने ही ताकतवर बनते गए।  उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार बनाने जा रहे हैं। लगभग पूरा देश उनका है।

    जो आपने मोदी जी के साथ किया वही आप योगी आदित्यनाथ जी के साथ कर रहे हैं। वे अभी मुख्यमंत्री बने नहीं आपने उनका विरोध करना शुरू कर दिया। अवसर दीजिए, धैर्य रखिए एक साल तक उनको सत्ता को समझने बूझने दीजिए। फिर कुछ कहिए।

    चलते-चलते :

    यदि आप यह सोच कर चल रहे हैं कि आप सड़क पर नहीं उतरेंगें, संघर्ष नहीं करेंगे। तब भी सत्ता अपने आप रसगुल्ले की तरह आपके मुंह में आ गिरेगी तो आप शेखचिल्ली हैं।

    यदि आप EVM को गलत मानते हैं तब भी, EVM को गलत नहीं मानते हैं तब भी। दोनों ही सूरत में आपको जमीन पर उतरना होगा और संघर्ष करना होगा। नए तौर तरीकों के साथ। सवाल यह है कि क्या आप ऐसा कर पाएंगें।

    बैठे ठाले राजनीति करने व सत्ता पाने के दिन लद गए, बेहतर हो कि आप इस बात को जितनी जल्दी हो सके स्वीकार कर लें। आपको संघर्ष करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी। चाहे EVM हो या EVM  न हो।

  • ईरोम चानु शर्मिला

    Vivek Umrao Glendenning “सामाजिक यायावर”

    Irom Chanu Sharmila

    बिना शक ईरोम चानु शर्मिला मजबूत इच्छाशक्ति की महिला हैं। लेकिन उनकी इच्छाशक्ति सीमित दिशा की इच्छाशक्ति लगती है। सीमित दिशा की इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उनकी इच्छाशक्ति उनके अपने शरीर को कैसे प्रयोग करना है, तक ही सीमित है।

    जब तक AFSA नहीं हटेगा, मैं भोजन नहीं करूंगी, अपने बालों में कंघी नहीं करूंगी, आईना में अपना चेहरा नहीं देखूंगी। यह था ईरोम शर्मिला का आंदोलन। व्यक्तिगत शरीर तक सीमित आंदोलन। खाना नहीं खाना, बालों में कंघी नहीं करनी, चेहरा आईना में नहीं देखना।

    ईरोम शर्मिला का उपवास सांकेतिक उपवास रहा क्योंकि ईरोम शर्मिला का शरीर भोजन प्राप्त करता रहा। ईरोम शर्मिला के उपवास की परिभाषा यह है कि उन्होंने अपने मुंह से भोजन नहीं ग्रहण किया।

    ईरोम शर्मिला मणिपुर में मास-लीडर कभी नहीं रहीं। वे युवा थीं, संवेदनशील थीं। उनको लगा होगा कि गांधी उपवास रखते थे, मैं भी रखूं तो AFSA हट जाएगा। जैसे गांधी जी के उपवास से सरकार दबाव में आती थी, मेरे उपवास से भी सरकार दबाव में आ जाएगी। अपने उपवास को मजबूती देने के लिए उन्होंने कहा कि वे अपने बालों में कंघी भी नहीं करेंगीं, आईना में अपना चेहरा नहीं देखेंगी।

    उन्होंने उपवास शुरू कर दिया, कुछ दिनों बाद उनको हिरासत में लेकर चिकत्सीय पद्धति से आहार देना शुरू कर दिया गया।  ईरोम शर्मिला का शरीर आहार प्राप्त करता रहा और ईरोम शर्मिला उपवास करने वाले आइकन के रूप में स्थापित होती रहीं। यह प्रक्रिया तकरीबन 16 वर्षों तक चली। इन 16 वर्षों में राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने ईरोम शर्मिला का बिना शर्त खूब साथ दिया। ईरोम शर्मिला को अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले।

    मैं ईरोम शर्मिला से पहली बार तकरीबन 11-12 साल पहले दिल्ली में मिला था। कुछ देर साथ रहा था। ईरोम शर्मिला के भाई व दिल्ली में मणिपुर के छात्रों से कई बार मिला, कई बार उनके कमरों में भी गया जहां वे छोटी-छोटी मीटिंगे करते थे। मुझे जनांदोलन खड़ा कर पाने की दृष्टि, सोच व स्पष्टता दिखी नहीं। शुभकामनाएं रखते हुए भी मैं धीरे-धीरे दूर होता चला गया। सक्रिय रूप से जुड़ने की संबद्धता बन नहीं पाई।

    जो मुझे जानते हैं, वे जानते ही हैं कि जब पूरा देश अरविंद केजरीवाल जी व अन्ना हजारे जी के पीछे पगलाया हुआ था। तब मैं यह कह रहा था कि कुछ नहीं रखा इनके आंदोलन में। दरअसल मैं समाज, सामाजिक मुद्दों, सामाजिक समाधान व आंदोलन को सूक्ष्मता से देखने का प्रयास करता हूं। सब्जेक्टिविटी की बजाय ऑब्जेक्टिविटी से समझने व देखने का प्रयास करता हूं। इसलिए मेरे विश्लेषण भिन्न होते हैं, अधिकतर लोगों को पसंद भी नहीं आते हैं। यह बात अलग है कि कुछ वर्षों बाद उनको लगता है कि मेरे विश्लेषण सही थे। विभिन्न सामाजिक मुद्दों व घटनाओं में इसी प्रक्रिया का दुहराव होता रहता है।

    भारतीय समाज भावुकता से चलता है। ईरोम शर्मिला ने भावुकता में निर्णय लिया कि वे भोजन नहीं करेंगीं, बालों में कंघी नहीं करेंगीं, आईना नहीं देखेंगी। पहले AFSA हटाओ तब यह सब करूंगी। एक महिला मुंह से भोजन नहीं ग्रहण करती है, सुंदर बनने व दिखने का त्याग कर दिया है इस बात पर भारतीय समाज की भावुकता ने ईरोम शर्मिला को आइकन बना दिया। आइकन बनने का आधार – मुंह से भोजन ग्रहण न करना, बालों में कंघी न करना, चेहरा आइने में न देखना।

    16 वर्षों में पहुंचे कहां :

    16 वर्षों में ईरोम शर्मिला सेलिब्रिटी बन गईं, पुरस्कार मिल गए, उनके भाई व परिवार आदि का आर्थिक विकास भी जबरदस्त हो गया। 

    ईरोम शर्मिला ने उपवास रखने वाला अपना व्यक्तिगत आंदोलन भी खतम कर लिया।

    सवाल यह खड़ा होता है कि इतना सब संसाधन, मीडिया, आर्थिक, सहयोग व सेलिब्रिटी तामझाम आदि होने के बावजूद 16 वर्षों जैसे लंबे समय में ईरोम शर्मिला मणिपुर में ठोस जनांदोलन की नींव रख पाने में असमर्थ रहीं।  मणिपुर के लोग वहीं के वहीं रहे।  AFSA भी वहीं का वहीं रहा।

    चलते-चलते :

    यदि ईरोम शर्मिला नहीं होतीं तो मणिपुर में पिछले 16-17 वर्षों में कुछ ठीक-ठाक जमीनी सामाजिक आंदोलन खड़े हो सकते थे। बहुत ऐसे छोटे-छोटे प्रयास जिनका वास्तविक जमीनी आधार था, उनकी ओर हमारा ध्यान नहीं गया, उनको हमने प्रोत्साहित नहीं किया।  हमने ईरोम शर्मिला को मणिपुर मान लिया, हमने मान लिया कि पूरा मणिपुर ईरोम शर्मिला के साथ खड़ा है।

    ईरोम शर्मिला को 80-90 मत मिलने पर हम भोचक्के इसीलिए हैं क्योंकि हमने यह मान रखा था कि ईरोम शर्मिला मणिपुर की मास-लीडर हैं, जमीनी आंदोलन व संघर्ष से निकली हुई लोक-नेता हैं। मणिपुर के लोग उनके साथ खड़े हैं। वे मणिपुर के लोगों का सामाजिक प्रतिनिधित्व करती हैं।

    ईरोम शर्मिला एक मजबूत इच्छाशक्ति की संवेदनशील महिला हैं। लेकिन वे मणिपुर के लोगों की मास-लीडर कभी नहीं रहीं।  वे उपवास रूपी अपने व्यक्तिगत आंदोलन को सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित करने में असफल रहीं।

    मुझे यह लगता है कि उनके पास दूरगामी योजना कभी रही नहीं, आंदोलन की समझ नहीं रही। वे बहाव में बहती चली गईं।

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  • भारतीय समाज को सामाजिक सेलिब्रिटियों से खुद को बचाने की जरूरत है

    सामाजिक यायावर Social Wayfarer

    लेख की शुरुआत में ही यह कहना चाहता हूं कि मुझे मोदी जी बड़े मासूम लगते हैं और RSS (संघ) से अधिक भारतीय लोगों की चारित्रिक-नस को समझने वाला कोई और संगठन नहीं।

    फेंकना हो, झूठ बोलना हो, दावे ठोंकना हो, सेल्फी लेना हो, मीडिया का प्रबंधन करना हो, लोगों के सामने लछ्छेदार बातें बनानी हों, यात्राएं करनी हों, मैं फकीर हूं कभी भी झोला उठाकर चल दूंगा, मैं तो आप लोगों के लिए जीवन का त्याग किया हूं, जिम्मेदारी का निर्वाहन करने की बजाय विरोधियों की बुराई करना, वगैरह-वगैरह …. मतलब मोदी जी के जीवन-व्यवहार के किसी मुद्दे की बात कर ली जाए।

    यदि आपको यह लगता है कि मोदी जी ही ऐसे हैं, विरले हैं, तो आप या तो मूर्ख हैं या निहायत ही धूर्त हैं या आपको मोदी जी के व्यक्तित्व की बुराई करने में सैडिस्टिक आनंद आता है। वास्तविकता तो यह है कि मोदी जी की इन सभी बातों व क्रियाकलापों में एक भी बात उनकी अपनी मौलिक नहीं है। ध्यान से देखेंगे तो भारतीय समाज में इनके जैसे लोग जगह-जगह छितरे हुए मिल जाएंगें।

    मैंने 2014 में मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक छोटी सी चंद लाइनों की पोस्ट की थी, कि मोदी जी भारत के लोगों के चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। मेरी मित्र सूची के केवल एक ऐसे मित्र हैं जिन्होंने कहा था कि यदि ऐसा है तो यह चिंताजनक बात है, उन मित्र का नाम है सचिन भंडारी, भंडारी जी मोदी के बड़े प्रशंसक हैं लेकिन मेरी बात से इनको चिंता इसलिए हुई क्योंकि इनको भारत के लोगों का चरित्र का अनुमान है और यदि मोदी जी उसी चरित्र के हैं तो इनको यह चिंताजनक बात लगी।

    मोदी जी ने कैसे गुजरात को विकास के अद्वितीय माडल के रूप में प्रायोजित करके पूरे देश में अपने लिए माहौल बनाया और विकास के जनक व पुरोधा बनते हुए प्रधानमंत्री की गद्दी को सुशोभित करने तक की सीढ़ी तय की। प्रधानमंत्री बनते ही विदेश के दौरे शुरू, महंगे-महंगे कपड़े पहनना, विदेशी राजनेताओं के साथ सेल्फी लेना, खुद को महान मानते हुए नए-नए नारे देना, मन की बात करना। अधिक क्या बताना, फेसबुक की वालों को घूमिए मोदी जी के चरित्र के बारे में हजारों लोग बतियाते हुए मिल जाएंगें।

    मुझे इस बात से बिलकुल विरोध नहीं कि देश के नागरिकों को अपने चुने हुए प्रतिनिधि को लाते बाते सुनाने, व्यंग्य कसने आदि का अधिकार नहीं। बिलकुल है, नागरिक सत्ता सौंपते हैं तो उन्हें अपने प्रतिनिधि के बारे में मूल्यांकन करने, लाते-बातें सुनाने का पूरा अधिकार है। फिर मोदी जी तो भारत के पहले ऐसे लोकतांत्रिक मूल्यों वाले राजनेता है जो स्वयं ही लोगों से कहते हैं कि यदि इतने दिनों में ऐसा या वैसा न हो तो मुझे चौराहे में जूते मार लेना।

    भाजपा के नेताओं को ही लीजिए, जब सरकार में नहीं होते तो धरना करते हैं, प्रदर्शन करते हैं, जिसकी सरकार होती है उसकी हर बात का विरोध करते हैं। वह बात अलग है कि जब खुद सरकार में आते हैं तो सरकार में नहीं होने पर जिस बात का विरोध करते थे, उसी बात को और अधिक शिद्दत के साथ करते हैं। इन सभी बातों को कोई कहे या न कहे, लेकिन सभी जानते समझते हैं। भाजपा के नेता, समर्थक व भक्त लोग भी जानते समझते हैं।

    भाजपा, संघ व मोदी जी भारतीय समाज के लोगों की सोच, मानसिकता व चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और विशेषज्ञ हैं।। लोगों के चरित्र को घुमाना-फिराना, उठाना-बिठाना, सुलाना-जगाना सभी कुछ बहुत ही बढ़िया से जानते हैं। उदाहरणस्वरूप देख लीजिए नोटबंदी को भूल गए लोगबाग।

    इस पोस्ट को लिखने का मकसद इन सब बातों की चर्चा करना नहीं है। लेकिन चूंकि इन बातों की चर्चा किए बिना आगे की बात कही ही नहीं जा सकती है, इसलिए करना पड़ रहा है। खैर आते हैं पोस्ट की असल बात पर…।

    —-

    आपमें से बहुत ही कम लोग ऐसे होंगे जिनको भारत के सामाजिक क्षेत्र के सेलिब्रिटियों को असल जीवन में जानने समझने का अवसर मिला होगा। अवसर भी तो तब मिलता जब आपने अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर कभी कुछ करने का सोचा होता।

    मैं सामाजिक सेलिब्रिटी उनको कहता हूं, जिनको सामाजिक क्षेत्र में काम करने के लिए नोबेल, मैगसेसे आदि जैसे पुरस्कार मिले, जो पादें या हगें या खांसे तो खबर बने या जिनकी संस्थाओं का टर्नओवर करोड़ों/अरबों का है या जो हर सप्ताह/महीना विदेश भाषण देने पहुंचते रहते हैं।

    यहां मैं उन अवसरों की बात नहीं कर रहा जो रोजगार की तलाश में या कुछ साल सेलिब्रिटियों को तेल-मालिश करके अपने लिए पहचान व लंबी ग्रांट आदि का जुगाड़ तलाशने या बनाने की देन होते हैं या इन जैसे एजेंडों से जुड़े होते हैं।

    मैं उन अवसरों की बात कर रहा हूं जिन्होंने निर्णय पूर्वक सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यों, आंदोलनों आदि को समझने के लिए इन सेलिब्रिटी लोगों के ढांचों में बिलकुल निचले स्तर पर रहकर काम करने का प्रयास किया।

    आपमें से शायद ही कोई ऐसे अवसर पाने के लिए प्रयास करता हो, गंभीर हो। ऐसा हो पाने के लिए अंदर की मजबूत सोच वाली ताकत चाहिए होती है, अहंकार की कमी चाहिए होती है। सबसे बड़ी बात समाज को नजदीक से समझने का भयंकर जज्बा व प्रतिबद्धता चाहिए होती है।

    भले ही आप जीवन व समाज को व्यवहारिक रूप से समझने के प्रति ईमानदार, गंभीर, जज्बेधारी व प्रतिबद्ध नहीं हों। लेकिन चूंकि आपमें से अधिकतर लोग तर्क वितर्क कुतर्क के विशेषज्ञ हैं और इन तत्वों को आलोचना, समालोचना जैसे खूबसूरत नामों से अलंकृत भी करते हैं। कुछ तो अपने बौद्धिक अहंकार को तुष्ट करने के लिए लंबी-लंबी पोस्ट लिख कर यह भी साबित करते हैं कि कैसे फेसबुक में बिना जमीन में कुछ किए हुए भी लिखना, बहुत बड़ा सामाजिक काम है, महानता है, सामाजिक परिवर्तन वाली प्रतिबद्धता है।  इसलिए आगे मैं जो लिखने जा रहा हूं वह आप मोटे तौर समझ ही जाएंगें ऐसी आशा मैं रखता हूं।

    आपको शायद नहीं भी पता हो सकता है कि भारत में सामाजिक प्रतिबद्ध लोग व सामाजिक क्रांतिकारी लोग कुकुरमुत्तों की तरह यहां-वहां जहां-तहां उगे हुए मिल जाते हैं।

    कोई NGO वाला होगा जिसने बीसियों साल भ्रष्टाचार व दलाली करके पैसे बनाए होगें, आदिवासी लड़कियों का यौन शोषण किया होगा, ग्रांट पाने के लिए आदिवासी लड़कियों को परोसा होगा, सरकारी विभागों को ग्रांट पाने के लिए कमीशन दिया होगा, फर्जी बिल वाऊचर लगाए होगें। वह एक दिन देश भर में घूम-घूम कर मानवाधिकारों की बात करना शुरू कर देता है, लोग हाथों हाथ लेते हैं यहां तक कि उसके नाम का रिफरेंस देते हुए खुद को जमीनी समझने के गौरव में जिएंगे और तो और अपने शोधों में भी उसकी बातों का रिफरेंस देते हैं।

    छोड़िए इन जैसे टटपुंजिए NGO वाले दुमछुल्ले लोगों को, खाने कमाने दीजिए, खुद को बड़ा आदमी मानने की कुंठा में जीने दीजिए व बैठने लायक जगह बनाने दीजिए। बात करते हैं बड़े पुरस्कारों व बड़े नामों वाले सेलिब्रिटी लोगों की।

    तो गैर-पंचसितारा व गैर सात-सितारा फार्महाउस टाइप वाले सामाजिक सेलिब्रिटी लोग शुरुआत तो जमीनी कामों से करते हैं, लेकिन मन के भीतर एजेंडा कुछ और रहता है। इसलिए किए गए कामों के लिए किसी भी जुगाड़ से मीडिया पब्लिसिटी करते हैं। मीडिया में सेटिंग करते हैं। बड़े नाम वालों के साथ जुड़ते हैं, वह अलग बात है कि पुरस्कार पाने या सेलिब्रिटी बनने के बाद उनको लतिया देते हैं। जैसे मोदी जी ने आडवाणी जी व मुरली जी को कोने में टरका दिया। शुरुआत के लिए गुजरात विकास को प्रायोजित किया।

    पुरस्कार मिलने व सेलिब्रिटी बनने के बाद काम करना बिलकुल बंद। कहीं भी कोई भी मुद्दा हो, विशेषज्ञ बनते हुए प्रेस कान्फेरेंस करते हैं, टीवी चैनल्स में ज्ञान बाटते हैं। मुद्दों को गहराई से बिना समझे जो भी समझ में आया या विरोध या समर्थन जो भी करना हुआ उसके आधार पर घुमा फिराकर लछ्छेदार तरीके से बातें बोलते हैं। मतलब यह कि काम न करने के बावजूद काम कर रहे हैं ऐसा जोरशोर से प्रायोजित करने में लगे रहते हैं। इन्हीं की तरह मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद काम बंद कर दिया, केवल काम करते हैं ऐसा प्रायोजित करने में लगे रहते हैं, इसके लिए नारे देते हैं, मीडिया का प्रयोग करते हैं, भाषणबाजी करते हैं।

    अपने मित्रों व चेले चपाटों के माध्यम से लाखों-करोड़ों के वारे-न्यारे करते रहने के बावजूद खुद को फकीर व समाज के लिए त्यागी महात्मा के रूप में जबरदस्त तरीके से प्रायोजित किए रहते हैं। फोटो व मीडिया का तो इतना नशा होता है कि मोदी जी की सेल्फी-दीवानगी इनके नशे के आगे बौनी है। जैसे मोदी जी अपने फेवर में रिपोर्ट्स प्लांट करवाते हैं, वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग अपने फेवर में रिपोर्ट्स प्लांट करवाते हैं।

    जैसे मोदी जी अपने आगे किसी को पनपने नहीं देना चाहते हैं, बिलकुल वैसे ही सेलिब्रिटी लोग अपनी संस्था में अपने आगे किसी को पनपने नहीं देते हैं। भाजपा व मोदी जी तो इस मामले इन सेलिब्रिटियों की तुलना में बहुत अधिक लिबरल व लोकतांत्रिक हैं।

    जैसे मोदी जी विदेश के दौरों में सरकारी धन खर्च करके जाते हैं। वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग ग्रांट या लोगों से मिले पैसे से विदेश के दौरों पर जाते हैं, लेकिन अपने चेले चपाटों को यह बताते हैं कि उनको विदेश से खर्चा पानी मिला था, जबकि या तो ग्रांट का पैसे का अकाउंट एडजस्टमेंट होता है या किसी भक्त के खर्चे पर या विदेश में रहने वाले चेले-चपाटों के खर्चे पर जाते हैं। बहुत ही कम बिलकुल न के बराबर ही ऐसी घटनाएं होती हैं जब सेमिनार के आयोजकों ने सच में खर्चा पानी दिया हो।

    जैसे मोदी जी अपने चेलों के बुलावे पर राक-डांस करने जाते हैं, वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग अपने चेलों के बुलावे पर किसी यूनिवर्सिटी में दो चार लोगों को लेक्चर देने रूपी कान्फेरेंस करने पहुंच जाते हैं। बेसिकली यह होता है हालीडे/पर्यटन ही।

    खैर कितना लिखा जाए, मोटा-मोटी यह समझिए कि मोदी जी अभी बच्चे हैं इन सामाजिक सेलिब्रिटियों के सामने। मोदी जी इन सामाजिक सेलिब्रिटियों की तुलना में कम धूर्त हैं क्योंकि मोदी जी का खाया पिया दिखता है, मोदी जी का नाम लेकर मैं यह पोस्ट लिख सकता हूं लेकिन मेरी यह औकात नहीं कि मैं जिन-जिन सेलिब्रिटियों का खाया पिया अघाया जानता हूं उनका नाम लेकर यह पोस्ट लिख पाऊं।

    रातदिन कारपोरेट को गरियाने वाले ये सामाजिक सेलिब्रिटी लोगों के घर का चम्मच भी कारपोरेट के धन से खरीदा गया होता है। उनके बच्चों की नैपी, चाकलेट व पेंसिल भी कारपोरेट के पैसे से आती है। लोकतंत्र का रट्टा लगाने वाले ये सामाजिक सेलिब्रिटी लोग निहायत ही साम्राज्यवादी सोच के होते हैं।

    यदि तुलनात्मक बात की जाए तो ऊपर बताए गए किस्म के NGO वाले लोगों, प्रायोजित आंदोलनों वाले लोगों तथा सेलिब्रिटी लोगों की जिसकी जो औकात व स्तर है, उस औकात व स्तर पर ये लोग मोदी जी की तुलना में बहुत अधिक भयावह हैं, खतरनाक हैं। आप मानें या ना मानें लेकिन इन्हीं लोगों के कारण आम समाज के लोगों की मानसिकता बदलती है और देश के लोग मोदी जी को प्रधानमंत्री चुनने व देश का कर्णधार अवतार मानने में गर्व का अनुभव करते हैं।

    हमारे समाज व देश के लोकतंत्र के लिए मोदी जी कोई खतरा नहीं, अपने समाज से इन जैसे NGO वालों, सेलिब्रिटी लोगों को नियंत्रित कर लीजिए, इनको ईमानदार, विशेषज्ञ व आदर्श मानना बंद कर दीजिए। मोदी जी जैसे लोगों का चरित्र अपने आप बदला हुआ ही मिलेगा। लेकिन हम आप इन्हीं सामाजिक सेलिब्रिटी लोगों के आधार पर, इन्हीं पर अंधा विश्वास करते हुए अपना माइंडसेट तय करते हैं।

    जब इतनी बात कर ही रहा हूं तो लगे हाथ यूनिवर्सिटी के छात्रों व छात्र नेताओं की बात भी कर ली जाए। अपवादों में भी अपवाद की बात यदि छोड़ दी जाए तो जिन छात्रों ने अपने छात्र जीवन में छात्रों व सामाजिक मुद्दों के नाम धरना प्रदर्शन किए होते हैं, पुलिस की लाठी खाई होती है वे सभी अपने जीवन में निहायत धूर्त, भ्रष्ट व चालबाज लोग ही निकलते हैं। दरअसल धरना करना, प्रदर्शन करना, नारे लगाना, पुलिस की लाठी खाना यह सब निवेश की तरह होता है जो या तो कैरियर के लिए होता है या फिर नाम-पहचान की वाहवाही के लिए होता है।

    अब आप कहेंगे कि नौकरशाहों के बारे में कुछ न लिखा। इस मसले पर मेरा सिर्फ यही कहना है कि भारत में सामाजिक सेलिब्रिटी, राजनेता, छात्रनेता, व्यापारी आदि मने जो कोई भी जो कुछ भी करता है वह सब नौकरशाही की रची हुई दुनिया में करता है। नौकरशाह ईश्वर है, सृष्टि का रचयिता है। इनकी माया जितनी समझें उतनी ही घुसी हुई मिलेगी।

    फिर भी हर क्षेत्रों की तरह इन लोगों में भी अपवाद होते हैं। अपवादों में भी अपवाद ऐसे होते हैं जो यह सब जीवन, समाज व ढांचों आदि की समझ विकसित व जीवंत अनुभव लेकर मानसिक रूप से समृद्ध होने के लिए करते हैं। ऐसे अपवाद लोगों की तासीर आपको अलग ही दिखेगी यदि आपको व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने की जरा सी भी समझ होगी और आप सभी के प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं रखते हैं, तो।

    अंत में मैं सिर्फ यह लिखते हुए कि “ये सभी लोग निकलते किस समाज से हैं”, पोस्ट को अपूर्ण छोड़ रहा हूं, आप अपनी-अपनी समझ के अनुसार स्वयं पूर्ण कर लीजिए।

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  • माओ त्से-तुंग वाले मसले पर एक और उठापटक-बेबाक-लेख – जो गंभीर हैं, लोकतांत्रिक दृष्टि रखते हैं, उनको लेख खराब न लगेगा

    सामाजिक यायावर

    भारत में कस्बाई व शहरी लोग अंग्रेजी भाषा को पहली कक्षा से पढ़ना शुरू कर देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में छठवीं कक्षा से अंग्रेजी शुरू होती थी। अब तो खैर हर गली नुक्कड़ में अंग्रेजी मीडियम व तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय स्कूल खुल गए हैं। पहली कक्षा से बारहवीं तक अंग्रेजी भाषा-विषय के रूप में साथ चिपकी रहती है। स्नातक में भी अंग्रेजी भाषा को सामान्य विषय की तरह उत्तीर्ण करना पड़ता है। इंजीनियरी जैसी प्रोफेशनल डिग्रियों की पढ़ाई तक में अंग्रेजी एक विषय की भांति चिपकी रहती है, वह भी तब जबकि डिग्री की पढ़ाई लिखाई तो अंग्रेजी में ही होती है।

    अंग्रेजी हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में भी समाहित है। गावों के निरक्षर लोग भी अपनी भाषा में बिना जानकारी के अंग्रेजी के कई शब्दों का प्रयोग करते हैं। कुल मिलाकर मतलब यह कि अंग्रेजी हमारे सामाजिक जीवन में रचीबसी हुई है। जो अंग्रेजी बोलता है उसको संभ्रांत व योग्य मान लिया जाता है। अंग्रेजी में संभ्रांतता, योग्यता, क्षमता व शक्ति निहित मानी जाती है।

    इतना सब होने व बचपन से पढ़ाई पूरी करने तक मतलब लगातार कम से कम लगभग 15 वर्षों तक अंग्रेजी पढ़ने बोलने व लिखने के बावजूद गंभीर अंग्रेजी को पढ़ने समझने बोलने व लिखने में अच्छे-अच्छे पुरोधा पानी मांगते हैं, जबकि अंग्रेजी बहुत समृद्ध व परिष्कृत भाषा नहीं है। जो अंग्रेजी से स्नातक, परास्नातक किए होते हैं उनकी भी हालत कमोवेश ऐसी ही होती है। अपवादों की बात अलग है, अपवाद नियम बनाते भी नहीं हैं।

    आप माओवाद, माओ, साम्यवाद पर बात कीजिए। JNU के लोग मक्खियों की तरह भिनभिनाते हुए आ जाएंगें। उनमें से बहुतेरे तो फूहड़ तरीके से धमकाएंगे कि JNU के हैं इसलिए चीन, माओ, माओवाद, साम्यवाद को समझते हैं। भिनभिनाते हुए आपके साथ सड़कछाप, सड़ियल, सतही, बेशर्म व बेहूदा व्यवहार करेंगे, शाब्दिक गुंडई करेंगे।

    JNU छोड़िए जो JNU की कैंटीन में जाकर चाय पी लेता है, जो उसकी चहारदीवारी को छू लेता है या कभी उसकी बाहरी दीवारों में सटकर पेशाब भी कर आता है वह भी अपने को विचारक, चिंतक, विद्वान व सामाजिक मसलों का विशेषज्ञ मान लेता है।

    इसलिए JNU या JNU के जैसे ठेकेदारों से मेरा फिलहाल इतना ही कहना है कि गंभीर बात कीजिए। JNU एक बौद्धिक सामंतवादी संस्थान है। कोशिश कीजिए कि JNU-वादी सामंती सोच से बाहर आकर आदमी की तरह बात कीजिए, तहजीब व तमीज से बात करने का प्रयास कीजिए।

    JNU भारत को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति का स्वातंत्र्य, मानवाधिकार आदि मूल्य सिखाता है, भारत के लोगों को जीवन जीना JNU सिखाता है, इस प्रकार की नीचता पूर्ण अहंकार से बाहर आकर अपनी बात रखिए।

    आपके व्यवहार से ही JNU का स्तर साबित होता है। पिछले लगभग दो दशकों में, अपवाद प्रतिशत लोगों को छोड़कर JNU के लोगों से बातचीत व चर्चाओं के बाद ही मैं JNU को एक रद्दी यूनिवर्सिटी मानने के नतीजे पर पहुंचा हूँ।

    समय समय पर JNU के ऊपर कई लेख लिखता रहा हूं। आपके अनुसार आपको शोध करने व रिफरेंसेस खोजने की क्षमता योग्यता व धैर्य तो है ही, मेरे इन लेखों की लिंक खोज सकते हैं, सामान्य आदमी हूं लिंक्स बहुत सरलता से मिल जाएंगीं। फेसबुक के कारण ये लेख मैंने बस यूं ही प्रथम दृष्टया ही लिखे थे। चाहेंगे तो गहराई से लिख कर भी आइना दिखा सकने की क्षमता व योग्यता रखता हूं। लेकिन यह सब ऊर्जा बर्बादी है।

    मान लीजिए यदि आप JNU के भी हैं और यदि आपने JNU में चीनी भाषा पढ़ी है, माओ से संबंधित साहित्य भी पढ़ा है तब भी आप अपनी बात सहजता से ही रखिए। ऐसा क्यों कह रहा हूं, यह समझने के लिए आपको आगे की पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ना पड़ेगा।

    पहली बात तो यह है कि चीनी भाषा वर्तमान युग की भाषाओं की सबसे क्लिष्ट, समृद्ध व परिष्कृत भाषाओं में से है। वास्तव में यदि ध्यान से देखा जाए तो चीनी भाषा जैसी कोई भाषा है भी नहीं। चीन में कई भाषाएं हैं लेकिन चीनी भाषा जैसी कोई भाषा नहीं है।  फिर भी आपके JNU-सामंती-बौद्धिक अहंकार की तुष्टि के लिए मान लेते हैं कि चीन की भाषा एक ही है, उसका नाम चीनी-भाषा ही है और आपने JNU से स्नातक/परास्नातक में चीनी भाषा पढ़ी है। आपकी सहूलियत के लिए वह सब भी जो “नहीं है”, उसको “है” ऐसा मान भी लेते हैं तब भी …..

    जब बचपन से पहली कक्षा से हर साल प्रमुख विषय के रूप में अंग्रेजी पढ़ते हुए, स्नातक परास्नातक में, कम्पटीशन की तैयारी करते हुए, इंजीनियरी आदि जैसे कोर्सेस की किताबें अंग्रेजी में पढ़ते हुए, अंग्रेजी फिल्में देखते हुए, अंग्रेजी अखबारों को पढ़ते हुए, सड़क में चलते हुए अंग्रेजी के होर्डिंग्स को देखते हुए, अंग्रेजी जैसी भाषा को ठीक से समझ नहीं पाते तो चीनी भाषा जैसी क्लिष्ट, समृद्ध व परिमार्जित भाषा के विद्वान आप महज दो चार वर्षों में ककहरा टाइप सीखते हुए कैसे हो सकते हैं। फिर चीन में कई प्रमुख भाषाएं हैं जो एक दूसरे से भिन्न हैं।

    भाषा के संदर्भ में एक जरूरी बात और कहना चाहता हूं। जिस भाषा या जिन भाषाओं के संपर्क में बच्चा अपने पैदा होने के दिन से रहता है, वही भाषाएं जीवन भर उस बच्चे की मौलिक भाषाएं होती हैं, भाषाओं के नुक्ते समझ आते हैं, साहित्य समझ आता है।

    पहले हिंदी को ही ठीक से समझना सीख लीजिए, चीनी भाषा पर अपनी विद्वता व विशेषज्ञता की चर्चा फिर कभी कर लीजिएगा, अभी उचित अवसर नहीं है।

    अब JNU के माओ-भक्तों व गैर-JNU के माओ-भक्तों से जो यह मानते हैं कि उनने माओ के बारे में पढ़ा है उनके बारे में भी कुछ खरी-खरी दो टूक बात कर ली जाए। 

    ये लोग इस गलतफहमी में रहते हैं या अपनी कंडीशनिंग के कारण मूर्खता में विद्वता देखते हुए गलतफहमी प्लाँट करते रहते हैं कि दुनिया के लोकतांत्रिक देश (ये लोग इनको साम्राज्यवादी देश कहते हैं) माओ त्से-तुंग के विरोध में सूचनाएं प्लांट करते हैं।

    इन लोगों से मैं यही कहना चाहता हूं कि जनाब आपके भगवान माओ त्से-तुंग ने जैसा भी चीन बनाया है वह बहुत ही वीभत्स-कारपोरेट साम्राज्यवादी देश बनाया है। आपके माओ का चरित्र साम्राज्यवादी था, चीन देश को निहायत ही बर्बर चरित्र का कारपोरेट ही संचालित करता है। चीन का कारपोरेट साम्राज्यवादी देशों के कारपोरेट की तुलना में ज्यादे केंद्रित सत्ता रखता है।

    अपनी सोच, मानसिकता की कंडीशंडनिंग व एक्सपोजर के छोटे-छोटे कुंठित दड़बों से बाहर निकल कर दुनिया को उसकी मौलिकता के साथ बिना पूर्वाग्रहों व अनुमानों के देखने समझने का प्रयास कीजिए। चीन व माओ का यथार्थ समझ पाने की दृष्टि आनी शुरू हो जाएगी। लोकतंत्र बेहतर लगने लगेगा। लोकतंत्र को परिमार्जन की ओर ढाला जा सकता है, माओवाद को कतई नहीं। हिंसा व बर्बरता में परिमार्जन की कोई संभावना नहीं होती, हो ही नहीं सकती।

    जैसे भारत कागज में लोकतांत्रिक देश है लेकिन असल में लोकतांत्रिक देश नहीं है, भारत के लोग अभी लोकतांत्रिक मूल्यों का ककहरा भी नहीं समझते हैं। वैसे ही चीन कागज में साम्यवादी व्यवस्था के देश है लेकिन असल में वीभत्स व बर्बर कारपोरेट साम्राज्यवादी देश है। अब इस बात के लिए रिफरेंस मांगने की मूर्खता न कीजिएगा। क्योंकि यह समझने की बात है, महसूस करने की बात है, एक्सपोजर की बात है, दृष्टि की बात है।

    जो चीन सत्ता के लिए माओ के निर्देशन में अपने ही 7 करोड़ लोगों की हत्या कर सकता है। जो चीन 1989 में अपने ही छात्रों के शांतिप्रिय आंदोलन के खिलाफ कई लाख सैनिक उतार सकता है और चारों तरफ से घेर कर हजारों मासूम छात्रों की हत्याएं कर सकता है।

    वह चीन आपकी यूनिवर्सिटीज में साहित्य, दस्तावेजों व किताबें नहीं प्लांट नहीं करेगा। इसकी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं आप। इसलिए प्लांटेड किताबों व दस्तावेजों के दम पर कूदिए मत। वास्तव में जानने समझने महसूस व दृष्टि विकसित कर पाने के विभिन्न स्तरों पर स्वाध्याय कीजिए, तभी कुछ गंभीर चर्चा कर पाने लायक दृष्टि रख पाएंगे।

    जरूरी नहीं कि सभी लंपट ही हों, सभी खोखले ही हों, सभी सतही ही हों। दुनिया में गंभीर लोग भी हैं, दृष्टिवान लोग भी हैं, ऐसे लोग भी हैं जो सामाजिक मसलों को गहराई से भेद कर देख व समझ लेने की क्षमता व दृष्टि विकसित कर लिए होते हैं।

    चीन व माओ के ऊपर चीन के ही गंभीर चिंतक लोगों ने चीन के ऐतिहासिक दस्तावेजों को पढ़ने समझने, चीन के समाज को नजदीक से जानने समझने के बाद निष्पक्ष भाव से अच्छी किताबें लिखी हैं। यदि आपकी पहुंच, हैसियत व औकात है, इन किताबों का इंतजाम कर पाने की तो इनको पढ़िए। कुछ नहीं तो कम से कम चीन के दूसरे चेहरे का अंदाजा होगा। चीन के लोगों की वैचारिक विभिन्नता के बारे में पता चलेगा।

    जो चीन शांति प्रदर्शन को रोकने के लिए लाखों सैनिक उतार देता हो, जो चीन भविष्य में आंदोलनों की संभावनाएं के भ्रूण को भी खतम करने के लिए अपने ही हजारों मासूम युवा छात्रों को चारों तरफ से घेरकर गोलियों से भून कर हत्याएं करता हो।

    वह चीन स्वतंत्र किताबें व दस्तावेज लिखने की इजाजत देता होगा, इस बचकानी कल्पना को सच मानने वालों के वैचारिक स्तर पर चर्चा करना भी ऊर्जा बर्बादी है। JNU, माओवादी समर्थक, माओ-भक्त व साम्यवाद-माओवाद को एक ही मानने वाले चीन की प्रायोजित व प्लांटेड किताबों, साहित्य व दस्तावेजों के मायाजाल व कंडीशनिंग में सच कितना व किस स्तर का जानते समझते होगें, इसका अंदाजा लगाना बिलकुल मुश्किल नहीं।

    चलते-चलते :

    जो माओ व माओवाद का समर्थक/भक्त है, वह ढोंग चाहे जैसा करे तर्क चाहे जो दे लेकिन अपने वास्तविक चरित्र में निहायत ही हिंसक, बर्बर, फरेबी, झूठा व रक्तपिपाशु है।

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  • अखिलेश यादव और उत्तरप्रदेश

    Vivek सामाजिक यायावर

    मुझे नहीं पता कि कौन जीतेगा, कौन हारेगा, किसकी सरकार बनेगी किसकी नहीं बनेगी। यूं लगता है कि जिस तरह लोकसभा चुनाव में लोगों का माइंडसेट स्विंग हुआ था, यदि वैसी पुनरावृत्ति होती है तो “बसपा+भाजपा” की सरकार बनेगी।

    यदि यह पूछा जाए कि मेरी इच्छा क्या है तो मेरी इच्छा अखिलेश जी को एक बार और मुख्यमंत्री के रूप में देखने की है। मैं किसी राजनैतिक पार्टी का नहीं हूं। भारत से दूर आस्ट्रेलिया में रहता हूं यहीं का स्थाई निवासी हूं, भारत में अपना कार्यक्षेत्र बिहार, छत्तीसगढ़ व राजस्थान आदि राज्यों के आदिवासी व दलित क्षेत्र होने के कारण कोई फर्क भी नहीं पड़ता कि उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनती है या नहीं।

    जैसे मैं छत्तीसगढ़ राज्य में डा० रमण सिंह जी के बारे में यह मानता हूं कि मुझे बस्तर क्षेत्र के संदर्भ उनके में प्रशासनिक निर्णय, समाधान व विकास के रचनात्मक प्रयासों में गंभीरता व इच्छाशाक्ति दिखती है। बहुत लोग मेरी इस बात से वास्ता नहीं रखते, लेकिन मैं यह अपने जमीनी अनुभवों के आधार पर मानता हूं। जैसे मैं बिहार में नितीश कुमार जी को तुलनात्मक बेहतर मुख्यमंत्री मानता हूं। वैसे ही मैं उत्तर प्रदेश के लिए अखिलेश जी को बेहतर राजनेता मानता हूं।

    मेरा यह लेख चुनावी हथकंडों से इतर सीधी सपाट बात कहने के लिए है। उत्तर प्रदेश व देश को सुलझे हुए राजनेताओं की जरूरत है जो सभी के लिए विकास के कार्य करें, घृणा व नफरत की बात न करें, संवेदनशील हों व प्रगतिशील सोच रखते हों। महिलाओं के प्रति सुलझी हुई सोच हो। पर्यावरण के मसलों पर बेहतर समझ हो। युवा हों, सच में ही पढ़े लिखे हों, देश दुनिया विज्ञान व तकनीक आदि की मूलभूत समझ हो, तार्किक हों।

    चुनावी राजनीति के प्रचार हथकंडों व टटपुंजिया पैंतरेबाजी से इतर यदि देखा बूझा समझा जाए तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश जी एक सुलझे हुए संवेदनशील राजनेता के रूप में उभर कर आए हैं।

    यदि व्यक्तिगत व जातिगत स्वार्थ से ऊपर उठ कर देखा जाए तो वैसे भी उत्तर प्रदेश में जो अन्य राजनेता हैं उनकी सोच व समझ व संवेदनशीलता अखिलेश जी से बेहतर दिखाई नहीं देती। वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसी कल्पनातीत तत्व की तो बात ही छोड़ दीजिए।

    ऐसे में यदि यह मानने में कोई नुकसान नहीं कि अखिलेश जी को उनके चाचाओं आदि ने अखिलेश जी के मन के अनुसार काम करने में बाधाएं दीं, अखिलेश जी के हाथ बंधे रहे। एक अवसर अखिलेश जी को देने में कोई हर्ज नहीं। ऐसा नहीं है कि अखिलेश जी की तुलना में बहुत बेहतर सोच समझ दृष्टि व संवेदनशीलता के राजनेता उत्तर प्रदेश की राजनैतिक सत्ता की दौड़ में हैं तो अखिलेश जी को अवसर देने में ऐतिहासिक नुकसान होगा।

    यह महसूस करते हुए भी कि “बसपा+भाजपा” की ही सरकार बनने की संभावनाएं अधिक हैं, मेरी इच्छा यह है कि उत्तर प्रदेश को अखिलेश जी को एक बार भरपूर अवसर देकर देखना चाहिए। पिछले पांच वर्षों में उन्होंने कुछ ऐसा तो किया नहीं है कि आगे के पांच वर्षों में पहाड़ टूट जाएगा या प्रदेश अंधेरे गलियारों में खो जाएगा।

    पूरे देश की राजनीति फूहड़ है, इसलिए उत्तर प्रदेश में भी थोड़ी बहुत राजनैतिक फूहड़ता होती रही तो यह कोई विशेष बात नहीं, विशेष बात यह है कि अन्य बड़े राज्यों की तुलना में फूहड़ता कम हुई।

    मैं अखिलेश जी की कुछ कामों के लिए उनका तहेदिल से शुक्रिया करता हूं। ये उनके वे काम हैं जिनके लिए मैं उनको पसंद करता हूं।

    छात्रों को लैपटाप बांटने की योजना

    इसको मैं बहुत दूरदर्शी व जबरदस्त योजना की श्रेणी में रखता हूं। यदि चुनावी राजनैतिक फूहड़ता के कारण जबरन इस योजना का विरोध न किया जाए तो यह बहुत ही शानदार योजना है, दूरगामी परिणाम बहुत ही बेहतर हैं। यह योजना क्यों बेहतर है, सभी अपने दिलों में भलीभांति समझते हैं वह बात अलग है कि हमें अपना स्वार्थ अपने बच्चों के भविष्य से अधिक प्यारा है और हम इस योजना को गरियाते हैं। कुछ लोगों का तर्क यह है कि पब्लिक का पैसा है। तो भई पब्लिक का पैसा तो हर सरकार ही प्रयोग करती है। तब तो किसी सरकार को अच्छा नहीं कहा जा सकता है। इसलिए यह तर्क बेमानी लगता है।

    शिक्षा मित्रों को स्थाई टीचर बनाने वाली योजना

    मैं हमेशा कहता रहा हूं कि जब काम समान है, स्तर समान है, चरित्र समान है तब वेतन व अधिकारों में इतना भेदभाव क्यों। यह अलोकतांत्रिक है, गलत है। मुझे बहुत ही अच्छा लगा था जब शिक्षामित्रों को स्थाई टीचर बनाने की घोषणा हुई। कुछ लोगों ने नुक्ते फंसाए, योजना उलझी। लेकिन यह योजना है काबिलेतारीफ।

    सड़कें

    वैसे तो बहुत लोग रटीरटाई कहावतों का प्रयोग करते हैं कि उत्तर प्रदेश की सड़कें खराब हैं। सच यह है कि उत्तर प्रदेश में अच्छी सड़कें हैं। सड़क निर्माण में भयंकर भ्रष्टाचार के बावजूद, अच्छी सड़कों का काम पिछली कई सरकारों ने किया है। लेकिन अखिलेश जी की सरकार ने सड़कों की गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा। सड़कों की कुछ बड़ी महात्वाकांक्षी योजनाएं भी उपलब्धि रही अखिलेश जी की सरकार की।

    तालाब

    अखिलेश जी की सरकार ने तालाबों पर विशेष ध्यान दिया जो किसी भी पिछली सरकार ने न दिया। यह बात अलग है कि स्थानीय लोगों व स्थानीय नौकरशाहों की मिली भगत के कारण तालाब वाली योजनाओं की उपलब्धि उतनी नहीं रही जितनी होनी चाहिए थे। लेकिन यदि अन्य राज्यों जहां तालाबों पर सरकारी योजनाएं बनी हैं उन सरकारी तालाब योजनाओं की तुलना में उत्तर प्रदेश की तालाब योजनाओं का आउटपुट अच्छा रहा है। कम से कम अखिलेश जी ने तालाबों के बारे में सोचा व जिन जमीनी कार्यकर्ताओं ने तालाब मुद्दों पर चर्चा की, उसका मान रखा, सम्मान रखा व य़ोजनाओं को स्वीकृति दी। यह अखिलेश जी की सोच व संवेदनशीलता को व्यक्त करता है।

    किसान व कृषि

    पूरे भारत में ही किसान व कृषि को सबसे उपेक्षित रखा जाता है। वास्तव में जो नौकरशाह हैं, जो कृषि वैज्ञानिक हैं, जो राजनेता हैं उनको पता ही नहीं कि किसान व कृषि के लिए क्या किया जाए। इसके बावजूद अखिलेश जी की कुछ छोटी-छोटी योजनाएं बहुत अच्छी रहीं। इनमें से एक योजना गावों में किसान बस चलाने की भी रही। किसानों के लिए ग्रामीण बसें जिनमें किसान अपना सामान लाद कर यात्रा कर सकता है। ध्यान से देखा जाए तो ऐसी कई छोटी-छोटी योजनाएं मिल जाएंगी जो किसानों व ग्रामीणों के लिए रहीं हैं।

    बिजली

    विकास के मामले में मैं बिजली को अखिलेश जी की सरकार की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण उपलब्धियों में मानता हूं। मैने अपना पूरा छात्र जीवन बिजली कटौती झेलते हुए व्यतीत किया। कुछ इलाकों को छोड़ दिया जाए तो लगभग पूरे प्रदेश में बिजली की आपूर्ति जबरदस्त रही। बिजली के उत्पादन की दूरगामी योजनाएं आईं, आपूर्ति सही हुई। जो काम पिछले कई दशकों की सरकारें न कर पाईं वह अखिलेश जी के नेतृत्व ने कर दिखाया।

    योजनाएं तो और भी अच्छी रहीं। मैंने खुद कई लोहिया ग्रामों को देखा है, बहुत अच्छी योजना रही। यदि ईमानदारी से बात की जाए तो अखिलेश जी ने चाचाओं व यादवों की यादवगिरी के बावजूद तालमेल बिठाते हुए बेहतर काम या प्रयास करते हुए सरकार चलाई।

    रही बात यादवगिरी की तो इस सरकार में यादवगिरी बहुत कम रही, हां बदनाम बहुत अधिक किए गए। यदि सपा सरकार में यादवगिरी होती है तो मायावती जी की सरकार में दलितगिरी होती है। भाजपा में बनियागिरी व पंडितगिरी होती है। और यह सब चुनावी हथकंडे हैं कि अखिलेश जी की सरकार में अपराध बढ़े, मेरा साफ-साफ मानना है कि जिस राज्य में विकास के काम होते हैं वहां अपराध कम ही होते हैं, मैं दृढ़ता से मानता हूं कि अखिलेश सरकार में अपराध कम हुए हैं। पड़ोसी राज्यों से यदि तुलना की जाए तो उत्तर प्रदेश अपराध के मामलों में बौना लगेगा।

    दरअसल किसी समाज, राज्य व देश का विकास जाति, धर्म आदि जैसे फूहड़ चुनावी राजनैतिक टटपुंजियागिरी की फूहड़ता से भरे पच्चड़ों की बजाय लोगों के लिए किए गए दूरगामी कामों व कामों की नीवें रखने से होता है। धीरे-धीरे लोग समृद्ध होते हैं, समाज व देश समृद्ध होता है।

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  • बस्तर, छत्तीसगढ़ पर आने वाली पुस्तक का प्रस्तावना अध्याय

    अभी इस विमर्श को छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद वहां के आदिवासी समाज के लिए प्रतिबद्ध, ईमानदार व कल्याणकारी है या नहीं, यह भी छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद बस्तर के आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व वास्तव में करता है या नहीं, सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण तथ्य कि बस्तर का माओवादी, माओवाद को जानता समझता भी है या नहीं इस विमर्श को भी छोड़ देते हैं। मैं इस किताब में यह विमर्श विस्तार से करूंगा भी नहीं क्योंकि पूर्वाग्रहों से इस विमर्श के दूषित होने का खतरा है, भिन्न पूर्वाग्रहों के लोगों के दावे भिन्न होंगें। मैं इस किताब में बस्तर में चल रहे प्रयासों की तथ्यात्मक चर्चा करूंगा, पुस्तक को पढ़ने के पश्चात आप स्वयं ही बस्तर के माओवाद के संदर्भ में विमर्श कर सकने में सक्षम होंगें, ऐसी आशा मैं करता हूं।

    साम्यवादी विचारधारा को मानने वाले लोगों में यह विरोधाभास रहता है कि वे सत्ता के राजसी ढांचे को साम्यवादी ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति मानते हैं लेकिन सत्ता के साम्यवादी ढांचे को लोकतंत्रीय ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति नहीं मानते हैं, इसे क्रांति न मानने के लिए विभिन्न तर्क देते हैं जबकि यदि देखा जाए तो सत्ता के ढांचों में परिवर्तन की दोनों घटनाओं का चरित्र एक सा है तथा दोनों घटनाएं आम लोगों द्वारा घटित हुईं। यूं लगता है कि क्रांति को स्थापित करने के लिए क्रांति की परिभाषा को पूर्वाग्रह के अनुसार गढ़ लिया जाता है।

    माओवाद के संदर्भ में मूलभूत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति जिसने किसी चीटी को नहीं मारा होता है वह दूसरे व्यक्तियों की नृशंस हत्याएं करने में गौरव का अनुभव करने लगता है, स्वयं को परिवर्तन के महान यज्ञ में आहुति डालने वाला समझने लगता है, कैसे क्रांति में योगदान करने के लिए किसी की भी निर्दोष व मासूम की भी हत्या करने के लिए स्वयं में महिमामंडित करते हुए गौरवांवित महसूस करते हुए स्वीकृति प्राप्त कर लेता है!! आगे की चर्चा ऐसा क्योंकर होता है, समझने में मदद करती है।

    सत्ता को अपरिहार्य मानना तथा सत्ता परिवर्तनों को जिस रूप में प्रस्तुत किया जाता है या जाता रहा है, इस अनुकूलता के अंतर्गत बेहतर व्यवस्था के निर्माण के लिए सत्ता के ढांचों में परिवर्तन ही एकमात्र रास्ता दृष्टिगत होता है, जिसे क्रांति का नाम दिया जाता है जिससे संबद्धित व्यक्ति स्वयं को क्रांतिकारी कहता है। व्यक्ति के विचार, सोच व मानसिकता की अनुकूलता यूं कर दी जाती है कि व्यक्ति यह मानने लगता है कि वर्तमान व्यवस्था नष्ट करने से बहुत अधिक अव्यवस्था होगी जिसका उपयोग वर्गविहीन सामाजिक व्यवस्था में किया जा सकता है। वर्तमान व्यवस्था को भी अव्यवस्था ही माना जाता है। वर्गविहीन आदर्श सामाजिक व्यवस्था के निर्माण व निर्माण प्रक्रिया में लोगों की हत्याएं होना व करना तो महान क्रांति के लिए आहुति मात्र ही हुईं।

    क्रांति का सबसे भयावह तथ्य यह है कि वर्तमान में जीवन जीने वाले मनुष्यों के जीवन का मूल्य, भविष्य के अजन्में मनुष्यों के जीवन मूल्य की तुलना में नगण्य है, कमतर है। इतना नगण्य है कि जीवित मनुष्य के जीवन की हत्या, भविष्य के काल्पनिक मनुष्य के आभासी बेहतर भविष्य के लिए करते हुए, गौरव महसूस किया जा सकता है।

    भविष्य अनिश्चित होता है। काल्पनिक भविष्य के लिए वर्तमान की बलि चढ़ाना प्रपंच, तर्क-छद्म व प्रवंचना से इतर कुछ भी नहीं। क्रांतिकारियों को भविष्य के प्रति इतना निश्चिंत-विश्वास कैसे हो सकता है, वर्तमान में हत्याएं करते हुए, भय स्थापित करते हुए, मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करते हुए कैसे भविष्य में मानवीय व्यवस्था का दावा कर देते हैं? क्या हिंसा करना, हत्या करना, हथियार का प्रयोग करना, भय स्थापित करना इत्यादि से भविष्य को देख सकने व महसूस कर सकने की दृष्टा क्षमता विकसित होती है?

    माओवाद अच्छा हो सकता है, आदर्श हो सकता है, किंतु हिंसा आदर्श नहीं हो सकती, हिंसा अच्छा नहीं हो सकती, हिंसा अनुचित है, हिंसा अस्वीकार्य है, हिंसा प्रवंचना है, हिंसा आत्मछल है। अहिंसा उचित है, अच्छा है, इस तथ्य को कोई भी मनुष्य अस्वीकार्य नहीं कर सकता। माओवाद मनुष्य को मतवादी के रूप में बेसुध करके हिंसक बनाने व हिंसा करने में गौरवांवित महसूस करने की आत्म-प्रवंचना की ओर ढकेलता है। ऐसा मनुष्य बिना हिंसा के नहीं रह सकता, क्रांति के नाम पर ऐसा क्रांतिकारी मनुष्य हिंसा करता है, जो अनुचित है व अस्वीकार्य है।

    ऐसी क्रांतियां मात्र प्रतिक्रियाएं होती हैं, विपक्षी होने की प्रतिक्रियाएं, प्रतिक्रियाओं की प्रतिक्रियाएं। प्रतिक्रियाओं की शृंखला से इतर कुछ भी नहीं। प्रतिक्रियाओं, कल्पनाओं व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति वस्तुतः क्रांति हो ही नहीं सकती, इसे भले ही इसे कितना भी जोर लगाकर क्रांति का नाम दिया जाए।

    कल्पना व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति को कितना ही महिमामंडित किया जाए, कितना भी सुसंगत तर्क दे लिए जाएं, कितने भी ऐतिहासिक प्रमाणों से मेल खाती हो, समानता नहीं ला सकती है। इसको यूं समझने का प्रयास किया जाए कि कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से विश्व को बचाना चाहते हैं, कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से। बेहतर व आदर्श व्यवस्था बनाने के नाम पर एक दूसरे की परस्परता को खंडित करते हैं, एक दूसरे के अस्तित्व को जड़ सहित समाप्त करना चाहते हैं। जबकि वास्तव में इनमें से किसी को भी बेहतर समाज का निर्माण करने की अभिलाषा नहीं होती है वरन अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार व्यवस्था को मनचाहा आकार देना चाहते हैं, ऐसा कर पाने के लिए हिंसा, शक्ति, सत्ता, प्रपंच, छल, छद्म इत्यादि का प्रयोग करते हैं। कल्पना विलगाव पैदा करती है, दूसरे समूह व व्यक्ति को निम्न स्तर का मानती है।

    यह क्रांति केवल सत्ता पर एक समूह के स्थान पर दूसरे समूह को स्थापित कर देती है। नया सत्ताधारी समूह विभिन्न सत्ताओं को अपने अधिकार में कर लेता है। फिर एक नया उच्च वर्ग बनता है जो विभिन्न प्रकार के विशेष अधिकारों से स्वयं को शक्तिशाली बनाता है। क्रांतियों के नाम पर विभिन्न स्तरों पर व तौर-तरीकों से इसी प्रक्रिया का दुहराव चलता रहता है। सत्ता-क्रांति कभी भी विषमता न तो कभी नष्ट करती है और न ही नष्ट करने की अभिलाषा व क्षमता ही रखती है। सत्ता-क्रांति महत्वपूर्ण बन पाने का वंचना तंतु है, संपूर्ण रूप से प्रतिक्रिया या प्रतिक्रिया की शृंखला पर आधारित। प्रतिक्रिया संघर्ष उत्पन्न करती है तात्पर्य कभी समाधानित न होने वाला वैमनस्य व हिंसा, परस्परता की हत्या। इस प्रकार की क्रांति सार्थक, मानवीय व समता वाली कैसी हो सकती है?

    मोटे तौर पर वर्तमान साम्यवाद पूंजीवाद के विरोध पर आधारित है। साम्यवाद में आर्थिक समता की कल्पना परोसी जाती है, कल्पना परोसना इसलिए कह रहा हूं क्योंकि गहराई से समझने पर साम्यवाद का चरित्र भी पूंजीवादी चरित्र का ही है। साम्यवाद का पूंजीवाद राजकीय होता है, राजकीय-पूंजीवाद। पूंजीवाद चाहे व्यक्ति का हो, व्यक्तियों के समूह का हो या राज्य का हो, कभी समतापूर्ण व कल्याणकारी नहीं हो सकता, संभव ही नहीं।

    साम्यवाद ही नहीं, अभी तक समाजवाद व पूंजीवाद में भी जो अंतर माना जाता है वह यह कि पूंजी की स्वछंदता व शक्ति व्यक्ति के पास न होकर राज्य व शासन के पास रहती है। इसका बेहतर समाज व व्यवस्था निर्माण से कोई रिश्ता नहीं होता क्योंकि राज्य अपने आपमें कोई जीवंत वस्तु नहीं होता जो स्वयं को स्वतः संचालित करता हो। राज्य को व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह द्वारा ही संचालित किया जाता है। इस प्रकार नाम परिवर्तन के बावजूद शक्ति व सत्ता कुछ व्यक्तियों या व्यक्ति-समूहों के हाथ में ही केंद्रित रहती है।

    पूंजीवाद की ही तरह साम्यवाद का आधार भी आर्थिक ही है इसीलिए इसका मूल चरित्र भिन्न नहीं है। व्यक्ति के अंदर आर्थिक संपन्नता के लिए जो वासना रहती है, साम्यवाद की आर्थिक समता का आधार यही वासना है। साम्यवाद आधार प्रतिक्रिया है यही कारण रहा कि यह वर्ग विग्रह में लिप्त होकर एक ऐसा तंत्र बन गया जो मनुष्य का प्रयोग करता है तथा घृणा, द्वेष, हिंसा, हत्या आदि को आवश्यक व अनिवार्य मानने की कट्टरता रूपी आत्मछल को प्रवंचना के साथ कोरे आदर्श व गौरव के रूप में प्रतिष्ठित व पोषित करता है। पूंजीवाद व साम्यवाद में मूलभूत चारित्रिक अंतर नहीं।

    लोकतंत्र में मूलभूत आदर्श प्रबल होना चाहिए। राजकीय व शासकीय मानसिकता को लोकतंत्र का नाम देने तथा शास्त्रों में, दस्तावेजों में, भाषा में, तर्कों इत्यादि में लोकतंत्र-लोकतंत्र की रट लगाने से लोकतंत्र को झुठलाया ही जाता है। वास्तविक लोकतंत्र का मूलभूत आदर्श, लोकविश्वास के आधार पर नीतियों को स्थापित करते हुए राज्य-शासन को कम करते हुए शासन मुक्त समाज की स्थापना व मनुष्य का परिष्करण करने के वृहद अवसर उपलब्ध कराना है।

    विनाश को केवल और केवल वही लोकतंत्र रोक सकता है जो अहिंसा, सामाजिक समता व कल्याण को अपनी दीर्घकालिक नीति मानेगा, इसी के अनुरूप अपने आर्थिक, प्रशासनिक व राजनैतिक ढांचे बनाएगा। अभी तक की पद्धतियों में सबसे बेहतरीन पद्धति लोकतंत्र है। पुरानी क्रांतियों को व्यवस्थित या ऊटपटांग तरीकों से दोहराया जाना औचित्यहीन है। मूलभूत बात है मानवीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति व रचना “अहिंसा” को जानने, समझने, स्वीकारने व प्रमाणिकता में जीने की। सत्य के आग्रह के साथ अहिंसा को समझना, स्वीकारना व प्रमाणिकता में जीना। मैं गांधी को मानवीय इतिहास के लिए इसीलिए अत्यधिक महत्वपूर्ण व दृष्टा व्यक्ति मानता हूं क्योंकि वे मानवीय लोकतंत्र के दृष्टा थे, उनकी अहिंसा सत्य के निकट थी व स्वअनुशाषित थी।

    मैं साम्यवाद, माओवाद पूंजीवाद, लोकतंत्र आदि विषयों पर गहरी व विस्तृत चर्चा इस पुस्तक में नहीं करना चाहता क्योंकि इस पुस्तक का मुख्य विषय बस्तर में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन के लिए रचनात्मक प्रयास हैं, पुस्तक अपने मूल विषय से भटक जाएगी। संक्षिप्त रूप से जितनी भी चर्चा इन विषयों पर प्रस्तावना अध्याय में हुई, आशा करता हूं कि उससे आपको यह महसूस हो रहा होगा कि मुझे साम्यवाद, माओवाद, क्रांति, परिवर्तन, पूंजीवाद आदि की समझ है, साथ ही यह पुस्तक रचनात्मक समाधान का प्रशस्तिगान करती हुई प्रतीत न हो, वरन् वस्तुस्थिति व रचनात्मक समाधान के प्रयासों को समझने में उपयोगी हो ताकि आप भी अपना योगदान सुनिश्चित करने की ओर मनन कर सकें, निर्णय ले सकें।