संघ-विरोधियों को संघ से सीखना चाहिए

Vivek “Samajik Yayavar”

राजनैतिक ईकाईयां

संघ ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में भारतीय जनसंघ ने अपने आपको जनता पार्टी में समाहित कर दिया, जनता पार्टी की सरकार बनी जो 1977 से 1980 तक चली। 1980 में संघ ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। 2013 में जनता पार्टी ने अपने आपको भारतीय जनता पार्टी में समाहित कर दिया। 1989 में जनता दल के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई जो 1990 तक चली।

दरअसल जो लोग संघ को पानी पी-पीकर कोसते हैं, उन्होंने संघ की राजनैतिक इकाइयों के साथ मिलकर समय समय पर सरकारें बनाईं हैं। जयप्रकाश नारायण के अनुयायी लोगों ने 1977 में संघ की राजनैतिक ईकाई के साथ मिलकर सरकार बनाई। आगे चलकर 1989 में फिर से संघ की राजनैतिक ईकाई के साथ मिलकर सरकार बनाई।

भारतीय जनता पार्टी 1996 में 13 दिनों के लिए सरकार में आई। 1998 में एक साल के लिए सरकार में आई, 1999 में फिर सरकार में आई।

भारतीय जनता पार्टी केंद्र में कुल लगभग 6 वर्षों तक सरकार में रही वह भी गठबंधन करते हुए। फिर 10 वर्षों तक लगातार सरकार में नहीं रही। इसके बावजूद 2014 में भारी बहुमत के साथ केंद्र में सरकार बनाती है। आज की तारीख में देश के अधिकतर राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की या भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सरकारें हैं।

रणनीतिक कुशलता, सांगठनिक क्षमता व लचीनापन की रणनीति

राजनैतिक रणनीतिक लचीलापन इतना अधिक कि 1951 को स्थापित की गई राजनैतिक ईकाई को संघ जरूरत पड़ने पर 1977 में जनता पार्टी में समाहित कर देता है। 1989 में जनता दल के साथ गठबंधन करके सरकार बनाता है। 1998 में देश भर की राजनैतिक पार्टियों को बटोर कर सरकार बनाता है।

भ्रष्टाचार की बात अपनी जगह, रणनीतिक तौर तरीकों की बात अपनी जगह, व संघ के एजेंडे के साथ सहमति असहमति अपनी जगह। लेकिन संघ का हर कदम एजेंडे की ओर गति करता है, यह एक सच्चाई है। भले ही 1996 में 13 दिन की सरकार हो या कुछ और।

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी जो दलितों की पार्टी है, जिसकी उत्पत्ति ही संघ के एंजेडे के विरोध में है उसने भी संघ की राजनैतिक ईकाई भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई।

मायावती की भी मान-मनौवल करते हुए बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ सरकार बनाता है। छोटी-छोटी पार्टियों को भी साथ मिलाकर सरकार बनाता है। यदि किसी पार्टी से कुछ हजार मतों का भी लाभ मिलना होता है तो भी उसको गठबंधन में लाने का प्रयास करता है।

1977 में स्वयं को जनता पार्टी में समाहित कर देना, 1989 में जनता दल का पिछलग्गू बनना। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाजवादी पार्टी का पिछलग्गू बनना। बिहार में नितीश कुमार का पिछलग्गू बनना।

भारतीय जनता पार्टी सरकार चलाती है तब भी संघ लोगों के बीच निरंतर संगठन प्रसार में लगा रहता है। क्योंकि संघ का मूल एजेंडा सत्ता प्राप्ति व सत्ता भोगना तक ही सीमित नहीं है। सत्ताएं तो मूल एजेंडे के लिए औजार हैं।

संघ विभिन्न दिशाओं में समानांतर रूप में लगातार काम करता रहता है। पूरे देश में विद्यालय खोले। पूरे देश में शाखाएं चलाईं। आपदाओं में राहत कार्य के लिए पहुंचते रहे। लोगों का विश्वास जीतने, लोगों की सोच बदलने, लोगों के दुख में सहयोगी के रूप में खड़े होने जैसे विभिन्न स्तरों पर लगातार जमीनी प्रयास किए।

जरूरत पड़ी तो राम मंदिर, कश्मीर में धारा 370 इत्यादि को बहुत बड़ा मुद्दे बनाए ताकि लोगों का राजनैतिक ध्रुवीकरण हो। जब राजनैतिक लाभ मिल गया तब इन मुद्दों को ठंडे बस्ते डाल दिया गया। क्योंकि यह सब संघ के मूल एजेंडा है ही नहीं। यह सब तो रणनीतियां हैं। संघ ने सबसे पहले हिंदुत्व के मूल एजेंडे से ऊंची जातियों को अपने साथ जोड़ा, फिर पिछड़ी जातियों को जोड़ा, अब दलितों को जोड़ रहा है।

संघ अपनी रणनीतियां बदलता है, राजनैतिक लचीलापन रखता है लेकिन अपने मूल एजेंडे से कभी नहीं भटकता है। संघ अपने एजेंडे के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहता है, दृष्टि व चिंतन में स्पष्टता रखता है, लोगों के साथ लगातार संवाद में रहता है, संगठन का दायरा बढ़ाता रहता है।

संघ-विरोध

उत्तर प्रदेश में मायावती को अवसर मिला पांच वर्षों तक बहुमत से सरकार चलाई। दलितों के प्रति, सामाजिक न्याय के प्रति कोई एजेंडा नहीं। जमीनी संगठन के लिए क्या किया। कांसीराम ने जो बनाया था उसको सत्ता प्राप्ति के चक्कर में नेस्तनाबूत कर दिया।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को अवसर मिला पांच वर्षों बहुमत से सरकार चलाई। समाजवाद व सामाजिक न्याय के प्रति कोई गंभीर एजेंडा नहीं। जमीनी संगठन के लिए क्या किया। मुलायम यादव ने संघर्ष करके जो संगठन बनाया उसको सहेज तक न पाए, समृद्ध करना तो दूर की बात है।

बिहार में लालू यादव ने 15 वर्षों तक सरकार चलाई, एजेंडा क्या रहा, केवल सरकार में बने रहना, सत्ता भोगना। 1990 में आडवाणी का रथ रोक दिया, चरवाहा विद्यालय की घोषणा कर दी। बस हो गए सांप्रदायिक शक्तियों के विरोध व सामाजिक न्याय के ऐतिहासिक पुरोधा। 15 वर्षों तक सरकार में रहते हुए सामाजिक न्याय के एजेंडे को कितना मजबूत किया जा सकता था, इस पर कोई चर्चा नहीं। कोई प्रश्न नहीं। सत्ता भोगना ही सामाजिक न्याय हो गया, चरवाहा विद्यालय की घोषणा ही हो गई वंचितों की मजबूती के लिए सुनहरे अक्षरों में लिखी जाने वाली ऐतिहासिक सामाजिक क्रांति।

पहले संघ की राजनैतिक ईकाईयों के साथ मिलकर कांग्रेस का विरोध, फिर कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा का विरोध। कुल जमा मूल बात सत्ता भोगना ही रही। दीवालियेपन में इसी को सामाजिक न्याय कह लिया जाए या सांप्रदायिकता-विरोध या कुछ और। 

समाज तो चाहता रहा कि सामाजिक न्याय की बात हो, जाति से मुक्त हुआ जाए, सांप्रदायिक सौहार्द की बात हो इसीलिए तो गैरभाजपा, गैरकांग्रेस सरकारें बनतीं रहीं। लेकिन जिनकी सरकारें बनतीं रहीं वे सत्ता भोगने के अलावे करते क्या रहे, उनके मूल चरित्र में अंतर क्या रहा ….

गुजरात में 2002 के बाद भारत में सैकड़ों NGO, सामाजिक/NGO सेलिब्रिटी, मैगसेसे पुरस्कृत लोगों ने मानवाधिकार के नाम पर, सांप्रदायिका के नाम करोड़ों रुपए की ग्रांट पाई। संघ, भारतीय जनता पार्टी व नरेंद्र मोदी का पानी पी-पीकर विरोध किया।

विरोधी पानी पी-पीकर विरोध करते रहे, जबकि संघ ने भरपूर दुस्साहस के साथ नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे कर दिया। विरोधियों ने लगातार जमकर नरेंद्र मोदी के विरोध में हंगामा काटा लेकिन नरेंद्र मोदी धुआंधार बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बन गए। यह है संघ का रणनीतिक कौशल्य व जमीनी सांगठनिक क्षमता व व्यापकता।

संघ विरोधी लोग बिना जमीन में गंभीरता से गए ऊपरी तौर पर बिना स्पष्ट दृष्टि व बिना प्रतिबद्धता के संगठित होते हैं। जबकि संघ जमीन पर अपने संगठन का अधिक मजबूती से विस्तार करता चला जाता है।

संघ-विरोधी लोग हल्ला गुल्ला करते हैं, आजकल सोशल मीडिया भी हो गया है तो उसमें संघ विरोध को नशे की तरह ओढ़ते बिछाते, खाते-पीते शौच करते, थूका-थाकी करते हुए खुद को क्रांतिकारी चिंतक व सामाजिक लंबरदार मान लेते हैं, लाइकों की संख्या पाकर सामाजिक परिवर्तन करते हैं।

जबकि संघ जमीन पर लोगों के साथ सीधे संवाद व काम करते अपने एजेंडे के लिए परिश्रम करता है। सोशल मीडिया वाले लोगों का मनोरंजन करने के लिए, व्यस्त रखने के लिए, क्रांतिकारी/परिवर्तनकारी होने के अहंकार को पोषित करने के लिए, हल्ला-गुल्ला बना रहे, के लिए समय-समय पर कुछ सुर्रा छोड़ देता है। संघ-विरोधी लोग सुर्रों पर पिल पड़ते हैं।

जो जितना अधिक पिलता है उसको उतना बड़ा चिंतक व क्रांतिकारी मान लिया जाता है। यह माना जाता है कि संघ यही करके शक्तिशाली बन पाया है, तो यही करके संघ को सत्ताओं से हटाया जा सकता है। इसी कारण पिले रहते हैं संघ विरोध को नशे की तरह ओढ़ते बिछाते, खाते-पीते शौच करते, थूका-थाकी करते हुए। इस मानसिकता को मूर्खता कह लीजिए, टटपुंजियागिरी कह लीजिए, मक्कारी कह लीजिए, भ्रांति कह लीजिए, कुछ भी कह लीजिए।

राजनैतिक सत्ता भले ही कुछ-कुछ समय के लिए संघ के हाथ से निकलती रहें लेकिन संघ भारत में प्रमुख शक्ति तब तक बनी रहेगी जबतक बेहद दूरदर्शी, गंभीर व ठोस प्रयास निरंतर-प्रतिबद्धता व भीषण संघर्षों के साथ नहीं शुरू किए जाएंगे।

संघ-विरोधियों को एक कटु यथार्थ स्वीकार कर लेना चाहिए कि हवाई तौर-तरीकों, सतहीपन, खोखलाहट, टटपुंजियागिरी से व बिना जमीन पर गंभीरता व ठोस रूप से उतरे हुए कभी भी संघ के विरोध में वास्तविक शक्ति नहीं खड़ी कर सकते हैं।

चलते-चलते

संघ के सांगठनिक ढांचे, मनोविज्ञान व समाजविज्ञान की गुणवत्ता यह है कि राजनैतिक रणनीतियों के तहत अनेकानेक उटपटांग एजेंडों को प्रमुख व महत्वपूर्ण एजेंडों के रूप में वर्षों तक पोषित व प्रायोजित करते रहने के बावजूद मूल एजेंडे को ही समृद्धि व शक्ति मिलती रहती है।

संघ को बैठे बिठाए, चुटकुले सुनाने, प्रेस रिलीज जारी करने, भाषण रटकर विद्वान व क्रांतिकारी बनने जैसी चोचले बाजियों या टटपुंजिएपन से यह सब प्राप्त नहीं हुआ है।

संघ के एजेंडे के प्रति सहमति असहमति हो सकती है। लेकिन संघ की दृष्टि-स्पष्टता, सामाजिक मनोविज्ञान की विशेषज्ञता, प्रचार तंत्र, सांगठनिक ढांचा, संगठन, एजेंडे के प्रति प्रतिबद्धता, व परिश्रम के संदर्भ में प्रश्न नहीं खड़े किए जा सकते हैं।

संघ बहुत अधिक व्यवहारिक व व्यापक जमीनी संगठन है। संघ अपने मूल एजेंडे के लिए जरूरत पड़ी तो भारतीय समाज से जाति को खतम करने में गंभीरता से जुट जाएगा।

संघ का तोड़ भारत में किसी भी पार्टी के पास नहीं है। संघ के परिश्रम, दृष्टि की स्पष्टता, कर्मठता, रणनीतिक कौशल, सांगठनिक क्षमता व कौशल व एजेंडे के प्रति प्रतिबद्धता को नकारना सबसे बड़ी मूर्खता है।

विरोधी की क्षमताओं, कौशल व विशेषज्ञता को नकारने की बजाय, सीखना चाहिए। विभिन्न रणनीतियां बनाते हुए, लाचीलापन रखते हुए स्पष्ट दृष्टि व प्रतिबद्धता के साथ एजेंडे के लिए एकाग्रता के साथ काम करते रहने की कला संघ से सीखना चाहिए।

Comments

4 responses to “संघ-विरोधियों को संघ से सीखना चाहिए”

  1. Damodar

    संघ की ताकत मुसलमान हैं।

  2. राजेश सिंह सिसोदिया नंगे पांव

    आंखें खोलने वाली post

  3. Rakesh

    संघ का मूल एजेंडा क्या है? मूल एजेंडा

  4. Anand kumar

    Virodhi se sikhna bhi ek kala h. Ye lekh yhi batata h. Shaandaar lekh. Mere anusaar sangh ka khatma mool agenda ka khatm hona sangh m hi chipa h. Jis tarah 51 wala sangh aur abke sangh m parivartan ata h usi tarah agey ayega aur sab ghulmil ke ek jaisa hi ho jayega. Basharte samaj ki bhagidari ho. Samaj chahe to sangh ke kattar type kuch agenda ko dhire dhire pighla sakta h .jaisa ki hua bhi h. Kaha 1990 m sangh ambedkar deshdrohi h aise parche baanta krta tha aur kha aaj use unki jarorat ya use ki jarorat h. Isi bahane change to hua. Sab logo pr nirbhar h wo sangh ke lie banna chahte h ya sangh ko apne liye banana chahte h.

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