Category: सामाजिक यायावर

  • समाजवादी पार्टी वाले “समाजवादियों” के लिए

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    जब से उत्तर प्रदेश के चुनाव में समाजवादी पार्टी की पराजय हुई है तब से अधिकतर समाजवादी फेसबुक में आंय बांय सांय बोले जा रहे हैं। कोई अखिलेश यादव को दोष देता है, कोई अवसरवादी युवाओं व नेताओं को दोष देता है, कोई चाटुकारों को दोष देता है। आरोप प्रत्यारोप का संगम चल रहा है। मैंने सोचा कि मैं भी विचारक के रूप में अपनी खरी-खरी बात रख दूं भले ही मैं समाजवादी पार्टी का सदस्य नहीं हूं। इसी बहाने समाजवादी पार्टी वाले समाजवादियों की सहिष्णुता व अभिव्यक्ति के स्वातंत्र्य वाले मूल्य पर उनकी आस्था व समझ का भी कुछ आकलन हो जाएगा।

    आपको अटपटा लग रहा होगा कि मैं समाजवादी पार्टी वाले समाजवादी क्यों लिख रहा हूं। वह इसलिए कि जैसे भारतीय वामपंथी पार्टी का होने का मतलब वामपंथ की समझ या वामपंथी होना नहीं होता, जैसे बहुजन समाज पार्टी का होने का मतलब बहुजन होना या बहुजन के प्रति प्रतिबद्ध होना नहीं होता जैसे भारतीय जनता पार्टी का होने का मतलब हिंदूत्व की समझ रखने वाला या हिंदू होना नही होता बिलकुल वैसे ही समाजवादी पार्टी का होने का मतलब समाजवादी होना नहीं होता। लेकिन चूंकि ऐसा माना जाता है, प्रचलन में आ गया है इसलिए मैं समाजवादी पार्टी वाले समाजवादियों कह रहा हूं।

    आप लोगों की प्रतिक्रियाओं से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो आपको पराजय बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। आपमें से बहुत लोग यह कहते हैं कि उन्होंने समाजवादी पार्टी की सरकार से कभी कुछ नहीं लिया। मेरा कहना है कि भले ही आपने पार्टी की सरकार से कुछ नहीं लिया हो लेकिन आपकी पार्टी की सरकार होना ही आपके अंदर मनोवैज्ञानिक आत्मविश्वास, प्रसन्नता व भावनात्मक आवेग आदि बनाए रखता है। इसलिए कौन कितना मलाई खाया, कौन कितना किसके चिपका रहा इत्यादि बातों का कोई विशेष मायने नहीं।

    मायने यह रखता है कि जो नुक्ताचीनी आप अब निकाल रहे हैं वह नुक्ताचीनी आपने पार्टी के सरकार में पांच साल रहते हुए क्यों नहीं की। मान लिया जाए कि आपने की भी तो पूरी शिद्दत से लगातार क्यों नहीं की। अपने भीतर गहराई में झांकिए, यदि थोड़ी सी भी दृष्टि होगी तो उत्तर आपको मिल जाएगा।

    मैं तो यही सुझाव दूंगा कि नुक्ताचीनी निकालना बंद कर दीजिए। जमीन पर उतरिए या जो जमीन पर उतरें हों उनके साथ बिना छल व धोखे व हिडेन-एजेंडे के साथ खड़े होइए बिना शर्त। यदि ऐसा न कर पाइए तो अपनी रोजी-रोटी पाइए, भविष्य में जब यदि कभी समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है तो फिर समाजवादी बन लीजिएगा। इतना करने में आखिर मुश्किल क्या है, कठिनाई कहां है। बहुत सरल है।

    Akhilesh Yadav

    आपमें से बहुत लोग सोशल मीडिया के माध्यम से अखिलेश यादव को यह बताने में लगे हैं कि उन्होंने किस पर विश्वास करके गलती किया, फलां किया ढिका किया वगैरह-वगैरह। दूर से आलोचना करना बहुत आसान है। लेकिन जब सत्ता हाथ में होती है तब लोगों व लोगों की मानसिकताओं को फिल्टर कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है। यह भी तो संभव है कि यदि आप अखिलेश यादव से चिपके होते तो आपका भी चरित्र सत्ता ग्लैमर के कारण वैसा ही हो गया होता जैसा कि उन लोगों का हुआ जिनके चिपकने को आप आज नाजायज ठहरा रहे हैं।

    चुनावी धींगामुस्ती में किसके क्या बयान थे, यह सब यदि छोड़कर ईमानदारी से बात की जाए तो यह मानना पड़ेगा कि अखिलेश यादव ने काम किया और काम करने का प्रयास किया। मैं समाजवादी पार्टी व उसके लोगों की बात नहीं कर रहा हूं। मैं सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव की बात कर रहा हूं।

    यदि नाजायज लोगों के चिपके होने के बावजूद अखिलेश यादव बेहतर सोच रख पाते हैं, बेहतर काम करने के लिए प्रयास कर पाते हैं। तो इसका मतलब यह है कि उन पर किसी के चिपके होने का कोई खास अंतर नहीं पड़ता। राजनैतिक त्रुटियां किससे नहीं होती हैं। सभी से होती हैं। राजनीति में हार जीत चलती रहती है। राजनीति में हारना या जीतना उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि अपने नेता पर विश्वास रखना और हार में भी साथ खड़े रहना।

    यदि आपको यह लगता है कि हार के जिन कारणों का विश्लेषण आप कर पा रहे हैं वह अखिलेश नहीं कर पाने में सक्षम नहीं हैं। तब अखिलेश यादव को अपने नेता के रूप में मानने का मतलब ही क्या रहा जाता है। जमीनी कार्यकर्ताओं के बारे में समझ धक्के खाने, धोखे खाने के बाद आती है। जो नेता अपनी हार के कारणों का विश्लेषण न कर पाए। जो नेता अपनी हार से सीख न ले पाए। यदि आपकी दृष्टि में अखिलेश यादव हार के कारणों का विश्लेषण कर पाने में, हार से सीख ले पाने में सक्षम नहीं तो आपके द्वारा उनको नेता के रूप में स्वीकारने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

    ऐसा भी नहीं है कि आप पूरे प्रदेश के हर एक गांव की जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं। ऐसा भी नहीं है कि आपने जमीन में बहुत बड़े काम किए हैं, लोगों के लिए भीषण संघर्ष किए हैं, जिनके कारण आपमें विशिष्ट क्षमता आ गई है घर बैठे जमीनी कारणों व हकीकत को समझने का। आप सिर्फ तार्किक व आवेगात्मक कयास लगा रहे हैं जिसे आप हार के कारणों के विश्लेषण का नाम दे रहे हैं।

    मूलभूत प्रश्न यह है कि आप अपने स्तर पर भरपूर ऊर्जा के साथ पांच वर्षों तक क्या करते रहे? आपने लोगों की मानसिकता अपने स्तर पर विकसित क्यों नहीं की। घर में बैठे-बैठे पोस्ट-अपडेट करने को जमीनी संघर्ष व योगदान मानने की उथली मानसिकता से तो आप बाहर निकल नहीं पा रहे हैं, किंतु अखिलेश यादव को बताना चाहते हैं कि वे क्या करें या न करें। यदि आपको विश्वास है कि अखिलेश यादव ने लोगों के लिए बेहतर काम करने का प्रयास किया तो उन पर विश्वास कीजिए। उनके साथ खड़े होइए। यदि आपको लगता है कि अखिलेश ने कोई काम नहीं किया, तो ऐसे नेता के पीछे समय व ऊर्जा बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं।

    आप हार को इस रूप में भी तो देख सकते हैं कि अखिलेश को जमीनी हकीकत से रूबरू होने का अवसर मिलेगा। जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति उनकी दृष्टि व समझ अधिक स्पष्ट होगी। यदि आपको लगता है कि आप बेहतर हैं, आप अधिक सक्षम हैं तो आपको अपनी पार्टी की कमान संभालनी चाहिए। मेरी समझ में आपकी यह बात समझ न आ रही कि सत्ता में न रहने, लोगों के लिए जमीनी पर रहते हुए संघर्ष करने से इतनी बेचैनी क्यों?

    आप तो भाजपा की तरह प्रयोगधर्मी व इच्छाशक्ति के धनी भी नहीं हैं कि आडवाणी जी को किनारे लगाकर मोदी जी को ले आवें। बिना किसी का चेहरा आगे किए हुए लहलहाते हुए सत्ता प्राप्त कर लें और आदित्यनाथ जी को मुख्यमंत्री बना दें और कोई चूं तक न करे उल्टे शान में रुदालियों व भांटों की तरह कसीदें पढ़ना शुरू कर दें।

    भाजपा तो समाजवादी होने का दावा नहीं करती फिर भी उसके कार्यकर्ता बिना मुंह बिचकाए बिलकुल जमीन पर घिसटते हुए अपनी पार्टी का प्रचार करते हैं। समाजवादी पार्टी तो समाजवादियों की पार्टी है फिर कार्यकर्ताओं को जमीन पर घिसटते हुए पार्टी का प्रचार करने में क्या झिझक। सत्ता किसी भी पार्टी की हो, सत्ता से सटे हुए लोग कमोवेश वही होते हैं। इसलिए कौन सत्ता से कैसे सटा है, से नहीं, जमीनी प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की लगातार की मेहनत से पार्टियां सत्ता तक पहुंचती हैं।

    खुलेमन से स्वीकारिए कि भाजपा ने मेहनत की, लोगों का माइंडसेट को अपने फेवर में करने में कामयाब रही। कारण चाहे जो भी रहे हों लेकिन लोगों को यह लगा कि समाजवादी यादवों की पार्टी है इसलिए अधिकतर पिछड़ी जातियां समाजवादी पार्टी से दूर हो गईं। इस जमीनी तथ्य का अखिलेश यादव से कुछ लोग कितना सटे रहे से कोई मतलब नहीं। हां यह आपकी व्यक्तिगत खुन्नस का विषय जरूर हो सकता है। वैसी ही खुन्नस जैसी कि पिछड़ी जातियां समाजवादी पार्टी के सत्ता पर आने से यादवों के व्यवहारों के कारण यादवों से रखने लगतीं हैं।

    यदि हो सके तो अपने स्तर पर समाजवादी पार्टी को मजबूत कीजिए। हर जाति के लोगों का दिल जीतिए। समाज के लोगों को लगे कि समाजवादी पार्टी उनकी अपनी पार्टी है। अब वे जमाने लद गए जब आपने बिना वास्तविक जमीनी आधार वाले किसी बेहूदे आदमी को उठाकर पद दे दिया और सोच लिया कि अब उस आदमी की जाति के सारे लोग लहालहा कर आपके साथ खड़े हो जाएंगें।

    भविष्य में विजय प्राप्त करना आसान नहीं। रगड़ना पड़ेगा खुद को, तपाना पड़ेगा खुद को, जमीन पर लोगों के बीच। वास्तविक जनाधार वाले नेताओं से डरिए नहीं, उनको साथ जोड़िए, तालमेल बनाइए, साझेदारी कीजिए, हिस्सेदारी दीजिए। हर स्तर पर साझा करना सीखिए, हर स्तर पर हिस्सेदारी देना सीखिए।

    यदि आपको लगता है कि आप सही हैं लेकिन आपका नेता अक्षम है, दृष्टिहीन है, कान का कच्चा है तो बदल दीजिए अपने नेता को। किंतु यदि आपको लगता है कि आपका नेता गुणी है तो उस पर विश्वास कीजिए, नुक्ताचीनी की बजाय उसके निर्णयों के साथ खड़े रहिए इस विश्वास के साथ कि आपका नेता भी कारणों का विश्लेषण करने में कम से कम उतना सक्षम है जितना कि आप हैं।

    चलते चलते एक बात बताना चाहता हूं, भाजपा आपके एजेंडे तय करती है। भाजपा जिस चुनावी रणनीति का प्रयोग आज करती है आप उस रणनीति का प्रयोग कल करते हैं जबकि भाजपा कल एक नई रणनीति के साथ चुनाव में अपना परचम लहरा रहा होती है। आपको भाजपा का अनुसरण करने की जरूरत नहीं, आपको भाजपा का प्रतिरोध करने की जरूरत नहीं, आपको भाजपा के एजेंडों के विरोध में अपने एजेंडे तय करने की जरूरत नहीं। ऐसा करके तो आप भाजपा को और अधिक मजबूत ही करते हैं।

    आप अपने एजेंडे खुद तय कीजिए जो आम लोगों के अपने एजेंडे हों। आप सत्ता में आएं या न आएं लेकिन एजेंडे अपने रखिए। भाजपा चुपचाप 10 साल सत्ता से बाहर रहकर भी अपने एजेंडे में काम करती रहती और एक दिन अचानक पूरे देश में कब्जा कर लेती है।

    धैर्य, रणनीति, जमीनी संगठन व प्रतिबद्ध कार्यकर्ता यह चार भाजपा के मूलभूत विजयी तत्व हैं। आप इन चारों में कमजोर हैं।

    पार कैसे लगेगा यह सोचने की बजाय आप तो आपसे में ही छीछालेदर करने में लिप्त हैं। अब मर्जी आपकी, आप मुझे चाहे गरिया लें या मेरी बातों पर मनन कर लें। आपकी अपनी समझ, आपकी अपनी खुशी।

    शुभकामनाओं सहित,

    सामाजिक यायावर

  • योगी आदित्यनाथ बनाम विपक्ष

    Vivek “सामाजिक यायावर Social Wayfarer”

    अभी शपथ ग्रहण भी नहीं हुआ और आप हुआ-हुआ करने लगे। यदि हुआ-हुआ ही करना था तो भाजपा को इतने भारी बहुमत से जिताया क्यों। यदि आपको यह लगता है कि भारी बहुमत EVM की करामात है तो उतरिए सड़क पर और बचाइए लोकतंत्र को, खाइए लाठियां, जाइए जेल, करिए अपना सीना पुलिस की बंदूक से निकलने वाली गोली के सामने। फेसबुक व whatsapp से दुनिया नहीं चलती है। आप एक समय की रोटी नहीं कमा सकते फेसबुक व whatsapp में मैसेजों को कापी, फारवर्ड करके, और दुनिया बदलने का ख्वाब देखते हैं।

    कुछ बातें बिलकुल चुस्ती के साथ गांठ में बांध कर समझ लीजिए।

    या तो यह स्वीकारिए कि संघ व भाजपा के कार्यकर्ता जमीन से लेकर सोशल मीडिया में हर स्तर पर आपसे बेहतर हैं। वोट फेसबुक व whatsapp की लफ्फाजी से नहीं मिलता। वोट जमीन पर उतर कर अपने नेता के लिए मेहनत करने से मिलता है। वोट जब रोड-शो करने से नहीं मिलता तो फेसबुक व whatsapp में मैसेज फारवर्ड करने से कैसे मिल सकता है।

    या यदि आप यह मानते हैं कि EVM के कारण भाजपा को बहुमत मिला, तो जैसा मैंने पोस्ट की शुरुआत में कहा कि उतरिए सड़कों पर, संघर्ष कीजिए। लफ्फाजी से बिलकुल भी काम नहीं चलेगा।

    मैं जानता हूं कि आपमें बूता नहीं कि आप सड़क पर उतर कर संघर्ष कर पाएं। कभी जमीन पर उतर कर समाज के लिए काम व संघर्ष किया हो तो कुछ हिम्मत भी पड़े। आप में से जो अपवाद हैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं।

    आपको मेरी बात बुरी लगे या भली, यह आपकी अपनी सोच का स्तर। उत्तर प्रदेश में मायावती जी के दिन लद गए, मायावती जी के दिन लदने का मतलब बसपा के दिन लद गए। चैप्टर क्लोज। भावुक मत होइए, कड़वा सच है। EVM होती या न होती, मायावती जी की हालत कम-अधिक यही होती जो है।

    अब बात आती है अखिलेश जी की। तो उनको वास्तविक जमीन पर उतरना पड़ेगा, एक आम जमीनी नेता की तरह। खुद को पूरी ताकत के साथ यादवों के अतिरिक्त अन्य पिछड़ी जातियों के मान्य व लोकप्रिय नेता के तौर पर स्थापित व साबित करना होगा। इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं। यही परीक्षा है अखिलेश जी की, उनकी राजनैतिक सूझबूझ, सांगठनिक क्षमता व दूरदर्शिता की।

    जितना मैं भाजपा व संघ को समझता हूं उसके आधार पर मैं योगी आदित्यनाथ जी को मोदी जी के बाद भाजपा के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहा हूं। मोदी जी शायद कुल दो टर्म तक प्रधानमंत्री रहेंगे, उसके बाद योगी आदित्यनाथ जी प्रधानमंत्री के रूप में पारी खेलेंगे।

    मोदी जी ने गुजरात दंगों के लिए बदनाम हुए लेकिन पूरे देश में खुद को विकास पुरुष के रूप स्थापित कर लिया। योगी जी के खाते में गुजरात दंगों जैसा कुछ है भी नहीं। तब क्या योगी जी खुद को विकास पुरुष व शांत पुरुष के रूप में स्थापित नहीं कर पाएंगें। क्या मुश्किल है। योगी आदित्यनाथ जी के राजनैतिक पैतरों वाले बयानों में मिट्टी डालकर भूल जाइए।

    केंद्र सरकार उनकी, राज्य में भारी बहुमत के साथ हैं। जितने मर्जी उतने राजमार्ग बनवा कर एयरोप्लेन उतरवा कर विकास पुरुष बन जाएंगें।  यदि एक प्रतिशत भी मान लीजिए कि योगी जी ने संतुलन के साथ काम किया तो कैसे रोक पाएंगें आप उनको। इस बार न रोक पाए तो अगली बार कैसे रोक लेंगें।

    लोगों को लगा कि भाजपा अखिलेश जी से बेहतर काम करेगी, अवसर दिया। यदि योगी जी बेहतर काम करते हैं तो अखिलेश जी को और अधिक बेहतर कामों के विचारों के साथ लोगों को लुभाना पड़ेगा।

    Yogi Adityanath, CM, Uttar Pradesh

    मैं तो चाहता हूं कि योगी आदित्यनाथ जी अच्छा काम करें। ताकि उनके विपक्ष को और अधिक अच्छे कामों की मंशा के साथ आगे आना होना। यह एक बेहतर राजनीति की शुरुआत होगी।

    काम करने की प्रतिस्पर्धा वाली राजनीति से डर किस बात का। यदि ऐसा हो पाया तो यह तो भारत की राजनीति में बहुत ही अधिक बेहतर शुरूआत होगी।

    आप 2012 से मोदी का विरोध करते आ रहे हैं। क्या उखाड़ लिया। 2014 में भारी बहुमत से केंद्र में सरकार बनाई। आप और अधिक विरोध करने लगे। उन्होंने नोटबंदी लागू कर दी। आपको लगा कि रसगुल्ला आ गया मुंह में। आपने और अधिक विरोध किया।

    आपका विरोध हवाई है। आप लोगों के बीच नहीं जाते। आप जमीन पर नहीं जाते हैं। आप तर्क गढ़ते हैं जमीन पर न जाने के। परिणाम देख लीजिए, आपने जितना विरोध किया मोदी जी उतने ही ताकतवर बनते गए।  उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार बनाने जा रहे हैं। लगभग पूरा देश उनका है।

    जो आपने मोदी जी के साथ किया वही आप योगी आदित्यनाथ जी के साथ कर रहे हैं। वे अभी मुख्यमंत्री बने नहीं आपने उनका विरोध करना शुरू कर दिया। अवसर दीजिए, धैर्य रखिए एक साल तक उनको सत्ता को समझने बूझने दीजिए। फिर कुछ कहिए।

    चलते-चलते :

    यदि आप यह सोच कर चल रहे हैं कि आप सड़क पर नहीं उतरेंगें, संघर्ष नहीं करेंगे। तब भी सत्ता अपने आप रसगुल्ले की तरह आपके मुंह में आ गिरेगी तो आप शेखचिल्ली हैं।

    यदि आप EVM को गलत मानते हैं तब भी, EVM को गलत नहीं मानते हैं तब भी। दोनों ही सूरत में आपको जमीन पर उतरना होगा और संघर्ष करना होगा। नए तौर तरीकों के साथ। सवाल यह है कि क्या आप ऐसा कर पाएंगें।

    बैठे ठाले राजनीति करने व सत्ता पाने के दिन लद गए, बेहतर हो कि आप इस बात को जितनी जल्दी हो सके स्वीकार कर लें। आपको संघर्ष करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी। चाहे EVM हो या EVM  न हो।

  • ईरोम चानु शर्मिला

    Vivek Umrao Glendenning “सामाजिक यायावर”

    Irom Chanu Sharmila

    बिना शक ईरोम चानु शर्मिला मजबूत इच्छाशक्ति की महिला हैं। लेकिन उनकी इच्छाशक्ति सीमित दिशा की इच्छाशक्ति लगती है। सीमित दिशा की इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उनकी इच्छाशक्ति उनके अपने शरीर को कैसे प्रयोग करना है, तक ही सीमित है।

    जब तक AFSA नहीं हटेगा, मैं भोजन नहीं करूंगी, अपने बालों में कंघी नहीं करूंगी, आईना में अपना चेहरा नहीं देखूंगी। यह था ईरोम शर्मिला का आंदोलन। व्यक्तिगत शरीर तक सीमित आंदोलन। खाना नहीं खाना, बालों में कंघी नहीं करनी, चेहरा आईना में नहीं देखना।

    ईरोम शर्मिला का उपवास सांकेतिक उपवास रहा क्योंकि ईरोम शर्मिला का शरीर भोजन प्राप्त करता रहा। ईरोम शर्मिला के उपवास की परिभाषा यह है कि उन्होंने अपने मुंह से भोजन नहीं ग्रहण किया।

    ईरोम शर्मिला मणिपुर में मास-लीडर कभी नहीं रहीं। वे युवा थीं, संवेदनशील थीं। उनको लगा होगा कि गांधी उपवास रखते थे, मैं भी रखूं तो AFSA हट जाएगा। जैसे गांधी जी के उपवास से सरकार दबाव में आती थी, मेरे उपवास से भी सरकार दबाव में आ जाएगी। अपने उपवास को मजबूती देने के लिए उन्होंने कहा कि वे अपने बालों में कंघी भी नहीं करेंगीं, आईना में अपना चेहरा नहीं देखेंगी।

    उन्होंने उपवास शुरू कर दिया, कुछ दिनों बाद उनको हिरासत में लेकर चिकत्सीय पद्धति से आहार देना शुरू कर दिया गया।  ईरोम शर्मिला का शरीर आहार प्राप्त करता रहा और ईरोम शर्मिला उपवास करने वाले आइकन के रूप में स्थापित होती रहीं। यह प्रक्रिया तकरीबन 16 वर्षों तक चली। इन 16 वर्षों में राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने ईरोम शर्मिला का बिना शर्त खूब साथ दिया। ईरोम शर्मिला को अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले।

    मैं ईरोम शर्मिला से पहली बार तकरीबन 11-12 साल पहले दिल्ली में मिला था। कुछ देर साथ रहा था। ईरोम शर्मिला के भाई व दिल्ली में मणिपुर के छात्रों से कई बार मिला, कई बार उनके कमरों में भी गया जहां वे छोटी-छोटी मीटिंगे करते थे। मुझे जनांदोलन खड़ा कर पाने की दृष्टि, सोच व स्पष्टता दिखी नहीं। शुभकामनाएं रखते हुए भी मैं धीरे-धीरे दूर होता चला गया। सक्रिय रूप से जुड़ने की संबद्धता बन नहीं पाई।

    जो मुझे जानते हैं, वे जानते ही हैं कि जब पूरा देश अरविंद केजरीवाल जी व अन्ना हजारे जी के पीछे पगलाया हुआ था। तब मैं यह कह रहा था कि कुछ नहीं रखा इनके आंदोलन में। दरअसल मैं समाज, सामाजिक मुद्दों, सामाजिक समाधान व आंदोलन को सूक्ष्मता से देखने का प्रयास करता हूं। सब्जेक्टिविटी की बजाय ऑब्जेक्टिविटी से समझने व देखने का प्रयास करता हूं। इसलिए मेरे विश्लेषण भिन्न होते हैं, अधिकतर लोगों को पसंद भी नहीं आते हैं। यह बात अलग है कि कुछ वर्षों बाद उनको लगता है कि मेरे विश्लेषण सही थे। विभिन्न सामाजिक मुद्दों व घटनाओं में इसी प्रक्रिया का दुहराव होता रहता है।

    भारतीय समाज भावुकता से चलता है। ईरोम शर्मिला ने भावुकता में निर्णय लिया कि वे भोजन नहीं करेंगीं, बालों में कंघी नहीं करेंगीं, आईना नहीं देखेंगी। पहले AFSA हटाओ तब यह सब करूंगी। एक महिला मुंह से भोजन नहीं ग्रहण करती है, सुंदर बनने व दिखने का त्याग कर दिया है इस बात पर भारतीय समाज की भावुकता ने ईरोम शर्मिला को आइकन बना दिया। आइकन बनने का आधार – मुंह से भोजन ग्रहण न करना, बालों में कंघी न करना, चेहरा आइने में न देखना।

    16 वर्षों में पहुंचे कहां :

    16 वर्षों में ईरोम शर्मिला सेलिब्रिटी बन गईं, पुरस्कार मिल गए, उनके भाई व परिवार आदि का आर्थिक विकास भी जबरदस्त हो गया। 

    ईरोम शर्मिला ने उपवास रखने वाला अपना व्यक्तिगत आंदोलन भी खतम कर लिया।

    सवाल यह खड़ा होता है कि इतना सब संसाधन, मीडिया, आर्थिक, सहयोग व सेलिब्रिटी तामझाम आदि होने के बावजूद 16 वर्षों जैसे लंबे समय में ईरोम शर्मिला मणिपुर में ठोस जनांदोलन की नींव रख पाने में असमर्थ रहीं।  मणिपुर के लोग वहीं के वहीं रहे।  AFSA भी वहीं का वहीं रहा।

    चलते-चलते :

    यदि ईरोम शर्मिला नहीं होतीं तो मणिपुर में पिछले 16-17 वर्षों में कुछ ठीक-ठाक जमीनी सामाजिक आंदोलन खड़े हो सकते थे। बहुत ऐसे छोटे-छोटे प्रयास जिनका वास्तविक जमीनी आधार था, उनकी ओर हमारा ध्यान नहीं गया, उनको हमने प्रोत्साहित नहीं किया।  हमने ईरोम शर्मिला को मणिपुर मान लिया, हमने मान लिया कि पूरा मणिपुर ईरोम शर्मिला के साथ खड़ा है।

    ईरोम शर्मिला को 80-90 मत मिलने पर हम भोचक्के इसीलिए हैं क्योंकि हमने यह मान रखा था कि ईरोम शर्मिला मणिपुर की मास-लीडर हैं, जमीनी आंदोलन व संघर्ष से निकली हुई लोक-नेता हैं। मणिपुर के लोग उनके साथ खड़े हैं। वे मणिपुर के लोगों का सामाजिक प्रतिनिधित्व करती हैं।

    ईरोम शर्मिला एक मजबूत इच्छाशक्ति की संवेदनशील महिला हैं। लेकिन वे मणिपुर के लोगों की मास-लीडर कभी नहीं रहीं।  वे उपवास रूपी अपने व्यक्तिगत आंदोलन को सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित करने में असफल रहीं।

    मुझे यह लगता है कि उनके पास दूरगामी योजना कभी रही नहीं, आंदोलन की समझ नहीं रही। वे बहाव में बहती चली गईं।

    .

  • भारतीय समाज को सामाजिक सेलिब्रिटियों से खुद को बचाने की जरूरत है

    सामाजिक यायावर Social Wayfarer

    लेख की शुरुआत में ही यह कहना चाहता हूं कि मुझे मोदी जी बड़े मासूम लगते हैं और RSS (संघ) से अधिक भारतीय लोगों की चारित्रिक-नस को समझने वाला कोई और संगठन नहीं।

    फेंकना हो, झूठ बोलना हो, दावे ठोंकना हो, सेल्फी लेना हो, मीडिया का प्रबंधन करना हो, लोगों के सामने लछ्छेदार बातें बनानी हों, यात्राएं करनी हों, मैं फकीर हूं कभी भी झोला उठाकर चल दूंगा, मैं तो आप लोगों के लिए जीवन का त्याग किया हूं, जिम्मेदारी का निर्वाहन करने की बजाय विरोधियों की बुराई करना, वगैरह-वगैरह …. मतलब मोदी जी के जीवन-व्यवहार के किसी मुद्दे की बात कर ली जाए।

    यदि आपको यह लगता है कि मोदी जी ही ऐसे हैं, विरले हैं, तो आप या तो मूर्ख हैं या निहायत ही धूर्त हैं या आपको मोदी जी के व्यक्तित्व की बुराई करने में सैडिस्टिक आनंद आता है। वास्तविकता तो यह है कि मोदी जी की इन सभी बातों व क्रियाकलापों में एक भी बात उनकी अपनी मौलिक नहीं है। ध्यान से देखेंगे तो भारतीय समाज में इनके जैसे लोग जगह-जगह छितरे हुए मिल जाएंगें।

    मैंने 2014 में मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक छोटी सी चंद लाइनों की पोस्ट की थी, कि मोदी जी भारत के लोगों के चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। मेरी मित्र सूची के केवल एक ऐसे मित्र हैं जिन्होंने कहा था कि यदि ऐसा है तो यह चिंताजनक बात है, उन मित्र का नाम है सचिन भंडारी, भंडारी जी मोदी के बड़े प्रशंसक हैं लेकिन मेरी बात से इनको चिंता इसलिए हुई क्योंकि इनको भारत के लोगों का चरित्र का अनुमान है और यदि मोदी जी उसी चरित्र के हैं तो इनको यह चिंताजनक बात लगी।

    मोदी जी ने कैसे गुजरात को विकास के अद्वितीय माडल के रूप में प्रायोजित करके पूरे देश में अपने लिए माहौल बनाया और विकास के जनक व पुरोधा बनते हुए प्रधानमंत्री की गद्दी को सुशोभित करने तक की सीढ़ी तय की। प्रधानमंत्री बनते ही विदेश के दौरे शुरू, महंगे-महंगे कपड़े पहनना, विदेशी राजनेताओं के साथ सेल्फी लेना, खुद को महान मानते हुए नए-नए नारे देना, मन की बात करना। अधिक क्या बताना, फेसबुक की वालों को घूमिए मोदी जी के चरित्र के बारे में हजारों लोग बतियाते हुए मिल जाएंगें।

    मुझे इस बात से बिलकुल विरोध नहीं कि देश के नागरिकों को अपने चुने हुए प्रतिनिधि को लाते बाते सुनाने, व्यंग्य कसने आदि का अधिकार नहीं। बिलकुल है, नागरिक सत्ता सौंपते हैं तो उन्हें अपने प्रतिनिधि के बारे में मूल्यांकन करने, लाते-बातें सुनाने का पूरा अधिकार है। फिर मोदी जी तो भारत के पहले ऐसे लोकतांत्रिक मूल्यों वाले राजनेता है जो स्वयं ही लोगों से कहते हैं कि यदि इतने दिनों में ऐसा या वैसा न हो तो मुझे चौराहे में जूते मार लेना।

    भाजपा के नेताओं को ही लीजिए, जब सरकार में नहीं होते तो धरना करते हैं, प्रदर्शन करते हैं, जिसकी सरकार होती है उसकी हर बात का विरोध करते हैं। वह बात अलग है कि जब खुद सरकार में आते हैं तो सरकार में नहीं होने पर जिस बात का विरोध करते थे, उसी बात को और अधिक शिद्दत के साथ करते हैं। इन सभी बातों को कोई कहे या न कहे, लेकिन सभी जानते समझते हैं। भाजपा के नेता, समर्थक व भक्त लोग भी जानते समझते हैं।

    भाजपा, संघ व मोदी जी भारतीय समाज के लोगों की सोच, मानसिकता व चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और विशेषज्ञ हैं।। लोगों के चरित्र को घुमाना-फिराना, उठाना-बिठाना, सुलाना-जगाना सभी कुछ बहुत ही बढ़िया से जानते हैं। उदाहरणस्वरूप देख लीजिए नोटबंदी को भूल गए लोगबाग।

    इस पोस्ट को लिखने का मकसद इन सब बातों की चर्चा करना नहीं है। लेकिन चूंकि इन बातों की चर्चा किए बिना आगे की बात कही ही नहीं जा सकती है, इसलिए करना पड़ रहा है। खैर आते हैं पोस्ट की असल बात पर…।

    —-

    आपमें से बहुत ही कम लोग ऐसे होंगे जिनको भारत के सामाजिक क्षेत्र के सेलिब्रिटियों को असल जीवन में जानने समझने का अवसर मिला होगा। अवसर भी तो तब मिलता जब आपने अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर कभी कुछ करने का सोचा होता।

    मैं सामाजिक सेलिब्रिटी उनको कहता हूं, जिनको सामाजिक क्षेत्र में काम करने के लिए नोबेल, मैगसेसे आदि जैसे पुरस्कार मिले, जो पादें या हगें या खांसे तो खबर बने या जिनकी संस्थाओं का टर्नओवर करोड़ों/अरबों का है या जो हर सप्ताह/महीना विदेश भाषण देने पहुंचते रहते हैं।

    यहां मैं उन अवसरों की बात नहीं कर रहा जो रोजगार की तलाश में या कुछ साल सेलिब्रिटियों को तेल-मालिश करके अपने लिए पहचान व लंबी ग्रांट आदि का जुगाड़ तलाशने या बनाने की देन होते हैं या इन जैसे एजेंडों से जुड़े होते हैं।

    मैं उन अवसरों की बात कर रहा हूं जिन्होंने निर्णय पूर्वक सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यों, आंदोलनों आदि को समझने के लिए इन सेलिब्रिटी लोगों के ढांचों में बिलकुल निचले स्तर पर रहकर काम करने का प्रयास किया।

    आपमें से शायद ही कोई ऐसे अवसर पाने के लिए प्रयास करता हो, गंभीर हो। ऐसा हो पाने के लिए अंदर की मजबूत सोच वाली ताकत चाहिए होती है, अहंकार की कमी चाहिए होती है। सबसे बड़ी बात समाज को नजदीक से समझने का भयंकर जज्बा व प्रतिबद्धता चाहिए होती है।

    भले ही आप जीवन व समाज को व्यवहारिक रूप से समझने के प्रति ईमानदार, गंभीर, जज्बेधारी व प्रतिबद्ध नहीं हों। लेकिन चूंकि आपमें से अधिकतर लोग तर्क वितर्क कुतर्क के विशेषज्ञ हैं और इन तत्वों को आलोचना, समालोचना जैसे खूबसूरत नामों से अलंकृत भी करते हैं। कुछ तो अपने बौद्धिक अहंकार को तुष्ट करने के लिए लंबी-लंबी पोस्ट लिख कर यह भी साबित करते हैं कि कैसे फेसबुक में बिना जमीन में कुछ किए हुए भी लिखना, बहुत बड़ा सामाजिक काम है, महानता है, सामाजिक परिवर्तन वाली प्रतिबद्धता है।  इसलिए आगे मैं जो लिखने जा रहा हूं वह आप मोटे तौर समझ ही जाएंगें ऐसी आशा मैं रखता हूं।

    आपको शायद नहीं भी पता हो सकता है कि भारत में सामाजिक प्रतिबद्ध लोग व सामाजिक क्रांतिकारी लोग कुकुरमुत्तों की तरह यहां-वहां जहां-तहां उगे हुए मिल जाते हैं।

    कोई NGO वाला होगा जिसने बीसियों साल भ्रष्टाचार व दलाली करके पैसे बनाए होगें, आदिवासी लड़कियों का यौन शोषण किया होगा, ग्रांट पाने के लिए आदिवासी लड़कियों को परोसा होगा, सरकारी विभागों को ग्रांट पाने के लिए कमीशन दिया होगा, फर्जी बिल वाऊचर लगाए होगें। वह एक दिन देश भर में घूम-घूम कर मानवाधिकारों की बात करना शुरू कर देता है, लोग हाथों हाथ लेते हैं यहां तक कि उसके नाम का रिफरेंस देते हुए खुद को जमीनी समझने के गौरव में जिएंगे और तो और अपने शोधों में भी उसकी बातों का रिफरेंस देते हैं।

    छोड़िए इन जैसे टटपुंजिए NGO वाले दुमछुल्ले लोगों को, खाने कमाने दीजिए, खुद को बड़ा आदमी मानने की कुंठा में जीने दीजिए व बैठने लायक जगह बनाने दीजिए। बात करते हैं बड़े पुरस्कारों व बड़े नामों वाले सेलिब्रिटी लोगों की।

    तो गैर-पंचसितारा व गैर सात-सितारा फार्महाउस टाइप वाले सामाजिक सेलिब्रिटी लोग शुरुआत तो जमीनी कामों से करते हैं, लेकिन मन के भीतर एजेंडा कुछ और रहता है। इसलिए किए गए कामों के लिए किसी भी जुगाड़ से मीडिया पब्लिसिटी करते हैं। मीडिया में सेटिंग करते हैं। बड़े नाम वालों के साथ जुड़ते हैं, वह अलग बात है कि पुरस्कार पाने या सेलिब्रिटी बनने के बाद उनको लतिया देते हैं। जैसे मोदी जी ने आडवाणी जी व मुरली जी को कोने में टरका दिया। शुरुआत के लिए गुजरात विकास को प्रायोजित किया।

    पुरस्कार मिलने व सेलिब्रिटी बनने के बाद काम करना बिलकुल बंद। कहीं भी कोई भी मुद्दा हो, विशेषज्ञ बनते हुए प्रेस कान्फेरेंस करते हैं, टीवी चैनल्स में ज्ञान बाटते हैं। मुद्दों को गहराई से बिना समझे जो भी समझ में आया या विरोध या समर्थन जो भी करना हुआ उसके आधार पर घुमा फिराकर लछ्छेदार तरीके से बातें बोलते हैं। मतलब यह कि काम न करने के बावजूद काम कर रहे हैं ऐसा जोरशोर से प्रायोजित करने में लगे रहते हैं। इन्हीं की तरह मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद काम बंद कर दिया, केवल काम करते हैं ऐसा प्रायोजित करने में लगे रहते हैं, इसके लिए नारे देते हैं, मीडिया का प्रयोग करते हैं, भाषणबाजी करते हैं।

    अपने मित्रों व चेले चपाटों के माध्यम से लाखों-करोड़ों के वारे-न्यारे करते रहने के बावजूद खुद को फकीर व समाज के लिए त्यागी महात्मा के रूप में जबरदस्त तरीके से प्रायोजित किए रहते हैं। फोटो व मीडिया का तो इतना नशा होता है कि मोदी जी की सेल्फी-दीवानगी इनके नशे के आगे बौनी है। जैसे मोदी जी अपने फेवर में रिपोर्ट्स प्लांट करवाते हैं, वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग अपने फेवर में रिपोर्ट्स प्लांट करवाते हैं।

    जैसे मोदी जी अपने आगे किसी को पनपने नहीं देना चाहते हैं, बिलकुल वैसे ही सेलिब्रिटी लोग अपनी संस्था में अपने आगे किसी को पनपने नहीं देते हैं। भाजपा व मोदी जी तो इस मामले इन सेलिब्रिटियों की तुलना में बहुत अधिक लिबरल व लोकतांत्रिक हैं।

    जैसे मोदी जी विदेश के दौरों में सरकारी धन खर्च करके जाते हैं। वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग ग्रांट या लोगों से मिले पैसे से विदेश के दौरों पर जाते हैं, लेकिन अपने चेले चपाटों को यह बताते हैं कि उनको विदेश से खर्चा पानी मिला था, जबकि या तो ग्रांट का पैसे का अकाउंट एडजस्टमेंट होता है या किसी भक्त के खर्चे पर या विदेश में रहने वाले चेले-चपाटों के खर्चे पर जाते हैं। बहुत ही कम बिलकुल न के बराबर ही ऐसी घटनाएं होती हैं जब सेमिनार के आयोजकों ने सच में खर्चा पानी दिया हो।

    जैसे मोदी जी अपने चेलों के बुलावे पर राक-डांस करने जाते हैं, वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग अपने चेलों के बुलावे पर किसी यूनिवर्सिटी में दो चार लोगों को लेक्चर देने रूपी कान्फेरेंस करने पहुंच जाते हैं। बेसिकली यह होता है हालीडे/पर्यटन ही।

    खैर कितना लिखा जाए, मोटा-मोटी यह समझिए कि मोदी जी अभी बच्चे हैं इन सामाजिक सेलिब्रिटियों के सामने। मोदी जी इन सामाजिक सेलिब्रिटियों की तुलना में कम धूर्त हैं क्योंकि मोदी जी का खाया पिया दिखता है, मोदी जी का नाम लेकर मैं यह पोस्ट लिख सकता हूं लेकिन मेरी यह औकात नहीं कि मैं जिन-जिन सेलिब्रिटियों का खाया पिया अघाया जानता हूं उनका नाम लेकर यह पोस्ट लिख पाऊं।

    रातदिन कारपोरेट को गरियाने वाले ये सामाजिक सेलिब्रिटी लोगों के घर का चम्मच भी कारपोरेट के धन से खरीदा गया होता है। उनके बच्चों की नैपी, चाकलेट व पेंसिल भी कारपोरेट के पैसे से आती है। लोकतंत्र का रट्टा लगाने वाले ये सामाजिक सेलिब्रिटी लोग निहायत ही साम्राज्यवादी सोच के होते हैं।

    यदि तुलनात्मक बात की जाए तो ऊपर बताए गए किस्म के NGO वाले लोगों, प्रायोजित आंदोलनों वाले लोगों तथा सेलिब्रिटी लोगों की जिसकी जो औकात व स्तर है, उस औकात व स्तर पर ये लोग मोदी जी की तुलना में बहुत अधिक भयावह हैं, खतरनाक हैं। आप मानें या ना मानें लेकिन इन्हीं लोगों के कारण आम समाज के लोगों की मानसिकता बदलती है और देश के लोग मोदी जी को प्रधानमंत्री चुनने व देश का कर्णधार अवतार मानने में गर्व का अनुभव करते हैं।

    हमारे समाज व देश के लोकतंत्र के लिए मोदी जी कोई खतरा नहीं, अपने समाज से इन जैसे NGO वालों, सेलिब्रिटी लोगों को नियंत्रित कर लीजिए, इनको ईमानदार, विशेषज्ञ व आदर्श मानना बंद कर दीजिए। मोदी जी जैसे लोगों का चरित्र अपने आप बदला हुआ ही मिलेगा। लेकिन हम आप इन्हीं सामाजिक सेलिब्रिटी लोगों के आधार पर, इन्हीं पर अंधा विश्वास करते हुए अपना माइंडसेट तय करते हैं।

    जब इतनी बात कर ही रहा हूं तो लगे हाथ यूनिवर्सिटी के छात्रों व छात्र नेताओं की बात भी कर ली जाए। अपवादों में भी अपवाद की बात यदि छोड़ दी जाए तो जिन छात्रों ने अपने छात्र जीवन में छात्रों व सामाजिक मुद्दों के नाम धरना प्रदर्शन किए होते हैं, पुलिस की लाठी खाई होती है वे सभी अपने जीवन में निहायत धूर्त, भ्रष्ट व चालबाज लोग ही निकलते हैं। दरअसल धरना करना, प्रदर्शन करना, नारे लगाना, पुलिस की लाठी खाना यह सब निवेश की तरह होता है जो या तो कैरियर के लिए होता है या फिर नाम-पहचान की वाहवाही के लिए होता है।

    अब आप कहेंगे कि नौकरशाहों के बारे में कुछ न लिखा। इस मसले पर मेरा सिर्फ यही कहना है कि भारत में सामाजिक सेलिब्रिटी, राजनेता, छात्रनेता, व्यापारी आदि मने जो कोई भी जो कुछ भी करता है वह सब नौकरशाही की रची हुई दुनिया में करता है। नौकरशाह ईश्वर है, सृष्टि का रचयिता है। इनकी माया जितनी समझें उतनी ही घुसी हुई मिलेगी।

    फिर भी हर क्षेत्रों की तरह इन लोगों में भी अपवाद होते हैं। अपवादों में भी अपवाद ऐसे होते हैं जो यह सब जीवन, समाज व ढांचों आदि की समझ विकसित व जीवंत अनुभव लेकर मानसिक रूप से समृद्ध होने के लिए करते हैं। ऐसे अपवाद लोगों की तासीर आपको अलग ही दिखेगी यदि आपको व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने की जरा सी भी समझ होगी और आप सभी के प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं रखते हैं, तो।

    अंत में मैं सिर्फ यह लिखते हुए कि “ये सभी लोग निकलते किस समाज से हैं”, पोस्ट को अपूर्ण छोड़ रहा हूं, आप अपनी-अपनी समझ के अनुसार स्वयं पूर्ण कर लीजिए।

    .

  • माओ त्से-तुंग वाले मसले पर एक और उठापटक-बेबाक-लेख – जो गंभीर हैं, लोकतांत्रिक दृष्टि रखते हैं, उनको लेख खराब न लगेगा

    सामाजिक यायावर

    भारत में कस्बाई व शहरी लोग अंग्रेजी भाषा को पहली कक्षा से पढ़ना शुरू कर देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में छठवीं कक्षा से अंग्रेजी शुरू होती थी। अब तो खैर हर गली नुक्कड़ में अंग्रेजी मीडियम व तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय स्कूल खुल गए हैं। पहली कक्षा से बारहवीं तक अंग्रेजी भाषा-विषय के रूप में साथ चिपकी रहती है। स्नातक में भी अंग्रेजी भाषा को सामान्य विषय की तरह उत्तीर्ण करना पड़ता है। इंजीनियरी जैसी प्रोफेशनल डिग्रियों की पढ़ाई तक में अंग्रेजी एक विषय की भांति चिपकी रहती है, वह भी तब जबकि डिग्री की पढ़ाई लिखाई तो अंग्रेजी में ही होती है।

    अंग्रेजी हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में भी समाहित है। गावों के निरक्षर लोग भी अपनी भाषा में बिना जानकारी के अंग्रेजी के कई शब्दों का प्रयोग करते हैं। कुल मिलाकर मतलब यह कि अंग्रेजी हमारे सामाजिक जीवन में रचीबसी हुई है। जो अंग्रेजी बोलता है उसको संभ्रांत व योग्य मान लिया जाता है। अंग्रेजी में संभ्रांतता, योग्यता, क्षमता व शक्ति निहित मानी जाती है।

    इतना सब होने व बचपन से पढ़ाई पूरी करने तक मतलब लगातार कम से कम लगभग 15 वर्षों तक अंग्रेजी पढ़ने बोलने व लिखने के बावजूद गंभीर अंग्रेजी को पढ़ने समझने बोलने व लिखने में अच्छे-अच्छे पुरोधा पानी मांगते हैं, जबकि अंग्रेजी बहुत समृद्ध व परिष्कृत भाषा नहीं है। जो अंग्रेजी से स्नातक, परास्नातक किए होते हैं उनकी भी हालत कमोवेश ऐसी ही होती है। अपवादों की बात अलग है, अपवाद नियम बनाते भी नहीं हैं।

    आप माओवाद, माओ, साम्यवाद पर बात कीजिए। JNU के लोग मक्खियों की तरह भिनभिनाते हुए आ जाएंगें। उनमें से बहुतेरे तो फूहड़ तरीके से धमकाएंगे कि JNU के हैं इसलिए चीन, माओ, माओवाद, साम्यवाद को समझते हैं। भिनभिनाते हुए आपके साथ सड़कछाप, सड़ियल, सतही, बेशर्म व बेहूदा व्यवहार करेंगे, शाब्दिक गुंडई करेंगे।

    JNU छोड़िए जो JNU की कैंटीन में जाकर चाय पी लेता है, जो उसकी चहारदीवारी को छू लेता है या कभी उसकी बाहरी दीवारों में सटकर पेशाब भी कर आता है वह भी अपने को विचारक, चिंतक, विद्वान व सामाजिक मसलों का विशेषज्ञ मान लेता है।

    इसलिए JNU या JNU के जैसे ठेकेदारों से मेरा फिलहाल इतना ही कहना है कि गंभीर बात कीजिए। JNU एक बौद्धिक सामंतवादी संस्थान है। कोशिश कीजिए कि JNU-वादी सामंती सोच से बाहर आकर आदमी की तरह बात कीजिए, तहजीब व तमीज से बात करने का प्रयास कीजिए।

    JNU भारत को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति का स्वातंत्र्य, मानवाधिकार आदि मूल्य सिखाता है, भारत के लोगों को जीवन जीना JNU सिखाता है, इस प्रकार की नीचता पूर्ण अहंकार से बाहर आकर अपनी बात रखिए।

    आपके व्यवहार से ही JNU का स्तर साबित होता है। पिछले लगभग दो दशकों में, अपवाद प्रतिशत लोगों को छोड़कर JNU के लोगों से बातचीत व चर्चाओं के बाद ही मैं JNU को एक रद्दी यूनिवर्सिटी मानने के नतीजे पर पहुंचा हूँ।

    समय समय पर JNU के ऊपर कई लेख लिखता रहा हूं। आपके अनुसार आपको शोध करने व रिफरेंसेस खोजने की क्षमता योग्यता व धैर्य तो है ही, मेरे इन लेखों की लिंक खोज सकते हैं, सामान्य आदमी हूं लिंक्स बहुत सरलता से मिल जाएंगीं। फेसबुक के कारण ये लेख मैंने बस यूं ही प्रथम दृष्टया ही लिखे थे। चाहेंगे तो गहराई से लिख कर भी आइना दिखा सकने की क्षमता व योग्यता रखता हूं। लेकिन यह सब ऊर्जा बर्बादी है।

    मान लीजिए यदि आप JNU के भी हैं और यदि आपने JNU में चीनी भाषा पढ़ी है, माओ से संबंधित साहित्य भी पढ़ा है तब भी आप अपनी बात सहजता से ही रखिए। ऐसा क्यों कह रहा हूं, यह समझने के लिए आपको आगे की पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ना पड़ेगा।

    पहली बात तो यह है कि चीनी भाषा वर्तमान युग की भाषाओं की सबसे क्लिष्ट, समृद्ध व परिष्कृत भाषाओं में से है। वास्तव में यदि ध्यान से देखा जाए तो चीनी भाषा जैसी कोई भाषा है भी नहीं। चीन में कई भाषाएं हैं लेकिन चीनी भाषा जैसी कोई भाषा नहीं है।  फिर भी आपके JNU-सामंती-बौद्धिक अहंकार की तुष्टि के लिए मान लेते हैं कि चीन की भाषा एक ही है, उसका नाम चीनी-भाषा ही है और आपने JNU से स्नातक/परास्नातक में चीनी भाषा पढ़ी है। आपकी सहूलियत के लिए वह सब भी जो “नहीं है”, उसको “है” ऐसा मान भी लेते हैं तब भी …..

    जब बचपन से पहली कक्षा से हर साल प्रमुख विषय के रूप में अंग्रेजी पढ़ते हुए, स्नातक परास्नातक में, कम्पटीशन की तैयारी करते हुए, इंजीनियरी आदि जैसे कोर्सेस की किताबें अंग्रेजी में पढ़ते हुए, अंग्रेजी फिल्में देखते हुए, अंग्रेजी अखबारों को पढ़ते हुए, सड़क में चलते हुए अंग्रेजी के होर्डिंग्स को देखते हुए, अंग्रेजी जैसी भाषा को ठीक से समझ नहीं पाते तो चीनी भाषा जैसी क्लिष्ट, समृद्ध व परिमार्जित भाषा के विद्वान आप महज दो चार वर्षों में ककहरा टाइप सीखते हुए कैसे हो सकते हैं। फिर चीन में कई प्रमुख भाषाएं हैं जो एक दूसरे से भिन्न हैं।

    भाषा के संदर्भ में एक जरूरी बात और कहना चाहता हूं। जिस भाषा या जिन भाषाओं के संपर्क में बच्चा अपने पैदा होने के दिन से रहता है, वही भाषाएं जीवन भर उस बच्चे की मौलिक भाषाएं होती हैं, भाषाओं के नुक्ते समझ आते हैं, साहित्य समझ आता है।

    पहले हिंदी को ही ठीक से समझना सीख लीजिए, चीनी भाषा पर अपनी विद्वता व विशेषज्ञता की चर्चा फिर कभी कर लीजिएगा, अभी उचित अवसर नहीं है।

    अब JNU के माओ-भक्तों व गैर-JNU के माओ-भक्तों से जो यह मानते हैं कि उनने माओ के बारे में पढ़ा है उनके बारे में भी कुछ खरी-खरी दो टूक बात कर ली जाए। 

    ये लोग इस गलतफहमी में रहते हैं या अपनी कंडीशनिंग के कारण मूर्खता में विद्वता देखते हुए गलतफहमी प्लाँट करते रहते हैं कि दुनिया के लोकतांत्रिक देश (ये लोग इनको साम्राज्यवादी देश कहते हैं) माओ त्से-तुंग के विरोध में सूचनाएं प्लांट करते हैं।

    इन लोगों से मैं यही कहना चाहता हूं कि जनाब आपके भगवान माओ त्से-तुंग ने जैसा भी चीन बनाया है वह बहुत ही वीभत्स-कारपोरेट साम्राज्यवादी देश बनाया है। आपके माओ का चरित्र साम्राज्यवादी था, चीन देश को निहायत ही बर्बर चरित्र का कारपोरेट ही संचालित करता है। चीन का कारपोरेट साम्राज्यवादी देशों के कारपोरेट की तुलना में ज्यादे केंद्रित सत्ता रखता है।

    अपनी सोच, मानसिकता की कंडीशंडनिंग व एक्सपोजर के छोटे-छोटे कुंठित दड़बों से बाहर निकल कर दुनिया को उसकी मौलिकता के साथ बिना पूर्वाग्रहों व अनुमानों के देखने समझने का प्रयास कीजिए। चीन व माओ का यथार्थ समझ पाने की दृष्टि आनी शुरू हो जाएगी। लोकतंत्र बेहतर लगने लगेगा। लोकतंत्र को परिमार्जन की ओर ढाला जा सकता है, माओवाद को कतई नहीं। हिंसा व बर्बरता में परिमार्जन की कोई संभावना नहीं होती, हो ही नहीं सकती।

    जैसे भारत कागज में लोकतांत्रिक देश है लेकिन असल में लोकतांत्रिक देश नहीं है, भारत के लोग अभी लोकतांत्रिक मूल्यों का ककहरा भी नहीं समझते हैं। वैसे ही चीन कागज में साम्यवादी व्यवस्था के देश है लेकिन असल में वीभत्स व बर्बर कारपोरेट साम्राज्यवादी देश है। अब इस बात के लिए रिफरेंस मांगने की मूर्खता न कीजिएगा। क्योंकि यह समझने की बात है, महसूस करने की बात है, एक्सपोजर की बात है, दृष्टि की बात है।

    जो चीन सत्ता के लिए माओ के निर्देशन में अपने ही 7 करोड़ लोगों की हत्या कर सकता है। जो चीन 1989 में अपने ही छात्रों के शांतिप्रिय आंदोलन के खिलाफ कई लाख सैनिक उतार सकता है और चारों तरफ से घेर कर हजारों मासूम छात्रों की हत्याएं कर सकता है।

    वह चीन आपकी यूनिवर्सिटीज में साहित्य, दस्तावेजों व किताबें नहीं प्लांट नहीं करेगा। इसकी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं आप। इसलिए प्लांटेड किताबों व दस्तावेजों के दम पर कूदिए मत। वास्तव में जानने समझने महसूस व दृष्टि विकसित कर पाने के विभिन्न स्तरों पर स्वाध्याय कीजिए, तभी कुछ गंभीर चर्चा कर पाने लायक दृष्टि रख पाएंगे।

    जरूरी नहीं कि सभी लंपट ही हों, सभी खोखले ही हों, सभी सतही ही हों। दुनिया में गंभीर लोग भी हैं, दृष्टिवान लोग भी हैं, ऐसे लोग भी हैं जो सामाजिक मसलों को गहराई से भेद कर देख व समझ लेने की क्षमता व दृष्टि विकसित कर लिए होते हैं।

    चीन व माओ के ऊपर चीन के ही गंभीर चिंतक लोगों ने चीन के ऐतिहासिक दस्तावेजों को पढ़ने समझने, चीन के समाज को नजदीक से जानने समझने के बाद निष्पक्ष भाव से अच्छी किताबें लिखी हैं। यदि आपकी पहुंच, हैसियत व औकात है, इन किताबों का इंतजाम कर पाने की तो इनको पढ़िए। कुछ नहीं तो कम से कम चीन के दूसरे चेहरे का अंदाजा होगा। चीन के लोगों की वैचारिक विभिन्नता के बारे में पता चलेगा।

    जो चीन शांति प्रदर्शन को रोकने के लिए लाखों सैनिक उतार देता हो, जो चीन भविष्य में आंदोलनों की संभावनाएं के भ्रूण को भी खतम करने के लिए अपने ही हजारों मासूम युवा छात्रों को चारों तरफ से घेरकर गोलियों से भून कर हत्याएं करता हो।

    वह चीन स्वतंत्र किताबें व दस्तावेज लिखने की इजाजत देता होगा, इस बचकानी कल्पना को सच मानने वालों के वैचारिक स्तर पर चर्चा करना भी ऊर्जा बर्बादी है। JNU, माओवादी समर्थक, माओ-भक्त व साम्यवाद-माओवाद को एक ही मानने वाले चीन की प्रायोजित व प्लांटेड किताबों, साहित्य व दस्तावेजों के मायाजाल व कंडीशनिंग में सच कितना व किस स्तर का जानते समझते होगें, इसका अंदाजा लगाना बिलकुल मुश्किल नहीं।

    चलते-चलते :

    जो माओ व माओवाद का समर्थक/भक्त है, वह ढोंग चाहे जैसा करे तर्क चाहे जो दे लेकिन अपने वास्तविक चरित्र में निहायत ही हिंसक, बर्बर, फरेबी, झूठा व रक्तपिपाशु है।

    .

  • अखिलेश यादव और उत्तरप्रदेश

    Vivek सामाजिक यायावर

    मुझे नहीं पता कि कौन जीतेगा, कौन हारेगा, किसकी सरकार बनेगी किसकी नहीं बनेगी। यूं लगता है कि जिस तरह लोकसभा चुनाव में लोगों का माइंडसेट स्विंग हुआ था, यदि वैसी पुनरावृत्ति होती है तो “बसपा+भाजपा” की सरकार बनेगी।

    यदि यह पूछा जाए कि मेरी इच्छा क्या है तो मेरी इच्छा अखिलेश जी को एक बार और मुख्यमंत्री के रूप में देखने की है। मैं किसी राजनैतिक पार्टी का नहीं हूं। भारत से दूर आस्ट्रेलिया में रहता हूं यहीं का स्थाई निवासी हूं, भारत में अपना कार्यक्षेत्र बिहार, छत्तीसगढ़ व राजस्थान आदि राज्यों के आदिवासी व दलित क्षेत्र होने के कारण कोई फर्क भी नहीं पड़ता कि उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनती है या नहीं।

    जैसे मैं छत्तीसगढ़ राज्य में डा० रमण सिंह जी के बारे में यह मानता हूं कि मुझे बस्तर क्षेत्र के संदर्भ उनके में प्रशासनिक निर्णय, समाधान व विकास के रचनात्मक प्रयासों में गंभीरता व इच्छाशाक्ति दिखती है। बहुत लोग मेरी इस बात से वास्ता नहीं रखते, लेकिन मैं यह अपने जमीनी अनुभवों के आधार पर मानता हूं। जैसे मैं बिहार में नितीश कुमार जी को तुलनात्मक बेहतर मुख्यमंत्री मानता हूं। वैसे ही मैं उत्तर प्रदेश के लिए अखिलेश जी को बेहतर राजनेता मानता हूं।

    मेरा यह लेख चुनावी हथकंडों से इतर सीधी सपाट बात कहने के लिए है। उत्तर प्रदेश व देश को सुलझे हुए राजनेताओं की जरूरत है जो सभी के लिए विकास के कार्य करें, घृणा व नफरत की बात न करें, संवेदनशील हों व प्रगतिशील सोच रखते हों। महिलाओं के प्रति सुलझी हुई सोच हो। पर्यावरण के मसलों पर बेहतर समझ हो। युवा हों, सच में ही पढ़े लिखे हों, देश दुनिया विज्ञान व तकनीक आदि की मूलभूत समझ हो, तार्किक हों।

    चुनावी राजनीति के प्रचार हथकंडों व टटपुंजिया पैंतरेबाजी से इतर यदि देखा बूझा समझा जाए तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश जी एक सुलझे हुए संवेदनशील राजनेता के रूप में उभर कर आए हैं।

    यदि व्यक्तिगत व जातिगत स्वार्थ से ऊपर उठ कर देखा जाए तो वैसे भी उत्तर प्रदेश में जो अन्य राजनेता हैं उनकी सोच व समझ व संवेदनशीलता अखिलेश जी से बेहतर दिखाई नहीं देती। वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसी कल्पनातीत तत्व की तो बात ही छोड़ दीजिए।

    ऐसे में यदि यह मानने में कोई नुकसान नहीं कि अखिलेश जी को उनके चाचाओं आदि ने अखिलेश जी के मन के अनुसार काम करने में बाधाएं दीं, अखिलेश जी के हाथ बंधे रहे। एक अवसर अखिलेश जी को देने में कोई हर्ज नहीं। ऐसा नहीं है कि अखिलेश जी की तुलना में बहुत बेहतर सोच समझ दृष्टि व संवेदनशीलता के राजनेता उत्तर प्रदेश की राजनैतिक सत्ता की दौड़ में हैं तो अखिलेश जी को अवसर देने में ऐतिहासिक नुकसान होगा।

    यह महसूस करते हुए भी कि “बसपा+भाजपा” की ही सरकार बनने की संभावनाएं अधिक हैं, मेरी इच्छा यह है कि उत्तर प्रदेश को अखिलेश जी को एक बार भरपूर अवसर देकर देखना चाहिए। पिछले पांच वर्षों में उन्होंने कुछ ऐसा तो किया नहीं है कि आगे के पांच वर्षों में पहाड़ टूट जाएगा या प्रदेश अंधेरे गलियारों में खो जाएगा।

    पूरे देश की राजनीति फूहड़ है, इसलिए उत्तर प्रदेश में भी थोड़ी बहुत राजनैतिक फूहड़ता होती रही तो यह कोई विशेष बात नहीं, विशेष बात यह है कि अन्य बड़े राज्यों की तुलना में फूहड़ता कम हुई।

    मैं अखिलेश जी की कुछ कामों के लिए उनका तहेदिल से शुक्रिया करता हूं। ये उनके वे काम हैं जिनके लिए मैं उनको पसंद करता हूं।

    छात्रों को लैपटाप बांटने की योजना

    इसको मैं बहुत दूरदर्शी व जबरदस्त योजना की श्रेणी में रखता हूं। यदि चुनावी राजनैतिक फूहड़ता के कारण जबरन इस योजना का विरोध न किया जाए तो यह बहुत ही शानदार योजना है, दूरगामी परिणाम बहुत ही बेहतर हैं। यह योजना क्यों बेहतर है, सभी अपने दिलों में भलीभांति समझते हैं वह बात अलग है कि हमें अपना स्वार्थ अपने बच्चों के भविष्य से अधिक प्यारा है और हम इस योजना को गरियाते हैं। कुछ लोगों का तर्क यह है कि पब्लिक का पैसा है। तो भई पब्लिक का पैसा तो हर सरकार ही प्रयोग करती है। तब तो किसी सरकार को अच्छा नहीं कहा जा सकता है। इसलिए यह तर्क बेमानी लगता है।

    शिक्षा मित्रों को स्थाई टीचर बनाने वाली योजना

    मैं हमेशा कहता रहा हूं कि जब काम समान है, स्तर समान है, चरित्र समान है तब वेतन व अधिकारों में इतना भेदभाव क्यों। यह अलोकतांत्रिक है, गलत है। मुझे बहुत ही अच्छा लगा था जब शिक्षामित्रों को स्थाई टीचर बनाने की घोषणा हुई। कुछ लोगों ने नुक्ते फंसाए, योजना उलझी। लेकिन यह योजना है काबिलेतारीफ।

    सड़कें

    वैसे तो बहुत लोग रटीरटाई कहावतों का प्रयोग करते हैं कि उत्तर प्रदेश की सड़कें खराब हैं। सच यह है कि उत्तर प्रदेश में अच्छी सड़कें हैं। सड़क निर्माण में भयंकर भ्रष्टाचार के बावजूद, अच्छी सड़कों का काम पिछली कई सरकारों ने किया है। लेकिन अखिलेश जी की सरकार ने सड़कों की गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा। सड़कों की कुछ बड़ी महात्वाकांक्षी योजनाएं भी उपलब्धि रही अखिलेश जी की सरकार की।

    तालाब

    अखिलेश जी की सरकार ने तालाबों पर विशेष ध्यान दिया जो किसी भी पिछली सरकार ने न दिया। यह बात अलग है कि स्थानीय लोगों व स्थानीय नौकरशाहों की मिली भगत के कारण तालाब वाली योजनाओं की उपलब्धि उतनी नहीं रही जितनी होनी चाहिए थे। लेकिन यदि अन्य राज्यों जहां तालाबों पर सरकारी योजनाएं बनी हैं उन सरकारी तालाब योजनाओं की तुलना में उत्तर प्रदेश की तालाब योजनाओं का आउटपुट अच्छा रहा है। कम से कम अखिलेश जी ने तालाबों के बारे में सोचा व जिन जमीनी कार्यकर्ताओं ने तालाब मुद्दों पर चर्चा की, उसका मान रखा, सम्मान रखा व य़ोजनाओं को स्वीकृति दी। यह अखिलेश जी की सोच व संवेदनशीलता को व्यक्त करता है।

    किसान व कृषि

    पूरे भारत में ही किसान व कृषि को सबसे उपेक्षित रखा जाता है। वास्तव में जो नौकरशाह हैं, जो कृषि वैज्ञानिक हैं, जो राजनेता हैं उनको पता ही नहीं कि किसान व कृषि के लिए क्या किया जाए। इसके बावजूद अखिलेश जी की कुछ छोटी-छोटी योजनाएं बहुत अच्छी रहीं। इनमें से एक योजना गावों में किसान बस चलाने की भी रही। किसानों के लिए ग्रामीण बसें जिनमें किसान अपना सामान लाद कर यात्रा कर सकता है। ध्यान से देखा जाए तो ऐसी कई छोटी-छोटी योजनाएं मिल जाएंगी जो किसानों व ग्रामीणों के लिए रहीं हैं।

    बिजली

    विकास के मामले में मैं बिजली को अखिलेश जी की सरकार की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण उपलब्धियों में मानता हूं। मैने अपना पूरा छात्र जीवन बिजली कटौती झेलते हुए व्यतीत किया। कुछ इलाकों को छोड़ दिया जाए तो लगभग पूरे प्रदेश में बिजली की आपूर्ति जबरदस्त रही। बिजली के उत्पादन की दूरगामी योजनाएं आईं, आपूर्ति सही हुई। जो काम पिछले कई दशकों की सरकारें न कर पाईं वह अखिलेश जी के नेतृत्व ने कर दिखाया।

    योजनाएं तो और भी अच्छी रहीं। मैंने खुद कई लोहिया ग्रामों को देखा है, बहुत अच्छी योजना रही। यदि ईमानदारी से बात की जाए तो अखिलेश जी ने चाचाओं व यादवों की यादवगिरी के बावजूद तालमेल बिठाते हुए बेहतर काम या प्रयास करते हुए सरकार चलाई।

    रही बात यादवगिरी की तो इस सरकार में यादवगिरी बहुत कम रही, हां बदनाम बहुत अधिक किए गए। यदि सपा सरकार में यादवगिरी होती है तो मायावती जी की सरकार में दलितगिरी होती है। भाजपा में बनियागिरी व पंडितगिरी होती है। और यह सब चुनावी हथकंडे हैं कि अखिलेश जी की सरकार में अपराध बढ़े, मेरा साफ-साफ मानना है कि जिस राज्य में विकास के काम होते हैं वहां अपराध कम ही होते हैं, मैं दृढ़ता से मानता हूं कि अखिलेश सरकार में अपराध कम हुए हैं। पड़ोसी राज्यों से यदि तुलना की जाए तो उत्तर प्रदेश अपराध के मामलों में बौना लगेगा।

    दरअसल किसी समाज, राज्य व देश का विकास जाति, धर्म आदि जैसे फूहड़ चुनावी राजनैतिक टटपुंजियागिरी की फूहड़ता से भरे पच्चड़ों की बजाय लोगों के लिए किए गए दूरगामी कामों व कामों की नीवें रखने से होता है। धीरे-धीरे लोग समृद्ध होते हैं, समाज व देश समृद्ध होता है।

    .

  • बस्तर, छत्तीसगढ़ पर आने वाली पुस्तक का प्रस्तावना अध्याय

    अभी इस विमर्श को छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद वहां के आदिवासी समाज के लिए प्रतिबद्ध, ईमानदार व कल्याणकारी है या नहीं, यह भी छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद बस्तर के आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व वास्तव में करता है या नहीं, सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण तथ्य कि बस्तर का माओवादी, माओवाद को जानता समझता भी है या नहीं इस विमर्श को भी छोड़ देते हैं। मैं इस किताब में यह विमर्श विस्तार से करूंगा भी नहीं क्योंकि पूर्वाग्रहों से इस विमर्श के दूषित होने का खतरा है, भिन्न पूर्वाग्रहों के लोगों के दावे भिन्न होंगें। मैं इस किताब में बस्तर में चल रहे प्रयासों की तथ्यात्मक चर्चा करूंगा, पुस्तक को पढ़ने के पश्चात आप स्वयं ही बस्तर के माओवाद के संदर्भ में विमर्श कर सकने में सक्षम होंगें, ऐसी आशा मैं करता हूं।

    साम्यवादी विचारधारा को मानने वाले लोगों में यह विरोधाभास रहता है कि वे सत्ता के राजसी ढांचे को साम्यवादी ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति मानते हैं लेकिन सत्ता के साम्यवादी ढांचे को लोकतंत्रीय ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति नहीं मानते हैं, इसे क्रांति न मानने के लिए विभिन्न तर्क देते हैं जबकि यदि देखा जाए तो सत्ता के ढांचों में परिवर्तन की दोनों घटनाओं का चरित्र एक सा है तथा दोनों घटनाएं आम लोगों द्वारा घटित हुईं। यूं लगता है कि क्रांति को स्थापित करने के लिए क्रांति की परिभाषा को पूर्वाग्रह के अनुसार गढ़ लिया जाता है।

    माओवाद के संदर्भ में मूलभूत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति जिसने किसी चीटी को नहीं मारा होता है वह दूसरे व्यक्तियों की नृशंस हत्याएं करने में गौरव का अनुभव करने लगता है, स्वयं को परिवर्तन के महान यज्ञ में आहुति डालने वाला समझने लगता है, कैसे क्रांति में योगदान करने के लिए किसी की भी निर्दोष व मासूम की भी हत्या करने के लिए स्वयं में महिमामंडित करते हुए गौरवांवित महसूस करते हुए स्वीकृति प्राप्त कर लेता है!! आगे की चर्चा ऐसा क्योंकर होता है, समझने में मदद करती है।

    सत्ता को अपरिहार्य मानना तथा सत्ता परिवर्तनों को जिस रूप में प्रस्तुत किया जाता है या जाता रहा है, इस अनुकूलता के अंतर्गत बेहतर व्यवस्था के निर्माण के लिए सत्ता के ढांचों में परिवर्तन ही एकमात्र रास्ता दृष्टिगत होता है, जिसे क्रांति का नाम दिया जाता है जिससे संबद्धित व्यक्ति स्वयं को क्रांतिकारी कहता है। व्यक्ति के विचार, सोच व मानसिकता की अनुकूलता यूं कर दी जाती है कि व्यक्ति यह मानने लगता है कि वर्तमान व्यवस्था नष्ट करने से बहुत अधिक अव्यवस्था होगी जिसका उपयोग वर्गविहीन सामाजिक व्यवस्था में किया जा सकता है। वर्तमान व्यवस्था को भी अव्यवस्था ही माना जाता है। वर्गविहीन आदर्श सामाजिक व्यवस्था के निर्माण व निर्माण प्रक्रिया में लोगों की हत्याएं होना व करना तो महान क्रांति के लिए आहुति मात्र ही हुईं।

    क्रांति का सबसे भयावह तथ्य यह है कि वर्तमान में जीवन जीने वाले मनुष्यों के जीवन का मूल्य, भविष्य के अजन्में मनुष्यों के जीवन मूल्य की तुलना में नगण्य है, कमतर है। इतना नगण्य है कि जीवित मनुष्य के जीवन की हत्या, भविष्य के काल्पनिक मनुष्य के आभासी बेहतर भविष्य के लिए करते हुए, गौरव महसूस किया जा सकता है।

    भविष्य अनिश्चित होता है। काल्पनिक भविष्य के लिए वर्तमान की बलि चढ़ाना प्रपंच, तर्क-छद्म व प्रवंचना से इतर कुछ भी नहीं। क्रांतिकारियों को भविष्य के प्रति इतना निश्चिंत-विश्वास कैसे हो सकता है, वर्तमान में हत्याएं करते हुए, भय स्थापित करते हुए, मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करते हुए कैसे भविष्य में मानवीय व्यवस्था का दावा कर देते हैं? क्या हिंसा करना, हत्या करना, हथियार का प्रयोग करना, भय स्थापित करना इत्यादि से भविष्य को देख सकने व महसूस कर सकने की दृष्टा क्षमता विकसित होती है?

    माओवाद अच्छा हो सकता है, आदर्श हो सकता है, किंतु हिंसा आदर्श नहीं हो सकती, हिंसा अच्छा नहीं हो सकती, हिंसा अनुचित है, हिंसा अस्वीकार्य है, हिंसा प्रवंचना है, हिंसा आत्मछल है। अहिंसा उचित है, अच्छा है, इस तथ्य को कोई भी मनुष्य अस्वीकार्य नहीं कर सकता। माओवाद मनुष्य को मतवादी के रूप में बेसुध करके हिंसक बनाने व हिंसा करने में गौरवांवित महसूस करने की आत्म-प्रवंचना की ओर ढकेलता है। ऐसा मनुष्य बिना हिंसा के नहीं रह सकता, क्रांति के नाम पर ऐसा क्रांतिकारी मनुष्य हिंसा करता है, जो अनुचित है व अस्वीकार्य है।

    ऐसी क्रांतियां मात्र प्रतिक्रियाएं होती हैं, विपक्षी होने की प्रतिक्रियाएं, प्रतिक्रियाओं की प्रतिक्रियाएं। प्रतिक्रियाओं की शृंखला से इतर कुछ भी नहीं। प्रतिक्रियाओं, कल्पनाओं व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति वस्तुतः क्रांति हो ही नहीं सकती, इसे भले ही इसे कितना भी जोर लगाकर क्रांति का नाम दिया जाए।

    कल्पना व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति को कितना ही महिमामंडित किया जाए, कितना भी सुसंगत तर्क दे लिए जाएं, कितने भी ऐतिहासिक प्रमाणों से मेल खाती हो, समानता नहीं ला सकती है। इसको यूं समझने का प्रयास किया जाए कि कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से विश्व को बचाना चाहते हैं, कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से। बेहतर व आदर्श व्यवस्था बनाने के नाम पर एक दूसरे की परस्परता को खंडित करते हैं, एक दूसरे के अस्तित्व को जड़ सहित समाप्त करना चाहते हैं। जबकि वास्तव में इनमें से किसी को भी बेहतर समाज का निर्माण करने की अभिलाषा नहीं होती है वरन अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार व्यवस्था को मनचाहा आकार देना चाहते हैं, ऐसा कर पाने के लिए हिंसा, शक्ति, सत्ता, प्रपंच, छल, छद्म इत्यादि का प्रयोग करते हैं। कल्पना विलगाव पैदा करती है, दूसरे समूह व व्यक्ति को निम्न स्तर का मानती है।

    यह क्रांति केवल सत्ता पर एक समूह के स्थान पर दूसरे समूह को स्थापित कर देती है। नया सत्ताधारी समूह विभिन्न सत्ताओं को अपने अधिकार में कर लेता है। फिर एक नया उच्च वर्ग बनता है जो विभिन्न प्रकार के विशेष अधिकारों से स्वयं को शक्तिशाली बनाता है। क्रांतियों के नाम पर विभिन्न स्तरों पर व तौर-तरीकों से इसी प्रक्रिया का दुहराव चलता रहता है। सत्ता-क्रांति कभी भी विषमता न तो कभी नष्ट करती है और न ही नष्ट करने की अभिलाषा व क्षमता ही रखती है। सत्ता-क्रांति महत्वपूर्ण बन पाने का वंचना तंतु है, संपूर्ण रूप से प्रतिक्रिया या प्रतिक्रिया की शृंखला पर आधारित। प्रतिक्रिया संघर्ष उत्पन्न करती है तात्पर्य कभी समाधानित न होने वाला वैमनस्य व हिंसा, परस्परता की हत्या। इस प्रकार की क्रांति सार्थक, मानवीय व समता वाली कैसी हो सकती है?

    मोटे तौर पर वर्तमान साम्यवाद पूंजीवाद के विरोध पर आधारित है। साम्यवाद में आर्थिक समता की कल्पना परोसी जाती है, कल्पना परोसना इसलिए कह रहा हूं क्योंकि गहराई से समझने पर साम्यवाद का चरित्र भी पूंजीवादी चरित्र का ही है। साम्यवाद का पूंजीवाद राजकीय होता है, राजकीय-पूंजीवाद। पूंजीवाद चाहे व्यक्ति का हो, व्यक्तियों के समूह का हो या राज्य का हो, कभी समतापूर्ण व कल्याणकारी नहीं हो सकता, संभव ही नहीं।

    साम्यवाद ही नहीं, अभी तक समाजवाद व पूंजीवाद में भी जो अंतर माना जाता है वह यह कि पूंजी की स्वछंदता व शक्ति व्यक्ति के पास न होकर राज्य व शासन के पास रहती है। इसका बेहतर समाज व व्यवस्था निर्माण से कोई रिश्ता नहीं होता क्योंकि राज्य अपने आपमें कोई जीवंत वस्तु नहीं होता जो स्वयं को स्वतः संचालित करता हो। राज्य को व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह द्वारा ही संचालित किया जाता है। इस प्रकार नाम परिवर्तन के बावजूद शक्ति व सत्ता कुछ व्यक्तियों या व्यक्ति-समूहों के हाथ में ही केंद्रित रहती है।

    पूंजीवाद की ही तरह साम्यवाद का आधार भी आर्थिक ही है इसीलिए इसका मूल चरित्र भिन्न नहीं है। व्यक्ति के अंदर आर्थिक संपन्नता के लिए जो वासना रहती है, साम्यवाद की आर्थिक समता का आधार यही वासना है। साम्यवाद आधार प्रतिक्रिया है यही कारण रहा कि यह वर्ग विग्रह में लिप्त होकर एक ऐसा तंत्र बन गया जो मनुष्य का प्रयोग करता है तथा घृणा, द्वेष, हिंसा, हत्या आदि को आवश्यक व अनिवार्य मानने की कट्टरता रूपी आत्मछल को प्रवंचना के साथ कोरे आदर्श व गौरव के रूप में प्रतिष्ठित व पोषित करता है। पूंजीवाद व साम्यवाद में मूलभूत चारित्रिक अंतर नहीं।

    लोकतंत्र में मूलभूत आदर्श प्रबल होना चाहिए। राजकीय व शासकीय मानसिकता को लोकतंत्र का नाम देने तथा शास्त्रों में, दस्तावेजों में, भाषा में, तर्कों इत्यादि में लोकतंत्र-लोकतंत्र की रट लगाने से लोकतंत्र को झुठलाया ही जाता है। वास्तविक लोकतंत्र का मूलभूत आदर्श, लोकविश्वास के आधार पर नीतियों को स्थापित करते हुए राज्य-शासन को कम करते हुए शासन मुक्त समाज की स्थापना व मनुष्य का परिष्करण करने के वृहद अवसर उपलब्ध कराना है।

    विनाश को केवल और केवल वही लोकतंत्र रोक सकता है जो अहिंसा, सामाजिक समता व कल्याण को अपनी दीर्घकालिक नीति मानेगा, इसी के अनुरूप अपने आर्थिक, प्रशासनिक व राजनैतिक ढांचे बनाएगा। अभी तक की पद्धतियों में सबसे बेहतरीन पद्धति लोकतंत्र है। पुरानी क्रांतियों को व्यवस्थित या ऊटपटांग तरीकों से दोहराया जाना औचित्यहीन है। मूलभूत बात है मानवीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति व रचना “अहिंसा” को जानने, समझने, स्वीकारने व प्रमाणिकता में जीने की। सत्य के आग्रह के साथ अहिंसा को समझना, स्वीकारना व प्रमाणिकता में जीना। मैं गांधी को मानवीय इतिहास के लिए इसीलिए अत्यधिक महत्वपूर्ण व दृष्टा व्यक्ति मानता हूं क्योंकि वे मानवीय लोकतंत्र के दृष्टा थे, उनकी अहिंसा सत्य के निकट थी व स्वअनुशाषित थी।

    मैं साम्यवाद, माओवाद पूंजीवाद, लोकतंत्र आदि विषयों पर गहरी व विस्तृत चर्चा इस पुस्तक में नहीं करना चाहता क्योंकि इस पुस्तक का मुख्य विषय बस्तर में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन के लिए रचनात्मक प्रयास हैं, पुस्तक अपने मूल विषय से भटक जाएगी। संक्षिप्त रूप से जितनी भी चर्चा इन विषयों पर प्रस्तावना अध्याय में हुई, आशा करता हूं कि उससे आपको यह महसूस हो रहा होगा कि मुझे साम्यवाद, माओवाद, क्रांति, परिवर्तन, पूंजीवाद आदि की समझ है, साथ ही यह पुस्तक रचनात्मक समाधान का प्रशस्तिगान करती हुई प्रतीत न हो, वरन् वस्तुस्थिति व रचनात्मक समाधान के प्रयासों को समझने में उपयोगी हो ताकि आप भी अपना योगदान सुनिश्चित करने की ओर मनन कर सकें, निर्णय ले सकें।

  • देश को गर्त में झोंकने की तथाकथित क्रांति के लिए आप भी उत्तरदायी हैं

    सामाजिक यायावर


    एक निहायत ही मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी आदमी आपके पास आता है। बेहूदा, खोखला व फर्जी दावा ठोंकता है कि उसने दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था का गहरा अध्ययन किया है।

    चूंकि आपने कभी जीवन में गहरा अध्ययन किया नहीं, गंभीर लोग आपकी सलाहकार व मित्र मंडलियों में दिखते नहीं। आप काल्पनिक व गढ़े गए इतिहास को वास्तविकता के रूप में प्रायोजित करते हुए जीते दीखते हैं क्योंकि ऐसा करने से अपनी सभ्यता के स्वयंभू महान होने का दंभ पूरा होता है। इसलिए आपने इस मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी के बेहूदे व फिजूल तर्कों को हाथों-हाथ लेकर देश को गर्त में पहुंचाने का कर्मकांड कर डाला।

    यह आदमी आपकी इन कमियों को जानता है, सबसे बड़ी बात यह आदमी यह भी जानता है कि आपको स्वयं को ऐतिहासिक क्रांतिकारी पुरुष के रूप में स्थापित करने की सनक है, जिस सनक के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं। यह आदमी आपसे कुछ मिनट की औपचारिक मुलाकात करने का समय मांगता है। उसके नेटवर्क ऐसे होते हैं कि उसको आपसे औपचारिक मुलाकात करने का समय मिल जाता है।

    यह निहायत ही मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी आदमी आपसे मिलता है, आपको देश में आमूलचूल परिवर्तन के सपने हकीकत में बदलते दिखाता है। आप एक तीर से कई शिकार करने की राजनैतिक योजना बनाते हैं। आपने यह समझने का प्रयास नहीं किया कि यह आदमी जो दुनिया के देशों का अर्थशास्त्र समझने का दावा (बिलकुल ही फर्जी दावा) ठोंक रहा है वह भारतीय समाज व यहां के लोगों की मानसिकता को समझता है या नहीं।

    चूंकि आपको प्रवचन देने व प्रवचन सुनने के लिए प्रशिक्षित किया गया है इसलिए आपको प्रवचन सुनने के बाद उसको आगे बढ़ाते हुए प्रवचन देने की शीघ्रता रहती है। सो आपने एक मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी का स्वादिष्ट प्रवचन सुना और बिना योग्य, गंभीर व विशेषज्ञ लोगों से परामर्श किए उसके प्रवचन को देश के लोगों को प्रवचन के रूप में सुना दिया।

    किंतु यह प्रवचन केवल प्रवचन नहीं था, देश की हजारों वर्षों के ढांचे को तहस-नहस करने की बात थी। अरबों लोगों के विश्वास टूटने की बात थी। अरबों लोगों के सुचारु रूप से चल रहे जीवन में छीछालेदर होने की बात थी।

    इस आदमी को की शान में कई मित्रों ने बाकायदा आपके साथ उसकी फोटुओं के साथ साबित करते हुए यह बताया कि यह दुनिया का महान अर्थशास्त्री है जिसके आगे दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री पनाह मांगते हैं। जबकि मुझे पहले पल से ही यह आदमी मानसिक विकृत, झूठा, फरेबी, लफंगा व लुच्चा आदमी प्रतीत हुआ है।

    ये मित्रगण जिनको न तो भारतीय समाज की समझ है, न ही अर्थशास्त्र की, न ही इन्होंने कभी कोई ठोस जमीनी काम ही समाज के लिए किया है, न ही इन्होंने अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जीवन की प्राथमिकताओं को सामाजिक प्राथमिकताओं के लिए भेंट ही चढ़ाया है। इन मित्रों के द्वारा इस मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी को महान अर्थशास्त्री मानने के पीछे उनके अपने मन के भीतर की ही वे कुंठित मानसिकताएं हैं जिनके कारण वे राजा या सामंत को सबसे योग्य, महान व दैवीय मानते हैं। इसलिए इस मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी की महानता व योग्यता का सबसे बड़ी कसौटी यही है कि आपने इसकी बेहूदी बकवास लगभग दो घंटे तक सुनी, आपने इसकी बेहूदी बकवास पर देश में आमूलचूल परिवर्तित करने वाली ऐतिहासिक क्रांति के बीज खोजे।

    यह मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी आदमी व इसके दुमछुल्ले मित्र व जानपहचान वाले फायदे में रहे। यह आदमी मीडिया में स्थान पाया, क्रांतिकारी सोच रखने वाले महान चिंतक आदि जैसे होने की फर्जी वाहवाही लूटा। इस आदमी के मित्र व जानपहचान वाले मानसिक विकृति वाले इस दंभ का मजा लिए कि वे इस आदमी के मित्र हैं या इसको जानते हैं। 

    लेकिन आपका व देश का क्या हुआ ….. आपके ऊपर सवाल खड़े होना शुरू हुए, आपको अगंभीर पुरुष माना जाने लगा, देश के लोगों की जो हालत है वह यदि आपको सच में ही नहीं पता तो यह अत्यधिक चिंता वाली बात है …..। यदि आप सच में देश के प्रति सहज भाव रखते हैं तो आपको इस आदमी व इस आदमी के मित्रों व जानपहचान वालों जैसे लफंगों, मानसिक विकृत व अधकचरे ज्ञानी लोगों से बचना चाहिए क्योंकि अपने देश का माइंडसेट ऐसा है कि लफंगे ही मौज करते हैं।

    जो आपने किया, करने के बाद भी जिस तरीके से हैंडल किया व कर रहे हैं; उससे लोगों को इतना तो स्पष्ट मालूम पड़ता जा ही रहा है कि आपमें देश को लफंगई के माइंडसेट से मुक्त कर पाने की दृष्टि, योग्यता व क्षमता नहीं; आप देश को समझते नहीं। इसलिए देश हित में बेहतर यही है कि केवल आप स्वयं को लुच्चों-लफंगों के स्वादिष्ट व लुभावने प्रस्तावों, दावों व तर्कों आदि के प्रभाव से ही मुक्त रख पाएं ताकि कम से कम देश और अधिक गर्त में तो नहीं पहुंचेगा।

     

    चलते-चलते :

     

    संभव है कि आपको लगता हो कि कबीलाई सोच व सभ्यता अबतक कि सबसे बेहतरीन सोच व सभ्यता थी। हो सकता हो आपको लगता हो कि चाणक्य का अर्थशास्त्र जो कबीलाई तौर-तरीकों पर आधारित था, वह दुनिया का सबसे बेहतरीन अर्थशास्त्र है। हो सकता हो आपको लगता हो कि देश के लोग मूर्ख हैं, उनको जैसे चाहे वैसे हांका जा सकता है।

     

    लेकिन मुझे लगता है कि देश के लोगों ने आप पर विश्वास किया था क्योंकि उनको लगा था कि आप उनके सपनों व कल्पनाओं को साझा करते हैं। आप उनको उनके सपनों व कल्पनाओं का देश बनाकर देंगें। बहुत लोग अब भी ऐसा ही सोचते हैं। लेकिन बहुत लोग ऐसे भी हैं जो अब यह मानने लगे हैं कि आपसे ऐसा संभव नहीं।

     

    जिन लोगों ने सिर्फ बैठे-बैठाए अय्याशी करने के लिए आपको ऐशोआराम उपलब्ध करवाने की शक्ति रखने वाला अवतार मानकर आपको बिना सवाल राजपाट सौंप दिया। आपको लगता है कि ऐसे लोग कबीलाई सभ्यता की ओर वापस जाना चाहेंगे। मुझे तो बिलकुल नहीं लगता है। आखिर कब तक लोग आपकी इन बातों पर विश्वास करते रहेंगे कि इतना कष्ट और झेल लो फिर जीवन स्वर्ग जैसा हो जाएगा। आखिर कब तक फर्जी सपनों व कल्पनाओं को देखते हुए लोग सब्र करते रहेंगे।

     

    दरअसल यह आदमी जो निहायत ही मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी है, की बात मानकर आपने लोगों के मन में गंभीर व चिंतनीय सवाल पैदा कर दिए हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आप केवल सपने दिखाते हैं, उन सपनों को धरातल में उतारने के लिए आप लोगों से कष्ट भोगने व बलिदान करने की मांग के ऊपर मांग प्रस्तुत करते हैं जबकि वास्तव में सपनों को धरातल पर उतार पाने की दृष्टि, सोच, समझ, योग्यता व क्षमता आप में नहीं है। …….

     

    _

     

    .

     

  • समलैंगिकता – प्राकृतिक या अप्राकृतिक

    सामाजिक यायावर


    मैं जब प्राकृतिक शब्द का प्रयोग करता हूं तो इसका अर्थ प्रकृति की व्यवस्था के सहज नियमों को जानना, समझना व अनुपालन करना है, न कि केवल प्रकृति में होना मात्र। यदि प्राकृतिक होने का अर्थ प्रकृति में होना मात्र है तो फिर पर्यावरण असंतुलन, बलात्कार, शोषण आदि का कोई तात्पर्य नहीं रह जाता है। कुछ भी सब प्राकृतिक है।

    समलैंगिकता को मैं अप्राकृतिक मानता हूं। अप्राकृतिक क्यों मानता हूं क्योंकि प्रकृति में जिन भी स्तनपायी जीव जंतुओं के पास योनि व गुदा अलग-अलग हैं, उनमें गुदा-मैथुन नहीं होता है। दूसरी बात सेक्स प्राकृतिक रूप से संतानोत्पत्ति के लिए है। जीव जंतुओं में रात दिन जब मन हो जाए तब सेक्स नहीं होता है। जब संतानोत्पत्ति के लिए ऋतु आएगी तभी पशुओं में सेक्स होता है। जीवन की गति चलती रहे इसके लिए सेक्स एक व्यवस्था है प्रकृति में।

    समलैंगिकता को अप्राकृतिक मानने के बावजूद, मेरा ऐसा मानना है कि जो लोग समलैंगिकता को जीना चाहते हैं उनको ऐसा जीने का पूरा अधिकार है। उनको समलैंगिकता का प्रचार प्रसार करने, समलैंगिकता को प्रतिष्ठित करने, समलैंगिकता को महानता साबित करने, समलैंगिकता को धर्म के रूप में भी प्रतिष्ठित करने आदि-आदि का संपूर्ण अधिकार है।

    समलैंगिकता के विरोध का मतलब सिर्फ यह है कि स्त्री-स्त्री व पुरुष-पुरुष के साथ सेक्स न करे, जीवन भर सेक्स करते रहने के साथी के रूप में न चुने। दो पुरुष या दो स्त्री साथ में रहें लेकिन आपस में सेक्स न करें तो मामला समलैंगिकता का नहीं होता। मुख्य मामला सेक्स करने के तरीके का है और कुछ नहीं।

    यदि बात सेक्स करने के तरीके पर की जाएगी तो हममें से बहुत ऐसे लोग होगें जो अपने दाम्पत्य जीवन में अपनी पत्नी के साथ या अपनी प्रेमिका के साथ या वेश्या के साथ या बलात्कार करते समय या पशु के साथ गुदा मैथुन करते होगें। बहुत ऐसी स्त्रियां होगीं जो अपने पति से या प्रेमी से या पशु से या छोटे बच्चों से मुख-मैथुन करती होगीं। यह भी तो समलैंगिकता ही हुई।

    मैं समलैंगिकता को अप्राकृतिक इसलिए मानता हूं क्योंकि मैं गुदा-मैथुन, मुख-मैथुन, हस्त-मैथुन आदि को अप्राकृतिक मानता हूं। लेकिन मैं समलैंगिकता का विरोध नहीं करता क्योंकि मैं यह भी जानता हूं कि हम सभी लोग गर्भ में बीज बनने से लेकर मृत्यु तक पूरा का पूरा जीवन अप्राकृतिक रूप से जीते हैं।

    राष्ट्र की सीमाएं, संविधान, सेना, कानून, परंपराएं, कर्मकांड, धर्म, संस्कार, ईश्वर की कल्पनाएं, मुद्रा, व्यापार, बाजार, संपत्ति-अधिकार आदि-आदि सभी कुछ अप्राकृतिक है। समलैंगिकता की तुलना में बहुत अधिक खतरनाक कोटि के धूर्तता, नीचता व पाखंड से भरे हुए अप्राकृतिक हैं। जब इन जैसी अप्राकृतिक बातों को हमनें सर-आखों पर प्रतिष्ठित कर रखा है तो समलैंगिकता जैसी व्यक्तिगत-स्वाद पर आधारित इच्छा जो किसी का शोषण नहीं करती, हिंसा नहीं करती, पर सवाल उठाने व विरोध करने का कोई औचित्य नहीं।

    हमने धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कार जैसी निहायत ही अप्राकृतिक चीजों में स्वयं के संपूर्ण अस्तित्व को ही विलीन कर रखा है। हमने अपने स्वाद पर आधारित तौर-तरीके जैसे भोजन, भोजन करने के तौर-तरीकों, कपड़े पहनने के तौर-तरीकों, बोलचाल के तौर-तरीकों, अभिवादन करने के तौर-तरीकों, सम्मान प्रेम आदि को व्यक्त करने के तौर-तरीकों, संपत्ति कब्जाने व उसके बटवारे के तौर-तरीकों आदि-आदि को संस्कृति व सभ्यता आदि के रूप में प्रतिष्ठित कर रखा है।

    चलते – चलते :

    हम पूरा जीवन एक से बढ़कर एक अप्राकृतिक, धूर्तता, हिंसा, बेहूदगी व झूठ से भरे झोल-झपाटों को प्रतिष्ठा के साथ स्वयं को महान व अद्वितीय मानते हुए स्वीकार कर रखते हैं। लेकिन हम इतनी मूलभूत ईमानदारी क्यों नहीं रख पाते कि हम समलैंगिकता जैसी बातों को भी धर्म या संस्कृति या सभ्यता या स्वाद के एक तौर-तरीके के रूप में स्वीकार कर लें, या फिर हम किसी भी झोल-झपाटे को न स्वीकार करें।

     

    जब तक हम कंडीशनिंग से स्वयं को मुक्त करने का ईमानदार प्रयास नहीं शुरू करेंगें हम दोहरे चरित्र/कसौटियों/मापदंडों आदि को ईश्वरीय, महान व अद्वितीय आदि मानने की मूर्खता व भ्रम में जीते रहेंगे।

     

     

  • भ्रांतियों से मुक्त होकर रचनात्मक कान्फ्लिक्ट-रिजोलूशन की गतिमान प्रक्रियाओं को समझने से ही बस्तर में कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारियों की जरूरत व योगदान को समझना संभव हो सकता है

    सामाजिक यायावर


    प्रस्तावना

    मेरा निवेदन स्वीकारें और खुले दिमाग से व्यवहारिकता के साथ इस लेख को पढ़ने का प्रयास कीजिए। लेख कुछ लंबा है इसलिए धैर्य की भी महती जरूरत है।

    यदि हम बस्तर क्षेत्र में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन में अपना योगदान देना चाहते हैं तो हमें बस्तर को वास्तविक धरातल से समझना पड़ेगा। बस्तर को समझने के लिए हमें पूर्वाग्रहों, पक्षपातों, पूर्वधारणाओं, भ्रांतियों व फ्रैबीकेटेड-तथ्यों आदि से मुक्त होना पड़ेगा। हमें फ्रैबीकेशन, प्रायोजित-प्रतिस्थापनाओं व प्रायोजित आदिवासी हीरोज के जाल से बाहर आना पड़ेगा। यदि हम वास्तव में बस्तर के आम आदिवासियों के प्रति संवेदनशील हैं तो हमें बस्तर के वास्तविक धरातल को गहराई से समझना पड़ेगा।

    बहुत अधिक संभावना इस बात की है कि मेरे इस लेख से छत्तीसगढ़ के नीतिनिर्माता नौकरशाह व नागरिक प्रशासनिक नौकरशाह आदि भी असहमत हों, मुख्यधारा के लोग जो बस्तर की धरातलीय वास्तविकता से परिचित नहीं है उनका असहमत होना तो अवश्यंभावी है।

    अधिकतर लोगों के द्वारा असहमत होने की प्रबल संभावनाओं के बावजूद मैं बस्तर समाधान के मुद्दे पर भिन्न दृष्टिकोण से कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारियों के योगदान पर अपनी बात रखना चाहता हूं। कई बार हम वस्तुस्थिति व तथ्यों से परिचित न होने के कारण भिन्न दृष्टिकोण से वस्तुस्थितियों को नहीं देख पाते हैं। बस्तर जैसे क्षेत्रों में समाधान के लिए हमें बहुत सारे कोणों से वस्तुस्थितियों को समझना पड़ता है। पूर्वाग्रहों, पक्षपातों तथा मनगढ़ंत व फ्रैबीकेटेड तथ्यों की भरमार के कारण वस्तुस्थिति को समझ पाना असंभव सा हो जाता है, इसलिए बहुत बार हम इन कारकों के आधार पर अपनी कल्पना, तार्किकता व सैद्धांतिकता के कारण अपना पक्ष चुन लेते हैं जो गलत भी हो सकता है।

    जब बात बस्तर की आती है तो माओवाद, आदिवासी, सलवाजुडूम व आदिवासी हीरोज की बात आती ही है। आदिवासी हीरोज से मेरा तात्पर्य उन लोगों से है जिनको बस्तर के आदिवासी लोगों के लिए नागरिक व पुलिस प्रशासन के शोषण के खिलाफ संघर्ष व आदिवासियों के लिए विकास के कार्य करने वालों के रूप में, कुछ NGOs, माओवाद के प्रति झुकाव लिए हुए प्रतिष्ठित लेखकों, प्रोफेसरों व मीडिया आदि के द्वारा प्रायोजित किया जाता है। तथ्यों के फ्रैबीकेशन का मूलभूत कारण निहित-स्वार्थ, पूर्वाग्रह, पक्षों के प्रति झुकाव व वस्तुस्थिति की सही सूचनाएं न होना ही है।

    बस्तर में चल रहे कान्फ्लिक्ट-रिजोलूशन के दीर्घकालिक-रचनात्मक समाधान के प्रयासों की चर्चा मैं बस्तर पर अपनी आगामी किताब में कर रहा हूं। यहां इस लेख में बहुत तत्वों पर बात करना संभव नहीं इसलिए केवल कुछ भ्रांतियों पर प्रथम दृष्टया-चर्चा करना चाहता हूं। यदि हम बस्तर से संबंधित कुछ मूलभूत भ्रांतियों को समझ लें तो कल्लूरी जैसे अधिकारियों की जरूरत व योगदान की व्यवहारिकता स्वतः समझ में आने लगती है। यह भी समझ आता है कि कल्लूरी जैसे अधिकारियों के व्यवहारिक योगदान को यूं ही नहीं नकारा जा सकता है।

    भ्रांतियां व हमारे मानदंडों का घिनौना दोगलापन

    बस्तर से जुड़े कुछ मुद्दों पर बेहिसाब व अनापशनाप भ्रांतियां फैलाई गई हैं। फ्रैबीकेशन व भ्रांतियों का स्तर इतना अधिक संगठित है कि उच्चतम न्यायालय तक को तथ्यों के फ्रैब्रीकेशन से भ्रम में डाल दिया जाता है।

    माओवादी व आदिवासी :

     

    bomb-narayanpur

    बस्तर के बारे में सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि माओवादी आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, आदिवासियों के हित के लिए काम करते हैं और स्थानीय आदिवासी ही माओवादी है। बस्तर के आम आदिवासी की बात तो छोड़ ही दीजिए, वह आदिवासी भी जो संघम का सक्रिय सदस्य है तक भी माओवाद का ककहरा नहीं जानता है। कुछ लोगों को माओवाद के शब्द रटा दिए गए है। जब 12-13 वर्ष की आयु के बच्चों को उनके माता पिता के घर से जबरिया अपहृत कर ट्रेनिंग कैंपों में डालकर कई-कई वर्षों तक वही शब्द व तर्क जबरिया ठूंस-ठूंस कर रटाए जाएंगें तो इससे मानसिक विकास व सोचने विचारने की शक्ति विकसित होगी या कुंठित होगी। स्वयं सोच लीजिए। क्या यह हिंसा नहीं है। बेहद ही खतरनाक हिंसा है। पीढ़ी दर पीढ़ी तक अनवरत चलने वाली हिंसा है।

    आदिवासियों की हालत यह है कि वे दिन में सड़क बनाते हैं तो रात में माओवादियों के दबाव में सड़क खोदते हैं लेकिन कहते हैं कि हमने स्वेच्छा से सड़क खोदी। प्रशासन के पास चुपके से आते हैं, कहते हैं कि हमको सड़क चाहिए, स्कूल चाहिए, अस्पताल चाहिए लेकिन माओवादियों को पता न चले कि हम यह सब मांग रहे हैं।

    संभव है कि भारत के दूसरे क्षेत्रों में माओवादियों की कोई विचारधारा हो जिसका आदिवासियों या आम लोगों की दुख तकलीफ आदि से रिश्ता हो, लेकिन बस्तर में ऐसा बिलकुल भी नहीं है। बस्तर में माओवाद कैसे पनपा इस पर विस्तृत बात बस्तर पर मेरी आने वाली किताब में होगी। प्रथम दृष्टया आप यह समझिए कि बस्तर में माओवाद बस्तर के आम आदिवासियों का प्रतिनिधित्व बिलकुल नहीं करता है, उल्टे आम आदिवासी माओवाद से त्रस्त है।

    सलवा-जुडूम :

    सलवा जुडूम के बारे में इतनी अधिक भ्रांतिया फैलाईं गईं कि सलवा जुडूम का नाम लेना भी गाली देना जैसा बना दिया गया। उच्चतम न्ययालय को प्रतिबंध लगाना पड़ गया। अंदाजा लगाया जा सकता है कि तथ्यों को फैब्रीकेट करने व भ्रांतियां फैलाने की श्रंखला कितनी गहरी व ढांचागत है।

    सलवा जुडूम के बारे में कितनी ही कहानियां गढ़ी गईं। चूंकि लोग सलवा जुडूम व बस्तर की आदिवासी संस्कृति व धरातल से परिचित नहीं इसलिए गढ़ी गई कहानियां सच मान ली जाती रहीं।

    सलवा जुडूम की शुरुआत बीजापुर जिले के एक माओवाद से त्रस्त गांव के तीन-चार बिलकुल निरक्षर व मासूम आदिवासी बंधुओं ने की थी। उनके पास इच्छा तो थी लेकिन ताकत नहीं थी माओवाद की हिंसा से लड़ने के लिए। सलवा जुडूम एक खालिस स्वतःस्फूर्त जनांदोलन था। हजारों-हजार आम आदिवासी इसके साथ खड़ा था। माओवादी नहीं चाहते थे कि इस तरह का कोई जनांदोलन खड़ा हो पाए क्योंकि ऐसा स्वतःस्फूर्त आंदोलन उनके अस्तित्व को खतम कर सकता था। मुख्यधारा के लोगों की इस भ्रांति को खतम कर सकता था कि माओवादी आदिवासियों के प्रतिनिधि हैं।

    माओवादियों के कारण सैकड़ों गांवों को वीरान होना पड़ा। सैकड़ों हजारों मासूम आदिवासियों की हत्याएं कर दी गईं। हजारों आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा। लेकिन ठीकरा हमेशा फोड़ा गया सलवा जुडूम के ऊपर।

    यदि हम माओवाद के नामपर आदिवासियों के हथियार उठाने को न्यायोचित मानते हैं तो जब माओवाद की हिंसा व शोषण से ऊबकर आम आदिवासी माओवाद का संगठित विरोध करने के लिए स्वतःस्फूर्त जनांदोलन सलवा जुडूम बनाता है तो हम उसका विरोध क्यों करते हैं, जबरिया बदनाम क्यों करते हैं, उसको नष्ट करने के लिए पूरी ताकत क्यों लगा देते हैं। हमारे मानदंड इतने सतही खोखले व दोगले क्यों हैं।

    हत्याएं, शोषण व यौन-शोषण :

    बस्तर में पुलिस जब किसी का इनकाउंटर करती है तो हम यह साबित करके ही दम लेते हैं कि इनकाउंटर बिलकुल गलत था। लेकिन हम माओवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं का विरोध क्यों नहीं करते हैं जबकि माओवादियों ने पुलिस की तुलना में कई गुना अधिक मासूम आदिवासियों की हत्याएं की हैं। हम एक लाइन का भी विरोध नहीं करते हैं। पुलिस को नियंत्रित करने के लिए न्यायालय है, मानवाधिकार आयोग हैं, हम और आप हैं। लेकिन हम आदिवासियों की सुरक्षा व विकास व मानवाधिकार के नाम पर माओवादियों का विरोध क्यों नहीं करते, क्या वे ईश्वरीय अवतार हैं। हमारे मानदंड इतने दोगले क्यों हैं।

    हम पुलिस कस्टडी में दी जाने वाली प्रताड़नाओं की सच्ची झूठी कहानियों की सत्यता की परख किए बिना तुरंत से सच मानकर पुलिस का विरोध करना शुरू कर देते हैं। लेकिन प्रतिवर्ष माओवादियों द्वारा सैकड़ों 12-13 वर्ष के बच्चे-बच्चियों को बर्बरता पूर्वक उठाकर ट्रेनिंग कैंपों में डाल दिए जाने व वहां पर होने वाले शोषण व यौन-शोषण का विरोध हम क्यों नहीं करते हैं। 

    क्या यह मान लिया जाए कि किशोरियों का ट्रेनिंग कैंपों में लगातार होने वाला यौन-शोषण, ब्रेन-वाश कर दिए जाने के कारण यौन-शोषण नहीं रह जाता है। महान मानवीय संवेदनशील व उच्चतर सामाजिक मूल्यों वाला विशिष्ट तत्व हो जाता है।

    जांचों व रिपोर्टों की विश्वसनीयता का स्तर

    CBI आदि जैसी आधुनिक तकनीक व सुविधाओं से समृद्ध विशेषज्ञ व प्रतिष्ठित संस्थाओं की जांचे भी बस्तर जैसे इलाकों में कितनी सही या गलत हो सकती हैं इसको सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है।

    मान लीजिए आप बस्तर के बीजापुर जिले के सुदूर इलाके में जा रहे हैं। रास्ते में आपको दो बच्चे मिलते हैं जिनकी उम्र महज 9 से 13 वर्ष है। वे पत्तों के बने दोनों में जामुन लिए हैं कि यदि कोई उस रास्ते से गुजरे और उनसे जामुन खरीदता है तो उनको पांच दस रुपए मिल जाएंगे। आप जामुन खरीदते हैं। आपको पता नहीं होता लेकिन आपके उस रास्ते से गुजरने की जानकारी ये बच्चे संघम के सदस्यों को देते हैं। लौटते समय माओवादी या संघम सदस्य आपकी खाल को भोथरे पत्थर से छील-छील कर घंटों तड़पा-तड़पा कर आपकी हत्या कर दी जाती है।

    अगले दिन वही बच्चे फिर से दोनों में जामुन लिए खड़े होते हैं। आपकी दृष्टि में ये बच्चे नृशंस हत्या के अपराध में भागीदार हैं या नहीं। यदि आप उन बच्चों को हत्या के अपराध में भागीदार मानते हैं तब भी जब तक खुद संघम सदस्य या खुद वे बच्चे नहीं स्वीकारेंगे तब तक आप कैसे साबित कर सकते हैं या जान सकते है कि वे बच्चे हत्या के अपराध में भागीदार थे। आदिवासी यदि संघम सदस्य नहीं भी है तो भी वह क्यों माओवादियों व संघम के विरुद्ध जाने की कोशिश करेगा यह जानते हुए भी कि अगले ही दिन उसकी सपरिवार तड़पा-तड़पा कर हत्या कर दी जाएगी।

    अनुवादक यदि स्थानीय है तो क्या वह अपने पूर्वाग्रह के अनुसार तथ्यों को तोड़मरोड़ नहीं सकता। यदि अनुवादक बाहरी है तो वह शाब्दिक व व्याकरणीय अनुवाद तो कर सकता है लेकिन भावात्मक अनुवाद तो नहीं ही कर सकता है जब तक कि स्थानीय समाज को बेहतर तरीके से समझता नहीं होगा। इस तरह के अभावात्मक अधकचरे अनुवाद से कही गई बात का वास्तविक अर्थ व संदेश पूरी तरह से कुछ का कुछ और निकल सकता है। जब CBI जैसी सक्षम अत्याधुनिक तकनीक व सुविधाओं से युक्त संस्थाओं की जांच दावे से पूरी सही नहीं कही जा सकती। जब CBI की भी अपनी सीमाएं हैं तो बाहरी लोग कुछ घंटे या कुछ दिन के लिए किसी स्थान में जाकर वहां के चुनिंदा स्थानीय लोगों से चर्चा करके बिलकुल सही व निष्पक्ष जांच कर पाने का दावा कैसे ठोंक सकते हैं।

    ऐसी जांचों का परिणाम मूलभूत रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि जांच कर्ता के समक्ष जिस स्थानीय व्यक्ति या समूह को प्रस्तुत किया गया है वह किस पक्ष की ओर झुकाव रखता है। पुलिस आम आदमी की सुरक्षा सुदूर गावों में हर क्षण नहीं कर सकती है, इसलिए अधिकतर ऐसी जांचों में माओवाद के विरुद्ध बात न करना व पुलिस के विरुद्ध में बात करना जीवन के लिए बहुत अधिक सुरक्षित होता है।

    मीडिया के जो लोग पहुंचते हैं और कहीं कुछ दिन रुककर लोगों से कुछ चर्चा करते हैं। स्थानीय आदिवासी मीडिया के लोगों का पक्ष व पूर्वाग्रह समझ कर ही अपनी बात रखेगा। बाहर से जाने वाले कितने मीडिया वाले लोग हैं जिनको माओवादियों द्वारा बर्बरता से की जाने वाली हत्याओं की जानकारी दी जाती है। माओवादी गावों से 12-13 साल की लड़कियों को उठा ले जाते हैं, इसकी चर्चा तो उठाई गई लड़कियों के माता-पिता भी बाहरी मीडिया के लोगों से नहीं करते हैं। क्यों करेंगें, क्यों वे अपनी व अपने परिवार की जान खतरे में डालेंगें।

    मीडिया के लोगों की रिपोर्टें इस बात पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं कि उन्होंने जिन लोगों से बात कीं उन लोगों का झुकाव किस तरफ है तथा खुद मीडिया के लोगों का झुकाव किस तरफ है।

    बस्तर के वर्तमान पुलिस महानिरीक्षक “कल्लूरी”

    कल्लूरी को मैं प्रत्याक्रमण का विशेषज्ञ पाता हूं। ध्यान दीजिए मैं कह रहा हूं कि वे प्रत्याक्रमण के विशेषज्ञ हैं, मैं यह नहीं कह रहा कि वे आक्रमण के विशेषज्ञ हैं। बस्तर में सुदूर गांवों तक में बिलकुल नीचे तक सूचनाओं के बेहद व्यवस्थित श्रंखला तंत्र की स्थापना व मजबूत पकड़ रखने वाले कल्लूरी हर स्तर पर प्रत्याक्रमण करते हैं माओवादियों की हिंसक घटनाओं जैसी प्रत्यक्ष आक्रमण के प्रत्याक्रमण से लेकर माओवादियों के समर्थकों के द्वारा फ्रैबीकेटेड तथ्यों व आदिवासी हीरोज के प्रायोजन रूपी अप्रत्यक्ष आक्रमण के प्रत्याक्रमण तक।

    हर स्तर पर प्रत्याक्रमण की विशेषज्ञता ही कल्लूरी को चहुंओर से आलोचनाओं का शिकार बना देती है। माओवादी, माओवादी समर्थक तथा क्रांति के साथ रोमांस की भावना से नियंत्रित होने वाले वे लोग जो वास्तविक धरातल से अपरिचित हैं या फ्रैबीकेटेड तथ्यों को ही अकाट्य सच मान लेते हैं, आदि जैसे लोग कल्लूरी जैसे अधिकारियों के इस स्तर के भयंकर विरोधी बन जाते हैं कि अपने अंदर वास्तविकता व व्यवहारिकता को समझकर विश्लेषण की संभावना के भ्रूण को भी नहीं उत्पन्न होने देते हैं। धरातलीय वस्तुस्थिति को कान्फ्लिक्ट-रिजोलूशन के व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखने समझने की बात तो कल्पनातीत है। 

    कल्लूरी व आदिवासी समाज
    कल्लूरी व आदिवासी समाज
    बस्तर में रहने वाला आम आदिवासी व आम गैर-आदिवासी लोग, जिनका NGO-दुकानदारी या राजनैतिक या माओवाद का समर्थन आदि पर आधारित  निहित स्वार्थ नहीं हैं, अपवाद छोड़कर वे सभी एक तथ्य को स्वीकार करते हैं कि जब से कल्लूरी बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक बने हैं तब से माओवादियों की गतिविधियां बहुत अधिक नियंत्रित हुई हैं। घोर माओवादी नियंत्रित इलाकों में भी सड़के, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक वितरण आदि नागरिक सेवाएं पहुंची हैं। सैकड़ों गावों के आम आदिवासियों ने स्वयं को सुरक्षित महसूस करना शुरू किया है।

    kalluri-sukma

    पुलिस व नागरिक प्रशासन के बेहतर तालमेल से ही सुदूर माओवादी इलाकों में विकास व शांति का पहुंच पाना संभव हो पा रहा है। अन्यथा विकास केवल जिला मुख्यालयों तक ही सीमित था क्योंकि तुलनात्मक रूप से जिला मुख्यालय आदि ही सबसे सुरक्षित इलाके थे। जिसने भी अंदर के इलाकों में जाने का प्रयास किया उसकी स्थिति सुकमा के पूर्व जिलाधिकारी अलेक्स पी मेनन जैसी कर दी गई। अलेक्स मेनन ग्रामीण विकास के बेहतरीन आइडियाज के साथ गांव-गांव जा रहे थे, लोगों पर विश्वास करके बिना सुरक्षा के आम-आदिवासी के पास उसके जैसा बनकर पहुंचते थे। सैंद्धांतिक रूप से यह बेहतर बात थी लेकिन व्यवहारिक रूप में यह हुआ कि उनकी इस शैली ने माओवादियों को उनका अपहरण करने के लिए प्रोत्साहित किया। बेहतरीन आइडियाज रखे रह गए।

    ज्यों-ज्यों स्थितियां नियंत्रण में आती चली जाती हैं या परिस्थितियां परिवर्तित होती हैं त्यों-त्यों कल्लूरी की क्रियान्वयन नीतियां भी बदलती जाती हैं। माओवाद का प्रभाव क्षेत्र कम होने के साथ ही कल्लूरी ने माओवादियों के आत्मसमर्पण व पुनर्वास की नीति को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया। आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवनयापन करने में भी भरपूर सहयोग करते हैं। कुछ माओवादियों की धूमधाम से शादी भी कराई। 

    इस लेख में कल्लूरी की कुछ फोटो दे रहा हूं, इनमें से हर एक फोटो बिना शब्दों के ही बहुत कुछ कहती है।

    चलते-चलते

    मैंने पिछले ग्यारह-बारह वर्षों में बस्तर को बदलते देखा है। बस्तर के दूर-दराज के कई सैकड़ा गांवों को एक दशक पहले ही देख चुका था। तब बस्तर में सड़कें नहीं होतीं थीं, पेट्रोलपंप नहीं होते थे, मोबाइल नहीं होते थे। एक गांव से दूसरे गांव में जाने के लिए जंगली रास्ते होते थे, माओवाद अपने पूरे उफान पर था ही। न मेरी कोई NGO उस समय थी और न ही आज है, न मुझे वहां जाने के लिए कहीं से कोई फंड मिलता था, न ही मैंने कभी कहीं माओवाद पर कोई लेख या रिपोर्ट ही लिखा। तात्पर्य यह कि मेरा कोई निहित स्वार्थ नहीं रहा, अपितु केवल वस्तुस्थिति को समझने व आम आदिवासियों के विकास की चेष्टा करना ही उद्देश्य रहा। एक दशक से अधिक समय तक मैंने बस्तर को धैर्य के साथ धरातल में रहते हुए देखा, समझा व जाना है।

    बस्तर बहुत अधिक बदल रहा है। बस्तर में रचनात्मक विकास की क्रांति हो रही है। यह क्रांति करने वाले बाहर से आए हुए लोग नहीं है वरन हमारे ही देश के वे नौजवान हैं जो कि IAS व IPS बनते हैं। बस्तर में प्रशासन का तालमेल दिखता है। नए अधिकारियों के द्वारा पूर्व के अधिकारियों के काम को आगे बढ़ाया जाना दिखता है।

    छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कितना अच्छे हैं या कितना बुरे यह मैं दावे से नहीं जानता। लेकिन एक बात मैं दावे से जानता हूं कि बस्तर में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन की दिशा में जो गंभीर व दीर्घकालिक रचनात्मक विकास व समाधान के कार्य हो रहे हैं, वह रमण सिंह की नेतृत्व दूरदृष्टि के बिना बिलकुल भी संभव नहीं। यह रमण सिंह की इच्छाशक्ति, दृढ़ता व अपने निर्णय शक्ति पर विश्वास ही है कि अनगिनत आलोचनाएं झेलने के बावजूद वे बस्तर में जुझारू व कर्मठ अधिकारियों को भेजते हैं, उन पर विश्वास करते हैं तथा उनको प्रोत्साहन देते हैं।

    मैं छत्तीसगढ़ सरकार की कई नीतियों व तौर तरीकों से बिलकुल सहमत नहीं, लेकिन जब बात बस्तर में सामाजिक समाधान व रचनात्मक विकास की आती है तब मैं अपने आपको छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, उनकी सलाहकार टोली व बस्तर के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ खड़ा पाता हूं।  बस्तर में जैसी गति व दिशा चल रही है यदि वैसी ही चलती रही तो आगामी कुछ वर्षों में बस्तर क्षेत्र विकास व नागरिक सुविधाओं के मुद्दे पर देश के सबसे बेहतरीन इलाकों में से होगा।  इसका संपूर्ण श्रेय रमण सिंह, उनकी सलाहकार टोली व प्रशासनिक अधिकारियों को ही जाता है।

    IAS अधिकारियों को तो उनके प्रयासों के लिए प्रशंसा व पुरस्कार मिल जाते हैं लेकिन कल्लूरी जैसे अधिकारियों को मिलती हैं सिर्फ गालियां व आलोचनाएं। जबकि बस्तर में कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति के बिना नागरिक प्रशासन सामान्य मलहम लगाने जैसा छिटपुट सेवा जैसा काम तो करता रह सकता है लेकिन विकास के ठोस व दीर्घकालिक कार्यक्रम नहीं चला सकता है, सुदूर इलाकों में तो बिलकुल भी नहीं।

    यदि बस्तर की पुलिस व कल्लूरी सच में वैसे ही राक्षस हैं, रावण हैं जैसा कि प्रायोजित किया जाता है तो बस्तर में विकास व रचनात्मक कार्य संभव ही नहीं हो पाता। रचनात्मक विकास की वास्तविकता तो यह है कि पुलिस का नागरिक प्रशासन के साथ संपूरकता का तालमेल है तभी वहां इतनी गति से काम हो पा रहे हैं।

    इसलिए बस्तर को यदि अनबलगन, आर० प्रसन्ना, ओमप्रकाश चौधरी, पी० दयानंद, नीरज बनसोड़, के० देवासेनापथि, अमित कटारिया, अब्दुल हक, अलेक्स मेनन, डा० अय्याज तांबोली, टामन सिंह सोनावानी, सौरभ कुमार व सुश्री अलारमेलमंगई आदि-आदि जैसे IAS अधिकारियों की जरूरत है तो स्व० राहुल शर्मा, अमरेश मिश्र, अभिषेक मीणा, के एल ध्रुव, कल्यान इलेसा, कामलोचन कश्यप, एम० एल० कोटवानी, आर० एन० दास व संतोष सिंह आदि-आदि जैसे IPS अधिकारियों व कल्लूरी जैसे प्रत्याक्रमण विशेषज्ञ पुलिस अधिकारियों की भी जरूरत है।

    .

     

    kalluri-civic-08

    kalluri-civic-07 kalluri-civic-02

     

    kalluri-civic-05

     

    kalluri-civic-10

     

    kalluri-civic-09

    .