Category: सामाजिक यायावर

  • खूबसूरत यादें लिए लौट चले शताब्दियों तक परित्यक्त रहे क्षेत्र अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे अपनी दुनिया की ओर (फोटो लेख)

    खूबसूरत यादें लिए लौट चले शताब्दियों तक परित्यक्त रहे क्षेत्र अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे अपनी दुनिया की ओर (फोटो लेख)

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मेरे देश के सैकड़ों सालों से अछूते रहे आदिवासी क्षेत्र अबुझमाड़ के बच्चे बाहरी दुनिया को देखने जानने समझने आए। यदि मैं भारत में होता तो किसी भी कोने से इन बच्चों के स्वागत के लिए पहुंचता भले ही असुविधा का सामना करना पड़ता क्योंकि मामला बच्चों के स्वागत का था। उन बच्चों के स्वागत का जिनको हमारी दुनिया के बारे में पूर्वाग्रह से भर कर विद्रोही बना दिया जाता है।

    बस्तर के बारे में झूठी सच्ची व प्रायोजित खबरों को सुनकर मानवाधिकारों को बचाने के नाम पर सोशल साइट्स में सरकार, पुलिस व प्रशासन को कोसने व गरियाने वाले हम लोगों की वास्तविक संवेदनशीलता व सामाजिक जागरूकता का भी पता चलता है, जब हममें से अधिकतर लोग अपने दरवाजे पर आए अबुझमाड़ जैसे क्षेत्र के बच्चों से मिलते भी नहीं हैं। अचानक हम बीमार हो जाते हैं, अचानक हमें अपने खुद के बच्चों की चिंता अधिक होने लगती है हम अपने बच्चों के जिम्मेदार अभिभावक बन जाते हैं, अचानक हम मातृ व पितृ भक्त हो जाते हैं, अचानक हमें बहुत जरूरी काम करने पड़ जाते हैं।

    इतने सारे अचानक वाले अचानकों में हम यह बिलकुल ही भूल जाते हैं कि ये बच्चे उस क्षेत्र से आए हैं जहां जीवन व विकास का कोई मायने नहीं। लेकिन हममें से अधिकतर लोग अपनी छटाक भर असुविधा से बचने के लिए स्वयं के असंवेदनशील हो जाने को प्राथमिकता देते हैं। अपनी सेलेक्टिव जागरूकता, संवेदनशीलता व क्रांतिकारिता के दंभ में सरकार व प्रशासन को कोसने व गरियाने वाले हम लोगों से इतना भी न बन पड़ा कि हम इन बच्चों से मिलकर जमीनी हकीकत का कुछ अंदाजा लगा लेते। ये बच्चे जिस इलाके से आए थे वहां जाना असंभव रहा है। यदि आप इन बच्चों से मिलते तो पता चलता कि स्थितयां कितनी बदल रही हैं इनकी दुनिया के बारे में बिना प्रायोजित जमीनी हकीकत से रूबरू होते।

    दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों के जिन आदरणीयों ने इन बच्चों से गुफ्तगूं की उनकी संवेदनशीलता को तहेदिल से कोटि-कोटि धन्यवाद। तहेदिल से विशेष धन्यवाद बड़े भ्राता पंकज चतुर्वेदी दा जी को, जिन्होंने मेरे भावों को बिना कहे स्नेह व स्वेच्छा से प्रेम व मान दिया। आभारी हूं।

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे भारत के राष्ट्रपति के साथ

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे खूबसूरत यादें लेकर अपनी दुनिया में लौट रहे हैं। बच्चों ने भारत के राष्ट्रपति के साथ समय गुजारा, राष्ट्रपति भवन में विशिष्ट स्नेह के साथ भोजन प्राप्त किया, देश की संसद को देखा, भारत के चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली समझी, विज्ञान भवन को देखा, नेशनल बुक ट्रस्ट को देखा, दिल्ली की मेट्रो तथा ऐतिहासिक इमारतों व अन्य विशिष्ट सरकारी प्रतिष्ठानों को देखा समझा।

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे भारत के राष्ट्रपति भवन में

    मैं धन्यवाद देता हूं डा० संतोष देवांगन, ADM नारायणपुर, जी को उनके जज्बे व मेहनत के लिए तथा बच्चों को एक पिता के रूप में देखभाल करने के लिए। मैं धन्यवाद देता हूं टामन सिंह सोनावनी, DM नारायणपुर, जी को इतना बड़ा निर्णय लेने व डा० संतोष देवांगन जी कर्मठ महानभाव पर विश्वास करने व उनको उचित दिशा निर्देश देते रहने के लिए। मैं धन्यवाद देता हूं नारायणपुर जिले की जिला प्रशासन टोली को जिनके सहयोग के बिना यह संभव नहीं हो पाता।

    मैं धन्यवाद देता हूं बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक कल्लूरी जी को। मैं धन्यवाद देता हूं नारायणपुर के पुलिस अधीक्षक मीणा जी को। जिनके प्रयासों से ऐसा वातावरण बन पा रहा है कि अबुझमाड़ के बच्चे व प्रशासन स्वयं को सुरक्षित महसूस कर पा रहे हैं, संपर्क मार्ग बन पा रहे हैं जिससे शिक्षा, विकास आदि के लिए तनावरहित वातावरण बन पा रहा है।

    मैं धन्यवाद देता हूं CRPF के महानिदेशक व अन्य आला अधिकारियों को जिन्होंने बच्चों को दिल्ली में बहुत बेहतरीन आवास, भोजन व यातायात सुविधाएं व पारिवारिक वातावरण दिया। बच्चों को सिखाया कि हमारी दुनिया में विशिष्ट स्थानों में कैसे रहा जाता है, कैसे भोजन किया जाता है, कैसे बातचीत की जाती है। आदि आदि।

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे -CRPF

    Abujhmarh Tribal Students - CRPF Academy
    Abujhmarh Tribal Students - CRPF Mess

    मैं धन्यवाद देता हूं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, उनकी सलाहकार टोली, प्रमुख सचिव, सचिवों व निदेशकों को। जो आलोचनाएं झेलते हुए भी बस्तर क्षेत्र में रचनात्मक समाधान के लिए समन्वय व तालमेल के साथ प्रयासरत हैं। नारायणपुर प्रशासन को प्रोत्साहित करने के लिए अतिरिक्त धन्यवाद।

    मेरी प्रसन्नता का कारण सिर्फ यह है कि मैं बस्तर की जमीनी हकीकत को समझता हूं। मैं जानता हूं कि मुख्यधारा की दुनिया के लिए भले ही यह एक सामान्य घटना हो लेकिन बस्तर के लिए यह उन ऐतिहासिक घटनाओं में से एक है जो बस्तर में रचनात्मक समाधान की स्थिति, गति व दिशा तय करती हैं।


    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – चुनाव आयोग

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – नेशनल बुक ट्रस्ट

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – उच्चतम न्यायालय

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – विज्ञान भवन

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – विज्ञान भवन

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – लाल किला

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – इंडिया गेट

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • जो भारत के कालाधन की वास्तविकता का केवल ककहरा ही समझते हैं मेरा दावा है कि वे यह भी समझते हैं कि सस्ती लोकप्रियता वाले चोचले कालाधन का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते उल्टे कालेधन के नेक्सस को मजबूती व सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं

    सामाजिक यायावर


    मोटा-मोटी समझा जाए तो भारत में कालाधन दो प्रकार का होता है। लेख को पढ़ने के बाद आप स्वयं ही तय कर लें कि क्या सतही चोचलेबाजी से वास्तविक कालेधन पर नियंत्रण संभव है। सतही चोचलेबाजी से उल्टे वास्तविक कालाधन व कालाधन रखने वाला अधिक सुरक्षित व ताकतवर होता जाता है। लोगों की नजरों में कालाधन न रखने के रूप में सदचरित्रता का प्रमाणपत्र ऊपर से मिल जाता है।

    लेखाजोखा की चतुराई से पैदा किया गया कालाधन

    ऐसा कालाधन आयकर से बचने के लिए आय को कम बता कर आयकर न दिए जाने के कारण बनता है। इस प्रकार के कालाधन में कम से कम 70 % हिस्सा कालाधन नहीं होता है। क्योंकि यदि आय आयकर की सबसे ऊपर वाली स्लैब में भी आती है तो भी आयकर 30% ही होगा। इस प्रकार वाले काला धन में अधिकतम केवल 30% की ही आयकर चोरी संभव होती है। इसमें आम आदमी के विकास के लिए सार्वनजिक संपत्तियों की चोरी, देश की संपत्ति पर कब्जा, देश के लोगों का संगठित रूप से शोषण, प्रताड़ना आदि की मात्रा न के बराबर रहती है।

    इस प्रकार का कालाधन भारत के सभी व्यापारियों के पास होता है। चाहे वह छोटा हो या बड़ा। छोटे कस्बे का हो या मेट्रो शहरों का। पूरे देश में कुछेक अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो गांव से लेकर देश की राजधानी तक भारत के सभी व्यापारी बिक्री व आय कर की चोरी करते हैं। इस प्रकार का कालाधन उन लोगों के पास भी होता है जो कंपनियों में नौकरियां करते हैं और कभी-कभार अवसर मिलने पर फर्जी बिल लगा कर अपने पास कुछ पैसा बना लेते हैं।

    इस प्रकार के कालाधन में सार्वजनिक संपत्तियों, राष्ट्र की संपत्तियों पर कब्जा नहीं होता है, लोगों का शोषण नहीं होता है, हिंसा नहीं होती है, धूर्तता नहीं होती है। केवल कर चोरी होती है वह भी लिखापढ़ी की चतुराई व पारस्परिक निर्भरता से, मसलन खरीदार भी खुश होता है कि उसका वैट बच गया क्योंकि पक्का बिल नहीं बना। लगभग सभी स्तरों पर इस प्रकार के कालेधन की पैदाइश होती है।

    इस प्रकार का कालाधन जल्दी पकड़ाई में आ जाता है क्योंकि व्यापार के लिए व्यापारियों को कैश इन हैंड रखना होता है क्योंकि हर स्तर पर व्यापार कैश इन हैंड ही होता है ताकि बिक्री व आय कर से बचा जा सके। बहुत ऐसे व्यापार हैं जिनका चरित्र ही ऐसा होता है कि पूरा का पूरा व्यापार ही कैश इन हैँड से चलता है, व्यापारी चाहे तब भी वह बिल-वाउचर नहीं बना सकता है, संभव ही नहीं। इसलिए व्यापारी के न चाहते हुए भी उसके पास का धन तकनीकी रूप से कालाधन की श्रेणी में आ जाता है।

    बिक्रीकर के अधिकारियों, विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों व आयकर के अधिकारियों को दी जाने वाली घूस जो देनी ही है अन्यथा उनसे बिना मतलब की परेशानी लगातार झेलनी पड़ती है। यह राशि बिना बिल बाउचर में झोल किए हुए पैदा ही नहीं की जा सकती है। भारत में सरकारी अधिकारियों को इतने अधिक अधिकार हैं कि एक झटके में दशकों से चली आ रहे व्यापार को ताला पड़वा सकते हैं।

    इस प्रकार का कालाधन स्वेच्छा से कई गई कर चोरी व लालफीताशाही के प्रपंचों व प्रताड़नाओं की विवशता के कारण उत्पन्न होता है।

    धूर्तता, बर्बरता, क्रूरता व भ्रष्टाचार के व्यापक नेक्सस से पैदा किया गया कालाधन

    इस प्रकार का कालाधन भ्रष्टाचार, नौकरशाही के सामंती अधिकार, सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ व्यापक नेक्सस आदि से उत्पन्न होता है। इस प्रकार के कालेधन में हर एक पैसा कालाधन होता है और बिना अपवाद सारा का सारा कालाधन सार्वजनिक संपत्तियों व राष्ट्र की संपत्तियों पर कब्जे, देश के लोगों के शोषण व प्रताड़ना तथा बर्बरता व निर्लज्जता से पैदा किया जाता है।

    इस प्रकार का कालाधन बहुत अधिक खतरनाक होता है। भारत में नेक्सस इतना तगड़ा है कि इस कालाधन को साबित करना बिलकुल ही असंभव है। कालाधन रखने वाले मूछों में ताव देते हुए बाकायदा खुद को ईमानदार घोषित करते हुए रहते हैं, क्योंकि उनको पता है कि उनके पास कालाधन है यह साबित हो ही नहीं सकता है। इनको खुद पर नहीं नेक्सस पर विश्वास होता है।

    चूंकि हर स्तर पर नेक्सस है इसलिए लिखापढ़ी काफी दुरुस्त रहती है, या तो सभी पकड़े जाएं या कोई नहीं। इस नेक्सस में व्यापारी, NGO, मानवाधिकार कार्यकर्ता, मीडिया, न्यायपालिका, कार्यपालिका व विधायिका सभी गुथ्थमगुत्था हैं।

    इस प्रकार के कालेधन की उत्पादन की सबसे महत्वपूर्ण व मूलभूत कड़ी हर स्तर पर भारत की नौकरशाही है। बिना इस कड़ी के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। भ्रष्टाचार की जांच भी यही कड़ी करती है, भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्यवाही करने का अधिकार भी इसी कड़ी के पास रहते हैं। न्यायपालिका भी नौकरशाही ही है। सार्वजनिक व राष्ट्रीय संपत्तियों के संदर्भ में नीतियां बनाने का अधिकार भी इसी कड़ी के पास रहते हैं। बहुत गहरा व व्यापक नेक्सस है, इस नेक्सस को छुआ नहीं जा सकता, बिलकुल सुरक्षित नेक्सस। इनमें हर स्तर पर कालाधन पैदा करने वाली कड़ियों में तीन प्रमुख हैं। मीडिया को इनमें इसलिए नहीं रख रहा क्योंकि ऊपर के लेवल की बात यदि छोड़ दी जाए तो पत्रकारों के पास छोटा हिस्सा ही आ पाता है जबकि बदनामी अधिक पाता है।

    व्यापारी व NGO 

    मैं व्यापारी व NGO को इसलिए एक साथ रख रहा हूं क्योंकि सरकारी ग्रांट से चलने वाले NGO व व्यापारियों का चरित्र स्तर के श्रेणी पर एक समान ही होता है। NGO को ज्यादे खतरनाक व नीच इसलिए मानता हूं क्योंकि NGO सामाजिक विकास के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति कब्जाता है। नेक्सस व सेटिंग के आधार पर सरकारी ग्रांट से चलने वाले NGO कई प्रकार के होते हैं। इनमें से एक वे होते हैं जो स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों व नेताओं से सेटिंग करके प्रोजेक्ट लेकर पैसा कमाते व कमवाते हैं। इनके पास का एक-एक पैसा कालाधन होता है और लोगों के विकास के लिए प्रयोग किए जाने वाला पैसा होता है। इनके घर की एक-एक ईंट, इनके बच्चों के मुंह का एक-एक निवाला सभी कुछ देश की संपत्ति का होता है। बहुत व्यापारी लोगों ने इस प्रकार के NGO तंत्र को अपने धंधे के रूप में स्थापित कर लिया है।

    इनमें से बहुत NGO वाले ऐसे होते हैं जो नया-नया पैसा देखे होते हैं तो खूब दिखावा करते हैं व कूदफांद करते हैं, यदि इस प्रकार के मूर्खों को छोड़ दिया जाए तो यह कड़ी सुरक्षित कड़ी होती है।

    कुछ बड़े व्यापारी व NGO तो इतने ताकतवर होते हैं कि उनके लिए करोड़ों, अरबों व खरबों के प्रोजेक्ट राजनेताओं व नौकरशाही के नेक्सस द्वारा बनाए जाते हैं ताकि राष्ट्रीय संपत्तियों पर कब्जा किया जा सके। इन लोगों को कोई परेशानी न हो इसलिए देश के लोगों की सुविधा को ताक में रखकर नीतियां व नियम बनाए जाते हैं। यह कड़ी बहुत अधिक सुरक्षित कड़ी होती है।

    नेता

    इन सबमें सबसे असुरक्षित कड़ी नेता वाली होती है। कारण यह है कि नेता को अपने लगुओं-भगुओं की देखभाल करनी होती है। चुनाव लड़ना होता है। बिना चुनाव के भी अपनी फिजा बनाने के लिए लगातार पैसा खर्चते रहना पड़ता है। इसलिए नेता के पास पैसा है यह सबको दिखता है। नेता सबसे कम भ्रष्ट होते हुए भी सबसे अधिक बदनाम इसीलिए रहता है। नेता पकड़ा भी जाता है क्योंकि उसको अपने पास खर्चों के लिए कैश इन हैंड रखना पड़ता है, अन्यथा उनकी नेतागिरी ठप्प हो जाएगी।

    नौकरशाह

    सबसे सुरक्षित कड़ी नौकरशाह वाली होती है। सबसे अधिक भ्रष्ट, क्रूर, बर्बर व निर्लज्ज लेकिन सबसे अधिक ईमानदार मानी जाने वाली कड़ी। भ्रष्टाचार का कालाधन बिना नौकरशाही के उत्पन्न ही नहीं हो सकता। फिर भी सबसे अधिक ईमानदार मानी जाने वाली कड़ी क्योंकि इनकी संपत्ति व पैसा दिखता नहीं है। क्योंकि इनको कहीं खर्च ही नहीं करना है, दूसरा सारे अधिकार इन्हीं के पास हैं, सरकार से इतनी सुविधाएं मिलती हैं कि इनको अपनी संपत्ति व पैसा खर्च करने की जरूरत ही नहीं।

     

    इस प्रकार का कालाधन किसी गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल के चपरासी से लेकर देश के व्यापारियों, नेताओं व आला-नौकरशाहों तक सभी के पास होता है। वैसे संभव तो नहीं लेकिन हो सकता है कि देश में इक्का दुक्का सरकारी लोग सच में ही कालाधन की एक चवन्नी नहीं रखते हों।

     

    इस प्रकार वाले कालेधन का अधिकतर हिस्सा मुद्रा के रूप में नहीं होता है। इसका लेनदेन या तो अचल संपत्तियों के रूप में होता है या इसको अचल संपत्तियों के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। बेनामी संपत्तियों के रूप में होता है। विश्वसनीय रिश्तेदारों के व्यापार में अलिखित शेयर के रूप में प्रयोग होता है। विदेशी बैंको में जमा होता है फिर वहां से घुमा फिरा कर वापस भारत में व्यापारिक निवेश के रूप में लाया जाता है।

     

    दरअसल  समाज के विकास को अवरुद्ध करने वाला कालाधन यही धूर्तता, बर्बरता, क्रूरता व भ्रष्टाचार के व्यापक नेक्सस से पैदा किया गया वाला कालाधन होता है। लेकिन भारत में इसको छेड़ा तक नहीं जाता है, उल्टे समय-समय पर इसको बचाने के लिए झोल झपाटे वाले चोचलेबाजी की जाती है, लोगों को लगता है कि क्रांति हो रही है।

     

    चलते-चलते

    भारत में कम संख्या में ही सही लेकिन ऐसे भी नौकरशाह हैं जो भले लोग हैं, समाज के भले के लिए जज्बे के साथ काम करते हैं। समाज के विकास के लिए ऊर्जा से काम करते हैं। इनमें से लगभग सभी लोग यह जाहिर करते हैं कि वे आर्थिक रूप से बेहद ईमानदार हैं। मैं जानता हूं कि वे आर्थिक रूप से ईमानदार नहीं हैं। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि वे मेरे लिए उनका आर्थिक ईमानदार न होना बिलकुल भी मायने नहीं रखता। मेरे लिए उनका सामाजिक प्रतिबद्ध होना, समाज के भले के लिए जज्बे के साथ काम करना सर्वोच्च ईमानदारी होती है इसलिए मेरी दृष्टि में वे विशुद्ध ईमानदार हैं, इसलिए कोई उनके साथ खड़ा हो या न हो लेकिन मैं बिना किसी नेक्सस के आजीवन अपनी छोटी-बड़ी क्षमता के साथ उनके साथ खड़ा रहूंगा।

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  • आजाद भारत का अनोखा दिन – सैकड़ों वर्षों तक परित्यक्त रहे क्षेत्र अबुझमाड़ के बच्चों से भारत के राष्ट्रपति मिले और विशिष्ट अतिथियों जैसा आदर व स्नेह देते हुए स्वादिष्ट भोजन कराया

    आजाद भारत का अनोखा दिन – सैकड़ों वर्षों तक परित्यक्त रहे क्षेत्र अबुझमाड़ के बच्चों से भारत के राष्ट्रपति मिले और विशिष्ट अतिथियों जैसा आदर व स्नेह देते हुए स्वादिष्ट भोजन कराया

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    ढंके की चोट पर पूरी ताकत से कहना चाहता हूं कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह जी के दिशा निर्देशन में बस्तर में चल रहे कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन की दिशा में किए जाने वाले दूरदर्शी व जमीनी रचनात्मक कार्यों ने बस्तर का वास्तविक चेहरा बहुत ही अधिक बदला है। इसी कड़ी में अबुझमाड़ जैसे सैकड़ों वर्षों से परित्यक्त क्षेत्र का विकास का युगकालीन इतिहास रचने वाली टामन सिंह सोनवानी की टोली ने भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में एक अनोखा दिन रच दिया।

    अबुझमाड़ के बच्चे कल राष्ट्रपति से मिले, राष्ट्रपति भवन में कई घंटे रहे, राष्ट्रपति जी के व्यक्तिगत पुस्तकालय व दरबार हाल सहित पूरा राष्ट्रपति भवन तसल्ली से देखा। राष्ट्रपति महोदय ने बच्चों के स्वागत सत्कार के लिए विशेष अधिकारी को उत्तरदायित्व दिया।

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे भारत के राष्ट्रपति भवन में

    आस्ट्रेलिया से मेरी बच्चों से टेलीफोन के माध्यम से बात हुई, बच्चे इतने अधिक खुश थे कि मैं उनकी खुशी को किन शब्दों में बयान करूं समझ नहीं आ रहा। बच्चों ने बताया कि उन्होंने कितने प्रकार के व्यंजन खाए, कैसे राष्ट्रपति भवन घूमे, राष्ट्रपति भवन में क्या-क्या देखा, राष्ट्रपति महोदय से किस प्रकार बात की, आदि-आदि।

    भारत के राष्ट्रपति के साथ टामन सिंह सोनवानी, डा० संतोष कुमार देवांगन, अबुझमाड़ के बच्चे व अन्य अधिकारी गण।

    बच्चों के लिए स्वादिष्ट व्यंजनों के स्वाद से बड़ी खुशी इस बात की थी कि उनके अपने देश के राष्ट्रपति ने उनको उस विशिष्ट स्थान पर भोजन कराया जहां विदेशों से आने वाले राष्ट्राध्यक्ष जैसे विशिष्ट अतिथिगण भोजन करते हैं। अपने देश के राष्ट्रपति से इतना आदर व स्नेह प्राप्त कर बच्चे गदगद हैं।

    मुझे आशा है कि इस यात्रा से इन बच्चों में इतना आत्मविश्वास व उत्साह भर जाएगा कि वे अपने जीवन में महान कार्य करेंगें और अपने क्षेत्र का विकास करने व लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना अकल्पनीय योगदान देंगें।

    इस अनोखे दिन व घटना के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह व उनकी सलाहकार टोली, बस्तर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक कल्लूरी, नारायणपुर के पूर्व पुलिस अधीक्षक अमित तुकाराम कांबले, वर्तमान पुलिस अधीक्षक अभिषेक मीणा व वर्तमान अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी डा० संतोष कुमार देवांगन को बधाई व शुभकामनाएं। नारायणपुर के जिलाधिकारी टामन सिंह सोनवानी व उनकी टोली को विशेष बधाई।

    भारत के राष्ट्रपति महोदय को भारत के लोगों की ओर से आभार व बच्चों को उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाएं।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • हमारे प्रधानमंत्री जी को “कौटिल्य-शास्त्र” की चौपतियाओं व नारा-संस्कृति वाली क्रांतिकारिता से बाहर आने की महती जरूरत है

    सामाजिक यायावर


    इसमें संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी जी की मंशा रहती है कि देश बेहतर हो। लेकिन केवल मंशा रखने भर से, नारे देने व भक्तों के तर्क वितर्क कुतर्क से कुछ भी साबित करते रहने से देश का निर्माण नहीं होता, देश आगे नहीं बढ़ता है।

    झाड़ू लेकर सफाई हो, बेटी बचाओ वाली बात हो, 24 घंटे बिना सोए देश के लिए काम करता हूं या ऐसी ही अन्य बातें। सभी नारे के रूप में निकलीं, नारे के रूप में प्रायोजित हुईं और धरातलीय वास्तविकता पर सड़ियल दिखावे व चोचलेबाजी के रूप में परिवर्तित होकर अपनी परिणति को प्राप्त हुईं। 

    pm-india-narendra-modiशायद हमारे प्रधानमंत्री जी को ऐसा लगता है कि वे 24 घंटे बिना सोए देश के लिए काम करते हैं जैसे नारों को प्रायोजित कर देने मात्र से देश का तंत्र जिम्मेदार व कार्यशील हो जाता है। सफाई का नारा दे देने मात्र से लोग सफाई करना शुरू कर देंगें। बेटी के साथ सेल्फी का नारा देने मात्र से लोग कन्या भ्रूण हत्या बंद कर देंगे, दहेज बंद हो जाएगा, प्रेम विवाहों का स्वागत होने लगेगा, लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की आजादी मिल जाएगी।

    कम से कम मुझे यह बिलकुल भी नहीं लगता कि मोदी जी यह चाहते होगें कि उनके दिए गए नारों की परिणति इस प्रकार हो। मोदी जी नारे देते हैं, क्योंकि उनको लगता है कि उनका काम नारे देने का है और लोग उनके नारों को सामाजिक बदलाव वाले आंदोलनों का रूप दे देगें। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता, उनके दिए नारे बहुत ही सड़ियल परिणति को प्राप्त होते हैं।

    हमारे प्रधानमंत्री जी समझ ही नहीं पाए हैं कि नारों से जीवन जीने की प्रमाणिकता में अंतर नहीं आता है। वे देख ही नहीं पाए कि सफाई, बेटी बचाओ आदि जैसे मुद्दों पर उनके दिए नारों का जमीन पर क्या परिणति हुई। किस प्रकार उनके दिए नारे जमीन पर आते-आते सड़क छाप नारा व चोचलेबाजी का रूप ले लिए।

    नारों की इस तरह परिणति होने में प्रधानमंत्री जी के भक्तों व अंध भक्तों का बहुत बड़ा योगदान है। क्योंकि उनके अंध भक्त भी यही मानते हैं कि हमारा प्रधानमंत्री केवल नारे देता है, हवाई बातें करता है जिसका जीवन जीने की प्रमाणिकता से कोई संबंध नहीं। इसलिए प्रधानमंत्री जी के अंध भक्त लोग तक भी प्रधानमंत्री जी के नारों को जीवन में उतारने की बजाय गैर-भक्तों के साथ तर्को, कुतर्को व गाली गलौज से प्रधानमंत्री जी के नारा-प्रयासों की और अधिक छीछालेदर करते रहते हैं।

    तर्क, वितर्क, कुतर्क व गाली गलौज की बजाय यदि भक्त व अंध भक्त गण प्रधानमंत्री जी के दिए नारों को खुद अपने ही जीवन में उतार कर जीना शुरू कर देते तो बिना अतिरिक्त प्रयास के ही प्रधानमंत्री जी लोकप्रियता घटने की बजाय बढ़ती और भक्तों को गाली गलौज करने तथा फर्जी गाथाएं, फर्जी फोटुवें व फर्जी रपटें गढ़ने की कोई जरूरत नहीं होती, लोग खुद ब खुद मोदी जी के फालोवर बनते चले जाते और मोदी जी के नारे जनांदोलन का रूप ले लेते।

    दरअसल जितने भी गांधी विरोधी लोग हैं, जो गांधी को नहीं समझते हैं या गांधी के कारण जिनके वेस्टेड इंटरेस्ट्स को क्षति पहुंचती है, वे सभी यही समझते कहते व प्रायोजित करते हैं कि गांधी को अंग्रेजो ने प्रायोजित किया। बहुत लोग तो ऐसे हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया यही प्रायोजित करने में कि गांधी में कोई खासियत नहीं थी वे केवल अंग्रेजों द्वारा प्रायोजित थे।

    इस प्रकार की सोच रखने वाले विकृत मानसिकता वाले लोगों को यही लगता है कि महानता, मानवीय मूल्य, संवेदनशीलता, ईमानदारी, त्याग आदि जीवन में जीकर प्रमाणित होने वाले मूल्य न होकर केवल सत्ताओं द्वारा प्रायोजित किए जाने वाले मूल्य हैं। इसलिए ऐसे लोग मूल्यों को स्वयं में प्रमाणिकता से जीने की बजाय सत्ता व सत्ता द्वारा स्वयं के प्रायोजित करवाने के तिकड़मों में लगे रहते हैं।

    परिणाम यह होता है कि समाज व समाज के लोग जीवन मूल्यों के प्रति अवहेलना व तिरस्कार की अवस्था की ओर बढ़ जाते हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी के भक्त व अंध भक्त गण ऐसी ही अवस्थाओं में जीने वाले लोग होते जा रहे हैं। जिन्हें उचित-अनुचित, सही-गलत, मूल्यों व संवेदनशीलता का भान नहीं। तुर्रा वे यह सोचते हैं कि वे देश निर्माण में प्रधानमंत्री जी के साथ कंधा से कंधा से मिलाए खड़े हैं।

    500 व 1000 रुपए को बंद करने वाले मुद्दे की ही बात कर ली जाए। जो भी ईमानदार चिंतक है जिसे सामाजिक अर्थशास्त्र की समझ है वह अच्छी तरह जानता है कि 500 व 1000 रुपयों को बंद करने की कवायद जिस तरह के झोल झपाटे से हुई उसका काला-धन समाप्ति व भ्रष्टाचार नियंत्रण से दूर-दूर तक कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता है। लेकिन भक्तगण पिले पड़े हुए हैं। इसके लिए इमोशनल नारे व इमोशनल ब्लैकमेल करने वाले तर्क गढ़ते हैं। इन सब चोचलों से आम आदमी कशमशा कर रह जाता है, उसके सोचने समझने की शक्ति कुंद होती चली जाती है। 

    व्यक्तिगत रूप से मैं इसमें प्रधानमंत्री जी का दोष नहीं मानता, दोष उनकी समझ का है उनके भावों का नहीं। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जी अर्थशास्त्री है ही नहीं, उन्हें तो अर्थशास्त्र का ककहरा भी शायद ही आता हो। वे तो कौटिल्य शास्त्र, जो राजतंत्रीय काल में आधुनिक व्यवस्था से बिलकुल ही भिन्न व्यवस्था में लिखा गया था, का अनुसरण करने वाले प्राणी हैं। उदाहरण के लिए मान लीजिए यदि कौटिल्य ने कहीं लिख दिया कि मुद्रा का विमूल्यीकरण कर देना चाहिए तो हमारे प्रधानमंत्री जी के लिए यह ब्रह्मवाक्य होगा और वे बिना सोचे विचारे विमुद्रीकरण कर देंगें वह भी इस अहंकार के साथ कि वे जो कर रहे हैं वह व्यवस्था परिवर्तन के लिए है। मैं यह बिलकुल नहीं कह रहा हूं कि प्रधानमंत्री जी ने वर्तमान विमुद्रीकरण कौटिल्य जी से पूछकर किया। मैंने केवल उदाहरण दिया अपनी बात को समझाने के लिए।

    आगे का काम हमारे प्रधानमंत्री जी के भक्त गण संभाल लेते हैं। पिल पड़ते हैं मोदी जी की बात को सही व ऐतिहासिक साबित करने के लिए। भले ही इसके लिए किसी निहायत ही सड़ियल सी टेक्स्ट बुक के किसी पन्ने को नीला पीला करके बताना पड़े कि देखो वहां लिखा है कि विमुद्रीकरण करना चाहिए। बस हो गया भक्तों का काम खतम। भारत व भारत के लोग चाहे गर्त में चले जाएं। बिना सवाल अपने आराध्य की भक्ति रूपी भक्तियोग परंपरा में महान योग के रूप में प्रतिष्ठित है ही। 

    दरअसल 500 व 1000 रुपयों को खतम करने वाली बात उतनी सीधी व सपाट है नहीं जितनी इसको लागू करते समय बताई गई व प्रायोजित की गई थी। ढेर सारे टेढ़े मेढ़े पेंच हैं। खैर फेसबुक में या पब्लिक में खुलेआम इन पेंचों की बात नहीं की जा सकती। जो दृष्टि रखते हैं उनको शुरू से ही अंदाजा हो गया था। जिनके पास दृष्टि नहीं है उनको तो हाथी सूप, रस्सी, खंभे आदि रूप में ही दिखेगा। खैर…

    मोटा-मोटी यह समझा जाए कि माननीय प्रधानमंत्री जी खुद को क्रांतिकारी व राष्ट्र निर्माता के रूप में प्रायोजित करने में बहुत तगड़ी हड़बड़ी कर गए। उनके द्वारा दिए गए नारों को ही उनके भक्तगण देश निर्माण, देश प्रेम, देश भक्ति, जागरूकता, प्रगतिशीलता व विकास की कसौटी मानते हैं। इसलिए मोदी जी भी नारा-आसक्ति में जीते हैं। सो उन्होंने 500 व 1000 नोटों के मामले में काला धन वगैरह-वगैरह का क्रांतिकारी नारा दिया और निकल लिए। बाकी का काम उनके भक्तों व उनकी कैबिनेट ने संभाल लिया जिसमें देश के लोगों को इमोशनल टच देते हुए बयानबाजी करते रहना है जैसे देश के लिए इतना तो कष्ट भोगना ही पड़ेगा। देश के लिए यह, देश के लिए वह, इत्यादि।

    आम आदमी के लिए देश कल्याणकारी होने की बजाय लगातार कष्ट देने व बलिदान मांगने की मशीन हो गया। लोकतांत्रिक देश लोगों के कल्याण के लिए होता है। जिम्मेदार व ईमानदार जनप्रतिनिधि देश के लोगों के पहले स्वयं कष्ट भोगने की शुरुआत करता है। लेकिन यहां तो मानो केवल आम आदमी ही देश बनाने के लिए जिम्मेदार हैं सो केवल और केवल वही कष्ट भोगें और लगातार भोगेंगे। मानो उनकी पैदाइश ही हुई है कष्ट भोगने के लिए, कष्ट भोग-भोग कर देश निर्माण के लिए।

    देश के आम आदमी की हालात पुराने जमाने के शूद्रों जैसी है। जिनका जन्म ही होता है कष्ट भोगने के लिए। कष्ट भोगना उनकी ईश्वरीय नियति मान ली जाती है। शूद्र कष्ट भोगते गए ऊपर वाले मौज करते गए। बिलकुल वैसे ही आम आदमी कष्ट भोग-भोग कर देश निर्माण करता रहे और ऊपर वाले मौज करते रहें।

     

    दरअसल भारत जैसे देशों में जहां का ढांचा भले ही कागज में लोकतंत्र की बात करता हो लेकिन वास्तविक चरित्र सामंतवादी का होता है उन देशों में जो नेता लोग बहुत लंबे समय तक सत्ता या सत्ता के नजदीक रहते हैं, उनमें इतना अधिक अहंकार व मद आ जाता है कि वे आम लोगों को तकलीफों के प्रति घोर असंवेदनशील हो जाते है। उनको देश के आम लोग लिजलिजाते कीड़े-मकोड़े की तरह लगते हैं। उनको लगता है कि आम आदमी की पैदाइश ही लिजलिजा जीवन जीते रहने के लिए ही होती है। वर्तमान भारत सरकार के कैबिनेट मंत्रियों व भक्तगणों के बयानों व तर्कों से तो यही लगता है कि उनकी असंवेदनशीलता सीमाएं पार कर चुकी है। उनको लगता है कि आम लोग तो पैदा ही हुए हैं लिजलिजाते कीड़े मकोड़ों के रूप में घिसटती हुई जिंदगी जीने के लिए। 

    जबकि स्थिति यह है कि इस झोल झपाटे से देश को आर्थिक रूप से भयंकर क्षति हुई है, लंबे समय तक लगातार क्षति होती रहेगी। देश कब उबर पाएगा इसका अंदाजा नहीं। भक्तगण क्या कहते हैं इसकी बात न की जाए क्योंकि वे तो देश को आर्थिक महाशक्ति एक घंटे में बना दें, सोशल मीडिया है ही। क्या पता आर्थिक महाशक्ति बना भी चुके हों, इसलिए शायद कुछ दिनों में सोशल मीडिया में तैरते-उतराते भारत महान आर्थिक शक्ति के तौर पर हमारे आपके पास पहुंच भी जाए।

     

    मैं मोदी जी के कई गुणों का प्रशंसक हूं, उनकी कई नीतियों का आलोचक भी हूं। लेकिन मैंने एक बात पर हमेशा विश्वास किया है कि मोदी जी देश के लोगों के प्रति निर्दयी नहीं हैं, हिंदुत्व के दर्शन पर विश्वास करते हैं। लेकिन देश के आम लोगों को लिजलिजाते कीड़े-मकोड़े समझना, उनसे हमेशा देश निर्माण के नाम पर कष्ट भोगते रहने की ही इमोशनल मांग करते रहना और खुद विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र बजाने का आनंद लेना। कुछ भी हो सकता है लेकिन महान गौरवाशाली हिंदुत्व संस्कृति दर्शन नहीं ही हो सकता। 

    प्रधानमंत्री जी व उनके भक्तों को समझने का प्रयास करना चाहिए कि अब राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है। राजतंत्र में राजा गलतियां करते हुए, आम लोगों को कष्ट देते हुए भी राजा बना रहता है। लेकिन लोकतंत्र में गलतियां करते जाना बहुत कुछ बदल देता है। लोकतंत्र में लोग अपने कष्ट को कम करने के लिए जन-प्रतिनिधियों को शक्ति देते हैं। आम आदमी कभी भी यह सवाल खड़ा कर सकता है कि क्या देश निर्माण में कष्ट भोगने का ठेका सिर्फ उस आम आदमी का ही है जिसका जीवन पहले से ही कष्ट में है।

    विश्वास कीजिए एक दिन यह आम आदमी जिसे लिजलिजाता हुआ कीड़ा-मकोड़ा समझा जाता है, खुद को लिजलिजाता कीड़ा-मकोड़ा मानने से मना कर सकता है। क्योंकि आम आदमी देख सकता है कि देश निर्माण के नाम पर कष्ट भोगते रहने के बावजूद उसकी स्थिति में अंतर नहीं आता है, जो देश निर्माण के नाम पर कष्ट नहीं भोगते हैं उनकी स्थिति जरूर ही और बेहतर होती चली जाती है। उस दिन आम आदमी इमोशनल ब्लैकमेल करने के लिए चतुराई से गढ़े गए खूबसूरत तर्कों को भी धता बता देगा।

     

    भक्तगण कुछ भी कहें लेकिन लोगों की सोच व समझ प्रतिक्षण बदल रही है। लोग अपने आराम व स्वार्थ के प्रति प्रतिपल जागरूक हो रहे हैं। लोगों को दिखता है कि कैसे उनको कष्ट मिलता है देश निर्माण के नाम पर और कुछ प्रतिशत लोग कैसे मौज करते हैं। इन सबमें देश की ऊर्जा बर्बाद होती है, देश व समाज के लोगों के मूल्य पतित होते चले जाते हैं।

    सत्ता में बने रहने के लिए इमोशनल ब्लैमेलिंग व लोगों की गलत कंडीशनिंग करने की बजाय लोगों के कल्याण के लिए गंभीर व दूरदर्शी काम करते रहना चाहिए। सत्ता में बने रहने के लिए कौटिल्य शास्त्र व नारा-क्रांतिकारिता शायद ही बार-बार काम आ पाए। देश के प्रधानमंत्री को नारा-क्रांतिकारिता व कौटिल्य शास्त्र से बाहर निकल आना चाहिए। 

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  • राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र के संवेदनशील लोगों के लिए सूचना – अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे आपसे मिलने दिल्ली पहुंच चुके हैं

    सामाजिक यायावर


    अबुझमाड़ भारत का वह आदिवासी इलाका है जहां पर 2009 तक अबुझमाड़ से बाहर के लोगों के लिए अबुझमाड़ में प्रवेश प्रतिबंधित रहा था। माओवादियों ने जंगल के प्रवेश मार्गों पर लैंड माइन्स लगा कर प्रशासनिक सेवाओं का मार्ग अवरुद्ध कर रखा था। इसलिए अबुझमाड़ के आदिवासी लोग हमारी आपकी दुनिया से कटे रहे, अपरिचित रहे।

    Dr Santosh Kr Dewangan

    डा० संतोष कुमार देवांगन, अतिरिक्त जिला दंधाधिकारी, ADM, नारायणपुर ने टेलीफोनिक चर्चा के दौरान बताया कि श्री टामन सिंह सोनवानी, जिलाधिकारी, DM, नारायणपुर के निर्देश पर वे व श्री दीपक हिरवानी, निजसचिव, जिलाधिकारी नारायणपुर अबुझमाड़ के बच्चों के साथ दिल्ली भ्रमण पर पहुंच चुके हैं।

    अबुझमाड़ क्षेत्र के ये आदिवासी बच्चे भारत के राष्ट्रपति आदि से मिलने, लोकतंत्र के विभिन्न पहलुओं को समझने, संसद, सेना मुख्यालयों, चुनाव आयोग, लाल किला, कुतुबमीनार आदि देखने के लिए दिल्ली कुछ दिनों के लिए आए हैं।

    यदि आप इन बच्चों से मिलकर उनका हौसला बढ़ाना चाहते हैं, उनका नई दुनिया में स्वागत करना चाहते हैं, उनको महसूस कराना चाहते हैं कि उनके घर अबुझमाड़ के बाहर की दुनिया व लोग कैसे हैं। तो आप इन बच्चों से मिलें, उनके साथ कुछ समय बिताएं। 

    यदि आप ऐसा करने के इच्छुक हैं तो आपकी सुविधा के लिए दिल्ली में बच्चों के प्रस्तावित-कार्यक्रम व संपर्क की सूचना निम्न है।

     

    • 11 नवंबर – भारत के राष्ट्रपति, लोटस टेम्पल व इंडिया गेट
    • 12 नवंबर – कुतुब मीनार, विज्ञान भवन, हुमाऊँ का मकबरा, राजघाट
    • 13 नवंबर – अक्षरधाम मंदिर, मेट्रो ट्रेन, अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, विभिन्न देशों के राजदूतों के कार्यालय
    • 14 नवंबर – थलसेना मुख्यालय, वायुसेना मुख्यालय, जलसेना मुख्यालय, CRPF मुख्यालय
    • 15 नवंबर – भारतीय चुनाव आयोग, खेलगांव
    • 16 नवंबर – नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT), भारत के प्रधानमंत्री, भारत की संसद, मीडिया संस्थान

     

    संपर्क :
    डा० संतोष कुमार देवांगन, अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी, ADM, 09425253589 व
    श्री दीपक हिरवानी, निज सचिव, जिला दंडाधिकारी (जिलाधिकारी), DM, 09425595244

     

    यह कार्यक्रम किसी NGO का फंड से आयोजित कार्यक्रम नहीं है। यह जिला प्रशासन के संवेदनशील अधिकारियों का कार्यक्रम है। यहां तक कि इन अधिकारियों ने इस आयोजन में होने वाले खर्च में सहयोग के लिए अपने वेतन में से आर्थिक सहयोग भी किया है। इन अधिकारियों ने अबुझमाड़ में क्या काम किए और कर रहे हैं, उसका कुछ अंश समझने व जानने के लिए आप दी हुई लिंक पर जाकर लेख पढ़ सकते हैं।

     

    अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे DM, ADM व अन्य के साथ

  • सेवाभावी सुकमा बड्डे : अबुझमाड़ की पहली मड़िया आदिवासी नर्स

    सेवाभावी सुकमा बड्डे : अबुझमाड़ की पहली मड़िया आदिवासी नर्स

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    सुकमा बड्डे अबुझमाड़ क्षेत्र की पहली मुरिया आदिवासी लड़की है जिसने स्नातक किया है। सुकमा बड्डे ने रामकृष्ण मिशन के आवासीय छात्रावास में रहकर 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। 12वीं के बाद भिलाई के संस्थान से नर्सिंग में B.Sc स्नातक किया।

    सुकमा बड्डे ने अपनी इच्छा के लिए कि वह अबुझमाड़ में जरूरतमंद लोगों के लिए काम करेगी, शहर में रहकर नौकरी करते हुए आरामदेह व सुरक्षित जीवन जी पाने की संभावनाओं पर कभी विचार ही नहीं किया। विचार ही नहीं किया कि उसके पास छत्तीसगढ़ की राजधानी में घर हो सकता है, वह महंगे रेस्टोरेंट में खाना खाने जा सकती है, कार खरीद सकती है, ग्लैमर का जीवन जी सकती है।

    सुकमा बड्डे जो विशेष आदिवासी क्षेत्र से है, विशेष आरक्षण की सुविधा का प्रयोग करते हुए किसी शहर में नौकरी पाना उसके लिए बहुत मुश्किल नहीं था। लेकिन स्नातक के बाद इन संभावनाओं को तिलांजलि देते हुए वह अबुझमाड़ लौटी। उसने स्वास्थ्य विभाग में नर्स की नौकरी के लिए आवेदन दिया, जो भी कारण रहा हो लेकिन उसके आवेदन को स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने अस्वीकृत कर दिया।

    Sukma Badde

    लगभग दो वर्ष पूर्व जब टामन सिंह सोनवानी जिलाधिकारी होते हुए भी अबुझमाड़ के गांवों में स्वास्थ्य शिविर लगवाते घूम रहे थे। तब सुकमा बड्डे उनसे मिली और नर्स की नौकरी की मांग की। टामन सिंह सोनवानी को बड़ा ताज्जुब हुआ जब उनको मालूम पड़ा कि अबुझमाड़ जैसे क्षेत्रों की माड़िया आदिवासी लड़की ने इतना पढ़ाई की है। उनको लगा कि उनको इस लड़की का सहयोग करना चाहिए। उन्होंने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए सुकमा बड्डे को नारायणपुर जिला अस्पताल में नर्स की नौकरी दिलवा दी।

    नौकरी पाने के अगले दिन सुकमा बड्डे नारायणपुर जिलाधिकारी टामन सिंह सोनवानी के पास आती है और कहती है कि वह जिला अस्पताल में नौकरी नहीं करना चाहती है वह तो अपने क्षेत्र के पिछड़े गावों की सेवा करना चाहती है।

    ऐसी भावना व कार्य करने का जज्बा देखकर सुकमा बड्डे का स्थानांतरण अबुझमाड़ के गावों में कर दिया गया। सुकमा बड्डे उत्साह व जज्बे के साथ गांवों के लोगों की सेवा में लगी हुई हैं। एक ऐसी लड़की जिसने बेहतर जीवन की संभावनाओं को त्याग कर अबुझमाड़ जैसे शताब्दियों से अपवर्जित क्षेत्र में स्वेच्छा व जिद से जाकर आदिवासियों की सेवा करने का भाव रखा। उस सुकमा बड्डे को माओवादी क्रांतिकारी प्रशासन का इंफारमर कहते हुए धमकी देते हैं।

    स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध न रहने के कारण असमय अपनी माता को खो चुकी सुकमा बड्डे का अपराध क्या सिर्फ यह है कि वह जागरूक है, उसमें पढाई करने का जज्बा था और उसने अपने जीवन में एक निर्णय लिया कि उसको अपने इलाके में लोगों के स्वास्थ्य के लिए जीवन समर्पित करना है ताकि उसकी माता जैसा दर्द औरों को न झेलना पड़े। इस निर्णय के लिए उसने पढ़ाई पढ़ी, शहरों में नौकरी करके आरामदेह जीवन यापन करने की संभावनाओं को त्यागा। नारायणपुर जिला अस्पताल में लगी सरकारी नौकरी नहीं करने की इच्छा जाहिर की।

    ऐसी सेवाभावी व दृढ़ निश्चयी लड़की को तो सलाम करना चाहिए। सुकमा बड्डे को कोटि-कोटि सलाम।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • ​हिंदुओं को समान नागरिक संहिता (कॉमन सिविल कोड) के नुक्ते समझने होगें

    सामाजिक यायावर


    भारत में जब भी कामन सिविल कोड की बहस शुरू होती है तब यह बहस मुसलमान धर्म की कुछ बातों जैसे चार पत्नियां रखने की अनुमति उनके धर्म में होना व तीन बार तलाक बोल कर तलाक हो जाने जैसी बातों तक ही सीमित रह जाती है। यूं लगता है कि जैसे कामन सिविल कोड का नाम केवल कामन सिविल कोड है किंतु इसमें कामन व सिविल जैसा कुछ है ही नहीं। क्योंकि कामन सिविल कोड की बहस मुसलमान धर्म में चार विवाहों की अनुमति व तीन तलाक आदि तक ही सीमित हो जाती है। यूं लगता है जैसे बहस कामन सिविल कोड पर न होकर एंटी-मुस्लिम कोड पर होनी है।

    गहराई से देखने पर दिखने लगता है कि कामन सिविल कोड के लागू न हो पाने में सबसे अधिक पेंच तो हिंदू धर्म से आएंगें। चूंकि मुस्लिम घृणा को हिंदुत्व, महानता, विश्वबंधुत्व, संस्कृति, संस्कार, राष्ट्रभक्ति व सहिष्णुता आदि मानने वाले हिंदुओं को यह लगता है कि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू धर्म की परंपराओं का पालन करना होगा। सच तो यह है कि इन लोगों को कामन सिविल कोड के ककहरे का भी अंदाजा नहीं।

    प्रासांगिक यथार्थ तो यही है कि वास्तव में कामन सिविल कोड एक असमाधानित मुद्दा है जिसे हिंदुओं के अंदर एंटी-मुस्लिम भावना को हवा देते रहने के लिए जीवित रखा जाता है।

    मुस्लिम व हिंदू समाजों में वैधानिक/अवैधानिक एक से अधिक पत्नियां :

    मुस्लिम समाज में चार पत्नियां रखने की अनुमति है लेकिन बहुत ही कम प्रतिशत होगा जो वास्तव में एक से अधिक पत्नी रखने की माली हैसियत रखता होगा। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि मुस्लिम धर्म में एक से अधिक पत्नियां रखने वाले लोग नहीं होगें। होगें जरूर होगें लेकिन प्रतिशत बहुत ही कम है।

    मुस्लिम धर्म में एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति होने के बावजूद भारत में जितने प्रतिशत मुसलमान एक से अधिक पत्नियां रखते होगें। हिंदूओं में एक से अधिक पत्नियों की अनुमति न होने के बावजूद उससे अधिक प्रतिशत हिंदू रखैलें व दूसरी पत्नियां रखते होगें। बेहतर हो कि हिंदुओं को भी एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार दे दिया जाए। चोरी छिपे रखैल रखने या दावपेंच करके दूसरी पत्नी रखने से बेहतर होगा कि खुल्लमखुल्ला अधिकार मिल जाएं।

    मैंने तो ऐसे ऐसे हिंदू देखे हैं जो अपनी दो-दो पत्नियों को साथ लेकर खुलेआम घूमते हैं। दोनों पत्नियों से संतानें। यात्रा करते समय कार की सीट में वे बीच में बैठते हैं और उनके दोनों बगल उनकी दो पत्नियां बैठतीं हैं। दो पत्नियों के अलावे रखैंलें अलग से।

    बहुत हिंदू ऐसे हैं जो दबंग नहीं हैं, पारिवारिक कलह को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, वे रखैंले रखते हैं। रखैल को बाकायदा अलग घर देते हैं, महीने का पूरा खर्चा, रखैल से बच्चे भी उनका पूरा खर्चा। मतलब यह कि समानांतर एक और परिवार चलाते हैं। अंतर केवल यह कि रखैल को वैधानिकता नहीं हासिल।

    मुस्लिम समाज व हिंदू समाज में वैधानिक अवैधानिक तरीके से एक से अधिक पत्नियां या सहपत्नियां रखने वालों का प्रतिशत लगभग बराबर ही होगा। इसलिए व्यवारिक व चारित्रिक अंतर तो कुछ रहा नहीं।

    आदिवासी समाजों में एक से अधिक पत्नियां :

    भारत के आदिवासी समाजों में अधिकतर आदिवासी समाज पुरुष सत्ता की परंपरा वाले हैं। मुस्लिम धर्म में अधिकतम चार पूर्णकालिक पत्नियां रखने का अधिकार है। लेकिन भारत के अधिकतर आदिवासी समाजों में तो ऐसी व्यवस्था है कि आदिवासी पुरुष जितनी मर्जी हो उतनी पत्नी रख सकता है। यह भी एक कटु सत्य है कि भारत में अधिकतर आदिवासी लोग जिनका शहरीकरण नहीं हुआ है उनमें से अधिकतर लोग एक से अधिक पत्नियां रखते हैं। मैं अपने जीवन में ऐसे हजारों आदिवासियों से मिला हूं जिनके पास एक से अधिक पत्नियां हैं। या यूं कहूं कि जितने आदिवासियों से मिला हूं उनमें से अधिकतर के पास एक से अधिक पत्नियां हैं/थीं। आदिवासियों में एक से अधिक पत्नी रखना इसलिए भी आसान है क्योंकि महिला ही खेतों में काम करती है, जंगल से जंगल-उत्पाद चुन कर लाती है और उसके द्वारा किए गए उत्पादन पर उसके पति का मालिकाना हक होता है। तो जिसके पास जितनी अधिक पत्नियां उसकी उतनी अधिक आय। पत्नी को खाना, कपड़ा और झोपड़ी में एक कोना मिल जाए, बस यही बहुत है। इसमें भी खाना पत्नी ही बनाती है, कपड़े भी पत्नी ही बनाती है, झोपड़ी भी पत्नी ही बनाती है फिर भी यह सब पति के द्वारा दिया गया माना जाता है। इसलिए अधिकतर आदिवासियों ने जिनके पास कुछ पेड़ या कुछ जमीन है, मतलब खाने का जुगाड़ हो, एक से अधिक पत्नियां रख रखीं हैं।

    कामन सिविल कोड :

    अभी हिंदुओं के मंदिरों में बहुत ऐसे मंदिर हैं जिनके विवाह प्रमाणपत्र को वैधानिक दर्जा प्राप्त है। हिंदू रीतियों से होने वाले विवाहों का विवाह विभाग में पंजीकरण करवा लिया जाता है, क्योंकि हिंदू रीति से विवाह को मान्यता प्राप्त है। कामन सिविल कोड के लागू होने पर या तो हिंदुओं से यह सुविधाएं छिन जाएंगीं या सभी धर्मों को वर्तमान में प्राप्त सुविधाएं मिलती रहेंगी। कामन सिविल कोड का मतलब ही यही है कि सभी नागरिकों के लिए समान संहिता। इसका यह मतलब कतई नहीं कि समान सहिंता में हिंदू धर्म के तौर तरीके होगें। या तो सभी धर्मों को प्राप्त सुविधाएं बरकरार रहेंगीं या सभी धर्मों को प्राप्त सुविधाएं खतम कर दी जाएंगीं। जो भी होगा वह सभी के लिए समान होगा।

    यदि ये सुविधाएं बरकरार रहतीं हैं तो कामन सिविल कोड का औचित्य ही खतम हो जाता है। यदि खतम कर दी जातीं हैं तो हिंदू लोग भी कितना तैयार होगें यह विचारणीय तथ्य है। क्योंकि अभी तो हिंदुओं की कल्पना यही है कि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू धर्म के रीति रिवाज।

    कामन सिविल कोड यदि धर्मों की इन सुविधाओं को खतम करता है जो करना ही पड़ेगा तो पारंपरिक विवाहों की मान्यता खतम हो जाएगी। भले ही कई लाख लोगों के सामने अग्नि के सत्तर फेरे लीजिए लेकिन विवाह अवैधानिक होगा, अमान्य होगा। विवाह किसे कहा जाए इसकी परिभाषा तय होगी जो किसी धर्म के रीति रिवाजों की बजाय सभी नागरिकों के लिए समान होगी।

    आदिवासी समाजों के अधिकतर विवाह अमान्य घोषित हो जाएंगें।

    दरअसल कामन सिविल कोड बहुत ही टेढ़ी खीर है, बहुत ही अधिक पेंचदार चूड़ी है। अभी भारत के लोग कामन सिविल कोड के लिए मानसिक व सामाजिक रूप से तैयार भी नहीं हैं। हंगामा तो इसलिए होता है क्योंकि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू सिविल कोड या एंटी मुस्लिम कोड मान लिया जाता है। भारत हिंदू राष्ट्र नहीं है जो हिंदू सिविल कोड को कामन सिविल कोड मान लिया जाएगा। हिंदू सिविल कोड में भी किस जाति की परंपरा को हिंदू सिविल कोड माना जाए, यह भी बहुत पेंचदार है।

    हिंदू जब कामन सिविल कोड के समर्थन की बात करता है तो यह भूल जाता है कि उनके धर्म में हजारों जातियां व उपजातियां हैं, सबने दूसरे से अलग दिखने के लिए अपने लिए अलग-अलग रीति रिवाज व परंपराएं बनाई हैं, जो कामन सिविल कोड के लिए सबसे बड़े रोड़े बनेंगें, जब भी कामन सिविल कोड की गंभीर बहस शुरू होगी। अधिकतर हिंदुओं की मान्यता में तो कामन सिविल कोड को एंटी-मुस्लिम कोड या हिंदू सिविल कोड के रूप में देखा समझा जाता है इसलिए वास्तविक व बारीक नुक्तों पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है, न ही जानने समझने की चेष्टा ही की जाती है।

    चलते – चलते :

     

    कामन सिविल कोड में सबसे बड़ी बात यह होगी कि किसी भी परिस्थिति में एक से अधिक पत्नी रखना अवैध होगा, क्योंकि स्त्री भी एक नागरिक है। यदि पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार होगा तो स्त्री को भी एक से अधिक पति रखने का अधिकार होगा। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि एक पति कई पत्नी रखे और उसकी पत्नियां कई-कई पति। इसलिए उन हिंदुओं का क्या होगा जिन्होंने दो-दो या तीन-तीन पत्नियां कर रखीं हैं। हिंदू को एंटी-मुसलमान आवेश से बाहर निकल कर कामन सिविल कोड की जमीनी हकीकत को जानने समझने का प्रयास करना चाहिए।

     

    सभ्य लोगों के सभ्य देश का कानून किसी धर्म विशेष के प्रति घृणा के आधार पर नहीं बनाया जा सकता है। फिलहाल तो कामन सिविल कोड असमाधानित मुद्दा रूपी जिन्न है, जो बाहर तो निकाल लिया जाता है लेकिन उसे लागू कर पाना तो बहुत दूर की बात है, उसका आकार प्रकार व परिभाषाएं कैसीं हों यह ही उचित व व्यवस्थित रूप से नहीं तय हो पाया है।

    .

     

     

  • मुलायम काका को अखिलेश भाई जी के संदर्भ में पत्र

    सामाजिक यायावर


    आदरणीय मुलायम काका,
    सादर चरण स्पर्श।

    जो उठापटक व घमासान चल रही है, बयानबाजी चल रही है, भावावेश चल रहा है व त्यागपत्र वाले पत्र, खून से लिखे पत्र आदि लिखे जा रहे हैं। मैंने सोचा कि मैं भी काका को पत्र लिख लूं, अवसर भी है अपनी बात कहने का। मेरा आपसे या अखिलेश भाई से स्वार्थ वाला कोई रिश्ता भी नहीं है, न ही मुझे चुनाव लड़ना है। मुझे आजतक आपकी पार्टी से या अखिलेश भाई की नेतृत्व वाली सरकार से, किसी प्रकार की कोई सुविधा ही प्राप्त हुई है और न ही मेरी आपसे या अखिलेश भाई से कभी व्यक्तिगत मुलाकात ही हुई है। इसलिए मेरा सोचना है कि मैं निष्पक्ष होकर अपनी बात कह सकता हूं। आशा है कि उदारमना आप मेरी धृष्टता को क्षमा करेंगें।

    आपकी बात :

    mulayam-singh-yadavइसमें कोई संदेह नहीं कि समाजवादी पार्टी सिर्फ और सिर्फ आपकी बनाई व बढ़ाई हुई है। आपने जिस जमाने में संघर्ष शुरू किया था, उस समय के जो हालात थे, आपने जिस तरह से अपनी जगह बनाई, पार्टी खड़ी की, सत्ता तक पहुंचे। आपके उस संघर्ष को समझ पाना, उस राजनैतिक चातुर्य की प्रशंसा कर पाना, आपकी दूरदर्शिता को देख पाने की क्षमता व दृष्टि आज के उन चाटुकार युवाओं में नहीं है जो अखिलेश भैया जिंदाबाद के नारे लगाते हुए अपनी वफादारी साबित करने का प्रयास करते हैं।

    अखिलेश भाई का जयकारा लगाने वाले लोगों में अपवादों को छोड़कर अधिकतर लोग ऐसे हैं, जो अखिलेश भाई की मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को देखते हुए साथ जुड़े, मुख्यमंत्री बनने पर सत्ता की मलाई खाने के लिए साथ जुड़े, जो अब जुड़ रहे हैं या वफादारी दिखा रहे हैं उनको यह लगता है कि अखिलेश भाई आज नहीं तो कल सत्ता में आएंगे।

    इस प्रकार के लोगों से यह अपेक्षा करना कि वे आपकी सांगठनिक क्षमता को समझ पाएंगें या समर्पित कार्यकर्ताओं का क्या अर्थ होता है यह ही समझ पाएंगें।

    लोग कुछ भी कहें, अखिलेश भाई को भी बुरा लग सकता है लेकिन मैं दो टूक कहना चाहता हूं कि अखिलेश भाई आपके कारण मुख्यमंत्री बने। यदि वे आपकी ही तरह एक सामान्य परिवेश के निकले सामान्य गुमनाम से युवा होते तो इतनी बड़ी पार्टी व मजबूत संगठन खड़ा करना उनके बूते की बात नहीं थी। लेकिन चाटुकार लोगों को इन सब तथ्यों की गहराई को समझने व स्वीकारने से कोई मतलब नहीं होता। उन्हें तो हल्ला गुल्ला करना होता है।

    ये जो युवा आज अखिलेश जी के साथ खड़े दिख रहे हैं उनमें से अधिकतर का किसी विचारधारा, विकास या परिवर्तन से कोई मतलब नहीं, समझ ही नहीं जो कोई मतलब हो पड़ेगा। उनको सिर्फ इससे मतलब है कि आपके रहते आप अपने पुराने समर्पित व जांचे हुए सहयोगियों व कार्यकर्ताओं को ही महत्व देंगें, जिनके दम पर आपने इतनी बड़ी पार्टी खड़ी की और अखिलेश भाई को मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इनको तो अपनी संभावनाएं देखनीं हैं, अपने जुगाड़ देखने हैं।

    अखिलेश भाई की बात :

    akhilesh-singh-yadavमैं अखिलेश भाई का अवलोकन उस समय से कर रहा हूं जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश लिया। निःसंदेह उन्होंने बहुत कुछ सीखा है, परिपक्वता की ओर बढ़े हैं। विनम्र हैं, शालीन हैं, संवेदनशील हैं, दूरदर्शी व इच्छाशक्ति रखते हैं। भारत की वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में ऐसे सुलझे हुए लोग बहुत नहीं है। यह आपकी ही रचनात्मकता है जो आपने ऐसा अपवाद नेता भारतीय राजनीति को उपलब्ध कराया।

    अखिलेश भाई करते हुए सीखते हैं, तीव्रता से सीखते हैं, बिना अपने मूल्यों को बदलते हुए सीखते हैं। लोकतंत्र को समझते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास करने की इच्छा नहीं रखते हैं। मेरा मानना है कि उनके ऐसा होने में आपकी परवरिश का योगदान है, इसलिए श्रेय आपको भी जाता है।

    यदि शुरू के दो सालों को छोड़ दें जिनमें आपको प्रधानमंत्री पद के नजदीक जाते देखने के लिए हड़बड़ी में सरकार को चलाना रहा। लोगों ने क्या देखा मैं नहीं जानता लेकिन मुझे स्पष्ट दिख रहा था कि अखिलेश भाई आपको प्रधानमंत्री देखना चाहते थे। अच्छी सोच रखने के बावजूद लोकसभा चुनाव इतने नजदीक थे कि लोगों को लुभाने की पुरानी शैली को अपनाने के अलावे उनके पास पार्टी द्वारा स्वीकार्य विकल्प नहीं था। मामला अधकचरा रह गया। न पुरानी शैली ही पूरी तरह प्रयोग हो पाई और न ही नई शैली का आगाज हो पाया।

    लोकसभा चुनावों के बाद अखिलेश भाई ने प्रयास करना शुरू किया कि वे अपनी सोच के हिसाब से काम कर पाएं। पहली बार इतनी कम उम्र का कोई युवा मुख्यमंत्री बना था, पहली बार इतना पढ़ा लिखा युवा मुख्यमंत्री बना था, बहुत लोगों को भ्रम भी रहा कि वे कठपुतली मुख्यमंत्री रहेंगें। ये भी कारण रहे कि उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा।

    पार्टी के अंदर, नौकरशाही आदि से सहयोग न मिलने के बावजूद अखिलेश भाई ने तुलनात्मक बेहतर तरीके से सरकार चलाई। अपराध वगैरह तो आकड़ों के मामले होते हैं। अन्यथा कुल मिलाकर अखिलेश भाई ने सरकार अच्छी चलाई। विरोधी भी उनकी आलोचना दावे से नहीं कर पाते हैं। केवल उत्तर प्रदेश में नहीं बल्कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अखिलेश भाई की लोकप्रियता बढ़ी है।

    मुझे लगता है कि अखिलेश भाई की यह इच्छा है कि उन्हें बिना अवांछनीय दबाव के अपने हिसाब से काम करने का अवसर मिले। ऐसी इच्छा रखना गलत भी नहीं क्योंकि युवा हैं, ऊर्जावान हैं, दृष्टि रखते हैं तथा काम करके स्वयं की क्षमता को साबित भी किया है।

    भारत में दीर्घकालिक राजनीति अब विचारों की, परिवर्तन की व कार्यशैली की होनी है। अखिलेश भाई की कार्यशैली से यह अनुमान होता है कि वे ऐसी ही दीर्घकालिक राजनीति करने की इच्छा रखते हैं।

    आप दोनों की बात :

    akhilesh-mulayamअखिलेश भाई जो संवेदनशील हैं, विचारशील हैं, वे जरूर ही अंदर से आपके प्रति आभार व धन्यवाद ज्ञापन का भाव रखते होगें। उनके व आपके मध्य जो भी वैचारिक मतभेद है वह पीढ़ी का अंतर ही होगा।

    मेरा आपसे निवेदन है कि आप अपने ऊपर विश्वास रखें। आपने अखिलेश भाई की बेहतरीन परवरिश की है। अखिलेश भाई को पाश्चात्य को भी समझने का अवसर मिला है। यदि वे बेहतर कार्यशैली से राजनीति करना चाहते हैं तो उनको करने दीजिए। इसमें आपका ही बड़प्पन है।

    आज की जो राजनैतिक परिस्थिति है उसमें आप लोगों के आपस में मनभेदों से बहुत बड़ा नुकसान है। संभव है कि अखिलेश भाई उस क्षति से कभी उबर न पाएं। यदि सत्ता उनके हाथ में लंबे समय तक हाथ में न रही तो उनके चाटुकार लोग पाला बदलकर भाग जाएंगें।  आपको भी क्षति है क्योंकि लोकप्रियता अखिलेश भाई के साथ है, उत्तर प्रदेश के लोग उनको पसंद करते हैं, लोग अब पुरानी शैली की ओर नहीं जाना चाहते हैं।

    मेरा निवेदन है कि आप लोग व्यवहारिकता को संज्ञान में रखते हुए, पिता-पुत्र वाले दंभ को दरकिनार करते हुए, चातुर्य व संतुलन के साथ मध्य का मार्ग निकालें। पिता-पुत्र के मध्य का दंभ सुलझाएं नहीं सुलझता है। सुलझता भी है तो सिर्फ पिता द्वारा पुत्र को स्वीकारने से। जीवन परिवर्तन व परिवर्तन को स्वीकारने का नाम है।

    आप चाहें तो मेरे पत्र को बचकाना व अप्रयोगात्मक भी मान सकते हैं। उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में अखिलेश भाई से बेहतर राजनेता कोई दीखता नहीं, इसलिए उनका अपव्यय होते देखने की इच्छा नहीं है, जबकि मेरा उत्तर प्रदेश की राजनीति से कोई लेना देना नहीं, मैं तो मतदान भी नहीं करता हूं। इसीलिए आप तक अपनी बात पहुंचाने की धृष्टता कर रहा हूं।

    सादर चरण स्पर्श।
    आपका,
    सामाजिक यायावर

    पुनश्च – एक दो साल पहले मैंने अखिलेश भाई को भी पत्र लिखा था, कई लोगों ने कहा भी कि वे उन तक मेरा पत्र पहुंचा देंगें। पत्र उन तक पहुंचा नहीं पहुंचा, मुझे अनुमान नहीं। लेकिन मैंने पत्र में जो लिखा था, आज वही होते दिख रहा है। 

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  • इंट्रेप्रिन्योरशिप एक सोच होती है – 001

    सामाजिक यायावर


    मेरी माता जी की एक चचेरी-ममेरी बहन हैं, माता जी से छोटी हैं सो छोटी बहन हुईं। मेरे गांव में ही उनका ब्याह हुआ। उनके एक लड़का एक लड़की हुई। उनके पति गांव-नाते से मेरे बड़े भाई लगते हैं, पारिवारिक रिश्ते में नहीं आते हैं, सो मौसी वाला रिश्ता ही चलता है। इसलिए उनके पति को मौसा लिखूंगा।

    मौसा किसान हैं। ट्रैक्टर हैं, ट्यूबवेल है, बाग-बगीचे हैं। अच्छी किसानी करते हैं, समृद्ध किसान हैं। बहुत ही सुंदर नक्काशीदार कुआं भी रहा उनके घर में जिसका प्रयोग आस पड़ोस के सभी लोग करते रहे। कुएं में गाय बैलों के पानी पीने के लिए बढ़िया अच्छी नांदें भी बनी रहीं, कुएं से पानी नाली में बहते हुए पास के तालाब में जाता रहा। बारिश के समय के अलावे कीचड़ नहीं रहता रहा। अब जरूरत नहीं रही तो कुआं बंद हो गया।

    मौसी जी शुरू से शौकीन व जागरूक रही हैं। अपने घर की किचेन को शहर जैसी किचेन की तरह बनवाया, वास-वेसिन, बर्तन को सुखाने का टंगना, बर्तन रखने का टंगना, रेफ्रीजरेटर, कूलर, गैस-चूल्हा, मिट्टी का चूल्हा, खाना रसोई में खड़े होकर बनाया जाता है। चाऊमीन, बर्गर, समोसा, जलेबी, पनीर पकोड़ा, पनीर समोसा मतलब बहुत कुछ बनाना जानतीं हैं और प्रेम से जबरदस्ती बुला कर ठूंस कर खिलाने में इनको आनंद आता है।

    पनीर घर में बनातीं हैं। दूध के लिए घर में कई गायें पाल रखी हैं। मैंने उनके पास हमेशा गायें देखीं। बढ़िया मोटी  खूबसूरत गायें। बिना कीचड़ के पूंछ फटकारती गायें। मन आ गया तो कभी कभार गायों को रंगबिरंगा भी कर देतीं हैं, मतलब परिवार के बच्चों की तरह गायों को पालती हैं। उनका कहना है कि हमारे बच्चों की देखभाल गाय करती है तो हमारा फर्ज है कि हम गायों को अपना परिवार व बच्चा मानें, उनके नखरे खुशी से झेलें।

    मौसी जी का यह कहना रहा है कि जो खाना है बताओ मैं घर में बनाऊंगी, जो बनाना नहीं आता होगा वह बनाना सीखूंगी फिर बनाकर खिलाऊंगी लेकिन बाजार से खरीद कर नहीं खाना है क्योंकि बाजार में खाने में मिलावटी सामान प्रयोग होता है गुणवत्ता अच्छी नहीं होती। इसी चक्कर में उन्होंने खूब सारी चीजें बनानी सीखीं।

    लड़का व लड़की दोनों इंजीनियर हैं। जब भी छुट्टियों में घर आते हैं तब मौसी जी रोज नाश्ते, लंच व डिनर में आज भी अलग-अलग चीजें बनाती हैं। जब मैं गांव में होता हूं तो सुबेरे सुबेरे पूछने आ जातीं हैं कि मैं नाश्ते में क्या खाऊंगा, धोखे से भी मुंह से कुछ निकल गया कि यह खाऊंगा तो वह चीज बनेगी।

    गांव में रहते हुए भी बच्चों को शहरों जैसी सुविधाएं दीं। बहुत अच्छी वाली तकिया, बहुत अच्छा बिस्तर मुलायम व गुदगुदा गद्दा, धुली व अच्छी चादरें व बेडशीट, मच्छरदानी, सोफा आदि। अच्छी मुलायम रोएंदार तौलियाएं। बच्चों को चलने के लिए उम्र व जरूरत के हिसाब से साइकिल व मोटरसाइकिल दीं।

    मौसी जी की उम्र पचास वर्ष से अधिक होगी। सुबह चार बजे उठती हैं, बड़ा घर है लेकिन खुद ही पूरे घर में झाड़ू लगाना, सफाई करना, गायों की देखभाल करना। फिर नाश्ता बनाना। फिर कपड़े धोना, फिर खाना बनाना, गायों की देखभाल। फिर कुछ देर आराम करतीं हैं, फिर खेत-खलिहान देखने जाती हैं कि काम-काज ठीक चल रहा है या नहीं, वहां से लौटकर फिर गाय व रात का भोजन। रोज साफ सुथरे बिस्तर लगाती हैं।

    शाम को भोजन के पश्चात अपने पति के साथ बैठकर या थकावट होने पर बिस्तर में लेटे हुए टीवी देखतीं हैं, समाचार देखतीं हैं। सो जाती हैं।

    मेरा मानना है कि मौसी जी अच्छा व स्वस्थ जीवन जीतीं आईं हैं। मेहनत किया, पैसा कमाया, पैसा सुविधाओं में खर्च भी किया, पैसा बचाया भी। मेरा अंदाजा है कि वे एक अच्छी कार खरीदने की हैसियत रखतीं है, दिल्ली जैसे शहर में एक अच्छा फ्लैट खरीद सकतीं हैं। क्या मालूम किसी मेट्रो शहर में उनके दो-चार प्लाट पड़े भी हों जिनकी कीमत आज करोड़ों में हो। किसी का बैंक अकाउंट या संपत्तियों की बहुत गहरी जानकारी नहीं रखी जा सकती है। कोई क्यों बताए भला।

    उनका लड़का गांव में रहते हुए भी सुविधाओं में पला बढ़ा। इंजीनियरी की और अब लगभग पचास-साठ हजार महीना की नौकरी करता है। मेट्रो शहरों में पचास-साठ हजार रुपए महीना कोई बड़ी रकम नहीं। छोटे से फ्लैट में रहता होगा। पैसे बचाता होगा, क्या पता मौसी अब भी उसको पैसे देतीं हों। अंदर की बात क्या मालूम। क्या पता जिस मेट्रो शहर में रहता है वहां घर खरीदने में भी आर्थिक मदद करें या किया हो। 

    दरअसल यह लेख इन सब बातों की चर्चा करने के लिए नहीं लिख रहा। यह सब बातें तो मुख्य बात का आमुख हैं सो अब आता हूं लेख की असली बात पर।

    मेरा मानना है कि जितना पैसा मौसी जी ने अपने लड़के मतलब मेरे मौसेरे भाई को इंजीनियरी की डिग्री दिलाने में खर्च किया, जितना रुपया जब वह नौकरी के लिए संघर्ष कर रहा था उस समय खर्च किया होगा, जितना रुपया उसको मेट्रो शहर में घर खरीदने के लिए सहयोग कर रहीं होगीं। उससे बहुत कम पैसे से कोई व्यापार करवा सकतीं थीं या खेती किसानी को आधुनिक व व्यापाराना तरीके से करवाने की सोच दे सकतीं थीं।

    जिस कृषि ने उनको इतना सक्षम व समृद्ध बनाया कि उन्होंने बेहतर जीवन जिया व बच्चों को सुविधाओं वाली परवरिश दी। उसी कृषि को और बेहतर तरीके से करते हुए इंट्रेप्रिन्योर बनने की सोच अपने बच्चों को क्यों नहीं दे पाईं। पढ़ी लिखी व जागरूक होते हुए भी ऐसी सोच क्यों नहीं रख पाईं।

    लाखों रुपए साल का निवेश सालों तक बिना उफ किए वह भी पचास-साठ हजार रुपल्ली महीना जैसे छोटे आउटपुट के लिए।

    यदि इतना ही रुपया, इतने ही सालों तक बिना उफ किए, बिना लाभ की चिंता किए किसी व्यापार में लगाने की सोच रखतीं तो उनका लड़का आज नौकरी करने की बजाय कई लोगों को अपने यहां नौकरी दे रहा होता। जब उसकी मां उसको गांव में शहर जैसी सुविधा दे सकतीं थीं तो वह दिल्ली जैसे शहर की सुविधाओं को अपने गांव में लाकर खड़ा कर सकता था।

    लेकिन हुआ क्या अच्छी खासी समृद्धि व समृद्धि की संभावनाओं को छोड़कर वह लाखों करोड़ों की भीड़ में एक भूला हुआ बिना पहचान वाला चेहरा बनने चला गया वह भी विकास के नाम पर, प्रगति के नाम पर।

    इसमें गलती मौसी की या उनके लड़के की भी नहीं है। अपने समाज की सोच ऐसी है कि वह नौकरी को महान मानता है, नौकरी देने को महानता नहीं मानता। दूसरा रिस्क लेने की भावना अभी गांवों के लोगों में नहीं आई हैं। नौकरी में लगने वाला निवेश उनको बिना रिस्क का लगता है जबकि व्यापार का निवेश उनको रिस्क का लगता है। सामंतवादी सोच वाली ऐंठन, अहम व लोगों क्या कहेंगे जैसी मानसिकता भी बहुत बड़ा कारण है। व्यापार में विनम्र होना पड़ता है। लेकिन नौकरी करने में भी तो बातों के जूते रोज खाने ही पड़ते हैं।

    मैंने कल अपने गांव के बारे में लिखा। जैसा कि मैं करता हूं, मैंने फेसबुक व व्हाट्सअप जैसी कई सोशल मीडियाओं में उस लेख को भी पोस्ट किया। कई लोगों के अहम को मेरा लेख अनजाने में चोट कर गया। उन्होंने लेख के भाव को समझने की बजाय नुक्ताचीनी करने को प्राथमिकता दी, कुछ ने तो लेख के तथ्यों को ही गलत साबित करने को प्राथमकिता दी।

    हमारी सोच का स्तर यह है कि हमारा अहम स्वीकारने को तैयार नहीं होता, समझने को तैयार नहीं होता, सुनने को तैयार नहीं होता। यही कारण है कि हममें दृष्टि विकसित नहीं हो पाती, हम अपने आसपास घटित हो रही घटनाओं को देख नहीं पाते।

    ऐसा नहीं है कि मेरा गांव एक आदर्श गांव है, भारत में ऐसे गांव बहुत हैं, सैकड़ों हैं। ऐसा नहीं है कि मेरी चचेरी-ममेरी मौसी ही ऐसी हैं, भारत के गांवों में हजारों की संख्या में ऐसी महिलाएं हैं लेकिन हम उनको देखते नहीं, क्योंकि हमारी हमारी कंडीशनिंग, हमारे पूर्वाग्रह, हमारा अहम, हमको आब्जर्व करने से रोकता है, हमें दृष्टिहीन बनाता है।

    दरअसल इंट्रेप्रिन्योरशिप एक सोच होती है, भारत को इस सोच की व दृष्टि की बहुत अधिक जरूरत है। तभी भारत, समाज व भारत के लोग वास्तव में विकसित व जागरूक होगें।

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  • अबुझमाड़ में इतिहास रचती टामन सिंह सोनवानी IAS, की प्रशासनिक टोली

    अबुझमाड़ में इतिहास रचती टामन सिंह सोनवानी IAS, की प्रशासनिक टोली

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मुझसे बहुत लोग असहमत रहते हैं इसके बावजूद मेरा दृढ़ता पूर्वक मानना है कि बस्तर में रमण सिंह जी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ प्रशासन संघर्ष-समाधान के लिए दीर्घकालिक रचनात्मक समाधान-प्रयासों के साथ प्रयासरत है। समाधान के लिए किए गए प्रयासों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि जो जमीन पर कार्य करने जा रहा है, वह व्यक्ति कैसा है, उसकी सोच, उसकी मानसिकता, उसकी क्षमता, उसका अपना व्यक्तिगत संकल्प, इच्छाशक्ति व दृढ़ता का स्तर क्या है। बस्तर संभाग के जिलों में ऐसे कई अधिकारी पहुंचे जिन्होंने अपने जीवन की सुरक्षा को ताक पर रखते हुए रचनात्मक-समाधान की ओर के प्रयासों के लिए वास्तव में जमीनी इतिहास रच दिया। ऐसे अधिकारियों को बस्तर में भेजे जाने के लिए, उनको प्रयास करने देने के लिए, दिशा-निर्देशन के लिए, प्रोत्साहन आदि के लिए निःसंदेह मुख्यमंत्री रमण सिंह जी, उनकी सलाहकार टोली व नौकरशाह आदि धन्यवाद के पात्र हैं।

    Raman Singh, the Chief Minister Chhattisgarh

    आधुनिक बस्तर में इतिहास रचने वाले अधिकारियों में एक नाम टामन सिंह सोनवानी व उनकी टोली का आता है। टामन सिंह सोनवानी व उनकी टोली के कामों की तासीर समझ पाने के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि उन्होंने काम किन परिस्थितियों में किया और कर रहे हैं।

    टामन सिंह सोनवानी लगभग ढाई साल पहले बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के जिलाधिकारी बनाए गए। नारायणपुर जिला क्या है, इस जिले में जिलाधिकारी या प्रशासन में होने का मतलब क्या है, यह समझने के लिए नारायणपुर जिला जिसके कुल क्षेत्रफल का लगभग 90% भाग घना जंगली क्षेत्र है, के “अबुझमाड़” को समझना पड़ेगा।

    “अबुझमाड़”

    “अबुझमाड़”, छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में लगभग चार हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का एक ऐसा इलाका जिसे आधुनिक काल में भारत में आदिवासियों का वास्तविक घर कहा जा सकता है जो बाहरी दुनिया से अछूता है। बाहरी दुनिया से कितना अछूता है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सन् 2009 में मुख्यमंत्री रमण सिंह जी के निर्देश पर छत्तीसगढ़ सरकार ने इस क्षेत्र को प्रतिबंधित क्षेत्र के दायरे से मुक्त किया। अबुझमाड़ क्षेत्र कई दशकों तक प्रतिबंधित क्षेत्र रहा, जो लोग इस क्षेत्र के नहीं थे उन लोगों का प्रवेश इस क्षेत्र में प्रतिबंधित रहा।

    यह क्षेत्र आजादी के कुछ दशकों बाद आदिवासी संस्कृति को संरक्षित करने के लिए प्रतिबंधित घोषित किया गया, इसलिए बाहरी दुनिया से अछूता हो गया हो, ऐसा नहीं है। अंग्रेज जिन्होंने दुनिया के कई देश खोजे, उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों को खोज लिया उन अंग्रेजों के शासन काल में भी लगभग डेढ़ सौ साल पहले जमीनी सर्वे किए जाने के बावजूद यह क्षेत्र अपवर्जित घोषित रहा।

    आदिवासियों की स्थानीय भाषा में “अबुझमाड़” का मतलब अज्ञात पहाड़ियां होता है। बहुत अधिक घने जंगलों, पहाड़ियों व इन्द्रावती नदी के कारण अबुझमाड़ बाहरी दुनिया से सदैव ही अलग थलग रहा है। बाहरी दुनिया से पूरी तरह अछूते अबुझमाड़ क्षेत्र में पहुंचने के लिए साधन केवल दुर्गम जंगली रास्ते रहे हैं इसलिए यहां प्रशासन की पहुंच तक नहीं रही, विकास की योजनाओं का पहुंचाना तो कल्पनातीत बात रही है। यह सबसे प्रमुख कारण रहा कि यह क्षेत्र माओवाद का सबसे मजबूत व मुख्य गढ़ बन गया।

    अबुझमाड़ क्षेत्र में अभी भी सिर्फ पैदल व साइकिल से ही पहुंचना संभव है। माओवादियों ने अबुझमाड़ जो उनका मुख्य गढ़ है को प्रशासनिक पहुंच से सुरक्षित करने के लिए यहां पहुंचने वाली जंगली पंगडंडियों वाले रास्तों में विस्फोटक सुरंगों (लैंड माइंस) आदि का प्रयोग बहुतायत से किया, ताकि प्रशासन व सुरक्षा बल यहां तक न पहुंच सकें।

    टामन सिंह सोनवानी व उनकी टीम के कार्य

    Taman Singh Sonwani IAS

    जिन इलाकों में कार, बस, जीप, मोटरगाड़ी आदि पहुंचने के रास्ते ही नहीं उन इलाकों में जिलाधिकारी द्वारा प्रशासन की टोली के साथ माओवादियों के धमकी देने के बावजूद पैदल व साइकिल आदि से किसी तरह पहुंचते हुए, माओवादियों के झंडा बैनर लगे स्थानों में अपनी जान की बिना परवाह करते हुए बैठकर आदिवासियों के साथ विकास की योजनाओं के संदर्भ में चर्चाएं की, समाग्री वितरण कराया, डाक्टरों की टोलियों को भी साथ ले जाकर चिकित्सा शिविर कराए।

    माओवादियों की समानांतर सरकार वाले इलाकों में जाकर आदिवासियों से विकास कार्यों व योजनाओं की चर्चा करना, उनका विश्वास अर्जित करके विकास के कार्यों को इतने दुर्गम स्थानों पर उनके दरवाजे तक पहुंचाना; निरंतर प्रयास, संकल्पशक्ति, इच्छाशक्ति, प्रशासनिक कुशलता व टोली भावना के साथ काम करने का ही परिणाम हो सकता है।

    आदिवासियों का विश्वास जीतने के लिए पेयजल, चिकित्सा शिविर, सोलर-ऊर्जा वाली लाइट आदि जैसी मूलभूत सुविधाओं से शुरुआत की गई। इन सुविधाओं का विरोध माओवादी भी नहीं कर पाए क्योंकि उनको भी पानी व प्रकाश आदि चाहिए। इन सुविधाओं से बढ़ते हुए कृषि, आर्थिक विकास, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) व 20 वर्ष पहले विद्युत वितरण की योजनाओं को माओवादियोँ द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद, आज 20 वर्ष पश्चात उन योजनाओं को चलाने की स्थिति तक पहुंचे। 

    अब स्थिति यह है कि सड़कों का भी निर्माण शुरू हो रहा है, पुल और पुलियाएं बन रही हैं जिसके कारण आर्थिक विकास व सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और बेहतर कर पाने में मदद मिल रही है तथा शताब्दियों से अपवर्जित इस इलाके को बाहरी दुनिया से जोड़ा भी जा सकेगा। इन सड़कों के निर्माण में मुश्किलों का अनुमान लगाने के लिए एक उदाहरण यह समझा जाए कि सिर्फ 26 किलोमीटर सड़क के निर्माण के लिए  23-24 पुल बनाने पड़ते हैं, कई घाट बनाने पड़ते हैं, औसतन लगभग हर एक किलोमीटर पर एक पुल। पुल व सड़क बनाने की सामग्री, यंत्र, इंजीनियर, मजदूर आदि का पहुंच पाना वह भी ऐसे दुर्गम व अशांत क्षेत्र में।

    नारायणपुर जिले में 176 राजस्व ग्रामों सहित कुल लगभग 400 गांव हैं। जिनमें से अबुझमाड़ क्षेत्र के 100 से अधिक गांवों में तामन सिंह सोनावनी व उनकी प्रशासनिक टोली द्वारा रचनात्मकता का इतिहास लिख दिया गया है। इन गांवों को जोड़ने के लिए, संपर्क में लाने के लिए पुल-पुलियों का बहुत अधिक निर्माण कराया गया है।

      स्वास्थ्य व पेयजल :

    आदिवासी लोग नदियों, चुओं, नालों, पहाड़ी झरने से आदि से पानी ढोकर घर लाते थे घरेलू प्रयोग के लिए, यही पानी पीते भी थे। टामन सिंह सोनवानी ने 100 से अधिक गांवों में सोलर-पंप लगवाकर पेयजल उपलब्ध करवाया। हर गांव से कुछ युवाओं को सोलर-पंप का प्रशिक्षण दिया गया ताकि वे सोलर-पंप का संचालन व देखभाल कर पाएं। इन गांवों में सोलर ऊर्जा से प्रकाश की व्यवस्था भी की गई है।

    सीमित वनोपज पर निर्भर आदिवासी समाज के बच्चे, महिलाए व वयस्क सभी कुपोषित हैं। तामन सिंह ने गर्भवती महिलाओं व बच्चों को कुपोषण से बचाने का बीड़ा उठाया और गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं व बच्चों को सुपोषित आहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनाई। स्वास्थ्य की जांच होती है, जांच में जिन पोषक तत्वों की कमी पाई जाती है उनके सप्लीमेंट्स दिए जाते हैं।

    दुर्गमता के कारण अबुझमाड़ के गांवों में पहुंचना सरल नहीं, इसलिए दुपहिया वाहनों में चलंत चिकित्सा केंद्र संचालित किए जाते हैं। चिकित्सा से संबंधित जितना आवश्यक सामान दुपहिया में लाद पाना संभव होता है उतना लाद कर गांव-गांव पहुंच कर लोगों को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराई जाती है। जहां जहां पुल पुलिया बनने से संपर्क रास्ते बनते जा रहे हैं वहां और बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जाने लगीं हैं।

    Sukma Badde

    आदिवासी युवती “सुकमा बड्डे” :

    अबुझमाड़ के इलाके की एक आदिवासी लड़की, वह पहली माड़िया लड़की है जिसने नर्सिंग की पढाई करने के बाद अपने ही समाज के लोगों के लिए काम करने की इच्छा जाहिर की तो टामन सिंह सोनवानी ने सहयोग किया। सुकमा बड्डे नाम की यह पढ़ी लिखी युवती जिसने कितनी भयंकर तकलीफों से पढाई पढ़ी होगी, किसी शहर में सरकारी नौकरी करते हुए चकाचौंध, शहर में घर, कार, अपनी संतानों की बेहतर शिक्षा आदि सुविधाओं का भोग कर सकती थी। लेकिन उसने स्वेच्छा से यह निर्णय लिया कि उसको अबुझमाड़ के बिना सुविधा वाले दुर्गम गावों में अपने समाज के स्वास्थ्य के लिए काम करना है।

    सार्वजनिक वितरण प्रणाली, PDS :

    दुर्गम स्थानों व रास्ते न होने के कारण आदिवासी लगभग 60 किलोमीटर पैदल चलकर 35 किलो का राशन लेने आते थे। केवल राशन लेने आने के लिए आने जाने में कई-कई दिन लगते थे। जंगली व पहाड़ी रास्तों में 35-35 किलो का वजन शरीर पर लाद कर चलना पड़ता था। टामन सिंह सोनवानी ने सार्वजिनक वितरण प्रणाली के केंद्र लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित करने की योजना बनाई। प्रशासन के द्वारा अबुझमाड़ में इतने अंदर की दूरी तक घुस कर काम करने की कुव्वत इसलिए आ पाई क्योंकि वह आदिवासियों का विश्वास जीत पाने में सफल रहा और योजनाओं को वास्तव में आदिवासियों तक पहुंचाया।

    कृषि, पानी, लिवलीहुड कालेज, दुग्ध-उद्योग व रोजगार के अवसरों से आर्थिक विकास :

    अबुझमाड़ में आदिवासी पेंडा कृषि करते आए हैं। पेंडा कृषि का मतलब जो अपने आप उग वो उग गया, बीज को जमीन पर ऐसे ही बिखेर दिया जो उगना हुआ वह उग गया। पेड़ों से बीज गिर कर जिन बीजों को स्वतः उगना हुआ वे उग गए। वन संपदा को बीन कर एकत्र करना। यही सब मिलाजुला कर कहलाती है पेंडा कृषि।

    प्रशासन ने आदिवासियों को कृषि का प्रशिक्षण दिलवाया। अब किसान मक्का लगा रहे हैं, सब्जियों की खेती कर रहे हैं, बागवानी लगा रहे हैं। किसानों को बाजार उपलब्ध करवाया जा रहा है। किसानों के परिवारों को पोषण वाला भोजन प्राप्त हो रहा है और आय भी हो रही है। आर्थिक विकास हो रहा है। क्रय-विक्रय शक्ति बढ़ रही है।

    किसानों को खेती करने के लिए पानी की कमी न हो, कृषि योग्य जमीन उपलब्ध हो इसलिए नदीं नालों में जगह-जगह छोटे-छोटे चेकडैम बनवाए गए हैं ताकि पूरे वर्ष खेती करने के लिए किसानों को पानी उपलब्ध रहे।

    आदिवासी युवाओं की समितियां बनाकर डेयरी खोलीं गईं हैं। गायों की देखभाल करने का प्रशिक्षण दिलवाया गया है। दूध के विपणन के लिए आदिवासी बच्चों के लिए विद्यालयों, छात्रावासों व सुरक्षा बलों के कैपों आदि में आपूर्ति होती है।

    विभिन्न प्रकार के रोजगारों के लिए प्रशिक्षण देने के लिए जिला मुख्यालय में लिवलीहुड कालेज की स्थापना की गई। यहां से निकली कई आदिवासी महिलाओं को बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बैंगलोर जैसे शहरों में नौकरियां दीं। इनमें से कुछ वापस आकर लिवलीहुड कालेज में ही प्रशिक्षण देने का काम करने लगीं क्योंकि उनको महसूस हुआ कि उनको अपने समाज के लिए काम करना चाहिए।

    जंगल में रहने के कारण, असुविधाओं में रहने के कारण उनके शरीर का स्टेमिना अच्छा होता है लेकिन सुरक्षा बलों की फिजिकल फिटनेस आदि जैसी परीक्षाएं कैसे उत्तीर्ण करें यह कुछ पता नहीं होता। इसलिए जिला मुख्यालय में सुरक्षा बलों में भर्ती होने की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए छात्रावास सहित प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया है। प्रशिक्षकगण व प्रशिक्षुगण यहीं रहते हैं और सिखाते सीखते हैं। सरकार ने बस्तर के आदिवासियों के लिए बस्तर बटालियन की स्थापना की है। यह भी यहां के आदिवासियों को दुनिया व मुख्यधारा से जोड़ने का दूरदर्शी प्रयास है।

    Taman Singh Sonwani driving motorcycle

    दुर्गम गांवों में स्वयं मोटरसाइकिल चलाकर लोगों के पास पहुंचने वाले नारायणपुर के जिलाधिकारी तामन सिंह सोनवानी कहते हैं कि रेडियो बहुत कुछ बदलता है। रेडियो बहुत सहजता से प्रयोग किया जा सकता है, बहुत तामझाम की जरूरत नहीं होती, हाथ में लेकर टहलते हुए भी सुना जा सकता है। इसलिए गावों में उन्होंने युवाओं को रेडियो उपलब्ध कराए हैं ताकि उन तक विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सरकारी योजनाओं की जानकारियां पहुंचती रहें। लोकतंत्र पर उनका विश्वास बने। देखने में आया है कि प्रधानमंत्री की मन की बात व मुख्यमंत्री का गोठ आदि कार्यक्रमों को भी सुनते हैं, फिर सहमति असहमति के साथ आपस में चर्चा करते हैं। रेडियो को कैसे संवाद का सशक्त माध्यम बनाया जा सके ऐसी योजनाओं पर विचार व काम चल रहा है।

    सुपर मार्केट :

    अबुझमाड़ के ओरछा नामक स्थान में जो ब्लाक मुख्यालय भी है, में सुपर मार्केट की स्थापना की गई। सुपर मार्केट की स्थापना के पहले स्थानीय आदिवासी युवाओं को सामान रखरखाव, लेखा-जोखा व विपणन आदि का प्रशिक्षण दिया गया। सुपर मार्केट का संचालन करने के लिए आदिवासी युवाओं की समिति बनाई गई।

    सुपर मार्केट की स्थापना दो प्रमुख कारणों से की गई। एक, दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली वस्तुओं को सरलता से उपलब्ध कराने के लिए जिनको लाने के लिए दुर्गम रास्तों में बहुत तकलीफें झेल कर मुख्यालय के बाजार तक आना पड़ता था। दो, किसान कृषि-उत्पाद का सरलता से विपणन कर सके, आदिवासी शिल्प आदि का सरलता से विपणन हो सके।

    रोजमर्रा के सामानों, वन-उपज, कृषि उपज, आदिवासी शिल्पकला आदि सामानों संग्रह, विपणन आदि करने के लिए सुपर मार्केट में सुपर मार्केट में गोदाम व दुकान की स्थापना की गई। इसी तरह की सुपरमार्केट अबुझमाड़ के अन्य स्थानों में भी स्थापित करने की योजनाओं पर काम चल रहा है।

    शिक्षा :

    Taman Singh Sonwani IAS with tribal students

    माओवादी इलाकों में बच्चों व बच्चियों को माओवादी प्लाटून या दलम में भर्ती करने के लिए ले जाया जाता है। स्कूलों व शिक्षा आश्रमों को चलने नहीं दिया जाता है। गांव बहुत दूर-दूर व विरले बसे हुए हैं। इसलिए ओरछा ब्लाक में अंदर के गावों में एक प्रयोग किया गया है। आठ अलग-अलग गांवो के स्कूलों व आश्रमों को मिलाकर एक स्थान पर बड़े आश्रम की स्थापना करके “आठ-आश्रम” बनाया गया है। ये आठ गांव 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर थे, बहुत ही दुर्गम गांव।

    स्कूलों व आश्रमों में आधुनिक तकनीक वाली टेलीविजन भी लगवाएं गए हैं ताकि बच्चे देखकर, सुनकर सीख सकें। बाहरी दुनिया से अनजान न रहें। सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं ताकि बच्चों का व्यक्तित्व विकास हो, आत्मविश्वास विकसित हो।

    दसवीं बारहवीं के बच्चे शिक्षक न होने की वहज से गणित व विज्ञान आदि जैसे विषयों में बहुत कमजोर रहते हैं। शिक्षक बीहड़ों में जाकर नहीं पढ़ाना चाहते हैं, इसलिए आउटसोर्सिंग करके नारायणपुर जिला मुख्यालय में कुछ भवन दिए गए हैं जहां छात्र व शिक्षक रहते हुए पढ़ते व पढ़ाते हैं। एक छात्र ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) की मुख्य प्रवेश परीक्षा में अर्हता प्राप्त की।

    चलते-चलते

    Taman Singh Sonwani IAS

    टामन सिंह सोनवानी से यह पूछने पर कि इतने असंभव क्षेत्र में इतने काम कैसे कर पाए। वे विनम्रता से जवाब देते हैं कि उन्होंने नहीं किया। ये काम इसलिए हो पाए क्योंकि प्रशासन में उनको मिली टोली बहुत अच्छी है और काम करना चाहती है।  उन्होंने कहा कि पुलिस की सोच भी रचनात्मक समाधान की है इसलिए प्रशासन के साथ तालमेल अच्छा व संपूरकता का रहता है। टामन सिंह सोनवानी उपलब्धियों के श्रेय का बड़ा हिस्सा पुलिस व उनके अधिकारियों को देते हुए कहते हैं कि सिविक एक्शन प्रोग्राम के प्रति पुलिस बहुत गंभीर है। इस कार्यक्रम के तहत पुलिस अधीक्षक गांव-गांव प्रशासन के साथ लोगों से मिलने जाते हैं, चर्चा करते हैं, संभव हुआ तो वहीं समस्याओं का निराकरण करने का प्रयास करते हैं, यहां तक कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यवहारिक रूप से सुदृढ़ व सरल बनाने में भी पुलिस का योगदान रहा।

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    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.